राजस्थान के महलों एवं दुर्गों के वृक्ष

राजस्थान के महलों एवं दुर्गों के वृक्ष

राजस्थान राज्य किलों, महलों, गढों और गढियों के लिए जाना जाता रहा है। राजा-महाराजा, राव-उमराव सब अपनी – अपनी हैसियत अनुसार किले व महल आदि बनवाते थे। सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने एवं आन्तरिक गतिविधियों को छुपाये रखने हेतु अलग-अलग मोटाई, ऊँचाई व बनावट की प्राचीरें बनवाई जाती थी। परकोटे की प्राचीरों से घिरे क्षेत्र का कोई निश्चित पैमाना तो नहीं था फिर भी महलों के मुकाबले किलों के परकोटे से घिरा क्षेत्र अधिक होता था। कुंभलगढ के किले की प्राचीर तो लगभग 36 किमी. लम्बी बताई जाती है। सज्जनगढ अभयारण्य में स्थित सज्जनगढ वास्तव में गढ़ यानी किला नहीं है बल्कि एक महल है जिसमें चारों तरफ कोई सुरक्षा दीवार नहीं है। जयसमंद अभयारण्य में स्थित रूठी रानी का महल व हवा महल भी परकोटा विहीन हैं। नाहरगढ किला, गागरोन का किला, शेरगढ किला, शाहबाद का किला, काँकवाडी किला, बाला किला (अलवर) आदि जगहों पर बडा क्षेत्र घेरते हुऐ परकोटे बनाये गये थे। महलों व किलों की आन्तरिक सुन्दरता एक महत्वपूर्ण पहलू है। वास्तुकारीय विशेषताओं के अलावा बाहर व भीतर की हरियाली का सृजन व संधारण भी एक महत्वपूर्ण प्रबंधन क्षेत्र था। यहाँ महलों व किलों की आन्तरिक हरियाली पर कुछ प्रकाश डालना उचित होगा जो हमें तत्कालीन राजघरानों की सोच, समझ, जरूरत व उद्देश्य के ज्ञान व भान की झलक देता है।

किलों के परकोटे को विस्तार देते समय जो प्राकृतिक वन क्षेत्र घेरा जाता था उसे सुन्दरता, शीतलता, ईधन, घोडे एवं हाथियों हेतु चारे की आंशिक पूर्ती, फल आदि जरूरतों हेतु उसे सुरक्षित रखा जाता था। जो वन क्षेत्र किलों की परीधी पर बाहर विद्यमान रहता था, उसको भी सुरक्षित रखा जाता था क्युंकि बाहरी वन किले को छुपाने में मदद करते थे। ऐसे दुर्गों को आज हम वन दुर्ग के रूप में जानते हैं।

प्राचीन किलो में जहाँ अधिकांश प्राकृतिक वनस्पति को सुरक्षित रखा जाता था, वहीं महलों के परिसरों में विद्यमान काँटेदार व अनुपयोगी या कम उपयोगी वनस्पतियों को हटा दिया जाता था। राजघरानों के लोग ताजी हवा, ताजे फल, छाँया, शीतलता, सुन्दरता, लोक दवाओं, शुभ शगुन विचार व धार्मिक – सामाजिक अनुष्ठानों हेतु अनेक वृक्षों का रोपण भी महलों व किलों के प्रांगण में कराते थे। उन रोपित वृक्षों की उचित देख-भाल की जाती थी। महलों व किलों में रोपित वृक्षों के स्वयं गिरे या पुनः-पुनः फैंके बीजों से या नये रोपित पौधों से उन पसंद की प्रजातियों की अगली पीढीयाँ भी शनैः-शनैः वहाँ उगती रहती थी। पुराने वृक्ष बडे होकर या दीमक आदि के प्रकोप से समाप्त भी होते रहते थे।

महलों व किलों में रहने वाले राजपरिवारों, सैनिकों, सेवकों, अनुष्ठान कर्ताओं आदि द्वारा रोपित पौधों से तरह-तरह के लाभ लिये जाते थे। आवश्यक्तानुसार पौधों की संख्या निर्धारित की जाती थी लेकिन शगुन एवं सौभाग्य से संबंधित पौधे कम संख्या में होते थे तथा इन्हें प्रायः प्रवेश द्वारों के पास लगाया जाता था ताकि महल या किले में प्रवेश करते ही उनके दर्शन कर अच्छे शगुन का भान हो। मौलश्री जैसे वृक्षों के फूलों की महक हवा मे सुगंध घोलने के लिए जानी जाती है। कच्चे आम (कैरी) की छाछ, रायण व मौलश्री के फलों का गर्मी में सेवन आम चलन था। तत्कालीन राजपूताना (वर्तमान राजस्थान) के राजघरानों की पसंद के कुछ वृक्ष निम्न हैं जो जहाँ-तहाँ आज भी किलों – महलों में सुरक्षित नजर आते हैंः

क्र.सं.स्थानीय नामवैज्ञानिक नामप्रकृतिवानस्पतिक कुलउपयोगिता
1रायण

Manilkara

hexandra

सदाबहारSapotaceaeसघन-शीतल छाँया, फल, सुन्दरता, झूला डालना
2मौलश्री, बकुलMimusops elengiसदाबहारSapotaceaeछाँया, फल, सुन्दरता, औषधीय महत्व
3पीपलFicus religiosaपतझडी/ अर्धसदाबहारMoraceaeछायाँ, धार्मिक-सामाजिक महत्व, हवन सामग्री, झूला डालना
4बरगदFicus benghalensisसदाबहारMoraceaeछायाँ, धार्मिक-सामाजिक महत्व, झूला डालना
5नीमAzadirechta indicaसदाबहारMeliaceaeछायाँ, औषधीय महत्व (विशेषकर दाँतुन हेतु उपयोगी), झूला डालना, सुन्दरता, फल
6खजूरPhoenix sylvestrisसदाबहारArecaceaeफल, सुन्दरता, झाडू सामग्री, बर्तन सफाई हेतु रेशे, मधुर रस एवं ताडी
7आमMangifera indicaसदाबहारAnacardiaceaeछायाँ, फल, झूला, सुन्दरता, औषधीय महत्व
8जामुनSyzygium cuminiसदाबहारMyrtaceaeछायाँ, फल, सुन्दरता, औषधीय महत्व
9इमलीTamarindus indicusसदाबहारCaesalpiniaceaeछायाँ, फल, सुन्दरता, औषधीय महत्व
10लिसोडाCordia myxaसदाबहारEhretiaceaeछायाँ, सुन्दरता, फल
11कलम/कदमMitragyna parivifolia पतझडीRubiaceaeसुन्दरता, धार्मिक महत्व
12बेलपत्रAegle marmelosपतझडीRutaceaeधार्मिक महत्व, फल, औषधीय महत्व

प्राचीन समय में रायण व मौलश्री को प्राथमिकता से लगाया जाता था (चित्र 1 से 5)। जहाँ देवालय स्थित होते थे वहाँ पूजन हेतु पत्र सहजता से मिल सकें, अतः उपयुक्त स्थान पर बेलपत्र भी लगाया जाता था। तुलसी के पौधे भी देवालयों व निवास स्थानों के पास लगाए जाते थे। पूजा – पाठ हेतु दूब घास भी सुरक्षित जगह उगने दी जाती थी। देश में कई जगह कल्प वृक्ष (Adansonia digitata) भी लगाऐ जाते थे। मध्यप्रदेश के धार जिले में माँडू के किले एवं महलों के परिसरों में एवं आस-पास बडी संख्या में प्राचीन समय में रोपित विशाल आकार के कल्प वृक्ष दर्शनीय हैं।

चित्र 2.3: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प काल क्लोजअप

चित्र 1: शेरगढ किले के प्रवेश द्वार के पास मुख्य मार्ग की बाँयीं तरफ विद्यमान दो रायण वृक्ष 

शेरगढ किले के प्रवेश द्वार के पास विद्यमान प्राचीन रायण वृक्षों की सघन छाँया

चित्र 2: शेरगढ किले के प्रवेश द्वार के पास विद्यमान प्राचीन रायण वृक्षों की सघन छाँया 

सघन छाँया देने वाला सदाबहार मौलश्री वृक्ष

चित्र 3: सघन छाँया देने वाला सदाबहार मौलश्री वृक्ष.     

चित्र 2.3: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प काल क्लोजअप

चित्र 4: मौलश्री वृक्षः फल एवं फूलों से लदी शाखा 

चित्र 2.4: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प मुण्ड क्लोजअप

चित्र 5: मौलश्री वृक्ष का फल

सारणी-1 में देखेंगे तो पता चलेगा कि अधिकांश वृक्ष दीर्घजीवी व बडे आकार के हैं। इनमें अधिकांश सदाबहार या लगभग सदाबहार प्रकृति के हैं। बेलपत्र व खजूर को छोड कर कोई काँटेदार नहीं है। सभी वृक्ष स्थानीय व बहु-महत्व (multi-purpose) वाले हैं।

प्राचीन समय में कुछ वृक्षों को तो महलों व किलों के अलावा देवालयों व जलस्त्रोतों के पास भी लगाने का चलन था। पाली जिले में सादडी के पास रणकपुर जैन मंदिर में विशाल भवनों से घिरा, एकदम केन्द्रिय भाग में एक रायण का प्राचीन विशाल वृक्ष आज भी सुरक्षित है। पीपल, बरगद, बेलपत्र, जीवापूता (Drypetes roxburghii), मौलश्री आदि प्रायः शिवालयों के पास सुरक्षित मिलते हैं। प्राकृतिक रूप से शिवलिंग से समानता दर्शाने वाले फूल कोरोपिटा गुवानेन्सिस (Couroupita guianensis) नामक वृक्ष में देखे जा सकते है। आजकल दक्षिण भारत में कई जगह शिवालयों के पास यह वृक्ष भी देखने को मिलता है।

अधिक वर्षामान वाले क्षेत्रों में पानी के तालाबों-जोहडों की पाल पर भी बरगद, पीपल, बेलपत्र, जामुन, इमली, नीम, आम, कलम (कदम) लगाने-बचाने का चलन था। जिस तालाब के किनारे कलम (कदम या कदम्ब) होता है उसे बोलचाल में ’’कदमा तालाब’’ या ’’कदम्ब तालाब’’ कहते हैं। सामान्य तालाब के मुकाबले ’’कदम्ब तालाब’’ ज्यादा पूज्य माने जाते हैं। शेखावाटी से लेकर मारवाड के तालाबों के पाल वृक्षों (Embankment tree) में खारा जाल, मीठा जाल, पीपल, बरगद, खेजडी, रौंझ, बबूल, नीम, बेर, इमली, इन्द्रधोक (Anogeissus sericea nummularia) अदि विशेष महत्व रखते हैं। इसी तरह कमल को भी विशेष धार्मिक महत्व मिलता था। जिस तालाब में कमल (पदम) उगते थे उसे “पदम तालाब” नाम से आदर दिया जाता है।

वृक्षों के महत्व को जानने हेतु प्राचीन महल, किले, देवालयों एवं तालाबों के अवलोकन – अध्ययन के साथ -साथ पुरानी रूढीयों, परिपाटियों, अभिवृतियों व परंपरागत ज्ञान पर नजर जरूरी है ताकि हम प्राचीन भारतीय समाज के पुरा वैभव से रूबरू हो सकें।

सतीश कुमार शर्मा

राजस्थान वन सेवा (सेवा निवृत)

14-15, चकरिया आम्बा, रामपुरा चैराहा, झाडोल रोड़

पोस्ट – नाई, उदयपुर – 313031, राजस्थान, भारत

sksharma56@gmail.com

कवर इमेज: गागरोन क़िले की दीवार से लिया गया दृश्य (फोटो: प्रवीण)

जयपुर में बढ़ते तेंदुआ–मानव संघर्ष के संदर्भ में एक अन्य दृष्टिकोण

जयपुर में बढ़ते तेंदुआ–मानव संघर्ष के संदर्भ में एक अन्य दृष्टिकोण

जयपुर में तेंदुआ-मानव संघर्ष बढ़ा क्यों? जब सब कहते हैं जंगल में कमी है, तो मेरा मानना है कि इंसानों ने अनजाने में तेंदुओं के लिए ‘सब कुछ’ इतना आसान बना दिया है कि यह उनके ही जीवन के लिए एक ‘खतरनाक जाल’ बन गया है।

हाल के दिनों में जयपुर के आसपास तेंदुओं ने कई बार  डर और भ्रम का माहौल पैदा कर दिया है। लगने लगा कि मानव–वन्यजीव संघर्ष अचानक बढ़ गया है। लोग कहने लगे कि जंगलों में भोजन कम है, पानी की कमी है, जंगल का क्षेत्र घट रहा है, और यहाँ तक कि वन अधिकारियों को भी दोष दिया जाने लगा कि वे अपना काम ठीक से नहीं कर रहे या उनके पास पर्याप्त संसाधन नहीं हैं। दुर्भाग्य से, वन विभाग के कुछ लोग भी इन धारणाओं को समर्थन करते दिखते है। मेरा दृष्टिकोण इसके एक दम विपरीत है।

यह स्थिति केवल जयपुर तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में भारत के कई हिस्सों में इसी तरह के पैटर्न देखे गए हैं। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि आखिर ऐसा क्या बदल गया है कि आज हमें इतने अधिक संघर्ष के मामले दिखाई दे रहे हैं?

प्रश्न 1 — क्या तेंदुओं की संख्या बढ़ी है? किसी जंगल में आदर्श रूप से कितने तेंदुए होने चाहिए?

उत्तर: हाँ, तेंदुओं की संख्या निश्चित रूप से बढ़ी है, कितने होने चाहिए इसका जवाब मेरे पास नहीं है परंतु लगता है वर्तमान संख्या सामान्य नहीं है। पिछले 1-2 दसकों में तेंदुओं की संख्या बढ़ने के निम्न तीन मुख्य कारण हैं:

A — वन्यजीवों के प्रति हमारे दृष्टिकोण में बदलाव

पिछले दो दसक में पर्यटन और शिक्षा ने लोगों की सोच को काफी बदला है। पहले तेंदुए को केवल खतरे के रूप में देखा जाता था; आज बहुत से लोग उन्हें जिज्ञासा और प्रशंसा से देखते हैं। पर्यटन के अलावा और पर्यावरण के प्रति आई चेतना के कारण आम लोग और सरकार वन्यजीवों की रक्षा करने को अपना प्रमुख कृतव्य मानने लगे है। इसमें कोई बुराई नहीं, परंतु यह बदलाव उनकी संख्या बढ़ाने का एक मुख्य कारण है। जो उचित है। सरकारों ने वन्यजीव संरक्षण में अधिक ध्यान दिया है और संसाधनों से वन्य जीव सुरक्षा भी बढ़ी है। लोगो द्वारा उसका अवैध शिकार भी कम होने लगा है।  

B — जयपुर के वनों में प्रचुर मात्र में पानी की उपलब्धता होना।

यह सबसे महत्वपूर्ण कारण है। पिछले 15-20 वर्षों में देश भर में जंगलों में पानी के सोर्स और अन्य संसाधन बढ़ाए गए हैं। पहले पानी की कमी तेंदुओं की संख्या को प्राकृतिक रूप से नियंत्रित करती थी।  आज, हमारे सूखे पर्णपाती वनों में पानी की भरमार उपलब्धता करा दी गई है, इसलिए यह प्राकृतिक नियंत्रण खत्म हो गया है। हर जगह सोलर पम्प और ट्यूबवेल खोद दिए गए है।

C — जयपुर शहर के आसपास इंसानों ने अनजाने में तेंदुओं के लिए अत्यधिक भोजन के ज़रिए पैदा कर दिए हैं:

  • जयपुर के आसपास कचरे में फेंका गया भोजन
  • मांस की दुकानों से निकलने वाले मांस-अवशेष
  • जंगल किनारे मरी हुई पशु लाशें
  • कचरे पर पलने वाली कुत्तों और सूअरों की बढ़ती संख्या, इसके अलावा चूहों को भी खा कर तेंदुआ अपना समय गुजर सकता है।

यह सब मिलकर तेंदुओं के लिए एक “अनलिमिटेड बुफेजैसा वातावरण बना देता है। भोजन जितना आसान मिलेगा, उतने अधिक तेंदुए यह क्षेत्र संभाल सकेगा।

तो मीडिया में चल रही चर्चा मिथ्या प्रतीत होती है कि वन अधिकारियों ने जल, भोजन और सुरक्षा कमजोर कर रखी है। यानी असल वजह मेरे अनुसार इसके विपरीत है।

जयपुर शहर के आसपास इंसानों ने अनजाने में तेंदुओं के लिए अत्यधिक भोजन के ज़रिए पैदा कर दिए हैं (फ़ोटो : डॉ धर्मेन्द्र खांडल )

अब कोई कह सकता है कि “जयपुर शहर के आस-पास के क्षेत्र में 125–132 तेंदुए हैं, यह कितनी अच्छी बात है!

लेकिन सवाल यह है कि

प्रश्न 2 – क्या जयपुर वास्तव में इतनी बड़ी संख्या को प्राकृतिक रूप से रख सकता है?

उत्तर है नहीं

क्यों?

क्योंकि शहर के चारों ओर फैला कचरा, अवैध मीट-फेंक, मृत पशुओं का निस्तारण, कुत्तेसूअरचूहों की बढ़ती संख्या ये सब एक आसान भोजनका झूठा भ्रम पैदा करते हैं।

तेंदुआ सोचता है कि यहाँ भरपूर भोजन है, लेकिन यह प्राकृतिक भोजन नहीं, बल्कि कचरे पर पनपा हुआ अप्राकृतिक भोजन है।

ऐसी स्थिति ही “पारिस्थितिक जाल” (Ecological Trap) कहलाती है जिसका सिद्धांत J.A. Krebs ने 1970 के दशक में दिया था।

Ecological Trap का अर्थ है

ऐसा आवास जो जानवरों को बाहर से आकर्षक और सुरक्षित दिखता है, लेकिन वास्तव में वह उनके जीवन के लिए पर्याप्त नहीं होता है। यह स्थिति अक्सर मानव-निर्मित परिवर्तनों के कारण पैदा होती है।

प्रश्न 3 — जब भोजन पर्याप्त है, पानी भी पर्याप्त है, स्थान भी सुरक्षित है, तो फिर तेंदुआ बाहर आने की आवश्यकता क्यों महसूस करता है?

उत्तर इस प्रश्न को समझने के लिए हमें अपने जंगलों की वास्तविक स्थिति को दोबारा, और सही दृष्टि से देखना होगा। आज हमारे कई जंगल पारिस्थितिक जाल बन चुके हैं।

एक सीमा तक जंगल संख्या झेल लेता है, लेकिन जब:

  • मुख्य नर तेंदुए, युवाओं को क्षेत्र में रहने नहीं देते
  • क्षेत्र सीमित है
  • प्राकृतिक शिकार पर्याप्त नहीं है और अब इतने तेंदुओं के बीच उन्हें बढ़ाना भी आसान नहीं है।
  • मानव-निर्मित भोजन की उपलब्धता अनिश्चित हो सकती है या जोखिम भरा हो जाता है

तो युवा नर और उप-वयस्क तेंदुए नई जगह खोजने के लिए मजबूर हो जाते हैं

यही कारण है कि वे शहरों, खेतों, औद्योगिक इलाकों और हाइवे के आसपास अधिक दिखाई देते हैं।

 एक सीमा तक जंगल बढ़ती संख्या झेल लेता है उसके बाद युवा और अवयस्क तेंदुए नई जगह खोजने के लिए मजबूर हो जाते हैं। (फ़ोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

प्रश्न 4 – क्या हमारे जंगल वास्तव में अपर्याप्त हैं, या हम वन्यजीवों के व्यवहार को गलत समझ रहे हैं?

तेंदुओं की संख्या को पानी और भोजन के अलावा बाघ ही नियंत्रित कर सकते, चूँकि जयपुर के वनोंमें बाघ है ही नहीं, यह भी एक कारण बनता है उनकी संख्या बढ़ने का।

जहाँ बाघ गायब होते हैं, वहाँ तेंदुओं की संख्या पर प्राकृतिक नियंत्रण भी खत्म हो जाता है।

मौजूदा प्राकृतिक शिकार (चीतल, सांभर, नीलगाय आदि) इतनी बड़ी संख्या को सस्टेन ही नहीं कर सकता

और यदि हम प्राकृतिक शिकार बढ़ाने की कोशिश करें, तो बड़ी संख्या में मौजूद तेंदुए उसे तुरंत खत्म कर देंगे

यानी न तो प्राकृत‍िक भोजन बढ़ सकता है, और न ही संख्या स्वाभाविक रूप से नियंत्रित हो सकती है

यही कारण है कि यह संख्या बढ़ना विकास का संकेत नहीं, बल्कि एक भविष्य का संकट है।

अक्सर तेंदुओं को जयपुर से पकड़कर अन्य जगह पर छोड़ दिया जाता है, जो की नई समस्या को जन्म देता है (फ़ोटो: धर्मेन्द्र खांडल)

स्थानांतरित (Relocate) करने की समस्या

अक्सर तेंदुओं को जयपुर से पकड़कर:

  • लोहारगल
  • शाकंभरी
  • मनसा माता

जैसे इलाकों में छोड़ दिया जाता है। लेकिन वहाँ पहले से ही कम घनत्व वाली प्राकृतिक तेंदुआ आबादी मौजूद है। अचानक एक नया, संघर्षशील युवा नर पहुँचने पर:

  • स्थानीय तेंदुओं को नुकसान पहुँच सकता है
  • मानववन्यजीव संघर्ष बढ़ सकता है

यानी समाधान के नाम पर एक नई समस्या पैदा की जाती है।

अंत में वास्तविक समाधान क्या है?

इस स्थिति को नियंत्रित करने के लिए आवश्यक है कि:

  • शहरों और जंगलों के आसपास फैला कचरा पूरी तरह नियंत्रित और साफ रखा जाए
  • अप्राकृतिक भोजन समाप्त किया जाए
  • जंगलों को धीरे–धीरे प्राकृतिक रूप में लौटाया जाए
  • आबादी को विस्फोटक स्तर तक पहुँचने न दिया जाए

तभी तेंदुओं की संख्या प्राकृतिक ढंग से स्थिर होगी और संघर्ष कम होगा। इसका कोई आसान हल नहीं है। इसके साथ जीना सीखना होगा।

कदम तालाब

कदम तालाब

देश के ग्रामीण अंचलों में जगह-जगह तालाब (जोहड) मिलते हैं जिनका आर्थिक, धार्मिक, सांस्कृतिक महत्व तो है ही उनका पारिस्थतिकीय महत्व भी कम नहीं है। इन ग्रामीण तालाबों का कैचमेन्ट आस -पास का क्षेत्र होता है तो कई बार कैचमेन्ट जलाशय से काफी दूर भी स्थित होता है। ऐसी स्थिति में दूरस्थ कैचमेन्ट को जलाशय से कोई न कोई नाला जोड़ने का काम करता है। आस-पास के कैचमेन्ट वाले जलाशयों का पानी प्रायः सभी दिशाओं से बहता हुआ जलाशय में पहुँच कर जमा होता रहता है लेकिन दूरस्थ कैचमेन्ट की स्थिति में कैचमेन्ट का जल नाले के रास्ते से बहता हुआ जलाशय में पहुँचता है। (चित्र 1.1 एवं 1.2)

Picture 1 Kadam Talab with catchment

चित्र 1.1: स्थानीय कैचमेन्ट युक्त तालाब

Picture 2 Kadam Talab with Satellite catchment

चित्र 1.2: एक तालाब, दूर स्थित कैचमेन्ट से, नाले से जुड़ा हुआ। 

नोट: (S=सीढी/घाट, T=धार्मिक स्थल, I=द्वीप, V= गाँव, P= रास्ता, SP= अतिरिक्त जल निकासी हेतु ओटा, N= नाला, TT= वनस्पतियां, R=चट्टानों के टुकडे, D= पाल/तट बन्ध, M=मार्सी क्षेत्र)

गाँव के तालाबों के पानी को रोके रखने हेतु उन पर ढाल की तरफ अर्धचंद्राकार या गोलाकार मिट्टी के तटबन्ध बनाये जाते हैं जिन्हें स्थानीय भाषा में ’पाल’ (embankment) कहा जाता हैं। पाल पर कई बार तरह – तरह के वृक्ष भी लगाए जाते हैं या अपने आप उग आते हैं जिन्हें पाल वृक्ष (embankment trees) कहा जाता है।

तालाबों, एनीकटों व बांधो के मिट्टी की बनी पाल या तटबन्धों पर कोई देव स्थान, नहाने के घाट, उतरने-चढ़ने की सीढ़ियाँ, खुर्रे या रपट, ओटा (spill over) आदि विद्यमान हो सकते हैं। पाल वृक्ष, पाल की मिट्टी को बाँध कर रखते हैं तथा बहते वर्षा जल व हवा से उसे कटने से बचाते हैं एवं तटबन्ध को सुरक्षा प्रदान करते हैं। पाल वृक्षों की वजह से तालाबों की सुन्दरता तो बढती ही है उनकी छाया में पालतू व वन्य पशु तथा मनुष्य विश्राम करते हैं। पाल वृक्षों से चारा, फल, फूल, शहद, गौंद, ईंधन, आदि लघु वन उपज भी मिलते हैं। पाल वृक्षों पर तरह – तरह के पक्षी, लंगूर, बंदर, गिलहरी, गिरगिट, बागल, बिज्जू (civet) आदि बसेरा करते हैं एंव प्रजनन भी करते हैं। पाल वृक्ष के कोटरों में उल्लू, बसंता, मैना, टिट आदि पक्षी प्रजनन से लेकर रात्रि विश्राम करते हैं।

ग्रामीण क्षेत्रों में मेलों व धार्मिक अनुष्ठानों का आयोजन प्रायः तालाबों के पास होता है एवं इन कार्यों हेतु पाल वृक्ष बहुत काम आते हैं। गाँव के बच्चों द्वारा वृक्षों पर झूले डाले जाते हैं। वन क्षेत्रों से दूर ये तालाब एक अच्छे “वाटर होल” (water hole) की भूमिका भी निभाते हैं तथा वनों से दूर खेतों, पडत, बंजर व चारागाहों में रहने वाले वन्यप्राणी यहां पानी पीने आते हैं। कई बार पाल वृक्षों पर बागलों (Flying Fox-Pteropus gigenticus) की कॉलोनियां पाई जाती हैं। बागल भूमि पर उतर कर पानी नहीं पी सकती बल्कि वे उडते हुए ही पानी पीती हैं इसलिये उनको बडा व खुला जलाशय ही रास आता है। ये बागल परागण व प्रकीर्णन का कार्य कर प्रकृति में सकारात्मक भूमिका निभाती हैं।

पाल वृक्षों की विशेषतायें व सही प्रजातियों का रोपण हेतु चयन:

“पाल” वस्तुतः एक बड़ा मिट्टी का डौला (Bund or mound) है जिस पर मिट्टी का कटाव चलता रहता है। अतः पाल पर उगे वृक्ष की जडें भूमि क्षरण की वजह से आने वाले वर्षों में आंशिक रूप से नंगी हो जाती हैं तथा दिखने लग जाती हैं। समय-समय पर ग्रामीण अपने श्रम से या किसी सरकारी योजना अन्तर्गत तालाब को गहरा करने हेतु, मिट्टी खोद कर पाल पर डालते हैं जिससे न केवल जडें बल्कि तने पर भी एक ऊँचाई तक मिट्टी चढा दी जाती है। मिट्टी की कमी व मिट्टी की अधिकता को फाइकस वंश (Genus Ficus) अच्छी तरह सहन कर सकता है। इस लिहाज से पीपल (Ficus religiosa), बरगद (Ficus benghalensis), गूलर (Ficus recemosa), पाखड (Ficus virens), पिपरानी (Ficus lambertiana), पलक या पिंपरी (Ficus amplecema), करंज (Pongamia pinnata) आदि पाल हेतु अधिक उपयुक्त प्रजातियां है एवं प्राय इनका रोपण भी काफी किया जाता है। कई जगह नीम, इमली, आम, देशी बबूल, रायण, महुआ, जामुन, खेजडी, इन्द्रधोक (Anogeissus sericea nummularia) आदि भी पाल पर रोपित किये जाते हैं या सुरक्षित रखे जाते हैं।

कदम – तालाब

धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्य हेतु कई बार ग्रामीणजन अपने गाँव के जलाशय की पाल पर न्यूनतम एक कदम (Mitragyna parvifolia) का पौधा भी लगाते हैं जो कालांतर में वृक्ष के रूप में पनप जाते हैं (चित्र 2.1 से 2.4)। कई बार एक से अधिक कदम वृक्षों को भी पनपाया जाता है। एक बार रोपण से तैयार होने पर गिरने वाले बीजों से नए कदम भी अपने आप पनपते रहते हैं। जिन तालाबों पर कदम प्रजाति का एक या अधिक वृक्ष “पाल वृक्ष” के रूप में विद्यमान हो उस तालाब को “कदम – तालाब” या “कदमा तालाब” कहा जाता है। पूर्वी राजस्थान में जगह – जगह कदम – तालाब देखने को मिलते हैं। अलवर जिले में मुण्डावर-बहरोड क्षेत्र में हुलमाणा कलाँ, गादली की ढाणी, बीजवाड चैहान, फौलादपुर, काँटी खेडी आदि गाँवों के कदम तालाब उल्लेखनीय हैं। पूर्वी राजस्थान के इस क्षेत्र से सटे व निरंतरता आगे तक हरियाणा राज्य के रेवाडी, झज्जर आदि जिलों के विभिन्न गाँवों में भी कदम तालाब देखने को मिलते हैं। कदम तालाबों में स्थानीय ग्राम एवं आस-पास के अन्य ग्राम जहाँ कदम तालाब उपस्थित नहीं है वहाँ की महिलाएं विभिन्न धार्मिक एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम श्रावण मास में कदम वृक्ष के नीचे संपन्न करती हैं। कई तरह के उपवासों में खाना घर से बनाकर महिलाएं गीत गाते हुए कदम तालाब पर पहुँचती हैं तथा कदम वृक्ष के नीचे बैठकर सामूहिक भोज कर उपवास खोलती हैं। यह परंपरा सदियों से चली आ रही है।

Picture 1 Kadam Talab with catchment

चित्र 2.1: मित्रागायना पार्वीफोलिया: वर्षा काल में

Picture 2 Kadam Talab with Satellite catchment

चित्र 2.2: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पतझड काल में

चित्र 2.3: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प काल क्लोजअप

चित्र 2.3: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प काल क्लोजअप

चित्र 2.4: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प मुण्ड क्लोजअप

चित्र 2.4: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प मुण्ड क्लोजअप

कदम कुण्ड

कदम तालाब की तरह सामान्य कुण्डों के मुकाबले कदम कुण्ड भी धार्मिक एवं सांस्कृतिक गतिविधियों हेतु विशेष महत्व रखते हैं। पहाड़ों में जगह-जगह खोखले गड्ढेनुमा या गुफानुमा स्थान मिलते हैं जिन्हें “कुण्ड” कहा जाता है। कुण्डों में वर्ष प्रान्त या वर्षाकाल एवं सर्दी के मौसम में पानी विद्यमान रहता है। अजमेर जिले में पुष्कर में पास पंचकुण्ड, अलवर जिले में रेणागिरि गाँव के पास परशुराम कुण्ड, बडा बेरा कुण्ड, हनुमान कुण्ड; झुंझुनू जिले में लोहार्गल कुण्ड, चिराणा गाँव के “ताताकुण्ड” व “ठण्डाकुण्ड” आदि प्रसिद्ध हैं। यदि किसी कुण्ड के पास कदम (Mitragyna parvifolia) का वृक्ष उगा हो तो उसे “कदम कुण्ड” कहा जाता है। सीकर जिले में नीम का थाना कस्बे के पास छापोली गाँव में एक कदम कुण्ड बहुत प्रसिद्ध है। स्थानीय जनों द्वारा सामान्य कुंडों की तुलना में कदम कुण्ड में धार्मिक अनुष्ठान करने को प्राथमिकता दी जाती है। ऐसे कुण्डों में विशेष रूप से श्रद्धालु स्नान करने को प्राथमिकता देते हैं जिनके पास कदम वृक्ष विद्यमान हो।

कदम रोपण

कदम या कदम्ब के नाम से दो वृक्ष प्रजातियां, मित्रागायना पार्वीफोलिया (Mitragyna parvifolia) (चित्र 2.1 से 2.4) तथा नियोलैमार्किया कदंबा (Neolamarckia cadamba) (चित्र 3.1 से 3.3) ज्ञात हैं। मित्रागायना पार्वीफोलिया जिसे कलम नाम से भी जाना जाता है, लेकिन बोल- चाल में ‘कदम’ नाम ही अधिक प्रचलित हैं। प्राकृतिक रूप से यह प्रजाति राजस्थान के पहाड़ी वनों में जगह-जगह देखने को मिलता है जबकि नियोलैमार्किया कदंबा प्राकृतिक रूप से राजस्थान में नहीं पाया जाता। यह प्रजाति जहाँ भी राजस्थान में देखने को मिलती है किसी न किसी व्यक्ति या संस्था द्वारा रोपित की गई होती है। मित्रागायना पार्वीफोलिया सामान्यता पहाड़ों से दूर नहीं मिलती। प्राचीन समय में पौधशालाओं का भी अभाव था अतः पुराने समय में ग्रामीण लोग पहाडी वन क्षेत्र से वर्षा ऋतु में प्राकृतिक रूप से उगे कदम के छोटे पौधों को मिट्टी के पिण्ड सहित खोद कर लाते थे तथा अपने गाँव के तालाब की पाल पर रोपित करते थे एवं समय-समय पर पानी पिलाकर उसे बडा होने देते थे। इस दौरान बाडबन्दी कर उसे गाँव के पशुओं से चराई व रौंदने से सुरक्षा प्रदान करते थे। इस तरह ग्रामीण अपने गाँव के सामान्य तालाब को एक कदम तालाब बना देते थे। गाँव का कोई भी व्यक्ति तालाब के कदम वृक्ष को नुकसान नहीं पहुँचाता था। समय के साथ बढ़े हुए कदम वृक्ष के बीज गिर कर नए कदम वृक्ष पनपाने लगते थे। आस – पास के लोग अब किसी पर्वतीय वन से नहीं बल्कि किसी गाँव के तालाब से नया कदम पौधा लेकर दूसरे तालाब पर रोपित करते रहते थे। इस तरह इस प्रजाति का फैलाव वन क्षेत्र से दूर होता रहता था। लेकिन समय के साथ कदम वृक्ष रोपण का सिलसिला लगभग समाप्त हो गया है। आज जो भी कदम गाँव में तालाबों के तट पर नजर आते हैं वे तीन – चार पीढ़ियों पहले तक के ही नजर आते हैं।

चित्र 3.1: नियोलैमार्किया कदंबा वृक्ष

चित्र 3.1: नियोलैमार्किया कदंबा वृक्ष

चित्र 3.2: नियोलैमार्किया कदंबा पुष्प काल में

चित्र 3.2: नियोलैमार्किया कदंबा पुष्प काल में

चित्र 3.3: नियोलैमार्किया कदंबा पुष्प

चित्र 3.3: नियोलैमार्किया कदंबा पुष्प

राजस्थान के तालाबों के तट पर विशेष रूप से संरक्षित किये जाने वाले कदम तथा इन्द्र धोक (Anogeissus sericea var. nummularia) दो खास वृक्ष हैं। इन्द्र धोक राजस्थान के अनेक भागों में, खास तौर से पश्चिमी राजस्थान के अर्द्ध – शुष्क क्षेत्र के तालाबों के तट पर पाया जाता है तथा समाज द्वारा सदियों से संरक्षित किया जा रहा है। राजस्थान के तालाब तटों पर बरगद, पीपल एवं नीम भी विशेष रूप से पाये जाते हैं जिनका महत्व सर्व विदित है। हमें तालाबों की पालों पर वृक्षो को लगाने, बचाने व संरक्षित करने की परंपरा को ससम्मान बचाये रखना चाहिए।

राजस्थान में तालाबों, जोहडों, नाडियों, बावडियों, केवडियों आदि परंपरागत जल संरक्षण संरचनाओं का सदियों से महत्व रहा है। तालाबों के कई आकार – प्रकार एवं नामकरण भी प्रचलन में रहे हैं। जिस तरह कदम की उपस्थिति से कोई तालाब कदम तालाब के रूप में जाना जाता है उसी तरह कमल यानि पदम की उपस्थिति से कई तालाब “पदम तालाब” का खिताब पाते रहे हैं। हमें जतनपूर्वक अपने तालाबों को बचाकर अच्छी प्राचीन परम्पराओं को अगली पीढ़ी को सौंपने में गर्व महसूस करना चाहिये।

सतीश कुमार शर्मा

राजस्थान वन सेवा (सेवा निवृत)

14-15, चकरिया आम्बा, रामपुरा चैराहा, झाडोल रोड़

पोस्ट – नाई, उदयपुर – 313031, राजस्थान, भारत

sksharma56@gmail.com

राजस्थान की ख़ुशबू

राजस्थान की ख़ुशबू

गंध सिर्फ़ गंध नहीं, स्मृति, पहचान और भविष्य की चेतावनी भी होती है। अगर हम इन सूक्ष्म संकेतों को जान लें, तो सिर्फ़ हवा नहीं, हमारी ज़िंदगी भी फिर से महक सकती है।

तड़के चार बजे — जब गर्मी से झुलसते राजस्थान में भी हवा हल्की ठंडी लगती है — कच्ची गली में पारिजात (Nyctanthes arbor-tristis) के फूल ज़मीन पर गिरे हुए आमतौर पर दिख ही जाते थे। दूधिया पंखुड़ियों के बीच नारंगी नली वाले फूल ऐसे बिछ जाते थे मानो ज़मीन ने खुद चंदन तिलक लगा लिया हो। दादी का धीमी आवाज़ में कहना, “जब तक यह खुशबू बचेगी, हमारी सुबहें बचेगी।” आज ये शब्द कहाँ सुनने को मिलते है। आज वही गली पक्के टाइलों से ढंक चुकी है, ड्रेनेज पाइप्स की गंध ने पारिजात के माधुर्य को दबा दिया है। जाने‐पहचाने फूलों का यह ‘सुबह का पहला नमस्कार’ कब फीका पड़ गया, किसी ने ध्यान ही नहीं दिया। ठीक यही कहानी, राजस्थान के कई खुशबू वाले जंगली पौधों के साथ चल रही है — सुगंध पहले ग़ायब होती है, संकट का नोटिस बाद में आता है।

रेगिस्तान की खुशबुओं का भूगोल

मरु-प्रदेश की भट्टी-सी गर्मी, तेज़ धूप और कम आद्र्रता ने यहाँ के क़ुदरती वृक्षों एवं झाड़ियों में एक अनोखी विशेषता भर दी है— ये पौधे अपने पत्तों और लकड़ियों में सुगंधित तेल (टर्पीन / Terpene जैसा खुशबूदार रस) जमा कर लेते हैं। दोपहर की तेज़ गरमी में यही तेल धीरे-धीरे उड़कर ऐसा “सूखा इत्र” बनाते हैं, जो कभी चरवाहों, गृहिणियों, साधुओं और किले-कस्बों की हवा में घुला रहता था।

#क्षेत्रसुगंध के स्रोतखुशबू का प्रकार
1अरावली की पहाड़ियाँ (अलवर से डूंगरपुर तक)गुग्गल और सलाई के झुरमुटमंदिर की धूप जैसी मीठी-मसालेदार खुशबू
2थार के चलते-फिरते टीले (जैसलमेर, बाड़मेर)खावी घास और गांधेलनींबू-अदरक की तरोताज़ी, फिर सूखे भूसे के हल्के धुएं की गंध
3चंबल-और लूणी के कन्दरा क्षेत्रझाऊ और केर की झाड़ियाँतीखी कपूर-नीम जैसी गंध जो काफी दूर तक आती है; बरसात के बाद हवा में ताजगी का अहसास
4केवलादेव, भरतपुर, से धौलपुर, तक का क्षेत्रखस-खस की गहरी जड़ेंठंडी मिट्टी-सी भीनी खुशबू, रात की हवा में घुली सुगंध
5सवाई माधोपुर (रणथंभौर के आसपास)नदी-किनारे उगती खस-खस व पहाड़ी ढलानों की खावी घासभीनी भीनी ठंडक एवं नींबू-अदरक की ताज़गी; जंगल सफ़ारी के वक्त अक्सर महसूस होती है
6माउंट आबू का पहाड़ी ठंडा ऊपरी क्षेत्रफुलेड़ घास और जंगली पहाड़ी जड़ी-बूटियाँपुदीने जैसी ठंडी-मीठी सुगंध जो की शाम की नमी में और उभरती है
7अरावली की दक्षिणी पहाड़ियाँ (उदयपुर, डूंगरपुर)पामा रोसा घास (गंधबेल या जिन्जर ग्रास)गुलाब-सी मीठी गंध; परफ्यूम कंपनियों का छिपा ख़ज़ाना

खुशबूओं की यह भू-रसायनशाला अब तापमान वृद्धि, भूमिगत जल दोहन, खनन तथा चारागाह के दबावों के तले सिकुड़ रही है। अगर ध्यान न दिया गया तो आने वाली हवा सिर्फ़ गरम और सूखी रहेगी, उसमें खुशबू का कोई झोंका नहीं बचेगा।

प्राकृतिक गंध के स्रोत

  1. गुग्गल (Commiphora wightii) – अरावली क्षेत्र में

नीले आसमान तले भीषण गर्मी झेलता यह झाड़-नुमा पौधा, हल्के चाकलेटी तने पर जब हल्की कट लगती है, तो आँसू-सा पीला राल रिसता है। यही “गुग्गल धूप” मंदिरों-घरों में धार्मिक कार्यों, पूजन के समय जलाया जाता है। अनियंत्रित दोहन ने 1950 से आज तक इसके प्राकृतिक भंडार को 80 % तक घटा दिया है। इसके बीज अंकुरण की क्षमता काफी कम, लगभग 10 प्रतिशत ही है। गुजरात-राजस्थान सीमा के कुछ क्षेत्रों में सामुदायिक “हल्की खरोंच-पद्धति” ने इसको होने वाले नुकसान को आधा कर दिया है पर फिर भी यह IUCN की ‘क्रिटिकली एंडेंजर्ड’ सूची में अब भी शामिल है।

क्या आप पहचानते हैं इस गुग्गल को? इसकी मीठी सुगंध कभी रेगिस्तान की हवा में घुली रहती थी। (चित्र: सोनू)

  1. खावी (Cymbopogon jwarancusa) पश्चिम राजस्थान के थार क्षेत्र में

चलते-चलते बारीक रेत पर पाँव पटकें तो हवा में एक तीखी मीठी, नींबू‐अदरक की ताजगी वाली गंध महसूस होती है; इसका कारण खावी घास है। एक समय था जब चरवाहे इस घास से बुखार के इलाज के लिए पारंपरिक देसी लेप बनाते थे, तो महिलाएँ इसे कूट कर अनाज भंडार में कीटों की रोकथाम के लिए रखती थीं। इन दिनों चराई के दबाव और इत्र उद्योग हेतु अति संग्रहण ने इस घास को खात्मे की ओर धकेल दिया है। फलस्वरूप बीज-बैकों की रिकव्हरी घट कर एक-तिहाई रह गई।

  1. गांधेल (Iseilema anthephoroides)

मॉनसून की पहली फुहार पड़ते ही सूखी धरती पर जो ‘भीगी-मिट्टी और कच्ची घास’ की एक विशिष्ट मिलीजुली खुशबू आती है, उसका जनक यही वार्षिक घास है। गाँव के किसान इस खुशबू से ही समझ जाते हैं कि अब बोआई (बुआई) का समय आ गया है। पहले, रबी और खरीफ की फसलों के बीच जो ज़मीन कुछ समय खाली रहती थी, अब वह लगातार काम में ली जाने लगी है। आजकल मॉनसून से पहले ही ट्रैक्टर से जुताई हो जाने की वजह से गांधेल को पनपने का समय ही नहीं मिलता।

मॉनसून की पहली फुहार पड़ते ही सूखी धरती पर ‘भीगी-मिट्टी और कच्ची घास’ की विशिष्ट खुशबू आती है, उसका जनक यही वार्षिक घास गांधेल है। (चित्र: सोनू)

  1. झाहू (Artemisia scoparia)

इस घास के गेहुँआ-हरे पत्तों को हाथ से मसलते ही कपूर या नीम जैसी तेज़, झंझनाती खुशबू निकलती है। गाँव के पुराने वैद्य इसे सुखाकर धुआँ करने के लिए रखते थे — जिससे साँप-बिच्छू भागते थे, बुखार कम होता था, और कभी-कभी इसे मसालेदार चाय में भी डाला जाता था। लेकिन पिछले 20 सालों में विलायती बबूल (Prosopis juliflora) ने झाहू की ज़मीन पर कब्ज़ा कर लिया है। अब झाहू के उगने और बढ़ने हेतु जरूरी धूप और पानी की जरूरत के लिए संघर्ष करना पड़ रहा है जिसमें यह घास धीरे-धीरे पिछड़ता जा रहा है।

 तेज कपूर-नीम जैसी खुशबू वाली झाहू (Artemisia scoparia) घास आज विलायती बबूल से संघर्ष कर रही है। (चित्र: सोनू)

  1. खस-खस (Chrysopogon zizanoides)

नदी किनारे उगने वाली खस की घास अपनी गहरी जड़ों से मिट्टी को बाँधे रखती है, और इन्हीं जड़ों से मिलने वाला तेल महँगे इत्र में इस्तेमाल होता है। पहले गर्मियों में जब खस की चटाई पर पानी छिड़का जाता था, तो कमरा ठंडा हो जाता था — जैसे कोई प्राकृतिक एयर-कूलर हो। लेकिन अब रेत की खुदाई और खस की जड़ों की लूट से इसके घने झुरमुट खत्म होते जा रहे हैं।

 नदी किनारे उगने वाली खस-खस (Chrysopogon zizanioides) की घास अपनी गहरी जड़ों से मिट्टी को बाँधे रखती है। इन्हीं जड़ों से मिलने वाला तेल महँगे इत्र में इस्तेमाल होता है। (चित्र: सोनू)

  1. मिर्च-गंध (पल्मारोसा) (Cymbopogon martinii)

उदयपुर की पहाड़ी ढलानों पर उगने वाली पल्मारोसा घास से गुलाब जैसी मीठी और हल्की मिर्च जैसी खुशबू आती है। इसका तेल विदेशी परफ्यूम का अहम हिस्सा है। लेकिन अब जंगल कटने और नई हाईब्रिड घासों के फैलने से असली जंगली पल्मारोसा कम होती जा रही है। हम चाहें तो इसे बचा सकते हैं—स्थानीय नर्सरी से इसके जंगली बीज लेकर खेतों की मेड़ों या खाली ज़मीन पर इसे फिर से उगा सकते हैं।

यह है पल्मारोसा घास, जिसकी गुलाब जैसी मीठी और हल्की मिर्च जैसी खुशबू अब जंगलों के कटने से धीरे-धीरे कम होती जा रही है। (चित्र: सोनू)

  1. गुंदेल (Themeda quadrivalvis)

रात को आग में डाला गया गुंदेल सूखे भूसे जैसी लेकिन हल्की मीठी खुशबू छोड़ता है। पहले यह घास टीलों पर बड़े-बड़े झुरमुटों में उगती थी, लेकिन अब बिना रोकटोक की चराई और बार-बार लगाई गई घास की आग से यह बिखरती जा रही है। हम चाहें तो इसे वापस ला सकते हैं — चरवाहों और ग्रामीणों के साथ मिलकर खेतों में आग लगाने की प्रक्रिया को रोकने की एक आसान सी योजना बनाएं, जिससे गुंदेल फिर से घना उग सके।

गुंदेल: सूखे भूसे-सी दिखने वाली यह घास अक्सर टीलों पर घने झुरमुटों में उगती है। (चित्र: सोनू)

  1. फुलेड़ (Apluda mutica)

राजस्थान के इकलौते पहाड़ी ठिकाने माउंट आबू की नम चट्टानों पर उगने वाला फुलेड़ एक खास घास है, जिसकी पत्तियाँ रगड़ने पर हल्की पुदीना जैसी ठंडी खुशबू आती है। लेकिन अब चट्टानों की खुदाई और नमी के घटने से यह घास धीरे-धीरे गायब होती जा रही है। फुलेड़ के खास इलाकों को पहचान कर और उन्हे “हॉट-स्पॉट” के रूप में चिन्हित कर इन जगहों को खनन से बचाकर हम इसे बचा सकते हैं।

पहाड़ों की ठंडी खुशबू, फुलेड़ घास (Apluda mutica), की पुदीना-सी महक शाम की नमी में और उभरती है। (चित्र: सोनू)

  1. जंगली तुलसी / नगद भाबरी (Ocimum canum)

नगद भाँवरी, जिसे कई जगह जंगली तुलसी भी कहा जाता है, एक झाड़ीदार पौधा है जिसकी पत्तियों को छूते ही तेज़, नींबू-कपूर जैसी तीखी खुशबू हवा में फैल जाती है। इसकी पत्तियाँ कीटों को दूर रखने, त्वचा के संक्रमण में लेप बनाने और देसी इत्र में बेस की तरह उपयोग होती रही हैं। रणथंभौर में जंगल सफ़ारी के दौरान जब जीपों के पहिए इस झाड़ी को कुचलते हैं, तो अचानक एक ताज़ा, तीखी गंध हवा में भर जाती है — यह उस जंगल की पहचान बन गई है। इस गंध को एक बार महसूस कर लेने के बाद, वह सफ़ारी हमेशा के लिए स्मृति में बस जाती है।

  1. ग्वारपाठा (Aloe vera)

ग्वारपाठा भले ही हमारे लिए महकता न लगे, लेकिन इसकी कटने पर निकलने वाली मिट्टी-जैसी हल्की गंध और ठंडा गूदा कई औषधीय कामों में आता है। हो सकता है हमें इसकी खुशबू महसूस न हो, पर मक्खियाँ इसे अच्छी तरह पहचानती हैं — और इससे दूर भागती हैं। शायद यही वजह है कि कई आदिवासी समुदाय इसे सूखने के बाद अपने घर की छतों से उल्टा लटका देते थे, ताकि घर में मक्खियाँ न आएँ और हवा शुद्ध बनी रहे। औषधीय गुणों से भरपूर यह पौधा, गंध की अदृश्य दुनिया में अपना एक अलग ही स्थान रखता है।

क्या आप जानते हैं कि ग्वारपाठा की भी अपनी एक अनोखी गंध होती है? (चित्र: प्रवीण)

ये सुगंधित घासें सिर्फ़ हमारी यादों से नहीं जुड़ी हैं, बल्कि मिट्टी को थामने, कीड़ों को भगाने और गाँवों की कमाई बढ़ाने का भी काम करती हैं। तो अगली बार जब राजस्थान की गर्म हवा चेहरे से टकराए, एक पल ठहरकर सूँघिए—क्या उसमें गुग्गल का धुआँ है, खावी की हरी ताज़गी है या खस की मिट्टी जैसी ठंडक बाकी है?

अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो घबराने की ज़रूरत नहीं—अब भी वक्त है। एक बीज बोइए, एक झाड़ी वाला कोना बचाइए, और उस मिट्टी की खोती खुशबू को फिर से लौटाइए।

और भी सुगंधें, और भी कहानियाँ

राजस्थान की खुशबू सिर्फ़ जंगली घासों तक सीमित नहीं है। हमारे गाँव-आँगन और खेतों की मेड़ों पर भी कई पारंपरिक खुशबू वाले पौधे सदियों से पले हैं — जो दवा, पूजन और घरेलू उपयोग में गहराई से जुड़े हैं। तुलसी की अलग-अलग किस्में (राम तुलसी, कृष्णा तुलसी, वन तुलसी) न सिर्फ़ हवा को शुद्ध करती हैं, बल्कि इसकी तेज़ गंध और चाय में मिलाई जाने वाली पत्तियाँ रोग प्रतिरोधक ताकत देती हैं। मरुआ (Origanum majorana), जिसे ‘सदाबहार तुलसी’ भी कहते हैं की सूखी गंध वाली पत्तियाँ पुराने घरों में सिरहाने रखी जाती थीं।

पुदीना की तेज़, ठंडी सुगंध रसोई और देसी इलाज दोनों में बसी हुई है। रात को खिलने वाली रात की रानी (Cestrum nocturnum) और दिन में महकने वाला दिन का राजा (Cestrum diurnum) — दोनों मिलकर गंध की प्राकृतिक घड़ी जैसे काम करते हैं। खेतों की मेड़ों या मंदिरों के पास खिले गेंदे के फूलों की मिट्टी से मिलती तीखी महक, त्योहारों और व्रतों की याद दिलाती है।

अन्य उल्लेखनीय खुशबूदार पौधे:

राजस्थान की सुगंध-परंपरा में और भी कई वनस्पतियाँ हैं — जैसे केवड़ा की तीखी इत्र-जैसी गंध, नीम और धतूरे की विशिष्ट तीव्र महक, तथा सेवण जैसी घासें जो ज़मीन को थामे रखने के साथ-साथ हवा को अपनी विशेष पहचान देती हैं। ये सब मिलकर उस अदृश्य विरासत का हिस्सा हैं, जो हमारी नाक से ज़्यादा स्मृति और संस्कृति में महकती है।

खुशबुओं का मंद पड़ना — प्रमुख कारण

#कारणप्रभावउदाहरण
1अनियंत्रित दोहनराल या घास काटने की रफ़्तार पुनर्जनन से तेज़ हो गईगुग्गल की गहरी कटाई, खावी की जड़ों समेत उखाड़ना
2चराई व आगजनीफूल-आने से पहले चराई, गर्मियों में आग से बीज नष्टगांधेल के बीज उपलब्ध न होना, झाहू की झाड़ियों पर आग पुनरुद्भवन हेतु
3खनन व सौर-पार्कझाड़ियों और घासों का प्राकृतिक आवास नष्ट होता जा रहा हैअरावली में बॉक्साइट खनन एवं जैसलमेर में सौर ऊर्जा क्लस्टर का दुष्प्रभाव जारी है
4जलवायु परिवर्तनतापमान बढ़ने से तेल की सुगंध और गुणों में बदलावखस और खावी की खुशबू में कमी के शुरुआती संकेत प्रतीत हो रहे हैं
5सांस्कृतिक विस्मरणपारंपरिक उपयोग घटा; नई चीज़ों ने पुराने तरीकों को हटायाखस की मट की जगह प्लास्टिक कूलर, इत्र फैक्ट्रियों का असर

क्या किया जा रहा है?

  1. सामुदायिक राल-संग्रह समिति, जालोर: गाँवों में बनी समितियाँ अब यह नियम मान रही हैं: ऊँची चार कट नहीं, सतही दो खरोंच”। इससे गुग्गल के पौधे को ज़्यादा नुकसान नहीं होता। निगरानी भी अब साझेदारी से होती है — सभी हिस्सेदार मिलकर तय करते हैं कि दोहन कितना और कैसे हो।
  2. CIMAP-जोधपुर का खस नर्सरी कार्यक्रम: खस की खेती में अब सूक्ष्म सिंचाई और फसलों के बीच संतुलन (अंतरफसल) अपनाया जा रहा है। इससे खुशबू वाला तेल (EO) अच्छा बना रहता है, और किसानों की आमदनी में करीब 30% तक बढ़ोतरी हुई है।
  3. खावी चारागाह विश्राम-चक्र, बाड़मेर: बाड़मेर में 500 हेक्टेयर ज़मीन पर तीन महीने का नो-ग्रेज़िंग रोटेशन लागू किया गया है। यानी बारी-बारी से चराई रोककर घास को उगने का समय मिलता है। तीसरे साल जब बीज डाले गए, तो 65% से ज़्यादा हिस्सा फिर से हरा हुआ।
  4. स्कूल सुगंध उद्यान: अब गाँव के स्कूलों में 25 × 25 मीटर का एक खास प्लॉट बनाया जा रहा है — जहाँ खाने और महकने वाली जड़ी-बूटियाँ और घासें लगाई जाती हैं। बच्चे हर पौधे पर टैग लगाते हैं, और गंध का छोटा हर्बेरियम (संग्रह) बनाते हैं — एक खेल के साथ सिखाई जाने वाली विज्ञान की सीख।

सुगंध जो हवा ले गई

अगर आपने कभी पारिजात की वह हल्की, मीठी खुशबू महसूस की है — जो बस छूने भर से उड़ जाती है — तो याद कीजिए, वह एहसास किसी इत्र की शीशी में नहीं, आपके अपने आँगन में पला था। राजस्थान की हवा से ऐसे ही कई जंगली इत्र-घर धीरे-धीरे गायब हो रहे हैं। जब खुशबू जाती है, तो साथ में हमारी स्मृतियाँ भी फीकी पड़ जाती हैं — हमारी लोक-कथाएँ, मौसम की पहचान, मंदिर की आरती की महक, और पशुपालकों की जड़ी-बूटियाँ, सब कमजोर हो जाती हैं।

अगली बार जब थार की गर्म हवा आपके गाल से टकराए, तो एक पल ठहरकर सूँघिए — क्या उसमें खावी की नींबू जैसी ताजगी है? झाहू की कपूर जैसी छुअन है? अगर नहीं, तो शायद यही सही समय है किसी स्कूल-उद्यान में एक बीज बोने का, किसी गुग्गल झाड़ी को नाखून-भर खरोंच कर छोड़ देने का, या किसी बच्चे को यह बताने का कि पहली बारिश की असली खबर ‘गांधेल’ की खुशबू देती है, कोई मौसम ऐप नहीं।

गंध सिर्फ़ नाक से नहीं, स्मृति, पहचान और भविष्य की चेतावनी भी होती है। अगर हम इन सूक्ष्म संकेतों को सुन लें, तो सिर्फ़ हवा नहीं, हमारी ज़िंदगी भी फिर से महक सकती है।

तुलसी की अलग-अलग किस्में (राम तुलसी, कृष्णा तुलसी, वन तुलसी) न सिर्फ़ हवा को शुद्ध करती हैं, बल्कि इसकी तेज़ गंध वाली पत्तियाँ रोग प्रतिरोधक ताकत भी देती हैं (चित्र: प्रियल)

जब तक हवा में महक बचेगी, रेगिस्तान की मीठी यादें भी महकती रहेंगी

पुस्तक समीक्षा: राजस्थान के बाघों का संसार

पुस्तक समीक्षा: राजस्थान के बाघों का संसार

पुस्तक का सारांश

“राजस्थान के बाघों का संसार” अरावली और विंध्यांचल की अद्भुत जैव विविधता और पारिस्थितिकी पर केंद्रित एक अनूठी कृति है। यह पुस्तक न केवल बाघों के संरक्षण के महत्वपूर्ण आयामों को सामने लाती है, बल्कि उन पहाड़ी क्षेत्रों में मौजूद वनस्पति, जीव-जंतुओं और स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र को भी विस्तार से समझाती है। इस पुस्तक के लेखक प्रवीण सिंह, मीनू धाकड़, धर्म सिंह गुर्जर और डॉ. धर्मेंद्र खांडल ने अपने अनुभव के आधार पर इस अद्वितीय पुस्तक को तैयार किया है।

विशेषताएं और सामग्री

विषयवस्तु की विविधता
पुस्तक में 13 अध्यायों के माध्यम से बाघों का महत्व, राजस्थान के प्रमुख टाइगर रिजर्व (जैसे रणथंभौर, मुकुंदरा, रामगढ़-विशधारी, धौलपुर-करौली), जैव विविधता, पारिस्थितिकी, संरक्षण जीवविज्ञान, सतत विकास, मानव-पारिस्थितिकी संघर्ष, विकास और अन्यान्य विषयों को समेटा गया है।

जैव विविधता का गहन विश्लेषण
पुस्तक अरावली-विंध्यांचल क्षेत्र की विशेष वनस्पति (जैसे धोक, पलाश, खैर) और जीव-जंतुओं का वैज्ञानिक विवरण प्रस्तुत करती है। यह क्षेत्र, भारत के शुष्क क्षेत्रों में होने के बावजूद, असाधारण जैव विविधता का घर है।

संरक्षण और सामुदायिक भागीदारी
इसमें टाइगर वॉच संस्था द्वारा किए गए संरक्षण कार्यों और स्थानीय समुदायों की भूमिका का विवरण मिलता है। संस्था के प्रयासों से न केवल वन्यजीव संरक्षण हुआ, बल्कि स्थानीय लोगों के लिए रोजगार और शिक्षा के अवसर भी सृजित हुए।

वैज्ञानिक भाषा और स्थानीयता का सम्मिलन
इस पुस्तक में वैज्ञानिक तथ्यों को सुलभ भाषा में प्रस्तुत किया गया है, जिससे यह शैक्षणिक संस्थाओं, छात्रों और आमजन के लिए भी उपयोगी बनती है। साथ ही, इसमें स्थानीय शब्दावली और कहानियों का समावेश इसे और भी रोचक बनाता है।

प्रेरक कथाएं
पुस्तक में खेजड़ली और अमृता देवी जैसी प्रेरणादायक गाथाओं का वर्णन है, जो राजस्थान की सांस्कृतिक विरासत और पर्यावरण-संवेदनशीलता को उजागर करती हैं।

उपयोगिता

“राजस्थान के बाघों का संसार” पुस्तक न केवल वन्यजीव प्रेमियों और शोधार्थियों के लिए अमूल्य है, बल्कि छात्रों, शिक्षकों और राजस्थान के बाघ क्षेत्र में काम कर रहे प्रकृति मार्गदर्शकों (नेचर गाइड्स) के लिए भी एक महत्त्वपूर्ण संसाधन है। इस पुस्तक का लेखन शैली स्पष्ट, प्रवाहपूर्ण और वैज्ञानिक तथ्यों से परिपूर्ण है, जो इसे विद्यार्थियों और शिक्षकों के लिए समझने योग्य और प्रेरक बनाती है।

यह पुस्तक स्कूल के बच्चों और शिक्षकों के बीच जागरूकता पैदा करने के उद्देश्य से तैयार की गई है। साथ ही, बाघों के परिदृश्य में कार्यरत नेचर गाइड्स भी इससे लाभान्वित हो सकते हैं। पुस्तक में वैज्ञानिक तथ्यों को सहज भाषा में प्रस्तुत किया गया है, जिससे कठिन अवधारणाएं भी सरलता से समझाई जाती हैं। स्थानीय शब्दावली और सांस्कृतिक संदर्भों का समावेश इसे और भी रोचक बनाता है।

अतः, यह पुस्तक किसी भी व्यक्ति के लिए उपयोगी है, जो राजस्थान की जैव विविधता और पारिस्थितिकी में रुचि रखता है। यह पाठक वर्ग को न केवल अरावली-विंध्यांचल के अद्वितीय पारिस्थितिकी तंत्र की सराहना करने में मदद करेगी, बल्कि इसके संरक्षण के प्रति प्रेरित भी करेगी।

नोट: इस पुस्तक की प्रति प्राप्त करने के लिए आप हमें tigerwatchtiger@gmail.com पर लिख सकते हैं या लेखकों से सीधे संपर्क कर सकते हैं।

राजस्थान और जलवायु परिवर्तन: संकट, संकेत और समाधान

राजस्थान और जलवायु परिवर्तन: संकट, संकेत और समाधान

देश का सबसे बड़ा राज्य आज सबसे बड़ी जलवायु चुनौती झेल रहा है

राजस्थान, जो भारत का सबसे बड़ा राज्य है (देश के भौगोलिक क्षेत्र का 10.4%), तेज़ धूप, रेतीले टीले और ऐतिहासिक किलों के लिए तो मशहूर है, लेकिन यही धरती आज बदलते मौसम की सबसे मुश्किल चुनौतियाँ झेल रही है। यहाँ की 6.85 करोड़ आबादी (2011 की जनगणना के अनुसार भारत की कुल आबादी का 5.66%) अनियमित मानसून और बढ़ते तापमान के बीच जूझ रही है: खेतों में बूँद-बूँद पानी बचाने की होड़, गर्मी की लहरों में बिजली कटौती से बचने का संघर्ष, और बढ़ती महंगाई में दिन-प्रतिदिन जीवनयापन का तनाव।

यदि हमें “जलवायु परिवर्तन” शब्द सुनते ही सिर्फ ग्लेशियर पिघलने या समुद्रस्तर बढ़ने का खयाल आता है, तो राजस्थान के अनुभव उसे कहीं दूर तक ले जाते हैं। जब बारिश अपने सही समय और मात्रा से हटकर हो, तो यह आराम नहीं देती, बल्कि किसान के खेत सूख जाने का कारण बन जाती है; बिजली कटौती शहरों को “हीट आइलैंड” बना देती है, जहाँ हर दीवार तपती और हर कदम झुलसता है।

2022 में राजस्थान के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन निदेशालय और आईआईटी मुंबई ने मिलकर जो स्टेट एक्शन प्लान ऑन क्लाइमेट चेंज (RSAPCC) जारी किया, वह सिर्फ एक कागजी दस्तावेज़ नहीं, बल्कि राज्य के सामने खड़ी उन आठ अहम चुनौतियों का नक्शा है जिनमें हम आज उतर रहे हैं—कृषि में सूखा-प्रतिरोधी फ़सलों से लेकर जल संचयन तक, वनों की रक्षा से लेकर सार्वजनिक स्वास्थ्य तक, ऊर्जा दक्षता से लेकर आपदा प्रबंधन तक।

यह योजना तय करती है कि किन-किन इलाकों को सबसे पहले प्राथमिकता देनी होगी और कैसे सामाजिक-आर्थिक संकेतक—जैसे जनसंख्या घनत्व, महिला साक्षरता, घरों का आकार, तथा अनुसूचित जाति-जनजाति की आबादी—हमें यह बताते हैं कि कहाँ सबसे अधिक तैयारी, सबसे सख्त कदम और सबसे सच्ची भागीदारी की दरकार है। जयपुर, सीकर और कोटा जैसे जिले जहाँ चक्रवात और गर्मी की लहरें आम बात हो गई हैं, उनकी कहानी अलग है; प्रतापगढ़, चित्तौड़गढ़ और बांसवाड़ा जैसे ग्रीन इलाके दूसरी दास्ताँ सुनाते हैं, जहाँ सूखे ने संस्कृति और आम जीवन को मुश्किलों में डाला है।

जलवायु परिवर्तन के प्रति राजस्थान राज्य में जिला-वार सामाजिक-आर्थिक संवेदनशीलता (सौजन्य: RSAPCC)

जलवायु परिवर्तन के प्रमुख प्रभाव

जब बरसात राहत नहीं, सिरदर्द बन जाए

राजस्थान में ग्रीष्म और शीत ऋतुओं की तीव्रता में स्पष्ट वृद्धि है—गर्मी पहले की तुलना में अधिक प्रचंड हो गई है और सर्दी अधिक कड़ाके की होने लगी है। मॉनसून की अनिश्चितता, वर्षा का देर से आगमन या अल्पावधि में अत्यधिक वर्षा जैसी स्थितियाँ सामान्य होती जा रही हैं। इसके परिणामस्वरूप कृषि प्रणाली बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

यहाँ औसत वार्षिक वर्षा लगभग 572 मिमी है, पर यह बहुत असमान रूप से वितरित है: राज्य का उत्तर-पश्चिमी हिस्सा मात्र 200–400 मिमी बारिश प्राप्त करता है, जबकि दक्षिण-पूर्व में यह 900–1000 मिमी तक पहुँच जाती है।

अरावली पर्वत श्रृंखला राज्य को दो भिन्न जलवायु क्षेत्रों में विभाजित करती है; अरावली के पश्चिम का क्षेत्र शुष्क से अर्ध-शुष्क है, जबकि पूर्व का क्षेत्र अर्ध-शुष्क से उप-आर्द्र है और अत्यधिक तापमान, लंबे सूखे, तेज हवाओं और उच्च संभावित वाष्पीकरण की विशेषता है। इस असमानता और मॉनसून की कमी या अत्यधिक तीव्रता की वजह से अचानक सूखा और बाढ़ जैसी चरम घटनाएं आम हो गई हैं, जिससे कृषि प्रणाली बुरी तरह प्रभावित होती है। रिपोर्ट के विश्लेषण से पता चलता है कि राजस्थान में सूखे के महीनों में वृद्धि हुई है।

सूखी और फटती ज़मीन के बीच जीवन की आखिरी उम्मीद — घटती जलधाराएँ सिर्फ प्यास नहीं बढ़ा रहीं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को संकट में डाल रही हैं।

गर्मी, सूखा और बाढ़: एक साथ तीन मोर्चों की मार

“राजस्थान की दो जलवायु अवधियाँ और बदलती वर्षा की तस्वीर”

रिपोर्ट के अनुसार, राज्य में वर्षा की स्थिति का मूल्यांकन दो प्रमुख समयावधियों—1901 से 1950 तक और 1951 से 2015 तक निम्न बिन्दुओ के आधार पर किया गया है:

  • वार्षिक वर्षा के रुझान: 1950 तक प्रतापगढ़, बांसवाड़ा और दक्षिणी राजस्थान के अन्य क्षेत्रों में अच्छी वर्षा हुआ करती थी, जबकि जैसलमेर और उत्तरी राजस्थान के कई हिस्सों में लगभग सूखे जैसे हालात थे। लेकिन 1951 से 2015 की अवधि में यह तस्वीर बदल गई — अब जोधपुर, बीकानेर जैसे पश्चिमी-उत्तर पश्चिमी क्षेत्र, पारंपरिक रूप से शुष्क माने जाने के बावजूद, दक्षिण-पूर्वी राजस्थान से अधिक वर्षा प्राप्त करने लगे हैं। वहीं, पहले अधिक वर्षा वाले दक्षिणी क्षेत्र अब लगातार सूखाग्रस्त होते जा रहे हैं। ढोलपुर, जयपुर और मध्य राजस्थान के अन्य इलाके, जो पहले सामान्य वर्षा क्षेत्र थे, अब सूखे की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं।
  • अगर मानसून की बारिश की बात करें, तो 1901 से 1951 की अवधि के दौरान पूर्वी-दक्षिणी राजस्थान—जैसे प्रतापगढ़, उदयपुर, डूंगरपुर, बांसवाड़ा और हाड़ौती क्षेत्र—में सर्वाधिक वर्षा होती थी। लेकिन 1951 से 2015 की अवधि में यह प्रवृत्ति बदल गई और जोधपुर, चूरू, झुंझुनूं जैसे शुष्क क्षेत्रों को छोड़कर पूरे राज्य में वार्षिक मानसूनी वर्षा में गिरावट दर्ज की गई है।
  • गैर-मानसून वर्षा के बदलाव: 1950 से पहले कोटा, झालावाड़ जैसे हाड़ौती क्षेत्र में गैर-मानसून (ग्रीष्म एवं शीत ऋतु) वर्षा सामान्य रूप से होती थी, जबकि अरावली की तलहटी में बसे जैसलमेर, बीकानेर, जोधपुर, पाली, नागौर आदि क्षेत्रों में इसकी मात्रा नगण्य थी। लेकिन 1950 से 2015 के बीच यह प्रवृत्ति उलट गई — अब जैसलमेर व उसके आसपास के क्षेत्रों में गैर-मानसून वर्षा अपेक्षाकृत अधिक देखी जा रही है, जबकि हाड़ौती क्षेत्र में यह लगभग समाप्त हो गई है।

बरसात के रंग: लाल से नीला होता रेगिस्तान

“मानचित्रों में जलवायु का इतिहास”

नीचे दिए गए मानचित्रों में राजस्थान में वर्षा के दशकों के बदलावों को रंगों के माध्यम से दर्शाया गया है। लाल रंग उन क्षेत्रों को दिखाता है जहाँ वर्षा में गिरावट या कम वर्षा हुई है, जबकि नीला रंग उन क्षेत्रों को चिन्हित करता है जहाँ वर्षा की मात्रा में वृद्धि देखी गई है।

1901-1951 अवधि के बीच कुल वार्षिक वर्षा, वार्षिक अधिकतम वर्षा, मानसून वर्षा और गैर-मानसून वर्षा का रुझान (सौजन्य: RSAPCC)

1951-2020 अवधि के बीच कुल वार्षिक वर्षा, वार्षिक अधिकतम वर्षा, मानसून वर्षा और गैर-मानसून वर्षा का रुझान (सौजन्य: RSAPCC)

पानी की प्यास और घटती ज़मीन के नीचे की नमी

“राज्य के पूर्वोत्तर हिस्से सबसे तेज़ी से सूख रहे हैं”

राजस्थान पहले से ही भारत के सबसे जल-अभावग्रस्त राज्यों में है। RSAPCC रिपोर्ट बताती है कि राज्य के उत्तर-पूर्वी जिलों (सीकर, जयपुर, अलवर, दौसा, धौलपुर, करौली, नागौर, राजसमंद) में भूजल स्तर तेजी से घट रहा है, जो तेजी से भूजल की कमी का संकेत है। भूजल पर अधिक दोहन और अनियमित वर्षा के कारण खेतों में पानी नहीं रुकता, ग्रामीण क्षेत्रों में पेयजल और सिंचाई दोनों के लिए संघर्ष बढ़ता जा रहा है। क्षेत्रीय जल संकट राजस्थान में एक गंभीर समस्या हो सकती है, जहां कम वर्षा और भूजल के अत्यधिक दोहन के प्रभाव भविष्य में और बढ़ने की संभावना है। भविष्य में दक्षिण-पूर्वी राजस्थान (प्रतापगढ़, बांसवाड़ा, चित्तोडगढ़, एवं कोटा के कुछ हिस्से) में जल उपलब्धता में वृद्धि दिखाई देती है, लेकिन शेष राजस्थान में कोई परिवर्तन या कमी नहीं दिखती है।

मानचित्र: भूजल की उपलब्धता के रुझान 1996-2014 की अवधि में (सौजन्य: RSAPCC)

जल की माँग बनाम उपलब्धता: एक असंतुलन की तस्वीर

“हनुमानगढ़ से भरतपुर तक अधिक जल उपयोग, लेकिन संकट हर ओर”

राजस्थान में जल की वार्षिक मांग को विभिन्न उपयोग श्रेणियों में विभाजित किया गया है, जिनमें घरेलू उपयोग, पशुधन, संस्थागत जरूरतें, अग्निशमन, सिंचाई तथा विद्युत संयंत्रों की शीतलन आवश्यकताएं शामिल हैं। इन सभी श्रेणियों की कुल मांग को मिलाकर राज्य का वार्षिक जल उपयोग तय किया गया है। संलग्न मानचित्र में राजस्थान के विभिन्न जिलों में जल उपयोग की मात्रा (मिमी में) को रंगों के माध्यम से दर्शाया गया है, जिसमें अधिक जल उपयोग वाले क्षेत्र लाल और कम जल उपयोग वाले क्षेत्र नीले व बैंगनी रंग में दिखाए गए हैं। यह विश्लेषण दर्शाता है कि राज्य के पूर्वी और उत्तर-पूर्वी हिस्सों (हनुमानगढ़, गंगानगर, अलवर, जयपुर,  भरतपुर, बूंदी, सीकर, और दौसा) में जल उपयोग अपेक्षाकृत अधिक है, जबकि पश्चिमी और दक्षिणी भागों में यह कम पाया गया है। यह वितरण मुख्यतः सिंचाई, पशुपालन और जनसंख्या घनत्व जैसे कारकों पर निर्भर करता है।

वार्षिक जल उपयोग (सौजन्य: RSAPCC)

कृषि की लड़ाई: जलवायु के सामने किसान बेबस

“65% आबादी की रोज़ी पर मंडराता संकट”

राजस्थान जैसे सूखा-प्रभावित राज्य में, जहां लगभग 65% आबादी की आजीविका सीधे खेती और मौसम पर निर्भर है, जलवायु परिवर्तन की मार सबसे तीव्र रूप से महसूस की जा रही है। बार-बार सूखा पड़ना, भूजल स्तर में गिरावट, जल संसाधनों की कमी, अकुशल जल प्रबंधन, बिगड़ती मिट्टी की गुणवत्ता और घटती उत्पादकता जैसे संकट कृषि को प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित कर रहे हैं। इसके साथ ही, बेमौसमी तूफान, लंबा सूखा, ओलावृष्टि और अचानक बाढ़ जैसी चरम मौसमी घटनाएं अब आम हो गई हैं, जिनकी आवृत्ति लगातार बढ़ रही है। जिन जिलों में मौसम की अनिश्चितता अधिक है, वहां कृषि सबसे अधिक संकटग्रस्त है, जिससे फसलें बर्बाद हो रही हैं और किसान आर्थिक असुरक्षा की स्थिति में फंसते जा रहे हैं।

“बारमेर से सिरोही तक अलग-अलग संकट, अलग-अलग कारण”

राज्य-स्तरीय आंकड़ों से यह स्पष्ट होता है कि कृषि संवेदनशीलता और जलवायु संकट के बीच एक सकारात्मक संबंध है। बाड़मेर, जैसलमेर, चूरू और जालोर जैसे ज़िले सर्वाधिक संवेदनशील पाए गए हैं, जबकि बूंदी, चित्तौड़गढ़, दौसा, करौली, राजसमंद, अलवर, बारां और धौलपुर जैसे ज़िलों में यह संवेदनशीलता सबसे कम है। हालांकि कुछ ज़िले इस सामान्य प्रवृत्ति से अलग भी हैं—जैसे गंगानगर और हनुमानगढ़, जहां जलवायु संकट तो अधिक है, लेकिन सिंचाई की बेहतर सुविधाओं के कारण कृषि अपेक्षाकृत सुरक्षित है। इसके विपरीत सिरोही ज़िले में जलवायु संकट अपेक्षाकृत कम होते हुए भी कृषि की संवेदनशीलता अधिक है, क्योंकि वहां सिंचाई सुविधा और उत्पादकता दोनों बहुत कम हैं।

इन हालातों का सामाजिक प्रभाव भी गहरा है—स्थानीय बाजारों में अंशकालिक मजदूरी, ऋणग्रस्तता और प्रवासन की प्रवृत्ति बढ़ रही है, जिससे ग्रामीण सामाजिक संरचना अस्थिर हो रही है।

तपिश और बीमारी: जनस्वास्थ्य पर दोहरी मार

“हीट स्ट्रोक से लेकर डेंगू तक, जलवायु बदल रही है बीमारियों का नक्शा”

तापमान में वृद्धि, जल संकट और भोजन की असुरक्षा का सीधा असर जनस्वास्थ्य पर पड़ रहा है, विशेषकर कमजोर और वंचित समुदायों में। अत्यधिक गर्मी ‘हीट स्ट्रोक’ और ‘हीट एक्सहॉस्टन’ जैसी बीमारियाँ ला रही है, जबकि बाढ़ और जलजमाव के कारण डेंगू, मलेरिया जैसे पानीजनित रोग तेजी से फैल रहे हैं। राजस्थान में पहले से ही डेंगू और मलेरिया का प्रकोप अधिक है। जलवायु परिवर्तन से प्रेरित अप्रत्यक्ष स्वास्थ्य प्रभावों में व्यावसायिक रोग, खराब पोषण और मानसिक स्थिति भी शामिल हैं।

बढ़ती आर्द्रता और सर्दी से अस्थमा, ब्रोंकाइटिस जैसे श्वसन संबंधी रोगों में भी वृद्धि हो रही है। इन सभी कारणों से अस्पतालों में भीड़ बढ़ रही है, स्वास्थ्य बजट पर दबाव पड़ रहा है और लोगों की जीवन गुणवत्ता में गिरावट आ रही है—यहाँ तक कि छुट्टियाँ भी अब स्वास्थ्य संबंधी चिंता से घिर गई हैं।

शहरों की गर्मी और जलभराव: हीट आइलैंड बनते शहर 

“जब हर सड़क तपती है और हर गली में पानी भरता है”

शहरों में ग्रीन स्पेस कम होने से “अर्बन हीट आइलैंड” इफ़ेक्ट बढ़ता है। बारिश का पानी सही ढंग से निकासी न मिलने से जलभराव होता है, ट्रैफिक जाम और प्रदूषण दोगुना होता है। रिपोर्ट बताती है कि राजस्थान के शहरी क्षेत्रों, विशेषकर सीकर जिले में, वार्षिक न्यूनतम दैनिक तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है। वहीं, दक्षिण और पूर्वी राजस्थान के शहरों (बांसवाड़ा, बारां, बूंदी, चित्तौड़गढ़, झालावाड़, पाली, सिरोही, चूरू और जयपुर) के साथ-साथ पश्चिम में जैसलमेर में दैनिक अधिकतम तापमान में उल्लेखनीय वृद्धि देखी जा रही है। ऐसे हालात में पानी सोखने वाले फर्श और वर्षा जल संचयन जैसे स्थानीय उपाय ही कारगर समाधान हैं।

वनों की आग और जैव विविधता की पुकार

“2035 तक वन आवरण का 61% बदल सकता है”

वन और जैव विविधता पर भी गंभीर खतरा मंडरा रहा है। अरावली की पहाड़ियों से लेकर अन्य जंगलों में आग की घटनाएं बढ़ी हैं, जिससे कई प्रजातियों के आवास प्रभावित हुए हैं और पारिस्थितिक असंतुलन पैदा हो रहा है। जलवायु परिवर्तन के कारण वनों की आग, पौधों और जानवरों की प्रजातियों के निवास स्थान में बदलाव और वनस्पति संरचना में गिरावट देखी जा रही है। इससे पारिस्थितिक तंत्र की स्थिरता को खतरा है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि जलवायु परिवर्तन के कारण राजस्थान में वनस्पति आवरण में परिवर्तन 2035 तक 61.22% और 2085 तक 78.18% हो सकता है।

जलते जंगलों की लपटें सिर्फ पेड़ों को नहीं, भविष्य की उम्मीदों को भी राख कर रही हैं।
राजस्थान की सूखी धरती पर हर चिंगारी एक चेतावनी है।

त्योहार, संस्कृति और परंपरा: जलवायु से बदलता जन-जीवन

“मानसून आधारित त्योहारों का समय अब यादों में खोता जा रहा है”

जलवायु परिवर्तन ने परम्परागत त्योहारों, लोककथाओं और रीति-रिवाजों को भी प्रभावित किया है। मानसून पर आधारित उत्सवों का समय खिसक रहा है, नदी-तीर्थ यात्रा जोखिमभरे हो गए हैं, और पारंपरिक कृषि-आधारित त्यौहारों में हिस्सा लेने वाले युवा शहर की ओर पलायन कर रहे हैं।

कभी हरियाली तीज की झूला गीतों से गूंजते आँगन, आज सूखी धरती और धुंधली यादों में बदल गए हैं। मानसून-आधारित त्योहार अब सिर्फ दीवारों की फीकी पेंटिंग में बचे हैं।

कभी हरियाली तीज की झूला गीतों से गूंजते आँगन, आज सूखी धरती और धुंधली यादों में बदल गए हैं।
मानसून-आधारित त्योहार अब सिर्फ दीवारों की फीकी पेंटिंग में बचे हैं।

2030 की चेतावनी: उत्सर्जन और अवसर दोनों साथ

“यदि आज नहीं चेते, तो 1.7 गुना बढ़ जाएगा उत्सर्जन”

रिपोर्ट के अनुसार, यदि वर्तमान विकास की दिशा में कोई परिवर्तन नहीं किया गया तो राजस्थान में 2030 तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन वर्तमान मूल्य का लगभग 1.7 गुना तक बढ़ सकता है। राजस्थान का कुल अनुमानित योगदान 137 मीट्रिक टन CO₂-तुल्यांक/वर्ष है, जिसमें लगातार वृद्धि की प्रवृत्ति है।

प्रमुख उत्सर्जक क्षेत्र और अनुमान:

  • बिजली उत्पादन: यह क्षेत्र लगभग 2 मीट्रिक टन CO₂-तुल्यांक/वर्ष का उत्सर्जन करता है और सबसे बड़े उत्सर्जकों में से एक है।
  • कृषि क्षेत्र: यह भी लगभग 8 मीट्रिक टन CO₂-तुल्यांक/वर्ष का योगदान देता है, जिसमें फसल अवशेषों को जलाना, पशुधन से मीथेन उत्सर्जन और उर्वरकों का उपयोग शामिल है।
  • उद्योग: औद्योगिक उत्पादन लगभग 4 मीट्रिक टन CO₂-तुल्यांक/वर्ष उत्सर्जित करता है ।
    • सीमेंट उद्योग: यह औद्योगिक उत्सर्जन का एक बड़ा हिस्सा है ।
    • वस्त्र और चमड़ा, एवं रसायन और उर्वरक उद्योग भी महत्वपूर्ण योगदानकर्ता हैं ।
  • परिवहन: यह क्षेत्र लगभग 34 मीट्रिक टन CO₂-तुल्यांक/वर्ष उत्सर्जित करता है और 2030 तक इसके उत्सर्जन में 2.7 गुना वृद्धि का अनुमान है ।
  • आवासीय क्षेत्र: लगभग 10 मीट्रिक टन CO₂-तुल्यांक/वर्ष का उत्सर्जन, मुख्य रूप से खाना पकाने और प्रकाश व्यवस्था के लिए पारंपरिक ईंधन के उपयोग से होता है । 2030 तक इसमें 20% वृद्धि की संभावना है ।
  • ईंट उत्पादन: लगभग 4 मीट्रिक टन CO₂-तुल्यांक/वर्ष उत्सर्जित करता है । यदि वर्तमान तकनीक (मुख्य रूप से फिक्स्ड चिमनी बुल्स ट्रेंच किल्न – FCBTKs) में बदलाव नहीं किया गया तो 2030 तक ईंट निर्माण से होने वाला उत्सर्जन दोगुना से अधिक हो सकता है ।
  • अपशिष्ट प्रबंधन: लगभग 4 मीट्रिक टन CO₂-तुल्यांक/वर्ष का उत्सर्जन करता है ।

नीतियाँ नहीं, समाधान चाहिए: अवसरों की सूची

“जल, ऊर्जा, कृषि, वन और स्वास्थ्य—हर क्षेत्र में सुधार की राह है”

हालांकि, यह संकट एक अवसर भी प्रदान करता है। राजस्थान राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (RSAPCC) में कई समाधान सुझाए गए हैं, जैसे:

  • जल प्रबंधन: पुनः उपयोग और रिचार्ज को बढ़ावा देना। जल संरक्षण के पारंपरिक और वैज्ञानिक तरीकों को एकीकृत करना। इसमें वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना और भूजल पुनर्भरण के लिए नवोन्मेषी तकनीकों का उपयोग करना शामिल है।
  • हरित ऊर्जा में निवेश: सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं का विस्तार। राजस्थान में सौर ऊर्जा की अनुमानित क्षमता 142 GW और पवन ऊर्जा की 7 GW है।
  • स्मार्ट कृषि: जल-कुशल तकनीकों और फसल विविधीकरण को अपनाना। इसमें ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई प्रणाली और कम पानी वाली फसलों को बढ़ावा देना शामिल है।
  • शहरी नियोजन: हरित भवन, सार्वजनिक परिवहन और टिकाऊ बुनियादी ढांचे की ओर अग्रसर होना। शहरों में ग्रीन स्पेस बढ़ाना और वर्षा जल निकासी प्रणालियों में सुधार करना।
  • स्वास्थ्य प्रणाली को जलवायु के अनुकूल बनाना: स्वास्थ्य सेवाओं, पोषण, स्वच्छता और निगरानी तंत्र को सुदृढ़ करना। इसमें गर्मी और सर्दी से संबंधित बीमारियों के लिए प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली विकसित करना और वेक्टर जनित रोगों के लिए निगरानी बढ़ाना शामिल है।
  • वन और जैव विविधता का संरक्षण: वनीकरण को बढ़ावा देना, मौजूदा वनों की सुरक्षा करना और आग की घटनाओं को रोकने के उपाय करना।
  • उत्सर्जन में कमी: औद्योगिक प्रक्रियाओं में सुधार, ईंट भट्टों में स्वच्छ तकनीक का उपयोग और परिवहन क्षेत्र में इलेक्ट्रिक वाहनों को बढ़ावा देना।

निष्कर्ष: आज की तैयारी, कल का भविष्य

“अगर आज ठोस कदम उठाए, तो राजस्थान बन सकता है मॉडल राज्य”

जलवायु परिवर्तन कोई दूर की आशंका नहीं, बल्कि एक जीवंत, वर्तमान संकट है — और राजस्थान इसके सबसे सामने खड़े राज्यों में है। यदि आज हम समुचित नीति, समुदायिक भागीदारी और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के साथ ठोस कदम उठाते हैं, तो न केवल हम इस संकट से बच सकते हैं, बल्कि राजस्थान को जलवायु-संवेदनशीलता से मुक्त एक टिकाऊ राज्य के रूप में स्थापित भी कर सकते हैं। इस कार्य योजना का प्रभावी कार्यान्वयन राजस्थान को भारत में जलवायु कार्रवाई के लिए एक बेंचमार्क बना सकता है।

गर्मी की मार झेलता एक ग्रामीण – तपती ज़मीन, दीवारों में समाई लू, और पेड़ की छांव ही है राहत का एकमात्र सहारा। राजस्थान के गाँवों में अब यही दृश्य आम हो चला है। (फ़ोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

नोट: यह लेख राजस्थान राज्य जलवायु परिवर्तन कार्य योजना (Rajasthan State Action Plan on Climate Change – RSAPCC) पर आधारित है, जिसे 2022 में राजस्थान सरकार के पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन विभाग और भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (IIT) मुंबई के सहयोग से तैयार किया गया था। इस योजना के निर्माण में प्रमुख भूमिका निभाने वालों में राजस्थान सरकार के तत्कालीन प्रमुख सचिव (वन, पर्यावरण और जलवायु परिवर्तन) श्री शिखर अग्रवाल (IAS) और IIT मुंबई के प्रोफेसर के. नारायणन (मुख्य परियोजना प्रभारी) शामिल थे। IIT मुंबई की टीम में प्रोफेसर रंगन बनर्जी, प्रोफेसर सुभीमल घोष, प्रोफेसर अर्नब जना, प्रोफेसर त्रुप्ति मिश्रा, प्रोफेसर डी. पार्थसारथी, प्रोफेसर आनंद बी. राव और प्रोफेसर चंद्रा वेंकटरमन जैसे विशेषज्ञों ने योगदान दिया। इस योजना का उद्देश्य राजस्थान को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति अधिक लचीला और अनुकूल बनाने के लिए रणनीतियाँ विकसित करना है।