भारत के जंगलों में, जहाँ बाघ की दहाड़ के बीच हज़ारों परिवारों का शोर भी सुनाई देता है, वहाँ उनके खेत, उनके पशु, उनके देवता और उनके पुरखों के स्मारक स्थल — सब उसी जंगल से जुड़े हैं। लेकिन जब भारत ने अपने बाघों को बचाने का फ़ैसला किया, तो सबसे पहला सवाल यही उठा: क्या बाघ और इंसान एक ही ज़मीन पर रह सकते हैं? यद्यपि, इस यक्ष प्रश्न के उत्तर पर आज भी मतभेद बना हुआ है।
इस सवाल को समझने के लिए पहले ‘विस्थापन’ को समझना ज़रूरी है। ‘विस्थापन‘ यानी किसी गाँव या बस्ती को उसकी पुरानी जगह से हटाकर कहीं और बसाना — जो इस देश में बाँध, सड़क और विकास की अन्य गतिविधियों के लिए होता ही रहता है। टाइगर रिज़र्व के संदर्भ में विस्थापन के लिए ग्रामीणों की सहमति सर्वोपरि होती है, और इसीलिए इसे ‘स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन’ कहा जाता है। वन विभाग का तर्क है कि जब गाँव बाघ के ‘क्रिटिकल हैबिटेट’ — यानी उसके मुख्य इलाक़े — में बसे हों, तो न तो बाघ सुरक्षित रह पाता है और न ही ग्रामीण।
एक ओर, जंगल के अंदर रहने वाले लोग लकड़ी, चारा, पानी और ज़मीन के लिए उसी वन पर निर्भर होते हैं। उनके मवेशी बाघ के प्राकृतिक शिकार को प्रभावित करते हैं, और कभी-कभी बाघ खुद उनके पशुओं को उठा ले जाता है — इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। दूसरी ओर, वन्यजीव विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर बाघ को एक बड़ा और सुरक्षित क्षेत्र मिले, तो उसकी संख्या सुरक्षित रह सकती है।
इसलिए यह बहस सिर्फ़ पर्यावरण की नहीं, बल्कि न्याय, संस्कृति, पहचान और आजीविका की भी है। इस लेख में हम इसी जटिल सवाल के विभिन्न पहलुओं को राजस्थान के संदर्भ में समझेंगे — 1976 के रणथम्भौर से लेकर आज के धौलपुर-करौली तक, और पशु चराने वाले परिवारों से लेकर नेचर गाइड बन चुके युवाओं तक के सफ़र की चर्चा करेंगे।
जंगल बचाने की नींव
ब्रिटिश राज के दौर में, सिर पर सफारी टोपी (pith helmet) लगाए, हाथ में राइफ़ल थामे और अभी-अभी मारे गए बाघ पर पैर टिकाए खड़े ‘साहब-शिकारी’ की तस्वीर बेहद आम थी। आज़ादी के बाद भी यह सिलसिला रुका नहीं। किसी को ठीक-ठीक यह तक नहीं पता था कि भारत के जंगलों में कितने बाघ बचे हैं, और उन्हें अंधाधुंध मारा जा रहा था।
बीसवीं सदी के आरंभ में, अनुमान के अनुसार, भारत में बाघों की संख्या लगभग 40,000 थी। लेकिन शिकार, जंगलों की कटाई और खेती के विस्तार ने इस संख्या को बुरी तरह घटा दिया। गिरावट इतनी तेज़ थी कि 1972 में हुए देश के पहले बाघ सर्वेक्षण में मोटे तौर पर यह अनुमान लगाया गया कि भारत में बाघों की संख्या घटकर महज़ 1,827 रह गई थी।[2]
बाघ की यह दुर्दशा अकेले भारत की चिंता नहीं रह गई थी। 1969 में अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने अपनी आम सभा दिल्ली में आयोजित की। राजस्थान के वनाधिकारी कैलाश संखला ने इसी सभा में अपना पर्चा ‘द वैनिशिंग टाइगर’ प्रस्तुत किया, और सभा ने एक प्रस्ताव (GA 1969 RES 015) पारित कर बाघ के शिकार पर रोक (मोरेटोरियम) तथा प्रजाति की रक्षा के लिए तत्काल क़दमों की माँग की। इसी अपील के बाद भारतीय वन्यजीव बोर्ड ने राज्यों से पाँच साल के लिए बाघ के शिकार पर प्रतिबंध लगाने को कहा, और 1970 तक देश में बाघ के शिकार पर पूरी रोक लग गई।[1]
लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय इतने भर से आश्वस्त नहीं हुआ। 1972 में वर्ल्ड वाइड फंड फ़ॉर नेचर (WWF) के प्रभावशाली ट्रस्टी गाय माउंटफ़र्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से मुलाक़ात कर उनसे इस प्रजाति को विलुप्ति से बचाने का आग्रह किया। पर्यावरण और संरक्षण के प्रति गहरी रुचि रखने वाली प्रधानमंत्री ने स्थिति का अध्ययन करने और आगे की योजना बनाने के लिए विशेषज्ञों का एक दल गठित किया। डॉ. करण सिंह की अध्यक्षता वाले इस दल ने अगस्त 1972 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, और इसी से भारत के बाघ-संरक्षण कार्यक्रम का खाका तैयार हुआ — वही कार्यक्रम जो आगे चलकर ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ कहलाया। इसी दौर में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 भी पारित हुआ। जाने-माने संरक्षणवादी एच. एस. पंवर ने इन वर्षों को देश में संरक्षण के प्रति नज़रिये में आए एक ‘आमूल बदलाव’ के रूप में याद किया है।[1][2]
इन्हीं प्रयासों की परिणति 1 अप्रैल 1973 को हुई, जब इंदिरा गाँधी ने ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की औपचारिक शुरुआत की। शुरुआत में यह कार्यक्रम छह वर्षों के लिए — अप्रैल 1973 से मार्च 1979 तक — सोचा गया था। इसका घोषित उद्देश्य था: भारत में बाघों की एक व्यवहार्य आबादी बनाए रखना, और इन क्षेत्रों को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में सदा के लिए सुरक्षित रखना, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इनसे लाभ, शिक्षा और आनंद पा सकें। टास्क फ़ोर्स ने अलग-अलग पारिस्थितिकी-तंत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले चुनिंदा अभयारण्यों से शुरुआत करने का सुझाव दिया था, और लॉन्च के समय देश के नौ जंगलों को इसमें शामिल किया गया। रणथम्भौर इन्हीं नौ अभयारण्यों में से एक था।[2]
इसी के साथ वह प्रक्रिया शुरू हुई जो आज भी जारी है — जंगल को बाघों के अनुकूल और अधिक सुरक्षित बनाने की प्रक्रिया, जिसका सबसे दुष्कर और महत्त्वपूर्ण कार्य है: जंगल के अंदर बसे गाँवों का विस्थापन।
विस्थापन का ढाँचा
टाइगर रिज़र्व से गाँवों का विस्थापन एक ऐसी प्रक्रिया है जो दशकों में बनी कई नीतियों और क़ानूनों से नियंत्रित होती है। इन्हें समझे बिना यह विषय अधूरा रहेगा।
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और प्रोजेक्ट टाइगर
1972 के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम ने बाघ के शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया और राष्ट्रीय उद्यानों व अभयारण्यों को क़ानूनी दर्जा दिया। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के साथ यह वैज्ञानिक सोच और स्पष्ट हो गई कि बाघ को प्रजनन और अस्तित्व के लिए विशाल और अबाधित आवास चाहिए, जिस पर उसका अपना एकाधिकार हो। इसलिए तय हुआ कि उसके ‘कोर एरिया’ को मानव गतिविधियों से पूरी तरह मुक्त — यानी ‘अक्षुण्ण’ (inviolate) — रखना होगा। तर्क यह था कि मवेशियों की चराई, जलावन-लकड़ी की कटाई और खेती जंगल को खंडित करती है और हिरन जैसे प्राकृतिक शिकार-आधार को घटाती है।
लेकिन एक अहम बात यह है कि 1972 के अधिनियम में विस्थापन के लिए कोई अलग, अधिकार-आधारित नीति नहीं थी। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की आकस्मिक शुरुआत के बाद गाँवों को मुख्यतः इसी अधिनियम की सामान्य शक्तियों और कार्यकारी आदेशों के सहारे हटाया गया। जब किसी इलाक़े को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने की मंशा अधिसूचित होती, तो ज़िला कलेक्टर पर ‘अधिकारों के निपटान’ (Settlement of Rights) की ज़िम्मेदारी आ जाती — यानी उस सीमा के भीतर मौजूद मानव अधिकारों का अधिग्रहण, समाप्ति या स्थानांतरण। चूँकि ये इलाक़े नए टाइगर रिज़र्व के कोर के रूप में सख़्त राष्ट्रीय उद्यानों में बदले जा रहे थे, व्यवहार में यह ‘निपटान’ गाँवों को खाली कराने का रूप ले लेता था।[16]
उस दौर की सोच को ‘फ़ोर्ट्रेस कंज़र्वेशन’ (क़िलेबंद संरक्षण) कहा जाता है — यह मान्यता कि प्रकृति की सबसे अच्छी रक्षा उसे इंसानों से पूरी तरह अलग रखकर ही होती है। चूँकि उस समय न तो निर्वाचित ग्राम सभाएँ थीं और न ही वन अधिकार अधिनियम जैसा कोई क़ानून, इसलिए विस्थापन वन विभाग के ऊपर से थोपे गए आदेशों के ज़रिए होता था। उदाहरण के लिए, रणथम्भौर में 1973 से 1979 के बीच 12 गाँवों के 800 परिवारों को बाहर बसाया गया, ताकि अवैध शिकार पर रोक लगे और उजड़ा आवास फिर से पनप सके।
इन शुरुआती विस्थापनों में आज जैसे तय मुआवज़े, क़ानूनी सुरक्षा-कवच या पुनर्वास के दिशा-निर्देश मौजूद नहीं थे, इसलिए ये अक्सर वनवासी समुदायों के लिए बेहद कष्टकारी साबित हुए। इन्हीं कठोर और ग़ैर-मानकीकृत विस्थापनों के अनुभव ने आगे चलकर 2006 में अधिनियम के संशोधन की ज़मीन तैयार की।
2006 के संशोधन में ‘क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट’ (CTH) की अवधारणा लाई गई — यानी ऐसे कोर क्षेत्र जिन्हें बाघ के लिए अक्षुण्ण रखना ज़रूरी है। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि CTH से कोई भी विस्थापन स्वैच्छिक हो, उचित मुआवज़े सहित हो और स्थानीय समुदायों की सहमति से ही हो। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) इस पूरी प्रक्रिया की देखरेख करता है।
वन अधिकार अधिनियम, 2006
2006 में वन अधिकार अधिनियम (FRA) के आने के बाद विस्थापन की प्रक्रिया और जटिल हो गई। इस क़ानून ने अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को अपनी ज़मीन पर क़ानूनी अधिकार दिए। FRA के तहत यह तय हुआ कि जब तक सामुदायिक और व्यक्तिगत वन अधिकारों की मान्यता नहीं हो जाती, तब तक विस्थापन ग़ैर-क़ानूनी है। हालाँकि ज़मीन पर यह नियम अक्सर टूटता भी रहा — कई जगह FRA की प्रक्रिया पूरी किए बिना ही परिवारों को विस्थापित कर दिया गया। वर्ष 2025 में केंद्रीय जनजातीय मंत्रालय ने एक नया नीति-ढाँचा जारी किया, जिसमें कहा गया कि विस्थापन ‘अपवादस्वरूप, स्वैच्छिक और प्रमाण-आधारित’ होना चाहिए।
NTCA के 2008 के दिशा-निर्देश
फ़रवरी 2008 में NTCA ने स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन के विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए। इनमें परिवारों को दो विकल्प दिए गए। पहला — नक़दी पैकेज: प्रति परिवार 10 लाख रुपये (जो बाद में बढ़ाकर 15 लाख कर दिए गए), जिसके तहत परिवार ख़ुद ज़मीन और मकान की व्यवस्था करता है। दूसरा — ज़मीन पैकेज: मूल ज़मीन के बराबर नई ज़मीन, मकान के लिए 1.5 लाख रुपये और सामुदायिक सुविधाएँ। सबसे अहम बात यह थी कि यह पूरी प्रक्रिया ‘स्वैच्छिक’ थी — परिवार और ग्राम सभा की सहमति के बिना कोई विस्थापन नहीं।
राजस्थान सरकार की नीतियाँ: 2002, 2022, 2025
जैसा ऊपर ज़िक्र हुआ, रणथम्भौर में विस्थापन 1970 के दशक में ही शुरू हो चुका था; लेकिन राजस्थान में इसकी पहली औपचारिक नीति 2 नवंबर 2002 को जारी हुई। इसी के तहत रणथम्भौर के पादरा गाँव के 111 परिवारों को खण्डार के पास गणेशनगर गाँव में बसाया गया — यह 2002 की नीति के बाद की पहली बड़ी विस्थापन कार्रवाई थी।
हालाँकि गणेशनगर गाँव को बसाने को वन भूमि की बड़ी हानि के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि यह स्थान बाघों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि लोगों को जंगल के एक किनारे से निकालकर दूसरे किनारे पर ही बसा दिया गया — जबकि उस दौर में सरकारों के पास मुआवज़ा देने के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध थी।
7 सितंबर 2022 को इस पैकेज में बड़ा संशोधन हुआ, और फिर 24 जुलाई 2025 को एक नया आदेश जारी किया गया। नए आदेश में ज़मीन पैकेज के अंतर्गत मूल ज़मीन के साथ 1 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि (जिसमें कम से कम 0.8 हेक्टेयर सिंचित या 1.6 हेक्टेयर असिंचित), भूमिहीनों को भी न्यूनतम ज़मीन, और रहने के लिए कम से कम 5,400 वर्ग फ़ुट का आवासीय प्लॉट देने का प्रावधान किया गया। नक़दी पैकेज में NTCA के नियमानुसार प्रति परिवार 15 लाख रुपये की व्यवस्था रखी गई। दोनों में से कोई एक विकल्प परिवार चुन सकता है। यह राशि CAMPA और वन्यजीव फंड से दी जाती है, जिससे राज्य सरकार पर अलग से वित्तीय बोझ नहीं पड़ता।
1976 की कहानी
क़ानून और नीतियों का यह ढाँचा जिन असली घटनाओं पर खड़ा है, उनमें सबसे पहली और सबसे चर्चित कहानी रणथम्भौर की है। राजस्थान का रणथम्भौर — जहाँ आज दुनिया भर के पर्यटक बाघ देखने आते हैं — कभी एक ऐसा जंगल था जिसमें गाँव और जंगल एक-दूसरे में गुँथे हुए थे। 1973 में जब इसे टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया, तब 392 वर्ग किलोमीटर के इस वन क्षेत्र में कुल 16 गाँव थे। इनमें से 12 गाँव जंगल के एकदम भीतरी हिस्से में गहरे बसे हुए थे और शेष 4 बाहरी परिधि में। ये सभी गाँव 16 अलग-अलग पॉकेट्स में बिखरे हुए थे, जिससे वन्यजीवों के लिए कोई एकसूत्र, निर्बाध आश्रय-स्थल नहीं बचा था। बड़े भूखंडों पर खेती होती थी और अत्यधिक चराई से जंगल की घास तेज़ी से ख़त्म हो रही थी। वन्यजीव दिन में छिपे रहते और रात में ही निकलते।
ऐसे में तत्कालीन उप-क्षेत्र निदेशक फतेह सिंह राठौड़ को इन 12 भीतरी गाँवों के विस्थापन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना जो उस ज़माने में भी असामान्य था और आज भी एक मिसाल बना हुआ है — दबाव नहीं, भरोसा। वे गाँव-गाँव जाते, लोगों के बीच बैठते और उनकी ज़रूरतें सुनते।
“जंगल और उसके सभी प्राणी ईश्वर की रचना हैं। क्या देवी दुर्गा — जो राक्षसों का नाश करती हैं — स्वयं बाघ पर सवार नहीं होतीं? इस दिव्य सृष्टि को बिगाड़ने का हक़ किसी इंसान को नहीं है। जंगल को उसके वास्तविक स्वरूप में लौटाना होगा।” — फतेह सिंह राठौड़, ग्राम चौपालों पर (Ward, Geoffrey C., and Diane Raines Ward, Tiger-Wallahs, New York: HarperCollins, 1993)
1975 में ज़िला स्तर पर ‘प्रोजेक्ट टाइगर विलेज रिलोकेशन कमेटी’ बनाई गई, जिसमें ज़िला प्रमुख, फ़ील्ड डायरेक्टर और ज़िला कलेक्टर शामिल थे। समिति की 27 दिसंबर 1975 की बैठक में तय हुआ कि विस्थापन दो चरणों में होगा — पहले 6 गाँव डुमोदा के पास कैलाशपुरी में, और फिर 6 गाँव छान-फरिया के पास गोपालपुरा में। सरकार की ओर से वन भूमि को राजस्व विभाग को हस्तांतरित करने की स्वीकृति मिलते ही काम शुरू हो गया।
12 गाँव, 200 परिवार, एक नया जीवन
सन् 1976 में यह ऐतिहासिक काम मूर्त रूप लेने लगा। पहली सफलता अणतपुरा गाँव से आई — जगन गुर्जर नाम के एक स्थानीय युवक ने पहल की, लोगों को समझाया, और गाँव राज़ी हो गया। छितर गुर्जर ने भी इसमें सहयोग दिया। एक बार शुरुआत होने के बाद बाक़ी गाँव भी एक के बाद एक हटने लगे। सुबह-सुबह ट्रकों की क़तार आती; लोग आँखों में आँसू और सपने लिए अपना सामान लादते, और एक गहरी ख़ामोशी में अपने पुराने घर, गली और गाँव को अलविदा कहते। पेड़ों से लिपटकर रोते लोग फतेह सिंह को भी भावुक कर देते थे। उन्हीं के शब्दों में —
“यह मेरा सबसे कठिन काम था। लोग पेड़ों से लिपटकर रोए। उन्हें लगता था कि उनका भविष्य बिल्कुल अँधेरे में है। सभी बुज़ुर्गों ने कहा, ‘हमने यहीं पूरी ज़िंदगी गुज़ारी है, हमें यहीं मरने दो।’ मैं भी उनके साथ रो रहा था — क्योंकि मेरे भीतर कहीं यह एहसास था कि वे उस चीज़ की क़ीमत चुका रहे हैं जिसे शायद वे कभी समझ न पाएँ।” — फतेह सिंह राठौड़ (Sanctuary Asia, Vol. XXVIII, No. 3, जून 2008; जेनिफ़र स्कारलॉट के साथ साक्षात्कार)
एक साल के भीतर सभी 12 गाँव — अणतपुरा, बेरदा, हनुत्या, लकड़दा, फुलेड़ी, छिंदावली, चिरोली, प्रेमपुर, लाहपुर, गुड़ा, क़िला रणथम्भौर और नागदी-रेहमानपुर — खाली हो गए। ये सभी मुख्यतः गुर्जर समुदाय के गाँव थे। कुल 200 परिवार और लगभग 800 लोग अपनी पुरानी ज़मीन छोड़कर नई जगह बसे। उनके साथ लगभग 2,500 मवेशी (भैंस, गाय, बैल, ऊँट, बकरी और खच्चर) भी नए ठिकाने पर आए। सात गाँव — अणतपुरा, बेरदा, हनुत्या, लकड़दा, फुलेड़ी, छिंदावली और चिरोली — कैलाशपुरी (डुमोदा) में बसाए गए, और पाँच गाँव — प्रेमपुर, लाहपुर, गुड़ा, क़िला रणथम्भौर और नागदी-रेहमानपुर — गोपालपुरा (छान) में।
ज़मीन, मुआवज़ा और सुविधाएँ
इस विस्थापन में एक ऐसा पैकेज तैयार किया गया जो उस दौर में अभूतपूर्व था। प्रत्येक परिवार को उसकी मूल ज़मीन के बराबर नई ज़मीन दी गई, और साथ में 5 बीघा अतिरिक्त भूमि का बोनस भी — हर भूमिधारक तथा परिवार के मुखिया को। यहाँ तक कि जो परिवार पहले भूमिहीन थे, उन्हें भी 5 बीघा ज़मीन दी गई। कुल 2,681 बीघा 9 बिस्वा (लगभग 687.5 हेक्टेयर) भूमि वन विभाग से राजस्व विभाग को पुनर्वास हेतु हस्तांतरित की गई — कैलाशपुरी में 1,587 बीघा 9 बिस्वा (लगभग 407 हेक्टेयर) और गोपालपुरा में 1,094 बीघा (लगभग 280.5 हेक्टेयर)।
अचल संपत्ति के लिए नक़दी मुआवज़ा भी दिया गया; 12 गाँवों को कुल ₹4,52,829 का नक़द मुआवज़ा मिला। विस्थापन की सम्पूर्ण लागत ₹5,49,914 रही — जो आज के मूल्यों में लगभग ₹3.5 से 4 करोड़ के बराबर है। इसके अलावा जो सुविधाएँ प्रदान की गईं, वे जंगल में कभी नसीब नहीं हुई थीं: सभी चल संपत्ति को नए स्थान तक पहुँचाने के लिए वाहन, नगर नियोजक (टाउन प्लानर) द्वारा तैयार कैलाशपुरी का मास्टर प्लान, धार्मिक भावनाओं की रक्षा के लिए मंदिर का निर्माण, एक माध्यमिक स्कूल, सामुदायिक कुएँ और डीज़ल पम्प की व्यवस्था, और आस-पास के गाँवों से जोड़ने के लिए सड़कें।
जंगल का पुनर्जन्म
फतेह सिंह की मेहनत का नतीजा देखने में देर नहीं लगी। 1976 में ही उन्होंने रणथम्भौर में पहली बाघिन देखी, जिसे उन्होंने प्यार से ‘पद्मिनी’ नाम दिया। जो खेत कभी मानवीय गतिविधियों से भरे रहते थे, वहाँ घास के मैदान लहलहा उठे। सांभर और चीतल चरने लगे, और बाघ दिन में भी खुलकर विचरने लगा। 1973 में यहाँ बाघों की संख्या महज़ 17–18 थी; आज 70 से अधिक बाघ यहाँ हैं। रणथम्भौर आज दुनिया में बाघ देखने की सबसे बेहतरीन जगहों में से एक है।
राजस्थान के अन्य टाइगर रिज़र्व: वर्तमान परिदृश्य
रणथम्भौर की कहानी आधी सदी पुरानी है — और एक सफलता की कहानी भी। लेकिन विस्थापन का वही सवाल राजस्थान के बाक़ी टाइगर रिज़र्व में आज भी अनसुलझा है: कहीं अधूरा, कहीं विवादित, तो कहीं बिलकुल नई राह पर।
सरिस्का — बाघ भी गए, गाँव भी रहे
अलवर ज़िले में 1978 में घोषित सरिस्का टाइगर रिज़र्व लापरवाही का एक महँगा सबक है। 2004 में जब एक सर्वेक्षण में यहाँ से बाघों के पूरी तरह ग़ायब हो जाने की बात सामने आई, तो पूरे देश में हलचल मच गई; इसका मुख्य कारण स्थानीय शिकारी गिरोहों द्वारा किया गया अवैध शिकार और जंगल पर लगातार बना मानव दबाव माना गया। इसके बाद ही केंद्र ने ‘टाइगर टास्क फ़ोर्स’ गठित की और 28 दिसंबर 2007 को सरिस्का के ‘क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट’ (CTH) को अधिसूचित किया गया।[6][5]
28 जून 2008 को रणथम्भौर से एक बाघ को हेलिकॉप्टर से लाकर सरिस्का में छोड़ा गया — यह देश का पहला ‘एरियल’ बाघ-स्थानांतरण था। इसके बाद और बाघ लाए गए, और आज यहाँ इनकी संख्या लगभग 48 है।[7][8]
सरिस्का के CTH में 29 गाँव हैं। 2007–08 की NTCA पुनर्स्थापन योजना के तहत भगानी गाँव के 21 परिवार सबसे पहले स्वेच्छा से हटे। मार्च 2024 तक 5 गाँव — भगानी, उमरी, रोटक्याला, पनीधाल और डाबली — पूरी तरह विस्थापित हो चुके थे (कुल 322 परिवार)। विस्थापन के लिए चिह्नित गाँवों के कुल 1,471 परिवारों में से 973 अब तक हट चुके हैं, जबकि सुकोला, क्रास्का, देवरी, कांकवाड़ी और हरिपुरा जैसे गाँवों की प्रक्रिया अभी अधूरी है।[11][8]
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। विस्थापित परिवारों की शिकायत है कि उन्हें पर्याप्त ज़मीन और रोज़गार नहीं मिला। डाबकन जैसे गाँव, जिन्हें 2017–18 में विस्थापन के लिए चुना गया था, आज भी अधर में लटके हैं — वन विभाग ने वहाँ बिजली, पानी और पक्के मकान जैसी बुनियादी सुविधाएँ रोक दीं, और लोग वर्षों से अनिश्चितता में जी रहे हैं। आदिवासी परिवारों ने FRA के तहत सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता के बिना विस्थापन का विरोध किया और अदालत का दरवाज़ा खटखटाया।
अब दबाव दोनों ओर से बढ़ रहा है। सरिस्का के 48 बाघों में 13 शावक ऐसे हैं जिन्हें आने वाले महीनों में अपना अलग इलाक़ा चाहिए; जगह न मिली तो उनके आबादी की ओर बढ़ने का ख़तरा है। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2026 तक शेष विस्थापन पूरा करने का आदेश दिया है, फिर भी बचे हुए गाँवों के लिए न ज़मीन तय हुई है और न मुआवज़ा। यही सरिस्का और रणथम्भौर के प्रबंधन का फ़र्क़ है — एक जगह प्रक्रिया ने भरोसा जीता, दूसरी जगह भरोसा टूटा।
मुकुंदरा हिल्स — गिरधरपुरा की दोहरी त्रासदी
कोटा और झालावाड़ के बीच फैला मुकुंदरा हिल्स 2013 में अधिसूचित राजस्थान का तीसरा टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH लगभग 417 वर्ग किलोमीटर है। इसके CTH में 14 गाँव हैं। मार्च 2024 तक यहाँ केवल 2 गाँव — लक्ष्मीपुरा (30 में से 29 परिवार) और खरली बावरी (24 में से 17 परिवार) — विस्थापित हो सके हैं। बड़े गाँवों की प्रक्रिया अभी आधी-अधूरी है: मशालपुरा के 301 परिवारों में से 156, और घाटी जागीर के 58 में से 21 परिवार ही अब तक हटे हैं, जबकि दामोदरपुरा के 153 परिवारों का विस्थापन शुरू ही नहीं हुआ। मशालपुरा में तो चार परिवार आज भी जाने को तैयार नहीं हैं।[11][9]
रफ़्तार इतनी धीमी रही कि आवंटित पैसा भी पूरा ख़र्च नहीं हो पाया — मुकुंदरा के पुनर्स्थापन के लिए जारी ₹39.16 लाख की राशि अनखर्च रह गई और 2020 में उसे फिर से मान्य (revalidate) कराना पड़ा। नतीजा यह कि यह रिज़र्व का एक हिस्सा आज भी बाघों से लगभग ख़ाली है — यहाँ बमुश्किल एक बाघ-बाघिन की जोड़ी, उनके शावक और दो उप-वयस्क बाघिनें हैं।[10][8]
इसी पृष्ठभूमि में गिरधरपुरा का ज़िक्र ज़रूरी है, क्योंकि यह गाँव एक दोहरी त्रासदी का प्रतीक है। 1960 के दशक में गाँधी सागर बाँध के निर्माण के समय इसे पहले ही एक बार विस्थापित किया जा चुका था; और अब, दशकों बाद, उसी नई जगह को मुकुंदरा के CTH में शामिल कर लिया गया — यानी दूसरा विस्थापन। दो बार उजड़ चुके इन परिवारों के लिए यह पहचान, विश्वास और आसरे का सवाल है। वे पूछते हैं: “अगर अगली बार फिर कोई योजना आई, तो क्या तीसरी बार हटना होगा?”
रामगढ़ विषधारी — नई शुरुआत
बूँदी ज़िले में 2022 में अधिसूचित रामगढ़ विषधारी राजस्थान का चौथा टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH लगभग 482 वर्ग किलोमीटर है। इसके CTH में 8 गाँव हैं। मार्च 2024 तक यहाँ एक भी गाँव पूरी तरह विस्थापित नहीं हुआ है; केवल गुलखेड़ी गाँव की प्रक्रिया शुरू हुई है, जहाँ 208 परिवारों में से 40 अब तक हटे हैं।[13][11]
धौलपुर-करौली — सह-अस्तित्व की नई प्रयोगशाला
धौलपुर-करौली टाइगर रिज़र्व (DKTR) राजस्थान का पाँचवाँ टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH 599.64 वर्ग किलोमीटर है और बफ़र ज़ोन लगभग 458.24 वर्ग किलोमीटर। रिज़र्व के कोर क्षेत्र में 52 गाँव और बफ़र क्षेत्र में 108 गाँव बसे हैं, फिर भी अब तक CTH से किसी भी गाँव का विस्थापन प्रस्तावित नहीं है। जहाँ रणथम्भौर और सरिस्का विस्थापन के मॉडल रहे, वहीं DKTR को एक अलग राह — बाघ और इंसान के सह-अस्तित्व — की प्रयोगशाला के रूप में देखा जा रहा है।[12]
विस्थापन के बाद जंगल की वापसी
हर पूरा हुआ विस्थापन अपने पीछे दो कहानियाँ छोड़ जाता है — एक जंगल की, और दूसरी उन परिवारों की जो वहाँ से गए। पहले जंगल की बात।
किसी गाँव के खाली होने के बाद वहाँ क्या बचता है? टूटी हुई दीवारें, पुराने कुएँ, मंदिरों के खंडहर, खेतों की मेड़ें, और कभी-कभी तुलसी का एक पौधा जो आज भी उग आता है। लेकिन इन्हीं खाली जगहों में धीरे-धीरे जंगल वापस आने लगता है। रणथम्भौर में जहाँ कभी खेत थे, वहाँ अब घास के मैदान हैं। जहाँ मवेशी चरते थे, वहाँ सांभर और चीतल हैं। जहाँ इंसानी रोशनी थी, वहाँ अब बाघ बेधड़क विचरता है। सरिस्का में भी भगानी गाँव के खाली होते ही पुरानी इमारतें तोड़ दी गईं, ताकि जंगल को जगह मिल सके। पन्ना और रणथम्भौर के अध्ययन बताते हैं कि विस्थापित गाँवों की जगहों पर पहले शाकाहारी वन्यजीव और फिर शिकारी जल्दी लौट आते हैं।
रणथम्भौर के जंगल में आज भी कुछ पुरानी दीवारें खड़ी हैं। सफ़ारी पर जाने वाले पर्यटक इन्हें देखते हैं — ये खंडहर एक पुराने जीवन की याद हैं, और इनमें उन लोगों की स्मृतियाँ बसी हैं जिन्होंने यह जंगल बाघ के लिए वापस कर दिया।
नए गाँव
दूसरी कहानी परिवारों की है। नए गाँवों में जाने के बाद शुरुआती दौर में उनकी मुश्किलें बढ़ जाती हैं। जंगल में जो मुफ़्त था — लकड़ी, पत्ते, जड़ी-बूटियाँ, चारा — वह अब बाहर ख़रीदना पड़ता है। नई ज़मीन पर शुरू-शुरू में फ़सल नहीं उगती। और पड़ोसी गाँव वाले नए आए परिवारों को कभी-कभी संदेह से देखते हैं।
फिर भी समय के साथ तस्वीर बदलती है। 1976 में विस्थापित रणथम्भौर के परिवारों के बसने के बाद सेंटर फ़ॉर एनवायरनमेंट एजुकेशन (CEE), अहमदाबाद की एक टीम ने कैलाशपुरी में सर्वेक्षण किया। उनकी रिपोर्ट में दर्ज है:[18]
“लोग अपने नए गाँव में संतुष्ट दिखे; कुछ ने कहा कि यहाँ जीवन जंगल के उन गाँवों से बेहतर है जहाँ से वे आए हैं।” — Centre for Environment Education, अहमदाबाद — कैलाशपुरी सर्वेक्षण
कैलाशपुरी और गोपालपुरा — आज की तस्वीर
आज कैलाशपुरी में 300 परिवार हैं और कुल आबादी 1,601 है। 1976 में वन विभाग द्वारा बनाया गया सामुदायिक कुआँ आज भी है — जिसे 1992–93 में वन विभाग ने और गहरा करवाकर दुरुस्त किया। स्कूल और मंदिर, दोनों वन विभाग ने बनवाए थे, जो आज भी गाँव की धड़कन हैं। गाँव का पशुधन — 452 भैंस, 170 गाय, 130 बैल, 3 ऊँट, 622 बकरियाँ और 2 खच्चर, यानी कुल 1,379 पशु — बताता है कि पशुपालन आज भी इन परिवारों की रीढ़ है।
गोपालपुरा में 70 परिवार हैं और आबादी 288। यहाँ 500 बीघा भूमि पर खेती होती है। पशुओं के पानी के लिए वन विभाग ने एक ‘खेल’ (टंका) बनवाया, जबकि मंदिर पंचायत ने बनवाया। पशुधन में 20 भैंस, 150 गाय, 100 बकरी, 40 भेड़ और 2 ऊँट हैं। गोपालपुरा के लोगों ने आस-पास की वन भूमि पर इको-डेवलपमेंट कार्य शुरू किए हैं, और दो बायो-गैस इकाइयाँ भी स्थापित की गई हैं।
रणथम्भौर के दूसरे (हाल के) दौर के विस्थापन में परिवारों को 2.5 लाख रुपये की सहायता राशि, 60×90 फ़ीट का आवासीय भूखंड और 6 बीघा 7 बिस्वा कृषि भूमि दी गई। ये नवस्थापित गाँव अभी भी बुनियादी सुविधाओं — स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल — के लिए विकास की राह पर हैं।
नई पहचान बनाते युवा
पुनर्वास की कहानी का सबसे उम्मीद भरा अध्याय वह है जो आज लिखा जा रहा है। पुनर्वासित गाँवों के युवा अब केवल मज़दूरी तक सीमित नहीं हैं। पशुपालन में भी एक बड़ा बदलाव आया है: जहाँ पहले देसी नस्लें जंगल में चरती थीं, अब परिवार उन्नत नस्ल के पशु पालने लगे हैं। डेयरी उद्योग से जुड़ाव बढ़ा है, जो नियमित आमदनी का ज़रिया बन रहा है। युवाओं ने ट्रैक्टर-चालन, छोटे व्यापार, निर्माण और परिवहन में भी पैर जमाए हैं।
2023 में रणथम्भौर के तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर पी. कथीरवेल के निर्देश पर रणथम्भौर से विस्थापित गाँवों के 52 युवाओं को, और इको-डेवलपमेंट कमेटी के माध्यम से 30 युवाओं को, नेचर गाइड के रूप में नियुक्त किया। जो जंगल कभी इनकी आजीविका का केंद्र था, अब वही जंगल इन्हें नई पहचान दे रहा है — लेकिन इस बार वन्यजीवों के दोस्त और रक्षक के रूप में।
ग़ैर-सरकारी संगठन टाइगर वॉच ने रणथम्भौर के बाहर बसे पुनर्वासित गाँवों — अनंदीपुरा और गिरिराजपुरा — में दो शिल्प-कौशल विकास केंद्र स्थापित किए हैं, जहाँ महिलाएँ और युवा हस्तशिल्प, बुनाई और पारंपरिक कलाओं का प्रशिक्षण ले रहे हैं। साथ ही अनंदीपुरा में एक डिजिटल शिक्षा केंद्र भी है, जो इन गाँवों के बच्चों को आधुनिक शिक्षा और मुख्यधारा से जोड़ रहा है। यह तस्वीर बताती है कि जब विस्थापन सम्मान के साथ होता है — और पुनर्वास के बाद सतत सहयोग भी मिले — तो यह केवल एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं, बल्कि एक नई संभावना का द्वार भी हो सकता है।
एक बड़ा सवाल
जंगल में रहने वाले लोगों के लिए यह सिर्फ़ एक जगह नहीं है — यह उनकी दुनिया है। उनके देवता वहाँ के पेड़ों में हैं, उनके पुरखों की राख उस मिट्टी में मिली है, और उनकी भाषा में उन पेड़-पौधों के नाम हैं जो किसी शब्दकोश में नहीं मिलेंगे। कई परिवारों का कहना है कि ‘स्वैच्छिक विस्थापन’ का नाम तो ज़रूर है, लेकिन ज़मीन पर दबाव बहुत होता है। जंगल के अंदर नई सड़क और इमारत बनाने की इजाज़त नहीं, खेतों में नलकूप नहीं, बच्चों के लिए स्कूल और अस्पताल नहीं — यही धीमा दबाव उन्हें हटने पर मजबूर करता है।
केंद्र सरकार के 2024 के आँकड़ों के अनुसार, 1973 से अब तक देश भर में 257 गाँवों के 25,007 परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है। लेकिन अभी भी 64,801 परिवार टाइगर रिज़र्व के कोर एरिया में रह रहे हैं, और इन सबके विस्थापन एक लंबा तथा बेहद ख़र्चीला काम है।[14]
वन्यजीव विशेषज्ञों का तर्क है कि बाघ को जीवित रहने के लिए बड़ा, निर्बाध क्षेत्र चाहिए। एक बाघ का ‘होम रेंज’ 100 से 400 वर्ग किलोमीटर तक हो सकता है। जब इस इलाक़े में गाँव, खेत और मवेशी होते हैं, तो बाघ का व्यवहार बदल जाता है — वह रात का शिकारी बन जाता है और प्रजनन कम कर देता है। रणथम्भौर का उदाहरण देखें: 1976 में जब 12 गाँव हटे, तब यहाँ बमुश्किल 17–18 बाघ थे; आज 70 से अधिक हैं। फिर भी, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि सभी गाँवों को हटाना ‘न व्यावहारिक है और न वास्तविक’ — इसके बजाय उन गाँवों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो बाघ के मुख्य ‘कॉरिडोर’ में हैं।[14]
क्या विस्थापन ही एकमात्र विकल्प है?
CTH (कोर एरिया) से विस्थापन वैज्ञानिक और क़ानूनी, दोनों दृष्टि से ज़रूरी है। लेकिन बफ़र ज़ोन की बात अलग है। वहाँ सह-अस्तित्व — बाघ और इंसान का साथ-साथ जीना — संभव भी है और व्यावहारिक भी। नेपाल, केन्या और ज़ांबिया जैसे देशों में ‘कम्यूनिटी-बेस्ड कंज़र्वेशन’ सफलतापूर्वक चल रहा है, और भारत में भी बफ़र ज़ोन में ऐसे प्रयोग हुए हैं। रणथम्भौर के बफ़र में नेचर गाइड, EDC कार्यक्रम और टाइगर वॉच के कौशल केंद्र — ये सब इसी सोच की देन हैं: स्थानीय लोग संरक्षण के दुश्मन नहीं, बल्कि उसके सबसे बड़े भागीदार बन सकते हैं।
असली बात यह है: जब विस्थापन सही तरीक़े से होता है — सही मुआवज़ा, सही सुविधाएँ और लोगों की सच्ची इच्छा से — तो जंगल भी बचता है और लोग भी ख़ुश रहते हैं। और जब यह ज़बरदस्ती होता है या वादे टूट जाते हैं, तो लोग नाराज़ होते हैं, बाघों पर दोष मढ़ा जाता है और संरक्षण की भावना ही ख़त्म हो जाती है। इसलिए दोनों विकल्प — CTH से विस्थापन और बफ़र में सह-अस्तित्व — एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।
राजस्थान में विस्थापन की स्थिति (मार्च 2024)
(नीचे दी गई जानकारी राजस्थान वन विभाग के अभिलेखों पर आधारित है।)
राजस्थान के टाइगर रिज़र्व — क्षेत्रफल (वर्ग किलोमीटर)
| टाइगर रिज़र्व | CTH | बफ़र | कुल |
|---|---|---|---|
| रणथम्भौर | 1,113.36 | 297.92 | 1,411.28 |
| सरिस्का | 881.11 | 332.23 | 1,213.34 |
| मुकुंदरा हिल्स | 417.17 | 342.82 | 759.99 |
| रामगढ़ विषधारी | 481.91 | 1,019.98 | 1,501.89 |
| धौलपुर-करौली | 599.64 | 458.24 | 1,057.88 |
| कुल | 3,493.19 | 2,451.19 | 5,944.38 |
स्वैच्छिक ग्राम विस्थापन की प्रगति
| टाइगर रिज़र्व | CTH में गाँव | पूर्णतः विस्थापित | प्रक्रिया में |
|---|---|---|---|
| रणथम्भौर | 65 | 8 | 9 |
| सरिस्का | 29 | 5 | 6 |
| मुकुंदरा हिल्स | 14 | 2 | 2 |
| रामगढ़ विषधारी | 8 | 0 | 1 |
| धौलपुर-करौली | 52* | — | — |
| कुल | 168 | 15 | 18 |
* राजस्थान के अन्य चार रिज़र्व के आँकड़े ‘विस्थापन हेतु चिह्नित’ गाँवों के हैं (कुल 116)। धौलपुर-करौली के 52 गाँव कोर/CTH में मौजूद हैं (बफ़र में 108), पर अभी इनमें से किसी का विस्थापन प्रस्तावित नहीं है।
रणथम्भौर — परिवारवार विवरण (मार्च 2024)
| गाँव | कुल परिवार | विस्थापित |
|---|---|---|
| इन्दाला | 33 | 33 |
| पादरा | 111 | 111 |
| मछनकी | 59 | 59 |
| मोरडुंगरी | 157 | 154 |
| भीड़ | 164 | 139 |
| गाड़ीतालाड़ा | 49 | 49 |
| काथुली | 151 | 141 |
| काला खोहेरा | 46 | 46 |
| कलीभट | 47 | 43 |
| हिंदवार | 575 | 373 |
| मुंदरहेड़ी | 161 | 72 |
| बेराई भीमपुरा | 102 | 91 |
| डांगरा | 83 | 49 |
| उँची ग्वाड़ी | 143 | 116 |
| चोड़क्या कलाँ | 115 | 73 |
| चोड़क्या खुर्द | 18 | 5 |
| मरमड़ा | 245 | 220 |
| कुल | 2,259 | 1,774 |
बाघ भारत की धरोहर है — इसे बचाना हम सबकी ज़िम्मेदारी है। लेकिन यह ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन लोगों पर नहीं थोपी जा सकती जो सदियों से जंगल के साथ जी रहे हैं और जिनका इस संकट में कोई हाथ नहीं था। रणथम्भौर का उदाहरण बताता है कि जब विस्थापन सम्मान के साथ होता है, तो यह दोनों तरफ़ फ़ायदेमंद हो सकता है। 1976 में जिन 200 परिवारों ने अपनी जड़ें छोड़ीं, उनके वंशज आज नेचर गाइड हैं, शिल्पकार हैं, डेयरी किसान हैं, डिजिटल रूप से जुड़े नागरिक हैं — और रणथम्भौर में 70 से अधिक बाघ हैं।
राजस्थान में अभी भी सैकड़ों गाँव टाइगर रिज़र्व के कोर में हैं; 15 पूरी तरह विस्थापित हो चुके हैं और 18 प्रक्रिया में हैं। यह काम लंबा, महँगा और नाज़ुक है। लेकिन अगर CTH में विस्थापन और बफ़र में सह-अस्तित्व — दोनों विकल्पों को एक साथ, समझदारी से चलाया जाए — तो न सिर्फ़ बाघ बचेंगे, बल्कि जो परिवार जाएँगे, वे भी एक बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर जाएँगे।
“जंगल बचाने के लिए पहले लोगों का दिल जीतना होता है।” — फतेह सिंह राठौड़
यही सबसे बड़ा सबक है — जो 1976 में भी सच था, और आज भी उतना ही ज़रूरी है।
संदर्भ:
[1] IUCN (2023), “A catalyst for change” — Project Tiger and IUCN Resolution GA 1969 RES 015. iucn.org/story/202311/catalyst-change
[2] “Project Tiger,” Wikipedia. en.wikipedia.org/wiki/Project_Tiger
[3] Ward, Geoffrey C., and Diane Raines Ward. Tiger-Wallahs: Encounters with the Men Who Tried to Save the Greatest of the Great Cats. New York: HarperCollins, 1993.
[4] Sanctuary Asia, Vol. XXVIII, No. 3 (जून 2008) — फतेह सिंह राठौड़ का जेनिफ़र स्कारलॉट के साथ साक्षात्कार।
[5] Shrivastava, Shubhi. “Dabkan Village with Uncertain Future: A Study of Village Relocation in Sariska Tiger Reserve.” IJCRT, Vol. 10, Issue 5 (May 2022), IJCRT2205864. ijcrt.org
[6] “Sariska Tiger Reserve,” Wikipedia. en.wikipedia.org/wiki/Sariska_Tiger_Reserve
[7] India Together (6 Aug 2008), “Relocation of tigers to Sariska proceeds, amidst caution.” indiatogether.org/relocn-environment
[8] राजस्थान पत्रिका (27 अक्टूबर 2025), “सरिस्का–मुकुन्दरा टाइगर रिज़र्व से 18 गांवों का विस्थापन अटका.” patrika.com
[9] NDTV राजस्थान — मुकुंदरा टाइगर रिज़र्व: मशालपुरा के चार परिवार हटने को तैयार नहीं। rajasthan.ndtv.in
[10] NTCA / Project Tiger Division, पत्र सं. 4-1(43)/2019-PT (5 अगस्त 2020) — मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिज़र्व ग्राम पुनर्स्थापन।
[11] राजस्थान वन विभाग / NTCA — स्वैच्छिक ग्राम विस्थापन प्रगति, राजस्थान के टाइगर रिज़र्व (31 मार्च 2024 तक)।
[12] “Dholpur-Karauli: India’s 54th Tiger Reserve” (2023), Drishti IAS. drishtiias.com
[13] “Dholpur-Karauli tiger reserve approved; Rajasthan’s fifth, India’s 54th” (Aug 2023), India TV — Ramgarh Vishdhari (2022) as Rajasthan’s fourth reserve. indiatvnews.com
[14] Mongabay-India (Jan 2025), “Relocating villages in core tiger areas based on science.” india.mongabay.com
[15] The Diplomat (July 2025), “Between Tigers and Tradition: The Complex Reality of Village Relocation in India.” thediplomat.com
[16] The Indian Express, “Explained: Village relocation from tiger reserves.” indianexpress.com
[17] Drishti IAS, “NTCA’s Plan on Relocation of Villages.” drishtiias.com
[18] Centre for Environment Education (CEE), अहमदाबाद — कैलाशपुरी पुनर्वास सर्वेक्षण रिपोर्ट।
नोट: कुछ ऐतिहासिक और स्थानीय आँकड़े (1976 के पैकेज का विवरण, गाँवों के नाम, पशुधन आदि) राजस्थान वन विभाग के अभिलेखों तथा क्षेत्रीय शोध-सामग्री पर आधारित हैं।









