डॉ. सतीश कुमार शर्मा
राजस्थान वन सेवा (सेवानिवृत्त), उदयपुर
अरावली पर्वतमाला एक फोल्ड (Fold) पर्वतमाला है, यानी यह ऐसी नज़र आती है मानो कोई समतल चट्टानी पट्टी ऊपर-नीचे-ऊपर-नीचे होकर सलवटदार हो गई हो। भूपट्टी पर दबाव किस दिशा से आ रहा है, यह दबाव ही सलवटों की दिशा निर्धारित करता है। किसी एक दिशा के दबाव से सलवटें समानान्तर हो सकती हैं। अरावली में भी कई-कई समानान्तर पर्वत शृंखलाएँ नज़र आती हैं। दक्षिण अरावली में यह दृश्य ज़्यादा स्पष्ट नज़र आता है। कुंभलगढ़ अभयारण्य में समानान्तर पहाड़ों का दृश्य किसी ऊँचाई पर जाकर आसानी से देखा जा सकता है।
फोल्ड यानी घुमाव के कारण पहाड़ Ʌ या ∩ रूप में उठे या V या U रूप में धँसे प्रतीत होते हैं। अरावली के पहाड़ फोल्ड या सलवटों के कारण खड़ी काट में कुछ तिकोने से नज़र आते हैं, यानी उनका आधार चौड़ा नज़र आता है तथा ऊपर की तरफ़ धीरे-धीरे संकरे होते हुए शीर्ष यानी चोटी पर बहुत पतले से नज़र आते हैं। अरावली पहाड़ियों के शीर्ष में कई संरचनात्मक विभिन्नताएँ नज़र आती हैं, जैसे पतला धारनुमा शीर्ष, पतला दाँतेदार शीर्ष, भौंटा शीर्ष, पठारनुमा चौड़ा शीर्ष, गोलाई लिए गुम्बदनुमा शीर्ष आदि। छोटी पहाड़ियों (Piedmonts) में प्रायः उत्तल (Convex) गोलाकार गुम्बदनुमा शीर्ष होता है।
अपरदन की निरन्तर प्रक्रिया पहाड़ों में चलती रहती है, जिसमें उनकी तलहटी, ढाल, शीर्ष, चोटी (Peak), काठी (Saddle), घाटी (Valley), जलधारा (Water stream), जल प्रपात (Waterfall), ऊँचाई, चौड़ाई, भार, आयतन, वनस्पति आवरण की प्रकृति, प्राणी प्रकार आदि के गुणों व विशेषताओं में बदलाव आते रहते हैं। हम आज जो अरावली देख रहे हैं, वह मूल अरावली नहीं, बल्कि करोड़ों वर्षों के क्षरण व प्राकृतिक शक्तियों के प्रभाव से बची-खुची अवशेष अरावली है। इसीलिए अरावली को अवशेष पर्वत शृंखला (Residual mountain chain) भी कहा जाता है।
अपरदन से कैसे बनते हैं तोरण
कोई भी ऊँचा पहाड़ ताप, ठंड, वर्षा, ओले एवं आँधी-तूफ़ान तो झेलता ही है। वर्षा के कारण ढालों पर बहता पानी (Run off) मिट्टी व चट्टानों को बहाव के साथ ऊपर से नीचे की तरफ़ ढकेलता रहता है। यदि लैंड स्लाइड (land slide) होता है तो भारी मात्रा में चट्टान, मिट्टी आवरण व वनस्पति आवरण दरकता-सरकता, ढालों से फिसलता हुआ नीचे तलहटी में पहुँच जाता है। कई बार चट्टानों में दो तरह के खनिज होते हैं — एक कठोर तथा पानी के द्वारा धीमे अपरदन (Erosion) का शिकार होने वाले, दूसरे नर्म तथा शीघ्र वर्षा जल में घुल कर या उसके बहाव में कट कर अपेक्षाकृत शीघ्र अपरदन का शिकार होने वाले।
अपरदन एवं अनेक प्राकृतिक शक्तियों के कारण कई बार पत्थरों व चट्टानों के बीच में छेद हो जाते हैं। ये छेद गुफा (Cave), सुरंग (Tunnel), खोखली जगह (Hollows), साधारण छेद (Hole or pits), बड़े छेद, गड्ढेनुमा अवतल (Concave) स्थान आदि के रूप में होते हैं। यदि चट्टान कुछ-कुछ पतली व खड़ी हो तथा उसमें अपेक्षाकृत खिड़की के आकार या द्वार के आकार जैसा बड़ा छेद हो, तो उसे स्थानीय लोग तोरण, तोरणा, तोरणद्वार, पोल आदि नामों से पुकारते हैं।
राजस्थान के ज्ञात तोरण
राजस्थान में अरावली एवं विंध्याचल पर्वतमालाओं के अलावा मालवा का पठार भी विद्यमान है, लेकिन प्राकृतिक तोरण केवल अरावली पर्वतमाला में ही नज़र आते हैं। राजस्थान के अरावली क्षेत्र में देखे गए कुछ तोरण व इनसे मिलते-जुलते स्थलों की सूची सारणी 1 में नीचे प्रस्तुत है:
| क्र. सं. | पर्वत शृंखला | स्थान जहाँ विद्यमान है | छिद्रनुमा रचना या छिद्रवाली चट्टान का स्थानीय नाम | विशेष विवरण |
|---|---|---|---|---|
| 1 | अरावली | सरिस्का बाघ परियोजना, अलवर | पाण्डूपोल | “पोल” का स्थानीय बोली में अर्थ है खोखला या पोला। जनश्रुति है कि पाण्डवों ने इधर से उधर जाने हेतु छोटा मार्ग बनाने के लिए पहाड़ को तोड़कर छेद बनाया था। उनके नाम पर ही यह छेद पाण्डूपोल कहलाया। |
| 2 | अरावली | जिला उदयपुर में स्थित फुलवारी अभयारण्य के आड़ा हल्दू वन खण्ड में | काणी हाल | “काणा” का स्थानीय बोली में अर्थ है फूटा हुआ, यानी फूटा हुआ पहाड़ |
| 3 | अरावली | जिला उदयपुर में स्थित फुलवारी अभयारण्य के डैया वन खण्ड में डैया गाँव के पास बूझ–अम्बासा मार्ग पर | काना पारा | “काणा” यानी फूटी आँख का, “पारा” का अर्थ है पहाड़; यानी फूटी आँख का पहाड़ या एक आँख का पहाड़ |
| 4 | अरावली | उदयपुर जिले की झाड़ोल तहसील में खरडिया व नला गाँव के बीच | कोई विशेष नाम नहीं | पहाड़ की चोटी वाले क्षेत्र में आर-पार एक छिद्र है |
| 5 | अरावली | उदयपुर जिले में ओगणा के पास सलार गाँव में बोकन मगरा | कोई विशेष नाम नहीं | पहाड़ की चोटी वाले क्षेत्र में आर-पार एक छिद्र है |
| 6 | अरावली | तोरणा वन खण्ड (24.527601 N, 73.29222 E) | तोरणा | उदयपुर जिले की ओगणा रेंज में (फोटो: 1, 2, 3) |
| 7 | अरावली | तोरणा वन खण्ड (24.526128 N, 73.293083 E) | फूटा तोरणा | उदयपुर जिले की ओगणा रेंज में। कभी यह तोरणा सुरक्षित था, जो क्रमांक 6 पर दर्ज तोरणा से कुछ ही दूरी पर स्थित था, लेकिन जनश्रुति अनुसार दशकों वर्ष पूर्व भूकम्प से इसका ऊपरी भाग नष्ट हो जाने से यह तोरणा क्षतिग्रस्त हो गया। अतः वर्तमान में इसे फूटा तोरणा नाम से जाना जाता है (फोटो: 4) |
| 8 | अरावली | उदयपुर जिले की झाड़ोल तहसील में बाघपुरा के पास स्थित मादड़ी गाँव के पहाड़ में | कोई विशेष नाम नहीं | पहाड़ी के ऊपर की तरफ़ चोटी क्षेत्र में एक छेद है |
| 9 | अरावली | उदयपुर जिले की झाड़ोल तहसील में | कोई विशेष नाम नहीं | ढीकली–किरट के पास दाँतेदार पहाड़ी के शीर्ष की तरफ़ एक छेद है |
| 10 | अरावली | कुंभलगढ़ अभयारण्य में किले के पास आरेठ वन खण्ड में | एक चट्टान में बड़ा छेद है। इस चट्टान को स्थानीय लोग “दूरकी का भाटा” कहते हैं | बच्चों को कूकर खाँसी होने पर लोग इस चट्टान तक बच्चों को लाकर उनको यहाँ नए वस्त्र पहना कर घर ले जाते हैं, व पुराने वस्त्र छोड़ जाते हैं |
ओगणा रेंज का तोरणा वन खण्ड
उदयपुर जिले की ओगणा रेंज में एक वन खण्ड का नाम ही “तोरणा” है, क्योंकि उसमें एक विद्यमान एवं एक टूट चुका तोरणा है। ओगणा रेंज के तोरण बड़े विशिष्ट एवं प्रसिद्ध हैं। इन तोरणों का आकार भी बहुत बड़ा है।




तोरणों का महत्व
प्रायः तोरण एवं तोरणों से मिलते-जुलते क्षेत्र पहाड़ियों के शीर्ष की तरफ़ होते हैं एवं स्थानीय सीमा चिह्नों (Land marks) की तरह भी प्रयोग होते हैं। ये भूगर्भविज्ञान के अध्येताओं और छात्रों के लिए अध्ययन हेतु भी उपयोगी होते हैं। पतझड़ हो जाने पर दूर तक अच्छी तरह दिखाई पड़ने के कारण तोरणों को देखने हेतु गर्मी का शुष्क मौसम ज़्यादा उपयोगी रहता है। वर्षा ऋतु में हरियाली के कारण तोरण साफ़ नज़र नहीं आते।
तोरणों का पारिस्थितिकीय पर्यटन में भी महत्व है। कई जगह इनका धार्मिक एवं सांस्कृतिक महत्व भी है। इस रूप में पाण्डूपोल का नाम विशेष रूप से लिया जा सकता है। सरिस्का बाघ परियोजना में तोरणा को “पोल” नाम से जाना जाता है। वहाँ पाण्डूपोल नाम का तोरणा प्रसिद्ध है, लेकिन पर्यटकों की सुरक्षा को ध्यान में रख कर वहाँ आम पर्यटकों का जाना स्वीकृत नहीं है, क्योंकि वहाँ तक पैदल जाना होगा एवं बाघ परियोजना क्षेत्र में पैदल जाना ख़तरों भरा है। अतः पर्यटक हित को ध्यान में रखकर लोगों के वहाँ तक आवागमन को रोका गया था।
लेखक
डॉ. सतीश कुमार शर्मा, राजस्थान वन सेवा (सेवानिवृत्त)
14-15, चकरिया आम्बा, रामपुरा चौराहा, झाड़ोल रोड, पोस्ट — नाई, उदयपुर 313031, राजस्थान
ईमेल: sksharma56@gmail.com

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