अरावली की सूक्ष्म जैव विविधता में जुड़ी एक नई प्रजाति: लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस (Langelurillus udaipurensis)

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आज भी प्रकृति में ऐसे अनेक छोटे जीव मौजूद हैं, जिनकी पहचान विज्ञान के लिए अभी होना बाकी है। मकड़ियाँ भी इन्हीं कम अध्ययनित जीव समूहों में शामिल हैं। यद्यपि विश्वभर से मकड़ियों की हजारों प्रजातियाँ ज्ञात हैं, फिर भी प्रत्येक वर्ष नई प्रजातियों की खोज यह दर्शाती है कि जैव विविधता के बारे में हमारी समझ अभी पूर्ण नहीं है। इसी क्रम में राजस्थान के उदयपुर में स्थित सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य से जंपिंग स्पाइडर की एक नई प्रजाति, लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस, का वैज्ञानिक वर्णन किया गया। यह खोज न केवल विज्ञान के लिए एक नई प्रजाति का परिचय कराती है, बल्कि राजस्थान से लैंगलुरिलस  वंश का पहला वैज्ञानिक अभिलेख भी प्रस्तुत करती है। यह खोज अरावली क्षेत्र की समृद्ध, लेकिन अभी भी कम ज्ञात, जैव विविधता को समझने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।

लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस, जंपिंग स्पाइडर (साल्टिसिडे) कुल की एक प्रजाति है। इस कुल की मकड़ियाँ अपनी तीक्ष्ण दृष्टि और फुर्तीले शिकार करने के तरीके के लिए जानी जाती हैं। अधिकांश मकड़ियों के विपरीत ये शिकार पकड़ने के लिए जाला नहीं बनातीं, बल्कि शिकार का पीछा करके उस पर सटीक छलांग लगाती हैं। इन्हीं विशेषताओं के कारण साल्टिसिडे विश्व के सबसे अधिक अध्ययन किए जाने वाले मकड़ी समूहों में से एक है।

लैंगलुरिलस, जंपिंग स्पाइडर (कुल: साल्टिसिडे) का एक छोटा लेकिन विशिष्ट वंश है। इसकी अधिकांश प्रजातियाँ अफ्रीका में पाई जाती हैं, जबकि कुछ प्रजातियाँ भारत से भी ज्ञात हैं। वर्तमान में विश्वभर में लैंगलुरिलस की 23 मान्य प्रजातियाँ वर्णित की जा चुकी हैं। भारत में इस वंश का पहला वैज्ञानिक अभिलेख वर्ष 2017 में प्रकाशित हुआ, जब महाराष्ट्र से इसकी दो नई प्रजातियों का वर्णन किया गया। इसके बाद भारत में मकड़ियों की विविधता में लैंगलुरिलस वंश की नई प्रजातियाँ लगातार जुड़ती रहीं । वर्ष 2026 तक देश से इसकी पाँच प्रजातियाँ ज्ञात हो चुकी हैं (चित्र 1), इनमें से लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस  सबसे नवीन प्रजातियों में से एक है।

भारत में लैंगलुरिलस वंश की ज्ञात प्रजातियों का वितरण

भारत में लैंगलुरिलस वंश की ज्ञात प्रजातियों का वितरण (चित्र: हेमलता कोली)

लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस: राजस्थान से एक नई प्रजाति

जून 2024 में राजस्थान के उदयपुर स्थित सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में मकड़ियों के सर्वे के दौरान एक छोटी जंपिंग स्पाइडर एकत्रित की गई। प्रारंभिक पहचान से यह स्पष्ट हुआ कि यह लैंगलुरिलस वंश से संबंधित है। इसकी पुष्टि के लिए नमूनों का सूक्ष्मदर्शी की सहायता से विस्तारपूर्वक परीक्षण किया गया तथा उनकी तुलना लैंगलुरिलस वंश की पहले से ज्ञात प्रजातियों से की गई। विस्तृत वर्गिकी अध्ययन के बाद इसे विज्ञान के लिए एक नई प्रजाति के रूप में मान्यता दी गई। इस नई प्रजाति का नाम लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस  रखा गया, जिसका प्रजातीय नाम ‘उदयपुरेंसिस ‘ उदयपुर शहर के सम्मान में दिया गया है। अब तक यह प्रजाति केवल उदयपुर के सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य से ही ज्ञात है।


चित्र 2. लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस: नर मकड़ी

चित्र 2: लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस: नर मकड़ी (चित्र: हेमलता कोली)


लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस  आकार में लगभग 4–5 मिमी लंबी स्पाइडर है, इसका शरीर गहरे भूरे से काले रंग का होता है, जिस पर सफेद और हल्के पीले रंग के महीन रोएँ (setae) दिखाई देते हैं। यही रोएँ इसे एक विशिष्ट रूप प्रदान करते हैं (चित्र 2 एवं 3)। इस प्रजाति की पहचान का सबसे महत्त्वपूर्ण आधार नर मकड़ी के पैप्ल (palp) हैं। ये मुख के पास स्थित एक जोड़ी छोटे उपांग (appendages) होते हैं। नर मकड़ियों में यही उपांग प्रजनन के दौरान उपयोग होने वाले विशेष अंग के रूप में विकसित हो जाते हैं। प्रत्येक प्रजाति में इनकी संरचना अलग होती है, इसलिए वर्गिकी विशेषज्ञ नई मकड़ी प्रजातियों की पहचान और उनके वर्गीकरण के लिए मुख्य रूप से पैप्ल की बनावट का अध्ययन करते हैं।

लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस (नर) के संरचनात्मक दृश्य

चित्र 3. लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस (नर) के संरचनात्मक दृश्य: (A) अग्र (Frontal) दृश्य, (B) डॉर्सल (Dorsal) दृश्य तथा (C) पार्श्व (Lateral) दृश्य


लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस के पैप्ल अंगों में रेट्रोलेटरल टिबियल एपोफिसिस (RTA), एम्बोलस (Embolus) और टेगुलम (Tegulum) जैसी संरचनाएँ अन्य निकट संबंधी प्रजातियों से भिन्न हैं(चित्र 4)। इनमें RTA, पैप्ल अंगों के टिबिया भाग पर स्थित एक छोटा काँटे या उभार जैसा प्रक्षेप (projection) होता है। एम्बोलस एक पतली, सुईनुमा नली होती है, जिसके माध्यम से प्रजनन के दौरान शुक्राणु मादा तक पहुँचाए जाते हैं, जबकि टेगुलम पैप्ल अंगों का गोलाकार मुख्य भाग होता है, जिसमें शुक्राणु संग्रहित रहते हैं। इन संरचनाओं के आकार और बनावट में पाए जाने वाले सूक्ष्म अंतर ही इस प्रजाति को लैंगलुरिलस वंश की अन्य ज्ञात प्रजातियों से अलग पहचान देते हैं। अब तक इस प्रजाति का केवल नर ही ज्ञात है। मादा का वैज्ञानिक विवरण अभी उपलब्ध नहीं है, इसलिए भविष्य में इसके जीवन-इतिहास, वितरण तथा संरचनात्मक विशेषताओं को बेहतर ढंग से समझने के लिए और अध्ययन की आवश्यकता है।

लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस (नर) के पैप्ल के फोटोग्राफ एवं रेखाचित्र

चित्र 4. लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस (नर) के पैप्ल के फोटोग्राफ एवं रेखाचित्र। (A, C) वेंट्रल दृश्य तथा (B, D) रेट्रोलैटरल दृश्य


प्राकृतिक आवास एवं व्यवहार

अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस केवल राजस्थान के उदयपुर स्थित सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य से ही ज्ञात है। यह प्रजाति अभयारण्य के चट्टानी क्षेत्रों में पाई गई, जहाँ सूखी घास, पत्ती कूड़ा  तथा विरल वनस्पति मौजूद थी (चित्र 5)। इस प्रकार का आवास छोटे भूमि-निवासी (ground-dwelling) जंपिंग स्पाइडर के लिए अनुकूल माना जाता है। क्षेत्रीय सर्वेक्षण के दौरान यह मकड़ी दिन के समय चट्टानों पर सक्रिय अवस्था में देखी गई। इसके आधार पर इसे एक दिवाचर (Diurnal) प्रजाति माना जाता है, अर्थात यह मुख्य रूप से दिन के समय सक्रिय रहती है। यह व्यवहार अधिकांश जंपिंग स्पाइडर की विशेषता है, क्योंकि वे शिकार खोजने और पहचानने के लिए अपनी उत्कृष्ट दृष्टि पर निर्भर रहती हैं। सज्जनगढ़ के इसी चट्टानी आवास में लैंगोना प्रजाति, ओरिएंटैटस ऑरेंटियस, स्टेनेलुरिलस अरम्बागेंसिस तथा स्टेनेलुरिलस व्याघ्री  जैसी अन्य जंपिंग स्पाइडर भी दर्ज की गईं। यह दर्शाता है कि अभयारण्य का चट्टानी परिदृश्य विभिन्न जंपिंग स्पाइडर के लिए अनुकूल आवास उपलब्ध कराता है। हालाँकि, वर्तमान में लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस के भोजन, प्रजनन, जीवन-चक्र तथा मौसमी गतिविधियों के बारे में वैज्ञानिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। इन पहलुओं को समझने के लिए भविष्य में विस्तृत पारिस्थितिक अध्ययनों की आवश्यकता है।


लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस का प्राकृतिक आवास

चित्र 5. लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस का प्राकृतिक आवास। सज्जनगढ़ वन्यजीव अभयारण्य का चट्टानी परिदृश्य, जहाँ सूखी घास, पत्ती कूड़ा (leaf litter) तथा चट्टानों के बीच स्थित सूक्ष्म आवास (लाल बॉक्स) में यह प्रजाति पाई गई।


किसी नई प्रजाति का वैज्ञानिक विवरण केवल उसे एक नया नाम देने तक सीमित नहीं होता, बल्कि वह किसी क्षेत्र की जैव विविधता की समझ को और अधिक समृद्ध बनाता है। लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस  का वर्णन भी इसी दृष्टि से विशेष महत्व रखता है, क्योंकि यह राजस्थान से लैंगलुरिलस वंश का पहला वैज्ञानिक अभिलेख है। यह खोज यह भी बताती है कि अरावली क्षेत्र की सूक्ष्म जैव विविधता का अभी पूरी तरह दस्तावेजीकरण नहीं हो पाया है। संभव है कि यहाँ अब भी अनेक छोटे और कम अध्ययनित जीव मौजूद हों, जिनका वैज्ञानिक अभिलेखन होना शेष है। ऐसे में नियमित सर्वेक्षण और वर्गिकी अध्ययन इस क्षेत्र की वास्तविक जैव विविधता को सामने लाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। नई प्रजातियों का वैज्ञानिक विवरण भविष्य में वर्गिकी (Taxonomy), पारिस्थितिकी (Ecology), विकास (Evolution) और संरक्षण (Conservation) से जुड़े अध्ययनों के लिए आधार तैयार करता है। किसी भी प्रजाति के संरक्षण की दिशा में पहला कदम उसका सही वैज्ञानिक अभिलेखन और पहचान है। इसलिए लैंगलुरिलस उदयपुरेंसिस  जैसी खोजें केवल एक नई प्रजाति तक सीमित नहीं रहतीं, बल्कि वे किसी क्षेत्र की जैव विविधता को समझने और उसके संरक्षण की दिशा में भी महत्त्वपूर्ण योगदान देती हैं।


संदर्भ: Sanap, R. V., Tripathi, R., Caleb, J. T. D., Koli, H., Koli, V. K., Intodia, A., & Thackeray, T. (2026). Further notes on Indian Langelurillus Próchniewicz, 1994 (Araneae: Salticidae), with the description of two new species. Zootaxa, 5792(1), 183–199. https://doi.org/10.11646/zootaxa.5792.1.11

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2 comments

  1. Ankita sen

    Great job

    1. Hemlata Koli

      thank you Ankita

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