A large gathering of Eurasian Griffons at a feeding site, several birds coming in to land

राजस्थान में गिद्धों का भविष्य: चुनौतियाँ और संरक्षण की दिशा

गिद्ध संरक्षण विशेषज्ञ डॉ. दाऊ लाल बोहरा से डॉ. धर्मेन्द्र खांडल की बातचीत

प्रश्नकर्ता: डॉ. धर्मेन्द्र खांडल, राजस्थान बायोडायवर्सिटी
उत्तरदाता: डॉ. दाऊ लाल बोहरा, गिद्ध संरक्षण विशेषज्ञ एवं आईयूसीएन के वल्चर स्पेशलिस्ट ग्रुप के सदस्य

भारत में गिद्धों की संख्या में आई भारी गिरावट ने उनके संरक्षण की आवश्यकता को रेखांकित किया है। राजस्थान के विस्तृत खुले भूभाग, यहाँ पाई जाने वाली गिद्ध प्रजातियाँ और शीतकाल में आने वाले प्रवासी गिद्ध इस राज्य को संरक्षण की दृष्टि से विशेष महत्त्व देते हैं। गिद्धों की वर्तमान स्थिति, पशुचिकित्सा में प्रयुक्त दवाओं के प्रभाव, बिजली की लाइनों से उत्पन्न खतरों और संरक्षण की प्राथमिकताओं पर डॉ. दाऊ लाल बोहरा से डॉ. धर्मेन्द्र खांडल की बातचीत।

प्रश्न 1: भारत में गिद्ध संरक्षण की चर्चा करते समय राजस्थान को विशेष महत्त्व क्यों दिया जाना चाहिए?

डॉ. दाऊ लाल बोहरा: भारत में गिद्धों की संख्या में आई असाधारण गिरावट की पहचान में राजस्थान से मिले प्रमाणों की महत्त्वपूर्ण भूमिका रही है। बाद में व्यापक सर्वेक्षणों से स्पष्ट हुआ कि यह संकट किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं था।

शुष्क भूभाग में एक कँटीले पेड़ की फुनगी पर बैठे चार यूरेशियन ग्रिफॉन गिद्ध
शुष्क क्षेत्र के एक कँटीले पेड़ पर विश्राम करते यूरेशियन ग्रिफॉन गिद्ध। खुले भूभाग और ऊँचे विश्रामस्थल राजस्थान को गिद्धों के लिए उपयुक्त बनाते हैं। फ़ोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा

राजस्थान का महत्त्व इसके विस्तृत खुले भूभाग और यहाँ मिलने वाली गिद्ध प्रजातियों के कारण भी है। यहाँ स्थानीय गिद्धों के साथ शीतकालीन प्रवासी गिद्ध भी आते हैं। इसलिए राज्य की भूमिका अपनी निवासी आबादी के संरक्षण के साथ-साथ प्रवासी गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन और विश्रामस्थल उपलब्ध कराने की भी है।

मेरे विचार में राष्ट्रीय संरक्षण योजनाओं में राजस्थान की इस भूमिका को अधिक स्पष्ट मान्यता और उसके अनुरूप संसाधन मिलने चाहिए।

प्रश्न 2: राजस्थान में गिद्धों की कौन-कौन-सी प्रजातियाँ मिलती हैं?

डॉ. दाऊ लाल बोहरा: राजस्थान में गिद्धों की सात प्रजातियों का उल्लेख किया जाता है—इंडियन वल्चर, व्हाइट-रम्प्ड वल्चर, यूरेशियन ग्रिफॉन, हिमालयन ग्रिफॉन, इजिप्शियन वल्चर, सिनेरियस वल्चर और रेड-हेडेड वल्चर।

ग्रिफॉन गिद्धों के बीच खड़ा लाल सिर वाला रेड-हेडेड वल्चर
राजस्थान में पाई जाने वाली गिद्धों की विविधता—स्थानीय और प्रवासी प्रजातियों का एक साथ दिखाई देता समूह। फ़ोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा

इनके कुछ पुराने अथवा प्रचलित नाम भी हैं। उदाहरण के लिए, इंडियन वल्चर को लॉन्ग-बिल्ड वल्चर और रेड-हेडेड वल्चर को किंग वल्चर भी कहा जाता है। अलग-अलग नामों के कारण एक ही प्रजाति को दो बार गिनने से बचना चाहिए।

प्रजाति और उपप्रजाति का अंतर समझना भी आवश्यक है। इजिप्शियन वल्चर की स्थानीय और बाहर से आने वाली आबादियों का उल्लेख करते समय यह स्पष्ट रहना चाहिए कि उन्हें अलग प्रजातियों के रूप में नहीं गिना जा रहा है।

प्रश्न 3: वर्तमान में राजस्थान में गिद्धों की स्थिति को आप किस प्रकार देखते हैं?

डॉ. दाऊ लाल बोहरा: राजस्थान की स्थिति समझने के लिए पश्चिमी मरुस्थलीय क्षेत्र तथा अरावली से जुड़े पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों को अलग-अलग देखना उपयोगी होगा।

एक ही पेड़ पर बैठे अनेक गिद्ध, एक पक्षी पंख फैलाए उतरता हुआ
एक ही पेड़ पर बैठे गिद्धों का समूह। ऐसे विश्राम स्थल आबादी की निगरानी के लिए महत्त्वपूर्ण होते हैं। फ़ोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा

पश्चिम में जैसलमेर, बाड़मेर, बीकानेर, जोधपुर और आसपास के क्षेत्र महत्त्वपूर्ण हैं। दूसरी ओर धौलपुर, करौली, रणथम्भौर, बूंदी, कोटा, झालावाड़ और उनसे जुड़े भूभागों में भी गिद्धों की उपस्थिति पर ध्यान देना होगा।

मेरे क्षेत्रीय अनुभव के आधार पर राजस्थान में निवासी गिद्धों की संख्या लगभग 3,500 के आसपास होने का अनुमान है। हालाँकि, इसे राज्यव्यापी, प्रमाणित गणना का परिणाम नहीं माना जाना चाहिए।

स्थानीय और प्रवासी गिद्धों की संख्या अलग-अलग दर्ज करने वाली नियमित निगरानी आवश्यक है। तभी हम विश्वसनीय ढंग से समझ सकेंगे कि गिद्धों की संख्या कितनी है, कहाँ प्रजनन हो रहा है और किन क्षेत्रों में उनकी आबादी घट रही है।

प्रश्न 4: डाइक्लोफेनाक पर रोक के बाद भी गिद्धों के लिए दवाओं का खतरा क्यों बना रहा?

डॉ. दाऊ लाल बोहरा: किसी दवा पर प्रतिबंध लगना और उसका उपयोग पूरी तरह बंद हो जाना अलग-अलग बातें हैं। पशुचिकित्सा में डाइक्लोफेनाक पर रोक के बाद भी मानव उपयोग के लिए उपलब्ध दवा का पशुओं में इस्तेमाल चिंता का विषय रहा। बड़ी बहु-खुराक शीशियों पर बाद में लगाई गई रोक इसी समस्या से संबंधित थी।

मृत पशुओं के अवशेषों पर भोजन करते गिद्धों की भीड़
मृत पशुओं पर भोजन करते गिद्ध। पशुओं के उपचार में इस्तेमाल की गई दवाएँ इसी रास्ते गिद्धों तक पहुँचती हैं। फ़ोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा

मुख्य प्रश्न निगरानी और नियमों के पालन का है। पशुपालकों को कौन-सी दवाएँ मिल रही हैं, उनका उपयोग कैसे हो रहा है और प्रतिबंधित उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं या नहीं—इन सभी स्तरों पर ध्यान देना आवश्यक है।

केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं है। पशुचिकित्सकों, दवा विक्रेताओं और पशुपालकों तक सही जानकारी पहुँचनी चाहिए। साथ ही गिद्धों के लिए सुरक्षित पशुचिकित्सा विकल्प उपलब्ध होने चाहिए।

प्रश्न 5: क्या डाइक्लोफेनाक के अतिरिक्त अन्य दवाएँ भी चिंता का विषय हैं?

डॉ. दाऊ लाल बोहरा: हाँ। एसीक्लोफेनाक, कीटोप्रोफेन और निमेसुलाइड जैसी दवाएँ भी इस चर्चा में महत्त्वपूर्ण हैं। गिद्ध संरक्षण के लिए केवल डाइक्लोफेनाक के उपयोग पर निगरानी रखना पर्याप्त नहीं होगा।

भोजनस्थल पर पास-पास खड़े दर्जनों गिद्ध
एक भोजनस्थल पर गिद्धों की भीड़। किसी एक शव में मौजूद हानिकारक दवा एक साथ कई पक्षियों को प्रभावित कर सकती है। फ़ोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा

पशुओं में इस्तेमाल होने वाली दवाओं का गिद्धों की सुरक्षा की दृष्टि से मूल्यांकन और उसके अनुरूप नियमन आवश्यक है। साथ ही यह देखना होगा कि प्रतिबंधित दवाओं के स्थान पर कौन-से विकल्प उपयोग में लाए जा रहे हैं।

इन उपायों का वास्तविक प्रभाव समझने के लिए बाजार में दवाओं की उपलब्धता, पशुओं में उनके उपयोग और गिद्धों की मृत्यु की घटनाओं की निगरानी साथ-साथ करनी होगी।

प्रश्न 6: दवाओं के अतिरिक्त राजस्थान में गिद्धों के सामने सबसे गंभीर खतरे क्या हैं?

डॉ. दाऊ लाल बोहरा: मेरे अनुभव में बिजली की लाइनों और खंभों से होने वाली मौतें गंभीर चिंता का विषय हैं। विशेष रूप से 11 और 33 केवी की उन लाइनों पर ध्यान देने की आवश्यकता है, जिनकी बनावट में पक्षियों की सुरक्षा का पर्याप्त ध्यान नहीं रखा गया है।

बिजली के खंभों और तारों के नीचे जमीन पर पड़ा एक मृत पक्षी, पास में खड़ा एक व्यक्ति
बिजली की लाइन के नीचे मिला एक मृत पक्षी। खंभों और तारों से होने वाली मौतें गिद्धों सहित कई बड़े पक्षियों के लिए गंभीर खतरा हैं। फ़ोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा के सौजन्य से

खंभे पर बैठते या उड़ान भरते समय पक्षी विद्युत प्रवाहित हिस्से और किसी दूसरे संपर्क बिंदु को एक साथ छू सकता है। इससे उसे करंट लग सकता है। तारों से टकराना एक अलग खतरा है। इन दोनों समस्याओं के कारणों और समाधान को अलग-अलग समझना चाहिए।

पश्चिमी राजस्थान में ऊर्जा परियोजनाओं और उनसे जुड़े ढाँचे के विस्तार के साथ पक्षियों की सुरक्षा को भी योजना का हिस्सा बनाना आवश्यक है। गिद्धों के भोजनस्थलों, नियमित बैठने के स्थानों और आवागमन वाले क्षेत्रों के आसपास विशेष सावधानी बरतनी चाहिए।

प्रश्न 7: क्या बिजली के खंभों और तारों में बदलाव करके यह खतरा कम किया जा सकता है? इसकी लागत कितनी होगी?

डॉ. दाऊ लाल बोहरा: तकनीकी बदलाव संभव हैं। सबसे पहले उन खंभों और लाइनों की पहचान करनी चाहिए, जहाँ गिद्ध नियमित रूप से बैठते हैं अथवा जहाँ उनकी मौतें दर्ज हुई हैं। इसके बाद तकनीकी विशेषज्ञों की सहायता से उपयुक्त सुधार तय किए जा सकते हैं।

विद्युत खंभे के पास खड़ा एक व्यक्ति, हाथ में एक मृत पक्षी
विद्युत खंभे के पास मिला मृत पक्षी। जोखिम वाले खंभों की पहचान कर उनमें तकनीकी सुधार किया जा सकता है। फ़ोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा के सौजन्य से

खंभों की बनावट में बदलाव, जोखिम वाले संपर्क बिंदुओं पर सुरक्षा आवरण और आवश्यक स्थानों पर इन्सुलेशन जैसे उपाय उपयोगी हो सकते हैं। भोजनस्थलों और रात्रि-विश्राम स्थलों के आसपास के खंभों को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।

प्रति खंभा एक निश्चित लागत बताना उचित नहीं होगा। यह मौजूदा संरचना, आवश्यक बदलाव और इस्तेमाल होने वाली सामग्री पर निर्भर करेगी। पहले जोखिम का सर्वेक्षण और तकनीकी आकलन होना चाहिए।

प्रश्न 8: राजस्थान में गिद्ध संरक्षण के मौजूदा प्रयासों को आप कैसे देखते हैं? कहाँ सुधार की आवश्यकता है?

डॉ. दाऊ लाल बोहरा: राजस्थान में सकारात्मक प्रयास हुए हैं। बीकानेर का जोड़बीड़ इसका एक महत्त्वपूर्ण उदाहरण है। ऐसे स्थान गिद्ध संरक्षण के प्रयासों को आगे बढ़ाने का आधार प्रदान करते हैं।

बाड़ से घिरे एक स्थल पर कतार में बैठे गिद्ध, अग्रभूमि में एक इजिप्शियन वल्चर
बाड़ से घिरे एक निस्तारण स्थल पर एकत्र गिद्ध; अग्रभूमि में इजिप्शियन वल्चर। सुरक्षित और प्रबंधित भोजनस्थल संरक्षण का आधार बनते हैं। फ़ोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा

इन प्रयासों का विस्तार अन्य महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों तक भी होना चाहिए। पश्चिमी राजस्थान में स्थानीय और प्रवासी गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन तथा विश्रामस्थल सुनिश्चित करने के साथ बिजली के ढाँचे से जुड़े जोखिम कम करना आवश्यक है।

मेरे विचार में राज्य के प्रयासों को राष्ट्रीय स्तर पर अधिक सहयोग मिलना चाहिए। राजस्थान में आने वाले प्रवासी गिद्धों और यहाँ की निवासी आबादी के महत्त्व को देखते हुए दीर्घकालीन निगरानी तथा संरक्षण के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराए जाने चाहिए।

प्रश्न 9: क्या राजस्थान में पक्षीप्रेमियों और स्थानीय समूहों की सहायता से नियमित, जिलेवार गिद्ध गणना शुरू की जा सकती है?

डॉ. दाऊ लाल बोहरा: निश्चित रूप से। यह एक उपयोगी पहल होगी। इसके लिए स्पष्ट पद्धति, प्रशिक्षण और नियमितता आवश्यक हैं। एक दिन की गणना के साथ वर्ष के अन्य समय में भी व्यवस्थित निगरानी होनी चाहिए।

एक पेड़ पर बैठे गिद्धों का समूह, गिनती के लिए उपयुक्त दृश्य
पेड़ पर बैठे गिद्ध। नियमित और एक जैसी पद्धति से की गई गणना ही आबादी के रुझान बता सकती है। फ़ोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा

निवासी गिद्धों की गणना के लिए उपयुक्त समय निर्धारित किया जा सकता है। प्रवासी गिद्धों की निगरानी शीतकाल में अलग की जानी चाहिए। घोंसलों, रात्रि-विश्राम स्थलों और भोजनस्थलों का विवरण भी दर्ज करना होगा। दोहरी गिनती से बचने के लिए विभिन्न समूहों के बीच समन्वय जरूरी है।

एक केंद्रीय समन्वय समूह आँकड़ों की जाँच करे और हर वर्ष परिणाम प्रकाशित किए जाएँ। शुरुआत में कठिनाइयाँ आ सकती हैं, लेकिन लगातार एक जैसी पद्धति अपनाने से आबादी में होने वाले बदलाव समझना संभव होगा।

प्रश्न 10: निगरानी और संरक्षण में स्थानीय लोगों की भूमिका क्या होनी चाहिए?

डॉ. दाऊ लाल बोहरा: स्थानीय लोगों की भागीदारी बुनियादी आवश्यकता है। गिद्धों की उपस्थिति वाले क्षेत्रों में ऐसे लोगों और समूहों का होना जरूरी है, जो उनकी पहचान कर सकें, घोंसलों की जानकारी दे सकें और किसी खतरे की स्थिति में संबंधित विभाग तक सूचना पहुँचा सकें।

चट्टान के पास खड़ा एक व्यक्ति, गोद में एक बड़ा पक्षी शावक
स्थानीय जानकारी के बिना घोंसला-स्थलों तक पहुँचना कठिन होता है। फ़ोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा के सौजन्य से

हर जिले में जागरूकता और प्रशिक्षण का स्तर एक जैसा नहीं है। इसलिए स्थानीय समूहों को तैयार करना होगा। किसानों और पशुपालकों से संवाद भी आवश्यक है, विशेषकर उन स्थानों पर जहाँ खेतों या आसपास के पेड़ों पर गिद्धों के घोंसले हों।

लोगों की व्यावहारिक चिंताओं को समझते हुए उन्हें संरक्षण कार्यक्रमों में सहभागी बनाना चाहिए। विशेषज्ञों और स्थानीय लोगों का निरंतर सहयोग ही निगरानी व्यवस्था को लंबे समय तक बनाए रख सकता है।

प्रश्न 11: बीकानेर, जैसलमेर और जोधपुर जैसे क्षेत्रों में संरक्षण की रणनीति किस प्रकार अलग हो सकती है? गौशालाएँ क्या भूमिका निभा सकती हैं?

डॉ. दाऊ लाल बोहरा: प्रत्येक क्षेत्र में भोजन की उपलब्धता और उसके स्रोत अलग हो सकते हैं। कहीं डेयरी गतिविधियों की भूमिका अधिक है, तो कहीं गौशालाएँ महत्त्वपूर्ण हैं। इसलिए स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार रणनीति बनानी होगी।

भोजनस्थल पर बड़ी संख्या में इजिप्शियन वल्चर, आवारा कुत्ते और बिखरा हुआ कचरा
भोजनस्थल पर इजिप्शियन वल्चर, आवारा कुत्ते और बिखरा हुआ कचरा एक साथ। भोजन की उपलब्धता के साथ उसकी सुरक्षा भी उतनी ही महत्त्वपूर्ण है। फ़ोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा

गौशालाओं के सहयोग से गिद्धों के लिए हानिकारक दवाओं का उपयोग रोकने और सुरक्षित पशुचिकित्सा विकल्प अपनाने पर काम किया जा सकता है। पशुओं के उपचार का रिकॉर्ड रखना भी उपयोगी होगा।

मृत पशु उपलब्ध होना अपने आप में सुरक्षित भोजन की गारंटी नहीं है। यह जानना आवश्यक है कि उसके उपचार में किन दवाओं का इस्तेमाल हुआ था। पशुचिकित्सकों, गौशाला प्रबंधन और संबंधित विभागों के सहयोग से भोजन से जुड़े जोखिम कम किए जा सकते हैं।

प्रश्न 12: राजस्थान में गिद्ध संरक्षण के लिए तत्काल प्राथमिकताएँ क्या होनी चाहिए?

डॉ. दाऊ लाल बोहरा: सबसे पहले नियमित और विश्वसनीय निगरानी व्यवस्था बननी चाहिए, जिससे स्थानीय और प्रवासी आबादियों की स्थिति समझी जा सके।

दूसरी प्राथमिकता गिद्धों के भोजन को हानिकारक दवाओं से सुरक्षित बनाना है। तीसरी प्राथमिकता उन बिजली के खंभों और लाइनों की पहचान तथा सुधार है, जिनसे गिद्धों को खतरा है। घोंसलों, भोजनस्थलों और रात्रि-विश्राम स्थलों की सुरक्षा भी आवश्यक है।

इन प्रयासों में स्थानीय समुदायों, पशुपालकों, गौशालाओं, पशुचिकित्सकों, बिजली विभाग और वन विभाग को साथ लाना होगा। संरक्षण की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि हम इन उपायों को जमीन पर कितनी निरंतरता से लागू कर पाते हैं।

डॉ. धर्मेन्द्र खांडल: डॉ. दाऊ लाल बोहरा, राजस्थान बायोडायवर्सिटी के लिए इस महत्त्वपूर्ण बातचीत में शामिल होने और अपने अनुभव साझा करने के लिए आपका बहुत धन्यवाद।

एक पेड़ की फुनगी पर आमने-सामने बैठे दो यूरेशियन ग्रिफॉन गिद्ध
एक ही डाल पर बैठे दो यूरेशियन ग्रिफॉन गिद्ध। फ़ोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा

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