टाइगर वॉच के एक पर्यावरण शिक्षक धर्मसिंह गुर्जर कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य के पास बसे एक गाँव से गुजर रहे थे। रास्ते में उन्हें एक घर से महिला के रोने और लोगों के शोरगुल की आवाजें सुनाई दीं। घर के बाहर छोटी-सी दीवार थी, इसलिए भीतर का पूरा दृश्य दिखाई दे रहा था। उन्होंने देखा कि एक महिला बच्चे को गोद में लेकर बैठी थी और कुछ लोग उसे चारों ओर से घेरकर खड़े थे। शिक्षक को लगा कि कुछ ठीक नहीं है।
साँप के काटने के बाद माँ की गोद में बैठा बच्चा, पास में बैठा ओझा बाबा झाड़-फूँक से इलाज शुरू कर चुका था, जबकि उस मासूम को ज़्यादा ज़रूरत जिला अस्पताल पहुँचने की थी।
शिक्षक ने अंदर जाकर पूछा, “क्या हुआ?”
लोगों ने बताया, “इसे करीब 30–40 मिनट पहले साँप ने काट लिया है।”
शिक्षक ने देखा कि एक व्यक्ति बच्चे के शरीर पर भभूती या राख लगा रहा था और उसे नीम की पत्तियों से ढकने की कोशिश कर रहा था। शिक्षक ने तुरंत सभी से कहा, “बच्चे को यहाँ रखना खतरनाक हो सकता है। इसे जितनी जल्दी हो सके जिला अस्पताल ले जाना चाहिए।”
लेकिन शिक्षक की बात को पूरी तरह अनसुना कर दिया गया।
सर्पदंश के बाद अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़-फूंक के लिए बाबा के पास लाया गया बच्चा — नीम की पत्तियों से ढककर किए जा रहे 'उपचार' के दौरान सहमा हुआ चेहरा इस बात की गवाही देता है कि समय पर सही इलाज मिलता तो यह आज ज़िंदा होता।
शिक्षक से रहा नहीं गया। उन्होंने बच्चे की माँ से दृढ़ता से कहा, “अगर बच्चे को बचाना है तो इसे तुरंत अस्पताल ले जाना होगा। अगर झाड़-फूँक से कुछ होता, तो अब तक बच्चे की हालत बेहतर हो चुकी होती। लेकिन इसकी हालत लगातार बिगड़ रही है।”
वहाँ खड़े एक लड़के ने भी कहा, “भैया, मैं कब से कह रहा हूँ, लेकिन ये लोग मेरी बात भी नहीं मान रहे हैं।”
शायद माँ को लगा कि यह व्यक्ति समझदारी की बात कर रहा है। अंततः वह बच्चे को अस्पताल ले जाने के लिए तैयार हो गई। ग्रामीणों ने तुरंत बच्चे को मोटरसाइकिल पर बैठाया और अस्पताल की ओर निकल पड़े।
गाँव की कच्ची सड़क से कस्बे की ओर जाते परिजन, ये ऊबड़-खाबड़ रास्ते और मोटरसाइकिल ही सर्पदंश जैसे आपातकाल में गाँवों से अस्पताल तक पहुँचने का पहला सहारा होते हैं।
इधर, शिक्षक ने एक समझदार व्यक्ति से कहा, “आप जिला अस्पताल में फोन करके बता दीजिए कि साँप के काटने का मामला है और बच्चा रास्ते में है, ताकि अस्पताल में उसके इलाज की तैयारी पहले से हो सके।”
ग्रामीणों ने पास के कस्बे के अस्पताल में फोन किया, क्योंकि उनका परिचित वहाँ ड्यूटी करता है, उन्होंने बताया कि एक बच्चे को साँप ने काट लिया है और वे उसे लेकर अस्पताल आ रहे हैं।
वहाँ से उन्हें एम्बुलेंस की व्यवस्था कर दी गई।
योजना बनाई गई कि बच्चे को पहले मोटरसाइकिल से कस्बे के अस्पताल तक ले जाया जाएगा और वहाँ से एम्बुलेंस द्वारा करौली जिला अस्पताल पहुँचाया जाएगा।
कस्बा अस्पताल रास्ते में ही है।
बच्चे को लेकर लोग मोटरसाइकिल पर बिठाकर कस्बे के अस्पताल पहुँचे। वहाँ से बच्चे को एम्बुलेंस द्वारा करौली जिला अस्पताल ले जाया जा रहा था।
लेकिन इसी बीच बच्चे का मामा वहाँ पहुँच गया, और अस्पताल ले जाने की बजाय मंदिर ले जाने के लिए कहने लगा, बच्चे की माँ और मामा ने बच्चे को मंदिर ले जाने का मन बना लिया।
दोनों ने वहाँ मौजूद लोगों की बात मानने के बजाय,
बच्चे को अस्पताल में इलाज के लिए रखने के बजाय,
सीधे जीवली गाँव में काले बाबा के पास ले जाने का फैसला किया।
बच्चे को एम्बुलेंस से करौली जिला अस्पताल ले जाने के बजाय वे उसे एम्बुलेंस से उतारकर सीधे काले बाबा मंदिर ले गए।
काले बाबा तक पहुँचने और वहाँ झाड़-फूँक शुरू होने तक बच्चे की हालत कितनी बिगड़ चुकी होगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। कुछ समय बाद खबर आई कि बच्चे को बचाया नहीं जा सका।
दैनिक भास्कर, धौलपुर संस्करण (10 अगस्त 2026) — कंचनपुर थाना क्षेत्र के हांसई धनौरा गांव में सर्पदंश के बाद 16 वर्षीय सेवक जाटव को झाड़-फूंक में 16 घंटे गंवाने के बाद अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
दुर्भाग्य से, यह कोई अकेली घटना नहीं है।
लगभग इसी तरह की एक घटना धौलपुर में भी हुई। दिल्ली में काम करने वाले एक व्यक्ति का 16 वर्षीय बेटा धौलपुर के सरमथुरा कस्बे के पास एक गाँव में रहता था। उसे भी साँप ने काट लिया। लेकिन अस्पताल ले जाने और चिकित्सा उपचार कराने के बजाय उसे झाड़-फूँक के लिए ले जाया गया और अंततः उसकी भी मृत्यु हो गई।
मैंने पिछले कई वर्षों में ऐसी घटनाएँ अनेक बार देखी हैं। चौबीस साल पहले भी स्थिति ऐसी ही थी और आज भी हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में हम यह बुनियादी बात स्थापित नहीं कर पाए हैं कि साँप के काटने का इलाज झाड़-फूँक नहीं, बल्कि समय पर चिकित्सा उपचार और एंटी-स्नेक वेनम (ASV) है।
हर साल साँप के काटने से बच्चे, महिलाएँ और पुरुष अपनी जान गंवाते हैं। भारत में साँप के काटने से होने वाली मौतों के बहुत बड़े आँकड़े सामने आते हैं। यदि हम इसकी तुलना उन देशों से करें जहाँ ऐसी मौतें बहुत कम हैं, तो हमें समझ में आता है कि समस्या केवल साँपों की नहीं है। समस्या इलाज तक पहुँचने में देरी, अंधविश्वास और वैज्ञानिक चिकित्सा को न अपनाने की भी है।
यह कितना विचित्र है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग सर्दी-जुकाम या दूसरी सामान्य बीमारियों के लिए दवाइयाँ लेने में हिचकिचाते नहीं हैं, लेकिन साँप के काटने के मामले में आज भी झाड़-फूँक, तंत्र-मंत्र और तथाकथित “साँप के देवता” से जुड़ी मान्यताओं के कारण वैज्ञानिक उपचार में देरी कर देते हैं।
सवाल यह है कि हम इस स्थिति को कैसे बदलें?
क्या प्रशासन ऐसे मामलों में, जहाँ किसी व्यक्ति को समय पर चिकित्सा उपचार से दूर रखा गया हो और उसकी मृत्यु हो गई हो, कानूनी कार्रवाई पर विचार कर सकता है? क्या ऐसे झाड़-फूँक करने वाले तथाकथित उपचार केंद्रों पर किसी प्रकार का नियमन या नियंत्रण होना चाहिए? गाँव-गाँव में ऐसे अनेक केंद्र खुले हुए हैं, जहाँ लोगों का इलाज किया जाता है, लेकिन आज तक इनके खिलाफ प्रभावी नियंत्रण या कार्रवाई बहुत कम दिखाई देती है।
यह केवल अंधविश्वास का विषय नहीं है। यह जीवन और मृत्यु का प्रश्न है।
साँप के काटने के बाद हर मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है। झाड़-फूँक के नाम पर बीतने वाला समय किसी व्यक्ति की जान ले सकता है।
यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। हमें इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि विज्ञान और चिकित्सा पर भरोसा रखने वाली व्यवस्था ग्रामीण समाज तक कैसे पहुँचे और अंधविश्वास के कारण होने वाली इन मौतों को कैसे रोका जाए।
बाघ मेले के दौरान टाइगर वॉच के पर्यावरण शिक्षक धर्मसिंह गुर्जर स्कूली विद्यार्थियों के साथ फोटो प्रदर्शनी के माध्यम से बातचीत करते हुए। टाइगर वॉच पिछले चार वर्षों से पेट्रोनेट एलएनजी के सहयोग से ग्रेटर रणथम्भौर लैंडस्केप में 'बाघ मित्र कार्यक्रम' चला रहा है, जिसके तहत बच्चों को वन्यजीव संरक्षण से जोड़ा जा रहा है।
भारत के जंगलों में, जहाँ बाघ की दहाड़ के बीच हज़ारों परिवारों का शोर भी सुनाई देता है, वहाँ उनके खेत, उनके पशु, उनके देवता और उनके पुरखों के स्मारक स्थल — सब उसी जंगल से जुड़े हैं। लेकिन जब भारत ने अपने बाघों को बचाने का फ़ैसला किया, तो सबसे पहला सवाल यही उठा: क्या बाघ और इंसान एक ही ज़मीन पर रह सकते हैं? यद्यपि, इस यक्ष प्रश्न के उत्तर पर आज भी मतभेद बना हुआ है।
इस सवाल को समझने के लिए पहले 'विस्थापन' को समझना ज़रूरी है। 'विस्थापन' यानी किसी गाँव या बस्ती को उसकी पुरानी जगह से हटाकर कहीं और बसाना — जो इस देश में बाँध, सड़क और विकास की अन्य गतिविधियों के लिए होता ही रहता है। टाइगर रिज़र्व के संदर्भ में विस्थापन के लिए ग्रामीणों की सहमति सर्वोपरि होती है, और इसीलिए इसे 'स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन' कहा जाता है। वन विभाग का तर्क है कि जब गाँव बाघ के 'क्रिटिकल हैबिटेट' — यानी उसके मुख्य इलाक़े — में बसे हों, तो न तो बाघ सुरक्षित रह पाता है और न ही ग्रामीण।
एक ओर, जंगल के अंदर रहने वाले लोग लकड़ी, चारा, पानी और ज़मीन के लिए उसी वन पर निर्भर होते हैं। उनके मवेशी बाघ के प्राकृतिक शिकार को प्रभावित करते हैं, और कभी-कभी बाघ खुद उनके पशुओं को उठा ले जाता है — इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। दूसरी ओर, वन्यजीव विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर बाघ को एक बड़ा और सुरक्षित क्षेत्र मिले, तो उसकी संख्या सुरक्षित रह सकती है।
इसलिए यह बहस सिर्फ़ पर्यावरण की नहीं, बल्कि न्याय, संस्कृति, पहचान और आजीविका की भी है। इस लेख में हम इसी जटिल सवाल के विभिन्न पहलुओं को राजस्थान के संदर्भ में समझेंगे — 1976 के रणथम्भौर से लेकर आज के धौलपुर-करौली तक, और पशु चराने वाले परिवारों से लेकर नेचर गाइड बन चुके युवाओं तक के सफ़र की चर्चा करेंगे।
जंगल बचाने की नींव
ब्रिटिश राज के दौर में, सिर पर सफारी टोपी लगाए, हाथ में राइफ़ल थामे और अभी-अभी मारे गए बाघ पर पैर टिकाए खड़े 'साहब-शिकारी' की तस्वीर बेहद आम थी। आज़ादी के बाद भी यह सिलसिला रुका नहीं। किसी को ठीक-ठीक यह तक नहीं पता था कि भारत के जंगलों में कितने बाघ बचे हैं, और उन्हें अंधाधुंध मारा जा रहा था।
बीसवीं सदी के आरंभ में, अनुमान के अनुसार, भारत में बाघों की संख्या लगभग 40,000 थी। लेकिन शिकार, जंगलों की कटाई और खेती के विस्तार ने इस संख्या को बुरी तरह घटा दिया। गिरावट इतनी तेज़ थी कि 1972 में हुए देश के पहले बाघ सर्वेक्षण में मोटे तौर पर यह अनुमान लगाया गया कि भारत में बाघों की संख्या घटकर महज़ 1,827 रह गई थी।[2]
बाघ की यह दुर्दशा अकेले भारत की चिंता नहीं रह गई थी। 1969 में अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने अपनी आम सभा दिल्ली में आयोजित की। राजस्थान के वनाधिकारी कैलाश संखला ने इसी सभा में अपना पर्चा 'द वैनिशिंग टाइगर' प्रस्तुत किया, और सभा ने एक प्रस्ताव (GA 1969 RES 015) पारित कर बाघ के शिकार पर रोक (मोरेटोरियम) तथा प्रजाति की रक्षा के लिए तत्काल क़दमों की माँग की। इसी अपील के बाद भारतीय वन्यजीव बोर्ड ने राज्यों से पाँच साल के लिए बाघ के शिकार पर प्रतिबंध लगाने को कहा, और 1970 तक देश में बाघ के शिकार पर पूरी रोक लग गई।[1]
प्रिंस फिलिप, महारानी एलिज़ाबेथ, जयपुर के महाराजा और महारानी रणथंभौर में। चित्र: साइमन एंड शूस्टर (Simon & Schuster)
लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय इतने भर से आश्वस्त नहीं हुआ। 1972 में वर्ल्ड वाइड फंड फ़ॉर नेचर के प्रभावशाली ट्रस्टी गाय माउंटफ़र्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से मुलाक़ात कर उनसे इस प्रजाति को विलुप्ति से बचाने का आग्रह किया। पर्यावरण और संरक्षण के प्रति गहरी रुचि रखने वाली प्रधानमंत्री ने स्थिति का अध्ययन करने और आगे की योजना बनाने के लिए विशेषज्ञों का एक दल गठित किया। डॉ. करण सिंह की अध्यक्षता वाले इस दल ने अगस्त 1972 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, और इसी से भारत के बाघ-संरक्षण कार्यक्रम का खाका तैयार हुआ — वही कार्यक्रम जो आगे चलकर 'प्रोजेक्ट टाइगर' कहलाया। इसी दौर में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 भी पारित हुआ। जाने-माने संरक्षणवादी एच. एस. पंवर ने इन वर्षों को देश में संरक्षण के प्रति नज़रिये में आए एक 'आमूल बदलाव' के रूप में याद किया है।[1][2]
इन्हीं प्रयासों की परिणति 1 अप्रैल 1973 को हुई, जब इंदिरा गाँधी ने 'प्रोजेक्ट टाइगर' की औपचारिक शुरुआत की। शुरुआत में यह कार्यक्रम छह वर्षों के लिए — अप्रैल 1973 से मार्च 1979 तक — सोचा गया था। इसका घोषित उद्देश्य था: भारत में बाघों की एक व्यवहार्य आबादी बनाए रखना, और इन क्षेत्रों को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में सदा के लिए सुरक्षित रखना, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इनसे लाभ, शिक्षा और आनंद पा सकें। टास्क फ़ोर्स ने अलग-अलग पारिस्थितिकी-तंत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले चुनिंदा अभयारण्यों से शुरुआत करने का सुझाव दिया था, और लॉन्च के समय देश के नौ जंगलों को इसमें शामिल किया गया। रणथम्भौर इन्हीं नौ अभयारण्यों में से एक था।[2]
इसी के साथ वह प्रक्रिया शुरू हुई जो आज भी जारी है — जंगल को बाघों के अनुकूल और अधिक सुरक्षित बनाने की प्रक्रिया, जिसका सबसे दुष्कर और महत्त्वपूर्ण कार्य है: जंगल के अंदर बसे गाँवों का विस्थापन।
पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक बाघ शावक को गोद में लिए हुए। बाईं ओर मूल ऐतिहासिक छायाचित्र, दाईं ओर Artificial Intelligence (AI) की सहायता से उन्नत एवं रंगीन किया गया संस्करण। स्रोत: इंटरनेट पर उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखीय छवि।
विस्थापन का ढाँचा
टाइगर रिज़र्व से गाँवों का विस्थापन एक ऐसी प्रक्रिया है जो दशकों में बनी कई नीतियों और क़ानूनों से नियंत्रित होती है। इन्हें समझे बिना यह विषय अधूरा रहेगा।
वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और प्रोजेक्ट टाइगर
1972 के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम ने बाघ के शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया और राष्ट्रीय उद्यानों व अभयारण्यों को क़ानूनी दर्जा दिया। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के साथ यह वैज्ञानिक सोच और स्पष्ट हो गई कि बाघ को प्रजनन और अस्तित्व के लिए विशाल और अबाधित आवास चाहिए, जिस पर उसका अपना एकाधिकार हो। इसलिए तय हुआ कि उसके 'कोर एरिया' को मानव गतिविधियों से पूरी तरह मुक्त — यानी 'अक्षुण्ण' (inviolate) — रखना होगा। तर्क यह था कि मवेशियों की चराई, जलावन-लकड़ी की कटाई और खेती जंगल को खंडित करती है और हिरन जैसे प्राकृतिक शिकार-आधार को घटाती है।
लेकिन एक अहम बात यह है कि 1972 के अधिनियम में विस्थापन के लिए कोई अलग, अधिकार-आधारित नीति नहीं थी। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की आकस्मिक शुरुआत के बाद गाँवों को मुख्यतः इसी अधिनियम की सामान्य शक्तियों और कार्यकारी आदेशों के सहारे हटाया गया। जब किसी इलाक़े को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने की मंशा अधिसूचित होती, तो ज़िला कलेक्टर पर 'अधिकारों के निपटान' (Settlement of Rights) की ज़िम्मेदारी आ जाती — यानी उस सीमा के भीतर मौजूद मानव अधिकारों का अधिग्रहण, समाप्ति या स्थानांतरण। चूँकि ये इलाक़े नए टाइगर रिज़र्व के कोर के रूप में सख़्त राष्ट्रीय उद्यानों में बदले जा रहे थे, व्यवहार में यह 'निपटान' गाँवों को खाली कराने का रूप ले लेता था।[16]
उस दौर की सोच को 'फ़ोर्ट्रेस कंज़र्वेशन' (क़िलेबंद संरक्षण) कहा जाता है — यह मान्यता कि प्रकृति की सबसे अच्छी रक्षा उसे इंसानों से पूरी तरह अलग रखकर ही होती है। चूँकि उस समय न तो निर्वाचित ग्राम सभाएँ थीं और न ही वन अधिकार अधिनियम जैसा कोई क़ानून, इसलिए विस्थापन वन विभाग के ऊपर से थोपे गए आदेशों के ज़रिए होता था। उदाहरण के लिए, रणथम्भौर में 1973 से 1979 के बीच 12 गाँवों के 800 परिवारों को बाहर बसाया गया, ताकि अवैध शिकार पर रोक लगे और उजड़ा आवास फिर से पनप सके।
इन शुरुआती विस्थापनों में आज जैसे तय मुआवज़े, क़ानूनी सुरक्षा-कवच या पुनर्वास के दिशा-निर्देश मौजूद नहीं थे, इसलिए ये अक्सर वनवासी समुदायों के लिए बेहद कष्टकारी साबित हुए। इन्हीं कठोर और ग़ैर-मानकीकृत विस्थापनों के अनुभव ने आगे चलकर 2006 में अधिनियम के संशोधन की ज़मीन तैयार की।
2006 के संशोधन में 'क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट' (CTH) की अवधारणा लाई गई — यानी ऐसे कोर क्षेत्र जिन्हें बाघ के लिए अक्षुण्ण रखना ज़रूरी है। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि CTH से कोई भी विस्थापन स्वैच्छिक हो, उचित मुआवज़े सहित हो और स्थानीय समुदायों की सहमति से ही हो। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) इस पूरी प्रक्रिया की देखरेख करता है।
वन अधिकार अधिनियम, 2006
2006 में वन अधिकार अधिनियम (FRA) के आने के बाद विस्थापन की प्रक्रिया और जटिल हो गई। इस क़ानून ने अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को अपनी ज़मीन पर क़ानूनी अधिकार दिए। FRA के तहत यह तय हुआ कि जब तक सामुदायिक और व्यक्तिगत वन अधिकारों की मान्यता नहीं हो जाती, तब तक विस्थापन ग़ैर-क़ानूनी है। हालाँकि ज़मीन पर यह नियम अक्सर टूटता भी रहा — कई जगह FRA की प्रक्रिया पूरी किए बिना ही परिवारों को विस्थापित कर दिया गया। वर्ष 2025 में केंद्रीय जनजातीय मंत्रालय ने एक नया नीति-ढाँचा जारी किया, जिसमें कहा गया कि विस्थापन 'अपवादस्वरूप, स्वैच्छिक और प्रमाण-आधारित' होना चाहिए।
NTCA के 2008 के दिशा-निर्देश
फ़रवरी 2008 में NTCA ने स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन के विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए। इनमें परिवारों को दो विकल्प दिए गए।
पहला — नक़दी पैकेज: प्रति परिवार 10 लाख रुपये (जो बाद में बढ़ाकर 15 लाख कर दिए गए), जिसके तहत परिवार ख़ुद ज़मीन और मकान की व्यवस्था करता है।
दूसरा — ज़मीन पैकेज: मूल ज़मीन के बराबर नई ज़मीन, मकान के लिए 1.5 लाख रुपये और सामुदायिक सुविधाएँ।
सबसे अहम बात यह थी कि यह पूरी प्रक्रिया 'स्वैच्छिक' थी — परिवार और ग्राम सभा की सहमति के बिना कोई विस्थापन नहीं।
राजस्थान सरकार की नीतियाँ: 2002, 2022, 2025
जैसा ऊपर ज़िक्र हुआ, रणथम्भौर में विस्थापन 1970 के दशक में ही शुरू हो चुका था; लेकिन राजस्थान में इसकी पहली औपचारिक नीति 2 नवंबर 2002 को जारी हुई। इसी के तहत रणथम्भौर के पादरा गाँव के 111 परिवारों को खण्डार के पास गणेशनगर गाँव में बसाया गया — यह 2002 की नीति के बाद की पहली बड़ी विस्थापन कार्रवाई थी।
हालाँकि गणेशनगर गाँव को बसाने को वन भूमि की बड़ी हानि के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि यह स्थान बाघों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि लोगों को जंगल के एक किनारे से निकालकर दूसरे किनारे पर ही बसा दिया गया — जबकि उस दौर में सरकारों के पास मुआवज़ा देने के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध थी।
7 सितंबर 2022 को इस पैकेज में बड़ा संशोधन हुआ, और फिर 24 जुलाई 2025 को एक नया आदेश जारी किया गया। नए आदेश में ज़मीन पैकेज के अंतर्गत मूल ज़मीन के साथ 1 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि (जिसमें कम से कम 0.8 हेक्टेयर सिंचित या 1.6 हेक्टेयर असिंचित), भूमिहीनों को भी न्यूनतम ज़मीन, और रहने के लिए कम से कम 5,400 वर्ग फ़ुट का आवासीय प्लॉट देने का प्रावधान किया गया। नक़दी पैकेज में NTCA के नियमानुसार प्रति परिवार 15 लाख रुपये की व्यवस्था रखी गई। दोनों में से कोई एक विकल्प परिवार चुन सकता है। यह राशि CAMPA और वन्यजीव फंड से दी जाती है, जिससे राज्य सरकार पर अलग से वित्तीय बोझ नहीं पड़ता।
रणथंभौर के कोर क्षेत्र में स्थित अनंतपुरा गाँव, पुनर्वास से पूर्व (1976) कॉपीराइट: Tiger Watch.
1976 की कहानी
क़ानून और नीतियों का यह ढाँचा जिन असली घटनाओं पर खड़ा है, उनमें सबसे पहली और सबसे चर्चित कहानी रणथम्भौर की है। राजस्थान का रणथम्भौर — जहाँ आज दुनिया भर के पर्यटक बाघ देखने आते हैं — कभी एक ऐसा जंगल था जिसमें गाँव और जंगल एक-दूसरे में गुँथे हुए थे। 1973 में जब इसे टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया, तब 392 वर्ग किलोमीटर के इस वन क्षेत्र में कुल 16 गाँव थे। इनमें से 12 गाँव जंगल के एकदम भीतरी हिस्से में गहरे बसे हुए थे और शेष 4 बाहरी परिधि में। ये सभी गाँव 16 अलग-अलग पॉकेट्स में बिखरे हुए थे, जिससे वन्यजीवों के लिए कोई एकसूत्र, निर्बाध आश्रय-स्थल नहीं बचा था। बड़े भूखंडों पर खेती होती थी और अत्यधिक चराई से जंगल की घास तेज़ी से ख़त्म हो रही थी। वन्यजीव दिन में छिपे रहते और रात में ही निकलते।
ऐसे में तत्कालीन उप-क्षेत्र निदेशक फतेह सिंह राठौड़ को इन 12 भीतरी गाँवों के विस्थापन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना जो उस ज़माने में भी असामान्य था और आज भी एक मिसाल बना हुआ है — दबाव नहीं, भरोसा। वे गाँव-गाँव जाते, लोगों के बीच बैठते और उनकी ज़रूरतें सुनते।
"जंगल और उसके सभी प्राणी ईश्वर की रचना हैं। क्या देवी दुर्गा — जो राक्षसों का नाश करती हैं — स्वयं बाघ पर सवार नहीं होतीं? इस दिव्य सृष्टि को बिगाड़ने का हक़ किसी इंसान को नहीं है। जंगल को उसके वास्तविक स्वरूप में लौटाना होगा।" — फतेह सिंह राठौड़, ग्राम चौपालों पर (Ward, Geoffrey C., and Diane Raines Ward, Tiger-Wallahs, New York: HarperCollins, 1993)
1975 में ज़िला स्तर पर 'प्रोजेक्ट टाइगर विलेज रिलोकेशन कमेटी' बनाई गई, जिसमें ज़िला प्रमुख, फ़ील्ड डायरेक्टर और ज़िला कलेक्टर शामिल थे। समिति की 27 दिसंबर 1975 की बैठक में तय हुआ कि विस्थापन दो चरणों में होगा — पहले 6 गाँव डुमोदा के पास कैलाशपुरी में, और फिर 6 गाँव छान-फरिया के पास गोपालपुरा में। सरकार की ओर से वन भूमि को राजस्व विभाग को हस्तांतरित करने की स्वीकृति मिलते ही काम शुरू हो गया।
12 गाँव, 200 परिवार, एक नया जीवन
सन् 1976 में यह ऐतिहासिक काम मूर्त रूप लेने लगा। पहली सफलता अणतपुरा गाँव से आई — जगन गुर्जर नाम के एक स्थानीय युवक ने पहल की, लोगों को समझाया, और गाँव राज़ी हो गया। छितर गुर्जर ने भी इसमें सहयोग दिया। एक बार शुरुआत होने के बाद बाक़ी गाँव भी एक के बाद एक हटने लगे। सुबह-सुबह ट्रकों की क़तार आती; लोग आँखों में आँसू और सपने लिए अपना सामान लादते, और एक गहरी ख़ामोशी में अपने पुराने घर, गली और गाँव को अलविदा कहते। पेड़ों से लिपटकर रोते लोग फतेह सिंह को भी भावुक कर देते थे। उन्हीं के शब्दों में —
"यह मेरा सबसे कठिन काम था। लोग पेड़ों से लिपटकर रोए। उन्हें लगता था कि उनका भविष्य बिल्कुल अँधेरे में है। सभी बुज़ुर्गों ने कहा, 'हमने यहीं पूरी ज़िंदगी गुज़ारी है, हमें यहीं मरने दो।' मैं भी उनके साथ रो रहा था — क्योंकि मेरे भीतर कहीं यह एहसास था कि वे उस चीज़ की क़ीमत चुका रहे हैं जिसे शायद वे कभी समझ न पाएँ।" — फतेह सिंह राठौड़ (Sanctuary Asia, Vol. XXVIII, No. 3, जून 2008; जेनिफ़र स्कारलॉट के साथ साक्षात्कार)
1976 में आरम्भ हुए पुनर्वास ने रणथंभौर के प्राकृतिक आवासों को मानव दबाव से मुक्त करने और बाघों सहित वन्यजीवों के संरक्षण के लिए आधार तैयार किया। विस्थापित होते ग्रामीण अपना सामान लेकर नए ठिकाने की ओर जाते हुए। कॉपीराइट: Tiger Watch.
एक साल के भीतर सभी 12 गाँव — अणतपुरा, बेरदा, हनुत्या, लकड़दा, फुलेड़ी, छिंदावली, चिरोली, प्रेमपुर, लाहपुर, गुड़ा, क़िला रणथम्भौर और नागदी-रेहमानपुर — खाली हो गए। ये सभी मुख्यतः गुर्जर समुदाय के गाँव थे। कुल 200 परिवार और लगभग 800 लोग अपनी पुरानी ज़मीन छोड़कर नई जगह बसे। उनके साथ लगभग 2,500 मवेशी (भैंस, गाय, बैल, ऊँट, बकरी और खच्चर) भी नए ठिकाने पर आए। सात गाँव — अणतपुरा, बेरदा, हनुत्या, लकड़दा, फुलेड़ी, छिंदावली और चिरोली — कैलाशपुरी (डुमोदा) में बसाए गए, और पाँच गाँव — प्रेमपुर, लाहपुर, गुड़ा, क़िला रणथम्भौर और नागदी-रेहमानपुर — गोपालपुरा (छान) में।
ज़मीन, मुआवज़ा और सुविधाएँ
इस विस्थापन में एक ऐसा पैकेज तैयार किया गया जो उस दौर में अभूतपूर्व था। प्रत्येक परिवार को उसकी मूल ज़मीन के बराबर नई ज़मीन दी गई, और साथ में 5 बीघा अतिरिक्त भूमि का बोनस भी — हर भूमिधारक तथा परिवार के मुखिया को। यहाँ तक कि जो परिवार पहले भूमिहीन थे, उन्हें भी 5 बीघा ज़मीन दी गई। कुल 2,681 बीघा 9 बिस्वा (लगभग 687.5 हेक्टेयर) भूमि वन विभाग से राजस्व विभाग को पुनर्वास हेतु हस्तांतरित की गई — कैलाशपुरी में 1,587 बीघा 9 बिस्वा (लगभग 407 हेक्टेयर) और गोपालपुरा में 1,094 बीघा (लगभग 280.5 हेक्टेयर)।
अचल संपत्ति के लिए नक़दी मुआवज़ा भी दिया गया; 12 गाँवों को कुल ₹4,52,829 का नक़द मुआवज़ा मिला। विस्थापन की सम्पूर्ण लागत ₹5,49,914 रही —जो आज के मूल्यों में लगभग ₹3.5 से 4 करोड़ के बराबर है। इसके अलावा जो सुविधाएँ प्रदान की गईं, वे जंगल में कभी नसीब नहीं हुई थीं: सभी चल संपत्ति को नए स्थान तक पहुँचाने के लिए वाहन, नगर नियोजक (टाउन प्लानर) द्वारा तैयार कैलाशपुरी का मास्टर प्लान, धार्मिक भावनाओं की रक्षा के लिए मंदिर का निर्माण, एक माध्यमिक स्कूल, सामुदायिक कुएँ और डीज़ल पम्प की व्यवस्था, और आस-पास के गाँवों से जोड़ने के लिए सड़कें।
जंगल का पुनर्जन्म
फतेह सिंह की मेहनत का नतीजा देखने में देर नहीं लगी। 1976 में ही उन्होंने रणथम्भौर में पहली बाघिन देखी, जिसे उन्होंने प्यार से 'पद्मिनी' नाम दिया। जो खेत कभी मानवीय गतिविधियों से भरे रहते थे, वहाँ घास के मैदान लहलहा उठे। सांभर और चीतल चरने लगे, और बाघ दिन में भी खुलकर विचरने लगा। 1973 में यहाँ बाघों की संख्या महज़ 17–18 थी; आज 70 से अधिक बाघ यहाँ हैं। रणथम्भौर आज दुनिया में बाघ देखने की सबसे बेहतरीन जगहों में से एक है।
डुमोदा के निकट बसाया गया पुनर्वासित गाँव कैलाशपुरी, 1976, रणथंभौर के कोर क्षेत्र से स्थानांतरित परिवारों की नई बसावट। कॉपीराइट: Tiger Watch.
राजस्थान के अन्य टाइगर रिज़र्व: वर्तमान परिदृश्य
रणथम्भौर की कहानी आधी सदी पुरानी है — और एक सफलता की कहानी भी। लेकिन विस्थापन का वही सवाल राजस्थान के बाक़ी टाइगर रिज़र्व में आज भी अनसुलझा है: कहीं अधूरा, कहीं विवादित, तो कहीं बिलकुल नई राह पर।
सरिस्का — बाघ भी गए, गाँव भी रहे
अलवर ज़िले में 1978 में घोषित सरिस्का टाइगर रिज़र्व लापरवाही का एक महँगा सबक है। 2004 में जब एक सर्वेक्षण में यहाँ से बाघों के पूरी तरह ग़ायब हो जाने की बात सामने आई, तो पूरे देश में हलचल मच गई; इसका मुख्य कारण स्थानीय शिकारी गिरोहों द्वारा किया गया अवैध शिकार और जंगल पर लगातार बना मानव दबाव माना गया। इसके बाद ही केंद्र ने 'टाइगर टास्क फ़ोर्स' गठित की और 28 दिसंबर 2007 को सरिस्का के 'क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट' (CTH) को अधिसूचित किया गया।[6][5]
28 जून 2008 को रणथम्भौर से एक बाघ को हेलिकॉप्टर से लाकर सरिस्का में छोड़ा गया — यह देश का पहला 'एरियल' बाघ-स्थानांतरण था। इसके बाद और बाघ लाए गए, और आज यहाँ इनकी संख्या लगभग 48 है।[7][8]
सरिस्का के CTH में 29 गाँव हैं। 2007–08 की NTCA पुनर्स्थापन योजना के तहत भगानी गाँव के 21 परिवार सबसे पहले स्वेच्छा से हटे। मार्च 2024 तक 5 गाँव — भगानी, उमरी, रोटक्याला, पनीधाल और डाबली — पूरी तरह विस्थापित हो चुके थे (कुल 322 परिवार)। विस्थापन के लिए चिह्नित गाँवों के कुल 1,471 परिवारों में से 973 अब तक हट चुके हैं, जबकि सुकोला, क्रास्का, देवरी, कांकवाड़ी और हरिपुरा जैसे गाँवों की प्रक्रिया अभी अधूरी है।[11][8]
लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। विस्थापित परिवारों की शिकायत है कि उन्हें पर्याप्त ज़मीन और रोज़गार नहीं मिला। डाबकन जैसे गाँव, जिन्हें 2017–18 में विस्थापन के लिए चुना गया था, आज भी अधर में लटके हैं — वन विभाग ने वहाँ बिजली, पानी और पक्के मकान जैसी बुनियादी सुविधाएँ रोक दीं, और लोग वर्षों से अनिश्चितता में जी रहे हैं। आदिवासी परिवारों ने FRA के तहत सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता के बिना विस्थापन का विरोध किया और अदालत का दरवाज़ा खटखटाया।
अब दबाव दोनों ओर से बढ़ रहा है। सरिस्का के 48 बाघों में 13 शावक ऐसे हैं जिन्हें आने वाले महीनों में अपना अलग इलाक़ा चाहिए; जगह न मिली तो उनके आबादी की ओर बढ़ने का ख़तरा है। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2026 तक शेष विस्थापन पूरा करने का आदेश दिया है, फिर भी बचे हुए गाँवों के लिए न ज़मीन तय हुई है और न मुआवज़ा। यही सरिस्का और रणथम्भौर के प्रबंधन का फ़र्क़ है — एक जगह प्रक्रिया ने भरोसा जीता, दूसरी जगह भरोसा टूटा।
मुकुंदरा हिल्स — गिरधरपुरा की दोहरी त्रासदी
कोटा और झालावाड़ के बीच फैला मुकुंदरा हिल्स 2013 में अधिसूचित राजस्थान का तीसरा टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH लगभग 417 वर्ग किलोमीटर है। इसके CTH में 14 गाँव हैं। मार्च 2024 तक यहाँ केवल 2 गाँव — लक्ष्मीपुरा (30 में से 29 परिवार) और खरली बावरी (24 में से 17 परिवार) — विस्थापित हो सके हैं। बड़े गाँवों की प्रक्रिया अभी आधी-अधूरी है: मशालपुरा के 301 परिवारों में से 156, और घाटी जागीर के 58 में से 21 परिवार ही अब तक हटे हैं, जबकि दामोदरपुरा के 153 परिवारों का विस्थापन शुरू ही नहीं हुआ। मशालपुरा में तो चार परिवार आज भी जाने को तैयार नहीं हैं।[11][9]
रफ़्तार इतनी धीमी रही कि आवंटित पैसा भी पूरा ख़र्च नहीं हो पाया — मुकुंदरा के पुनर्स्थापन के लिए जारी ₹39.16 लाख की राशि अनखर्च रह गई और 2020 में उसे फिर से मान्य (revalidate) कराना पड़ा। नतीजा यह कि यह रिज़र्व का एक हिस्सा आज भी बाघों से लगभग ख़ाली है — यहाँ बमुश्किल एक बाघ-बाघिन की जोड़ी, उनके शावक और दो उप-वयस्क बाघिनें हैं।[10][8]
इसी पृष्ठभूमि में गिरधरपुरा का ज़िक्र ज़रूरी है, क्योंकि यह गाँव एक दोहरी त्रासदी का प्रतीक है। 1960 के दशक में गाँधी सागर बाँध के निर्माण के समय इसे पहले ही एक बार विस्थापित किया जा चुका था; और अब, दशकों बाद, उसी नई जगह को मुकुंदरा के CTH में शामिल कर लिया गया — यानी दूसरा विस्थापन। दो बार उजड़ चुके इन परिवारों के लिए यह पहचान, विश्वास और आसरे का सवाल है। वे पूछते हैं: "अगर अगली बार फिर कोई योजना आई, तो क्या तीसरी बार हटना होगा?"
रामगढ़ विषधारी — नई शुरुआत
बूँदी ज़िले में 2022 में अधिसूचित रामगढ़ विषधारी राजस्थान का चौथा टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH लगभग 482 वर्ग किलोमीटर है। इसके CTH में 8 गाँव हैं। मार्च 2024 तक यहाँ एक भी गाँव पूरी तरह विस्थापित नहीं हुआ है; केवल गुलखेड़ी गाँव की प्रक्रिया शुरू हुई है, जहाँ 208 परिवारों में से 40 अब तक हटे हैं।[13][11]
धौलपुर-करौली — सह-अस्तित्व की नई प्रयोगशाला
धौलपुर-करौली टाइगर रिज़र्व (DKTR) राजस्थान का पाँचवाँ टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH 599.64 वर्ग किलोमीटर है और बफ़र ज़ोन लगभग 458.24 वर्ग किलोमीटर। रिज़र्व के कोर क्षेत्र में 52 गाँव और बफ़र क्षेत्र में 108 गाँव बसे हैं, फिर भी अब तक CTH से किसी भी गाँव का विस्थापन प्रस्तावित नहीं है। जहाँ रणथम्भौर और सरिस्का विस्थापन के मॉडल रहे, वहीं DKTR को एक अलग राह — बाघ और इंसान के सह-अस्तित्व — की प्रयोगशाला के रूप में देखा जा रहा है।[12]
धौलपुर–करौली टाइगर रिजर्व का कोर क्षेत्र। यहाँ स्थित 52 छोटे-बड़े गाँवों में से अब तक एक भी गाँव का पुनर्वास प्रारम्भ नहीं हुआ है। कॉपीराइट: Tiger Watch.
विस्थापन के बाद जंगल की वापसी
हर पूरा हुआ विस्थापन अपने पीछे दो कहानियाँ छोड़ जाता है — एक जंगल की, और दूसरी उन परिवारों की जो वहाँ से गए। पहले जंगल की बात।
किसी गाँव के खाली होने के बाद वहाँ क्या बचता है? टूटी हुई दीवारें, पुराने कुएँ, मंदिरों के खंडहर, खेतों की मेड़ें, और कभी-कभी तुलसी का एक पौधा जो आज भी उग आता है। लेकिन इन्हीं खाली जगहों में धीरे-धीरे जंगल वापस आने लगता है। रणथम्भौर में जहाँ कभी खेत थे, वहाँ अब घास के मैदान हैं। जहाँ मवेशी चरते थे, वहाँ सांभर और चीतल हैं। जहाँ इंसानी रोशनी थी, वहाँ अब बाघ बेधड़क विचरता है। सरिस्का में भी भगानी गाँव के खाली होते ही पुरानी इमारतें तोड़ दी गईं, ताकि जंगल को जगह मिल सके। पन्ना और रणथम्भौर के अध्ययन बताते हैं कि विस्थापित गाँवों की जगहों पर पहले शाकाहारी वन्यजीव और फिर शिकारी जल्दी लौट आते हैं।
रणथम्भौर के जंगल में आज भी कुछ पुरानी दीवारें खड़ी हैं। सफ़ारी पर जाने वाले पर्यटक इन्हें देखते हैं — ये खंडहर एक पुराने जीवन की याद हैं, और इनमें उन लोगों की स्मृतियाँ बसी हैं जिन्होंने यह जंगल बाघ के लिए वापस कर दिया।
नए गाँव
दूसरी कहानी परिवारों की है। नए गाँवों में जाने के बाद शुरुआती दौर में उनकी मुश्किलें बढ़ जाती हैं। जंगल में जो मुफ़्त था — लकड़ी, पत्ते, जड़ी-बूटियाँ, चारा — वह अब बाहर ख़रीदना पड़ता है। नई ज़मीन पर शुरू-शुरू में फ़सल नहीं उगती। और पड़ोसी गाँव वाले नए आए परिवारों को कभी-कभी संदेह से देखते हैं।
फिर भी समय के साथ तस्वीर बदलती है। 1976 में विस्थापित रणथम्भौर के परिवारों के बसने के बाद सेंटर फ़ॉर एनवायरनमेंट एजुकेशन (CEE), अहमदाबाद की एक टीम ने कैलाशपुरी में सर्वेक्षण किया। उनकी रिपोर्ट में दर्ज है:[18]
"लोग अपने नए गाँव में संतुष्ट दिखे; कुछ ने कहा कि यहाँ जीवन जंगल के उन गाँवों से बेहतर है जहाँ से वे आए हैं।" — Centre for Environment Education, अहमदाबाद — कैलाशपुरी सर्वेक्षण
कैलाशपुरी और गोपालपुरा — आज की तस्वीर
आज कैलाशपुरी में 300 परिवार हैं और कुल आबादी 1,601 है। 1976 में वन विभाग द्वारा बनाया गया सामुदायिक कुआँ आज भी है — जिसे 1992–93 में वन विभाग ने और गहरा करवाकर दुरुस्त किया। स्कूल और मंदिर, दोनों वन विभाग ने बनवाए थे, जो आज भी गाँव की धड़कन हैं। गाँव का पशुधन — 452 भैंस, 170 गाय, 130 बैल, 3 ऊँट, 622 बकरियाँ और 2 खच्चर, यानी कुल 1,379 पशु — बताता है कि पशुपालन आज भी इन परिवारों की रीढ़ है।
गोपालपुरा में 70 परिवार हैं और आबादी 288। यहाँ 500 बीघा भूमि पर खेती होती है। पशुओं के पानी के लिए वन विभाग ने एक 'खेल' (टंका) बनवाया, जबकि मंदिर पंचायत ने बनवाया। पशुधन में 20 भैंस, 150 गाय, 100 बकरी, 40 भेड़ और 2 ऊँट हैं। गोपालपुरा के लोगों ने आस-पास की वन भूमि पर इको-डेवलपमेंट कार्य शुरू किए हैं, और दो बायो-गैस इकाइयाँ भी स्थापित की गई हैं।
रणथम्भौर के दूसरे (हाल के) दौर के विस्थापन में परिवारों को 2.5 लाख रुपये की सहायता राशि, 60×90 फ़ीट का आवासीय भूखंड और 6 बीघा 7 बिस्वा कृषि भूमि दी गई। ये नवस्थापित गाँव अभी भी बुनियादी सुविधाओं — स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल — के लिए विकास की राह पर हैं।
रणथंभौर से पुनर्वासित गाँवों के नेचर गाइड, जो आज रणथंभौर टाइगर रिजर्व में कार्यरत हैं। कॉपीराइट: मीठालाल गुर्जर.
नई पहचान बनाते युवा
पुनर्वास की कहानी का सबसे उम्मीद भरा अध्याय वह है जो आज लिखा जा रहा है। पुनर्वासित गाँवों के युवा अब केवल मज़दूरी तक सीमित नहीं हैं। पशुपालन में भी एक बड़ा बदलाव आया है: जहाँ पहले देसी नस्लें जंगल में चरती थीं, अब परिवार उन्नत नस्ल के पशु पालने लगे हैं। डेयरी उद्योग से जुड़ाव बढ़ा है, जो नियमित आमदनी का ज़रिया बन रहा है। युवाओं ने ट्रैक्टर-चालन, छोटे व्यापार, निर्माण और परिवहन में भी पैर जमाए हैं।
2023 में रणथम्भौर के तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर पी. कथीरवेल के निर्देश पर रणथम्भौर से विस्थापित गाँवों के 52 युवाओं को, और इको-डेवलपमेंट कमेटी के माध्यम से 30 युवाओं को, नेचर गाइड के रूप में नियुक्त किया। जो जंगल कभी इनकी आजीविका का केंद्र था, अब वही जंगल इन्हें नई पहचान दे रहा है — लेकिन इस बार वन्यजीवों के दोस्त और रक्षक के रूप में।
ग़ैर-सरकारी संगठन टाइगर वॉच ने रणथम्भौर के बाहर बसे पुनर्वासित गाँवों — अनंदीपुरा और गिरिराजपुरा — में दो शिल्प-कौशल विकास केंद्र स्थापित किए हैं, जहाँ महिलाएँ और युवा हस्तशिल्प, बुनाई और पारंपरिक कलाओं का प्रशिक्षण ले रहे हैं। साथ ही अनंदीपुरा में एक डिजिटल शिक्षा केंद्र भी है, जो इन गाँवों के बच्चों को आधुनिक शिक्षा और मुख्यधारा से जोड़ रहा है। यह तस्वीर बताती है कि जब विस्थापन सम्मान के साथ होता है — और पुनर्वास के बाद सतत सहयोग भी मिले — तो यह केवल एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं, बल्कि एक नई संभावना का द्वार भी हो सकता है।
आनंदीपुरा गाँव में टाइगर वॉच के ‘वन्य सखी’ कार्यक्रम की प्रतिभागी महिलाएँ। कॉपीराइट: Tiger Watch.
एक बड़ा सवाल
जंगल में रहने वाले लोगों के लिए यह सिर्फ़ एक जगह नहीं है — यह उनकी दुनिया है। उनके देवता वहाँ के पेड़ों में हैं, उनके पुरखों की राख उस मिट्टी में मिली है, और उनकी भाषा में उन पेड़-पौधों के नाम हैं जो किसी शब्दकोश में नहीं मिलेंगे। कई परिवारों का कहना है कि 'स्वैच्छिक विस्थापन' का नाम तो ज़रूर है, लेकिन ज़मीन पर दबाव बहुत होता है। जंगल के अंदर नई सड़क और इमारत बनाने की इजाज़त नहीं, खेतों में नलकूप नहीं, बच्चों के लिए स्कूल और अस्पताल नहीं — यही धीमा दबाव उन्हें हटने पर मजबूर करता है।
केंद्र सरकार के 2024 के आँकड़ों के अनुसार, 1973 से अब तक देश भर में 257 गाँवों के 25,007 परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है। लेकिन अभी भी 64,801 परिवार टाइगर रिज़र्व के कोर एरिया में रह रहे हैं, और इन सबके विस्थापन एक लंबा तथा बेहद ख़र्चीला काम है।[14]
वन्यजीव विशेषज्ञों का तर्क है कि बाघ को जीवित रहने के लिए बड़ा, निर्बाध क्षेत्र चाहिए। एक बाघ का 'होम रेंज' 100 से 400 वर्ग किलोमीटर तक हो सकता है। जब इस इलाक़े में गाँव, खेत और मवेशी होते हैं, तो बाघ का व्यवहार बदल जाता है — वह रात का शिकारी बन जाता है और प्रजनन कम कर देता है। रणथम्भौर का उदाहरण देखें: 1976 में जब 12 गाँव हटे, तब यहाँ बमुश्किल 17–18 बाघ थे; आज 70 से अधिक हैं। फिर भी, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि सभी गाँवों को हटाना 'न व्यावहारिक है और न वास्तविक' — इसके बजाय उन गाँवों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो बाघ के मुख्य 'कॉरिडोर' में हैं।[14]
क्या विस्थापन ही एकमात्र विकल्प है?
CTH (कोर एरिया) से विस्थापन वैज्ञानिक और क़ानूनी, दोनों दृष्टि से ज़रूरी है। लेकिन बफ़र ज़ोन की बात अलग है। वहाँ सह-अस्तित्व — बाघ और इंसान का साथ-साथ जीना — संभव भी है और व्यावहारिक भी। नेपाल, केन्या और ज़ांबिया जैसे देशों में 'कम्यूनिटी-बेस्ड कंज़र्वेशन' सफलतापूर्वक चल रहा है, और भारत में भी बफ़र ज़ोन में ऐसे प्रयोग हुए हैं। रणथम्भौर के बफ़र में नेचर गाइड, EDC कार्यक्रम और टाइगर वॉच के कौशल केंद्र — ये सब इसी सोच की देन हैं: स्थानीय लोग संरक्षण के दुश्मन नहीं, बल्कि उसके सबसे बड़े भागीदार बन सकते हैं।
असली बात यह है: जब विस्थापन सही तरीक़े से होता है — सही मुआवज़ा, सही सुविधाएँ और लोगों की सच्ची इच्छा से — तो जंगल भी बचता है और लोग भी ख़ुश रहते हैं। और जब यह ज़बरदस्ती होता है या वादे टूट जाते हैं, तो लोग नाराज़ होते हैं, बाघों पर दोष मढ़ा जाता है और संरक्षण की भावना ही ख़त्म हो जाती है। इसलिए दोनों विकल्प — CTH से विस्थापन और बफ़र में सह-अस्तित्व — एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।
गाँवों के पुनर्वास और आवास संरक्षण के परिणामस्वरूप बढ़ी बाघों की संख्या ने रणथंभौर को राजस्थान के अन्य टाइगर रिजर्वों के लिए बाघ स्थानांतरण का स्रोत क्षेत्र बना दिया है। कॉपीराइट: डॉ. धर्मेन्द्र खंडाल.
राजस्थान में विस्थापन की स्थिति (मार्च 2024)
(नीचे दी गई जानकारी राजस्थान वन विभाग के अभिलेखों पर आधारित है।)
राजस्थान के टाइगर रिज़र्व — क्षेत्रफल (वर्ग किलोमीटर)
टाइगर रिज़र्व
CTH
बफ़र
कुल
रणथम्भौर
1,113.36
297.92
1,411.28
सरिस्का
881.11
332.23
1,213.34
मुकुंदरा हिल्स
417.17
342.82
759.99
रामगढ़ विषधारी
481.91
1,019.98
1,501.89
धौलपुर-करौली
599.64
458.24
1,057.88
कुल
3,493.19
2,451.19
5,944.38
स्वैच्छिक ग्राम विस्थापन की प्रगति
टाइगर रिज़र्व
CTH में गाँव
पूर्णतः विस्थापित
प्रक्रिया में
रणथम्भौर
65
8
9
सरिस्का
29
5
6
मुकुंदरा हिल्स
14
2
2
रामगढ़ विषधारी
8
0
1
धौलपुर-करौली
52*
—
—
कुल
168
15
18
* राजस्थान के अन्य चार रिज़र्व के आँकड़े 'विस्थापन हेतु चिह्नित' गाँवों के हैं (कुल 116)। धौलपुर-करौली के 52 गाँव कोर/CTH में मौजूद हैं (बफ़र में 108), पर अभी इनमें से किसी का विस्थापन प्रस्तावित नहीं है।
रणथम्भौर — परिवारवार विवरण (मार्च 2024)
गाँव
कुल परिवार
विस्थापित
इन्दाला
33
33
पादरा
111
111
मछनकी
59
59
मोरडुंगरी
157
154
भीड़
164
139
गाड़ीतालाड़ा
49
49
काथुली
151
141
काला खोहेरा
46
46
कलीभट
47
43
हिंदवार
575
373
मुंदरहेड़ी
161
72
बेराई भीमपुरा
102
91
डांगरा
83
49
उँची ग्वाड़ी
143
116
चोड़क्या कलाँ
115
73
चोड़क्या खुर्द
18
5
मरमड़ा
245
220
कुल
2,259
1,774
बाघ भारत की धरोहर है — इसे बचाना हम सबकी ज़िम्मेदारी है। लेकिन यह ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन लोगों पर नहीं थोपी जा सकती जो सदियों से जंगल के साथ जी रहे हैं और जिनका इस संकट में कोई हाथ नहीं था। रणथम्भौर का उदाहरण बताता है कि जब विस्थापन सम्मान के साथ होता है, तो यह दोनों तरफ़ फ़ायदेमंद हो सकता है। 1976 में जिन 200 परिवारों ने अपनी जड़ें छोड़ीं, उनके वंशज आज नेचर गाइड हैं, शिल्पकार हैं, डेयरी किसान हैं, डिजिटल रूप से जुड़े नागरिक हैं — और रणथम्भौर में 70 से अधिक बाघ हैं।
राजस्थान में अभी भी सैकड़ों गाँव टाइगर रिज़र्व के कोर में हैं; 15 पूरी तरह विस्थापित हो चुके हैं और 18 प्रक्रिया में हैं। यह काम लंबा, महँगा और नाज़ुक है। लेकिन अगर CTH में विस्थापन और बफ़र में सह-अस्तित्व — दोनों विकल्पों को एक साथ, समझदारी से चलाया जाए — तो न सिर्फ़ बाघ बचेंगे, बल्कि जो परिवार जाएँगे, वे भी एक बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर जाएँगे।
"जंगल बचाने के लिए पहले लोगों का दिल जीतना होता है।" — फतेह सिंह राठौड़
यही सबसे बड़ा सबक है — जो 1976 में भी सच था, और आज भी उतना ही ज़रूरी है।
[3] Ward, Geoffrey C., and Diane Raines Ward. Tiger-Wallahs: Encounters with the Men Who Tried to Save the Greatest of the Great Cats. New York: HarperCollins, 1993.
[4] Sanctuary Asia, Vol. XXVIII, No. 3 (जून 2008) — फतेह सिंह राठौड़ का जेनिफ़र स्कारलॉट के साथ साक्षात्कार।
[5] Shrivastava, Shubhi. “Dabkan Village with Uncertain Future: A Study of Village Relocation in Sariska Tiger Reserve.” IJCRT, Vol. 10, Issue 5 (May 2022), IJCRT2205864. ijcrt.org
[13] “Dholpur-Karauli tiger reserve approved; Rajasthan’s fifth, India’s 54th” (Aug 2023), India TV — Ramgarh Vishdhari (2022) as Rajasthan’s fourth reserve. indiatvnews.com
[14] Mongabay-India (Jan 2025), “Relocating villages in core tiger areas based on science.” india.mongabay.com
[15] The Diplomat (July 2025), “Between Tigers and Tradition: The Complex Reality of Village Relocation in India.” thediplomat.com
[16] The Indian Express, “Explained: Village relocation from tiger reserves.” indianexpress.com
[17] Drishti IAS, “NTCA’s Plan on Relocation of Villages.” drishtiias.com
[18] Centre for Environment Education (CEE), अहमदाबाद — कैलाशपुरी पुनर्वास सर्वेक्षण रिपोर्ट।
नोट: कुछ ऐतिहासिक और स्थानीय आँकड़े (1976 के पैकेज का विवरण, गाँवों के नाम, पशुधन आदि) राजस्थान वन विभाग के अभिलेखों तथा क्षेत्रीय शोध-सामग्री पर आधारित हैं।
राजस्थान राज्य किलों, महलों, गढों और गढियों के लिए जाना जाता रहा है। राजा-महाराजा, राव-उमराव सब अपनी - अपनी हैसियत अनुसार किले व महल आदि बनवाते थे। सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने एवं आन्तरिक गतिविधियों को छुपाये रखने हेतु अलग-अलग मोटाई, ऊँचाई व बनावट की प्राचीरें बनवाई जाती थी। परकोटे की प्राचीरों से घिरे क्षेत्र का कोई निश्चित पैमाना तो नहीं था फिर भी महलों के मुकाबले किलों के परकोटे से घिरा क्षेत्र अधिक होता था। कुंभलगढ के किले की प्राचीर तो लगभग 36 किमी. लम्बी बताई जाती है। सज्जनगढ अभयारण्य में स्थित सज्जनगढ वास्तव में गढ़ यानी किला नहीं है बल्कि एक महल है जिसमें चारों तरफ कोई सुरक्षा दीवार नहीं है। जयसमंद अभयारण्य में स्थित रूठी रानी का महल व हवा महल भी परकोटा विहीन हैं। नाहरगढ किला, गागरोन का किला, शेरगढ किला, शाहबाद का किला, काँकवाडी किला, बाला किला (अलवर) आदि जगहों पर बडा क्षेत्र घेरते हुऐ परकोटे बनाये गये थे। महलों व किलों की आन्तरिक सुन्दरता एक महत्वपूर्ण पहलू है। वास्तुकारीय विशेषताओं के अलावा बाहर व भीतर की हरियाली का सृजन व संधारण भी एक महत्वपूर्ण प्रबंधन क्षेत्र था। यहाँ महलों व किलों की आन्तरिक हरियाली पर कुछ प्रकाश डालना उचित होगा जो हमें तत्कालीन राजघरानों की सोच, समझ, जरूरत व उद्देश्य के ज्ञान व भान की झलक देता है।
किलों के परकोटे को विस्तार देते समय जो प्राकृतिक वन क्षेत्र घेरा जाता था उसे सुन्दरता, शीतलता, ईधन, घोडे एवं हाथियों हेतु चारे की आंशिक पूर्ती, फल आदि जरूरतों हेतु उसे सुरक्षित रखा जाता था। जो वन क्षेत्र किलों की परीधी पर बाहर विद्यमान रहता था, उसको भी सुरक्षित रखा जाता था क्युंकि बाहरी वन किले को छुपाने में मदद करते थे। ऐसे दुर्गों को आज हम वन दुर्ग के रूप में जानते हैं।
प्राचीन किलो में जहाँ अधिकांश प्राकृतिक वनस्पति को सुरक्षित रखा जाता था, वहीं महलों के परिसरों में विद्यमान काँटेदार व अनुपयोगी या कम उपयोगी वनस्पतियों को हटा दिया जाता था। राजघरानों के लोग ताजी हवा, ताजे फल, छाँया, शीतलता, सुन्दरता, लोक दवाओं, शुभ शगुन विचार व धार्मिक - सामाजिक अनुष्ठानों हेतु अनेक वृक्षों का रोपण भी महलों व किलों के प्रांगण में कराते थे। उन रोपित वृक्षों की उचित देख-भाल की जाती थी। महलों व किलों में रोपित वृक्षों के स्वयं गिरे या पुनः-पुनः फैंके बीजों से या नये रोपित पौधों से उन पसंद की प्रजातियों की अगली पीढीयाँ भी शनैः-शनैः वहाँ उगती रहती थी। पुराने वृक्ष बडे होकर या दीमक आदि के प्रकोप से समाप्त भी होते रहते थे।
महलों व किलों में रहने वाले राजपरिवारों, सैनिकों, सेवकों, अनुष्ठान कर्ताओं आदि द्वारा रोपित पौधों से तरह-तरह के लाभ लिये जाते थे। आवश्यक्तानुसार पौधों की संख्या निर्धारित की जाती थी लेकिन शगुन एवं सौभाग्य से संबंधित पौधे कम संख्या में होते थे तथा इन्हें प्रायः प्रवेश द्वारों के पास लगाया जाता था ताकि महल या किले में प्रवेश करते ही उनके दर्शन कर अच्छे शगुन का भान हो। मौलश्री जैसे वृक्षों के फूलों की महक हवा मे सुगंध घोलने के लिए जानी जाती है। कच्चे आम (कैरी) की छाछ, रायण व मौलश्री के फलों का गर्मी में सेवन आम चलन था। तत्कालीन राजपूताना (वर्तमान राजस्थान) के राजघरानों की पसंद के कुछ वृक्ष निम्न हैं जो जहाँ-तहाँ आज भी किलों - महलों में सुरक्षित नजर आते हैंः
छायाँ, औषधीय महत्व (विशेषकर दाँतुन हेतु उपयोगी), झूला डालना, सुन्दरता, फल
6
खजूर
Phoenix sylvestris
सदाबहार
Arecaceae
फल, सुन्दरता, झाडू सामग्री, बर्तन सफाई हेतु रेशे, मधुर रस एवं ताडी
7
आम
Mangifera indica
सदाबहार
Anacardiaceae
छायाँ, फल, झूला, सुन्दरता, औषधीय महत्व
8
जामुन
Syzygium cumini
सदाबहार
Myrtaceae
छायाँ, फल, सुन्दरता, औषधीय महत्व
9
इमली
Tamarindus indicus
सदाबहार
Caesalpiniaceae
छायाँ, फल, सुन्दरता, औषधीय महत्व
10
लिसोडा
Cordia myxa
सदाबहार
Ehretiaceae
छायाँ, सुन्दरता, फल
11
कलम/कदम
Mitragyna parivifolia
पतझडी
Rubiaceae
सुन्दरता, धार्मिक महत्व
12
बेलपत्र
Aegle marmelos
पतझडी
Rutaceae
धार्मिक महत्व, फल, औषधीय महत्व
प्राचीन समय में रायण व मौलश्री को प्राथमिकता से लगाया जाता था (चित्र 1 से 5)। जहाँ देवालय स्थित होते थे वहाँ पूजन हेतु पत्र सहजता से मिल सकें, अतः उपयुक्त स्थान पर बेलपत्र भी लगाया जाता था। तुलसी के पौधे भी देवालयों व निवास स्थानों के पास लगाए जाते थे। पूजा - पाठ हेतु दूब घास भी सुरक्षित जगह उगने दी जाती थी। देश में कई जगह कल्प वृक्ष (Adansonia digitata) भी लगाऐ जाते थे। मध्यप्रदेश के धार जिले में माँडू के किले एवं महलों के परिसरों में एवं आस-पास बडी संख्या में प्राचीन समय में रोपित विशाल आकार के कल्प वृक्ष दर्शनीय हैं।
चित्र 1: शेरगढ किले के प्रवेश द्वार के पास मुख्य मार्ग की बाँयीं तरफ विद्यमान दो रायण वृक्ष
चित्र 2: शेरगढ किले के प्रवेश द्वार के पास विद्यमान प्राचीन रायण वृक्षों की सघन छाँया
चित्र 3: सघन छाँया देने वाला सदाबहार मौलश्री वृक्ष.
चित्र 4: मौलश्री वृक्षः फल एवं फूलों से लदी शाखा
चित्र 5: मौलश्री वृक्ष का फल
सारणी-1 में देखेंगे तो पता चलेगा कि अधिकांश वृक्ष दीर्घजीवी व बडे आकार के हैं। इनमें अधिकांश सदाबहार या लगभग सदाबहार प्रकृति के हैं। बेलपत्र व खजूर को छोड कर कोई काँटेदार नहीं है। सभी वृक्ष स्थानीय व बहु-महत्व (multi-purpose) वाले हैं।
प्राचीन समय में कुछ वृक्षों को तो महलों व किलों के अलावा देवालयों व जलस्त्रोतों के पास भी लगाने का चलन था। पाली जिले में सादडी के पास रणकपुर जैन मंदिर में विशाल भवनों से घिरा, एकदम केन्द्रिय भाग में एक रायण का प्राचीन विशाल वृक्ष आज भी सुरक्षित है। पीपल, बरगद, बेलपत्र, जीवापूता (Drypetes roxburghii), मौलश्री आदि प्रायः शिवालयों के पास सुरक्षित मिलते हैं। प्राकृतिक रूप से शिवलिंग से समानता दर्शाने वाले फूल कोरोपिटा गुवानेन्सिस (Couroupita guianensis) नामक वृक्ष में देखे जा सकते है। आजकल दक्षिण भारत में कई जगह शिवालयों के पास यह वृक्ष भी देखने को मिलता है।
अधिक वर्षामान वाले क्षेत्रों में पानी के तालाबों-जोहडों की पाल पर भी बरगद, पीपल, बेलपत्र, जामुन, इमली, नीम, आम, कलम (कदम) लगाने-बचाने का चलन था। जिस तालाब के किनारे कलम (कदम या कदम्ब) होता है उसे बोलचाल में ’’कदमा तालाब’’ या ’’कदम्ब तालाब’’ कहते हैं। सामान्य तालाब के मुकाबले ’’कदम्ब तालाब’’ ज्यादा पूज्य माने जाते हैं। शेखावाटी से लेकर मारवाड के तालाबों के पाल वृक्षों (Embankment tree) में खारा जाल, मीठा जाल, पीपल, बरगद, खेजडी, रौंझ, बबूल, नीम, बेर, इमली, इन्द्रधोक (Anogeissus sericea nummularia) अदि विशेष महत्व रखते हैं। इसी तरह कमल को भी विशेष धार्मिक महत्व मिलता था। जिस तालाब में कमल (पदम) उगते थे उसे "पदम तालाब" नाम से आदर दिया जाता है।
वृक्षों के महत्व को जानने हेतु प्राचीन महल, किले, देवालयों एवं तालाबों के अवलोकन - अध्ययन के साथ -साथ पुरानी रूढीयों, परिपाटियों, अभिवृतियों व परंपरागत ज्ञान पर नजर जरूरी है ताकि हम प्राचीन भारतीय समाज के पुरा वैभव से रूबरू हो सकें।
जयपुर में तेंदुआ-मानव संघर्ष बढ़ा क्यों? जब सब कहते हैं जंगल में कमी है, तो मेरा मानना है कि इंसानों ने अनजाने में तेंदुओं के लिए 'सब कुछ' इतना आसान बना दिया है कि यह उनके ही जीवन के लिए एक 'खतरनाक जाल' बन गया है।
हाल के दिनों में जयपुर के आसपास तेंदुओं ने कई बार डर और भ्रम का माहौल पैदा कर दिया है। लगने लगा कि मानव–वन्यजीव संघर्ष अचानक बढ़ गया है। लोग कहने लगे कि जंगलों में भोजन कम है, पानी की कमी है, जंगल का क्षेत्र घट रहा है, और यहाँ तक कि वन अधिकारियों को भी दोष दिया जाने लगा कि वे अपना काम ठीक से नहीं कर रहे या उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। दुर्भाग्य से, वन विभाग के कुछ लोग भी इन धारणाओं को समर्थन करते दिखते है। मेरा दृष्टिकोण इसके एक दम विपरीत है।
यह स्थिति केवल जयपुर तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के कई हिस्सों में इसी तरह के पैटर्न देखे गए हैं। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है कि आज हमें इतने अधिक संघर्ष के मामले दिखाई दे रहे हैं?
प्रश्न 1 — क्या तेंदुओं की संख्या बढ़ी है? किसी जंगल में आदर्श रूप से कितने तेंदुए होने चाहिए?
उत्तर: हाँ, तेंदुओं की संख्या निश्चित रूप से बढ़ी है, कितने होने चाहिए इसका जवाब मेरे पास नहीं है परंतु लगता है वर्तमान संख्या सामान्य नहीं है। पिछले 1-2 दसकों में तेंदुओं की संख्या बढ़ने के निम्न तीन मुख्य कारण हैं:
A — वन्यजीवों के प्रति हमारे दृष्टिकोण में बदलाव
पिछले दो दसक में पर्यटन और शिक्षा ने लोगों की सोच को काफी बदला है। पहले तेंदुए को केवल खतरे के रूप में देखा जाता था; आज बहुत से लोग उन्हें जिज्ञासा और प्रशंसा से देखते हैं। पर्यटन के अलावा और पर्यावरण के प्रति आई चेतना के कारण आम लोग और सरकार वन्यजीवों की रक्षा करने को अपना प्रमुख कृतव्य मानने लगे है। इसमें कोई बुराई नहीं, परंतु यह बदलाव उनकी संख्या बढ़ाने का एक मुख्य कारण है। जो उचित है। सरकारों ने वन्यजीव संरक्षण में अधिक ध्यान दिया है और संसाधनों से वन्य जीव सुरक्षा भी बढ़ी है। लोगो द्वारा उसका अवैध शिकार भी कम होने लगा है।
B — जयपुर के वनों में प्रचुर मात्र में पानी की उपलब्धता होना।
यह सबसे महत्वपूर्ण कारण है। पिछले 15-20 वर्षों में देश भर में जंगलों में पानी के सोर्स और अन्य संसाधन बढ़ाए गए हैं। पहले पानी की कमी तेंदुओं की संख्या को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करती थी। आज, हमारे सूखे पर्णपाती वनों में पानी की भरमार उपलब्धता करा दी गई है, इसलिए यह प्राकृतिक नियंत्रण खत्म हो गया है। हर जगह सोलर पम्प और ट्यूबवेल खोद दिए गए है।
C — जयपुर शहर के आसपास इंसानों ने अनजाने में तेंदुओं के लिए अत्यधिक भोजन के ज़रिए पैदा कर दिए हैं:
जयपुर के आसपास कचरे में फेंका गया भोजन
मांस की दुकानों से निकलने वाले मांस-अवशेष
जंगल किनारे मरी हुई पशु लाशें
कचरे पर पलने वाली कुत्तों और सूअरों की बढ़ती संख्या, इसके अलावा चूहों को भी खा कर तेंदुआ अपना समय गुजर सकता है।
यह सब मिलकर तेंदुओं के लिए एक “अनलिमिटेड बुफे” जैसा वातावरण बना देता है। भोजन जितना आसान मिलेगा, उतने अधिक तेंदुए यह क्षेत्र संभाल सकेगा।
तो मीडिया में चल रही चर्चा मिथ्या प्रतीत होती है कि वन अधिकारियों ने जल, भोजन और सुरक्षा कमजोर कर रखी है। यानी असल वजह मेरे अनुसार इसके विपरीत है।
जयपुर शहर के आसपास इंसानों ने अनजाने में तेंदुओं के लिए अत्यधिक भोजन के ज़रिए पैदा कर दिए हैं (फ़ोटो : डॉ धर्मेन्द्र खांडल )
अब कोई कह सकता है कि “जयपुर शहर के आस-पास के क्षेत्र में 125–132 तेंदुए हैं, यह कितनी अच्छी बात है!”
लेकिन सवाल यह है कि —
प्रश्न 2 - क्या जयपुर वास्तव में इतनी बड़ी संख्या को प्राकृतिक रूप से रख सकता है?
उत्तर है — नहीं
क्यों?
क्योंकि शहर के चारों ओर फैला कचरा, अवैध मीट-फेंक, मृत पशुओं का निस्तारण, कुत्ते–सूअर–चूहों की बढ़ती संख्या — ये सब एक “आसान भोजन” का झूठा भ्रम पैदा करते हैं।
तेंदुआ सोचता है कि यहाँ भरपूर भोजन है, लेकिन यह प्राकृतिक भोजन नहीं, बल्कि कचरे पर पनपा हुआ अप्राकृतिक भोजन है।
ऐसी स्थिति ही "पारिस्थितिक जाल" (Ecological Trap)कहलाती है — जिसका सिद्धांत J.A. Krebs ने 1970 के दशक में दिया था।
Ecological Trap का अर्थ है
ऐसा आवास जो जानवरों को बाहर से आकर्षक और सुरक्षित दिखता है, लेकिन वास्तव में वह उनके जीवन के लिए पर्याप्त नहीं होता है। यह स्थिति अक्सर मानव-निर्मित परिवर्तनों के कारण पैदा होती है।
प्रश्न 3 — जब भोजन पर्याप्त है, पानी भी पर्याप्त है, स्थान भी सुरक्षित है, तो फिर तेंदुआ बाहर आने की आवश्यकता क्यों महसूस करता है?
उत्तर — इस प्रश्न को समझने के लिए हमें अपने जंगलों की वास्तविक स्थिति को दोबारा, और सही दृष्टि से देखना होगा। आज हमारे कई जंगल पारिस्थितिक जाल बन चुके हैं।
एक सीमा तक जंगल संख्या झेल लेता है, लेकिन जब:
मुख्य नर तेंदुए, युवाओं को क्षेत्र में रहने नहीं देते
क्षेत्र सीमित है
प्राकृतिक शिकार पर्याप्त नहीं है और अब इतने तेंदुओं के बीच उन्हें बढ़ाना भी आसान नहीं है।
मानव-निर्मित भोजन की उपलब्धता अनिश्चित हो सकती है या जोखिम भरा हो जाता है
तो युवा नर और उप-वयस्क तेंदुए नई जगह खोजने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
यही कारण है कि वे शहरों, खेतों, औद्योगिक इलाकों और हाइवे के आसपास अधिक दिखाई देते हैं।
एक सीमा तक जंगल बढ़ती संख्या झेल लेता है उसके बाद युवा और अवयस्क तेंदुए नई जगह खोजने के लिए मजबूर हो जाते हैं। (फ़ोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)
प्रश्न 4 - क्या हमारे जंगल वास्तव में अपर्याप्त हैं, या हम वन्यजीवों के व्यवहार को गलत समझ रहे हैं?
तेंदुओं की संख्या को पानी और भोजन के अलावा बाघ ही नियंत्रित कर सकते, चूँकि जयपुर के वनों—में बाघ है ही नहीं, यह भी एक कारण बनता है उनकी संख्या बढ़ने का।
जहाँ बाघ गायब होते हैं, वहाँ तेंदुओं की संख्या पर प्राकृतिक नियंत्रण भी खत्म हो जाता है।
मौजूदा प्राकृतिक शिकार (चीतल, सांभर, नीलगाय आदि) इतनी बड़ी संख्या को सस्टेन ही नहीं कर सकता
और यदि हम प्राकृतिक शिकार बढ़ाने की कोशिश करें, तो बड़ी संख्या में मौजूद तेंदुए उसे तुरंत खत्म कर देंगे
यानी न तो प्राकृतिक भोजन बढ़ सकता है, और न ही संख्या स्वाभाविक रूप से नियंत्रित हो सकती है
यही कारण है कि यह संख्या बढ़ना विकास का संकेत नहीं, बल्कि एक भविष्य का संकट है।
अक्सर तेंदुओं को जयपुर से पकड़कर अन्य जगह पर छोड़ दिया जाता है, जो की नई समस्या को जन्म देता है (फ़ोटो: धर्मेन्द्र खांडल)
स्थानांतरित (Relocate) करने की समस्या
अक्सर तेंदुओं को जयपुर से पकड़कर:
लोहारगल
शाकंभरी
मनसा माता
जैसे इलाकों में छोड़ दिया जाता है। लेकिन वहाँ पहले से ही कम घनत्व वाली प्राकृतिक तेंदुआ आबादी मौजूद है। अचानक एक नया, संघर्षशील युवा नर पहुँचने पर:
स्थानीय तेंदुओं को नुकसान पहुँच सकता है
मानव–वन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है
यानी समाधान के नाम पर एक नई समस्या पैदा की जाती है।
अंत में — वास्तविक समाधान क्या है?
इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक है कि:
शहरों और जंगलों के आसपास फैला कचरा पूरी तरह नियंत्रित और साफ रखा जाए
अप्राकृतिक भोजन समाप्त किया जाए
जंगलों को धीरे–धीरे प्राकृतिक रूप में लौटाया जाए
आबादी को विस्फोटक स्तर तक पहुँचने न दिया जाए
तभी तेंदुओं की संख्या प्राकृतिक ढंग से स्थिर होगी और संघर्ष कम होगा। इसका कोई आसान हल नहीं है। इसके साथ जीना सीखना होगा।
देश के ग्रामीण अंचलों में जगह-जगह तालाब (जोहड) मिलते हैं जिनका आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक महत्व तो है ही उनका पारिस्थतिकीय महत्व भी कम नहीं है। इन ग्रामीण तालाबों का कैचमेन्ट आस -पास का क्षेत्र होता है तो कई बार कैचमेन्ट जलाशय से काफी दूर भी स्थित होता है। ऐसी स्थिति में दूरस्थ कैचमेन्ट को जलाशय से कोई न कोई नाला जोड़ने का काम करता है। आस-पास के कैचमेन्ट वाले जलाशयों का पानी प्रायः सभी दिशाओं से बहता हुआ जलाशय में पहुँच कर जमा होता रहता है लेकिन दूरस्थ कैचमेन्ट की स्थिति में कैचमेन्ट का जल नाले के रास्ते से बहता हुआ जलाशय में पहुँचता है। (चित्र 1.1 एवं 1.2)
चित्र 1.1: स्थानीय कैचमेन्ट युक्त तालाब
चित्र 1.2: एक तालाब, दूर स्थित कैचमेन्ट से, नाले से जुड़ा हुआ।
नोट: (S=सीढी/घाट, T=धार्मिक स्थल, I=द्वीप, V= गाँव, P= रास्ता, SP= अतिरिक्त जल निकासी हेतु ओटा, N= नाला, TT= वनस्पतियां, R=चट्टानों के टुकडे, D= पाल/तट बन्ध, M=मार्सी क्षेत्र)
गाँव के तालाबों के पानी को रोके रखने हेतु उन पर ढाल की तरफ अर्धचंद्राकार या गोलाकार मिट्टी के तटबन्ध बनाये जाते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में ’पाल’ (embankment) कहा जाता हैं। पाल पर कई बार तरह - तरह के वृक्ष भी लगाए जाते हैं या अपने आप उग आते हैं जिन्हें पाल वृक्ष (embankment trees) कहा जाता है।
तालाबों, एनीकटों व बांधो के मिट्टी की बनी पाल या तटबन्धों पर कोई देव स्थान, नहाने के घाट, उतरने-चढ़ने की सीढ़ियाँ, खुर्रे या रपट, ओटा (spill over) आदि विद्यमान हो सकते हैं। पाल वृक्ष, पाल की मिट्टी को बाँध कर रखते हैं तथा बहते वर्षा जल व हवा से उसे कटने से बचाते हैं एवं तटबन्ध को सुरक्षा प्रदान करते हैं। पाल वृक्षों की वजह से तालाबों की सुन्दरता तो बढती ही है उनकी छाया में पालतू व वन्य पशु तथा मनुष्य विश्राम करते हैं। पाल वृक्षों से चारा, फल, फूल, शहद, गौंद, ईंधन, आदि लघु वन उपज भी मिलते हैं। पाल वृक्षों पर तरह - तरह के पक्षी, लंगूर, बंदर, गिलहरी, गिरगिट, बागल, बिज्जू (civet) आदि बसेरा करते हैं एंव प्रजनन भी करते हैं। पाल वृक्ष के कोटरों में उल्लू, बसंता, मैना, टिट आदि पक्षी प्रजनन से लेकर रात्रि विश्राम करते हैं।
ग्रामीण क्षेत्रों में मेलों व धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन प्रायः तालाबों के पास होता है एवं इन कार्यों हेतु पाल वृक्ष बहुत काम आते हैं। गाँव के बच्चों द्वारा वृक्षों पर झूले डाले जाते हैं। वन क्षेत्रों से दूर ये तालाब एक अच्छे “वाटर होल” (water hole) की भूमिका भी निभाते हैं तथा वनों से दूर खेतों, पडत, बंजर व चारागाहों में रहने वाले वन्यप्राणी यहां पानी पीने आते हैं। कई बार पाल वृक्षों पर बागलों (Flying Fox-Pteropus gigenticus) की कॉलोनियां पाई जाती हैं। बागल भूमि पर उतर कर पानी नहीं पी सकती बल्कि वे उडते हुए ही पानी पीती हैं इसलिये उनको बडा व खुला जलाशय ही रास आता है। ये बागल परागण व प्रकीर्णन का कार्य कर प्रकृति में सकारात्मक भूमिका निभाती हैं।
पाल वृक्षों की विशेषतायें व सही प्रजातियों का रोपण हेतु चयन:
“पाल” वस्तुतः एक बड़ा मिट्टी का डौला (Bund or mound) है जिस पर मिट्टी का कटाव चलता रहता है। अतः पाल पर उगे वृक्ष की जडें भूमि क्षरण की वजह से आने वाले वर्षों में आंशिक रूप से नंगी हो जाती हैं तथा दिखने लग जाती हैं। समय-समय पर ग्रामीण अपने श्रम से या किसी सरकारी योजना अन्तर्गत तालाब को गहरा करने हेतु, मिट्टी खोद कर पाल पर डालते हैं जिससे न केवल जडें बल्कि तने पर भी एक ऊँचाई तक मिट्टी चढा दी जाती है। मिट्टी की कमी व मिट्टी की अधिकता को फाइकस वंश (Genus Ficus) अच्छी तरह सहन कर सकता है। इस लिहाज से पीपल (Ficus religiosa), बरगद (Ficus benghalensis), गूलर (Ficus recemosa), पाखड (Ficus virens), पिपरानी (Ficus lambertiana), पलक या पिंपरी (Ficus amplecema), करंज (Pongamia pinnata) आदि पाल हेतु अधिक उपयुक्त प्रजातियां है एवं प्राय इनका रोपण भी काफी किया जाता है। कई जगह नीम, इमली, आम, देशी बबूल, रायण, महुआ, जामुन, खेजडी, इन्द्रधोक (Anogeissus sericea nummularia) आदि भी पाल पर रोपित किये जाते हैं या सुरक्षित रखे जाते हैं।
कदम - तालाब
धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्य हेतु कई बार ग्रामीणजन अपने गाँव के जलाशय की पाल पर न्यूनतम एक कदम (Mitragyna parvifolia) का पौधा भी लगाते हैं जो कालांतर में वृक्ष के रूप में पनप जाते हैं (चित्र 2.1 से 2.4)। कई बार एक से अधिक कदम वृक्षों को भी पनपाया जाता है। एक बार रोपण से तैयार होने पर गिरने वाले बीजों से नए कदम भी अपने आप पनपते रहते हैं। जिन तालाबों पर कदम प्रजाति का एक या अधिक वृक्ष “पाल वृक्ष” के रूप में विद्यमान हो उस तालाब को “कदम - तालाब” या “कदमा तालाब” कहा जाता है। पूर्वी राजस्थान में जगह - जगह कदम - तालाब देखने को मिलते हैं। अलवर जिले में मुण्डावर-बहरोड क्षेत्र में हुलमाणा कलाँ, गादली की ढाणी, बीजवाड चैहान, फौलादपुर, काँटी खेडी आदि गाँवों के कदम तालाब उल्लेखनीय हैं। पूर्वी राजस्थान के इस क्षेत्र से सटे व निरंतरता आगे तक हरियाणा राज्य के रेवाडी, झज्जर आदि जिलों के विभिन्न गाँवों में भी कदम तालाब देखने को मिलते हैं। कदम तालाबों में स्थानीय ग्राम एवं आस-पास के अन्य ग्राम जहाँ कदम तालाब उपस्थित नहीं है वहाँ की महिलाएं विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम श्रावण मास में कदम वृक्ष के नीचे संपन्न करती हैं। कई तरह के उपवासों में खाना घर से बनाकर महिलाएं गीत गाते हुए कदम तालाब पर पहुँचती हैं तथा कदम वृक्ष के नीचे बैठकर सामूहिक भोज कर उपवास खोलती हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।
चित्र 2.1: मित्रागायना पार्वीफोलिया: वर्षा काल में
चित्र 2.2: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पतझड काल में
चित्र 2.3: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प काल क्लोजअप
चित्र 2.4: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प मुण्ड क्लोजअप
कदम कुण्ड
कदम तालाब की तरह सामान्य कुण्डों के मुकाबले कदम कुण्ड भी धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों हेतु विशेष महत्व रखते हैं। पहाड़ों में जगह-जगह खोखले गड्ढेनुमा या गुफानुमा स्थान मिलते हैं जिन्हें “कुण्ड” कहा जाता है। कुण्डों में वर्ष प्रान्त या वर्षाकाल एवं सर्दी के मौसम में पानी विद्यमान रहता है। अजमेर जिले में पुष्कर में पास पंचकुण्ड, अलवर जिले में रेणागिरि गाँव के पास परशुराम कुण्ड, बडा बेरा कुण्ड, हनुमान कुण्ड; झुंझुनू जिले में लोहार्गल कुण्ड, चिराणा गाँव के “ताताकुण्ड” व “ठण्डाकुण्ड” आदि प्रसिद्ध हैं। यदि किसी कुण्ड के पास कदम (Mitragyna parvifolia) का वृक्ष उगा हो तो उसे “कदम कुण्ड” कहा जाता है। सीकर जिले में नीम का थाना कस्बे के पास छापोली गाँव में एक कदम कुण्ड बहुत प्रसिद्ध है। स्थानीय जनों द्वारा सामान्य कुंडों की तुलना में कदम कुण्ड में धार्मिक अनुष्ठान करने को प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे कुण्डों में विशेष रूप से श्रद्धालु स्नान करने को प्राथमिकता देते हैं जिनके पास कदम वृक्ष विद्यमान हो।
कदम रोपण
कदम या कदम्ब के नाम से दो वृक्ष प्रजातियां, मित्रागायना पार्वीफोलिया (Mitragyna parvifolia) (चित्र 2.1 से 2.4) तथा नियोलैमार्किया कदंबा (Neolamarckia cadamba) (चित्र 3.1 से 3.3) ज्ञात हैं। मित्रागायना पार्वीफोलिया जिसे कलम नाम से भी जाना जाता है, लेकिन बोल- चाल में 'कदम' नाम ही अधिक प्रचलित हैं। प्राकृतिक रूप से यह प्रजाति राजस्थान के पहाड़ी वनों में जगह-जगह देखने को मिलता है जबकि नियोलैमार्किया कदंबा प्राकृतिक रूप से राजस्थान में नहीं पाया जाता। यह प्रजाति जहाँ भी राजस्थान में देखने को मिलती है किसी न किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा रोपित की गई होती है। मित्रागायना पार्वीफोलिया सामान्यता पहाड़ों से दूर नहीं मिलती। प्राचीन समय में पौधशालाओं का भी अभाव था अतः पुराने समय में ग्रामीण लोग पहाडी वन क्षेत्र से वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से उगे कदम के छोटे पौधों को मिट्टी के पिण्ड सहित खोद कर लाते थे तथा अपने गाँव के तालाब की पाल पर रोपित करते थे एवं समय-समय पर पानी पिलाकर उसे बडा होने देते थे। इस दौरान बाडबन्दी कर उसे गाँव के पशुओं से चराई व रौंदने से सुरक्षा प्रदान करते थे। इस तरह ग्रामीण अपने गाँव के सामान्य तालाब को एक कदम तालाब बना देते थे। गाँव का कोई भी व्यक्ति तालाब के कदम वृक्ष को नुकसान नहीं पहुँचाता था। समय के साथ बढ़े हुए कदम वृक्ष के बीज गिर कर नए कदम वृक्ष पनपाने लगते थे। आस - पास के लोग अब किसी पर्वतीय वन से नहीं बल्कि किसी गाँव के तालाब से नया कदम पौधा लेकर दूसरे तालाब पर रोपित करते रहते थे। इस तरह इस प्रजाति का फैलाव वन क्षेत्र से दूर होता रहता था। लेकिन समय के साथ कदम वृक्ष रोपण का सिलसिला लगभग समाप्त हो गया है। आज जो भी कदम गाँव में तालाबों के तट पर नजर आते हैं वे तीन - चार पीढ़ियों पहले तक के ही नजर आते हैं।
चित्र 3.1: नियोलैमार्किया कदंबा वृक्ष
चित्र 3.2: नियोलैमार्किया कदंबा पुष्प काल में
चित्र 3.3: नियोलैमार्किया कदंबा पुष्प
राजस्थान के तालाबों के तट पर विशेष रूप से संरक्षित किये जाने वाले कदम तथा इन्द्र धोक (Anogeissus sericea var. nummularia) दो खास वृक्ष हैं। इन्द्र धोक राजस्थान के अनेक भागों में, खास तौर से पश्चिमी राजस्थान के अर्द्ध - शुष्क क्षेत्र के तालाबों के तट पर पाया जाता है तथा समाज द्वारा सदियों से संरक्षित किया जा रहा है। राजस्थान के तालाब तटों पर बरगद, पीपल एवं नीम भी विशेष रूप से पाये जाते हैं जिनका महत्व सर्व विदित है। हमें तालाबों की पालों पर वृक्षो को लगाने, बचाने व संरक्षित करने की परंपरा को ससम्मान बचाये रखना चाहिए।
राजस्थान में तालाबों, जोहडों, नाडियों, बावडियों, केवडियों आदि परंपरागत जल संरक्षण संरचनाओं का सदियों से महत्व रहा है। तालाबों के कई आकार - प्रकार एवं नामकरण भी प्रचलन में रहे हैं। जिस तरह कदम की उपस्थिति से कोई तालाब कदम तालाब के रूप में जाना जाता है उसी तरह कमल यानि पदम की उपस्थिति से कई तालाब “पदम तालाब” का खिताब पाते रहे हैं। हमें जतनपूर्वक अपने तालाबों को बचाकर अच्छी प्राचीन परम्पराओं को अगली पीढ़ी को सौंपने में गर्व महसूस करना चाहिये।
गंध सिर्फ़ गंध नहीं, स्मृति, पहचान और भविष्य की चेतावनी भी होती है। अगर हम इन सूक्ष्म संकेतों को जान लें, तो सिर्फ़ हवा नहीं, हमारी ज़िंदगी भी फिर से महक सकती है।
तड़के चार बजे — जब गर्मी से झुलसते राजस्थान में भी हवा हल्की ठंडी लगती है — कच्ची गली में पारिजात (Nyctanthes arbor-tristis) के फूल ज़मीन पर गिरे हुए आमतौर पर दिख ही जाते थे। दूधिया पंखुड़ियों के बीच नारंगी नली वाले फूल ऐसे बिछ जाते थे मानो ज़मीन ने खुद चंदन तिलक लगा लिया हो। दादी का धीमी आवाज़ में कहना, “जब तक यह खुशबू बचेगी, हमारी सुबहें बचेगी।” आज ये शब्द कहाँ सुनने को मिलते है। आज वही गली पक्के टाइलों से ढंक चुकी है, ड्रेनेज पाइप्स की गंध ने पारिजात के माधुर्य को दबा दिया है। जाने‐पहचाने फूलों का यह ‘सुबह का पहला नमस्कार’ कब फीका पड़ गया, किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। ठीक यही कहानी, राजस्थान के कई खुशबू वाले जंगली पौधों के साथ चल रही है — सुगंध पहले ग़ायब होती है, संकट का नोटिस बाद में आता है।
रेगिस्तान की खुशबुओं का भूगोल
मरु-प्रदेश की भट्टी-सी गर्मी, तेज़ धूप और कम आद्र्रता ने यहाँ के क़ुदरती वृक्षों एवं झाड़ियों में एक अनोखी विशेषता भर दी है— ये पौधे अपने पत्तों और लकड़ियों में सुगंधित तेल (टर्पीन / Terpene जैसा खुशबूदार रस) जमा कर लेते हैं। दोपहर की तेज़ गरमी में यही तेल धीरे-धीरे उड़कर ऐसा “सूखा इत्र” बनाते हैं, जो कभी चरवाहों, गृहिणियों, साधुओं और किले-कस्बों की हवा में घुला रहता था।
#
क्षेत्र
सुगंध के स्रोत
खुशबू का प्रकार
1
अरावली की पहाड़ियाँ (अलवर से डूंगरपुर तक)
गुग्गल और सलाई के झुरमुट
मंदिर की धूप जैसी मीठी-मसालेदार खुशबू
2
थार के चलते-फिरते टीले (जैसलमेर, बाड़मेर)
खावी घास और गांधेल
नींबू-अदरक की तरोताज़ी, फिर सूखे भूसे के हल्के धुएं की गंध
3
चंबल-और लूणी के कन्दरा क्षेत्र
झाऊ और केर की झाड़ियाँ
तीखी कपूर-नीम जैसी गंध जो काफी दूर तक आती है; बरसात के बाद हवा में ताजगी का अहसास
4
केवलादेव, भरतपुर, से धौलपुर, तक का क्षेत्र
खस-खस की गहरी जड़ें
ठंडी मिट्टी-सी भीनी खुशबू, रात की हवा में घुली सुगंध
5
सवाई माधोपुर (रणथंभौर के आसपास)
नदी-किनारे उगती खस-खस व पहाड़ी ढलानों की खावी घास
भीनी भीनी ठंडक एवं नींबू-अदरक की ताज़गी; जंगल सफ़ारी के वक्त अक्सर महसूस होती है
6
माउंट आबू का पहाड़ी ठंडा ऊपरी क्षेत्र
फुलेड़ घास और जंगली पहाड़ी जड़ी-बूटियाँ
पुदीने जैसी ठंडी-मीठी सुगंध जो की शाम की नमी में और उभरती है
7
अरावली की दक्षिणी पहाड़ियाँ (उदयपुर, डूंगरपुर)
पामा रोसा घास (गंधबेल या जिन्जर ग्रास)
गुलाब-सी मीठी गंध; परफ्यूम कंपनियों का छिपा ख़ज़ाना
खुशबूओं की यह भू-रसायनशाला अब तापमान वृद्धि, भूमिगत जल दोहन, खनन तथा चारागाह के दबावों के तले सिकुड़ रही है। अगर ध्यान न दिया गया तो आने वाली हवा सिर्फ़ गरम और सूखी रहेगी, उसमें खुशबू का कोई झोंका नहीं बचेगा।
प्राकृतिक गंध के स्रोत
गुग्गल (Commiphora wightii) – अरावली क्षेत्र में
नीले आसमान तले भीषण गर्मी झेलता यह झाड़-नुमा पौधा, हल्के चाकलेटी तने पर जब हल्की कट लगती है, तो आँसू-सा पीला राल रिसता है। यही “गुग्गल धूप” मंदिरों-घरों में धार्मिक कार्यों, पूजन के समय जलाया जाता है। अनियंत्रित दोहन ने 1950 से आज तक इसके प्राकृतिक भंडार को 80 % तक घटा दिया है। इसके बीज अंकुरण की क्षमता काफी कम, लगभग 10 प्रतिशत ही है। गुजरात-राजस्थान सीमा के कुछ क्षेत्रों में सामुदायिक “हल्की खरोंच-पद्धति” ने इसको होने वाले नुकसान को आधा कर दिया है पर फिर भी यह IUCN की ‘क्रिटिकली एंडेंजर्ड’ सूची में अब भी शामिल है।
क्या आप पहचानते हैं इस गुग्गल को? इसकी मीठी सुगंध कभी रेगिस्तान की हवा में घुली रहती थी। (चित्र: सोनू)
खावी (Cymbopogon jwarancusa) — पश्चिम राजस्थान के थार क्षेत्र में
चलते-चलते बारीक रेत पर पाँव पटकें तो हवा में एक तीखी मीठी, नींबू‐अदरक की ताजगी वाली गंध महसूस होती है; इसका कारण खावी घास है। एक समय था जब चरवाहे इस घास से बुखार के इलाज के लिए पारंपरिक देसी लेप बनाते थे, तो महिलाएँ इसे कूट कर अनाज भंडार में कीटों की रोकथाम के लिए रखती थीं। इन दिनों चराई के दबाव और इत्र उद्योग हेतु अति संग्रहण ने इस घास को खात्मे की ओर धकेल दिया है। फलस्वरूप बीज-बैकों की रिकव्हरी घट कर एक-तिहाई रह गई।
गांधेल (Iseilema anthephoroides)
मॉनसून की पहली फुहार पड़ते ही सूखी धरती पर जो ‘भीगी-मिट्टी और कच्ची घास’ की एक विशिष्ट मिलीजुली खुशबू आती है, उसका जनक यही वार्षिक घास है। गाँव के किसान इस खुशबू से ही समझ जाते हैं कि अब बोआई (बुआई) का समय आ गया है। पहले, रबी और खरीफ की फसलों के बीच जो ज़मीन कुछ समय खाली रहती थी, अब वह लगातार काम में ली जाने लगी है। आजकल मॉनसून से पहले ही ट्रैक्टर से जुताई हो जाने की वजह से गांधेल को पनपने का समय ही नहीं मिलता।
मॉनसून की पहली फुहार पड़ते ही सूखी धरती पर 'भीगी-मिट्टी और कच्ची घास' की विशिष्ट खुशबू आती है, उसका जनक यही वार्षिक घास गांधेल है। (चित्र: सोनू)
झाहू (Artemisia scoparia)
इस घास के गेहुँआ-हरे पत्तों को हाथ से मसलते ही कपूर या नीम जैसी तेज़, झंझनाती खुशबू निकलती है। गाँव के पुराने वैद्य इसे सुखाकर धुआँ करने के लिए रखते थे — जिससे साँप-बिच्छू भागते थे, बुखार कम होता था, और कभी-कभी इसे मसालेदार चाय में भी डाला जाता था। लेकिन पिछले 20 सालों में विलायती बबूल (Prosopis juliflora) ने झाहू की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया है। अब झाहू के उगने और बढ़ने हेतु जरूरी धूप और पानी की जरूरत के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है जिसमें यह घास धीरे-धीरे पिछड़ता जा रहा है।
तेज कपूर-नीम जैसी खुशबू वाली झाहू (Artemisia scoparia) घास आज विलायती बबूल से संघर्ष कर रही है। (चित्र: सोनू)
खस-खस (Chrysopogon zizanoides)
नदी किनारे उगने वाली खस की घास अपनी गहरी जड़ों से मिट्टी को बाँधे रखती है, और इन्हीं जड़ों से मिलने वाला तेल महँगे इत्र में इस्तेमाल होता है। पहले गर्मियों में जब खस की चटाई पर पानी छिड़का जाता था, तो कमरा ठंडा हो जाता था — जैसे कोई प्राकृतिक एयर-कूलर हो। लेकिन अब रेत की खुदाई और खस की जड़ों की लूट से इसके घने झुरमुट खत्म होते जा रहे हैं।
नदी किनारे उगने वाली खस-खस (Chrysopogon zizanioides) की घास अपनी गहरी जड़ों से मिट्टी को बाँधे रखती है। इन्हीं जड़ों से मिलने वाला तेल महँगे इत्र में इस्तेमाल होता है। (चित्र: सोनू)
मिर्च-गंध (पल्मारोसा) (Cymbopogon martinii)
उदयपुर की पहाड़ी ढलानों पर उगने वाली पल्मारोसा घास से गुलाब जैसी मीठी और हल्की मिर्च जैसी खुशबू आती है। इसका तेल विदेशी परफ्यूम का अहम हिस्सा है। लेकिन अब जंगल कटने और नई हाईब्रिड घासों के फैलने से असली जंगली पल्मारोसा कम होती जा रही है। हम चाहें तो इसे बचा सकते हैं—स्थानीय नर्सरी से इसके जंगली बीज लेकर खेतों की मेड़ों या खाली ज़मीन पर इसे फिर से उगा सकते हैं।
यह है पल्मारोसा घास, जिसकी गुलाब जैसी मीठी और हल्की मिर्च जैसी खुशबू अब जंगलों के कटने से धीरे-धीरे कम होती जा रही है। (चित्र: सोनू)
गुंदेल (Themeda quadrivalvis)
रात को आग में डाला गया गुंदेल सूखे भूसे जैसी लेकिन हल्की मीठी खुशबू छोड़ता है। पहले यह घास टीलों पर बड़े-बड़े झुरमुटों में उगती थी, लेकिन अब बिना रोकटोक की चराई और बार-बार लगाई गई घास की आग से यह बिखरती जा रही है। हम चाहें तो इसे वापस ला सकते हैं — चरवाहों और ग्रामीणों के साथ मिलकर खेतों में आग लगाने की प्रक्रिया को रोकने की एक आसान सी योजना बनाएं, जिससे गुंदेल फिर से घना उग सके।
गुंदेल: सूखे भूसे-सी दिखने वाली यह घास अक्सर टीलों पर घने झुरमुटों में उगती है। (चित्र: सोनू)
फुलेड़ (Apluda mutica)
राजस्थान के इकलौते पहाड़ी ठिकाने माउंट आबू की नम चट्टानों पर उगने वाला फुलेड़ एक खास घास है, जिसकी पत्तियाँ रगड़ने पर हल्की पुदीना जैसी ठंडी खुशबू आती है। लेकिन अब चट्टानों की खुदाई और नमी के घटने से यह घास धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। फुलेड़ के खास इलाकों को पहचान कर और उन्हे “हॉट-स्पॉट” के रूप में चिन्हित कर इन जगहों को खनन से बचाकर हम इसे बचा सकते हैं।
पहाड़ों की ठंडी खुशबू, फुलेड़ घास (Apluda mutica), की पुदीना-सी महक शाम की नमी में और उभरती है। (चित्र: सोनू)
जंगली तुलसी / नगद भाबरी (Ocimum canum)
नगद भाँवरी, जिसे कई जगह जंगली तुलसी भी कहा जाता है, एक झाड़ीदार पौधा है जिसकी पत्तियों को छूते ही तेज़, नींबू-कपूर जैसी तीखी खुशबू हवा में फैल जाती है। इसकी पत्तियाँ कीटों को दूर रखने, त्वचा के संक्रमण में लेप बनाने और देसी इत्र में बेस की तरह उपयोग होती रही हैं। रणथंभौर में जंगल सफ़ारी के दौरान जब जीपों के पहिए इस झाड़ी को कुचलते हैं, तो अचानक एक ताज़ा, तीखी गंध हवा में भर जाती है — यह उस जंगल की पहचान बन गई है। इस गंध को एक बार महसूस कर लेने के बाद, वह सफ़ारी हमेशा के लिए स्मृति में बस जाती है।
ग्वारपाठा (Aloe vera)
ग्वारपाठा भले ही हमारे लिए महकता न लगे, लेकिन इसकी कटने पर निकलने वाली मिट्टी-जैसी हल्की गंध और ठंडा गूदा कई औषधीय कामों में आता है। हो सकता है हमें इसकी खुशबू महसूस न हो, पर मक्खियाँ इसे अच्छी तरह पहचानती हैं — और इससे दूर भागती हैं। शायद यही वजह है कि कई आदिवासी समुदाय इसे सूखने के बाद अपने घर की छतों से उल्टा लटका देते थे, ताकि घर में मक्खियाँ न आएँ और हवा शुद्ध बनी रहे। औषधीय गुणों से भरपूर यह पौधा, गंध की अदृश्य दुनिया में अपना एक अलग ही स्थान रखता है।
क्या आप जानते हैं कि ग्वारपाठा की भी अपनी एक अनोखी गंध होती है? (चित्र: प्रवीण)
ये सुगंधित घासें सिर्फ़ हमारी यादों से नहीं जुड़ी हैं, बल्कि मिट्टी को थामने, कीड़ों को भगाने और गाँवों की कमाई बढ़ाने का भी काम करती हैं। तो अगली बार जब राजस्थान की गर्म हवा चेहरे से टकराए, एक पल ठहरकर सूँघिए—क्या उसमें गुग्गल का धुआँ है, खावी की हरी ताज़गी है या खस की मिट्टी जैसी ठंडक बाकी है?
अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो घबराने की ज़रूरत नहीं—अब भी वक्त है। एक बीज बोइए, एक झाड़ी वाला कोना बचाइए, और उस मिट्टी की खोती खुशबू को फिर से लौटाइए।
और भी सुगंधें, और भी कहानियाँ
राजस्थान की खुशबू सिर्फ़ जंगली घासों तक सीमित नहीं है। हमारे गाँव-आँगन और खेतों की मेड़ों पर भी कई पारंपरिक खुशबू वाले पौधे सदियों से पले हैं — जो दवा, पूजन और घरेलू उपयोग में गहराई से जुड़े हैं। तुलसी की अलग-अलग किस्में (राम तुलसी, कृष्णा तुलसी, वन तुलसी) न सिर्फ़ हवा को शुद्ध करती हैं, बल्कि इसकी तेज़ गंध और चाय में मिलाई जाने वाली पत्तियाँ रोग प्रतिरोधक ताकत देती हैं। मरुआ (Origanum majorana), जिसे ‘सदाबहार तुलसी’ भी कहते हैं की सूखी गंध वाली पत्तियाँ पुराने घरों में सिरहाने रखी जाती थीं।
पुदीना की तेज़, ठंडी सुगंध रसोई और देसी इलाज दोनों में बसी हुई है। रात को खिलने वाली रात की रानी(Cestrum nocturnum) और दिन में महकने वाला दिन का राजा (Cestrum diurnum) — दोनों मिलकर गंध की प्राकृतिक घड़ी जैसे काम करते हैं। खेतों की मेड़ों या मंदिरों के पास खिले गेंदे के फूलों की मिट्टी से मिलती तीखी महक, त्योहारों और व्रतों की याद दिलाती है।
अन्य उल्लेखनीय खुशबूदार पौधे:
राजस्थान की सुगंध-परंपरा में और भी कई वनस्पतियाँ हैं — जैसे केवड़ा की तीखी इत्र-जैसी गंध, नीम और धतूरे की विशिष्ट तीव्र महक, तथा सेवण जैसी घासें जो ज़मीन को थामे रखने के साथ-साथ हवा को अपनी विशेष पहचान देती हैं। ये सब मिलकर उस अदृश्य विरासत का हिस्सा हैं, जो हमारी नाक से ज़्यादा स्मृति और संस्कृति में महकती है।
खुशबुओं का मंद पड़ना — प्रमुख कारण
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कारण
प्रभाव
उदाहरण
1
अनियंत्रित दोहन
राल या घास काटने की रफ़्तार पुनर्जनन से तेज़ हो गई
गुग्गल की गहरी कटाई, खावी की जड़ों समेत उखाड़ना
2
चराई व आगजनी
फूल-आने से पहले चराई, गर्मियों में आग से बीज नष्ट
गांधेल के बीज उपलब्ध न होना, झाहू की झाड़ियों पर आग पुनरुद्भवन हेतु
3
खनन व सौर-पार्क
झाड़ियों और घासों का प्राकृतिक आवास नष्ट होता जा रहा है
अरावली में बॉक्साइट खनन एवं जैसलमेर में सौर ऊर्जा क्लस्टर का दुष्प्रभाव जारी है
4
जलवायु परिवर्तन
तापमान बढ़ने से तेल की सुगंध और गुणों में बदलाव
खस और खावी की खुशबू में कमी के शुरुआती संकेत प्रतीत हो रहे हैं
5
सांस्कृतिक विस्मरण
पारंपरिक उपयोग घटा; नई चीज़ों ने पुराने तरीकों को हटाया
खस की मट की जगह प्लास्टिक कूलर, इत्र फैक्ट्रियों का असर
क्या किया जा रहा है?
सामुदायिक राल-संग्रह समिति, जालोर: गाँवों में बनी समितियाँ अब यह नियम मान रही हैं: “ऊँची चार कट नहीं, सतही दो खरोंच”। इससे गुग्गल के पौधे को ज़्यादा नुकसान नहीं होता। निगरानी भी अब साझेदारी से होती है — सभी हिस्सेदार मिलकर तय करते हैं कि दोहन कितना और कैसे हो।
CIMAP-जोधपुर का खस नर्सरी कार्यक्रम: खस की खेती में अब सूक्ष्म सिंचाई और फसलों के बीच संतुलन (अंतरफसल) अपनाया जा रहा है। इससे खुशबू वाला तेल (EO) अच्छा बना रहता है, और किसानों की आमदनी में करीब 30% तक बढ़ोतरी हुई है।
खावी चारागाह विश्राम-चक्र, बाड़मेर: बाड़मेर में 500 हेक्टेयर ज़मीन पर तीन महीने का नो-ग्रेज़िंग रोटेशन लागू किया गया है। यानी बारी-बारी से चराई रोककर घास को उगने का समय मिलता है। तीसरे साल जब बीज डाले गए, तो 65% से ज़्यादा हिस्सा फिर से हरा हुआ।
स्कूल सुगंध उद्यान: अब गाँव के स्कूलों में 25 × 25 मीटर का एक खास प्लॉट बनाया जा रहा है — जहाँ खाने और महकने वाली जड़ी-बूटियाँ और घासें लगाई जाती हैं। बच्चे हर पौधे पर टैग लगाते हैं, और गंध का छोटा हर्बेरियम (संग्रह) बनाते हैं — एक खेल के साथ सिखाई जाने वाली विज्ञान की सीख।
सुगंध जो हवा ले गई
अगर आपने कभी पारिजात की वह हल्की, मीठी खुशबू महसूस की है — जो बस छूने भर से उड़ जाती है — तो याद कीजिए, वह एहसास किसी इत्र की शीशी में नहीं, आपके अपने आँगन में पला था। राजस्थान की हवा से ऐसे ही कई जंगली इत्र-घर धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। जब खुशबू जाती है, तो साथ में हमारी स्मृतियाँ भी फीकी पड़ जाती हैं — हमारी लोक-कथाएँ, मौसम की पहचान, मंदिर की आरती की महक, और पशुपालकों की जड़ी-बूटियाँ, सब कमजोर हो जाती हैं।
अगली बार जब थार की गर्म हवा आपके गाल से टकराए, तो एक पल ठहरकर सूँघिए — क्या उसमें खावी की नींबू जैसी ताजगी है? झाहू की कपूर जैसी छुअन है? अगर नहीं, तो शायद यही सही समय है किसी स्कूल-उद्यान में एक बीज बोने का, किसी गुग्गल झाड़ी को नाखून-भर खरोंच कर छोड़ देने का, या किसी बच्चे को यह बताने का कि पहली बारिश की असली खबर ‘गांधेल’ की खुशबू देती है, कोई मौसम ऐप नहीं।
गंध सिर्फ़ नाक से नहीं, स्मृति, पहचान और भविष्य की चेतावनी भी होती है। अगर हम इन सूक्ष्म संकेतों को सुन लें, तो सिर्फ़ हवा नहीं, हमारी ज़िंदगी भी फिर से महक सकती है।
तुलसी की अलग-अलग किस्में (राम तुलसी, कृष्णा तुलसी, वन तुलसी) न सिर्फ़ हवा को शुद्ध करती हैं, बल्कि इसकी तेज़ गंध वाली पत्तियाँ रोग प्रतिरोधक ताकत भी देती हैं (चित्र: प्रियल)
जब तक हवा में महक बचेगी, रेगिस्तान की मीठी यादें भी महकती रहेंगी