कभी-कभी प्रकृति अपने गहरे रहस्यों की केवल एक झलक दिखाती है—और ऐसी ही एक दुर्लभ घटना 16 अगस्त 2026 को चित्तौड़गढ़ जिले की राशमी तहसील के हरनाथपुरा गाँव में सामने आई।

यहाँ लगभग दो फीट लंबा दुर्लभ इंडियन एग-ईटिंग स्नेक (Boiga westermanni; पूर्व नाम Elachistodon westermanni) जीवित अवस्था में मिला। यह विषहीन साँप भारत के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची-I में संरक्षित है। अपनी रहस्यमयी जीवनशैली और अत्यंत कम बार दिखाई देने के कारण इसे भारत के दुर्लभ साँपों में गिना जाता है।

साँप दिखाई देने की सूचना मिलते ही वन्यजीव एवं पर्यावरण संरक्षण समिति की टीम सक्रिय हो गई। समिति सदस्य हरलाल के प्रारंभिक प्रयासों के बाद पियूष कांबले और रामकुमार साहू के नेतृत्व में विशेषज्ञ टीम मौके पर पहुँची। शरीर के विशिष्ट पैटर्न, सिर की बनावट और शल्कों का सावधानीपूर्वक निरीक्षण करने के बाद इसकी पहचान इंडियन एग-ईटिंग स्नेक के रूप में सुनिश्चित हुई।

टीम ने न केवल साँप का सुरक्षित रेस्क्यू किया, बल्कि उसकी पहचान से जुड़ी विशेषताओं का विस्तृत छायांकन और दस्तावेजीकरण भी किया। इसके बाद उसे किसी दूरस्थ अथवा अपरिचित स्थान पर छोड़ने के बजाय उसी क्षेत्र के उपयुक्त प्राकृतिक आवास में सुरक्षित मुक्त कर दिया गया।

चित्तौड़गढ़ के हरनाथपुरा में मिला जीवित इंडियन एग-ईटिंग स्नेक, शरीर पर विशिष्ट पैटर्न और सिर पर तीर जैसा निशान स्पष्ट
हरनाथपुरा में जीवित अवस्था में मिला इंडियन एग-ईटिंग स्नेक (Boiga westermanni)। फ़ोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल 

समिति के अध्यक्ष मनीष तिवारी बताते हैं कि संस्था अब तक सैकड़ों साँपों का सफलतापूर्वक रेस्क्यू कर चुकी है, लेकिन यह खोज कई मायनों में असाधारण है। इंडियन एग-ईटिंग स्नेक मुख्य रूप से पक्षियों के अंडों पर निर्भर रहने वाला अत्यंत विशिष्ट साँप है। इसकी उपस्थिति संकेत देती है कि इस क्षेत्र में पक्षियों, झाड़ियों और प्राकृतिक आवासों से जुड़ा एक समृद्ध तथा जीवंत पारिस्थितिक तंत्र अब भी साँस ले रहा है।

राजस्थान में इस प्रजाति का पहला प्रमाणित रिकॉर्ड वर्ष 2015 में सवाई माधोपुर जिले के बहरावंडा खुर्द क्षेत्र से सामने आया था। डॉ. धर्मेंद्र खांडल, वाई.के. साहू और विवेक शर्मा द्वारा दस्तावेजीकृत वह साँप मृत अवस्था में मिला था। इस दृष्टि से हरनाथपुरा की यह खोज राजस्थान में प्रजाति का दूसरा प्रमाणित रिकॉर्ड होने के साथ-साथ जीवित अवस्था में पहला ज्ञात रिकॉर्ड भी मानी जा रही है।

राजस्थान और मध्य प्रदेश की सीमा से जुड़े इस भूभाग में इस दुर्लभ प्रजाति का मिलना अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। यह खोज एक बार फिर सिद्ध करती है कि साधारण दिखाई देने वाले गाँव, खेत और झाड़ियाँ भी अपने भीतर असाधारण जैव-विविधता को छिपाए रख सकती हैं।

यह केवल एक दुर्लभ साँप मिलने की घटना नहीं है—यह प्रकृति का एक संदेश है। संदेश कि हमारे आसपास अब भी अनदेखा और अनजाना जीवन मौजूद है; आवश्यकता केवल उसे पहचानने, समझने और सुरक्षित रखने की है।

बायोडायवर्सिटी नेटवर्क इस महत्त्वपूर्ण खोज और संवेदनशील रेस्क्यू के लिए पियूष कांबले, रामकुमार साहू, हरलाल, मनीष तिवारी तथा वन्यजीव एवं पर्यावरण संरक्षण समिति की पूरी टीम को हार्दिक बधाई देता है। उनका यह प्रयास राजस्थान की जैव-विविधता के अध्ययन और संरक्षण में एक उल्लेखनीय योगदान है।