बोकड़शाला

डॉ. सतीश कुमार शर्मा

राजस्थान वन सेवा (सेवानिवृत्त), उदयपुर

हमारे देश के कोने-कोने में “वन्यजीव संरक्षण” से भी कहीं बढ़कर “जीव संरक्षण” की अनूठी परंपराएँ रही हैं। वन्यजीव संरक्षण का भाव, जीव संरक्षण की मुहिम में ही समाहित है। हाथी, बाघ, सिंह, गरुड़, हंस, गिलहरी, बंदर, भालू, कौवा, उल्लू, नाग (शेषनाग), चातक, चकोर आदि न जाने किन-किन वन्यप्राणियों का विशेष उल्लेख धर्मशास्त्रों एवं लोक गाथाओं में मिलता है तथा उनके प्रति सम्मान, सहिष्णुता एवं सद्भाव की धारणा समाज में व्याप्त है। आदिवासी समाज में तो वन्य प्राणियों एवं वनस्पतियों के प्रति समझ व सम्मान का दायरा और भी व्यापक है। नरसिंह अवतार, कच्छप अवतार, वराह अवतार, मत्स्य अवतार आदि की संकल्पना वन्यप्राणियों के प्रति सम्मान व संरक्षण की गहरी एवं विशिष्ट भावना के चरम का द्योतक है। यही स्थिति वनस्पतियों के साथ है। पीपल, बरगद, खेजड़ी, तुलसी, दूर्वा (दूब घास), डाब घास, सिरीष, केला, कमल, आँवला, नारियल (श्रीफल), आम, बकुल (मोलश्री), बुहारी घास आदि अनेक वनस्पतियों का अत्यधिक धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व है। मृत्यु के समय मानव शव को अन्तिम संस्कार हेतु ले जाने के लिए बुहारी घास का बिछौना प्रदान किया जाता है। वनस्पतियों के नामों से पहले या बाद में “श्री” शब्द का उपयोग वनस्पतियों के प्रति विशेष सम्मान का प्रतीक है। वन्यजीवों के साथ-साथ हमारा समाज पालतू व सहजीवी प्राणियों के प्रति भी ऐसी ही समझ एवं सम्मान प्रदर्शित करता रहता है। गाय, हाथी, कुत्ता, चूहा, घोड़ा, घरेलू बिल्ली आदि पालतू एवं अर्द्ध-पालतू जीवों के प्रति भी विशेष सम्मान का भाव समाज में व्याप्त है।

पालतू प्राणियों में गाय का एक विशेष स्थान रहा है एवं है। गायों की अपंगता, वृद्धावस्था एवं ऐसी ही स्थितियों में सुरक्षा एवं सम्मान के लिये देश में सदियों से गोशालाओं की व्यवस्था रही है। राजस्थान में कोने-कोने में गोशालाएँ सरकार एवं समाज के सहयोग से संचालित हो रही हैं।

क्या कोई सोच सकता है कि गोशाला की तरह ही बकरों की सुरक्षा एवं प्राकृतिक जीवन जीने हेतु सुरक्षित स्थल “बोकड़शाला” या “बकराशाला” की व्यवस्था भी देश में जगह-जगह कायम रही है। बकरों की सुरक्षा का यह अद्भुत एवं उदाहरणीय कार्य जैन धर्मावलंबियों द्वारा सदियों से किया जाता रहा है। उत्तर एवं पश्चिमी भारत में जगह-जगह बकरों की सुरक्षा हेतु बकराशाला या बोकड़शाला संचालित की जाती रही हैं। देश के बड़े भूभाग में इन बकरा-शरण स्थलियों को बकराशाला तथा दक्षिण राजस्थान के आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र में बोकड़शाला कहा जाता है। उदयपुर शहर से 10 किमी दूर दक्षिण-पश्चिम में बाँकी आरक्षित वन खण्ड की पश्चिमी सीमा पर नाई गाँव जाने वाले रास्ते के पास भी एक बोकड़शाला स्थापित रही है। बोकड़शाला या बकराशाला में सुरक्षा हेतु चारदीवारी, भरपेट खाने-दाने की व्यवस्था, साफ पेयजल, चिकित्सा व्यवस्था एवं मृत्यु पर सम्मानपूर्वक शव-निस्तारण की व्यवस्था होती है। यहाँ रात्रि समय में वन क्षेत्र के तेंदुओं से सुरक्षा देने के लिए विशेष कक्ष भी बनाए गए हैं, जिनमें रात्रिकाल में बकरों को बंद रखा जाता है। सूर्योदय होते ही उनको पुनः बाहर निकाल दिया जाता है (फोटो 1 एवं 2)।

बाँकी वन खण्ड के समीप स्थित एक प्राचीन बकराशाला की जीर्ण-शीर्ण पत्थर की चारदीवारी, झाड़ियों से ढकी हुई
फोटो 1: बाँकी वन खण्ड के समीपी क्षेत्र में स्थित एक प्राचीन बकराशाला। फोटो: डॉ. सतीश कुमार शर्मा
बकराशाला की चारदीवारी और भीतरी कक्ष का क्लोजअप दृश्य
फोटो 2: बाँकी वन खण्ड के समीप स्थित बकराशाला का क्लोजअप फोटो। चारदीवारी से अन्दर स्थित कक्ष में बकरों को रात्रि में तेंदुओं से बचाने हेतु सुरक्षा प्रदान की जाती थी। फोटो: डॉ. सतीश कुमार शर्मा

जैन धर्म अपने जाने-माने अनेक सिद्धान्तों में से एक “जीवो और जीने दो” की पालना में बूचड़खानों, धार्मिक कार्यों में मारे जाने वाले या बलि दिये जाने वाले या ऐसी ही विपत्ति में फँसे नर बकरों का मूल्य चुका कर उन्हें बकराशाला में दाखिल कर देता है। वहाँ उनकी सुरक्षा व देखभाल उनके जीवन-पर्यन्त की जाती है। बकराशालाओं का प्रबन्धन “जीव दया संस्थान” नामक स्वयंसेवी संस्था अपने समाजजनों के सहयोग से नियमित करता रहा है। हिन्दू धर्म में भी जगह-जगह “अमरा बकरा” देवी-देवता को चढ़ाने की परंपरा रही है। यानी बकरे की बलि न देकर उसे जीवित अर्पण किया जाता है। सामाजिक सुरक्षा के कारण उस बकरे को कोई नहीं मार सकता है। अतः वह अप्राकृतिक मृत्यु के प्रति अमर हो जाने से “अमरा बकरा” कहलाता है। पूरी आयु बचा रह जाने के कारण वह कद-काठी में काफी बड़ा भी हो जाता है। बकरियों के झुण्ड में चरता बकरा अपनी ऊँचाई एवं भारी शरीर के कारण दूर से ही नजर आता है। ऐसे अमरे बकरे बकरी पालकों द्वारा बीजू बकरे के रूप में प्रयोग लिये जाते रहे हैं। बकराशाला भी एक तरह से “अमरा बकरों” की शरणस्थली का ही एक रूप होती है। लेकिन जैन धर्मावलंबियों द्वारा संचालित बकराशालाओं में बकरों को अनेक व अधिक सुविधाएँ निरन्तर मिलती रहती हैं।

गोशालाओं में गाय, बैल, बछड़े सभी शरण लेते हैं, लेकिन बकराशालाओं में वे भाग्यशाली नर बकरे ही पहुँचते हैं जिनको समय रहते जैनियों ने बचा लिया।

गुजरते समय के साथ अनेक प्राचीन प्रवृत्तियाँ बदलाव का शिकार हो रही हैं। बकराशालाएँ भी धीरे-धीरे समाज में अपनी पहचान खोती जा रही हैं। आज बकराशालाओं की पहचान, प्रबंधन व जरूरतें उस रूप में नहीं दिखाई दे रही हैं जैसा कुछ दशकों पहले नजर आता था।

बकराशाला की संकल्पना एवं वास्तविकता जीव दया का एक अनुपम उदाहरण है।

लेखक

डॉ. सतीश कुमार शर्मा, राजस्थान वन सेवा (सेवानिवृत्त)

14-15, चकरिया आम्बा, रामपुरा चौराहा, झाड़ोल रोड, पोस्ट — नाई, उदयपुर 313031, राजस्थान

ईमेल: sksharma56@gmail.com

Discussion

No comments yet — start the conversation below.

Leave a comment

Your email address will not be published.