रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा का उन्मूलन

रामगढ़ विषधारी टाइगर रिजर्व में पिछले सात–आठ वर्षों के दौरान प्रोसोपिस जूलिफ्लोरा (Prosopis juliflora) को हटाने के लिए उल्लेखनीय कार्य हुआ है। वर्ष 2022 में इसे टाइगर रिजर्व घोषित किए जाने से पहले रामगढ़ विषधारी अभयारण्य के अधिकांश हिस्सों में जूलिफ्लोरा अत्यधिक घनत्व में फैला हुआ था।

इस विषय पर मैंने रामगढ़ विषधारी में कार्य कर चुके तत्कालीन डीएफओ श्री संजीव शर्मा से उनके अनुभवों के बारे में बातचीत की।

जूलिफ्लोरा किस प्रकार हानिकारक था?

श्री संजीव शर्मा ने बताया:

“जिन स्थानों पर जूलिफ्लोरा का अत्यधिक प्रसार था, वहाँ स्थानीय पेड़-पौधे और घास लगभग समाप्त हो गए थे। जहाँ जूलिफ्लोरा कम घनत्व में मौजूद था, वहाँ भी वह धीरे-धीरे अपना घनत्व बढ़ाता जा रहा था।

“धोक अत्यंत मजबूत और प्रतिस्पर्धी वृक्ष है। जिन क्षेत्रों में धोक के पेड़ों की कटाई नहीं हुई थी, वहाँ जूलिफ्लोरा प्रवेश नहीं कर पाया। इसके विपरीत, जहाँ धोक के पेड़ कम हो गए थे, वहाँ जूलिफ्लोरा फैल चुका था।”

जूलिफ्लोरा रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में कैसे फैला?

उन्होंने बताया:

“रामगढ़ विषधारी कभी बाघों का अच्छा पर्यावास हुआ करता था। लगभग 1990 के आसपास यहाँ शिकार की एक घटना हुई। इस मामले में एक शिकारी की वन विभाग की अभिरक्षा में मृत्यु हो गई, जिसके कारण स्थानीय लोग अत्यंत आक्रोशित हो गए। इसके बाद अभयारण्य पर वन विभाग का प्रभावी नियंत्रण कमजोर पड़ गया।

“कुछ वर्षों तक इस क्षेत्र को सामाजिक वानिकी के अंतर्गत रखा गया। उस समय सामाजिक वानिकी विभाग ने यहाँ अनेक प्रकार के पेड़-पौधों का रोपण किया। इन पौधारोपण क्षेत्रों की सुरक्षा के लिए चारों ओर जूलिफ्लोरा लगाया गया। कई स्थानों पर जूलिफ्लोरा का सीधे पौधारोपण भी किया गया।

“उस समय इस क्षेत्र का प्रबंधन वन्यजीव संरक्षण की आवश्यकताओं के अनुरूप नहीं किया गया। जूलिफ्लोरा के पारिस्थितिक प्रभावों के बारे में भी अधिक जानकारी नहीं थी। यह नहीं समझा गया था कि यह स्थानीय वनस्पतियों को चारों ओर से घेर लेगा, आसपास की मिट्टी से पानी और पोषक तत्त्व ग्रहण करेगा तथा तेजी से फैलता जाएगा। इस क्षेत्र में इसका कोई प्रभावी प्राकृतिक नियंत्रक भी मौजूद नहीं था।”

जूलिफ्लोरा को हटाने के प्रयास कब और कैसे शुरू हुए?

श्री संजीव शर्मा ने बताया:

“जूलिफ्लोरा के दुष्प्रभावों को गंभीरता से समझने की शुरुआत मुख्यमंत्री जल स्वावलंबन अभियान के दौरान हुई। तत्कालीन मुख्यमंत्री श्रीमती वसुंधरा राजे द्वारा आरंभ किए गए इस अभियान के अंतर्गत अनेक तालाब और दूसरी जल-संरक्षण संरचनाएँ बनाई गईं। इसी दौरान जूलिफ्लोरा के प्रभावों पर ध्यान गया और उसे हटाने के विषय में चर्चा शुरू हुई।

“स्थानीय रेंजर श्री धर्मराज गुर्जर ने विशेष प्रयास करके जूलिफ्लोरा के उन्मूलन के कार्य को आगे बढ़ाया। हालाँकि सरकार की ओर से इस काम के लिए बहुत अधिक धन उपलब्ध नहीं था। इसलिए जैव विविधता संरक्षण कोष, पर्यावास विकास कोष और घासभूमि विकास कोष जैसी विभिन्न योजनाओं के छोटे-छोटे प्रावधानों का उपयोग किया गया। इन सभी स्रोतों से उपलब्ध धनराशि को जोड़कर वन विभाग ने जूलिफ्लोरा हटाने के लिए अनेक प्रयास किए।”

जूलिफ्लोरा को हटाने के लिए कौन-से तरीके अपनाए गए?

श्री संजीव शर्मा ने बताया:

“जूलिफ्लोरा को हटाना आसान काम नहीं है। कहीं यह बहुत अधिक घनत्व में उगा हुआ मिलता है और एक हेक्टेयर में इसके 500 से 700 तक पेड़ हो सकते हैं। कुछ क्षेत्रों में इसका घनत्व कम होता है और एक हेक्टेयर में केवल 50 से 60 पेड़ मिलते हैं। कई स्थानों पर यह दूसरी वनस्पतियों के साथ मिश्रित रूप में मिलता है, लेकिन वहाँ भी प्रायः समूह बनाकर फैलता है। इसलिए इसके उन्मूलन के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाई गई।

“पहाड़ी क्षेत्रों में मुख्य रूप से धोक के वृक्ष मौजूद थे। इसलिए वहाँ बड़े स्तर पर जूलिफ्लोरा हटाने की आवश्यकता नहीं पड़ी। इसकी सबसे अधिक आवश्यकता मैदानी और घाटी वाले क्षेत्रों में थी। कई घाटियाँ जूलिफ्लोरा से पूरी तरह भर चुकी थीं।

“अत्यधिक घनत्व वाले क्षेत्रों में जूलिफ्लोरा को जड़ों सहित निकालने के लिए एक्सकेवेटर और जेसीबी मशीनों का उपयोग किया गया। जहाँ पेड़ों की संख्या कम थी, वहाँ हाथ से चलने वाले विशेष उपकरणों का प्रयोग किया गया।

“कुछ स्थानों पर पेड़ों की संख्या कम थी, लेकिन उनका आकार बहुत बड़ा हो चुका था। ऐसे पेड़ों को आसानी से एक स्थान से दूसरे स्थान तक ले जाई जा सकने वाली बैटरी चालित आरी से काटा गया। इसके बाद श्रमिकों की सहायता से उनकी जड़ों को जमीन से निकलवाया गया।

“निजी भूमि पर लोग कई बार पेड़ के जमीन से ऊपर वाले भाग को काटने के बाद बचे हुए तने और जड़ों पर रसायनों का प्रयोग करते हैं। वन्यजीव क्षेत्र में रसायनों का उपयोग उचित नहीं था। इसलिए पेड़ों को कुल्हाड़ी अथवा मशीन से काटने के बाद उनकी जड़ों को यथासंभव पूरी तरह निकाला गया।

“कुछ मामलों में तने को भीतर तक काटकर अथवा क्षतिग्रस्त करके छोड़ दिया जाता था, ताकि पेड़ दोबारा विकसित न हो सके। जहाँ पानी के कटाव के कारण जड़ें दिखाई देने लगी थीं, वहाँ उन्हें काटकर निकालने का प्रयास किया गया।”

क्या जूलिफ्लोरा को एक बार निकाल देना पर्याप्त है?

उन्होंने बताया:

“जूलिफ्लोरा को निकालने के बाद कम-से-कम तीन वर्षों तक उसके उन्मूलन का कार्य जारी रखना पड़ता है। उदाहरण के लिए, यदि दस हेक्टेयर भूमि से जूलिफ्लोरा हटाना हो तो पहले वर्ष लगभग पाँच–छह लाख रुपये खर्च हो सकते हैं। अगले वर्ष दोबारा उग आए पौधों और जड़ों से निकली नई शाखाओं को हटाने पर लगभग दो लाख रुपये तथा उसके अगले वर्ष करीब एक लाख रुपये खर्च करने पड़ सकते हैं। इस प्रकार लगातार निगरानी और कार्रवाई करने के बाद ही उसका पूर्ण उन्मूलन संभव होता है।

“यदि पहले वर्ष जूलिफ्लोरा को हटाने के बाद उस क्षेत्र को छोड़ दिया जाए तो जमीन में मौजूद बीज अंकुरित हो सकते हैं। अधूरी निकाली गई जड़ों से भी पौधे दोबारा फूट सकते हैं। इसलिए अगले दो–तीन वर्षों तक उस क्षेत्र की नियमित निगरानी और सफाई अत्यंत आवश्यक है।”

उन्मूलन के बाद क्षेत्र की निगरानी कैसे की गई?

श्री संजीव शर्मा ने बताया:

“यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि वनरक्षक जूलिफ्लोरा हटाए गए क्षेत्रों का नियमित निरीक्षण करें। इसके लिए उस क्षेत्र में अस्थायी बाड़बंदी की जा सकती है। वहाँ स्थानीय घास और वनस्पतियों के बीज भी बोए जा सकते हैं। इन गतिविधियों के कारण वनरक्षक उस स्थान पर नियमित रूप से जाते रहेंगे। यदि जूलिफ्लोरा फिर से उगता दिखाई दे तो उसे तत्काल निकाला जा सकेगा।

“कुछ स्थानों पर विशेष रूप से सघन निगरानी की आवश्यकता होती है। यदि जूलिफ्लोरा को काटने के बाद उस क्षेत्र को भुला दिया जाए तो उन्मूलन का पूरा प्रयास व्यर्थ हो सकता है।

“सरकारी विभागों में अधिकारियों और कर्मचारियों के स्थानांतरण होते रहते हैं। आवश्यक नहीं कि नए अधिकारी या कर्मचारी का उस स्थान से वही जुड़ाव हो, जो पहले काम करने वाले व्यक्ति का था। इसलिए उन्मूलन कार्य को एक सुव्यवस्थित परियोजना के रूप में लिया जाना चाहिए। संबंधित क्षेत्र स्पष्ट रूप से चिह्नित हो और कार्यों का विधिवत अभिलेख रखा जाए। इससे नए अधिकारी का ध्यान भी उस क्षेत्र पर जाएगा और काम निरंतर चलता रहेगा। इस प्रक्रिया में पुराने तथा लगातार उस क्षेत्र में कार्य कर रहे वनरक्षकों की भूमिका बहुत महत्त्वपूर्ण हो जाती है।”

अलग-अलग परिस्थितियों में कौन-सा उपकरण अधिक उपयोगी है?

उन्होंने बताया:

“जहाँ जूलिफ्लोरा का घनत्व बहुत अधिक हो, वहाँ एक्सकेवेटर मशीन का उपयोग उपयुक्त रहता है। जहाँ इसका घनत्व कम हो, वहाँ पेड़ों को इलेक्ट्रिक या बैटरी चालित आरी से काटकर उनकी जड़ें श्रमिकों से निकलवाई जा सकती हैं।

“यदि काम केवल कुल्हाड़ी के भरोसे छोड़ दिया जाए तो बड़े और मजबूत तने आसानी से नहीं कटते। निर्धारित बीएसआर दरों के अंतर्गत इतना काम निकालना भी कठिन हो जाता है। इसलिए बड़े पेड़ों को काटने के लिए इलेक्ट्रिक आरी अधिक उपयोगी है। लगभग 30 सेंटीमीटर से कम मोटाई वाले तनों पर कुल्हाड़ी का प्रयोग किया जा सकता है, लेकिन इससे अधिक मोटे तनों के लिए इलेक्ट्रिक आरी बेहतर रहती है।

“छोटे पौधों को निकालने के लिए पैरों से संचालित ‘वीड पुलर’ जैसे उपकरणों का उपयोग किया जाना चाहिए। ये उपकरण पौधे को जड़ों सहित आसानी से निकाल देते हैं।”

जूलिफ्लोरा हटाने के बाद स्थानीय वनस्पति किस प्रकार वापस आई?

श्री संजीव शर्मा ने बताया:

“इन प्रयासों से रामगढ़ विषधारी का एक बड़ा क्षेत्र जूलिफ्लोरा से मुक्त हो चुका है, हालाँकि अभी और काम किया जाना आवश्यक है।

“हमने देखा कि आसपास के क्षेत्रों में स्थानीय घासों तथा धोक और दूसरे देशज पेड़-पौधों का अच्छा बीज भंडार मौजूद है। जूलिफ्लोरा की प्रतिस्पर्धा समाप्त होते ही स्थानीय वनस्पतियाँ स्वाभाविक रूप से वापस आने लगती हैं। हवा के साथ उड़कर बीज वहाँ पहुँचते हैं और पक्षियों की बीट के माध्यम से भी अनेक प्रजातियों के बीज आते रहते हैं। इसलिए हर स्थान पर कृत्रिम पौधारोपण करना आवश्यक नहीं है। उचित संरक्षण मिलने पर स्थानीय वनस्पतियाँ प्राकृतिक रूप से पुनर्जीवित हो सकती हैं।”

निष्कर्ष

रामगढ़ विषधारी में जूलिफ्लोरा का उन्मूलन किसी एक पद्धति से संभव नहीं था। वन विभाग ने पौधों के घनत्व और आकार, क्षेत्र की स्थलाकृति तथा स्थानीय वनस्पति की स्थिति को ध्यान में रखते हुए अलग-अलग उपाय अपनाए।

अधिक घनत्व वाले क्षेत्रों में भारी मशीनों, बड़े पेड़ों के लिए बैटरी चालित आरी तथा छोटे पौधों के लिए वीड पुलर और दूसरे हाथ से चलने वाले उपकरणों का प्रयोग किया गया। पेड़ों को काटने के बाद उनकी जड़ों को निकालना, अगले तीन वर्षों तक दोबारा उगे पौधों को हटाना और संबंधित क्षेत्र की नियमित निगरानी करना इस प्रक्रिया के आवश्यक अंग थे।

इन प्रयासों का उद्देश्य केवल जूलिफ्लोरा को हटाना नहीं था, बल्कि धोक के जंगलों, प्राकृतिक घासभूमियों और दूसरी स्थानीय वनस्पतियों को पुनर्जीवित करके क्षेत्र को बाघों तथा अन्य वन्यजीवों के लिए बेहतर पर्यावास बनाना भी था।

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