क्रिमेटोगैस्टर घोंसला

अनोखा आशियाना बनाने वाली क्रिमेटोगैस्टर चींटियाँ

राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले के सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य में चींटियों की एक प्रजाति मिलती है जो घोंसले बनाती है जो पैगोडा मंदिरों के आकर का होता है। यह चींटियां देखने में  सामान्य काली चिंटी लगती है, लेकिन इन चींटियों का घोंसला अनुपम है। पैगोडा भारत के हिमालय क्षेत्र में या दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में मिलने वाले बौद्ध मंदिर है जो एक बुर्ज तथा अनेक तलों वाली इमारत है, जिसकी प्रत्येक तल की अपनी छत होती है। वैज्ञानिक इन चींटियों को क्रिमेटोगैस्टर वंश में रखते हैं। राजस्थान के जैव-विविधता के विशेषज्ञ डॉ सतीश शर्मा के अनुसार राजस्थान में क्रिमेटोगैस्टर चींटियों की तीन प्रजाति पाई जाती है Crematogaster (Acrocoelia) brunnea var. contemta, C. (A.) rothneyi and C. (A.) walshi.

क्रिमेटोगैस्टर
इनका पेट दिल के आकार का होता है जिसकी वजह से इनका नाम क्रिमेटोगैस्टर है (चित्र: मंगल मेहता)

प्रतापगढ़ जिले के जंगल अपनी जैव-विविधता के लिए जाने जाते हैं। यहाँ अरावली, विंध्याचल पर्वतमालाओं और  मालवा के पठार का अनूठा संगम है और साथ ही इस क्षेत्र की समुद्र तल ऊंचाई 282 – 600 मीटर के बीच है। यही कारण है की यहाँ राजस्थान के अन्य हिस्से की बजाय अधिक जैव-विविधता पाई जाती है।

पगोडा मंदिर का एक चित्रण (स्रोत: इंटरनेट)
पगोडा मंदिर का एक चित्रण (स्रोत: इंटरनेट)

यह चींटियाँ उष्ण/उपऊष्ण कटिबंधीय वनों के नम स्थलों के पेड़ों पर पाई जाती है। सीतामाता के जंगल में इनके घोंसले पेड़ों पर 20 फिट ऊँचाई तक देखे गए हैं। यह अपना घोंसला मिट्टी रेशों और अपनी लार को मिला कर बनाती है। इनके पेट दिल के आकार का होता है जिसकी वजह से इनका नाम क्रिमेटोगैस्टर – (गेस्टर) है। इनका आकर २ से ३ मिली मीटर तक होता है। राजस्थान के दक्षिण में स्थित अन्य जिलों जैसे उदयपुर, बांसवाड़ा आदि में भी कहीं कहीं इनके घोंसले देखे गये है। इनका घोंसला ५ से १० वर्षों या इससे भी अधिक पुराना हो सकता है- अगर पारिस्तिथिकी अनुकूल हो, और घोंसले वाले पेड़ों को छेड़ा नहीं जाए और जंगल की आग में भी यह सुरक्षित रह सकते है, यह कॉलोनी लम्बे समय तक स्थाई रहती है।

क्रिमेटोगैस्टर चींटियाँ अपना घोंसला मिट्टी के रेशों और अपनी लार को मिला कर बनाती है (चित्र: मंगल मेहता)

भारत में यह उत्तराखंड के जंगलों, मध्य भारत और दक्षिणी भारत के जंगलों में पाई जाती है। राजस्थान में इन घोंसलों की संख्या कम है। इसके घोंसले बहेडा और पलाश के पेड़ों पर देखे गए हैं। इन घोंसलों को नुकसान नहीं पहुंचाएं और न ही कौतूहल वश इसे छेड़ें। जिस पेड़ पर इसके घोंसले हो उन्हें नहीं काटना चाहिए। देखा गया है की इन घोंसलों में रुफस वुडपेकर अपना घोंसला बनाकर रहता है। परन्तु चींटियों के साथ यह कैसे रह पता है जानना अत्यंत रोमांचक होगा। अभी तक इस तरह की प्रक्रिया राजस्थान में भली प्रकार से किसी शोध पत्र में प्रकाशित नहीं हुई है। अथवा राजस्थान से कोई छायाचित्र भी प्रकाशित नहीं हुआ है।

Discussion

1 comment

  1. Praveen

    Nice article, I’ve seen such nest in Jaipur as well.

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