मुकुन्दरा के संरक्षण के पहिये में तब स्पंदन आया, जब रणथम्भोर से मीलों की दूरी तय कर के आये एक बाघ – “ब्रोकन टेल” की वर्ष 2003 में भारतीय रेल से हुई टक्कर में मृत्यु हो गयी। किसी ने सोचा ना था रणथम्भोर और मुकुन्दरा में कोई गलियारा अब भी बचा है। इस बाघ ने लोगों को एक विचार दिया, की मुकुन्दरा को बाघों के लिए एक सुरक्षित स्थल बनाया जा सकता है। यहाँ के लोगों ने अपने प्रयासों से इसे टाइगर रिज़र्व बनवाकर इस दिशा में एक महत्वाकांक्षी कदम बढ़ाया है।

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व हाड़ौती में स्थित राजस्थान का तीसरा बाघ संरक्षित क्षेत्र है जो कि हाड़ौती के तीन जिलों – कोटा, बूंदी, झालावाड़ और मेवाड़ के चित्तौड़गढ़ में विद्यमान है। चारों ओर घने जंगलों से घिरा हाड़ौती क्षेत्र चम्बल, काली सिन्ध, पार्वती, परवन जैसी बड़ी व अनेक छोटी-छोटी सदावाही नदियों के कारण जल समृद्ध है। इन नदियों के किनारे कहीं ऊंचे पर्वत, कहीं गहरी घाटियां और बीहड़ जंगल हैं। विंध्यन पर्वतमाला के पहाड़ी मैदान और मालवा पठार से जुड़े होने के कारण यह एक पहाड़ी क्षेत्र है जिसमें मुख्य पर्वत दरा या मुकुन्दरा हिल्स है।

यह रिजर्व कोटा के दक्षिणी भाग पर एक रेखाकारित (linear) वन क्षेत्र है जो चित्तौडगढ़ में, भैंसरोडगढ़ अभयारण्य के पास स्थित श्रीपुरा गाँव से बाडोली होते हुए दक्षिण-पूर्वी दिशा कि तरफ झालावाड़ के गागरोन में परवन और आहू नदियों के संगम तक विस्तृत है। यह वन क्षेत्र मुख्यतः दो समान्तर संकीर्ण रूप से 80 किलोमीटर कि लंबाई में फैली पर्वतमाला के रूप में है। मुकुन्दरा हिल्स कि समुद्र तल से औसत ऊंचाई 300 मीटर जो चाँद बावडी नामक स्थान पर 517 मीटर की उच्चतम ऊंचाई प्राप्त करता है। इन दोनों पर्वतमालाओं के बीच में सघन और सुन्दर वन हैं जो कई प्रकार के वन्यजीवों के लिए जाने जाते हैं। राजस्थान सरकार द्वारा इन घने जंगलों एवं वन्यजीवों को संरक्षित करने के लिए इन्हें वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया जिनको दरा और जवाहर सागर वन्यजीव अभयारण्य के नाम से जाना गया।

मुकुन्दरा का इतिहास एक झलक में

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व की पृष्ठ भूमि में कोटा का अत्यन्त प्राचीन एवं गौरवशाली इतिहास छिपा है। इस क्षेत्र में आदिम युगीन बस्तियों का प्रसार चम्बल अथवा चर्मण्यवती नदी के किनारे हुआ जिससे मुकुन्दरा हिल्स को आदि मानव की शरणस्थली होने का गौरव प्राप्त हुआ। मुकुन्दरा कि पहाड़ियों में बनी प्राकृतिक गुफाओं में आदिम युगीन मानव के कुछ शैल चित्र खोजे गये हैं जिनमें आदिम युगीन जीवन शैली को दर्शाया गया है साथ ही विभिन्न प्रकार के जीवों कि कई आकृतियाँ भी उकेरी गई हैं। ये शैलचित्र युक्त गुफाएँ चम्बल किनारे पहाड़ियों, नारसिंही माताजी, जवाहर सागर बांध, गैपरनाथ, गराडिया महादेव, दरा और कोलीपुरा स्थितः “डाकन का टोल” पर देखे जा सकते हैं। (Sharma, 2017)

Rock Painting - Mukundara

आदिम युगीन जीवन शैली को दर्शाता “डाकन का टोल” पर स्थितः शैलचित्र (फ़ोटो: प्रवीण कुमार)

शैल चित्रों के अलावा यहाँ कुछ प्राचीन शैल आकृतियाँ भी मिली हैं। ब्रिटिश राजनैतिक अभिकर्ता और खोजकर्ता जेम्स टॉड ने 1820 के दशक में 5वीं शताब्दी की एक खंडहर संरचना, “भीम की चौरी” का पता लगाया था। टॉड ने अपने एनल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान नामक पुस्तक में उल्लेख किया है कि 17वीं शताब्दी में कोटा के एक शासक ने इसके पास ही एक नई हवेली या कोठी बनाने के लिए इसके पत्थरों का इस्तेमाल किया था। 1998 में, इस हवेली के परिसर में एक खोज के दौरान मकरप्रणाल के रूप में नक्काशी की गई एक प्राचीन आकृति मिली। (Narayan & Mankodi, 2010)

मुकुन्दरा में दो महत्त्वपूर्ण रियासत कालीन गाँव भी हैं। गिरधरपुरा गाँव कोटा राज्य के बसने के पहले से अस्तित्व में है जो कि एक टकसाल हुआ करता था और यहाँ अदालत भी बैठती थी। आज भी गाँव में जगह-जगह प्राचीन मंदिर, बावडी और मकान देखे जा सकते है। दूसरा गाँव है मंदिर गढ़। इतिहासकार डॉ फिरोज अहमद के अनुसार इस गाँव को मालवा के शासक राजा नर बरमन ने बारहवीं सदी में बसाया और कई मंदिर बनवाए इसलिए इसे मंदिर गढ़ कहा जाता है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि इसका नाम महेंद्र भील के नाम पर महेंद्रगढ़ रखा गया था जो कालांतर में मंदिर गढ़ के नाम से जाना जाने लगा। इस गाँव के मंदिरों को मुग़ल शासकों द्वारा खंडित कर दिया गया था। खंडित मूर्तियाँ जगह-जगह ज़मीन में गड़ी हुई देखी जा सकती हैं।

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व में ऐतिहासिक महत्व के कई किले भी शामिल हैं जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है गागरोन का किला। युनेस्को विश्व विरासत गागरोन किला झालावाड़ से 10 किमी दूर काली सिंध नदी और आहु नदी के संगम पर स्थित है। तीन ओर से आहू और काली सिंध के पानी से घिरा हुआ यह एक जलदुर्ग एवं गिरीदुर्ग है। किला विंध्य हिल रेंज की सीधी खड़ी चट्टानों पर एक पठार के पूरे खंड को कवर करता है। किले में तीन परकोटे है जबकि राजस्थान के अन्य किलो में दो ही परकोटे होते है। इसके दो प्रवेश द्वार है जिनमे से एक पहाड़ी की तरफ खुलता है तो दूसरा नदी की तरफ। नदी के किनारे, 93.6 मीटर की ऊँचाई पर सीधी खड़ी पहाड़ी, गिध-कराई किले को दुर्गम बनती थी जिसका निष्पादन (फांसी का दंड) के लिए भी उपयोग किया जाता था। इस किले का निर्माण बारहवीं सदी में डोड परमार शासकों द्वारा करवाया गया था, जो बाद में खींची (चौहान) शासकों के शक्ति केन्द्र के रूप में विख्यात हुआ। (UNESCO Addendum, 2013)

विश्व विरासत होने के साथ ही ये दुर्ग हीरामन तोते के लिए भी जाना जाता है जिसे यहाँ गागरोनी तोता (Alexandrine parakeet – Psittacula eupatria) कहा जाता है। गागरोनी तोता पुराने समय में यहाँ हजारों कि संख्या में पाए जाते थे जो अब अज्ञात कारणों से बहुत कम रह गए हैं।

कोटा शहर चंबल नदी के दाहिने किनारे पर राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित है, जिसे हाड़ौती या हाड़ाओं की भूमि के रूप में जाना जाता है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार कोटा की स्थापना तात्कालिक बूंदी महाराज समर सिंह के पुत्र जेटसी द्वरा भील सरदार ‘कोट्या’ को 1264 के एक युद्ध में मार कर की गयी। कोट्या भील चंबल नदी के निकट स्थित अकेलगढ़ का शासक था जिसके किले के अवशेष आज भी उपस्थित है। जेटसी का पुत्र सुरजन, कोट्या की वीरता से प्रभावित था तथा इस भीलों के राज्य का नाम कोटा रख दिया। संभवतः कोटा एक-मात्र नगर है जो किसी विजयी के स्थान पर पराजित व्यक्ति के नाम पर बना है। (Crooke, 2018)

तत्कालीन कोटा राज्य बूंदी, जयपुर, मेवाड़, झालावाड़, टोंक और मध्य प्रदेश की रियासतों से घिरा हुआ था। यह सभी राजपूताना रियासतों के सबसे बड़े जंगलों में से एक था, जो 1900 के शुरुआती भाग में लगभग 3600 वर्ग किमी के क्षेत्र को आच्छादित किये हुए था। इन वनों में विभिन्न प्रकार के बड़े मांसाहारी जीव जैसे बाघ, बघेरा, भालू, लकड़बग्धा और भेड़िये शामिल थे। शाकाहारी वन्यजीवों में सांभर, चीतल, चौसिंघा, नीलगाय और जंगली सूअर भी इन वन खंडों में पाए गए थे। बोराबास विशेष रूप से चीतल समृद्ध होता था जहाँ कभी एक झुण्ड में 500 से अधिक चीतल दिखाई देते थेl कोटा के आसपास काले हिरण और जंगली सुअर आम थे। (Singh & Reddy, 2016)

प्राकृतिक सौन्दर्य और वन्यजीवों का स्वछन्द विचरण यहाँ के शासकों को आखेट के लिए आकर्षित करता था। लेकिन मालवा पठार से लगा हुआ दरा का विस्तृत पहाड़ी क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम क्षेत्र था। जिसको आसानी से केवल दर्रा की नाल (दरा) से होकर ही पार किया जा सकता था। चित्तौड़ से झालावाड़ जाने के लिए यह एकमात्र मार्ग था जो कि कोलीपुरा से 38 किलोमीटर दूर था। यह क्षेत्र कोटा रियासत के द्वितीय शासक राव मुकुन्द का पसंदीदा आखेट क्षेत्र था, राव मुकुन्द की इस क्षेत्र में अत्यधिक रुची होने के कारण दरा कि पहाड़ियों का नाम मुकुन्द दरा पहाड़ियां रख दिया गया था, जिसे कालांतर में मुकुन्दरा (मुकुन्दरा हिल्स) के नाम से जाना गया। टाईगर रिजर्व का नाम पहले राजीव गांधी टाइगर रिजर्व प्रस्तावित था लेकिन इसके मुख्यतः मुकुन्दरा हिल्स पर होने के कारण और दरा के ऐतिहासिक महत्व से प्रेरित होकर मुकुन्दरा हिल्स टाईगर रिजर्व रखा गया है।

राव मुकुन्द अक्सर मुकुन्दरा हिल्स क्षेत्र में आखेट के लिए शिविर आयोजित किया करते थे तथा इस प्रयोजन हेतु राव मुकुन्द ने दरा में महल का निर्माण कराया। यह महल, दरा महल या शिकारगाह के नाम से जाना जाता है जिसे प्रायः जानकारी के अभाव में कई लोग अबली मीणी का महल समझते हैं। जबकि अबली मिणी का महल दरा महल से कुछ ही दूर पहाड़ी पर राव मुकुन्द सिंह द्वारा खैराबाद की रहने वाली उनकी ख्वास अबली मिणी के लिए बनवाया गया था।

राव मुकुन्द सिंह (1648-1658)

मुग़ल बादशाह जहाँगीर द्वारा दरा के क्षेत्र (तत्कालीन खैराबाद के निकट) में सन् 1605 से 1627 ईस्वी के बीच शिकार का वर्णन तुज़्क-ए-जहाँगीरी (जहाँगीर की जीवनी) में किया गया हैं जिसके अलग-अलग अनुवादकों के अलग-अलग वर्णन मिलते हैं। अनुवादक अलेक्जेंडर रोजर के अनुवाद में जहाँगीर को एक शिकार यात्रा के दौरान शिकार शिविर के पास सड़क पर 14  सैंडग्राउस, 3 हेरोन, नीलगाय आदि के शिकार का वर्णन है। उसी शिविर के दौरान बादशाह ने घिरी गाँव के पास एक बब्बर शेर के होने कि खबर पाकर शिकार किया। जैसा कि बब्बर शेर की बहादुरी  स्थापित थी, बादशाह उसकी आंतों को देखना चाहता था तथा उन्हें निकाले जाने पर पाया कि अन्य जानवरों के विपरीत शेर के पित्ताशय उनके जिगर के भीतर थे। बादशाह जहांगीर को लगा शायद शेर इस कारण से साहसी होते है, जबकि असलियत में शेर के पित्ताशय अन्य जानवरों के समान ही होते हैं। (Roger, 2016)

थैक्सन के अनुवाद के अनुसार इस यात्रा के दौरान बादशाह ने 3 हेरोन, नीलगाय, चौसिंघा और बाघ का शिकार किया था। यहाँ यह विचारनिए है कि उल्लेखित हेरोन कि जगह वहाँ सारस या अन्य कोई पक्षी भी हो सकता है। बादशाह के शिकार का विवरण दर्शाता है कि यहाँ बाघ और शेर पाए जाते थे। (Thackston, 1999)

कोटा के कई लघु चित्रों में शेर और चीता शामिल हैं जो यहाँ इनके अस्तित्व को दर्शाते है। चित्रों के आधार पर, कोटा में 18वीं शताब्दी तक शेर थे। 1695-1707 ईस्वी कि एक उत्कृष्ट तस्वीर में कोटा के महाराव राम सिंह I को मुकुन्दरा में शेरों का शिकार करते चित्रित किया गया है। इस तस्वीर में राव राम सिंह I को चार महिलाओं के साथ मचान पर बैठा दिखाया गया है। (Anupama Thakur, 2009)

रामसिंह प्रथम ने दरा के पास ही वर्तमान रावंठा गाँव में एक महल बनवाया था जो कि ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक अभिकर्ता कर्नल टॉड के अनुसार पिंडारियो के विरुद्ध युद्ध के समय अक्सर उपयोग में लिया जाता था। उस दौरान यहाँ पर बहुत सघन जंगल थे जिसकी वजह से कालांतर में इस महल को शिकारगाह के रूप में विकसित किया गया, पूर्व में महल का नाम महाराव राम सिंह के नाम पर रामठा महल था, परंतु कालांतर में इसे रावंठा महल के नाम से जाना जाने लगा। राव रामसिंह ने इस महल के पास ही दो पहाड़ियों के बीच एक पक्का बाँध बनाकर एक तालाब का भी निर्माण कराया था, जिसे रामसागर के नाम से जाना जाता है। इस तालाब के भीतर एक जनाना तथा एक मर्दाना दो शिकार मालाओं का निर्माण कराया गया था। ये शिकारमाले दर्शाते हैं कि उस समय महिलायें भी शिकार में रुचि रखती थीं तथा महाराज के साथ आखेट पर जाया करती थी।

रामसागर तालाब के भीतर मौजूद जनाना माला एवं मर्दाना माला (फ़ोटो: हरी मोहन मीना)

उस जमाने में इस रामसागर से एक पक्का धौरा (नाली) भी बनवाया गया था, जिससे आस-पास के क्षेत्र में सिंचाई के लिये पानी लिया जाता था। इसके अलावा झामरा, बेवडा तलाई, गड्ढे का माला, करौंदी कंजार के माले भी शिकार के लिए बनवाए गए शिकारमाले में शामिल है। ऐसा माना जाता है कि महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय के शासनकाल के दौरान कोटा रियासत में 150 शिकारमाले हुआ करते थे जहां से वे प्रतिवर्ष 4-5 बाघों का शिकार किया करते थे। (Singh & Reddy, 2016)

शेवदर गंगेयाजी द्वारा चित्रित एक तस्वीर में महाराज दुर्जन साल और जसवंत सिंह को एक सुंदर हरे भरे जंगल में शेर के परिवार देखते हुए दर्शाया गया है जो एक शेर परिवार के साथ उनकी मुठभेड़ को दर्शाता है। 1784 में जोशी हथुवा की एक पेंटिंग में अलनिया के जंगलों में महाराज उम्मेद सिंह प्रथम (1771-1819) को शिकार करते हुए दिखाया गया है। (Thakur, 2009)

कोटा के जंगलों में ढोल (जंगली कुत्ते) भी पाए जाते थे। इन जंगलों में इनको 1920 तक देखा गया जब बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने बोरबन (संभवतः बोराबास) में एक को देखकर अपनी डायरी में नोट किया, निश्चित रूप से तब भी यह दुर्लभ रहा होगा।

आधुनिक भारतीय शासक अपने शिकार में सैन्य टुकड़ी को भी शामिल किया करते थे जिससे उनकी सेना युद्ध के लिए तैयार हमेशा तयार रहे। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में कोटा राज्य से ढेरों सैन्य टुकड़ी के शिकार में शामिल होने कि गतिविधियों को जेम्स टॉड ने “ए स्पीशीज़ ऑफ पेटी वार” के रूप में चित्रित किया था। (Hughes, 2009)

दरा हमेशा से बाघों का पर्यावास रहा है, 1950 तक कोटा के अधिकतर जंगलों में बाघ पाए जाते थे, जो शिकार के कारण कोटा से विलुप्त हो गए। प्रिया सिंह और डॉ जी वी रेड्डी कि एक रिपोर्ट के अनुसार 1950 – 60 के दशक के दौरान हाड़ौती क्षेत्र में 100 बाघों का शिकार हुआ। 1960 के दशक तक बाघ सिर्फ दरा जैसे जंगलों तक सीमित रह गए, जिसके बाद आबादी घटती गई और 1984 में छीपाबड़ौद क्षेत्र में एक अवयस्क बाघ कि स्थानीय शीर्षस्थ स्टेशन अधिकारी द्वारा तुरंत गोली मारकर हत्या करने के बाद लुप्त हो गई।

मुकुन्दरा के वन:

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व के पहाड़ी इलाके, घाटियां और नदी-नाले इस क्षेत्र में समृद्ध जैव-विविधता को बनाए रखते हैं। यहाँ के जंगलों को चैंपियन और सेठ वन वर्गीकरण 1968 के अनुसार 2 व्यापक वन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है, उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन और उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन।

धोक (Anogeissus pendula) यहाँ के जंगलों में मिलने वाला मुख्य वृक्ष है, धोक के बाद यहाँ पलाश (Butea monosperma), तेंदू (Diospyros melanoxylon), कड़ाया (Sterculia urens) यहाँ के अधिकांश पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। बारिश के दिनों में, काले और सफेद धोक (Anogeissus pendula & A. latifolia) के पेड़ पहाड़ियों को हरियाली देते हैं। शुष्क ग्रीष्मकाल में, पलाश और सेमल अपने फूलों की लाल आभा देकर आकर्षक छटा प्रदान करते हैं।

Wetland - Mukundara

मुकुन्दरा के कई नम-भूमि क्षेत्रों के पास अर्जुन, जामुन बहेड़ा, आदि के छोटे समूह पाए जाते हैं।

करोंदा (Carrisa congesta), गुरजन (Lannea coromandelica), बहेड़ा (Terminalia bellirica), सालर (Boswellia serrata), अमलतास (Cassia fistula), बांस (Dendrocalamus strictus), महुआ (Madhuca indica), बील (Aegle marmelos), बबूल, जामुन (Syzygium cumini), पीपल (Ficus religiosa), बरगद (Ficus benghalensis), नीम (Azadirachta indica), इमली (Tamarindus indica), आम (Mangifera indica) आदि के पेड़ इस वन क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में है। अर्जुन (Terminalia arjuna), दूधी (Wrightia tinctoria) और कदंब (Mitragyna parviflora)  भी नम स्थलों और धाराओं में पनपते हैं।

यहाँ कई जगह छोटे भाग में धोक, धावडा, अर्जुन, असान (Terminalia tomentosa), हरड़ (Terminalia chebula), सिरस (Albizia lebbeck), शीशम (Dalbergia spp.), चुरेल (Holoptelea integrifolia) आदि और इनके सहयोगी मिश्रित विविध वन बनाते हैं।

कांटेदार वनों का विस्तार तुलनात्मक रूप से कम दिखाई देता है, इन वनों में खैर (Acacia Senegal), रोंज (Acacia leucophloea), कैर (Capparis decidua), गोया खैर (Dichrostachys cinerea), डंडा ठोर (Euphorbia neriifolia), गुलाबी बबूल (Mimosa hamata) आदि पाए जाते हैं।

कई दुर्लभ पौधों की प्रजातियाँ जैसे सर्पडंडी (Adansonia digitata), खेजरी (Prosopis cineraria), गूगल (Commiphora mukul), विजयसार (Petrocarpus marsupium) जंगली केला (Ensete superbum), उपरारोही और थलीए ऑर्किड जैसे वांडा (Vanda tessilata), Aerides, नर्विलिया (Nervilia araguna), कंदिल पौधे जैसे प्यूरीया (Puraria tuberilata), Corallocarpus epigeous, आरिसेमा (Arisema torusum), हल्दी (Curcuma longa) आदि जैसे पौधे भी मुकुन्दरा में पाए जाते हैं। (Dadhich, 2002)

मुकुन्दरा के वन्यजीव:

यह एक सुखद बात है कि बाघ एक बार फिर से इस क्षेत्र में एक प्रमुख आकर्षण बन चुके हैं। बाघों के अलावा मुकुन्दरा अन्य वन्यजीवों के लिए भी जाना जाता है। यहाँ मांसाहारी जीवों में बघेरा, भेड़िया, लकड़बग्धा, सियार, लोमड़ी  और जंगल कैट आदि पाए जाते हैं।

शाकाहारी जीवों में हनुमान लंगूर, चीतल, सांभर, चिंकारा, नीलगाय, और खरगोश अच्छी संख्या में हैं और सभी मौसमों में आसानी से देखे जा सकते हैं। सर्वाहारी स्थानपाई जीवों में यहाँ भालू, जंगली सूअर, और इंडियन सॅमाल सिविट पाए जाते हैं। यहाँ कई जगह नेवले, चींटीखोर, और साही भी पाए जाते हैं। यहाँ सरीसृपों कि 18 प्रजातियाँ पाई जाती है जिनमें भारतीय अजगर यहाँ मिलने वाला सबसे बड़ा सरीसृप है। (Sultana, 2007)

मुकुन्दरा से पक्षियों की 225 से अधिक प्रजातियां अनुमानित कि गई हैं। जिनमें कई प्रकार के शिकारी पक्षी, उल्लू, सारस क्रेन, क्रेस्टेड सरपेंट, ईगल, शॉट टोड ईगल, पैराडाइज फ्लाई कैचर, इंडियन पिट्टा, विभिन्न प्रजातियों के पैराकीट, प्रिनिया,  नाइटजार, स्टॉर्क बिल्ड किंगफिशर, और मुनिया आदि विशेष आकर्षण के केंद्र हैं।

गागरोन के पास स्थितः लक्ष्मीपुरा और नोलाव के तालाब, गिरधरपुरा के छोटे और बड़े तालाब, श्रीपुरा का तालाब मुकुन्दरा के कुछ महत्त्वपूर्ण आर्द्रभूमि के रूप में प्रवासी पक्षियों का पर्यावास बनाते हैं जहां सर्दियों में हजारों कि संख्या में पक्षी देखे जा सकते हैं। इनके अलावा कडप का खाल में मगर और कछुए देखे जा सकते हैं।

Felis Chaus - Mukundara

सावनभादों बांध के पास जंगल कैट (Felis chaus) को आसानी से देखी जा सकता है।

मुकुन्दरा के सावन भादों बांध में लगभग 80 मगरमच्छ वन विभाग ने छोड़े हैं, जो कि एक बाघ प्रयवास के लिए गलत निर्णय साबित हो सकता है। इस बांध पर कई प्रकार के शिकारी पक्षी देखे जा सकते है, यह प्रवासी गिद्धों  का फीडिंग ग्राउन्ड है। यहाँ जंगल कैट (Felis chaus) भी आसानी से देखी जा सकती है।

दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी लुप्तप्राय लॉंग बिल्ड वल्चर कि कालोनी चंबल की लहरदार घाटियों में स्थित है। इन वल्चरस को गैपरनाथ और गराडिया कि कराइयों के पास आसमान में उड़ान भरते देखा जा सकता है। मुकुन्दरा रिजर्व के चम्बल नदी में चिकने फर वाले उदबिलावों को बार-बार कूदते हुए देखा जा सकता है। ये सुबह से शाम के समय बहुत सक्रिय रहते हैं और मानवों के हलचल को महसूस करते ही जोर-जोर से शोर करने लगते हैं। यहाँ कई घंटों तक मगर को बिना हिले डुले घूप सेकते हुए नदी के किनारे और नदी के बीच चट्टानों देखा जा सकता है।

बाघ संरक्षित क्षेत्र होने का सफर:

कोटा के आम जनों का ध्यान मुकुन्दरा हिल्स के टाइगर रिजर्व बनने कि संभावनाओं पर वर्ष 2003 में केंद्रित हुआ जब उन्होंने एक बाघ को अपने वन क्षेत्र में मृत पाया। उस समय किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि एक अकल्पनीय मेहमान उनके वनों कि परिभाषा बदल देगा।

2002 में, जब रणथम्भोर प्रबंधन रिजर्व से निकले एक बाघ को खोजने की कोशिश कर रहा था, तब दरा से खबर आई कि कुछ लोगों ने बाघ के पैरो के निशान देखे। पहले तो दरा में बाघ की मौजूदगी की संभावना को खारिज कर दिया गया था, लेकिन पगमार्क के सबूत मौजूद थे। 15 जुलाई 2003 को एक दिल दहला देने वाले दृश्य ने इस रहस्य को सुलझा दिया जब रात में एक बाघ द्रुतगामी राजधानी एक्सप्रेस की चपेट में आने से दरा रेलवे ट्रैक के पास मृत पाया गया। उस मृत बाघ कि पहचान उस समय नहीं हो पाई थी, वन विभाग उसे मध्य प्रदेश से आया हुआ बाघ बात रहा था। वहीं दूसरी ओर रणथम्भोर से निकला बाघ अभी तक लापता था। (Khandal et al., 2014)

Broken Tail

वन्यजीव प्रेमी श्री रवींद्र सिंह तोमर द्वारा 2003 मे लिया गया ‘ब्रोकन टेल’ के रेल दुर्घटना मे मारे जाने के बाद का चित्र जिसने दरा के वनों कि परिभाषा बदलने मे महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

पूरी कहानी आखिरकार अप्रैल, 2005 में सामने आई, जब वन अधिकारियों ने रणथम्भोर के लापता बाघ ‘ब्रोकन टेल’ कि तस्वीर का मिलान मृत बाघ कि तस्वीर से किया। दरा में पाया गया मृत बाघ ‘ब्रोकन टेल’ ही था यह स्थापित हो चुका था। ‘ब्रोकन टेल’ रणथम्भोर से 140 किमी की दूरी तय करके यहाँ पहुँचा था। वह घटना आज भी कोटा के वन्यजीव प्रेमी श्री  रवींद्र सिंह तोमर की आंखों में सुस्पष्ट है। इन्होंने ही उस ऐतिहासिक चित्र को अपने कैमरे में कैद किया जिसने बाघ का दुखद अंत दिखाया। मुकुन्दरा हिल्स को राज्य का तीसरा बाघ अभयारण्य बनाने में उस तस्वीर का अहम योगदान है।

इस दुर्घटना में ‘ब्रोकन टेल’ की मृत्यु के बाद बाघों के जीवन की ऐसी समस्याएँ सामने आईं जिसके बारे में किसी ने कभी नहीं सोचा था – बाघों को अधिक स्थान और आसपास के बाघ पर्यावास (habitat) के साथ संयोजकता (corridor) की आवश्यकता है।  वन विभाग ने इस तथ्य को स्थापित किया कि ‘ब्रोकन टेल’ ने कोटा पहुंचने के लिए विभिन्न पहाड़ी मार्गों का उपयोग किया। फिल्म निर्माता कोलिन स्टैनफोर्ड जॉनसन द्वारा ब्रोकन टेल पर निर्मित एक डॉकउमेन्टरी ने साक्ष्य एकत्र किए और साबित किया कि कोटा तक जाने के लिए बाघ ने पहाड़ी गलियारे का उपयोग किया। ‘ब्रोकन टेल’ द्वारा इस्तेमाल किया गया सटीक मार्ग हमेशा एक रहस्य रहेगा लेकिन एक अन्य बाघिन (टी -35) इस संबंध में अधिक प्रकाश डालती है।

यह अक्सर माना जाता है कि केवल बाघ ही रणथम्भोर से बाहर निकलते हैं लेकिन इस बाघिन ने इस धारणा को गलत साबित किया। टी -35 मूल रूप से रणथम्भोर के गिलई सागर क्षेत्र से थी जो बाहर निकलकर कोटा – सुल्तानपुर क्षेत्र में दिसम्बर 2009  में पाई गई। यह बाघिन मार्च 2016 में खेवड़ा गांव के पास मृत पाए जाने तक इस क्षेत्र में रही।

टी -35 के बाद, रणथम्भोर से एक और बाघ टी – 98 निकला जो आश्चर्यजनक रूप से सुल्तानपुर के जंगलों से होते हुए दरा पहुँचा। नियमित अंतराल पर बाघों का आना साबित करता रहा है कि यह इलाका बाघों के लिए उपयुक्त है जिसे सरिस्का, रथम्भौर, बूंदी और कोटा को मध्य प्रदेश से जोड़ने वाला एक बड़ा गलियारा (corridor) बनाया जा सकता है। मुकुन्दरा को रणथम्भोर से कम से कम दो संभावित गलियारे जोड़ते हैं – एक इंद्रगढ़ के माध्यम से – लाखेरी –  रामगढ़ विषधारी अभयारण्य – डाबी – जवाहर सागर अभयारण्य और दूसरा चंबल और कालीसिंध नदियों से गागरोन होते हुए दरा तक।

इन घटनाओं से प्रभावित होकर तथा रणथम्भौर में बाघों की बढ़ती आबादी और मुकुन्दरा को रणथम्भौर के एक उपग्रह कोर क्षेत्र के रूप में विकसित होने की क्षमता को देखते हुए राजस्थान सरकार ने 9 अप्रैल 2013 को अधिसूचना जारी करके मुकुन्दरा को एक बाघ आरक्षित क्षेत्र घोषित किया। मुकुन्दरा हिल्स के टाइगर रिजर्व बनने में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंदरा राजे के प्रयास और बाघ विशेषज्ञ वाल्मीक थापर कि सलाह उल्लेखनीय है। ऐसा भी नहीं है कि ये फैसला अचानक लिया गया हो, दरा के वन क्षेत्र को मुकन्दरा टाइगर रिजर्व बनाने का सफर सरकारी स्तर पर 1988 में तत्कालीन वन विभाग के अधिकारियों द्वारा शुरू किया जा चुका था। इसे जवाहर सागर से जोड़ कर विस्तृत राष्ट्रीय उद्यान बनाने की अवधारणा कुछ अधिकारियों कि थी तथा इसका प्रारूप बनाकर राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजा गया। संभवतः इन्हीं प्रयासों का नतीजा था कि 2004 में दरा को मुकन्दरा राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व का मानचित्र (राजस्थान बाइओडाइवर्सटी ऑर्ग, प्रवीण कुमार)

2013 कि अधिसूचना के अनुसार दरा अभयारण्य, जवाहर सागर अभयारण्य, और मुकुन्दरा राष्ट्रीय उद्यान के क्षेत्रों को सम्मिलित करके मुकुन्दरा देश का बयालीसवाँ टाइगर रिजर्व बना। जिसका कुल क्षेत्र 755.99 वर्ग किलोमीटर है। इसमें 417.17 वर्ग किलोमीटर क्रिटिकल टाइगर हैबिटैट (कोर एरिया) और 342.82 वर्ग किलोमीटर बफर एरिया है। कोर एरिया दर्रा वन्यजीव अभयारण्य और जवाहर सागर वन्यजीव अभयारण्य को बनाया गया है। चार नदियां चम्बल, काली सिंध, आहू और आमझर इसकी सीमा निर्धारित करती हैं।

मुकुन्दरा में बाघों कि वापसी:

मुकुन्दरा हिल्स के टाइगर रिजर्व बनने में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रयास और बाघ विशेषज्ञ वाल्मीक थापर कि सलाह उल्लेखनीय है। मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व में बाघों कि वापसी के लिए काम 2016 में राजस्थान के तात्कालिक मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक डॉ जी वी रेड्डी कि निगरानी में शुरू हुआ। शुरुआत में NTCA के निर्देशानुसार बाघों के पुनर्वास के लिए शेलजर को उपयुक्त मानते हुए अहाता (enclosure) बनाया गया, लेकिन राजस्थान स्टेट वाइल्ड्लाइफ बोर्ड कि स्टैन्डींग कमिटी ने दरा के वनों को उपयुक्त मानते हुए बाघ पुनर्वासित करने के निर्देश दिए। दरा के वनों को रक्षित करने का कार्य श्री एन सी गोयल के निगरानी में हुआ। दरा के इस वन को चारों तरफ 12 फुट कि दीवार से सुरक्षित करके बाघ के लिए एनक्लोजर बना लगभग 400 जानवर बाघ के शिकार के आधार के रूप में छोड़े गए, जिनमें ज्यादातर चीतल शामिल थे। बाघ को नई जगह के अनुकूल बनाने के लिए पहले एंकलोजर में और फिर बाघ के सामान्य व्यवहार के संकेत दिखने पर बाहर स्थानांतरित कर दिया जाना तय हुआ।

सारी तैयारियों के बावजूद मुकुन्दरा में किस बाघ को भेजना है यह तय नहीं हो पा रहा था, इसी बीच रणथम्भोर से एक बाघ (टी – 91) निकलकर बूंदी के रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में पहुँच गया था जिसको ट्रैक करना मुश्किल हो रहा था। वन विभाग और रणथम्भोर में बाघों के संरक्षण के लिए काम कर रही संस्था, टाइगर वॉच कि टीम लगभग पाँच महीने संयुक्त रूप से काम करके इस बाघ को ट्रैक कर रहे थे। ट्रैकिंग के दौरान पता चल कि बाघ जंगल छोड़कर लगातार आबादी वाले क्षेत्रों कि तरफ बढ़ रहा था। नतीजतन, स्थानीय लोगों में घबराहट की भावना थी और बाघ को शिकारियों से शिकार का खतरा भी था। तय हुआ कि इस बाघ को मुकुन्दरा में स्थानतारित किया जाएगा।

आखिरकार, 3 अप्रैल 2018, को वर्षों के इंतज़ार के बाद, मुकुन्दरा को पहला बाघ टी -91 के रूप में मिला। निर्धारित तारीख को वन विभाग की एक टीम द्वारा बूंदी के रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में टी-91 को ट्रेंकुलाइज कर, गले में रेडियो कॉलर लगा कर दरा के एनक्लोजर में पहुँचाया दिया गया। स्थानांतरण रणथंभौर के फील्ड डायरेक्टर श्री वाई के साहू मार्गदर्शन में हुआ। बाघ को मुकुन्दरा में आने पर नया नाम मिला मुकुन्दराज, जिसे MT-01 के नाम से भी जाना जाता है।

Mukundraj

टी-91 को बूंदी के रामगढ़ विषधारी अभ्यारण्य से दरा स्थितः सुरक्षित क्षेत्र मे स्थानतंत्रित करने के बाद कि तस्वीर (डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

मुकुन्दराज के बाद, रणथम्भोर कि चार बाघिनों टी -102, टी -104, टी -105 और टी -106 को मुकुन्दरा के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था। ये वो बाघिनें थी जो अपना नया क्षेत्र बनाने की कोशिश कर रही थी या रणथम्भोर से निकलने की कगार पर थीं।  जिनमें से टी -106 को पुनर्वास के लिए चुना गया और 18 दिसम्बर 2018 को ट्रैंगक्वलाइज़ करके लाया गया। इसका नाम MT-02 पड़ा।

मुकुन्दरा में बसने के लिए तीसरे बाघ का चुनाव खुद बाघ ने किया। अपने बाघों को खोने के लिए ख्यात रणथम्भोर एक और बाघ टी – 98 के रूप में खो चुका था, आश्चर्यजनक रूप से ये बाघ सुल्तानपुर के रास्ते मुकुन्दरा पहुँच गया। जब एनक्लोजर के बाहर भी बाघ के हलचल कि आहट मिली तब मुकुन्दरा के डायरेक्टर के अनुरोध पर टाइगर वॉच कि टीम ने एनक्लोजर के बाहर कैमरे लगा कर बाघ को ट्रैक और मानिटर करना शुरू किया। आखिरकार 10 फ़रवरी 2019 को एनक्लोजर के बाहर लगे कैमरा ट्रैप में उसकी फोटो कैद हो गयी। यह बाघ मुकुन्दरा और रणथम्भोर के बीच प्राकृतिक बाघ गलियारे से होते हुए कई दिन सुल्तानपुर के जंगलों में बिताने के बाद अपने आप यहाँ पहुँचा। शुरुआत में इस बाघ के भविष्य को लेकर संशय था लेकिन बाद में इसे मुकुन्दरा के तीसरे बाघ के रूप में स्वीकार करते हुए MT- 03 नाम दिया गया।

टी -98 के बाद मुकुन्दरा को एक और बाघिन टी-83, 12 अप्रैल 2019 को मिली। इसे रणथम्भोर के आमा घाटी से लाकर मुकुन्दरा के एंकलोजर में छोड़ा गया था, जिसे बाद में MT-04 के नाम से जाना गया।

इसके बाद मुकुन्दरा के जंगलों से 2 जून, 2020 को एक बड़ी खबर आई कि यहाँ बाघिन MT-02 को दो शावकों के साथ देखा है। दोनों शावक करीब ढाई माह के थे। यहाँ बाघों की शिफ्टिंग के दो साल बाद बाघिन ने शावकों को जन्म दिया। कोरोना काल में छाई मायूसी के बीच मुकुंदरा टाइगर रिजर्व से आई ये खबर यहाँ के लोगों के लिए एक खुशी कि बात थी, जिसकी खुशी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी ट्वीट के माध्यम से जताई और कहा कि इनका आना हमारे लिए उत्साह जैसा है। हमें मिलकर बाघों का और वन्यजीवों का संरक्षण करना है।

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व:  आगे की राह

कोटा के लोगों कि मेहनत रंग लाई और आज मुकुन्दरा के वन एक बार फिर से बाघ की दहाड़ से गूंज रहे हैं। मुकुन्दरा हिल्स आज एक टाइगर रिजर्व के रूप में ढल चुका है। बाघों का उपहार कोटा वासियों के लिए एक जिम्मेदारी भी है। जिम्मेदारी बाघ को सुरक्षित रखने कि, कोर एरिया से जैविक दबाब कम करने कि, मानव-पशु संघर्ष जैसी घटनाओं को रोकने कि। मुकुन्दरा के विकास में कई ऐसे कारक है जो विकास में अवरोधक साबित हो सकते हैं। (फ़ोटो: हरी मोहन मीना)

मुकुन्दरा के विकास में सबसे बड़ा अवरुद्ध साबित होता है कोर एरिया को कवर करते पर्याप्त बफर एरिया का ना होना। जैसा कि शुरुआत में बताया गया था मुकुन्दरा एक रेखाकारित आकार में फैला वन क्षेत्र है जिसके कारण ये रिजर्व लगातार जैविक दबाब को झेलता है। पर्याप्त बफर ना होने के कारण पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 10 जनवरी 2020 को मसौदा अधिसूचना जारी करते हुए मुकुन्दरा के कई हिस्सों में 1 किलोमीटर दायरे के इको-सेन्सिटिव ज़ोन बनाने के निर्देश जारी करते हुए मंत्रालय ने 60 के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी थी। यह राज्य का पहला बाघ अभयारण्य है जिसके लिए इको-सेन्सिटिव ज़ोन घोषित हुआ है।

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व के दायरे में गिरधरपुरा, दामोदरपुरा, लक्ष्मीपुरा, मशालपुरा, खरली बावड़ी, रूपपुरा कोलीपुरा, दरा, भूखी, घाँटी, बगीचा, रोझड़ा तालाब, नारायणपुरा, अंबा रानी, और नोसेरा समेत 14 गांव है। ये कोटा के अलावा बूंदी, झालावाड़ व चित्तौड़गढ़ जिलों की सीमा में है। मुकुन्दरा के इन गाँवों के बड़ी संख्या में ग्रामीण गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करते हैं और अपने पशुधन – बकरियों, भेड़ों, और मवेशियों – पर जीवित रहने के लिए बहुत अधिक निर्भर हैं जो कि स्वाभाविक रूप से रिजर्व में अपार जैविक दबाव का कारण है। जहां मुकुन्दरा कि परिधि के अंदर के 14 गाँव पूरी तरह वन संपदा पर आश्रित हैं तो वहीं परिधि के बाहर वाले गाँवों का दबाब भी है।

मुकुन्दरा के टाइगर रिजर्व बनने के बाद केंद्र सरकार ने इन गाँवों के विस्थापन कि मंजूरी दे दी है जिसके अंतर्गत अभी खरली बावड़ी व लक्ष्मीपुरा को विस्थापित किया जा चुका है। लेकिन फिर भी गाँवों का विस्थापन एक बड़ी समस्या है क्योंकि लोग विस्थापित होने को तैयार नहीं हैं, ज्यादातर ग्रामीणों को लगता है कि उन्हें उचित मुआवजा नहीं मील रहा। गिरधरपुरा गाँव के लोग इसलिए जाने को तैयार नहीं क्योंकि ये लोग हाल ही में बंदा गाँव से पुनर्वासित होकर यहाँ स्थापित हुए है। राणाप्रताप सागर बांध के निर्माण के लिए इन्होंने बंदा गाँव छोड़ था। प्रबंधन को इनके विस्थापन के लिए अन्य ठोस और कारगर फैसले लेने कि जरूरत है।

मुकुन्दरा कि तीसरी बड़ी समस्या है टाइगर रिजर्व के बीच से निकलते रेल मार्ग और राष्ट्रीय राजमार्ग। दरा के संकीर्ण पहाड़ियों के बीच से निकलता रेल मार्ग वन्यजीवों के लिए घातक सिद्ध होता रहा है। दिल्ली – मुंबई रेलमार्ग होने के कारण यह अत्यंत व्यस्त रहता है। यहाँ 2003 में ब्रोकन टैल के अलावा 2017 में एक भालू, 2018 में एक बघेरा और न जाने कितने ही छोटे वन्यजीव मारे जा चुके हैं। वहीं दूसरी ओर दरा के बीच से राष्ट्रीय राजमार्ग भी अक्सर सड़क दुर्घटनाओं का साक्षी रहता है। इसके साथ ही रेलगाड़ियों और सड़क वाहनों से होने वाले ध्वनि और भिन्न प्रकार के प्रदूषण वन्यजीवों के सामान्य जीवन में बाधक साबित होते हैं। हालांकि सड़क समस्या का समाधान सुरंग मार्ग के रूप में प्रस्तावित हो चुका है लेकिन फिर भी इसे बनकर तैयार होने तक समस्या जस की तस बनी रहेगी। वहीं रेल मार्ग का कोई विकल्प नहीं है।

मुकुन्दरा कि चौथी समस्या है वन्यजीवों के शिकार कि। वन्यजीवों का शिकार कभी प्रतिष्ठा के लिए, कभी सजावट के लिए, स्मृति चिन्ह के रूप में, तो कभी पारंपरिक एशियाई उपचार के लिए हजारों सालों से होता आया है। शिकार कि समस्या लगभग सभी जगह के वनों में आम है। यहाँ कई प्रकार के वन्यजीवों के शिकार कि घटनाएँ सामने आती रहती हैं। मुकुन्दरा डायरेक्टर द्वारा संचालित वन विभाग कि टीम यहाँ के वन्यजीवों कि रक्षा कर रही है। तथा बाघ द्वारा मवेशी के शिकार किए जाने पर ग्रामीणों की समस्याओं का निवारण वन विभाग द्वारा जल्द से जल्द किया जाता है ताकि लोगों में बाघ को लेकर कोई नकारात्मक विचार न आए।

Chambal - Mukundara

चारों ओर घने जंगलों से घिरा हाड़ौती क्षेत्र चम्बल, काली सिन्ध, पार्वती, परवन जैसी बड़ी व अनेक छोटी-छोटी सदावाही नदियों के कारण जल समृद्ध है। (फ़ोटो: हरी मोहन मीना)

मुकुन्दरा कि पाँचवी समस्या है रिजर्व में फैलती आक्रामक पौधों की प्रजातियां (invasive plant species)। मुकुन्दरा में कई विदेशी आक्रामक प्रजातियों का विस्तार बेहद तेजी से हो रहा है जैसे के विलायती बबूल (Prosopis juliflora), पुवाड (Cassia tora), कसोद (C. uniflora) और जंगली तुलसी (Hyptis suaveolens)। विलायती बबूल एक कठिन प्रजाति है जिसके काँटे वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाते हैं। यह मुकुन्दरा में कई जगह फैल चुका है जिसमे एंकलोजर भी शामिल है, वन विभाग इसके प्रसार को प्रभावी ढंग से जड़ से उखाड़ के संबोधित कर सकता है ताकि एंकलोजर में इसके फैलाव को कम किया जा सके। जंगली तुलसी का विस्तार ज्यादातर रास्तों और तालाबों के किनारे देखा जा सकता है। सावन-भादों बांध, श्रीपुरा,  लक्ष्मीपुरा और नोलाव के तालाब वाले क्षेत्र में ये काफी हद तक फैल चुका है। पुवाड एवं जंगली तुलसी को काट के और ठंडे मौसम में जला के खत्म किया जा सकता है।

इन समस्याओं के अलावा यहाँ के वनों को और अधिक विकसित और लोगों को जागरूक करने कि आवश्यकता है। यहाँ के लोगों को भी समझना होगा कि बाघ केवल एक करिश्माई प्रजाति या कुछ दूर जंगल में रहने वाला एक अन्य जंगली जानवर नहीं है। बाघ अपने पारिस्थितिक तंत्र में शीर्ष शिकारियों के रूप में काम करते हैं जिनको शिकार के लिए परस्पर बड़े क्षेत्रों की आवश्यकता होती है। बाघों के बिना, पूरा पारिस्थितिक तंत्र ध्वस्त हो जाएगा। यहाँ के लोगों को इस रिजर्व को एक जिम्मेदारी के तौर पर देखना एवं इसके विकास के लिए काम करना होगा।

References:

  • Sharma, G.K. (2017). History and Culture of Rajasthan, Garg Book Depot, Delhi.
  • Narayan, Jagat; Mankodi, K. L. (2010). The Case of the Bhim ki Chauri Ruins at Mukandara. Vol. 62, Issue 1. pg.80.Marg: A Magazine of the Arts. Mumbai.
  • UNESCO (2013). Addendum Evaluations of Nominations of Cultural and Mixed Properties to the World Heritage List. Phnom Penh.
  • Crooke, William. (Ed.). (2018). Annals and Antiquities of Rajasthan, v. 3 of 3 by James Tod. eBook, Public domain in the USA. http://www.gutenberg.org/ebooks/57376
  • Singh, P., Reddy, G.V. (2016). Lost Tigers Plundered Forests: A report tracing the decline of the tiger across the state of Rajasthan (1900 to present), WWF-India, New Delhi.
  • Beveridge, Henry (Ed.). (2016). The Tuzuk-i-Jahangiri: or, Memoirs of Jahangir. eBook. Public domain in the USA. http://www.gutenberg.org/ebooks/53674
  • Thackston, Wheeler M. (Ed.). (1999). The Jahangirnama; memoirs of Jahangir, Emperor of India, Oxford University Press, New York.
  • Thakur, Anupama. (2009). A Critical Study of Kota School, Shodhganga: a reservoir of Indian theses. http://hdl.handle.net/10603/96955
  • Hughes, Julie E. (2013). Animal Kingdoms: Hunting, the Environment, and Power in the Indian Princely States, Harvard University Press, USA.
  • Khandal Divya; Khandal, Dharmendra & Sahu, YK. (2014). The Marco Polos of Ranthambhore. pg.58, Saevus Mag., Mumbai.
  • Sultana, F. (2007). A study of the Faunal Diversity of Darrah Wildlife Sanctuary of Hadoti Region, Kota in Rajasthan. Ph.D thesis; University of Kota. Kota.
  • Dadhich, L. (2002). Biodiversity: Strategies for Conservation, Paragon Computers, New Delhi. https://books.google.co.in/books?id=8Ffhvj_7AckC&lpg=PA225&ots=Vs1eL_0Z3D&dq=dadhich%20hadoti%20flora&pg=PP1#v=onepage&q&f=false

 

 

 

Praveen Kumar

Praveen Kumar, holding a Master's in Life Sciences, is currently working as Assistant Conservation Biologist for Tiger Watch. He documented wetlands of Rajasthan as wildlife intern with the forest department. He has worked on Chambal assessment projects with SCHER, Kota and has volunteered in many conservation activities.