वन रक्षक 1: जुनून और जज़्बे की मिसाल: अभिषेक सिंह शेखावत

अभिषेक एक सक्षम एवं संपन्न परिवार में जन्म लेने के बावजूद, अपने लिए प्रकृति एवं वन्यजीव संरक्षण जैसे कठोर एवं श्रमशील कार्य के निचले पायदान को चुना और आज वन क्षेत्र में शिकारियों की रोकथाम, वन्यजीवों के संरक्षण और प्रबन्धन में वनकर्मी के रूप में योगदान दे रहे हैं।

एक संपन्न परिवार से आनेवाले “श्री अभिषेक सिंह शेखावत” को हमेशा से ही प्रकृति एवं वन्यजीव संरक्षण के प्रति कार्य करने का जुनून था, जिसके चलते उन्होंने वनरक्षक (फारेस्ट गार्ड) से भर्ती होकर इस क्षेत्र में प्रवेश किया। इनके पिताजी भारतीय पुलिस सेवा में पुलिस अध्यक्ष के पद पर कार्यरत हैं तथा उनके न चाहते हुए भी अभिषेक ने इस कार्य क्षेत्र को ही नहीं बल्कि सरकारी सेवा के निचले पायदान को चुना। आज, 7 साल तक वनरक्षक के रूप में कार्य करने के बाद, 22 जनवरी 2021 को ये सहायक वनपाल के पद पर पदोन्नत हुए हैं। हालांकि इनकी पदोन्नति से भी ये अपने पिताजी को खुश नही कर पाए। परन्तु फिर भी, एक उम्मीद की किरण, निरन्तर कर्मठ व प्रगतिशील व्यक्तित्व इन्हें अपनी कर्मभूमि के प्रति ईमानदार व व्यवस्थित रहने के लिए हौसला बढ़ाता रहा हैं। वन क्षेत्र में अवैध खनन व शिकारियों की रोकथाम, वन्यजीवों के संरक्षण और प्रबन्धन में इनका उल्लेखनीय योगदान रहा है। ये अपनी कार्यशैली व कुशलता के दम पर अपने साथियों को सकारात्मक रूप से प्रेरित रखने में भी अहम भूमिका निभा रहे हैं।

वर्तमान में 28 वर्षीय, अभिषेक सिंह का जन्म सीकर जिले की रामगढ़ तहसील के खोटिया गांव में हुआ तथा इनकी प्रारंभिक शिक्षा बाड़ी धौलपुर एवं उच्च माध्यमिक शिक्षा जयपुर से हुई और अलवर से इन्होने बीएससी नर्सिंग की शिक्षा प्राप्त की है। इन्हे हमेशा से ही पर्यटन, वन भृमण, प्रकृति एवं वन्यजीवों के प्रति रुचि रही है। वर्ष 2003 में जब इनके पिताजी अलवर में पुलिस उपाधीक्षक थे, तब ये अक्सर अपने दोस्तों के साथ सरिस्का अभ्यारण में घूमने जाया करते थे और तब से ही इनके मन में एक चाह थी कि मैं भी किसी तरह प्रकृति के नजदीक रह कर इसके संरक्षण के लिए कार्य करू।

अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद वर्ष 2011 में इन्होने वनरक्षक के लिए आवेदन किया तथा चयनित भी हुए। ट्रेनिंग के दौरान इन्होने वन्यजीव कानून व वन्य सुरक्षा में प्रथम स्थान प्राप्त किया तथा गर्व की अनुभूति के साथ इन्होने उमरी तिराहा पांडुपोल (सरिस्का) वनरक्षक के रूप में अपना पद संभाला।

वन क्षेत्र के भीतर अवैध चरवाहों को रोकते हुए अभिषेक

अभिषेक बताते हैं की “उस समय वहां के उप-वनसंरक्षक को लगा कि एक पुलिस अधिकारी का बेटा जंगल में काम नही कर पाएगा और उन्होंने मेरे पिताजी से बातकर मुझे ऑफिस में लगाने की बात कही, लेकिन मैंने साफ मना कर दिया। फिर एक बार यूँ हुआ उप-वनसंरक्षक और मैं साथ में रेंज का दौरा करने गए, तो कुछ पशु चरवाहों और उप-वनसंरक्षक में आपस मे कहासुनी हो गई। परन्तु मैंने हौसला दिखाते हुए 29 भैसों व उनके चरवाहों को वहां से भगा दिया। यह देख न सिर्फ उप-वनसंरक्षक प्रभावित हुए बल्कि मेरे जुनून व हौसलों की असल पहचान भी हुई।”

वर्तमान में अभिषेक सरिस्का बाघ परियोजना, बफर रेंज अलवर नाका प्रताप बंध व बीट डडीकर में सहायक वनपाल के पद पर तैनात हैं।

इतने वर्षों की अपनी कार्यसेवा के दौरान कई बार अभिषेक ने न सिर्फ मुश्किल बल्कि खतरनाक कार्यवाहियों में भी बड़ी सूझ-बुझ से भूमिका निभाई है।

नबम्बर 2018 में, वन विभाग कर्मियों ने नीलगाय का शिकार करने वाले कुछ शिकारियों को पकड़ा था। परन्तु पूछताछ के दौरान अपराधियों ने बताया की उन्होंने एक बाघिन का शिकार भी किया था तथा उनके कुछ साथी पडोसी जिले में छिपे हुए थे। उन शिकारियों को पकड़ने के लिए उप-वनसंरक्षक द्वारा 8 विश्वस्त लोगों की टीम गठित की गई जिसमें अभिषेक भी थे। अभिषेक और उनके एक साथी तहकीकात के लिए पडोसी जिले में गए और इस दौरान उनके सामने कई प्रकार की मुश्किलें आई जैसे की कुछ लोग उनकी सूचनाएं अपराधियों तक पहुचाने लगे। वे शिकारी एक जाति विशेष की बहुलता वाले क्षेत्र से आते थे, जो राजस्थान के सबसे संवेदनशील इलाकों मे शामिल था, और उस क्षेत्र में मुखबिरी करना अभिषेक के लिए एक चुनौतीपुर्ण कार्य था। ऐसे में अभिषेक और उनका साथी साधारण वेषभूषा में वहां के स्थानीय व्यक्ति की तरह दुकानों व चाय की थडियों पर बैठकर जानकारी जुटाने लगे। उन्होंने स्थानीय पुलिस की सहायता से उस जगह की छानभीन कर अपराधियों के अड्डों का पता तो लगा लिया था। परन्तु उस जगह पर छापा मारना आसान नहीं था क्योंकि काफी संख्या में ग्रामीण इकट्ठे हो सकते थे और हमला भी कर सकते थे। ऐसे में स्थानीय पुलिस टीम की मदद से उन अपराधियों को पकड़ लिया गया। वर्तमान में उन अपराधियों पर कानूनी कार्यवाही चल रही है तथा न्याय व्यवस्था इस प्रकार के अपराधों के लिए गंभीर रूप से कार्य कर रही है।

समय के साथ-साथ अभिषेक ने नई-नई चीजे सीखने में बहुत रुचि दिखाई है जैसे की उन्होंने श्री गोविन्द सागर भारद्वाज के साथ रह कर बर्ड-वॉचिंग व पक्षियों की पहचान के बारे में सीखा।

टाइगर ट्रैकिंग के लिए इनकी 15-15 दिन डयूटी लगती हैं जिसमें कई बार इनका टाइगर से आमना-सामना भी हुआ है। एक रात अभिषेक अपने साथियों के साथ बोलेरो केम्पर गाड़ी से गश्त कर रहे थे, तभी एक जगह खाना खाने के लिए उन्होंने गाड़ी रोकी। उनके साथियों ने गाड़ी से नीचे उतर एक साथ बैठकर खाना खाने को कहा परन्तु अभिषेक बोले की कैम्पर में बैठकर खाना खाते हैं। वो जगह कुछ ऐसी थी कि एक तरफ दुर्गम पहाड़ व दूसरी तरफ एक नाला था और सामने एक तंग घाटी थी। तभी अँधेरे में लगभग 15 फिट की दूरी पर एक मानव जैसी आकृति प्रतीत हुई और जैसे ही टॉर्च जलाई तो सामने टाइगर नजर आया। पूरी टीम ने ईश्वर को धन्यवाद किया की अगर गाड़ी से नीचे उतर गए होते तो कितनी बड़ी दुर्घटना हो गई होती। टाइगर ट्रैकिंग का एक वाक्य ऐसा भी हुआ जब अभिषेक व उनके साथी अनजाने में टाइगर के बिलकुल नज़दीक पहुंच गए और टाइगर गुर्राने लगा। तभी उन्होंने जल्दबाजी में एक पेड़ में चढ़ कर अपनी जान बचाई।

अभिषेक ने जंगल के सीमावर्ती क्षेत्रों में अवैध खनन को रोकने के लिए भी प्रयास किये हैं। जैसे एक बार गस्त के दौरान उन्होंने अवैध खनन वाले एक व्यक्ति को ट्रॉली में पत्थर भरकर ले जाते हुए देखा व रोकने की कोशिश भी की। ट्रैक्टर तेज गति से जाने लगा तो उन्होंने ने भागते हुए ट्रॉली के पीछे लटक गए,  ट्रैक्टर तेज गति में था, अतः अभिषेक ट्रॉली से लिपटकर घिसटते चले गए। लेकिन उस आदमी ने ट्रेक्टर नही रोका बाद में जैसे तैसे कूदकर उन्होंने अपनी जान बचाई। अभिषेक बताते हैं कि “ऐसे मौकों पर जब हम अवैध खनन माफिया के संसाधनों का पीछा करते हैं या जब्त करते हैं तो अधिकाँश ऐसे लोगों को दबंगों या राजनीतिक व्यक्त्वि विशेष का संरक्षण होता हैं। ऐसे में कई बार अपशब्द व धमकियां भी सुनने को मिलती हैं तब मन मे एक पीड़ा होती हैं कि हमारे पास ऐसे आदेश नही हैं कि हम अवैध कार्य करने वाले व इनको संरक्षण देने वालो को खुद सजा सुना सके।”

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अभिषेक के अनुसार संरक्षण क्षेत्र की सबसे बड़ी समस्या है वन क्षेत्रों के आसपास रह रही आबादी जो कई बार एक साथ इक्कट्ठे होकर लड़ाई करने के लिए आ जाते हैं। एक बार अभिषेक अपने साथियों के साथ विस्थापित परिवारों से मिलने गए तो वहां पर एक जाति विशेष की बहुलता वाला क्षेत्र था। वे लोग विस्थापित परिवारों के साथ भी दुर्व्यवहार करते थे और पेड़ों का कटाव भी कर रहे थे। जब वन अभिषेक एवं साथियों ने उन लोगों को रोकने की कोशिश की तो उन्होंने पत्थर फेकना शुरू कर दिया। ऐसे में वन कर्मियों के पास न तो कोई संसाधन थे और न ही प्रयाप्त टीम।

समय के साथ-साथ अभिषेक ने नई-नई चीजे सीखने में बहुत रुचि दिखाई है जैसे की उन्होंने श्री गोविन्द सागर भारद्वाज के साथ रह कर बर्ड-वॉचिंग व पक्षियों की पहचान के बारे में सीखा। जंगल में काम करते हुए अभिषेक ने सांप रेस्क्यू करना भी सीख लिया तथा बारिश के मौसम में अब कई बार ग्रामीण लोग उन्हें सांप रेस्क्यू करने के लिए बुलाते हैं। अभिषेक का जंगल के आसपास रहने वाले लोगों को वन व वन्यजीवों के लिए जागरूक भी करते हैं जैसे की वे समय-समय पर विस्थापित परिवारों से मिलने जाते थे और उनसे समाज की मुख्य धारा, शिक्षा व स्वास्थ्य के बारे में चर्चा करते हैं। कई बार जब आसपास के गांवों से महिलाएं जंगल में लकड़ियां लेने आती हैं तो उनको वनों की विशेषता के बारे में बताकर, पेड़ न काटने की शपथ दिलवाकर भेज देते हैं और इसके चलते आज उस क्षेत्र में पेडों की अवैध कटाई बिल्कुल बन्द हो गई हैं तथा वर्तमान में वहाँ हमेशा टाइगर की मूवमेंट रहता हैं।

अभिषेक के पिताजी चाहे कितने भी सख्त बने परन्तु उनको भी अपने बेटे व उसकी कार्यशैली को लेकर काफी चिंता रहती है जिसके चलते वर्ष 2018 की शुरुआत में उनके पिताजी के प्रभाव से उनका तबादला गांव के पास ही एक नाके पर हो गया ताकि वो घर के पास रहे। लेकिन प्रकर्ति के प्रति उनका जुनून और हौसले के चलते उन्होंने पिताजी से बिना पूछे ही अपना ट्रांसफर पुनः सरिस्का में करवा लिया। ये देख सभी को अचम्भा भी हुआ क्योंकि रणथम्भौर और सरिस्का में खुद की इच्छा से कोई भी नही आना चाहता।

एक बार सरिस्का बाघ रिसर्व के सीसीएफ ने वनरक्षकों का मनोबल बढ़ाने के लिए “मैं हु वनरक्षक” नामक पोस्टर बनवाये थे और जिसके ऊपर अभिषेक की फोटो छापी गई थी। चाहे आम नागरिक हो या वनकर्मी सभी ने पोस्टर की सराहना की थी। जब उनके पिताजी को पोस्टर के बारे में मालूम चला तो वो काफी खुश हुए और उस वक्त उनकी खुशी से अभिषेक को दोगुनी खुशी मिली।

अभिषेक के अनुसार वन्यजीव संरक्षण क्षेत्र में कुछ ऐसी जटिल समस्याए हैं जो हमारे लिए सबसे बड़ी बाधा हैं जैसे; एक बीट में केवल एक ही वनरक्षक रहता हैं, वन चौकियां दुर्गम स्थान पर होती हैं जहाँ चिकित्सा,बिजली व पानी जैसी मूलभूत सुविधाओं का अभाव व नेटवर्क की समस्या  रहती हैं। कई बार शिकारियों से भी आमना सामना होता हैं और ऐसे में केवल एक डंडे के अलावा उनके पास कोई हथियार नही होता। साथ ही कम वेतन भी इनके मनोबल को कमजोर करता है। क्योंकि एक वनरक्षक की शैक्षणिक व शारिरिक योग्यता पुलिस सिपाही की भर्ती मापदण्ड के समान हैं तथा इनका कार्य भी 24 घण्टे का रहता हैं लेकिन जो सुविधाएं पुलिस सिपाही को मिलती है जैसे हथियार, 2400 ग्रेड,वर्दी भत्ता व जोखिम भत्ता आदि ये सुविधा वनकर्मियों को नही मिल पाती हैं। यह कुछ मूलभूत आवश्यकताएं हैं जो सभी को चाइये परन्तु प्रकृति व वन्यजीव संरक्षण के प्रति इनके हौसलों की उड़ान कभी कमजोर नही हो सकती।

अभिषेक बताते हैं की “अभी तक के इन कार्यों में हमेशा पिताजी मेरा साथ देते रहे हैं अतः मैं समझता हूं कि मेरे इस कार्य से खुश जरूर हुए होंगे या फिर उन्हें कुछ तो मेरे प्रति सुकून मिला होगा। तथा वे मेरे पिताजी ही हैं जो मुझे हमेशा सकारात्मक, कर्मठ व साहसी रहने की प्रेरणा देते हैं।”

नाम प्रस्तावित कर्ता: डॉ गोविन्द सागर भरद्वाज

लेखक:

Shivprakash Gurjar (L) is a Post Graduate in Sociology, he has an interest in wildlife conservation and use to write about various conservation issues.

Meenu Dhakad (R) has worked with Tiger Watch as a conservation biologist after completing her Master’s degree in the conservation of biodiversity. She is passionately involved with conservation education, research, and community in the Ranthambhore to conserve wildlife. She has been part of various research projects of Rajasthan Forest Department.

 

 

 

Discussion

5 comments

  1. Prof. Suneel Sharma

    Flora collection, conservation
    of indigenous trees, shrub and annual bird watching
    Promation of underexploited fruit and nut crops

  2. Mohan gurjar

    बहुत खूब,शानदार ,आप इसी तरह लिखते रहे

  3. Avinash Bhardwaj

    This is the really great work n job.saluate all forest family member

  4. Rahul GURJAR

    बहुत ही अच्छी व संघर्ष भरी कहानी जिसमें एक कुलीन परिवार में जन्म लेने के बाद भी वन एवम् पर्यावरण के प्रति इतनी सजगता व प्रेम बहुत ही कम देखने को मिलता है

  5. Arjun parmar

    जब किसी की मुलाकात होती है तो कुछ यादे ऐसी होती है कि उसे भुलाया नहीं जा सकता जब मेरी प्रथम बार मुलाकात अभिषेक भईया से हुई तो लगा ही नहीं कि में उनसे प्रथम बार मिला हूं। उनका सरल स्वभाव, घमंड तो उनका शत्रु प्रतीत होता है। एक बेहद अच्छे व्यक्ति के सभी गुण विद्यमान हैं उनमें। कुछ समय की मुलाकात में ही उन्होंने मेरे बड़े भाई की भूमिका निभाई , जिस तरह एक बड़ा भाई अपने छोटे भाई का ख्याल रखते है भविष्य में क्या करना है उसके बारे में बताते है। अकसर लोगो की प्रेरणा बहुत ज्यादा प्रख्‍यात लोग होते है लेकिन मेरी प्रेरणा मेरे अभिषेक भईया है जो भविष्य में ईश्वर की कृपा से बहुत प्रख्यात होंगे।🙏🙏🙏🙏
    अर्जुन परमार

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