राजस्थान के बाघ अभयारण्यों से गाँवों के विस्थापन की तथ्यात्मक कहानी

राजस्थान के बाघ अभयारण्यों से गाँवों के विस्थापन की तथ्यात्मक कहानी

भारत के जंगलों में, जहाँ बाघ की दहाड़ के बीच हज़ारों परिवारों का शोर भी सुनाई देता है, वहाँ उनके खेत, उनके पशु, उनके देवता और उनके पुरखों के स्मारक स्थल — सब उसी जंगल से जुड़े हैं। लेकिन जब भारत ने अपने बाघों को बचाने का फ़ैसला किया, तो सबसे पहला सवाल यही उठा: क्या बाघ और इंसान एक ही ज़मीन पर रह सकते हैं? यद्यपि, इस यक्ष प्रश्न के उत्तर पर आज भी मतभेद बना हुआ है।

इस सवाल को समझने के लिए पहले ‘विस्थापन’ को समझना ज़रूरी है। ‘विस्थापन’ यानी किसी गाँव या बस्ती को उसकी पुरानी जगह से हटाकर कहीं और बसाना — जो इस देश में बाँध, सड़क और विकास की अन्य गतिविधियों के लिए होता ही रहता है। टाइगर रिज़र्व के संदर्भ में विस्थापन के लिए ग्रामीणों की सहमति सर्वोपरि होती है, और इसीलिए इसे ‘स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन’ कहा जाता है। वन विभाग का तर्क है कि जब गाँव बाघ के ‘क्रिटिकल हैबिटेट’ — यानी उसके मुख्य इलाक़े — में बसे हों, तो न तो बाघ सुरक्षित रह पाता है और न ही ग्रामीण।

एक ओर, जंगल के अंदर रहने वाले लोग लकड़ी, चारा, पानी और ज़मीन के लिए उसी वन पर निर्भर होते हैं। उनके मवेशी बाघ के प्राकृतिक शिकार को प्रभावित करते हैं, और कभी-कभी बाघ खुद उनके पशुओं को उठा ले जाता है — इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। दूसरी ओर, वन्यजीव विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर बाघ को एक बड़ा और सुरक्षित क्षेत्र मिले, तो उसकी संख्या सुरक्षित रह सकती है।

इसलिए यह बहस सिर्फ़ पर्यावरण की नहीं, बल्कि न्याय, संस्कृति, पहचान और आजीविका की भी है। इस लेख में हम इसी जटिल सवाल के विभिन्न पहलुओं को राजस्थान के संदर्भ में समझेंगे — 1976 के रणथम्भौर से लेकर आज के धौलपुर-करौली तक, और पशु चराने वाले परिवारों से लेकर नेचर गाइड बन चुके युवाओं तक के सफ़र की चर्चा करेंगे।

जंगल बचाने की नींव

ब्रिटिश राज के दौर में, सिर पर सफारी टोपी लगाए, हाथ में राइफ़ल थामे और अभी-अभी मारे गए बाघ पर पैर टिकाए खड़े ‘साहब-शिकारी’ की तस्वीर बेहद आम थी। आज़ादी के बाद भी यह सिलसिला रुका नहीं। किसी को ठीक-ठीक यह तक नहीं पता था कि भारत के जंगलों में कितने बाघ बचे हैं, और उन्हें अंधाधुंध मारा जा रहा था।

बीसवीं सदी के आरंभ में, अनुमान के अनुसार, भारत में बाघों की संख्या लगभग 40,000 थी। लेकिन शिकार, जंगलों की कटाई और खेती के विस्तार ने इस संख्या को बुरी तरह घटा दिया। गिरावट इतनी तेज़ थी कि 1972 में हुए देश के पहले बाघ सर्वेक्षण में मोटे तौर पर यह अनुमान लगाया गया कि भारत में बाघों की संख्या घटकर महज़ 1,827 रह गई थी।[2]

बाघ की यह दुर्दशा अकेले भारत की चिंता नहीं रह गई थी। 1969 में अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने अपनी आम सभा दिल्ली में आयोजित की। राजस्थान के वनाधिकारी कैलाश संखला ने इसी सभा में अपना पर्चा ‘द वैनिशिंग टाइगर’ प्रस्तुत किया, और सभा ने एक प्रस्ताव (GA 1969 RES 015) पारित कर बाघ के शिकार पर रोक (मोरेटोरियम) तथा प्रजाति की रक्षा के लिए तत्काल क़दमों की माँग की। इसी अपील के बाद भारतीय वन्यजीव बोर्ड ने राज्यों से पाँच साल के लिए बाघ के शिकार पर प्रतिबंध लगाने को कहा, और 1970 तक देश में बाघ के शिकार पर पूरी रोक लग गई।[1]

प्रिंस फिलिप, महारानी एलिज़ाबेथ, जयपुर के महाराजा और महारानी रणथंभौर में।
चित्र: साइमन एंड शूस्टर (Simon & Schuster)

लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय इतने भर से आश्वस्त नहीं हुआ। 1972 में वर्ल्ड वाइड फंड फ़ॉर नेचर के प्रभावशाली ट्रस्टी गाय माउंटफ़र्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से मुलाक़ात कर उनसे इस प्रजाति को विलुप्ति से बचाने का आग्रह किया। पर्यावरण और संरक्षण के प्रति गहरी रुचि रखने वाली प्रधानमंत्री ने स्थिति का अध्ययन करने और आगे की योजना बनाने के लिए विशेषज्ञों का एक दल गठित किया। डॉ. करण सिंह की अध्यक्षता वाले इस दल ने अगस्त 1972 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, और इसी से भारत के बाघ-संरक्षण कार्यक्रम का खाका तैयार हुआ — वही कार्यक्रम जो आगे चलकर ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ कहलाया। इसी दौर में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 भी पारित हुआ। जाने-माने संरक्षणवादी एच. एस. पंवर ने इन वर्षों को देश में संरक्षण के प्रति नज़रिये में आए एक ‘आमूल बदलाव’ के रूप में याद किया है।[1][2]

इन्हीं प्रयासों की परिणति 1 अप्रैल 1973 को हुई, जब इंदिरा गाँधी ने ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की औपचारिक शुरुआत की। शुरुआत में यह कार्यक्रम छह वर्षों के लिए — अप्रैल 1973 से मार्च 1979 तक — सोचा गया था। इसका घोषित उद्देश्य था: भारत में बाघों की एक व्यवहार्य आबादी बनाए रखना, और इन क्षेत्रों को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में सदा के लिए सुरक्षित रखना, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इनसे लाभ, शिक्षा और आनंद पा सकें। टास्क फ़ोर्स ने अलग-अलग पारिस्थितिकी-तंत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले चुनिंदा अभयारण्यों से शुरुआत करने का सुझाव दिया था, और लॉन्च के समय देश के नौ जंगलों को इसमें शामिल किया गया। रणथम्भौर इन्हीं नौ अभयारण्यों में से एक था।[2]

इसी के साथ वह प्रक्रिया शुरू हुई जो आज भी जारी है — जंगल को बाघों के अनुकूल और अधिक सुरक्षित बनाने की प्रक्रिया, जिसका सबसे दुष्कर और महत्त्वपूर्ण कार्य है: जंगल के अंदर बसे गाँवों का विस्थापन।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक बाघ शावक को गोद में लिए हुए। बाईं ओर मूल ऐतिहासिक छायाचित्र, दाईं ओर Artificial Intelligence (AI) की सहायता से उन्नत एवं रंगीन किया गया संस्करण। स्रोत: इंटरनेट पर उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखीय छवि।

विस्थापन का ढाँचा

टाइगर रिज़र्व से गाँवों का विस्थापन एक ऐसी प्रक्रिया है जो दशकों में बनी कई नीतियों और क़ानूनों से नियंत्रित होती है। इन्हें समझे बिना यह विषय अधूरा रहेगा।

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और प्रोजेक्ट टाइगर

1972 के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम ने बाघ के शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया और राष्ट्रीय उद्यानों व अभयारण्यों को क़ानूनी दर्जा दिया। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के साथ यह वैज्ञानिक सोच और स्पष्ट हो गई कि बाघ को प्रजनन और अस्तित्व के लिए विशाल और अबाधित आवास चाहिए, जिस पर उसका अपना एकाधिकार हो। इसलिए तय हुआ कि उसके ‘कोर एरिया’ को मानव गतिविधियों से पूरी तरह मुक्त — यानी ‘अक्षुण्ण’ (inviolate) — रखना होगा। तर्क यह था कि मवेशियों की चराई, जलावन-लकड़ी की कटाई और खेती जंगल को खंडित करती है और हिरन जैसे प्राकृतिक शिकार-आधार को घटाती है।

लेकिन एक अहम बात यह है कि 1972 के अधिनियम में विस्थापन के लिए कोई अलग, अधिकार-आधारित नीति नहीं थी। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की आकस्मिक शुरुआत के बाद गाँवों को मुख्यतः इसी अधिनियम की सामान्य शक्तियों और कार्यकारी आदेशों के सहारे हटाया गया। जब किसी इलाक़े को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने की मंशा अधिसूचित होती, तो ज़िला कलेक्टर पर ‘अधिकारों के निपटान’ (Settlement of Rights) की ज़िम्मेदारी आ जाती — यानी उस सीमा के भीतर मौजूद मानव अधिकारों का अधिग्रहण, समाप्ति या स्थानांतरण। चूँकि ये इलाक़े नए टाइगर रिज़र्व के कोर के रूप में सख़्त राष्ट्रीय उद्यानों में बदले जा रहे थे, व्यवहार में यह ‘निपटान’ गाँवों को खाली कराने का रूप ले लेता था।[16]

उस दौर की सोच को ‘फ़ोर्ट्रेस कंज़र्वेशन’ (क़िलेबंद संरक्षण) कहा जाता है — यह मान्यता कि प्रकृति की सबसे अच्छी रक्षा उसे इंसानों से पूरी तरह अलग रखकर ही होती है। चूँकि उस समय न तो निर्वाचित ग्राम सभाएँ थीं और न ही वन अधिकार अधिनियम जैसा कोई क़ानून, इसलिए विस्थापन वन विभाग के ऊपर से थोपे गए आदेशों के ज़रिए होता था। उदाहरण के लिए, रणथम्भौर में 1973 से 1979 के बीच 12 गाँवों के 800 परिवारों को बाहर बसाया गया, ताकि अवैध शिकार पर रोक लगे और उजड़ा आवास फिर से पनप सके।

इन शुरुआती विस्थापनों में आज जैसे तय मुआवज़े, क़ानूनी सुरक्षा-कवच या पुनर्वास के दिशा-निर्देश मौजूद नहीं थे, इसलिए ये अक्सर वनवासी समुदायों के लिए बेहद कष्टकारी साबित हुए। इन्हीं कठोर और ग़ैर-मानकीकृत विस्थापनों के अनुभव ने आगे चलकर 2006 में अधिनियम के संशोधन की ज़मीन तैयार की।

2006 के संशोधन में ‘क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट’ (CTH) की अवधारणा लाई गई — यानी ऐसे कोर क्षेत्र जिन्हें बाघ के लिए अक्षुण्ण रखना ज़रूरी है। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि CTH से कोई भी विस्थापन स्वैच्छिक हो, उचित मुआवज़े सहित हो और स्थानीय समुदायों की सहमति से ही हो। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) इस पूरी प्रक्रिया की देखरेख करता है।

वन अधिकार अधिनियम, 2006

2006 में वन अधिकार अधिनियम (FRA) के आने के बाद विस्थापन की प्रक्रिया और जटिल हो गई। इस क़ानून ने अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को अपनी ज़मीन पर क़ानूनी अधिकार दिए। FRA के तहत यह तय हुआ कि जब तक सामुदायिक और व्यक्तिगत वन अधिकारों की मान्यता नहीं हो जाती, तब तक विस्थापन ग़ैर-क़ानूनी है। हालाँकि ज़मीन पर यह नियम अक्सर टूटता भी रहा — कई जगह FRA की प्रक्रिया पूरी किए बिना ही परिवारों को विस्थापित कर दिया गया। वर्ष 2025 में केंद्रीय जनजातीय मंत्रालय ने एक नया नीति-ढाँचा जारी किया, जिसमें कहा गया कि विस्थापन ‘अपवादस्वरूप, स्वैच्छिक और प्रमाण-आधारित’ होना चाहिए।

NTCA के 2008 के दिशा-निर्देश

फ़रवरी 2008 में NTCA ने स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन के विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए। इनमें परिवारों को दो विकल्प दिए गए।

पहला — नक़दी पैकेज: प्रति परिवार 10 लाख रुपये (जो बाद में बढ़ाकर 15 लाख कर दिए गए), जिसके तहत परिवार ख़ुद ज़मीन और मकान की व्यवस्था करता है।

दूसरा — ज़मीन पैकेज: मूल ज़मीन के बराबर नई ज़मीन, मकान के लिए 1.5 लाख रुपये और सामुदायिक सुविधाएँ।

सबसे अहम बात यह थी कि यह पूरी प्रक्रिया ‘स्वैच्छिक’ थी — परिवार और ग्राम सभा की सहमति के बिना कोई विस्थापन नहीं।

राजस्थान सरकार की नीतियाँ: 2002, 2022, 2025

जैसा ऊपर ज़िक्र हुआ, रणथम्भौर में विस्थापन 1970 के दशक में ही शुरू हो चुका था; लेकिन राजस्थान में इसकी पहली औपचारिक नीति 2 नवंबर 2002 को जारी हुई। इसी के तहत रणथम्भौर के पादरा गाँव के 111 परिवारों को खण्डार के पास गणेशनगर गाँव में बसाया गया — यह 2002 की नीति के बाद की पहली बड़ी विस्थापन कार्रवाई थी।

हालाँकि गणेशनगर गाँव को बसाने को वन भूमि की बड़ी हानि के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि यह स्थान बाघों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि लोगों को जंगल के एक किनारे से निकालकर दूसरे किनारे पर ही बसा दिया गया — जबकि उस दौर में सरकारों के पास मुआवज़ा देने के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध थी।

7 सितंबर 2022 को इस पैकेज में बड़ा संशोधन हुआ, और फिर 24 जुलाई 2025 को एक नया आदेश जारी किया गया। नए आदेश में ज़मीन पैकेज के अंतर्गत मूल ज़मीन के साथ 1 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि (जिसमें कम से कम 0.8 हेक्टेयर सिंचित या 1.6 हेक्टेयर असिंचित), भूमिहीनों को भी न्यूनतम ज़मीन, और रहने के लिए कम से कम 5,400 वर्ग फ़ुट का आवासीय प्लॉट देने का प्रावधान किया गया। नक़दी पैकेज में NTCA के नियमानुसार प्रति परिवार 15 लाख रुपये की व्यवस्था रखी गई। दोनों में से कोई एक विकल्प परिवार चुन सकता है। यह राशि CAMPA और वन्यजीव फंड से दी जाती है, जिससे राज्य सरकार पर अलग से वित्तीय बोझ नहीं पड़ता।

रणथंभौर के कोर क्षेत्र में स्थित अनंतपुरा गाँव, पुनर्वास से पूर्व (1976) कॉपीराइट: Tiger Watch.

1976 की कहानी

क़ानून और नीतियों का यह ढाँचा जिन असली घटनाओं पर खड़ा है, उनमें सबसे पहली और सबसे चर्चित कहानी रणथम्भौर की है। राजस्थान का रणथम्भौर — जहाँ आज दुनिया भर के पर्यटक बाघ देखने आते हैं — कभी एक ऐसा जंगल था जिसमें गाँव और जंगल एक-दूसरे में गुँथे हुए थे। 1973 में जब इसे टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया, तब 392 वर्ग किलोमीटर के इस वन क्षेत्र में कुल 16 गाँव थे। इनमें से 12 गाँव जंगल के एकदम भीतरी हिस्से में गहरे बसे हुए थे और शेष 4 बाहरी परिधि में। ये सभी गाँव 16 अलग-अलग पॉकेट्स में बिखरे हुए थे, जिससे वन्यजीवों के लिए कोई एकसूत्र, निर्बाध आश्रय-स्थल नहीं बचा था। बड़े भूखंडों पर खेती होती थी और अत्यधिक चराई से जंगल की घास तेज़ी से ख़त्म हो रही थी। वन्यजीव दिन में छिपे रहते और रात में ही निकलते।

ऐसे में तत्कालीन उप-क्षेत्र निदेशक फतेह सिंह राठौड़ को इन 12 भीतरी गाँवों के विस्थापन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना जो उस ज़माने में भी असामान्य था और आज भी एक मिसाल बना हुआ है — दबाव नहीं, भरोसा। वे गाँव-गाँव जाते, लोगों के बीच बैठते और उनकी ज़रूरतें सुनते।

“जंगल और उसके सभी प्राणी ईश्वर की रचना हैं। क्या देवी दुर्गा — जो राक्षसों का नाश करती हैं — स्वयं बाघ पर सवार नहीं होतीं? इस दिव्य सृष्टि को बिगाड़ने का हक़ किसी इंसान को नहीं है। जंगल को उसके वास्तविक स्वरूप में लौटाना होगा।” — फतेह सिंह राठौड़, ग्राम चौपालों पर (Ward, Geoffrey C., and Diane Raines Ward, Tiger-Wallahs, New York: HarperCollins, 1993)

1975 में ज़िला स्तर पर ‘प्रोजेक्ट टाइगर विलेज रिलोकेशन कमेटी’ बनाई गई, जिसमें ज़िला प्रमुख, फ़ील्ड डायरेक्टर और ज़िला कलेक्टर शामिल थे। समिति की 27 दिसंबर 1975 की बैठक में तय हुआ कि विस्थापन दो चरणों में होगा — पहले 6 गाँव डुमोदा के पास कैलाशपुरी में, और फिर 6 गाँव छान-फरिया के पास गोपालपुरा में। सरकार की ओर से वन भूमि को राजस्व विभाग को हस्तांतरित करने की स्वीकृति मिलते ही काम शुरू हो गया।

12 गाँव, 200 परिवार, एक नया जीवन

सन् 1976 में यह ऐतिहासिक काम मूर्त रूप लेने लगा। पहली सफलता अणतपुरा गाँव से आई — जगन गुर्जर नाम के एक स्थानीय युवक ने पहल की, लोगों को समझाया, और गाँव राज़ी हो गया। छितर गुर्जर ने भी इसमें सहयोग दिया। एक बार शुरुआत होने के बाद बाक़ी गाँव भी एक के बाद एक हटने लगे। सुबह-सुबह ट्रकों की क़तार आती; लोग आँखों में आँसू और सपने लिए अपना सामान लादते, और एक गहरी ख़ामोशी में अपने पुराने घर, गली और गाँव को अलविदा कहते। पेड़ों से लिपटकर रोते लोग फतेह सिंह को भी भावुक कर देते थे। उन्हीं के शब्दों में —

“यह मेरा सबसे कठिन काम था। लोग पेड़ों से लिपटकर रोए। उन्हें लगता था कि उनका भविष्य बिल्कुल अँधेरे में है। सभी बुज़ुर्गों ने कहा, ‘हमने यहीं पूरी ज़िंदगी गुज़ारी है, हमें यहीं मरने दो।’ मैं भी उनके साथ रो रहा था — क्योंकि मेरे भीतर कहीं यह एहसास था कि वे उस चीज़ की क़ीमत चुका रहे हैं जिसे शायद वे कभी समझ न पाएँ।” — फतेह सिंह राठौड़ (Sanctuary Asia, Vol. XXVIII, No. 3, जून 2008; जेनिफ़र स्कारलॉट के साथ साक्षात्कार)

1976 में आरम्भ हुए पुनर्वास ने रणथंभौर के प्राकृतिक आवासों को मानव दबाव से मुक्त करने और बाघों सहित वन्यजीवों के संरक्षण के लिए आधार तैयार किया। विस्थापित होते ग्रामीण अपना सामान लेकर नए ठिकाने की ओर जाते हुए। कॉपीराइट: Tiger Watch.

एक साल के भीतर सभी 12 गाँव — अणतपुरा, बेरदा, हनुत्या, लकड़दा, फुलेड़ी, छिंदावली, चिरोली, प्रेमपुर, लाहपुर, गुड़ा, क़िला रणथम्भौर और नागदी-रेहमानपुर — खाली हो गए। ये सभी मुख्यतः गुर्जर समुदाय के गाँव थे। कुल 200 परिवार और लगभग 800 लोग अपनी पुरानी ज़मीन छोड़कर नई जगह बसे। उनके साथ लगभग 2,500 मवेशी (भैंस, गाय, बैल, ऊँट, बकरी और खच्चर) भी नए ठिकाने पर आए। सात गाँव — अणतपुरा, बेरदा, हनुत्या, लकड़दा, फुलेड़ी, छिंदावली और चिरोली — कैलाशपुरी (डुमोदा) में बसाए गए, और पाँच गाँव — प्रेमपुर, लाहपुर, गुड़ा, क़िला रणथम्भौर और नागदी-रेहमानपुर — गोपालपुरा (छान) में।

ज़मीन, मुआवज़ा और सुविधाएँ

इस विस्थापन में एक ऐसा पैकेज तैयार किया गया जो उस दौर में अभूतपूर्व था। प्रत्येक परिवार को उसकी मूल ज़मीन के बराबर नई ज़मीन दी गई, और साथ में 5 बीघा अतिरिक्त भूमि का बोनस भी — हर भूमिधारक तथा परिवार के मुखिया को। यहाँ तक कि जो परिवार पहले भूमिहीन थे, उन्हें भी 5 बीघा ज़मीन दी गई। कुल 2,681 बीघा 9 बिस्वा (लगभग 687.5 हेक्टेयर) भूमि वन विभाग से राजस्व विभाग को पुनर्वास हेतु हस्तांतरित की गई — कैलाशपुरी में 1,587 बीघा 9 बिस्वा (लगभग 407 हेक्टेयर) और गोपालपुरा में 1,094 बीघा (लगभग 280.5 हेक्टेयर)।

अचल संपत्ति के लिए नक़दी मुआवज़ा भी दिया गया; 12 गाँवों को कुल ₹4,52,829 का नक़द मुआवज़ा मिला। विस्थापन की सम्पूर्ण लागत ₹5,49,914 रही — जो आज के मूल्यों में लगभग ₹3.5 से 4 करोड़ के बराबर है। इसके अलावा जो सुविधाएँ प्रदान की गईं, वे जंगल में कभी नसीब नहीं हुई थीं: सभी चल संपत्ति को नए स्थान तक पहुँचाने के लिए वाहन, नगर नियोजक (टाउन प्लानर) द्वारा तैयार कैलाशपुरी का मास्टर प्लान, धार्मिक भावनाओं की रक्षा के लिए मंदिर का निर्माण, एक माध्यमिक स्कूल, सामुदायिक कुएँ और डीज़ल पम्प की व्यवस्था, और आस-पास के गाँवों से जोड़ने के लिए सड़कें।

जंगल का पुनर्जन्म

फतेह सिंह की मेहनत का नतीजा देखने में देर नहीं लगी। 1976 में ही उन्होंने रणथम्भौर में पहली बाघिन देखी, जिसे उन्होंने प्यार से ‘पद्मिनी’ नाम दिया। जो खेत कभी मानवीय गतिविधियों से भरे रहते थे, वहाँ घास के मैदान लहलहा उठे। सांभर और चीतल चरने लगे, और बाघ दिन में भी खुलकर विचरने लगा। 1973 में यहाँ बाघों की संख्या महज़ 17–18 थी; आज 70 से अधिक बाघ यहाँ हैं। रणथम्भौर आज दुनिया में बाघ देखने की सबसे बेहतरीन जगहों में से एक है।

डुमोदा के निकट बसाया गया पुनर्वासित गाँव कैलाशपुरी, 1976, रणथंभौर के कोर क्षेत्र से स्थानांतरित परिवारों की नई बसावट। कॉपीराइट: Tiger Watch.

राजस्थान के अन्य टाइगर रिज़र्व: वर्तमान परिदृश्य

रणथम्भौर की कहानी आधी सदी पुरानी है — और एक सफलता की कहानी भी। लेकिन विस्थापन का वही सवाल राजस्थान के बाक़ी टाइगर रिज़र्व में आज भी अनसुलझा है: कहीं अधूरा, कहीं विवादित, तो कहीं बिलकुल नई राह पर।

सरिस्का — बाघ भी गए, गाँव भी रहे

अलवर ज़िले में 1978 में घोषित सरिस्का टाइगर रिज़र्व लापरवाही का एक महँगा सबक है। 2004 में जब एक सर्वेक्षण में यहाँ से बाघों के पूरी तरह ग़ायब हो जाने की बात सामने आई, तो पूरे देश में हलचल मच गई; इसका मुख्य कारण स्थानीय शिकारी गिरोहों द्वारा किया गया अवैध शिकार और जंगल पर लगातार बना मानव दबाव माना गया। इसके बाद ही केंद्र ने ‘टाइगर टास्क फ़ोर्स’ गठित की और 28 दिसंबर 2007 को सरिस्का के ‘क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट’ (CTH) को अधिसूचित किया गया।[6][5]

28 जून 2008 को रणथम्भौर से एक बाघ को हेलिकॉप्टर से लाकर सरिस्का में छोड़ा गया — यह देश का पहला ‘एरियल’ बाघ-स्थानांतरण था। इसके बाद और बाघ लाए गए, और आज यहाँ इनकी संख्या लगभग 48 है।[7][8]

सरिस्का के CTH में 29 गाँव हैं। 2007–08 की NTCA पुनर्स्थापन योजना के तहत भगानी गाँव के 21 परिवार सबसे पहले स्वेच्छा से हटे। मार्च 2024 तक 5 गाँव — भगानी, उमरी, रोटक्याला, पनीधाल और डाबली — पूरी तरह विस्थापित हो चुके थे (कुल 322 परिवार)। विस्थापन के लिए चिह्नित गाँवों के कुल 1,471 परिवारों में से 973 अब तक हट चुके हैं, जबकि सुकोला, क्रास्का, देवरी, कांकवाड़ी और हरिपुरा जैसे गाँवों की प्रक्रिया अभी अधूरी है।[11][8]

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। विस्थापित परिवारों की शिकायत है कि उन्हें पर्याप्त ज़मीन और रोज़गार नहीं मिला। डाबकन जैसे गाँव, जिन्हें 2017–18 में विस्थापन के लिए चुना गया था, आज भी अधर में लटके हैं — वन विभाग ने वहाँ बिजली, पानी और पक्के मकान जैसी बुनियादी सुविधाएँ रोक दीं, और लोग वर्षों से अनिश्चितता में जी रहे हैं। आदिवासी परिवारों ने FRA के तहत सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता के बिना विस्थापन का विरोध किया और अदालत का दरवाज़ा खटखटाया।

अब दबाव दोनों ओर से बढ़ रहा है। सरिस्का के 48 बाघों में 13 शावक ऐसे हैं जिन्हें आने वाले महीनों में अपना अलग इलाक़ा चाहिए; जगह न मिली तो उनके आबादी की ओर बढ़ने का ख़तरा है। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2026 तक शेष विस्थापन पूरा करने का आदेश दिया है, फिर भी बचे हुए गाँवों के लिए न ज़मीन तय हुई है और न मुआवज़ा। यही सरिस्का और रणथम्भौर के प्रबंधन का फ़र्क़ है — एक जगह प्रक्रिया ने भरोसा जीता, दूसरी जगह भरोसा टूटा।

मुकुंदरा हिल्स — गिरधरपुरा की दोहरी त्रासदी

कोटा और झालावाड़ के बीच फैला मुकुंदरा हिल्स 2013 में अधिसूचित राजस्थान का तीसरा टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH लगभग 417 वर्ग किलोमीटर है। इसके CTH में 14 गाँव हैं। मार्च 2024 तक यहाँ केवल 2 गाँव — लक्ष्मीपुरा (30 में से 29 परिवार) और खरली बावरी (24 में से 17 परिवार) — विस्थापित हो सके हैं। बड़े गाँवों की प्रक्रिया अभी आधी-अधूरी है: मशालपुरा के 301 परिवारों में से 156, और घाटी जागीर के 58 में से 21 परिवार ही अब तक हटे हैं, जबकि दामोदरपुरा के 153 परिवारों का विस्थापन शुरू ही नहीं हुआ। मशालपुरा में तो चार परिवार आज भी जाने को तैयार नहीं हैं।[11][9]

रफ़्तार इतनी धीमी रही कि आवंटित पैसा भी पूरा ख़र्च नहीं हो पाया — मुकुंदरा के पुनर्स्थापन के लिए जारी ₹39.16 लाख की राशि अनखर्च रह गई और 2020 में उसे फिर से मान्य (revalidate) कराना पड़ा। नतीजा यह कि यह रिज़र्व का एक हिस्सा आज भी बाघों से लगभग ख़ाली है — यहाँ बमुश्किल एक बाघ-बाघिन की जोड़ी, उनके शावक और दो उप-वयस्क बाघिनें हैं।[10][8]

इसी पृष्ठभूमि में गिरधरपुरा का ज़िक्र ज़रूरी है, क्योंकि यह गाँव एक दोहरी त्रासदी का प्रतीक है। 1960 के दशक में गाँधी सागर बाँध के निर्माण के समय इसे पहले ही एक बार विस्थापित किया जा चुका था; और अब, दशकों बाद, उसी नई जगह को मुकुंदरा के CTH में शामिल कर लिया गया — यानी दूसरा विस्थापन। दो बार उजड़ चुके इन परिवारों के लिए यह पहचान, विश्वास और आसरे का सवाल है। वे पूछते हैं: “अगर अगली बार फिर कोई योजना आई, तो क्या तीसरी बार हटना होगा?”

रामगढ़ विषधारी — नई शुरुआत

बूँदी ज़िले में 2022 में अधिसूचित रामगढ़ विषधारी राजस्थान का चौथा टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH लगभग 482 वर्ग किलोमीटर है। इसके CTH में 8 गाँव हैं। मार्च 2024 तक यहाँ एक भी गाँव पूरी तरह विस्थापित नहीं हुआ है; केवल गुलखेड़ी गाँव की प्रक्रिया शुरू हुई है, जहाँ 208 परिवारों में से 40 अब तक हटे हैं।[13][11]

धौलपुर-करौली — सह-अस्तित्व की नई प्रयोगशाला

धौलपुर-करौली टाइगर रिज़र्व (DKTR) राजस्थान का पाँचवाँ टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH 599.64 वर्ग किलोमीटर है और बफ़र ज़ोन लगभग 458.24 वर्ग किलोमीटर। रिज़र्व के कोर क्षेत्र में 52 गाँव और बफ़र क्षेत्र में 108 गाँव बसे हैं, फिर भी अब तक CTH से किसी भी गाँव का विस्थापन प्रस्तावित नहीं है। जहाँ रणथम्भौर और सरिस्का विस्थापन के मॉडल रहे, वहीं DKTR को एक अलग राह — बाघ और इंसान के सह-अस्तित्व — की प्रयोगशाला के रूप में देखा जा रहा है।[12]

धौलपुर–करौली टाइगर रिजर्व का कोर क्षेत्र। यहाँ स्थित 52 छोटे-बड़े गाँवों में से अब तक एक भी गाँव का पुनर्वास प्रारम्भ नहीं हुआ है।
कॉपीराइट: Tiger Watch.

विस्थापन के बाद जंगल की वापसी

हर पूरा हुआ विस्थापन अपने पीछे दो कहानियाँ छोड़ जाता है — एक जंगल की, और दूसरी उन परिवारों की जो वहाँ से गए। पहले जंगल की बात।

किसी गाँव के खाली होने के बाद वहाँ क्या बचता है? टूटी हुई दीवारें, पुराने कुएँ, मंदिरों के खंडहर, खेतों की मेड़ें, और कभी-कभी तुलसी का एक पौधा जो आज भी उग आता है। लेकिन इन्हीं खाली जगहों में धीरे-धीरे जंगल वापस आने लगता है। रणथम्भौर में जहाँ कभी खेत थे, वहाँ अब घास के मैदान हैं। जहाँ मवेशी चरते थे, वहाँ सांभर और चीतल हैं। जहाँ इंसानी रोशनी थी, वहाँ अब बाघ बेधड़क विचरता है। सरिस्का में भी भगानी गाँव के खाली होते ही पुरानी इमारतें तोड़ दी गईं, ताकि जंगल को जगह मिल सके। पन्ना और रणथम्भौर के अध्ययन बताते हैं कि विस्थापित गाँवों की जगहों पर पहले शाकाहारी वन्यजीव और फिर शिकारी जल्दी लौट आते हैं।

रणथम्भौर के जंगल में आज भी कुछ पुरानी दीवारें खड़ी हैं। सफ़ारी पर जाने वाले पर्यटक इन्हें देखते हैं — ये खंडहर एक पुराने जीवन की याद हैं, और इनमें उन लोगों की स्मृतियाँ बसी हैं जिन्होंने यह जंगल बाघ के लिए वापस कर दिया।

नए गाँव

दूसरी कहानी परिवारों की है। नए गाँवों में जाने के बाद शुरुआती दौर में उनकी मुश्किलें बढ़ जाती हैं। जंगल में जो मुफ़्त था — लकड़ी, पत्ते, जड़ी-बूटियाँ, चारा — वह अब बाहर ख़रीदना पड़ता है। नई ज़मीन पर शुरू-शुरू में फ़सल नहीं उगती। और पड़ोसी गाँव वाले नए आए परिवारों को कभी-कभी संदेह से देखते हैं।

फिर भी समय के साथ तस्वीर बदलती है। 1976 में विस्थापित रणथम्भौर के परिवारों के बसने के बाद सेंटर फ़ॉर एनवायरनमेंट एजुकेशन (CEE), अहमदाबाद की एक टीम ने कैलाशपुरी में सर्वेक्षण किया। उनकी रिपोर्ट में दर्ज है:[18]

“लोग अपने नए गाँव में संतुष्ट दिखे; कुछ ने कहा कि यहाँ जीवन जंगल के उन गाँवों से बेहतर है जहाँ से वे आए हैं।” — Centre for Environment Education, अहमदाबाद — कैलाशपुरी सर्वेक्षण 

कैलाशपुरी और गोपालपुरा — आज की तस्वीर

आज कैलाशपुरी में 300 परिवार हैं और कुल आबादी 1,601 है। 1976 में वन विभाग द्वारा बनाया गया सामुदायिक कुआँ आज भी है — जिसे 1992–93 में वन विभाग ने और गहरा करवाकर दुरुस्त किया। स्कूल और मंदिर, दोनों वन विभाग ने बनवाए थे, जो आज भी गाँव की धड़कन हैं। गाँव का पशुधन — 452 भैंस, 170 गाय, 130 बैल, 3 ऊँट, 622 बकरियाँ और 2 खच्चर, यानी कुल 1,379 पशु — बताता है कि पशुपालन आज भी इन परिवारों की रीढ़ है।

गोपालपुरा में 70 परिवार हैं और आबादी 288। यहाँ 500 बीघा भूमि पर खेती होती है। पशुओं के पानी के लिए वन विभाग ने एक ‘खेल’ (टंका) बनवाया, जबकि मंदिर पंचायत ने बनवाया। पशुधन में 20 भैंस, 150 गाय, 100 बकरी, 40 भेड़ और 2 ऊँट हैं। गोपालपुरा के लोगों ने आस-पास की वन भूमि पर इको-डेवलपमेंट कार्य शुरू किए हैं, और दो बायो-गैस इकाइयाँ भी स्थापित की गई हैं।

रणथम्भौर के दूसरे (हाल के) दौर के विस्थापन में परिवारों को 2.5 लाख रुपये की सहायता राशि, 60×90 फ़ीट का आवासीय भूखंड और 6 बीघा 7 बिस्वा कृषि भूमि दी गई। ये नवस्थापित गाँव अभी भी बुनियादी सुविधाओं — स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल — के लिए विकास की राह पर हैं।

रणथंभौर से पुनर्वासित गाँवों के नेचर गाइड, जो आज रणथंभौर टाइगर रिजर्व में कार्यरत हैं।
कॉपीराइट: मीठालाल गुर्जर.

नई पहचान बनाते युवा

पुनर्वास की कहानी का सबसे उम्मीद भरा अध्याय वह है जो आज लिखा जा रहा है। पुनर्वासित गाँवों के युवा अब केवल मज़दूरी तक सीमित नहीं हैं। पशुपालन में भी एक बड़ा बदलाव आया है: जहाँ पहले देसी नस्लें जंगल में चरती थीं, अब परिवार उन्नत नस्ल के पशु पालने लगे हैं। डेयरी उद्योग से जुड़ाव बढ़ा है, जो नियमित आमदनी का ज़रिया बन रहा है। युवाओं ने ट्रैक्टर-चालन, छोटे व्यापार, निर्माण और परिवहन में भी पैर जमाए हैं।

2023 में रणथम्भौर के तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर पी. कथीरवेल के निर्देश पर रणथम्भौर से विस्थापित गाँवों के 52 युवाओं को, और इको-डेवलपमेंट कमेटी के माध्यम से 30 युवाओं को, नेचर गाइड के रूप में नियुक्त किया। जो जंगल कभी इनकी आजीविका का केंद्र था, अब वही जंगल इन्हें नई पहचान दे रहा है — लेकिन इस बार वन्यजीवों के दोस्त और रक्षक के रूप में।

ग़ैर-सरकारी संगठन टाइगर वॉच ने रणथम्भौर के बाहर बसे पुनर्वासित गाँवों — अनंदीपुरा और गिरिराजपुरा — में दो शिल्प-कौशल विकास केंद्र स्थापित किए हैं, जहाँ महिलाएँ और युवा हस्तशिल्प, बुनाई और पारंपरिक कलाओं का प्रशिक्षण ले रहे हैं। साथ ही अनंदीपुरा में एक डिजिटल शिक्षा केंद्र भी है, जो इन गाँवों के बच्चों को आधुनिक शिक्षा और मुख्यधारा से जोड़ रहा है। यह तस्वीर बताती है कि जब विस्थापन सम्मान के साथ होता है — और पुनर्वास के बाद सतत सहयोग भी मिले — तो यह केवल एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं, बल्कि एक नई संभावना का द्वार भी हो सकता है।

आनंदीपुरा गाँव में टाइगर वॉच के ‘वन्य सखी’ कार्यक्रम की प्रतिभागी महिलाएँ।
कॉपीराइट: Tiger Watch.

एक बड़ा सवाल

जंगल में रहने वाले लोगों के लिए यह सिर्फ़ एक जगह नहीं है — यह उनकी दुनिया है। उनके देवता वहाँ के पेड़ों में हैं, उनके पुरखों की राख उस मिट्टी में मिली है, और उनकी भाषा में उन पेड़-पौधों के नाम हैं जो किसी शब्दकोश में नहीं मिलेंगे। कई परिवारों का कहना है कि ‘स्वैच्छिक विस्थापन’ का नाम तो ज़रूर है, लेकिन ज़मीन पर दबाव बहुत होता है। जंगल के अंदर नई सड़क और इमारत बनाने की इजाज़त नहीं, खेतों में नलकूप नहीं, बच्चों के लिए स्कूल और अस्पताल नहीं — यही धीमा दबाव उन्हें हटने पर मजबूर करता है।

केंद्र सरकार के 2024 के आँकड़ों के अनुसार, 1973 से अब तक देश भर में 257 गाँवों के 25,007 परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है। लेकिन अभी भी 64,801 परिवार टाइगर रिज़र्व के कोर एरिया में रह रहे हैं, और इन सबके विस्थापन एक लंबा तथा बेहद ख़र्चीला काम है।[14]

वन्यजीव विशेषज्ञों का तर्क है कि बाघ को जीवित रहने के लिए बड़ा, निर्बाध क्षेत्र चाहिए। एक बाघ का ‘होम रेंज’ 100 से 400 वर्ग किलोमीटर तक हो सकता है। जब इस इलाक़े में गाँव, खेत और मवेशी होते हैं, तो बाघ का व्यवहार बदल जाता है — वह रात का शिकारी बन जाता है और प्रजनन कम कर देता है। रणथम्भौर का उदाहरण देखें: 1976 में जब 12 गाँव हटे, तब यहाँ बमुश्किल 17–18 बाघ थे; आज 70 से अधिक हैं। फिर भी, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि सभी गाँवों को हटाना ‘न व्यावहारिक है और न वास्तविक’ — इसके बजाय उन गाँवों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो बाघ के मुख्य ‘कॉरिडोर’ में हैं।[14]

क्या विस्थापन ही एकमात्र विकल्प है?

CTH (कोर एरिया) से विस्थापन वैज्ञानिक और क़ानूनी, दोनों दृष्टि से ज़रूरी है। लेकिन बफ़र ज़ोन की बात अलग है। वहाँ सह-अस्तित्व — बाघ और इंसान का साथ-साथ जीना — संभव भी है और व्यावहारिक भी। नेपाल, केन्या और ज़ांबिया जैसे देशों में ‘कम्यूनिटी-बेस्ड कंज़र्वेशन’ सफलतापूर्वक चल रहा है, और भारत में भी बफ़र ज़ोन में ऐसे प्रयोग हुए हैं। रणथम्भौर के बफ़र में नेचर गाइड, EDC कार्यक्रम और टाइगर वॉच के कौशल केंद्र — ये सब इसी सोच की देन हैं: स्थानीय लोग संरक्षण के दुश्मन नहीं, बल्कि उसके सबसे बड़े भागीदार बन सकते हैं।

असली बात यह है: जब विस्थापन सही तरीक़े से होता है — सही मुआवज़ा, सही सुविधाएँ और लोगों की सच्ची इच्छा से — तो जंगल भी बचता है और लोग भी ख़ुश रहते हैं। और जब यह ज़बरदस्ती होता है या वादे टूट जाते हैं, तो लोग नाराज़ होते हैं, बाघों पर दोष मढ़ा जाता है और संरक्षण की भावना ही ख़त्म हो जाती है। इसलिए दोनों विकल्प — CTH से विस्थापन और बफ़र में सह-अस्तित्व — एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।

गाँवों के पुनर्वास और आवास संरक्षण के परिणामस्वरूप बढ़ी बाघों की संख्या ने रणथंभौर को राजस्थान के अन्य टाइगर रिजर्वों के लिए बाघ स्थानांतरण का स्रोत क्षेत्र बना दिया है। कॉपीराइट: डॉ. धर्मेन्द्र खंडाल.

राजस्थान में विस्थापन की स्थिति (मार्च 2024)

(नीचे दी गई जानकारी राजस्थान वन विभाग के अभिलेखों पर आधारित है।)

राजस्थान के टाइगर रिज़र्व — क्षेत्रफल (वर्ग किलोमीटर)

टाइगर रिज़र्वCTHबफ़रकुल
रणथम्भौर1,113.36297.921,411.28
सरिस्का881.11332.231,213.34
मुकुंदरा हिल्स417.17342.82759.99
रामगढ़ विषधारी481.911,019.981,501.89
धौलपुर-करौली599.64458.241,057.88
कुल3,493.192,451.195,944.38

स्वैच्छिक ग्राम विस्थापन की प्रगति

टाइगर रिज़र्वCTH में गाँवपूर्णतः विस्थापितप्रक्रिया में
रणथम्भौर6589
सरिस्का2956
मुकुंदरा हिल्स1422
रामगढ़ विषधारी801
धौलपुर-करौली52*
कुल1681518

* राजस्थान के अन्य चार रिज़र्व के आँकड़े ‘विस्थापन हेतु चिह्नित’ गाँवों के हैं (कुल 116)। धौलपुर-करौली के 52 गाँव कोर/CTH में मौजूद हैं (बफ़र में 108), पर अभी इनमें से किसी का विस्थापन प्रस्तावित नहीं है।

रणथम्भौर — परिवारवार विवरण (मार्च 2024)

गाँवकुल परिवारविस्थापित
इन्दाला3333
पादरा111111
मछनकी5959
मोरडुंगरी157154
भीड़164139
गाड़ीतालाड़ा4949
काथुली151141
काला खोहेरा4646
कलीभट4743
हिंदवार575373
मुंदरहेड़ी16172
बेराई भीमपुरा10291
डांगरा8349
उँची ग्वाड़ी143116
चोड़क्या कलाँ11573
चोड़क्या खुर्द185
मरमड़ा245220
कुल2,2591,774

बाघ भारत की धरोहर है — इसे बचाना हम सबकी ज़िम्मेदारी है। लेकिन यह ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन लोगों पर नहीं थोपी जा सकती जो सदियों से जंगल के साथ जी रहे हैं और जिनका इस संकट में कोई हाथ नहीं था। रणथम्भौर का उदाहरण बताता है कि जब विस्थापन सम्मान के साथ होता है, तो यह दोनों तरफ़ फ़ायदेमंद हो सकता है। 1976 में जिन 200 परिवारों ने अपनी जड़ें छोड़ीं, उनके वंशज आज नेचर गाइड हैं, शिल्पकार हैं, डेयरी किसान हैं, डिजिटल रूप से जुड़े नागरिक हैं — और रणथम्भौर में 70 से अधिक बाघ हैं।

राजस्थान में अभी भी सैकड़ों गाँव टाइगर रिज़र्व के कोर में हैं; 15 पूरी तरह विस्थापित हो चुके हैं और 18 प्रक्रिया में हैं। यह काम लंबा, महँगा और नाज़ुक है। लेकिन अगर CTH में विस्थापन और बफ़र में सह-अस्तित्व — दोनों विकल्पों को एक साथ, समझदारी से चलाया जाए — तो न सिर्फ़ बाघ बचेंगे, बल्कि जो परिवार जाएँगे, वे भी एक बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर जाएँगे।

“जंगल बचाने के लिए पहले लोगों का दिल जीतना होता है।” — फतेह सिंह राठौड़

यही सबसे बड़ा सबक है — जो 1976 में भी सच था, और आज भी उतना ही ज़रूरी है।

संदर्भ:

[1] IUCN (2023), “A catalyst for change” — Project Tiger and IUCN Resolution GA 1969 RES 015. iucn.org/story/202311/catalyst-change

[2] “Project Tiger,” Wikipedia. en.wikipedia.org/wiki/Project_Tiger

[3] Ward, Geoffrey C., and Diane Raines Ward. Tiger-Wallahs: Encounters with the Men Who Tried to Save the Greatest of the Great Cats. New York: HarperCollins, 1993.

[4] Sanctuary Asia, Vol. XXVIII, No. 3 (जून 2008) — फतेह सिंह राठौड़ का जेनिफ़र स्कारलॉट के साथ साक्षात्कार।

[5] Shrivastava, Shubhi. “Dabkan Village with Uncertain Future: A Study of Village Relocation in Sariska Tiger Reserve.” IJCRT, Vol. 10, Issue 5 (May 2022), IJCRT2205864. ijcrt.org

[6] “Sariska Tiger Reserve,” Wikipedia. en.wikipedia.org/wiki/Sariska_Tiger_Reserve

[7] India Together (6 Aug 2008), “Relocation of tigers to Sariska proceeds, amidst caution.” indiatogether.org/relocn-environment

[8] राजस्थान पत्रिका (27 अक्टूबर 2025), “सरिस्का–मुकुन्दरा टाइगर रिज़र्व से 18 गांवों का विस्थापन अटका.” patrika.com

[9] NDTV राजस्थान — मुकुंदरा टाइगर रिज़र्व: मशालपुरा के चार परिवार हटने को तैयार नहीं। rajasthan.ndtv.in

[10] NTCA / Project Tiger Division, पत्र सं. 4-1(43)/2019-PT (5 अगस्त 2020) — मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिज़र्व ग्राम पुनर्स्थापन।

[11] राजस्थान वन विभाग / NTCA — स्वैच्छिक ग्राम विस्थापन प्रगति, राजस्थान के टाइगर रिज़र्व (31 मार्च 2024 तक)।

[12] “Dholpur-Karauli: India’s 54th Tiger Reserve” (2023), Drishti IAS. drishtiias.com

[13] “Dholpur-Karauli tiger reserve approved; Rajasthan’s fifth, India’s 54th” (Aug 2023), India TV — Ramgarh Vishdhari (2022) as Rajasthan’s fourth reserve. indiatvnews.com

[14] Mongabay-India (Jan 2025), “Relocating villages in core tiger areas based on science.” india.mongabay.com

[15] The Diplomat (July 2025), “Between Tigers and Tradition: The Complex Reality of Village Relocation in India.” thediplomat.com

[16] The Indian Express, “Explained: Village relocation from tiger reserves.” indianexpress.com

[17] Drishti IAS, “NTCA’s Plan on Relocation of Villages.” drishtiias.com

[18] Centre for Environment Education (CEE), अहमदाबाद — कैलाशपुरी पुनर्वास सर्वेक्षण रिपोर्ट।

नोट: कुछ ऐतिहासिक और स्थानीय आँकड़े (1976 के पैकेज का विवरण, गाँवों के नाम, पशुधन आदि) राजस्थान वन विभाग के अभिलेखों तथा क्षेत्रीय शोध-सामग्री पर आधारित हैं।

Butterfly Park – Amberi, Udaipur

Butterfly Park – Amberi, Udaipur

Butterflies are diurnal, non-biting, non-stinging, six – legged (3-paird) insects heaving 2 pairs of wings for flying. Both, butterflies and moths are collectively included in order Lepidoptera. Body of members of this order is covered with colored scales. They have four stages in their lifecycles namely, egg, caterpillar, pupa and imago or adult. Their caterpillar stage is a leaf eating stage; pupa, a fasting stage and adult represents a sucking phase of the life cycle. Mouth parts of an adult butterfly are formed for sucking and are in the form of a coiled tube or proboscis.

Order Lepidoptera is further divided in to two sub groups namely, Rhopalocera and Heterocera. All the butterflies are included in Rhopalocera while all the moths are classified in Heterocera taxa.

A biodiversity park has been developed in the Amberi Forest Block by the Forest Department Rajasthan known as “Mewar Biodiversity Park”. It was inaugurated on February 26, 2016. To create mass awareness about the butterflies, a butterfly park was developed inside the “Mewar Biodiversity Park, Amberi, Udaipur”. It was inaugurated on June 24, 2024.  So far 83 species of the butterflies have been recorded in this butterfly park. For the benefit of tourists coming to visit the butterfly park, a field guide has been developed by the park authorities to make butterfly identification easy. Many larval host and nectar plants are naturally growing in and around the butterfly park (Fig-1&2). Besides naturally growing pants a large number of larval hosts and nectar providing species have been planted to enrich the habitat quality of the park. Monsoon and summer are the best period to visit the park. Few or all four stages of the butterflies namely, egg, caterpillar, pupa and imago can be seen in this park after limited efforts only.

Figure 1: Gateway of Butterly Park, Amberi, Udaipur

Many walk ways have been developed in the butterfly park. Using these paths, visitors can reach at different corners of the park very easily. The micro habitat and micro climate of the park is very congenial to different species of butterflies and moths. Suitable mud puddling points are also developed to meet out the biological needs of the butterflies.

Figure 2: Vegetation of Butterfly Park Amberi

A list of the butterflies, so far seen in the Butterfly Park Amberi and their larval hosts are shown below in table 1:

TABLE 1: BUTTERFLIES AND THEIR LARVAL HOSTS CONFINED IN AND AROUND THE BUTTERFLY PARK AMBERI

S. No.

Name of butterfly species

Name of host species useful as larval host

Common Name

Latin Name

1.      

Common rose

Pachliopta aristolochiae

Aristolochia indica, A. brateolata

2.      

Crimson rose

Pachliopta hector

Aristolochia indica

3.      

Lime

Papilio demoleus

Aegle marmelose, Citrus limon

4.      

Common Mormon

Paplilio polytes

Aegle marmelose, Citrus limon

5.      

Tailed jay

Graphium Agamemnon

Polyalthia longifolia, Annona squamosa

6.      

Common jay

Graphium doson

Polyalthia longifolia, Annona squamosa

7.      

Spot swordtail

Graphium namius

Miliusa tomentosa

8.      

Common grass yellow

Eurema hecabe

Pithecellobium dulce, Cassia tora

9.      

Spotless grass yellow

Eurema laeta

Cassia pumila

10.   

Small grass yellow

Eurema brigittav

Cassia pumila

11.   

Common emigrant

Catopsilia pomona

Cassia siamea, C. fistula

12.   

Mottled emigrant

Catopsilia pyranthe

Cassia siamea, C. occidentalis

13.   

Psyche

Eptosia nina

Capparis sepiaria

14.   

Pioneer

Belenois aurota

Capparis sepiaria, C. decidua

15.   

Little orange-tip

Colotis etrida

Capparis decidua, Maerua oblongifolia

16.   

White orange-tip

Ixias marianne

Capparis sepiaria, C. decidua

17.   

Yellow orange-tip

Ixias pyrene

Capparis sepiaria

18.   

Common gull

Cepora Nerissa

Capparis sepiaria, C. decidua

19.   

Common jezebel

Delias eucharis

Dendrophthoe falcata

20.   

Western striped albatross

Appias libythea

Maerua oblongifolia, Crateva spp.

21.   

Large salmon arab

Colotis fausta

Maerua oblongifolia

22.   

Tiny grass blue

Zizula hylax

Ruellia patula, R. prostata

23.   

Grass Jewel

Fregyeria putii

Indigofera linnaei, Indigofera cordifolia

24.   

Pea blue

Lempides boeticus

Butea monosperma, Lablab purpureus

25.   

Zebra blue

Leptotes plinius

Plumbago zeylanica, Albizia lebbek

26.   

Gram blue

Euchrysops cnejus

Euchrysops cnejus

27.   

Forget-me-not

Ccotochrysops strabo

Butea monosperma, Tephrosia purpurea

28.   

Striped pierrot

Tarucus nara

Ziziphus mauritiana, Ziziphus nummularia

29.   

Black-spotted pierrot

Tarucus balkanicus

Ziziphus mauritiana

30.   

Common pierrot

Castalius rosimon

Ziziphus mauritiana

31.   

Red pierrot

Talicada nyseus

Bryophyllum pinnatum, Kalanchoe spp.

32.   

Lime blue

Chilades lajus

Citrus limon, Citrus spp.

33.   

Small cupid

Chilades parrhasius

Prosopis cineraria, Acacia leucophloea

34.   

Plains cupid

Chilades pandava

Cycas revoluta

35.   

Indian cupid

Everes lacturnus

Desmodium gangeticum

36.   

Lesser grass blue

Zizina otis

Alysicarpus vaginalis, Desmodium triflorum

37.   

Dark grass blue

Zizeeria karsanadra

Amaranthus viridis, Tribulus terrestris

38.   

Pale grass blue

Pseudozizeeria maha

Oxalis corniculate

39.   

African babul blue

Azanus jesous

Acacia leucophloea

40.   

Bright babul blue

Azanus ubaldus

Acacia nilotica, Acacia leucophloea

41.   

Tailless lineblue

Prosotas dubiosa

Pithecellobium dulce, Prosopis cineraria

42.   

Indian red flash

Rapala airbus

Acacia leucophloea, Butea monosperma

43.   

Common silverline

Spindasis vulcanus

Clerodendrum phlomidis, Ziziphus mauriatiana

44.   

Common shot silverline

Spindasis ictis

Clerodendrum phlomidis, Ziziphus mauriatiana

45.   

Plumbeous silverline

Spindasis schistacea

Acacia spp.

46.   

Common cerulean

Jamides celeno

Pongamia pinnata

47.   

Common guava blue

Virachola Isocrates

Psidium guajava

48.   

Plains blue royal

Tajuria jehana

Dendrophthoe falcata

49.   

Indian sunbeam

Curetis thetis

Pongamia pinnata, Abrus precatorius

50.   

Danaid eggfly

Hypolimans misippus

Portulaca oleracea, Elytraria acaulis

51.   

Great eggfly

Hypolimans bolina

Sida rhombifolia, Rungia spp.

52.   

Blue pansy

Junonia orithya

Lindenbergia muraria, Ruellia prostate

53.   

Lemon pansy

Junonia lemonias

Barleria prionitis, Ruellia tuberosa

54.   

Peacock pansy

Junonia almana

Phyla nodiflora, Hygrophila auriculata

55.   

Yellow pansy

Junonia hierta

Barleria prionitis, Ruellia tuberosa

56.   

Grey pansy

Junonia atlites

Hygrophila auriculata

57.   

Chocolate pansy

Junonia iphita

Barleria cristata

58.   

Painted lady

Vanessa cardui

Echinops echinatus

59.   

Black rajah

Charaxes solon

Tamarindus indicus, Pithecellobium dulce

60.   

Anomalous nawab

Charaxes agrarius

Acacia catechu

61.   

Common evening brown

Melanitis leda

Oryza sativa, Sorghum spp.

62.   

Common three-ring

Ypthima asterope

Cynodon dactylon

63.   

Common four-ring

Papilio demoleus

Cynodon dactylon

64.   

Baronet

Symphaedra nais

Diospyros melanoxylon

65.   

Common sailer

Neptis hylas

Desmodium spp.

66.   

Common castor

Ariadne merione

Ricinus communis, Tragia plukenetii

67.   

Tawany coster

Acraea terpsicore

Passiflora foetida, P. incarnata

68.   

Common leopard

Phalanta phalantha

Flacourtia indica

69.   

Plain tiger

Danaus chrysippus

Calotropis gigantea, Pergularia daemia

70.   

Striped tiger

Danaus genutia

Ceropegia bulbosa

71.   

Common Indian crow

Euploea core

Carissa carandas, Nerium oleander

72.   

Blue tiger

Tirumala limniace

Dregea volubilis

73.   

Indian palm bob

Suastus gremius

Cocos nucifera, Phoenix sylvestris

74.   

Rice swift

Borbo cinnara

Cymbopogen spp., Echinochloa colona

75.   

Small branded swift

Pelopidas mathias

Zea mays, Oryaza sativa

76.   

Swift sp.

Parnara sp.

Setaria spp., Oryaza sativa

77.   

Common banded awl

Hasora chromus

Pongamia pinnata

78.   

Brown awl

Badamia exclamationis

Terminalia bellirica

79.   

Indian skipper

Spialia galba

Waltheria indica, Sida spinosa

80.   

Zebra skipper

Ernsta zebra

Melhania futteyporensis

81.   

Pale palm- dart

Telicota colon

Saccharum officinarum

82.   

Spotted small flat

Sarangesa purendra

Lepidagathis trinervis

83.   

Tricolor pied flat

Coladenia indrani

Mallotus phillipensis

Many nectar providing species like Adhatoda vasica, Calotropis gigantea, C. procera, Salvia spp., Euphorbia nerifolia, Euphorbia caducifolia, Eharatia laevis, Clerodendron phlamoides, Asclepias curassavica, Buddleia davidii, Vernonia spp., Zinnia spp., Lavender, Marigold, Sunflower, Daisy, Dandelion, Tridex procumbens, Leucas aspera, Anisomeles indica, Leonotis nepetiifolia, Stachytarpheta jamaicensis etc. are also planted in beds and pots to attract the butterflies to feed.

Like butterfly park, other thematic parks like climber park, bush park (shrubbery), euphorbia park, ficus park, ziziphus park, grass park (grassetum), bamboo park (bambusetum), fern park (fernery), rose park (rosery), orchid park (orchidarium) etc. should be developed and maintained regularly for awareness and nature education. 

Dr. Satish Kumar Sharma

Assistant Conservator of Forests (Retd.)

14-15, Chakri Amba, Rampura Circle, Jhadol Road

Post – Nai, Udaipur – 313031, Rajasthan

email: sksharma56@gmail.com

कदम तालाब

कदम तालाब

देश के ग्रामीण अंचलों में जगह-जगह तालाब (जोहड) मिलते हैं जिनका आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक महत्व तो है ही उनका पारिस्थतिकीय महत्व भी कम नहीं है। इन ग्रामीण तालाबों का कैचमेन्ट आस -पास का क्षेत्र होता है तो कई बार कैचमेन्ट जलाशय से काफी दूर भी स्थित होता है। ऐसी स्थिति में दूरस्थ कैचमेन्ट को जलाशय से कोई न कोई नाला जोड़ने का काम करता है। आस-पास के कैचमेन्ट वाले जलाशयों का पानी प्रायः सभी दिशाओं से बहता हुआ जलाशय में पहुँच कर जमा होता रहता है लेकिन दूरस्थ कैचमेन्ट की स्थिति में कैचमेन्ट का जल नाले के रास्ते से बहता हुआ जलाशय में पहुँचता है। (चित्र 1.1 एवं 1.2)

Picture 1 Kadam Talab with catchment

चित्र 1.1: स्थानीय कैचमेन्ट युक्त तालाब

Picture 2 Kadam Talab with Satellite catchment

चित्र 1.2: एक तालाब, दूर स्थित कैचमेन्ट से, नाले से जुड़ा हुआ। 

नोट: (S=सीढी/घाट, T=धार्मिक स्थल, I=द्वीप, V= गाँव, P= रास्ता, SP= अतिरिक्त जल निकासी हेतु ओटा, N= नाला, TT= वनस्पतियां, R=चट्टानों के टुकडे, D= पाल/तट बन्ध, M=मार्सी क्षेत्र)

गाँव के तालाबों के पानी को रोके रखने हेतु उन पर ढाल की तरफ अर्धचंद्राकार या गोलाकार मिट्टी के तटबन्ध बनाये जाते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में ’पाल’ (embankment) कहा जाता हैं। पाल पर कई बार तरह – तरह के वृक्ष भी लगाए जाते हैं या अपने आप उग आते हैं जिन्हें पाल वृक्ष (embankment trees) कहा जाता है।

तालाबों, एनीकटों व बांधो के मिट्टी की बनी पाल या तटबन्धों पर कोई देव स्थान, नहाने के घाट, उतरने-चढ़ने की सीढ़ियाँ, खुर्रे या रपट, ओटा (spill over) आदि विद्यमान हो सकते हैं। पाल वृक्ष, पाल की मिट्टी को बाँध कर रखते हैं तथा बहते वर्षा जल व हवा से उसे कटने से बचाते हैं एवं तटबन्ध को सुरक्षा प्रदान करते हैं। पाल वृक्षों की वजह से तालाबों की सुन्दरता तो बढती ही है उनकी छाया में पालतू व वन्य पशु तथा मनुष्य विश्राम करते हैं। पाल वृक्षों से चारा, फल, फूल, शहद, गौंद, ईंधन, आदि लघु वन उपज भी मिलते हैं। पाल वृक्षों पर तरह – तरह के पक्षी, लंगूर, बंदर, गिलहरी, गिरगिट, बागल, बिज्जू (civet) आदि बसेरा करते हैं एंव प्रजनन भी करते हैं। पाल वृक्ष के कोटरों में उल्लू, बसंता, मैना, टिट आदि पक्षी प्रजनन से लेकर रात्रि विश्राम करते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में मेलों व धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन प्रायः तालाबों के पास होता है एवं इन कार्यों हेतु पाल वृक्ष बहुत काम आते हैं। गाँव के बच्चों द्वारा वृक्षों पर झूले डाले जाते हैं। वन क्षेत्रों से दूर ये तालाब एक अच्छे “वाटर होल” (water hole) की भूमिका भी निभाते हैं तथा वनों से दूर खेतों, पडत, बंजर व चारागाहों में रहने वाले वन्यप्राणी यहां पानी पीने आते हैं। कई बार पाल वृक्षों पर बागलों (Flying Fox-Pteropus gigenticus) की कॉलोनियां पाई जाती हैं। बागल भूमि पर उतर कर पानी नहीं पी सकती बल्कि वे उडते हुए ही पानी पीती हैं इसलिये उनको बडा व खुला जलाशय ही रास आता है। ये बागल परागण व प्रकीर्णन का कार्य कर प्रकृति में सकारात्मक भूमिका निभाती हैं।

पाल वृक्षों की विशेषतायें व सही प्रजातियों का रोपण हेतु चयन:

“पाल” वस्तुतः एक बड़ा मिट्टी का डौला (Bund or mound) है जिस पर मिट्टी का कटाव चलता रहता है। अतः पाल पर उगे वृक्ष की जडें भूमि क्षरण की वजह से आने वाले वर्षों में आंशिक रूप से नंगी हो जाती हैं तथा दिखने लग जाती हैं। समय-समय पर ग्रामीण अपने श्रम से या किसी सरकारी योजना अन्तर्गत तालाब को गहरा करने हेतु, मिट्टी खोद कर पाल पर डालते हैं जिससे न केवल जडें बल्कि तने पर भी एक ऊँचाई तक मिट्टी चढा दी जाती है। मिट्टी की कमी व मिट्टी की अधिकता को फाइकस वंश (Genus Ficus) अच्छी तरह सहन कर सकता है। इस लिहाज से पीपल (Ficus religiosa), बरगद (Ficus benghalensis), गूलर (Ficus recemosa), पाखड (Ficus virens), पिपरानी (Ficus lambertiana), पलक या पिंपरी (Ficus amplecema), करंज (Pongamia pinnata) आदि पाल हेतु अधिक उपयुक्त प्रजातियां है एवं प्राय इनका रोपण भी काफी किया जाता है। कई जगह नीम, इमली, आम, देशी बबूल, रायण, महुआ, जामुन, खेजडी, इन्द्रधोक (Anogeissus sericea nummularia) आदि भी पाल पर रोपित किये जाते हैं या सुरक्षित रखे जाते हैं।

कदम – तालाब

धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्य हेतु कई बार ग्रामीणजन अपने गाँव के जलाशय की पाल पर न्यूनतम एक कदम (Mitragyna parvifolia) का पौधा भी लगाते हैं जो कालांतर में वृक्ष के रूप में पनप जाते हैं (चित्र 2.1 से 2.4)। कई बार एक से अधिक कदम वृक्षों को भी पनपाया जाता है। एक बार रोपण से तैयार होने पर गिरने वाले बीजों से नए कदम भी अपने आप पनपते रहते हैं। जिन तालाबों पर कदम प्रजाति का एक या अधिक वृक्ष “पाल वृक्ष” के रूप में विद्यमान हो उस तालाब को “कदम – तालाब” या “कदमा तालाब” कहा जाता है। पूर्वी राजस्थान में जगह – जगह कदम – तालाब देखने को मिलते हैं। अलवर जिले में मुण्डावर-बहरोड क्षेत्र में हुलमाणा कलाँ, गादली की ढाणी, बीजवाड चैहान, फौलादपुर, काँटी खेडी आदि गाँवों के कदम तालाब उल्लेखनीय हैं। पूर्वी राजस्थान के इस क्षेत्र से सटे व निरंतरता आगे तक हरियाणा राज्य के रेवाडी, झज्जर आदि जिलों के विभिन्न गाँवों में भी कदम तालाब देखने को मिलते हैं। कदम तालाबों में स्थानीय ग्राम एवं आस-पास के अन्य ग्राम जहाँ कदम तालाब उपस्थित नहीं है वहाँ की महिलाएं विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम श्रावण मास में कदम वृक्ष के नीचे संपन्न करती हैं। कई तरह के उपवासों में खाना घर से बनाकर महिलाएं गीत गाते हुए कदम तालाब पर पहुँचती हैं तथा कदम वृक्ष के नीचे बैठकर सामूहिक भोज कर उपवास खोलती हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।

Picture 1 Kadam Talab with catchment

चित्र 2.1: मित्रागायना पार्वीफोलिया: वर्षा काल में

Picture 2 Kadam Talab with Satellite catchment

चित्र 2.2: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पतझड काल में

चित्र 2.3: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प काल क्लोजअप

चित्र 2.3: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प काल क्लोजअप

चित्र 2.4: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प मुण्ड क्लोजअप

चित्र 2.4: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प मुण्ड क्लोजअप

कदम कुण्ड

कदम तालाब की तरह सामान्य कुण्डों के मुकाबले कदम कुण्ड भी धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों हेतु विशेष महत्व रखते हैं। पहाड़ों में जगह-जगह खोखले गड्ढेनुमा या गुफानुमा स्थान मिलते हैं जिन्हें “कुण्ड” कहा जाता है। कुण्डों में वर्ष प्रान्त या वर्षाकाल एवं सर्दी के मौसम में पानी विद्यमान रहता है। अजमेर जिले में पुष्कर में पास पंचकुण्ड, अलवर जिले में रेणागिरि गाँव के पास परशुराम कुण्ड, बडा बेरा कुण्ड, हनुमान कुण्ड; झुंझुनू जिले में लोहार्गल कुण्ड, चिराणा गाँव के “ताताकुण्ड” व “ठण्डाकुण्ड” आदि प्रसिद्ध हैं। यदि किसी कुण्ड के पास कदम (Mitragyna parvifolia) का वृक्ष उगा हो तो उसे “कदम कुण्ड” कहा जाता है। सीकर जिले में नीम का थाना कस्बे के पास छापोली गाँव में एक कदम कुण्ड बहुत प्रसिद्ध है। स्थानीय जनों द्वारा सामान्य कुंडों की तुलना में कदम कुण्ड में धार्मिक अनुष्ठान करने को प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे कुण्डों में विशेष रूप से श्रद्धालु स्नान करने को प्राथमिकता देते हैं जिनके पास कदम वृक्ष विद्यमान हो।

कदम रोपण

कदम या कदम्ब के नाम से दो वृक्ष प्रजातियां, मित्रागायना पार्वीफोलिया (Mitragyna parvifolia) (चित्र 2.1 से 2.4) तथा नियोलैमार्किया कदंबा (Neolamarckia cadamba) (चित्र 3.1 से 3.3) ज्ञात हैं। मित्रागायना पार्वीफोलिया जिसे कलम नाम से भी जाना जाता है, लेकिन बोल- चाल में ‘कदम’ नाम ही अधिक प्रचलित हैं। प्राकृतिक रूप से यह प्रजाति राजस्थान के पहाड़ी वनों में जगह-जगह देखने को मिलता है जबकि नियोलैमार्किया कदंबा प्राकृतिक रूप से राजस्थान में नहीं पाया जाता। यह प्रजाति जहाँ भी राजस्थान में देखने को मिलती है किसी न किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा रोपित की गई होती है। मित्रागायना पार्वीफोलिया सामान्यता पहाड़ों से दूर नहीं मिलती। प्राचीन समय में पौधशालाओं का भी अभाव था अतः पुराने समय में ग्रामीण लोग पहाडी वन क्षेत्र से वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से उगे कदम के छोटे पौधों को मिट्टी के पिण्ड सहित खोद कर लाते थे तथा अपने गाँव के तालाब की पाल पर रोपित करते थे एवं समय-समय पर पानी पिलाकर उसे बडा होने देते थे। इस दौरान बाडबन्दी कर उसे गाँव के पशुओं से चराई व रौंदने से सुरक्षा प्रदान करते थे। इस तरह ग्रामीण अपने गाँव के सामान्य तालाब को एक कदम तालाब बना देते थे। गाँव का कोई भी व्यक्ति तालाब के कदम वृक्ष को नुकसान नहीं पहुँचाता था। समय के साथ बढ़े हुए कदम वृक्ष के बीज गिर कर नए कदम वृक्ष पनपाने लगते थे। आस – पास के लोग अब किसी पर्वतीय वन से नहीं बल्कि किसी गाँव के तालाब से नया कदम पौधा लेकर दूसरे तालाब पर रोपित करते रहते थे। इस तरह इस प्रजाति का फैलाव वन क्षेत्र से दूर होता रहता था। लेकिन समय के साथ कदम वृक्ष रोपण का सिलसिला लगभग समाप्त हो गया है। आज जो भी कदम गाँव में तालाबों के तट पर नजर आते हैं वे तीन – चार पीढ़ियों पहले तक के ही नजर आते हैं।

चित्र 3.1: नियोलैमार्किया कदंबा वृक्ष

चित्र 3.1: नियोलैमार्किया कदंबा वृक्ष

चित्र 3.2: नियोलैमार्किया कदंबा पुष्प काल में

चित्र 3.2: नियोलैमार्किया कदंबा पुष्प काल में

चित्र 3.3: नियोलैमार्किया कदंबा पुष्प

चित्र 3.3: नियोलैमार्किया कदंबा पुष्प

राजस्थान के तालाबों के तट पर विशेष रूप से संरक्षित किये जाने वाले कदम तथा इन्द्र धोक (Anogeissus sericea var. nummularia) दो खास वृक्ष हैं। इन्द्र धोक राजस्थान के अनेक भागों में, खास तौर से पश्चिमी राजस्थान के अर्द्ध – शुष्क क्षेत्र के तालाबों के तट पर पाया जाता है तथा समाज द्वारा सदियों से संरक्षित किया जा रहा है। राजस्थान के तालाब तटों पर बरगद, पीपल एवं नीम भी विशेष रूप से पाये जाते हैं जिनका महत्व सर्व विदित है। हमें तालाबों की पालों पर वृक्षो को लगाने, बचाने व संरक्षित करने की परंपरा को ससम्मान बचाये रखना चाहिए।

राजस्थान में तालाबों, जोहडों, नाडियों, बावडियों, केवडियों आदि परंपरागत जल संरक्षण संरचनाओं का सदियों से महत्व रहा है। तालाबों के कई आकार – प्रकार एवं नामकरण भी प्रचलन में रहे हैं। जिस तरह कदम की उपस्थिति से कोई तालाब कदम तालाब के रूप में जाना जाता है उसी तरह कमल यानि पदम की उपस्थिति से कई तालाब “पदम तालाब” का खिताब पाते रहे हैं। हमें जतनपूर्वक अपने तालाबों को बचाकर अच्छी प्राचीन परम्पराओं को अगली पीढ़ी को सौंपने में गर्व महसूस करना चाहिये।

सतीश कुमार शर्मा

राजस्थान वन सेवा (सेवा निवृत)

14-15, चकरिया आम्बा, रामपुरा चैराहा, झाडोल रोड़

पोस्ट – नाई, उदयपुर – 313031, राजस्थान, भारत

sksharma56@gmail.com

कीडी नगरा

कीडी नगरा

क्या आपने कभी सुना है गाँवों में बने ‘कीडी नगरा’ के बारे में, जहाँ इंसान चींटियों के लिए बाड़ा बनाते हैं और खाना परोसते हैं? यह अनोखी परंपरा राजस्थान की संस्कृति और प्रकृति के रिश्ते की दिलचस्प कहानी है।

चींटियाँ, मधुमक्खियाँ, एवं ततैये हाईमिनोप्टेरा गण के सदस्य कीट हैं इनके झिल्ली जैसे पंखो के आर-पार देखा जा सकता है। तितलियों की तरह इनके पंखों पर स्केल नहीं होते। इनके अग्र जोडी पंख बडे एवं पश्च जोडी पंख आकार में छोटे होते हैं। इस वर्ग के कीटों के जबडे कुछ बडे व अच्छी तरह विकसित होते हैं। इस गण के कीट अकेले न रहकर एक बडे परिवार के रूप में सामाजिक जीवन यापन करते हैं।

मधुमक्खियों व ततैयों में हर समय शरीर पर पंख पाये जाते हैं जबकि लैंगिक रूप से प्रौढ, परिपक्व एवं प्रजनन क्षमता युक्त चींटियों में प्रजनन काल में ही पंख आते हैं। नर – मादा के मिलन के बाद दीमकों की तरह पंख झड कर गिर जाते हैं। चींटियों के एक ही परिवार में कई तरह के विशिष्ट सदस्य पाये जाते हैं जो काॅलोनी में अलग – अलग तरह का कार्य संपादित करते हैं। चींटियों की यह बहुरूपता अद्भुत होती है। कुछ प्रजातियों में तो बहुरूपों की संख्या 29 तक पहुँच जाती है। फिर भी 4 बहुरूप श्रमिक, सैनिक, उर्वर मादा एवं उर्वर नर सबसे आम व जाने पहचाने होते रूप होते हैं। चींटियों का अध्ययन एक विशेष विज्ञान में किया जाता है जिसे चींटी विज्ञान (Myrmecology) कहते हैं।

राजस्थान में वन्यजीवों के संरक्षण की परंपरा कीडी यानी चींटी जैसे छोटे से प्राणी से प्रारंभ होती है और बाघ जैसे बडे प्राणी तक पहुँच जाती है। ऐसी संरक्षण की विविधता राजस्थान की लोक संस्कृति में सदियों से चली आ रही है। हमारे राज्य में चींटी तक को मारना पाप समझा जाता है।

राजस्थान के गाँवों में चींटी को कीडी नाम से जाना जाता है। चींटी लोक कहावतों में भी स्थान रखती है। कोई सामान्य सा व्यक्ति अपने बूते से कुछ बडा करने की बात कहे या बडी-बडी डींगें हाँके या दुःसाहस करे तो उसे “चींटी के भी पर निकलने लगे हैं” जैसे मुहावरे से वर्णित-मंडित किया जाता है।

राजस्थान में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ चीटियाँ नहीं हों। हर गाँव में चींटियाँ मिल ही जाती हैं। कुछ जगह तो चीटियों के प्राचीन बिल मिलते हैं जिनमें लाखों चींटियाँ निवास करती हैं। ये बिल वहाँ कब से हैं कोई नहीं जानता। स्थानीय बुजुर्गों से पूछो तो बतायेंगे – साब मैं तो इनके इस बिल को मेरे जन्म से यहीं देख रहा हूँ। चींटियों के बिल, उनमें निवास करने वाली चीटियाँ और उनके आने-जाने से बने रास्ते सब मिला कर चीटियों का एक नगर जैसा होता है। चींटियों की छोटी, मध्ययम और बडी बस्तियाँ प्रकृति में जगह-जगह देखने को मिलती हैं। चींटियों की छोटी एवं मध्ययम बस्तियाँ तब तक ध्यान आकर्षित नहीं करती जब तक की वे बडी न हो जायें। बडी होने पर उनके चलने के पथ एक सँकरी सी, साफ-सुथरी सडक जैसी दूर से ही नजर आने लगती हैं। आते-जाते लोग चींटी पथ पर पैर नहीं रखते तथा लाँघ कर ही अपना आगे का रास्ता चलते जाते हैं। ये चींटी पथ सीधे, दूर तक अशाखित, एक समान चैडाई वाले या कई बार कुछ दूर जाकर घुमावदार व सँकरे भी हो जाते हैं यानी ये कई आकार के एवं अलग-अलग चैडाई के हो सकते हैं। आने एवं जाने, दोनों दिशाओं का ’’ट्रैफिक’’ उसी एक रास्ते पर चलता है। हमारी तरह चींटियों को दायें एवं बायें का ज्ञान नहीं होता है वे रास्ते की चौडाई के अन्दर रहते हुऐ कहीं से भी अपना रास्ता बना सकती हैं। चींटी पथ पर वे अपना भोजन मुँह में दबाये, बिल की तरफ आती हुई नजर आती हैं तथा भोजन के दानें व दूसरी वस्तुऐं बिल के भण्डार गृह में जमा कर वे बिना सुस्ताए फिर से अगले फेरे के लिये फिर निकल पडती हैं। यह सारा कार्य श्रमिक वर्ग की चींटियों को करना पडता है। चींटी पथ पर ’’चींटियों का ट्राफिक’’ ऐसा लेगता है मानों सडक पर कुछ ट्रक लोड लेकर भरे हुये आ रहें तो कुछ लोड भरने के लिए खाली जा रहे हैं। जो काम हमारे लिये हमारे हाथ करते हैं वही काम चीटियों के जबडे उनके लिये करते हैं। वे भार को जबडों से पकड कर ’’चीटीं पथ’’ पर चलती हैं। यदि वस्तु भारी है तो कई चींटियाँ मिल कर भार को खींचती हैं। कहा जाता है, चींटी अपने शरीर के वजन से भारी वजन खींचने की क्षमता रखती हैं। श्रमिक चींटियों का एक दल वहीं बिल में खुदाई-सफाई के कार्य में मशगूल नजर आता है।

एक ही परिवार की चींटियों का यह विशाल कुनबा हर किसी का ध्यान आकर्षित करता है। बिल, चींटी परिवार तथा दूर-दूर तक ’’चींटी पथों’’ का यह जाल राजस्थान में ’’कीडी नगरा’’ या ’’कीडीनारा’’ के नाम से जाना जाता है। कीडी नगरा चींटियों का एक ऐसा नगर है जैसा हम मनुष्यों का नगर होता है। हमारे नगरों में भी भवन, बाशिंदे, सडके और न जाने क्या – क्या चीजें विद्यमान होती हैं। यही नही, एक पूरी कानून व्यवस्था एवं नियम पालन सदाचार भी हमारे नगरों की व्यवस्था का एक हिस्सा होती हैं। ऐसे ही नियम कायदे एवं उनका पालन किसी भी कीडी नगरा का अहम हिस्सा होते हैं।

चींटियों को मोटे तौर पर 3 वर्गो में बाँट सकते हैंः

  1. भूमि पर रहने वाली चीटियाँ
  2. वृक्ष के तनो पर रहने वाले चींटियाँ
  3. वृक्षों की पत्तियों में घौंसला बना कर रहने वाली चींटियाँं।

वृक्षों के तनो पर रहने वाली चीटियों के अनेक प्रकार हैं। कुछ तने पर रहती हैं तथा आकार में बडी व मोटी होती हैं तथा काले रंग की होती हैं जिनको राजस्थान में जगह-जगह ’’मकोडा’’ नाम से जाना जाता है। कुछ चीटियाँ वृक्ष के तने के ऊपरी भागो में गोलाकार गुम्बद जैसी रचना बना कर उसमें निवास करती हैं जो क्रीमेटोगास्टर वंश (Crematogaster Genus) में वर्गीकृत की गयी है। लाल चीटिंयाँ (Oecophylla smaragdina) पत्तों को आपस में जोड व सिलाई कर उनमें घौंसला बना ऊपर वृक्षों पर निवास करती हैं। हाँलाकि वे वृक्षों से नीचे भी उतरती हैं लेकिन अपना कार्य पूर्ण कर वापिस ऊपर घौंसले में चली जाती हैं। वृक्ष के तने व पत्तों में रहने वाली चीटिंयाँ ’’कीडी नगरा या कीडी नारा’’ बस्ती नहीं बनाती।

भूमि पर अनेक प्रजातियों की चींटियों का निवास है लेकिन जो चींटियाँ बडा कुनबा बना कर अनाज के दानों को भी बिलों में ले जाकर भण्डारित करने व खाने की शौकीन होती हैं वे चींटियाँ कीडी नगरा के रूप में जानी – पहचानी जाती हैं। राजस्थान में जगह- जगह कीडी नगरा मिल जायेंगे। कई जगह तो बाकायदा बोर्ड लगाया जाता हैं। कई जगह बोर्ड नहीं भी होते। कई जगह बाकायदा काँटेदार तारों या दूसरी तरह की बाड लगाई जाती है ताकी पालतू व जंगली प्राणी कीडी नगरा को रौंदे नहीं। पश्चिमी राजस्थान में कीडी नगरा जगह-जगह ग्रामीण अँचल में देखने को मिल जाते हैं।

राजस्थान के लोग जिस तरह जगह-जगह पक्षियों को दाना-पानी व अन्य जीवों हेतु भोजन, पानी व शरण देने के स्थान बनाते हैं, उसी तरह चीटीयों को भी अनाज, अनाज का दलिया, चीनी, गुड के छोटे-छोटे टुकडे आदि खाद्य पदार्थ प्रातःकाल में बिल के आस-पास फैलाते हुये बिखेरे जाते हैं। कई जगह मोटा पिसा आटा भी चुग्गे के रूप में चींटियों के बिल के आस – पास शृद्धापूर्वक डाला जाता है। लोग स्वयं व अपने परिवार जनों के साथ चींटियों के बिलों के पास चुग्गा डालने आते हैं। यदि अधिक मात्रा में भोजन देना है तो एक दिन में डालकर उसे खराब नहीं किया जाता बल्कि कीडी नगरा के संचालक-प्रबंधक की भूमिका निभाने वाले व्यक्ति को कीडियों का भोजन या भोजन की कीमत जमा करा दी जाती है। प्रबंधक का फोन नम्बर बोर्ड पर अंकित रहता है। शृद्धालु बोर्ड पर अंकित नम्बर पर फोन कर प्रबंधक तक पहुँच जाता है तथा चींटियों को भोजन आपूर्ती का जिम्मा प्रबन्धक को लेकर स्वयं निवृत हो जाता है। 

चित्र 1: कीडी नगरा प्रबंधक द्वारा लगाया गया बोर्ड

चित्र 2: कई जगह कीडी नगरा काॅलोनी को पशु रौंद कर नुकसान पहुँचाते हैं अतः सुरक्षा हेतु फैंसिंग तक की जाती है।

लोगों का मत है यदि चींटियों को उनके आवास के आस-पास ही भोजन मिल जायेगा तो वे घरों, खेतों, खलिहान व गोदामों की तरफ रूख नहीं करेंगी जिससे उनमें दूर जाकर कहीं भोजन की तलाश में किसी एक परिवार या जगह को नुकसान पहुँचाने की संभावना नहीं रहेगी। साथ ही वे जगह-जगह मार्गों पर कुचल कर मरने से भी बचेंगी। चींटियाँ बीज व फल प्रकीर्णन, परागण, छोटे कीटों का नियंत्रण के साथ-साथ अपने बिलों द्वारा भूमी की गहराईयों में वायु संचार करती हैं। भूमि में संचारित वायु वृक्षों, झाडियों जैसी वनस्पतियों की जडों को, जो गहराई तक पहुँच जाती हैं, उन्हें स्वश्न हेतु ऑक्सीजन उपलब्ध कराती हैं। इसी का कमाल है कि पेड पौधे हरे – भरे रहकर हमें ऑक्सीजन, फल-फूल, बीज, चारा, लकडी और न जाने क्या – क्या उत्पाद उपलब्ध कराते हैं।

यों तो राजस्थान में अनगिनत कीडी नगरा हैं लेकिन पाली जिले में गढवाडा, सिणगारी, दुदली आदि गाँवों में जाकर कीडी नगरा व उनके प्रबंधन को देखा व समझा जा सकता है। कुछ जगह जैसे तालछापर अभयारण्य के कीडीनगरा तो और भी दर्शनीय हैं। तालछापर के कीडी नगरा के चीटीं मार्ग बिल को केन्द्र मानते हुये एक तरफ 200-300 मीटर लम्बे व कहीं- कहीं तो इससे भी अधिक दूर तक पहुँच जाते हैं जिन पर हजारों चीटियाँ एक साथ आना-जाना करती हैं। कुछ कीडी नगरा तो तालछापर में इतनें विशाल हैं कि एक कीडी नगर में हजारों नहीं लाखों चींटियाँ होती हैं। इस अभयारण्य में आने वाले पर्यटकों को वन कर्मी सावधानी से इस तरह घुमाते हैं कि कीडी नगरा की चींटियों को कुचलने से बचाया जा सके।

चित्र 3: सूखे मौसम में तालछापर अभयारण्य में एक अशाखित चींटी पथ पर गतिमान चींटियों का ट्राफिक 

चित्र 4: तालछापर अभयारण्य में एक शाखित चींटी पथ

वन्यजीवों को मानवीय या मानवों द्वारा भोजन दिया जावे या नहीं इस पर बहस होती रहती है। लोगों के पक्ष और विपक्ष में विचार सुनने – पढने को मिल जाते हैं। यदि कुछ देर इस बहस से अलग होकर देखें तो यह स्पष्ट महसूस होता है कि राजस्थानी लोग बडे- बडे वन्य प्राणी ही नहीं, चींटी जैसे छोटे प्राणी को भी संरक्षित -सुरक्षित करते रहे हैं और इतनी आधुनिकता आ जाने के बाद भी समाज के ये मूल्य आज भी अक्षुण हैं जो वन्यजीव संरक्षण की आस जगाये हुये हैं।

चित्र 5: तालछापर अभयारण्य में एक चींटी पथ कर क्लोज अप

सतीश कुमार शर्मा

राजस्थान वन सेवा (सेवा निवृत)

14-15, चकरिया आम्बा, रामपुरा चैराहा, झाडोल रोड़

पोस्ट – नाई, उदयपुर – 313031, राजस्थान, भारत

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वल्चर सेफ ज़ोन: गिद्धों को बचाने की एक पहल

वल्चर सेफ ज़ोन: गिद्धों को बचाने की एक पहल

गिद्ध, हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के अभिन्न अंग हैं, जो सफाईकर्मी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, बीते कुछ दशकों में गिद्धों की आबादी में खतरनाक गिरावट आई। गिद्धों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाना उनके संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

गिद्ध, प्रकृति के सफाईकर्मी के रूप में जाने जाते हैं, ये मृत जानवरों को खाकर पर्यावरण को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से, विश्वभर में गिद्धों की संख्या पिछले तीन दशकों में चिंताजनक रूप से कम हुई है और इस गिरावट से राजस्थान भी अछूता नहीं रहा। हालांकि हाल ही में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार भारत में गिद्धों की संख्या स्थिर हुई है, लेकिन बढ़ नहीं रही है।

भारतीय गिद्धों का एक समूह (फ़ोटो: बनवारी यदुवंशी)

भारत में कभी नौ गिद्धों की प्रजातियाँ पाई जाती थीं, जिनमें से तीन – वाईट-रम्प्ड गिद्ध (Gyps bengalensis), भारतीय गिद्ध (Gyps indicus) और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध (Gyps tenuirostris) – गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं।

इन नौ प्रजातियों में शामिल हैं: लॉन्ग-बिल्ड गिद्ध (Gyps indicus), स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध (Gyps tenuirostris), वाईट-रम्प्ड गिद्ध (Gyps bengalensis), हिमालयन ग्रिफॉन (Gyps himalayensis), यूरेशियन ग्रिफॉन (Gyps fulvus), सिनेरियस गिद्ध (Aegypius monachus), रेड-हेडेड गिद्ध (Sarcogyps calvus), इजिप्शियन गिद्ध (Neophron percnopterus), और  बेयरडेड गिद्ध (Gypaetus barbatus)

राजस्थान, अपने शुष्क वनों और खुले मैदानों के कारण, गिद्धों के लिए महत्वपूर्ण आवास स्थल है। यहाँ बेयरडेड गिद्ध और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध को छोड़कर बाकी सातों प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से चार प्रजातियाँ निवासी हैं और यहीं प्रजनन करती हैं, जबकि तीन अन्य प्रजातियाँ प्रवासी पक्षी के रूप में ऑक्टोबर से मार्च के महीनों में यहाँ देखी जाती हैं, कभी-कभी अप्रैल के मध्य तक भी यहाँ देखी जा सकती हैं। राजस्थान में पाए जाने वाले प्रवासी गिद्धों की प्रजातियों में हिमालयन ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन, और सिनेरियस गिद्ध शामिल है।

कोटा ज़िले में स्थितः भारतीय गिद्ध का ब्रीडिंग और नेस्टिंग साइट (फ़ोटो: बनवारी यदुवंशी)

यहाँ ध्यान दें कि गिद्धों की संख्या में तेजी से गिरावट आने का कारण मुख्य रूप से पशुओं में इस्तेमाल की जाने वाली स्टेरॉयडमुक्त प्रज्वलनरोधी (NSAIDS) दवाएँ थी। नसाइड्स दवाओं में भी डाईक्लोफेनाक का उपयोग गिद्धों के अस्तित्व के लिए घातक साबित हुआ। डाईक्लोफेनाक को पशुओं के लिए दर्द निवारक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जो की मृत पशुओं के अवशेषों में रह जाता और जब गिद्ध इन मृत जानवरों को खाते तो डाईक्लोफेनाक उनके शरीर में प्रवेश कर उनके गुर्दे की कार्यक्षमता को नष्ट कर देता जिससे उनकी मृत्यु हो जाती थी।

डाईक्लोफेनाक के उपयोग से मुख्य रूप प्रभावित प्रजातियों में वाईट-रम्प्ड गिद्ध, भारतीय गिद्ध और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध शामिल थे। इन तीन प्रजातियों की आबादी में 95% से अधिक की गिरावट आई थी। अन्य प्रजातियाँ भी कम संख्या में पाई जाती हैं, जिससे गिद्धों के पारिस्थितिक कार्यों पर व्यापक प्रभाव पड़ा, और शहरों और गाँव में मृत जीवों के शव कई दिनों तक सड़ते हुए देखे जाने लगे।

डाईक्लोफेनाक को पशुओं के लिए दर्द निवारक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जो की मृत पशुओं के अवशेषों में रह जाता और जब गिद्ध इन मृत जानवरों को खाते तो डाईक्लोफेनाक उनके शरीर में प्रवेश कर उनके गुर्दे की कार्यक्षमता को नष्ट कर देता जिससे उनकी मृत्यु हो जाती थी। (फ़ोटो: प्रवीण)

गिद्धों के लिए अन्य खतरों में शामिल है उनके आवास का नुकसान। पेड़ों को काटना और चट्टानों को तोड़ना गिद्धों के घोंसले बनाने के लिए उपयुक्त स्थानों को कम कर देता है। दूसरा कारण है विद्युत लाइन। गिद्ध बड़े पंखों वाले पक्षी होते हैं, और वे अक्सर विद्युत लाइनों से टकराकर मारे जाते हैं। इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में, गिद्धों का उनके शरीर के अंगों के लिए अवैध रूप से शिकार किया जाता है, जिन्हें तांत्रिक क्रियाओं में इस्तेमाल करने की गलत धारणा है।

गिद्धों की इस चिंताजनक स्थिति को देखते हुए 2000 के दशक के मध्य में डाईक्लोफेनाक के पशु चिकित्सा उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया और साथ ही पशु चिकित्सकों को गिद्धों के लिए सुरक्षित दवाओं के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया गया। पूरे भारत की तरह, राजस्थान में भी डाईक्लोफेनाक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के बाद से गिद्धों की संख्या में मामूली सुधार तो हुआ है, लेकिन उनकी आबादी अभी भी अपने मूल स्तर से बहुत कम है।

गिद्धों के संरक्षण के लिए भारत सरकार और वन्यजीव संस्थाएं मिलकर कई प्रयास कर रही हैं जिनमें वल्चर सेफ ज़ोन (वल्चर सेफ़ ज़ोन), गिद्ध अभयारण्य, संरक्षण और प्रजनन केंद्र, और जागरूकता अभियान शामिल हैं।

गिद्ध अभयारण्य: “गिद्ध अभयारण्य” नामक विशेष क्षेत्रों की स्थापना की जा रही है। इन क्षेत्रों में पशुओं के मृत शरीरों को जहर रहित दवाओं से उपचारित किया जाता है ताकि गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन उपलब्ध हो सके। देश का एकमात्र गिद्ध अभयारण्य रामदेवरा बेट्टा हिल है, जो की कर्नाटक के रामानगर जिले में स्थित है।

संरक्षण और प्रजनन केंद्र: देश भर में कई गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों में घायल गिद्धों का उपचार किया जाता है और स्वस्थ गिद्धों को प्रजनन के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इन केंद्रों से भविष्य में जंगल में गिद्धों को छोड़ा जा सकता है। भारत में नौ गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र (वीसीबीसी) हैं, जिनमें तीन बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) और बाकी सेंट्रल जू अथॉरिटी द्वारा प्रशासित हैं:

  • पिंजौर, हरियाणा: 2001 में गिद्ध देखभाल केंद्र के रूप में स्थापित, यह 2004 में भारत का पहला वीसीबीसी था
  • राजभटखावा, पश्चिम बंगाल: 2005 में स्थापित
  • रानी, ​​गुवाहाटी, असम: 2007 में स्थापित
  • केरवा, वन विहार राष्ट्रीय उद्यान, भोपाल, मध्य प्रदेश: 2011 में स्थापित
  • हैदराबाद के नेहरू प्राणी उद्यान में हैदराबाद गिद्ध प्रजनन केंद्र
  • जूनागढ़ गिद्ध प्रजनन केंद्र , सक्करबाग प्राणि उद्यान, जूनागढ़
  • रांची गिद्ध प्रजनन केंद्र, मगरमच्छ प्रजनन केंद्र, मुटा, रांची
  • भुवनेश्वर गिद्ध प्रजनन केंद्र, नंदनकानन प्राणि उद्यान, भुवनेश्वर

भारत मे मौजूद गिद्ध प्रजनन केंद्र (वल्चर ब्रीडिंग सेंटर) (मैप: प्रवीण)

वल्चर सेफ ज़ोन (वीएसजेड): वल्चर सेफ़ ज़ोन न केवल गिद्धों को बचाने में महत्वपूर्ण हैं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी लाभदायक हैं। प्रत्येक वीएसजेड, गंभीर रूप से लुप्तप्राय गिद्ध प्रजातियों में से कम से कम एक प्रजाति के जीवित कॉलोनी पर केंद्रित होती है। वीएसजेड को 100 किमी (30,000 किमी 2 से अधिक) के दायरे वाले क्षेत्रों के रूप में परिभाषित किया गया है, और यह क्षेत्र ओरिएंटल व्हाइट-बैकड गिद्धों (SAVE, 2014) के रेंज के आधार पर निर्धारित किया गया है।

SAVE के अनुसार वीएसजेड में:

  • पशु चिकित्सा उपयोग के लिए दुकानों पर डाइक्लोफेनाक उपलब्ध नहीं होना चाहिए,
  • कम से कम 800 मवेशियों के शव के जिगर के नमूनों में कोई डाइक्लोफेनाक नहीं पाया जाना चाहिए,
  • वीएसजेड क्षेत्र के भीतर मृत गिद्धों में कोई डाइक्लोफेनाक या आंत संबंधी गठिया नहीं पाया जाना चाहिए,
  • वीएसजेड में गिद्धों की आबादी में स्थिरता या वृद्धि होनी चाहिए।

गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन की आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है। इसके लिए इन क्षेत्रों में मवेशी आश्रयों अथवा गौशालाओं के साथ मिलकर काम किया जाता है, जहाँ गिद्धों को खाने के लिए मृत गायों को उपलब्ध कराया जाता है।

कैलादेवी क्षेत्र में मौजूद गंभीर रूप से संकटग्रस्त भारतीय गिद्ध (फ़ोटो: प्रवीण)

अस्थायी गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (पीवीएसजेड): जब उपरोक्त मानदंड पूरे होते हैं तभी वीएसजेड पूरी तरह से स्थापित होता है। जब तक यह स्थापित नहीं होता की उक्त मानदंड पूरे हो गए हैं तब तक इन क्षेत्रों को अस्थायी गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (प्रविशनल वल्चर सेफ़ ज़ोन) माना जाता है।

वल्चर सेफ़ ज़ोन की शुरुआत: वर्ष 2011 में नेपाल ने स्थानीय समूहों और गैर सरकारी संगठनों का एक नेटवर्क विकसित करके वीएसजेड स्थापित करने का नेतृत्व किया, और डाईक्लोफेनाक के उपयोग में कमी और रोक सुनिश्चित करने के लिए गिद्धों के प्रजनन इलाकों के आसपास के क्षेत्रों में एक साथ काम किया।

नेपाल द्वारा वल्चर सेफ़ ज़ोन बनाने के लिए सबसे पहले गिद्धों के प्रजनन इलाकों के आसपास के क्षेत्रों से पशु चिकित्सा के लिए डाइक्लोफेनाक के सभी उपलब्ध स्टॉक को हटाया गया और इसकी जगह गिद्ध सुरक्षित दवा मेलॉक्सिकैम को स्थापित किया गया। यह बदलाव उन्होंने प्रजनन क्षेत्रों के 50 किमी की दूरी तक के दायरे में स्थापित किया।

डाइक्लोफेनाक को मेलोक्सिकैम से बदलने के बाद स्थानीय समुदाय के बीच एक व्यापक शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम चलाया। इस कार्यक्रम में गिद्धों के शवों को साफ करने की क्षमता के संबंध में जानकारी दी और यह भी बताया की किस प्रकार ये बीमारी के खतरों को कम करते हैं और कुत्तों की बढ़ती संख्या को भी नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इसके अलावा किसानों, पशुचिकित्सकों और फार्मासिस्टों के साथ कार्यशालाएँ आयोजित की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे डाइक्लोफेनाक के उपयोग से होने वाली समस्याओं के बारे में जानते हैं।

नेपाल के बाद भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी वल्चर सेफ़ ज़ोन के माध्यम से गिद्धों के इन-सीटू संरक्षण पर जोर दिया।

कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य गिद्धों की एक छोटी आबादी को संरक्षित करता है, जो की एक संभावित वल्चर सेफ़ ज़ोन भी घोषित किया जा सकता है (फ़ोटो: प्रवीण)

राजस्थान के गिद्ध संरक्षण के प्रयास: गिद्धों की आबादी के हिसाब से देखा जाए तो राजस्थान एशिया के गिद्धों के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। देश का सबसे बड़ा राज्य होने के साथ ही यहाँ 22 जिलों में गिद्धों का आश्रय पाया गया है, जिनमें निवासी और प्रवासी गिद्ध दोनों ही शामिल हैं। प्रवासी पक्षी (मुख्यतः ईगिप्शियन वल्चर) प्रजनन के लिए यहाँ घोंसलों का निर्माण कर प्रजनन करते हैं इसलिए यहाँ गिद्धों के संरक्षण के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाना आवश्यक है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए राजस्थान के संरक्षणवादी और गैर सरकारी संस्थाएँ काफी समय से राजस्थान में गिद्ध प्रजनन केंद्र की मांग कर रहे हैं।

गिद्ध संरक्षण के लिहाज से बीकानेर स्थित जोरबीड गिद्ध संरक्षण रिजर्व राजस्थान द्वारा किया गया एक सफल प्रयास है। हालांकि अभी तक इस क्षेत्र को वीएसजेड का दर्ज नहीं मिल पाया है।

गिद्ध संरक्षण के लिए काम कर रहे प्रोफेसर डॉ दाऊ लाल बोहरा ने जोरबीड को वीएसजेड घोषित करवाने हेतु यहाँ आ रहे मवेशियों के शवों जी जांच कारवाई और पाया की किसी भी शव के उपचार के लिए गिद्धों के लिए हानिकारक दवाओं का उपयोग नहीं किया गया बल्कि उनके लिए सुरक्षित दवाएँ ही उपयोग की गई हैं। इसके अलावा संदिग्ध जानवरों को कुत्तों के खाने के लिए रखा जाता है। साथ ही स्थानीय औषधि विक्रेताओं को जागरूक किया जा रहा है ताकि जल्द से जल्द इस क्षेत्र को वीएसजेड घोषित किया जा सके।

जोरबीड का गिद्धों के लिए महत्तव देखते हुए यहाँ आ रहे गिद्धों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिंगिंग और टैगिंग कार्यक्रम चलाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीएमएस सीओपी में भी राजस्थान के महत्तव और यहाँ गिद्ध संरक्षण के प्रयासों को और मजबूत करने हेतु चिंता जताई जा चुकी है। सीएमएस सीओपी उन पार्टियों का सम्मेलन है, जो जंगली जानवरों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर प्राथमिक निर्णय लेने और उनकी पालना सुनिश्चित करने के लिया बनाया गया है।

भारत में वल्चर सेफ ज़ोन: वीएसजेड के मुख्य लक्ष्य सभी देशों में समान हैं, हालांकि मॉडल अलग-अलग देशों में और यहां तक कि एक देश के भीतर भी भिन्न देखने को मिल जाते हैं। नेपाल ने वीएसजेड पर वर्ष 2011 में काम शुरू किया, जिसके बाद भारत ने 2012 के शुरुआत में काम शुरू किया। बांग्लादेश देश ने 2014 में काम शुरू किया और वीएसजेड को गजेट अधिसूचना के माध्यम से कानूनी दर्जा देने वाला पहला देश बन गया। जबकि नेपाल और भारत में वीएसज़ेड को कोई कानूनी दर्जा नहीं प्राप्त है। भारत में 9 चयनित क्षेत्रों को गिद्धों के लिए संभावित गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (वीएसजेड) के रूप में पहचाना गया है। ये सारे क्षेत्र गिद्ध प्रजनन केंद्रों को ध्यान में रखते हुए पहचाने गए हैं। हरियाणा में पिंजौर, पश्चिम बंगाल में राजाभटखावा, असम में माजुली द्वीप के आसपास, एमपी में बुक्सवाहा, यूपी में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान और कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य, झारखंड में हज़ारीबाग़, और गुजरात में सौराष्ट्र।

संरक्षणवादी एवं गैर सरकारी संस्थाएँ मौजूदा गिद्ध सुरक्षित क्षेत्रों को स्थापित एवं मजबूत करने और नए क्षेत्र बनाने के लिए काम कर रहे हैं। उम्मीद है कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में इस पहल से गिद्धों के संरक्षण में सफलता मिलेगी।

(कवर फ़ोटो (बनवारी यदुवंशी): कोटा के गैपरनाथ क्षेत्र के पास भारतीय गिद्धों का एक समूह

 

MENAR: An Ordinary Village Pond to an Important Bird Area Site and Beyond

MENAR: An Ordinary Village Pond to an Important Bird Area Site and Beyond

A few years back Menar was not so known in the area as it is known today. Menar is a small village on the Udaipur – Chittorgarh National Highway (NH 76), 50km away from Udaipur City. It is a Menaria Brahmin-dominated village. This village is well known for its cultural legacy. Two beautiful water bodies are present in this village nearly 1 km apart from each other which have created a new history in recent years. The small-sized waterbody is present towards the northwest outskirts of the village, called Braham Talab. A giant Lord Shiva statue is present on the embankment of this pond in a sitting posture. Another big-sized pond called Dhand Talab is present towards the southern end of the village near Menar – Bhinder Road. Both the ponds have beautiful earthen embankments. Many old, aged mango trees (Mangifera indica) are present on each embankment. A big-sized colony of a Megabat species, the Indian Flying Fox (Pteropus giganteus) is present among the Mango trees of Braham Talab.

Menar is known to protect its wetlands and avifauna. Village people are very pro-nature. They have been conserving their wetlands and birds since ancient times. Forest Department, Rajasthan started celebrating the “Udaipur Bird Festival” in 2014. Every year the birders participating in the Udaipur Bird Festival, reach Menar wetlands for bird watching. Local media also played a vital role in highlighting the conservation ethos and practices of the local community to protect their wetlands and avifauna. In 2016, the Bombay Natural History Society and BirdLife International notified both ‘Menar Ponds’ as an Important Bird Area (IBA). Presently, Rajasthan has 31 Important Bird Areas and Menar is one of them. More than 100 species are known from Menar village ponds and surrounding habitats. Many Critically Endangered, Vulnerable and Near Threatened species are known from waterbodies and surrounding terrestrial habitats as shown below:

Category Common English name of the bird Latin name
Critical EndangeredWhite-rumped VultureGyps bengalensis
EndangeredEgyptian VultureNeophron percnopterus
VulnerableSarus CraneGrus antigone
Indian SkimmerRhynchops albicollis
White-naped TitParus nuchalis
Near ThreatenedOriental DarterAnhinga melanogaster
Spot-billed PelicanPelecanus philippensis
Painted StorkMycteria leucocephala
Black-necked StorkEphippiorhynchus asiaticus
Lesser FlamingoPhoeniconaiaf minor
Ferruginous DuckAythya nyroca
Black-tailed GodwitLimosa limosa
Black-headed IbisThreskiornis melanocephala
Great Thick-kneeEsacus recurvirostris
River TernSterna aurantia
European RollerCoracias garrulus
Alexandrine ParakeetPsittacula eupatria

A journey from an ordinary village pond to an important bird area:

During the last one-decade, Menar became an important birding destination not only in Rajasthan but in India as well. Gradually, this small village is also establishing its shining presence on the world birding map. So far, many honours and titles have been credited to the account of this bird village. A few of them are as follows:

S. no. Year Event
1.2014First Udaipur Bird Fair birders team reached for bird watching. From 2014 to 2023 birders participating in the Udaipur Bird Festival are regularly visiting the Menar Wetland complex.
2.2016Menar became an IBA site.
3.2021A bird fair was celebrated on December 14, 2021, by the Rajasthan Patrika at IBA Menar.
4.2023
  • Menar Village was awarded the “Best Tourism Village 2023” in the silver category by the Ministry of Tourism, Government of India.
  • The audience award is given to the film “Wings of Hope: A Bustling Village and Their Bird Friends” by “The UN World Wildlife Day Film Showcase”. This film is related to the wetland and bird conservation legacy of Menar village.
  • Menar village wetlands were declared as a notified “wetland” by the Government of Rajasthan.

Beyond Important Bird Area:

Now Forest Department, Rajasthan is trying to make the Menar wetland complex a Ramsar Site. The required proposal has been prepared by the department. Hopefully, soon one more feather will be in the turban of Menar village.

Impact of Menar conservation legacy:

Menar has become a conservation model in Rajasthan. Many wetlands like Nagawali, Badwai, Kishan Kareri, Kheroda, Ramakheda, Puthiyan, Rundeda, Bhinder, Roma Talab (Mangalwad), Menpuria, Bhatewar, Bhupalsagar etc. which are present in the vicinity of Menar village are now on the way to become new “Menars” in southern Rajasthan. There is a competition in various villages to protect their wetlands like the people of Menar are doing. The conservation ethos of the people of Menar Village is now inspiring many villages of southern Rajasthan to protect and conserve their village wetlands and the aquatic fauna and flora present there.

Local youth earn their livelihood through birding (Photo: Umesh Menaria).

A stone at Bhupalsagar, dated back May 05, 1937, tells the story of wetland and bird conservation in the Mewar region (Photo: Author).