राजस्थान के संरक्षित क्षेत्र

राजस्थान के संरक्षित क्षेत्र

संरक्षित क्षेत्र, ऐसे क्षेत्र होते हैं जिन्हें उनकी प्राकृतिक, पर्यावरणीय, जैव-विविधता और सांस्कृतिक महत्व के कारण परिवर्तन या हानि से सुरक्षा प्रदान की जाती है। इन क्षेत्रों में मानव हस्तक्षेप और संसाधनों का दोहन बहुत ही सीमित और नियंत्रित हो। संरक्षित क्षेत्रों की व्यापक रूप से स्वीकृत परिभाषा इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) द्वारा संरक्षित क्षेत्रों के अपने वर्गीकरण दिशानिर्देशों में प्रदान की गई है। जिसके अनुसार “संरक्षित क्षेत्र कानूनी या अन्य प्रभावी साधनों के माध्यम से मान्यता प्राप्त एक स्पष्ट रूप से परिभाषित भौगोलिक स्थान होता है जो प्रकृति के दीर्घकालिक संरक्षण के साथ पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए समर्पित और प्रबंधित है”

संरक्षित क्षेत्र, सुरक्षा के भिन्न स्तर और देश के सक्षम कानूनों या शामिल अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के नियमों के आधार पर कई प्रकार के होते हैं। भारत में संरक्षित क्षेत्र में राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, कंजर्वेशन / कम्यूनिटी रिजर्व और टाइगर रिजर्व शामिल हैं। इसमें आरक्षित वन शामिल नहीं हैं।

संरक्षित क्षेत्र (PA) को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में परिभाषित किया गया है। धारा 2 (24A) कहती है: “संरक्षित क्षेत्र” का अर्थ है राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, संरक्षण / सामुदायिक अभयारण्य। इन्हें “संरक्षित क्षेत्र” नामक अध्याय IV के तहत अधिसूचित किया गया है।

दूसरी ओर एक टाइगर रिजर्व को “राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण” (NTCA) नामक अध्याय IV B के तहत अधिसूचित किया गया है। राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के क्षेत्रों को शामिल करके टाइगर रिज़र्व का गठन किया जाता है। यह धारा 38 V (4) (i) द्वारा अनिवार्य है। चूंकि, टाइगर रिजर्व के सभी अधिसूचित कोर या क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट या तो अभयारण्य हैं या बाघों की आबादी वाले राष्ट्रीय उद्यान हैं इसलिए उन्हें भी PA माना जाता है। यहाँ आपको बात दें कि धारा 38 V (4) (ii) के अनुसार टाइगर रिजर्व में अधिसूचित बफ़र या परिधीय क्षेत्रों को संरक्षण की कमतर आवश्यकता होती है इसलिए उन्हें PA कि श्रेणी से बाहर रखा गया है। इनमें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) भी शामिल हैं जो PA को घेरते हैं।

राजस्थान के सभी संरक्षित क्षेत्रों को दर्शाता मानचित्र

राष्ट्रीय उद्यान:

अभयारण्य के भीतर या बाहर एक क्षेत्र को उसके पारिस्थितिक, जीव-जंतु, वनस्पतीय, भू-आकृति, या प्राणी-शास्त्रीय महत्व के कारण रक्षा, वन्यजीवों या उनके पर्यावरण का प्रचार या विकास करने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा इनको राष्ट्रीय उद्यान के रूप में गठित करने के लिए अधिसूचित किया जा सकता है। राष्ट्रीय उद्यान के अंदर किसी भी मानवीय गतिविधि की अनुमति नहीं होती सिवाय राज्य के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक द्वारा अध्याय 4 में दी गई शर्तों के तहत स्वीकृत गतिविधियों के।

वन्यजीव अभयारण्य:

किसी भी आरक्षित वन या प्रादेशिक जल से युक्त क्षेत्र के अलावा कोई क्षेत्र यदि पर्याप्त पारिस्थितिक, जीव-जंतु, वनस्पतीय, भू-आकृति, प्राकृतिक या जूलॉजिकल महत्व का हो तो राज्य सरकार द्वारा वन्यजीव या उसके पर्यावरण की रक्षा, प्रचार या विकास के उद्देश्य से अभयारण्य के रूप में गठित करने के लिए अधिसूचित किया जा सकता है। अभयारण्य क्षेत्र के अंदर कुछ प्रतिबंधित मानव गतिविधियों की अनुमति होती है जो कि WPA 1972 के अध्याय IV में दिए गए हैं।

रामगढ विषधारी अभयारण्य और वहां की जैव-विविधता (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

कंजर्वेशन / कम्यूनिटी रिजर्व:

संरक्षित क्षेत्रों को चिह्नित करने वाले शब्द हैं जो आम तौर पर स्थापित राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों और आरक्षित और संरक्षित जंगलों के बीच बफर जोन के रूप में कार्य करते हैं। ऐसे क्षेत्र यदि निर्जन और पूरी तरह से भारत सरकार के स्वामित्व में हों, लेकिन समुदायों और सामुदायिक क्षेत्रों द्वारा निर्वाह के लिए उपयोग किये जाते हों या भूमि के छोटे हिस्से का निजी स्वामित्व होने कि स्थिति में संरक्षण क्षेत्रों के रूप में नामित किया जा सकता है।

संरक्षित क्षेत्रों में इन श्रेणियों  को पहली बार 2002 के वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम में पेश किया गया था। भूमि के निजी स्वामित्व और भूमि उपयोग के कारण मौजूदा या प्रस्तावित संरक्षित क्षेत्रों में कम सुरक्षा के कारण इन श्रेणियों को जोड़ा गया था।

जोड़ बीड गधवाला कंजर्वेशन रिजर्व, बीकानेर (फोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा)

राजस्थान में संरक्षित क्षेत्रों कि स्थिति:

राजस्थान के संरक्षित क्षेत्रों के बारे में यहाँ के लोगों को कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मालूम पड़ती। अक्सर यहाँ लोगों द्वारा अलग-अलग जानकारियाँ उपलब्ध कराई जाती है। यहाँ तक कि भिन्न सरकारी संस्थाओं द्वारा भी अलग – अलग जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। WII-ENVIS के वेब पोर्टल के अनुसार राजस्थान में 4 राष्ट्रीय उद्यान और 25 वन्यजीव अभयारण्य हैं। राजस्थान सरकार के एनवायरनमेंट पोर्टल के अनुसार यहाँ 3 राष्ट्रीय उद्यान और 26 अभयारण्य हैं।

राजस्थान में तीन राष्ट्रीय उद्यान, 27 वन्यजीव अभयारण्य, 14 कंजर्वेशन रिजर्व, और तीन टाइगर रिजर्व हैं। यहाँ अभी तक एक भी कम्यूनिटी रिजर्व घोषित नहीं किया गया है, लेकिन इस संबंध में सरकार के प्रयास जारी हैं। यहाँ यह भी उलेखनिए है कि डेसर्ट नैशनल पार्क और सरिस्का नैशनल पार्क को राजस्थान सरकार कि अधिसूचना के अनुसार राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया है लेकिन वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अधिसूचना के अनुसार ये अभयारण्य ही हैं जिनके नाम में नैशनल पार्क शब्द जोड़ा गया है, और राजस्थान में सिर्फ राष्ट्रीय उद्यान ही हैं।

क्रम. सं. संरक्षित क्षेत्र संख्या क्षेत्र (sq.km.) कवरेज % (राज्य में)
1 राष्ट्रीय उद्यान 3 608.38 0.18
2 वन्यजीव अभ्यारण्य 27 9152.33 2.67
3 कंजर्वेशन रिजर्व 14 667.01 0.19
4 टाइगर रिजर्व 3 3384.62 0.99
  योग (total) 47 13812.4* 4.04

* योग, संरक्षित क्षेत्रों के एरिया के ओवरलैप को छोड़कर

भैंसरोडगढ़ अभयारण्य (फोटो: डॉ. एन.कृष्णेन्द्र सिंह)

 

राजस्थान में संरक्षित क्षेत्रों की सूची (जुलाई, 2020)
S. No. संरक्षित क्षेत्र का नाम जिला क्षेत्र (प्रति वर्ग कि.मी.) मुख्य वन्यजीव अधिसूचना नं. और तारीख
A नेशनल पार्क
1 रणथंभौर नेशनल पार्क सवाई माधोपुर 282.03 बाघ, पैंथर, भालू, सांभर, चीतल F11(26)Revenue/8/80/ Dated 01.11.1980
2 केवलादेव नेशनल पार्क भरतपुर 28.73 निवासी और प्रवासी पक्षी, चीतल, अजगर, ब्लू बुल, सांभर F3(5)(9)/8/72/Dated 27.08.1981
3 मुकुंदरा हिल्स नेशनल पार्क कोटा, चित्तौड़गढ़ 297.62 बाघ, पैंथर, चिंकारा, भालू, चीतल, लकड़बग्घा, जंगली सूअर F11(56)Van/2011/Part Dated 09.01.2012.
Overlap with Darrah Sanctuary, Jawaharsagar Sanctuary and National Chambal Sanctuary
  कुल क्षेत्र 608.38  
B वन्यजीव अभयारण्य
1 सरिस्का अभयारण्य अलवर 491.99 बाघ F39(2)Forest/55/ Dated 01.11.1955
2 सरिस्का ‘ए’ अभयारण्य अलवर 3.01 सांभर, चीतल, पैंथर P1(24)Van/08/ Dated 20.06.2012
3 दरा अभयारण्य कोटा, झालावाड़ 71.31 पैंथर, भेड़िया, सियार, चीतल, लोमड़ी, सांभर, स्लोथ भालू, साही F39(2)Forest/55/ Dated 01.11.1955
Overlap with Mukundara Hills National Park.
Area based on MHTR notifications
4 जवाहरसागर अभयारण्य कोटा, बूंदी, चित्तौड़गढ़ 156.62 पैंथर, भालू, भेड़िया, घड़ियाल, मगरमच्छ, चीतल, लकड़बग्घा, लोमड़ी, सियार F11(5)13/Revenue/8/73/ Dated 09.10.1975 Overlap with Mukundara Hills National Park
Area based on MHTR notifications
5 जयसमंद अभयारण्य उदयपुर 52.34 निवासी पक्षी, लकड़बग्घा, सियार, चिंकारा F39(2)Forest/55/ Dated 01.11.1955
6 फुलवारी कि नाल अभयारण्य उदयपुर 511.41 पैंथर, लकड़बग्घा, जंगली बिल्ली, सियार, फॉक्स F11(1)/Revenue/8/83/ Dated 06.10.1983
7 सज्जनगढ़ अभयारण्य उदयपुर 5.19 पैंथर, लकड़बग्घा, जंगली बिल्ली, सियार, फॉक्स F11(64)/Revenue/8/86/ Dated 17.02.1987
8 सीतामाता अभयारण्य उदयपुर, चित्तौड़गढ़ 422.94 फ्लाइंग गिलहरी, पैंथर, जंगली बिल्ली, सांभर, लकड़बग्घा, सिवेट F11(9)Revenue/8/78/ Dated 02.01.1979
9 माउंट आबू अभयारण्य सिरोही 326.1 पैंथर, भालू, लकड़बग्घा, भेड़िया, साही P.11(40)Van/97/ Dated 15.04.2008
10 ताल छापर अभयारण्य चूरू। 7.19 ब्लैक बक, निवासी पक्षी F379/Revenue/8/59/ Dated 04.10.1962
11 राष्ट्रीय चम्बल घड़ियाल अभयारण्य कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, करोली, धौलपुर 564.03 घड़ियाल, मगरमच्छ, कछुआ, डॉल्फिन, भालू, चिंकारा, ऊदबिलाव F11(39)Revenue/8/78/ Dated 07.12.1979
Overlap with Mukundara Hills National Park
Area as per DGPS survey
12 नाहरगढ़ अभयारण्य जयपुर 52.4 लकड़बग्घा, सियार, लोमड़ी, खरगोश F11(39)Revenue/8/80 Dated 22.09.1980
13 जमवा रामगढ़ अभयारण्य जयपुर 300 पैंथर, चीतल, जंगली सूअर, लकड़बग्घा, सियार F11(12)Revenue/8/80/ Dated 31.05.1982
14 डेजर्ट नेशनल पार्क अभयारण्य जैसलमेर, बाड़मेर 3162 चिंकारा, डेजर्ट कैट, फॉक्स, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड F3(1)73/Revenue/8/79/ Dated 04.08.1980
15 रामगढ़ विषधारी  अभयारण्य बूंदी 303.05 पैंथर, लकड़बग्घा, स्लोथ भालू, सियार, लोमड़ी, चीतल F11(1)/Revenue/8/79/ Dated 20.05.1982
After de-notification
16 केलादेवी अभयारण्य करोली, सवाई माधोपुर 676.82 पैंथर, चीतल, चिंकारा, सांभर, भालू, लकड़बग्घा, जंगली सूअर, भेड़िया F11(28)/Revenue/8/83/ Dated 19.07.1983
17 शेरगढ़ अभयारण्य बारां। 81.67 पैंथर, चीतल, चिंकारा, जंगली सूअर F11(35)/Revenue/8/83/ Dated 30.07.1983
18 तोडगढ़ रावली अभयारण्य राजसमंद, अजमेर, पाली 495.27 पैंथर, लकड़बग्घा, भेड़िया, हरे कबूतर, जंगल मुर्गी F11(56)/Revenue/8/82/ Dated 28.09.1983
19 कुंभलगढ़ अभयारण्य राजसमंद, उदयपुर, पाली 610.53 पैंथर, स्लोथ भालू, लकड़बग्घा, जंगली सूअर, चार सींग वाले मृग, सांभर F10(26)Revenue/A/71/ Dated 13.07.1971
20 सवाईमानसिंह अभयारण्य सवाई माधोपुर 113.07 बाघ, पैंथर, लकड़बग्घा, लोमड़ी, भालू, चीतल, सांभर F11(28)/Revenue/8/84/ Dated 30.11.1984
21 सवाईमाधोपुर अभयारण्य सवाई माधोपुर 131.3 बाघ, पैंथर, लकड़बग्घा, लोमड़ी, भालू, चीतल, सांभर F/39/(2)For/55 dated 07.11.1955
Overlap with Ranthambhore National Park
22 भेंसरोडगढ़ अभयारण्य चित्तौड़गढ़ 201.4 पैन्थर, चौसिंघा, चिंकारा,लोमड़ी, लकड़बग्घा F11(44)/Revenue/8/81/ Dated 05.02.1983
23 बस्सी अभयारण्य चित्तौड़गढ़ 138.69 चीतल, चिंकारा, पैन्थर, लकड़बग्घा, जंगल कैट F11(41)/Revenue/8/86/ Dated 29.08.1988
24 वन विहार अभयारण्य धौलपुर 25.6 भालू, भेड़िया, चीतल, सांभर, लोमड़ी, जंगल कैट F39(2)Forest/55/ Dated 01.11.1955
25 रामसागर अभयारण्य धौलपुर 34.4 भेड़िया, लकड़बग्घा, लोमड़ी, चीतल F39(2)FOR/55/ Dated 07.11.1955
26 केसरबाग अभयारण्य धौलपुर 14.76 भेड़िया, लकड़बग्घा, लोमड़ी, चितल F39(26)FOR/55/ Dated 07.11.1955
27 बांध बरेठा अभयारण्य भरतपुर 199.24  प्रवासी पक्षी F11(1)/Enviorment/ Dated 07.10.1985
  कुल क्षेत्र 9152.33    
C कॉनजर्वेसन रिजर्व
1 बीसलपुर कंजर्वेशन रिजर्व टोंक 48.31 काला हिरण, लकड़बग्घा, भेड़िया, सियार P.3(19)Van/2006/ Dated 13.10.2008
2 जोड़ बीड गधवाला कंजर्वेशन रिजर्व, बीकानेर बीकानेर 56.47  काला हिरण, जंगल कैट, जंगली सुअर P.3(22)Van/2008/ Dated 25.11.2008
3 सुंधामाता कंजर्वेशन रिजर्व जालोर, सिरोही 117.49  पैन्थर, भालू, भेड़िया, लकड़बग्घा, चिंकारा P.3(22)Van/2008/ Dated 25.11.2008
4 गुढ़ा विश्सियान कंजर्वेशन रिजर्व जोधपुर 2.32  चिंकारा, काला हिरण, जंगली सूअर P.3(2)Van/2011/ Dated 15.12.2011
5 शाकंबरी कंजर्वेशन रिजर्व सीकर, जंजैहली 131  सांभर, पॉर्क्यपाइन, लॉनदी, जंगली बिल्ली, लकड़बग्घा P.3(16)Van/2009/ Dated 09.02.2012
6 गोगेलाव कंजर्वेशन रिजर्व नागौर 3.58  चिंकारा, खरगोश, काला हिरण P.3(17)Van/2011/ Dated 09.03.2012
7 बीर झुंझुनू कंजर्वेशन रिजर्व जंजैहलू 10.47  खरगोश, हेज हॉग, प्रवासी पक्षी P.3(47)Van/2008/ Dated 09.03.2012
8 रोटु कंजर्वेशन रिजर्व नागौर 0.73   P.3(8)Van/2011/ Dated 29.05.2012
9 उम्मेदगंज पक्षी विहार कंजर्वेशन रिजर्व शहर 2.72  प्रवासी पक्षी F3(1) FOREST/ 2012 dated 5.11.2012
10 जवाईबंद तेंदुआ संरक्षण रिजर्व डंडे 19.79  पैन्थर F3(1) FOREST/ 2012 dated 27.02.2013
11 बंसियाल खेतड़ी कंजर्वेशन रिजर्व झुंझुनू 70.18   F3(13) FOREST/ 2016 dated 01.03.2017
12 बंसियाल खेतड़ी बागोर कंजर्वेशन रिजर्व झुंझुनू 39.66   F3(13) FOREST/ 2016 dated 10.04.2018
13 जवाई बंद लीपॉर्ड कंजर्वेशन रिजर्व द्वितीय डंडे 61.98 पैन्थर F3(4) FOREST/ 2012 PT dated 15.06.2018
14 मनसा माता कंजर्वेशन रिजर्व झुंझुनू 102.31   F3(9) FOREST/ 2013 Jaipur dated 18.11.2019
  कुल क्षेत्र 667.01    
D टाइगर रिजर्व
1 रणथंभौर टाइगर रिजर्व सवाईमाधोपुर, करौली, बूंदी, टोंक 1411.29   F3(34)FOREST/2007 dated 28.12.2007 (CTH Notification) and F3(34)FOREST/2007 dated 06.07.2012 (Buffer Notification)
Overlap with Ranthambhore National Park, Sawaimadhopur Sanctuary, Sawaimansingh Sanctuary, Keladevi Sanctuary and National Chambal Sanctuary
2 सरिस्का टाइगर रिजर्व अलवर, जयपुर 1213.34   F3(34)FOREST/2007 dated 28.12.2007 (CTH Notification) and F3(34)FOREST/2007 dated 06.07.2012 (Buffer Notification)
Overlap with Sariska Sanctuary, Sariska A Sanctuary and Jamwaramgarh Sanctuary
3 मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व कोटा, बूंदी, झालावाड़, चित्तौड़गढ़ 759.99   F3(8)FOREST/2012 dated 09.04.2013 (CTH Notification) and F3(8)FOREST/2012 dated 09.04.2013 (Buffer Notification)
Overlap with Mukundara Hills National Park, Darrah Sanctuary, Jawaharsagar Sanctuary and National Chambal Sanctuary
  कुल क्षेत्र 3384.62   राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के साथ ओवरलैप को छोड़कर
  महायोग 13812.4   टाइगर रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के बीच सभी ओवरलैप को छोड़कर

Source: Wildlife (Planning) Wing, Department of Forests and Wildlife, Government of Rajasthan.

Cover Photo Credits: Dr. Dharmendra Khandal

 

कुत्तो का वायरस बाघों के लिए खतरा: कैनाइन मोर्बिली वायरस

कुत्तो का वायरस बाघों के लिए खतरा: कैनाइन मोर्बिली वायरस

कुत्तों से फैला कैनाइन मोर्बिली वायरस या कैनाइन डिस्टेंपर वायरस शेर और बाघ के लिए खतरा बना गया है। यह वायरस कभी भी उनपर कहर बरपा सकता है। अभी तक इसके संक्रमण से जूझ रहे शेर-बाघों को बचाने वाली कोई वैक्सीन तक नहीं है।

अखिल भारतीय बाघ सर्वेक्षण में उपयोग किए गए कैमरा-ट्रैप ने 17 बाघ अभयारण्यों में बाघों की तुलना से ज्यादा आवारा कुत्तों को कैप्चर किया। कुत्तों और पशुधन दोनों की उपस्थिति महत्वपूर्ण संख्या में कम से कम 30 टाइगर रिजर्व में दर्ज की गई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि पहले से ही अवैध शिकार और पर्यावास कि कमी आदि चुनौतियों से जूझ रहे बाघ, शेर और अन्य जंगली मांसाहारी, इन जंगली और परित्यक्त कुत्तों और पशुओं (कैटल), के प्रसार से विभिन्न रोगों का संचरण और संक्रमण जल्द ही इनकी विलुप्त हो रही आबादी को लुप्तप्राय कर सकता है।(Jay Mazumdar, 2020)

यहाँ आप वन्यजीवों में खतरे के रूप में उभरे वायरस के बारे में पढ़ने जा रहे हैं। वर्ष 2018 में गुजरात के 23 शेरों कि मौत का कारण बना कैनाइन डिस्टेम्पर वायरस (सीडीवी) एक संक्रामक वायरस है। मूलतः कुत्तों में फैलने वाले इस वायरस से ग्रसित जानवरों का बचना बेहद मुश्किल होता है। सीडीवी पॅरामीक्सोविरइडे (Paramyxoviridae) परिवार के मोर्बिली वायरस जीनस का सदस्य है। सीडीवी एक एनवेलप्ड़पले ओमॉरफीक आरएनए वायरस है, जिसका बाहरी एन्वेलपहेमगलुटिनीन और फ्यूज़न प्रोटीन का बना होता है। ये प्रोटीन, वायरस को नॉर्मल सेल से जुडने और अंदर प्रवेश कर संक्रमित करने में मदद करते हैं। मोर्बिलीवायरस, मध्यम-से-गंभीर श्वसन, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, इम्युनोसुप्रेशन और न्यूरोलॉजिकल रोगों को भिन्न प्रकार के जीवों जैसे की मनुष्य (खसरा वायरस), मांसाहारी (कैनाइनडिस्टेंपर वायरस), मवेशी (रिन्डरपेस्ट वायरस) डॉल्फ़िन और अन्य लुप्तप्राय वन्यजीव प्रजातियों को संक्रमित करने के कारण जाना जाता है। कुत्तों में इसके संक्रमण से गंभीर, बहु-तंत्रीय रोग हो सकते है जो मुख्य रूप से गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, श्वसन और न्यूरोलॉजिकलसिस्टम को प्रभावित करते हैं। (Appel M. J.1987)

कुत्ते वन्यजीवों के शिकार का उपभोग करते हुए उसे CDV से संक्रमित कर देते हैं और जब वन्यजीव अपने शिकार को खत्म करने के लिये वापस लौटता तो इस घातक बीमारी की चपेट में आ जाता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

अपने नाम के बावजूद, कैनाइन डिस्टेम्पर वायरस को ऑर्डर कार्निवोरा में विभिन्न प्रकार की प्रजातियों को संक्रमित करने के लिए जाना जाता है। यहां तक कि वर्ष 2013 में गैर-मानवीय प्राइमेट भी सीडीवी से संक्रमित हो गए हैं, जिससे संभावित मानव संक्रमण कि भी संभावनाएँ बढ़ गई है। फेलिड्स को सीडीवी के लिए ज्यादातर प्रतिरोधी माना जाता था लेकिन अमेरिकी जूलॉजिकल पार्कों में रहने वाले बंदी बाघों, शेरों, तेंदुओं और जगुआर में घातक संक्रमणों की एक श्रृंखलाने इस धारणा को गलत साबित किया। फिर, 1994 में, तंजानिया के सेरेनगेटी नेशनल पार्क में कुल शेरों की आबादी के लगभग एक तिहाई शेरों का संक्रमण से मौत होना साबित करता था कि बड़ी बिल्लियाँ इससे बची ना थी। उनकी मौतों के साथ ही सेरेनगेटी इकोसिस्टम के भीतर विभिन्न प्रकार के मांसाहारियों में होने वाली मौतों के लिए सीडीवी को जिम्मेदार ठहराया गया था। उसके बाद फिर ऐसे कई मामले सामने आए जिनमे अन्य फेलिड्स की आबादीजैसे कि बॉबकैट, कनाडा लिनक्स, यूरेशियन लिनक्स, गंभीर रूप से लुप्तप्राय इबेरियन लिनक्स, और अमूर बाघ भी शामिल थे। (Terio, KA. 2013)

इसके अलावा भारत में देखें तो, थ्रेटेड टैक्स (Threatened Taxa) में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि राजस्थान के रणथंभौर नेशनल उद्यान (Ranthambhore National Park) के समीप 86% कुत्तों का परीक्षण किये जाने के बाद इनके रक्तप्रवाह में CDV एंटीबॉडीज़ के होने की पुष्टि की गई है। इसका अर्थ है कि ये कुत्ते या तो वर्तमान में CDV से संक्रमित हैं या अपने जीवन में कभी-न-कभी संक्रमित हुए हैं और उन्होंने इस बीमारी पर काबू पा लिया है। इस अध्ययन में यह इंगित किया गया है कि उद्यान में रहने वाले बाघों और तेंदुओं में कुत्तों से इस बीमारी के हस्तांतरण का खतरा बढ़ रहा है। अक्सर ऐसा होता है कि शेर/ बाघ एक बार में पूरे शिकार को नहीं खाते हैं। कुत्ते उस शिकार का उपभोग करते हुए उसे CDV से संक्रमित कर देते हैं। शेर/बाघ अपने शिकार को खत्म करने के लिये वापस लौटता है और इस घातक बीमारी की चपेट में आ जाता है।(Sidhu et al, 2019)
वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशन सोसाइटी, कॉर्नेल और ग्लासगो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक वायरस के लिए नियंत्रण उपायों (जैसे कि एक टीका देना, आदि जो इन जानवरों के लिए सुरक्षित हो) को विकसित करके इसके संकट को दूर करने के लिए तेजी से कार्रवाई करने का आग्रह कर रहे हैं। उन्होंने कैनाइन डिस्टेंपर वायरस का नाम बदलकर कार्निवॉर डिस्टेम्पर वायरस रखने का भी सुझाव दिया है ताकि जानवरों की विस्तृत श्रृंखला को दिखाया जा सके जो वायरस का संचरण करते हैं और बीमारी से पीड़ित हो सकते हैं।

कैनाइन डिस्टेंपर कैसे फैलता है?

कुत्ते में सीडीवी के संक्रमण के तीन मुख्य तरीके हैं – एक संक्रमित जानवर या वस्तु के साथ सीधे संपर्क के माध्यम से, एयरबोर्न एक्सपोज़र के माध्यम से, और प्लसेन्टा के माध्यम से। कैनाइन डिस्टेंपर वायरस शरीर कि लगभग सभी प्रणालियों को प्रभावित करता है। 3-6 महीने की उम्र के पिल्ले विशेष रूप से अतिसंवेदनशील होते हैं। सीडीवी एरोसोल की बूंदों के माध्यम से और संक्रमित शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क के 6 से 22 दिन बाद से फैलता है, जिसमें नाक और नेत्र संबंधी स्राव, मल और मूत्र शामिल हैं। यह इन तरल पदार्थों से दूषित भोजन और पानी से भी फैल सकता है। जब संक्रमित कुत्ते या जंगली जानवर खाँसते, छींकते या भौंकते हैं, तो एयरोसोल की बूंदों को पर्यावरण में छोड़ते हैं जो कि आस-पास के जानवरों और सतहों को संक्रमित करते है। संक्रमण और बीमारी के बीच का समय 14 से 18 दिनों का होता है, हालाँकि संक्रमण के 3 से 6 दिन बाद बुखार आ सकता है।डिस्टेम्पर वायरस पर्यावरण में लंबे समय तक नहीं रहता है और अधिकांश कीटाणुनाशकों द्वारा नष्ट किया जा सकता है। जबकि डिस्टेम्पर-संक्रमित कुत्ते कई महीनों तक वायरस का प्रवाह कर सकते हैं और अपने आसपास के कुत्तों को जोखिम में डालते हैं।

कैनाइन डिस्टेम्पर वाइरस संरचना (Source – veteriankey.com)

 

सीडीवी संक्रमण द्वारा प्रभावित एनाटॉमिक साइट्स (Source – veteriankey.com)

कैनाइन डिस्टेम्पर के लक्षण:

कैनाइन डिस्टेम्पर के प्रारम्भिक लक्षणों के दौरान आँखों से पानी के साथ मवाद जैसा पदार्थ निकलता है। इसके बाद बुखार, भूख ना लगना, और नाक बहने जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं। अन्य लक्षणों में उलटी, दस्त, अत्यधिक लार, खांसी, और सांस लेने में तकलीफ शामिल है। यदि तंत्रिका संबंधी लक्षण विकसित होते हैं, तो असंयम हो सकता है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के संकेतों में मांसपेशियों या मांसपेशियों के समूहों की एक स्थानीय अनैच्छिक ट्विचिंग शामिल है। जबड़ों में ऐंठन, जिसे आमतौर पर “च्यूइंग-गम फिट”, या अधिक उपयुक्त रूप से “डिस्टेंपर मायोक्लोनस” के रूप में वर्णित किया जाता है, भी लक्षण में शामिल है। जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है जानवर प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता, असंयम, चक्कर, दर्द या स्पर्श के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि, और मोटर क्षमताओं के बिगड़ने के लक्षण दिखा सकता है। कुछ मामलों में संक्रमण अंधापन और पक्षाघात का कारण बन सकते हैं।

कैनाइन डिस्टेम्पर के प्रारम्भिक लक्षणों के दौरान आँखों से पानी के साथ मवाद जैसा पदार्थ निकलता है। इसके बाद बुखार, भूख ना लगना, और नाक बहने जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

कैनाइन डिस्टेम्पर का निवारण:

दुर्भाग्य से इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है, लेकिन उपचार के तौर पर लक्षणों को नियंत्रित करना शामिल है। हालांकि कैनाइन डिस्टेंपर का इलाज इस बात पर भी निर्भर है कि जानवर की प्रतिरक्षा प्रणाली कितनी मजबूत है और वायरस का असर कितना है। इसके अलावा यदि इस बीमारी का निदान व इलाज शुरुआती चरणों में शुरू कर दिया जाए तो इसे आसाानी से नियंत्रित किया जा सकता है।
कुत्तों के लिए कैनाइन डिस्टेंपर के खिलाफ कई टीके मौजूद हैं। कीटाणुनाशक, डिटर्जेंट के साथ नियमित सफाई से वातावरण से डिस्टेम्पर वायरस नष्ट हो जाता है। यह कमरे के तापमान (20-25 डिग्री सेल्सियस) पर कुछ घंटों से अधिक समय तक पर्यावरण में नहीं रहता है, लेकिन ठंड से थोड़े ऊपर तापमान पर छायादार वातावरण में कुछ हफ्तों तक जीवित रह सकता है। यह अन्य लेबिल वायरस के साथ, सीरम और ऊतक के मलबे में भी लंबे समय तक बना रह सकता है। कई क्षेत्रों में व्यापक टीकाकरण के बावजूद, यह कुत्तों की एक बड़ी बीमारी है।
आरक्षित वनों से डिस्टेम्पर के रोकथाम के लिए सर्वप्रथम राष्ट्रीय उद्यानों के आसपास के क्षेत्र में मुक्त घुमने वाले और घरेलू कुत्तों का टीकाकरण किया जाना चाहिये। इस बीमारी को पहचानने तथा इसके संबंध में आवश्यक अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है। जहाँ कहीं भी मांसाहारी वन्यजीवों में CDV के लक्षणों का पता चलता है वहाँ संबंधित जानकारियों का एक आधारभूत डेटा तैयार किया जाना चाहिये ताकि भविष्य में ज़रूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल किया जा सकें। नियंत्रण उपायों पर विचार करने के क्रम में स्थानीय CDV अभयारण्यों में घरेलू पशुओं की भूमिका को विशेष महत्तव दिया जाना चाहिये तथा इस संबंध में उपयोगी अध्ययन किये जाने चाहिये।
इस समस्या का सबसे आसान तरीका है- इस रोग की रोकथाम। वन्यजीवों की आबादी में किसी भी बीमारी का प्रबंधन करना बेहद मुश्किल होता है। सरकार को देश में वन्यजीव अभयारण्यों के समीप कुत्तों के टीकाकरण के लिये पहल शुरू करनी चाहिये।

सन्दर्भ :

1. Appel M. J.Canine distemper virus Virus infections of carnivores. Appel M. J. 1987 133 159 Elsevier SciencePublishers B. V. Amsterdam, The Netherlands Google Scholar
2. Terio KA, Craft ME. Canine distemper virus (CDV) in another big cat: should CDV be renamed carnivore distemper virus?. mBio. 2013;4(5):e00702-e713. Published 2013 Sep 17. doi:10.1128/mBio.00702-13American Society for Microbiology
3. Mazumdar J. What camera traps saw during survey: More domestic dogs than tigers in major reserves. Indianexpress.com. Published 2020 Aug 3. https://indianexpress.com/article/cities/delhi/tiger-reserves-domestic-dogs-india-survey-6536467/
4. Sidhu, N., Borah, J., Shah, S., Rajput, N., & Jadav, K. K. (2019). Is canine distemper virus (CDV) a lurking threat to large carnivores? A case study from Ranthambhore landscape in Rajasthan, India. Journal of Threatened Taxa, 11(9), 14220-14223. https://doi.org/10.11609/jott.4569.11.9.14220-14223

 

 

रामगढ विषधारी अभयारण्य–राजस्थान के बाघों का अनौपचारिक आशियाना

रामगढ विषधारी अभयारण्य–राजस्थान के बाघों का अनौपचारिक आशियाना

हमेशा से बाघों के अनुकूल रहा, राजस्थान का एक ऐसा क्षेत्र जो बाघ पर्यावास बनने को तैयार है लेकिन सरकारी अटकलों और तैयारियों  कि कमी के कारण आधिकारिक तौर पर बाघों से वंचित है।

रामगढ़ विषधारी अभयारण्य राज्य के बूंदी जिले में 304 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत एक जलपूर्ण वन क्षेत्र है। राज्य ने इसे 20 मई 1982 को राजस्थान वन्य प्राणी और पक्षी संरक्षण अधिनियम, 1951 की धारा 5 के अंतर्गत अभयारण्य घोषित किया। रामगढ़, रणथंभोर टाइगर रिजर्व के दक्षिण कि ओर एक पहाड़ों से घिरा वन क्षेत्र है जो कि मेज नदी द्वारा दो असमान भागों में विभाजित होता है। मेज नदी इस वन क्षेत्र के कई जलश्रोत को जलपूर्ण कर इस वन क्षेत्र कि जीवन रेखा के रूप में काम करती है। रणथंभोर से जुड़ा होने के कारण यह बफर ज़ोन का भी काम करता है जिसकी वजह से रणथंभोर से निकले हुए बाघ अक्सर यहाँ पहुँच जाते है।

रामगढ़ का इतिहास:

रामगढ़ का इतिहास, वन्यजीवों से लेकर इंसानों के खूनी गाथाओं से भरा हुआ है।अधिकांश राजपूत शासक एक दूसरे के राज्यों में मेहमान के तौर पर शिकार, विशेष रूप से स्वयं के राज्यों में अनुपलब्ध जीवों के शिकार के लिए आमंत्रित करते रहते थे। अक्सर ये शिकार यात्राएँ उनके बीच घनिष्ठ संबंधों, विवाह, दोस्ती और साझा हित से जुड़ी रियासतों, के अस्तित्व को प्रतिबिंबित और प्रबलित करते थे।

बाघों की बड़ी आबादी कि वजह से, बूंदी बाघों के शिकार के लिए एक लोकप्रिय स्थान था। जबकि आम तौर पर बाघों का  शिकार राज्यों द्वारा अपने आपसी संबंधों को मजबूत करने में मददगार साबित होता था, बूंदी के मामले में यह उसके विपरीत साबित हुआ है। ब्रिटिश एजेंट जेम्स टोड के ऐनल्ज़ एण्ड एंटीकुईटीस के अनुसार यहाँ अहेरिया (वसंत के समय का शिकार) का त्यौहार मेवाड़ के महारनाओं के लिए तीन बार घातक साबित हुआ (Hughes, 2013)। 1531 में एक शिकार के दौरान बूंदी के राव सूरजमल और मेवाड़ के महाराणा रतन सिंह के बीच एक झगड़े का उल्लेख है जिसमें दोनों महाराज एक दूसरे को मार डालते हैं। टोड के अनुसार महाराणा रतन सिंह द्वारा चोरी से हाड़ा महाराज सुरजमल कि बहन से विवाह करने के कारण बदले कि भावना में शिकार के दौरान झगड़े में एक दूसरे को मार डालते हैं। ऐसी ही एक घटना 1773 में दोहराई गई जब बूंदी के राव राजा अजीत सिंह ने मेवाड़ के महाराणा अरसी सिंह को शिकार के दौरान ही मार डाला। टोड के अनुसार महाराणा कि मौत मेवाड़ के रईसों द्वारा प्रभावित था जिन्हें महाराज अरसी स्वीकार नहीं थे (Crooke, 2018)।

Ramgarh Hunting Lodge: बूंदी के महाराज रामसिंह द्वारा मेज नदी के किनारे शिकार के महल का निर्माण करवाया गया था।ब्रिटिश एजेंट जेम्सटोड के अनुसार राजा राम को शिकार का जुनून उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला, और यहां तक कि इस ग्यारह वर्ष कि उम्र में उन्हें अपने पहले शिकार करने पर बूंदी के रईसों से नजर और बधाई मिली। (फोटो: प्रवीण कुमार)

महारजाओं के शिकार के साथ ही यहाँ बेहिसाब वन्यजीवों का भी शिकार हुआ है। जेम्स टॉड ने अपने ऐनल्ज़ में ही बताया है कि बूंदी के शासक राव राजा बिशन सिंह (मृत्यु 1821) ने 100 से अधिक शेर और कई बाघ मारे थे। बेशक शिकार के लिए ऐसा जुनून उस एक शेर के जितना ही खतरनाक साबित हो सकता है जिसका शिकार किया जाता था, और ऐसा हुआ भी जब अपने किसी शिकार अभियानों में से एक के दौरानएक शेर द्वारा राजा पर हमला किया गया जिसके परिणामस्वरूप महाराज ने एक अंग को खो दिया और जीवन भर के लिए अपंग होकर रह गए (Crooke, 2018)। इन बेहिसाब शिकारों के कारण 1830 तक यहाँ से शेर विलुप्त हो चुके थे (Singh & Reddy, 2016)I

रुडयार्ड किपलिंग अपने 1890 के दशक के बूंदी दौरे के बारे में बताते हैं कि जब अंग्रेज बूंदी आए तो उन्हे सुख महल में ठहराया गया जहां उन्होंने अपनी पुस्तक “किम” के कुछ अंश पूरा किया। उसी दौरान उन्होंने बूंदी के डिस्पेंसरी का दौरा किया, तो उन्होंने एक रजिस्टर पाया (ऑपरेशन बुक) जिसमें अस्पताल में आने वाले लोगों की बीमारियों को अंग्रेजी में सूचीबद्ध किया गया था। उनमें से एक सप्ताह में अक्सर तीन-चार मामले, शेर के काटने के होते थे, जिसे सूची में “लायन बाइट” के तौर पर सूचित किया गया था। जुलोजिकल सटीकता देखने पर उन्होंने इसमें बाघ के काटने की संभावना पाई (Kipling,1899)।

1899-90 में राज्य के बहुत से वन्यजीव, विशेष रूप से चीतल और सांभर जैसी प्रजातियां, एक गंभीर सूखे के कारण मारे गए। हालांकि, आने वाले वर्षों में शिकार पर रोक लगने के बाद, वन्यजीवों की आबादी वापस आ गई। 1960 के दशक में भी, बूंदी में 50 साल पहले जंगलों में पाई जाने वाली सभी प्रजातियों का उचित प्रतिनिधित्व था। लेकिन, 1920 से बूंदी ने बाघों के शिकार के आगंतुकों का स्वागत करना शुरू किया जिससे राज्य ने शिकार का उच्च स्तर अनुभव किया। इस समय तक तत्कालीन शासक, महराओ राजा रघुबीर सिंह, पहले ही लगभग 100 बाघों को मार चुके थे। इस छोटे से राज्य में हर साल औसतन सात बाघ मारे जाते थे। हालांकि पूर्व नियमों के अनुसार बाघिनों के शिकार को हतोत्साहित किया गया था, लेकिन कुछ निजी रिकॉर्डों को देखते हुए, ऐसा प्रतीत होता है कि या तो नियम 1930 के दशक से बदल गए थे या उनका पालन नहीं हो रहा था। हालांकि, शिकार और पर्यावास में परिवर्तन के बावजूद यहाँ 1941 में 75 बाघ थे (Playne, et al.,1922)I

1945 में बाघ शिकार के नियमों में ढील दी गई और कई लोग शिकार के शाही खेल में भाग लेने के लिए शामिल होने लगे। 1950 के दशक में, एक बाघिन ने फूल सागर के आसपास के जंगल में दो शावकों को जन्म दिया। उसी अवधि के आसपास फूल सागर पैलेस में आमंत्रित लोगों के साथ क्रिसमस की शिकार पार्टियां लोकप्रिय हो गईं और 1950 के दशक के अंत से बाघों का अवैध शिकार भी शुरू हुआ। 1952 में, लॉर्ड माउंटबेटन ने बूंदी में दो बाघों का शिकार किया; एक फूल सागर में और दूसरा रामगढ़ में। 1955 और 1965 के बीच, महाराव राजा बहादुर सिंह ने अकेले बूंदी के जंगलों में 27 बाघों का शिकार किया। यहाँ के जंगलों में 1957 से 1967 के बीच नौ बाघों का शिकार अवैध शिकारियों द्वारा किया गया। 1960 के दशक तक बाघ काफी सीमित क्षेत्रों तक ही पाए जाते थे। हालांकि, ये बाघ और बाघ-शिकारियों के लिए बदलते समय थे क्यूँकि वन विभाग ने बाघों के शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया था (Singh & Reddy, 2016)I

1982 में अभयारण्य घोषित होने के साथ इस क्षेत्र कि सुरक्षा और बढ़ी। इस क्षेत्र के बाघों में विशेष रुचि रखने वाले वन रक्षक लड्डू राम के अनुसार, 1983 में रामगढ़ और शिकार्बुरज ब्लॉक के बीच तीन बाघ थे, और 1986 में छह। 1990 में, उनका मानना है कि पूरे इलाके में 11 बाघ थे, जो बिजोलिया, बांद्रा पोल, मांडू और झारपीर में फैले थे- ये सभी रामगढ़ रेंज में हैं (Singh & Reddy, 2016)I

1985 में, लोहारपुरा घाटी में एक बाघ को अवैध रूप से मार दिया गया था। इसके बाद 1991 को एक और ऐसी घटना हुई जब पिपलिया मणिकचौथ में गोरधन की पहाड़ी पर एक और बाघ की मौत हो गई। तत्कालीन उप वन संरक्षक के एल सैनी और रेंज ऑफिसर पूरण मल जाट द्वारा, 23 – 24 जनवरी को शिकारी रंगलाल मीणा को बाघ के शिकार के संदेह में गिरफ्तार किया गया। हालांकि रंगलाल मीणा मोतीपुरा गाँव का एक माना हुआ शिकारी था, लेकिन उक्त शिकार में वह शामिल ना था। उस रेंज के तत्कालीन गार्ड भूरा मीणा कि रंगलाल से आपसी मतभेद के कारण अत्यधिक प्रतारणा के कारण मौत हो गई। हिरासत में मौत होने के कारण इस क्षेत्र में एक उग्र आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन का नेतृत्व किया वहाँ के विधायक राम नारायण मीणा ने। आंदोलन में लोगों ने रेंज ऑफिस जला दिया, गार्ड्स को बाहर निकाल दिया, और लगभग डेढ़ साल तक फॉरेस्ट गार्ड्स को अभयारण्य में प्रवेश न करने दिया। अभयारण्य अधिकारियों द्वारा पर्यवेक्षण और सक्रिय प्रबंधन के अभाव में वन्यजीवों की सुरक्षा बुरी तरह से विफल रही।

अभयारण्य कि सुरक्षा में वर्ष 2000 में सहायक वन संरक्षक मुकेश सैनी के नेतृत्व में बढ़ी। प्रारम्भिक अड़चनों के बाद उन्होंने अपनी सूज-बूझ से विधायक राम नारायण मीणा का समर्थन हासिल किया और अभयारण्य में  कोयला बनाने पर रोक लगवाई। इनके बाद उप वन संरक्षक श्रुति शर्मा ने अभयारण्य में कैम्प करके स्वयं कि निगरानी में कई विकास कार्य करवाए।

रामगढ़ के वन:

यहाँ के जंगलों को चैंपियन और सेठ वन वर्गीकरण 1968 के अनुसार उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन श्रेणी में वर्गीकृत किया जा सकता है। जलवायु स्थिति से परे, एडैफिक और बायोटिक कारक मुख्य रूप से इन वनों की संरचना, वितरण और गुणवत्ता का निर्धारण करते हैं। यहाँ के वन खंडों को पूर्णतया धोक (Anogeissus pendula) के वन, धोक के मिश्रित वन, धोक कि झाड़ियाँ, खैर (Acacia catechu) के वन, उष्णकटिबंधीय शुष्क मिश्रित वन, उष्णकटिबंधीय नम मिश्रित वन,घास के मैदान, आदि के रूप में पहचाना जा सकता है (Nawar, 2015)I

धोक के वन में लगभग 80%, Anogeissus pendula पाया जाता है जो कि यहाँ के पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक है, Grewia flavescens यहाँ धोक का एक सामान्य सहयोगी है। धोक के मिश्रित वनों में धोक, अन्य पर्णपाती प्रजातियों, जैसे कडाया (Sterculia urens), सालर (Boswellia serrata), पलाश (Butea monosperma), खैर (Acacia catechu), आदि के साथ पाया जाता है। धोक इन वनों कि भी प्रमुख प्रजाति है, सालर और कडाया ढलानों पर मौजूद हैं, जबकि पलाश घाटी क्षेत्रों में आता है। इन जंगलों में Grewia flavescens, Capparis decidua, Cassia tora, Calotropis procera आदि जैसी झाड़ी प्रजातियां भी शामिल है।

यहाँ शुष्क मिश्रित वनों के कुछ पैच भी मौजूद है जिसमें चुरेल (Holoptelea integrifolia), गुर्जन (Lannea coromandelica), पलाश, कड़ाया, धोक के साथ शामिल हैं। बबूल (Acacia nilotica) अवस्था परिवर्तन कालिक क्षेत्रों में और असमान सतहों पर पाया जाता है। नम मिश्रित वनों में Syzygium cumini, Ficus racemosa, Diospyros melanoxylon, Phoenix sylvestris,Flacourtia indica, Mallotus philippensis, Terminalia bellirica and Mangifera indica आदि पाए जाते हैं।  इस तरह के जंगल पानी की धाराओं, झीलों और जलाशयों के आसपास के घाटी क्षेत्रों में आम हैं। जलीय वनस्पतियों में नेलुम्बो न्यूसीफेरा, निमफेया नौचली, अजोला पिनाटा, ट्रापा नटंस, इपोमिया एक्वाटिक, यूट्रीकुलरिया औरिया आदि शामिल हैं।

रामगढ़ के वन्यजीव:

रामगढ़ विषधारी वन्यजीव अभयारण्य रणथंभौर टाइगर रिजर्व के लिए सॅटॅलाइट क्षेत्र के रूप में विस्तारित होने की क्षमता रखता है। यह अभयारण्य रणथंभौर टाइगर रिजर्व से निकले हुए बाघों का पसंदीदा क्षेत्र है। बाघ के अलावा यहाँ मांसाहारी जीवों में बघेरा, भेड़िया, लकड़बग्धा, सियार, लोमड़ी, सियागोश, रस्टी स्पॉटेड कैट, और जंगल कैट आदि पाए जाते हैं।

मानसून के दौरान, अभ्यारण्य में पानी व्यापक होता है जिसके कारण वन्यजीव असुविधाजनक आर्द्रभूमि से बचने हेतु ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पलायन करते हैं। अक्टूबर और नवंबर के बाद वे नीचे घाटियों की ओर बढ़ना शुरू करते हैं और बाद में नदियों और नालों वाले क्षेत्रों में। मई और जून के शुष्क और गर्म महीनों के दौरान लगभग सभी जानवर सीमित वाटर हॉलस के पास ही पाए जाते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

शाकाहारी जीवों में हनुमान लंगूर, चीतल, सांभर, चिंकारा, नीलगाय, और खरगोश अच्छी संख्या में हैं और सभी मौसमों में आसानी से देखे जा सकते हैं। सर्वाहारी स्थानपाई जीवों में यहाँ भालू, जंगली सूअर, और इंडियन सॅमाल सिविट पाए जाते हैं। यहाँ नेवले की दो प्रजातियाँ इंडियन ग्रे मोंगूस एवं रडी मोंगूस, चींटीखोर, और साही भी पाए जाते हैं।

वन्यजीव गणना के दौरान रामगढ़ महल के पास जलश्रोतों पर भालू, बघेरा हनुमान लंगूर इत्यादि आसानी से एवं अच्छी संख्या में देखने को मील जाते हैं (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

अभयारण्य में स्थितः रामगढ़ गाँव कई प्रजातियों के सांपों के लिए जाना जाता है, संभवतः इसी कारण इसको विषधारी अभयारण्य कहा जाता है। है। यहाँ पक्षियों किभी काफी विविधता मौजूद हैं जिनमें कई प्रकार के शिकारी पक्षी जैसे भारतीय गिद्ध, बोनेलीज़ ईगल,आदि, विभिन्न प्रजातियों के पैराकीट, ओरिएण्टल व्हाइट आई, गोल्डन ओरिओल, पर्पल सनबर्ड, हरियल, पपीहा, नवरंग, कोयल, येलो थ्रोटेड स्पैरो, सरकीर मालकोहा, बुलबुल, फ्लाई कैचर्स इत्यादि शामिल हैं।

1899-90 में राज्य के बहुत से वन्यजीव, विशेष रूप से चीतल और सांभर जैसी प्रजातियां, एक गंभीर सूखे के कारण मारे गए। हालांकि, आने वाले वर्षों में शिकार पर रोक लगने के बाद, वन्यजीवों की आबादी वापस आ गई। 1960 के दशक में भी, बूंदी में 50 साल पहले जंगलों में पाई जाने वाली सभी प्रजातियों का उचित प्रतिनिधित्व था। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

रामगढ़, रणथंभोर और बाघ:

रामगढ़-विषधारी और रणथंभौर के बीच मौजूदा वन कनेक्टिविटी, हालांकि कमजोर है, लेकिन फिर भी बाघों को इस पारंपरिक मार्ग से पलायन करने में काफी हद तक सहायक है। यह मार्ग बूंदी के उत्तरी हिस्सों में तलवास और अंतर्दा के जंगलों से गुजरता है। 2007 के आसपास, एक युवा क्षणस्थायी बाघ, युवराज, द्वारा रणथंभौर से बूंदी की दिशा में जाने का प्रयास किया गया लेकिन अपने गंतव्य तक पहुँचने से पहले ही सखावडा के पास बच्चू, मूल्या और सक्रमा नाम के तीन शिकारी भाइयों द्वारा उसका शिकार कर दिया गया। अगस्त 2013 में, एक और युवा क्षणस्थायी बाघ, T-62 कि मौजूदगी को तलवास के पास कैमरा ट्रैप द्वारा स्थापित किया गया था। अटकलें यह है कि बाघ रामगढ़-विषधारी वन्यजीव अभयारण्य में पशुधन शिकार पर 2015 की शुरुआत तक रहा और फिर रणथंभौर की दिशा में वापस यात्रा किया।

2017 में भी  एक बाघ, T-91 रणथम्भोर से निकल कर रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में पहुँच गया जिसको लगभग पाँच महीने कि निगरानी के बाद 3 अप्रैल 2018 को मुकंदरा टाइगर रिज़र्व में शिफ्ट किया गया। इसके बाद भी यहाँ 2 बाघों की उपस्थिति दर्ज हुई जिनमें से एक युवा नर T-115 चम्बल के किनारे व दूसरा बाघ T-110 जो कि पहले भी यहाँ अपना इलाका बना चुका है।

बाघ, T-91 रणथम्भोर से निकलकर रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में पहुँच गया जिसको लगभग पाँच महीने कि निगरानी के बाद 3 अप्रैल 2018 को मुकंदरा टाइगर रिज़र्व में शिफ्ट किया गया। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

बाघों द्वारा इस पारंपरिक मार्ग के उपयोग को देखते हुए, जब रणथंभोर में बाघों कि आबादी बड़ी तो बाघ विशेषज्ञ वाल्मीक थापर और वर्तमान प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन सेना प्रमुख) डॉ जी.वी रेड्डी ने रामगढ़ विषधारी अभयारण्य को रणथंभोर के तीसरे डिवीजन के रूप में विकसित करने कि परियोजना पर विचार किया। जिसका प्रस्ताव वाई के साहू के निर्देशन में धर्मेन्द्र खांडल ने तैयार किया।

रणथंभोर के बफर एरिया को, जो कि इन्दरगढ़ के वनों से लेकर रामगढ़ अभ्यारण्य तक को पहले टाइगर रिजर्व के खंड के रूप विकसित करने पर बल दिया गया। प्रस्तावित किया गया कि पूर्ण रूप से विकसित होने के पश्चात रामगढ़ को स्वतंत्र टाइगर रिजर्व घोषित किया जाए। इस प्रस्ताव के पीछे का तर्क था कि रणथंभोर के हिस्सा होने पर विभाग द्वारा संचालित रणथंभौर बाघ संरक्षण फाउंडेशन (RTCF) कि धनराशि को रामगढ़ के विकास के लिए उपयोग किया जा सकेगा।

रामगढ़ का रणथंभोर के तीसरे खंड के रूप में विकसित होने से, डॉ धर्मेन्द्र खांडल के अनुसार, सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बाघों के स्थानांतरण में आने वाली वैधानिक अड़चनें समाप्त हो जाएंगी। आमतौर पर बाघों को एक रिजर्व से दूसरे तक पहुंचाने में कई वैधानिक समस्याएं आती हैं जैसे कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा स्वीकृति लेना आदि। रणथंभोर का हिस्सा होने से बाघों को आसानी से बिना किसी विलंब के बाघों कि बढ़ती आबादी को रामगढ़ स्थानांतरित किया जा सकेगा।

आज रामगढ़ पुन: अपने गौरवशाली अतीत की ओर अग्रसर हो रहा है। NTCA द्वारा यहाँ रणथम्भौर से 2 बाघों को पुनर्वासित करने की मंजूरी पहले ही दी जा चुकी है। शिफ्टिंग के प्रथम चरण में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए यहाँ सुरक्षा की दृष्टी से वन्यजीव विभाग ने अतिरिक्त वनकर्मियों को तैनात करने के साथ ही जिन विचरण मार्गो से पूर्व में ‘युवराज’ नाम का बाघ, T-62, T-91 रणथम्भौर से निकलकर रामगढ़ तक पहुंचे थे, को भी दुरुस्त करने का कार्य किया गया है।वन्यजीव संरक्षण में वर्षों से प्रयासरत बूंदी जिले के विट्ठल सनाढ्य,  पृथ्वी सिंह राजावत, ओम प्रकाश “कुकी” आदि जैसे वरिष्ठ संरक्षणवादी, एन.टी.सी.ए. की मन्जूरी के बाद आशा में हैं कि फिर से रामगढ़ में बाघों की दहाड़ गुंजायमान होगी।

 

सन्दर्भ:
  1. Hughes, J. (2013). Animal Kingdoms: Hunting, the Environment, and Power in the Indian Princely States. Permanent Black, Ranikhet.
  2. Crooke, William. (Ed.). (2018). Annals and Antiquities of Rajasthan, v. 3 of 3 by James Tod. eBook, Public domain in the USA. http://www.gutenberg.org/ebooks/57376
  3. Singh, P., Reddy, G.V. (2016). Lost Tigers Plundered Forests: A report tracing the decline of the tiger across the state of Rajasthan (1900 to present), WWF-India, New Delhi.
  4. Rudyard Kipling. (1899).“The Comedy of Errors and the Exploitation of Boondi,” in From Sea to Sea; Letters of Travel, vol. 1 (New York: Doubleday & McClure Company), 151.
  5. Playne, S., Solomon, R.V., Bond, J.V. and Wright, A. (1922). Indian States: A Biographical, Historical and Administrative Survey. Asian Educational Services, New Delhi.
  6. Nawar, K. (2015). Floristic and Ethnobotanical Studies ofRamgarh Vishdhari Wild Life Sanctuary ofBundi (Rajasthan). A THESISSubmitted for The Award of Ph.D. Degreein The Faculty of Science ofUNIVERSITY OF KOTA, KOTA., pg. 64.

 

 

 

पैंगोलिन: अत्यंत दुर्लभ जीव की बढ़ती समस्याएं

पैंगोलिन: अत्यंत दुर्लभ जीव की बढ़ती समस्याएं

एक नजर में दिखने पर किसी को अचम्भित कर देने वाला शर्मीले स्वभाव का वन्यजीव पैंगोलिन राजस्थान में बहुत ही कम तथा सीमित स्थानों पर पाया जाता है, इसकी दुर्लभता के कारण कभी किसी ने सोचा भी न होगा कि पैंगोलिन कि तस्करी राजस्थान से भी हो सकती है।

जून 2020 में मध्य प्रदेश वन विभाग कि स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने एक बड़ी सफलता के साथ वीडियो शेयरिंग साइट यूट्यूब (YouTube) पर पैंगोलिन शल्क बेचने वाले तस्करों के एक गिरोह का भंडाफोड़ किया है। पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया है जिनकी पहचान शेर सिंह धाकड़ और राजस्थान के निवासी वकिल उर्फ पप्पू के रूप में हुई है। एसटीएफ के अधिकारी रितेश सरोठिया के अनुसार, एसटीएफ विंग ने शिवपुरी जिले के निवासी शेर सिंह धाकड़ के कब्जे से 2.7 किलोग्राम पैंगोलिन शल्क जब्त किया है। वैश्विक ग्राहकों को आमंत्रित करने के लिए उसने यू-ट्यूब पर अपना मोबाइल नंबर दिखाया था, एसटीएफ ने इसको पकड़ने के लिए एक ग्राहक भेजा और मौके पर गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, 10वीं कक्षा का टॉपर धाकड़, पप्पू से शल्क खरीदता था।

वीडियो शेयरिंग साइट यूट्यूब (YouTube) पर पैंगोलिन शल्क बेचने वाला शेर सिंह “शेरु” जब्त शल्कों के साथ (फ़ोटो: रितेश सरोठिया)

अवैध नेटवर्क के भंडाफोड़ के बाद एसटीएफ की यह 12 राज्यों से 165वीं गिरफ्तारी है। इससे पूर्व रणथंभोर स्थित टाइगर वॉच संस्था द्वारा दी गई एक महत्वपूर्ण सूचना के अंतर्गत कार्यवाही करते हुए एसटीएफ द्वारा 27-28 किलो पैंगोलिन शल्क जब्त किया गया तथा एक तस्कर दम्पत्ति (मुन्नी और हरी सिंह) कि गिरफ़्तारी भी कि गई। कार्यवाही के दौरान पाया गया कि भिंड / मोरेना स्थित मोगया सहित अन्य शिकारी जाति के लोग इनकी तस्करी में मदद करते थे और बाघ, बघेरा और अन्य वन्यजीवों कि भी तस्करी में शामिल थे। विश्व में सबसे ज्यादा पैंगोलिन कि तस्करी की जाती है और हर दिन लगभग तस्कर और शिकारी पैंगोलिन शल्क के साथ पकड़े जाते हैं। इसका अन्धाधुन्ध शिकार, बड़े पैमाने पर तस्करी, तेजी से बढ़ता शहरीकरण व इनके घटते प्राकृतिक आवासों से इनकी संख्या में भारी गिरावट आयी है।

पैंगोलिन एक गैर आक्रामक खूबसूरत लेकिन शर्मीला स्तनधारी जीव है। दूर से देखने पर यह छोटा डायनासोर जैसा प्रतीत होता है। गहर-भूरे, पीले-भूरे अथवा रेतीले रंग के इस शुण्डाकार निशाचर जीव को फोलिडोटा (Pholidota) ऑर्डर में रखा गया है। पैंगोलिन का छोटा शरीर एक चीड़ शंकु (pine cone) के समान होता है जिसकी लम्बाई लगभग दो मीटर तथा वजन लगभग पैंतीस किलो तक का होता है। इसके शरीर पर केराटिन के बने शल्क नुमा (scaly) संरचना होती है जो कि इस मासूम जीव का एकमात्र रक्षा तंत्र है। पैंगोलिन ऐसे शल्कों वाला अकेला ज्ञात स्तनधारी है। हालांकि वर्मी (Armadillo) भी कवच युक्त होते हैं लेकिन उनका कवच चमड़े का बना होता है। खतरा महसूस होने पर ये चेहरे को पूंछ में छुपा कर खुद को लपेटकर अच्छी तरह से संरक्षित एक गेंद का रूप ले लेते हैं। नुकीले शल्क इन्हें शिकारियों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। इनकी पूंछ नुकीले काँटों के रूप में विकसित होती है जिन्हें ये हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

पैंगोलिन नाम मलय शब्द पेंगुलिंग से आया है, जिसका अर्थ है “जो लिपटकर गोल हो जाता है” भारत में इसे चींटीखोर, वज्रशल्क या सल्लू साँप भी कहते हैं। इस जिज्ञासु कीटभक्षी की विश्व भर में आठ प्रजातियां हैं जो अफ्रीकी और एशियाई महाद्वीप पर पाए जाते हैं। इन आठों ज्ञात प्रजातियों को मनीडे (Manidae) परिवार में रखा गया है। इस परिवार में इनको तीन जातियों में बांटा गया है, मानिस (Manis), फेटाजीनस (Phataginus) और स्मटसिया (Smutsia)। एशिया में पाई जाने वाली चारों प्रजातियां मनीस में शामिल हैं, जबकि अफ्रीका में रहने वाली चार प्रजातियां फेटाजीनस और स्मट्सिया में शामिल हैं।

 

भारतीय पैंगोलिन एक निशाचर प्राणी है जो दिन के समय अपनी माँद में आराम करते हैं और रात में भोजन कि तलाश में बाहर आते हैं। दिन में नींद व आराम में खलल न हो इस हेतु यह बिल के मुहाने को मिट्टी से हल्का सा बन्द कर देता है। ये लगभग 11 फुट गहरी सुरंग खोदकर अपने रहने के लिए 4 प्रकार के माँद का निर्माण करते हैं। पैंगोलिन मुख्यतः कीटभक्षी होते हैं, उनके आहार में अधिकांश चींटियों और दीमक की विभिन्न प्रजातियां शामिल हैं। इनके अलावा ये अन्य कीड़ों, विशेष रूप से लार्वा का भी उपभोग करते हैं। इन्हे आहार में ज्यादा बदलाव पसंद नहीं है, कीटों कि कई प्रजातियाँ उपलब्ध होने के बावजूद भी केवल एक या दो प्रजातियों का ही उपभोग करते हैं। एक पैंगोलिन प्रति दिन 140 से 200 ग्राम कीटों का उपभोग कर सकता है। (Mahmood et al., 2014)

पैंगोलिन की दृष्टि असामान्य रूप से कमजोर होती है जिसकी कमी अत्यधिक विकसित गंध लेने और सुनने की क्षमता से पूरी करते हैं। पैंगोलिन में दांतों कि भी कमी होती है इसलिए इनमें चींटियों और दीमक को खाने के लिए अन्य भौतिक विशेषताएँ विकसित हुई है। जैसे कि मजबूत कंकाल संरचना, मजबूत नुकीले नाखूनों से लैस पंजे। वे अपने शक्तिशाली पंजों का उपयोग दीमक के टीले खोदने और फाड़ने तथा शिकार को पेड़, जमीन और वनस्पति के बीच खोजने के लिए करते हैं। उनकी जीभ और पेट कि संरचना कीटों को पचाने में सहायता करती है। उनकी चिपचिपी लार चींटियों और दीमकों को जीभ से चिपकाने में सहायक होती है। दांतों कि कमी के कारण वे शिकार खोजते (foraging) समय छोटे पत्थरों को निगलते हैं जो उनके पेट में जमा होकर चींटियों को पीसने में मदद करता है। (Mohapatra et al., 2014)

खतरा महसूस होने पर पैंगोलिन एक स्कंक के स्प्रे के समान गुदा के पास ग्रंथियों से एक विषाक्त-महक वाले रसायन का उत्सर्जन कर सकता है। पैंगोलिन की जीभ विशालकाय चींटीखोर कि तरह बहुत लंबी होती है। बड़े पैंगोलिन 1.5 फुट तक अपनी जीभ का विस्तार कीट सुरंगों के अंदर जांच करने और अपने शिकार को प्राप्त करने के लिए उपयोग करते हैं।

 

पैंगोलिन अपने जीवन का अधिकांश भाग एकांत में व्यतीत करते हैं और वर्ष में केवल एक बार प्रजनन करने के लिए गर्मियों या सर्दियों में मिलते हैं। नर अपने क्षेत्र को मूत्र या मल से चिह्नित करते हैं जिससे कि मादाएँ उनको खोज सके। मादाओं के लिए प्रतिस्पर्धा होने पर नर अपने पूंछ का उपयोग आपसी युद्ध के लिए करते हैं। गर्भधारण की अवधि 65 से 70 दिनों कि होती है। इस दौरान नर व मादा पैंगोलिन जोड़े में रहते हैं। मादा साल में एक ही शिशु (पैंगोपप्स) को जन्म देती है। जन्म के समय वजन 80 से 450 ग्राम और औसत लंबाई 150 मिमी (6 इंच) होता है। जन्म के समय शल्क नरम और सफेद होते हैं जो कि कई दिनों के बाद एक वयस्क पैंगोलिन के समान कठोर और काले हो जाते हैं। थोड़े बड़े होने पर पैंगोपप्स को मादाएँ अपनी पूँछ पर बिठाकर जंगल में विहार कराने के दौरान सुरक्षा तथा भोजन खोजने व खाने का हुनर भी सिखाती है। कुछ महीनों बाद शिशु अपनी माँ से अलग हो जाता है। पैंगोलिन पेड़ों पर चढ़ने व पानी में तैरने में दक्ष होते हैं।

भारतीय पैंगोलिन कि उपस्थिति को विभिन्न प्रकार के वनों से दर्ज किया गया है, जिसमें श्रीलंकाई वर्षावन और मैदानी क्षेत्र से लेकर मध्य पहाड़ी स्तर शामिल हैं। यह घास के मैदानों और माध्यमिक जंगलों में भी पाया जा सकता है, तथा रेगिस्तानी क्षेत्रों के लिए अच्छी तरह से अनुकूलित है लेकिन बंजर और पहाड़ी क्षेत्र इसके पसंदीदा आवासों में शामिल है। कभी – कभी यह पैंगोलिन उच्चतम ऊंचाई वाले स्थान जैसे कि श्रीलंका के 1100 मीटर कि ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों और भारत में 2300 मीटर कि ऊंचाई वाले नीलगिरि पहाड़ों पर भी देखा गया है। यह नरम और अर्ध-रेतीली मिट्टी पसंद करता है, जो कि इनके बिल खोदने के लिए उपयुक्त होते है। (Mohapatra et al., 2015)

वैसे तो पैंगोलिन अपने पर्यावास में व्यापक रूप से वितरित हैं लेकिन कहीं भी आसानी से नहीं दिखते। वर्ष 2019 में राजस्थान के कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में 25 सालों बाद पहली बार नजर आया। कुम्भलगढ़ के अलावा जयपुर, सवाई माधोपुर, बारां, और कोटा में भी इसकी उपस्थिति दर्ज कि गई है।(मानचित्र: समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों पर आधारित)

पैंगोलिन अपने प्राकृतिक आवासों में दीमक और चींटियों की आबादी को नियंत्रित कर प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। लेकिन ग्रामीण व आदिवासी लोग अपनी बेवकूफी व नासमझी के कारण निहायती भोले इन जीवों का बर्बरता पूर्वक शिकार करते हैं। साथ ही हाल के कुछ वर्षों में, लोगों द्वारा पेड़ों कि कटाई से वन क्षेत्र में व्यापक कमी आई है जिसने कई प्रकार के पर्यायवासों को नष्ट कर दिया है। नए और सुगम यातायात सुविधाओं और अच्छे पैसे मिलने के कारण शिकारियों ने स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय खपत के लिए कई दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियों की तलाश और तस्करी तेजी से बढ़ा दी है। (Dr Jeff Salz, 2020)

चींटियों की बांबी के पास रहने वाले इस जानवर की तलाश में शिकारियों को मुश्किल नहीं होती। इसके अलावा इसे मारने के लिए उन्हें खास हथियार भी नहीं ले जाने पड़ते हैं। छूने या खतरे का आभास होने पर पेंगोलिन खुद को शल्कों (खोल) में समेटकर फुटबाल की तरह गोल हो जाता है। इसके बाद वह देख ही नहीं पाता कि उस पर हमला किया जा रहा है। शिकारी आसानी से उसे पीट-पीटकर मार डालते हैं।

इसका मांस लजीज होने से चीन व वियतनाम जैसे कई देशों के होटल व रेस्टोरेंट में खाने की लिए बेधड़क परोसा जाता है। वैश्विक स्तर पर इनके मांस, चमड़ी, शल्क, हड्डियां व अन्य शारीरिक अंगों की अधिक मांग होने से इनका बड़े पैमाने पर शिकार करवाया जाता है तथा राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इनकी भारी मात्रा में तस्करी की जाती है। दूसरी ओर चीन व थाईलैंड जैसे कई देशों में इसके शल्कों का उपयोग यौनवर्धक औषधि व नपुसंकता दूर करने के लिये भी किया जाता है। जबकि आज तक इसका कोई वैज्ञानिक सबूत उपलब्ध नहीं है। पैंगोलिन से बने काढ़े और संक्रमित तरल पदार्थ से इलाज करवाने हेतु पिछले वर्ष तक चीनी सरकार द्वारा नागरिकों को स्वास्थ्य बीमा के रूप में मदद भी दी जाती थी।

यूएस पार्टी सर्किट में शल्क का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। हाल ही में इंटरपोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, पैंगोलिन के 26 प्रतिशत शल्कों को अमेरिका में भेजा जाता है। शल्क का उपयोग क्रिस्टल, मेथामफेटामाइन (methamphetamine ) के निर्माण के लिए किया जाता है, जो पार्टी ड्रग क्रिस्टल मेथ या क्रैंक (crystal meth or crank) का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। जानकारी के मुताबिक शल्कों को निकालने की लिये निर्दयतापूर्वक इन्हें जिन्दा ही खौलते गर्म पानी में डाल दिया जाता है। शल्कों का व्यापार गैर कानूनी होने के बावजूद भारत में आज भी इनकी बिक्री बेखौफ होकर धड़ल्ले से होती है।

हालांकि पर्यावरण एवं वन विभाग इन वन्य जीवों की ताजा स्थिति बताने में गुरेज करते हैं। लेकिन फिर भी कुछ राज्यों के विभाग इनके संरक्षण के लिए उतक्रिस्ट कार्य कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के अलावा उत्तराखंड वन विभाग ने भी विशेष कार्य बल संगठित किया है जो पंगोलीन को रेडियो टैग करने का कार्य कर रहा है। रेडियो टैग का कार्य अभी शुरुवाती दौर में है और फिलहाल मध्य प्रदेश वन विभाग ने अभी तक दो और उत्तराखंड वन विभाग ने एक पैंगोलिन को टैग किया है। (TOI, 2020)

अन्तरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के नवीनतम अपडेट (2019) के अनुसार पैंगोलिन का भविष्य, आबादी में तेजी से कमी आने के कारण निराशाजनक दिखाई देता है। IUCN के अनुसार विश्व कि आठ प्रजातियों में से तीन प्रजातियाँ (चीनी, सुंडा, और फिलीपीन पैंगोलिन) गंभीर रूप से विलुप्तप्राय हैं, तीन विलुप्तप्राय (भारतीय, सफेद पेट वाले और विशाल पैंगोलिन) और बाकी के दो असुरक्षित है।

पहले से ही दुर्लभ और संकटग्रस्त इस जीव कि समस्याएं और बधाई है चीनी शोधकर्ताओं के नए शोध ने। साउथ चाइना एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का दावा है कि पैंगोलिन, चमगादड़ों और मनुष्यों के बीच कोरोना वायरस का एक मध्यवर्ती मेजबान हो सकता है। इसका अंदाजा पैंगोलिन में पहचाने गए वायरस से लगाया गया जो कि 99% कोरोना वायरस के समान था। हालांकि पैंगोलिन को कोरोना वायरस के कई स्ट्रैनस की मेजबानी के लिए जाना जाता है लेकिन इस प्रेस विज्ञप्ति के पीछे का शोध अभी तक वैज्ञानिक साहित्य में प्रकाशित नहीं हुआ है जिससे इन दावों का मूल्यांकन करना मुश्किल हो जाता है।

वैज्ञानिकों द्वारा वायरस को स्थानांतरित करने का संदेह मात्र पैंगोलिन पर ही नहीं रहा। कोविड-19 के शुरुआती दिनों में चीनी शोधकर्ताओं ने बताया कि मूल रूप से सांप संभावित कैरियर थे लेकिन अब उन्होंने इस विचार का खंडन कर दिया है। 22 मार्च को प्रकाशित एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि वायरस की प्रोटीन संरचना और जीनोम प्रभावी रूप से सांपों से अलग है।

अभी सर्वसम्मति यह है कि कोरोना वायरस के मूल स्रोत चमगादड़ हैं। चमगादड़ SARS-CoV-2 वायरस के साथ अन्य कई वायरस के एक प्राकृतिक संग्रह केन्द्र के रूप में कार्य करते हैं। 2000 के दशक की शुरुआत में भी चमगादड़ ही SARS वायरस के लिए जिम्मेदार थे। लेकिन एक विचार ये भी है कि किसी अन्य जानवर ने वायरस को चमगादड़ से मनुष्यों में पहुँचाया होगा जो पैंगोलिन हो सकता है। अवैध चीनी व्यापार द्वारा पैंगोलिन का पारंपरिक चीनी चिकित्सा में उपयोग मनुष्यों में संचरण के लिए एक वेक्टर के रूप में सुझाया गया था। पैंगोलिन कोरोवायरस के कई वंशों की खोज और SARS-CoV-2 से उनकी समानता से संकेत मिलता है कि पैंगोलिन SARS-CoV-2 जैसे कोरोनवायरस के होस्ट हो सकते हैं। हालांकि, पूरे जीनोम की तुलना में पाया गया कि पैंगोलिन और मानव कोरोनवायरस अपने RNA का 92% ही साझा करते हैं। (Cyranoski et al., 2020)

अभी तक कोई निर्णायक शोध नहीं होने के बावजूद चीनी वैज्ञानिकों द्वारा पैंगोलिन को वायरस के संभावित ट्रांसमीटर के रूप में सूचीबद्ध करने पर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है। इन शुरुआती अटकलों के कारण पहले से ही संकटग्रस्त इस स्तनपायी के लिए और संकट उत्पन्न हुए हैं। आज बड़े पैमाने पर इनकी हत्या करने का प्रोत्साहन उसी प्रकार मिल है जैसा कि SARS के प्रकोप के दौरान एशियाई पाम सिवेट के साथ हुआ था। (CBS News, 2004) बहरहाल, पंगोलिन के अवैध व्यापार को समाप्त करना वन्यजीवों के उपभोग से जुड़े संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में योगदान दे सकता है। कोरोना वायरस महामारी के पीछे वन्यजीव व्यापार कि अहम भूमिका को देखते हुए चीन के अधिकारी इसे वन्यजीव बाजारों को खत्म करने वाले एक संकेत के रूप में ले रहे हैं। जो कि आने वाले समय में वन्यजीवों के लिए एक अच्छी खबर हो सकती है।

पंगोलीन संरक्षण के लिए 2016 में, कई देशों ने पैंगोलिन की सभी आठ प्रजातियों को CITES Appendix I श्रेणी में सूचीबद्ध करने के लिए मतदान कर इनके व्यापार पर प्रतिबंध लगाया था। IUCN SSC पैंगोलिन स्पेशलिस्ट ग्रुप ने भी इनके संरक्षण के लिए वर्ष 2014 में “Scaling up Pangolin conservation” नाम से वैश्विक कार्य योजना प्रारंभ कि। (IUCN SSC)

भारत में पाए जाने वाले दोनों प्रजातियों (भारतीय और चीनी पैंगोलिन) को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची 1 भाग 1 के तहत सूचीबद्ध किया गया है। इसका शिकार करना, इसको सताना, मारना या पीटना, विष देना, तस्करी करना यह सब गैर कानूनी एवं अपराध की श्रेणी में आते हैं। यह प्रजाति विलुप्त न हो इस हेतु लोगों में जागरूकता लाने व इसके संरक्षण के लिये विश्व भर में प्रतिवर्ष फरवरी माह के तीसरे शनिवार को ‘वर्ल्ड पैंगोलिन डे’ (विश्व चींटीखोर दिवस) मनाया जाता है। लेकिन भारत में इसके प्रति लोगों में उत्साह नजर नहीं आता है।

References:

  1. Cyranoski, David. (2020-02-07). Did pangolins spread the China coronavirus to people? Nature. DOI: 1038/d41586-020-00364-2
  2. Mohapatra, R.K., Panda, S. (2014). Behavioural Descriptions of Indian Pangolins (Manis crassicaudata) in Captivity. International Journal of Zoology. Hindawi Publishing Corporation. Vol. 2014, Article ID 795062. http://dx.doi.org/10.1155/2014/795062
  3. IUCN SSC Pangolin specialist group, Red List Update: https://www.pangolinsg.org/2019/12/23/iucn-red-list-update-highlights-need-for-concerted-conservation-action-for-pangolins/
  4. Zhang, Y. (2020). Protein Structure and Sequence Reanalysis of 2019-nCoV. Proteome Res. 2020, 19, 4, 1351–1360 Publication Date: March 22, 2020 https://doi.org/10.1021/acs.jproteome.0c00129
  5. Mohapatra, R.K., Et al. (2015). A note on the illegal trade and use of pangolin body parts in India. TRAFFIC Bulletin Vol. 27 No. 1. https://www.pangolinsg.org/wp-content/uploads/sites/4/2018/06/Mohapatra-et-al_2015_A-note-on-the-illegal-trade-and-use-of-pangolin-body-parts-in-India.pdf
  1. Mahmood; Irshad; Hussain (2014). “Habitat preference and population estimates of Indian pangolin”. Russian Journal of Ecology. 45 (1): 70–75. DOI:10.1134/s1067413614010081
  2. In a first, MP shows way, radio-tags two pangolins: https://timesofindia.indiatimes.com/city/nagpur/in-a-first-mp-shows-way-radio-tags-two-pangolins/articleshow/cms
  3. Scientists radio-tag Indian pangolin (2020): https://www.thehindu.com/sci-tech/energy-and-environment/scientists-radio-tag-indian-pangolin/articleece
  4. MP: Wildlife STF arrests two for selling pangolin scales on YouTube (2020): https://timesofindia.indiatimes.com/city/bhopal/mp-stf-wildlife-arrests-two-for-selling-pangolin-scales-on-youtube/articleshow/76717230.cms
  5. Civet Cat Slaughter To Fight SARS (2004): https://www.cbsnews.com/news/civet-cat-slaughter-to-fight-sars/

 

 

 

Locusts: Ancient migratory pests

Locusts: Ancient migratory pests

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They came, they saw, they plundered. They settled on every tree and on every blade of grass; they settled on the houses and covered the bare ground. The skies went black and the Pink city turned brown. It had not happened for many a long year; alas it’s happening now and about 23 countries are under their direct impact with many more to join. And the locusts have the impression of not moving away anytime soon all the while working as if sent to destroy humanity…

Much before the humans took over the world, insects have reigned the planet. These ubiquitous creatures can be found under the ground, as low as life could get; and over the ground, as high as our mountains could reach and are very much associated to human life as both useful and harmful creatures. Among the harmful insects are the Desert Locusts defying the zenith of challenges for humans. As per the estimates of Food and Security Organisation, desert locusts affect the livelihood of one in ten people on the planet and hence are deemed to be the deadliest pests infesting the world. The challenges created by them are not new, they find mentions throughout history and have references of existence through early paintings of pre-historic period.

On an average locust hit once in every six years, the hit so intense it seems they have come all together, to end humans all at once. They cover houses, swing against the windows, collapse against moving vehicles, acting as if they are assigned the only task to plunder greenery and cause destruction.

The highly mobile locusts’ swarms cover a huge area ranging from Mauritania to India, Turkmenistan to Tanzania affecting the lives and crops of people inhabiting these countries. World Bank along with various other development-oriented agencies help the countries in coping with the damaging effects and control locusts, however, there is no significant improvement in lives of people as their attack is unconditional, they are not bound to appear every year and don’t follow a determined specific time to attack instead they appear at irregular intervals, many a time after a gap of several years. This is called periodicity of locust activity. India has witnessed several locust plagues and locust upsurges and incursions during the last two centuries including at least 15 recorded cycles since 1812. During recent past India has witnessed 2 major swarms in 1968 and 1993 and the story continues to date with them appearing at regular intervals.

The year 2020, so far, has proved to be miraculously challenging with various natural calamities including one of a kind THE NOVEL CORONA VIRUS, cyclones, earthquakes and floods. While the whole world is fighting the novel coronavirus epidemic by putting humans under lockdown to limit the spread of the virus, nature has created an equally challenging, but not so new, threat in the form of locusts plague in some African and Asian nations, proving humans can be dethroned from earth anytime, without any warning if the interference with nature is not controlled.

These locusts are once again in front of us in their macabre form and wreaking havoc on crops. People this time speculating various causes for their emergence, some say changing land use pattern might be responsible, some other blaming increased greenery in the deserts, yet another group advocating the rising temperature of the Earth. Before getting to know about their arrival, let’s get acquainted with Locust briefly.

Locusts are mainly grasshoppers found in dry grasslands and desert areas. They are the world’s oldest and highly noticeable migratory pests due to their extreme destruction potential. Mistakenly, people also consider long-horned grasshopper to be locusts as they also breed in favourable summer conditions to increase numbers and destroy crops in a limited area.

Locust is the swarming stage of some species of short-horned grasshopper from the family Acrididae. There is no taxonomic difference between locust and grasshopper species, they look similar to grasshoppers but in practice are completely different from them. Grasshoppers are found on agricultural land while locusts are found in desert and arid conditions. No morphological changes are seen in Grasshopper, whereas many changes are seen during the 90 days life cycle of Locusts.

These grasshoppers are usually solitary but under certain circumstances, when their numbers increase, they witness some behavioural changes and undergo phenotypic shift and change phase to turn gregarious and start migrating. This phase change is the only basis of their definition. This change is called “density-dependent phenotypic plasticity” in scientific terms.

Boris Uvarov first described two stages of phage polymorphisms, the solitaria (independently living hoppers) and the Gregoria (hopper living as bands of immature hopper). These are also known as statary and migratory forms although, in true form, their swarms are nomadic rather than being migratory.

Solitary locusts are forced to live together during the dry season due to the limited greenery in the area. Increased tactile stimulation of the posterior leg leads to an increase in serotonin levels that causes the grasshopper to change colour, eat more, and breed easily. Locusts breed in desert areas and often coincide with forests, agricultural areas, and pastoral livelihoods. In all locusts have three breeding seasons: winter breeding (November to December), spring breeding (January to June) and summer breeding (July to October). There is only one season of grasshopper breeding in India, i.e., the summer breeding while our neighbour, Pakistan has both spring and summer breeding seasons.

The life cycle of locusts consists of three distinct stages, egg, hopper and adult. Locusts lay eggs at a depth of 10 cm in moist sandy soil. Gregarious females usually lay eggs in 2-3 pods with 60–80 eggs in a pod. The solitary female mostly lays an average of 150–200 eggs in 3–4 pods. The rate of growth of eggs depends on soil moisture and temperature. There is no growth below 15°C. Incubation period during the optimum temperature of 32–35°C is between 10–35 days.

There are about 28500 species of grasshoppers worldwide, of which only 500 exist in the form of agricultural pests, and only 20 have the potential to become locusts. India is mainly affected by four species of locusts, the desert locust (Schistocerca gregaria), the African migratory locust (Locusta migratoria), the Bombay locust (Patanga succincta), and tree locust (Anacridium spp).

After the incubation is complete the eggs hatch and nymphs come out which are called “hoppers”. The gregarious stage consists of 5 instars and the Solitarius population consists of 5–6 instars. Each instar has different growth and special colour changes. The growth rate of the hopper depends on the temperature. Where it takes 22 days at an average temperature of 37°C, the same can be delayed up to 70 days at an average temperature of 22°C.

Hoppers become adults after the fifth instar stage. This change is called ‘fledging’ and the young adult is called ‘fledgeling’ or ‘immature adult’. The duration of sexual maturity varies. In the appropriate condition, the adult can mature in 3 weeks and can take up to 8 months in frost and/or drought conditions. During this stage, adults fly to search for favourable reproductive status and can travel thousands of kilometres. During this time, if favourable conditions are found at any time, they can become gregarious

Younger grasshoppers are solitary at the time of hatching and are green and brown to fit with their surroundings. When the food is in abundance, dessert locusts increase the number by breeding and achieve a “gregarious state”. Younger immature adults are pink in colour while older adults turn dark red or brown in cold conditions.

As the locusts grow larger and denser, they act in a group with behavioural changes to form a flying flock known as a swarm. The change of grasshopper form is induced by several contacts per minute over a period of four hours. A large swarm spread over an area of thousands of square kilometres can contain billions of grasshoppers, with a population of about 80 million per square kilometre. At this point, the grasshoppers are fully mature and adult. Adults become bright yellow at maturity. Males mature earlier than females. Changes in locust behaviour and physical symptoms are reversible, which can eventually change their original form or pass on to their offspring.

Locusts hatch from an egg to adulthood after a breeding cycle of about three months and can increase in number up to 20 times. It can increase 400 times after six months and up to 8,000 after nine months. They come in swarms of thousands of millions to eat all the leaves, flowers, fruits, seeds, and bark of trees, plants or crops. They sit on trees in such a number that under their weight the tree can even break. A grasshopper makes a meal equal to its weight i.e. at least two grams. The locust of the flying band also shows the cannibalistic action of biting each other during food shortages. Migrations in desert locusts are influenced by their cannibalism. Research by Sepideh Bazzazi suggests that grasshopper swarms are formed because they like to stay one step ahead of their cannibalistic neighbours to protect themselves.

Their emergence as swarms cannot be attributed to a single factor entirely. They follow a sequence. Yes, changing land use pattern and other factors play an important role, but at a particular point following the sequence. For example, the greenery is essential but only after the eggs have hatched into nymphs, to keep them alive.

Dr S. Pradhan in 1967 put forth the Biotic theory of periodicity of locust cycles, who was at that time head of the division of Entomology at the Indian Agricultural Research Institute, New Delhi. Locusts breed in semi-desert areas where sandy soil is suitable for thrusting the eggs up to a depth of 15 cm. While locusts lead a marginal existence in these areas, their vertebrate predators, namely, lizards, snakes, birds, shrews, hedgehogs, moles etc. find it difficult to sustain themselves in the extreme conditions of deserts and semi-deserts and hence gradually move out to the more tolerant areas on the periphery.

But in desert areas, once in a decade or so, there is sufficient rainfall that triggers the growth of sedge grass and other weeds and locust gets a chance to realise its full biotic potential and its population shoots up in the absence of predators that are present outside the breeding areas and cannot move in fast enough to contain its population. Unchecked by the natural enemies, locust moves from the solitary phase to migratory phase and develops into large congregations and eventually to swarms that migrate out of the breeding areas causing immense destruction. Locust swarms having gone out of the desert areas, scattered population of adults and nymphs is left behind which then persists as solitary phase, throughout Mauritania and India, till the arrival of another phase of tolerant environmental conditions.

Grasshoppers are major components of grassland ecosystems around the world and play an important role in trophic mobility and nutrient cycling. But when green grasslands develop due to good rains, locusts take advantage of the greenery and multiply rapidly to increase in number within a month or two and take the shape of a terrible swarm.

If not controlled on time, small groups of wingless hoppers or bands can form a small group or swarm of winged adult grasshoppers called an OUTBREAK and is typically spread around 5,000 square kilometres in a part of a country. If an outbreak or multiple outbreaks concurrently are not controlled and there is widespread or unusually heavy rainfall in the surrounding areas, a series of breeding seasons may occur that would later lead to the formation of hopper bands and adult swarms. This is called UPSURGE and generally affects the entire region.

if an Upsurge is not controlled, and the environmental condition remains favourable for reproduction, locust populations continue to increase in number and size developing into a PLAGUE. Most infestations occur in the form of bands and swarms at the time of the Plague. A major Plague occurs when two or more regions are affected simultaneously.

Locusts outbreaks are common and frequent, with only a few of these outbreaks taking the form of upsurge, and some of the upsurges turn into plagues. The last Plague was observed in 1987–89 and the last major upsurge in 2003–05. Upsurges and plagues do not emerge on a single night, they may take several months to a year or two to develop.

Globally, Locusts are monitored by the Local Watch Department in guidance of Food and Agriculture Organization (FAO) of United Nation, according to which the current locust attack story began in the year 2018 with cyclonic storms and heavy rains on the Arabian Peninsula. The storm of May caused so much water that for the next six months the desert saw the emergence of green landscapes capable of sustaining two generations of locusts. Subsequently, due to the October storms, locusts got another few months to breed and thrive where their three generations grew up. They became dangerous from here and targeted Africa starting in 2019. Locusts increased their populations in remotely undeveloped areas such as Oman and Yemen due to cyclones.

According to FAO’s locust’s expert Keith Cressman, the organization monitors the attacks of locust through human resources and satellites but has failed in this case. Monitoring network collapsed. According to Cressman, no one knew what was happening in the remote area of ​​the Earth then. There is nothing in this area, no roads, no infrastructure, no Facebook, nothing. Some are large mounds of sand, which are no less than skyscrapers.

When locust swarms develop a tendency to live in groups and become gregarious, they rely primarily on carbohydrate-rich foods. The land from which successive crops have been taken and which have been over-grazed lack Nitrogen. Due to this lack of essential nutrient from the soil carbohydrate-rich grasses develop. Experts have found this in studies on South American locusts.

At the end of 2018, when people saw locusts in Oman, the news reached Cressman’s organization and alerted the situation. But it was too late by then. From here locust swarms had reached Yemen and Iran and were continuously coming out of Oman. War-torn Yemen had the crisis of not having the force to fight the locust attack. Yemen received heavy rainfall during these conditions and the locust swarm found a favourable environment to breed and flourish. The locust disaster reached Somalia from here during the last spring and summer seasons (2019) and then wreaked havoc in Ethiopia and Kenya. Last March saw heavy rain in East Africa, which again proved to be a boon for locusts. Over the last forty years, control of desert locusts with preventive strategy has proved effective, but due to negligence and organizational problems, locust swarms have once again become a serious problem.

Locusts are very difficult to control at the time of the attack as they are spread over a large area. Early intervention in locusts is the only successful way to prevent a swarm. Many organizations around the world monitor threats from locusts. They provide forecasts of areas likely to suffer locusts in the near future.

FAO’s Desert Locust Information Service (DLIS) monitors daily weather, ecological conditions and locust conditions from Rome, Italy. The DLIS obtains the results of field survey and control operations conducted by national teams in the affected countries and assesses the current situation by combining this information with satellite data, such as MODIS, rainfall estimates and seasonal temperatures and rainfall forecasts, etc. Information on breeding and migration during the week is estimated.

Locust Warning Organisation (LWO), Directorate of Plant Protection Quarantine and Storage is responsible for monitoring, survey and control of Desert Locust in Scheduled Desert Areas mainly in the States of Rajasthan and Gujarat. The incursion of exotic locust swarms into India is prevented through the organization of suitable control operation. LWO keeps itself abreast with the prevailing locust situation at National and International level through monthly Desert Locust Bulletins of FAO issued by the Desert Locust Information Service. Survey data are collected by the field functionaries from the fields which are transmitted to LWO circle offices, field HQ Jodhpur and Central HQ Faridabad where these are compiled and analysed to forewarn the probability of locust outbreak and upsurges. The locust situation is appraised to the State Governments of Rajasthan and Gujarat with the advice to gear up their field functionaries to keep a constant vigil on locust situation in their areas and intimate the same to nearest LWO offices for taking necessary action at their end. A lot of innovations have been made in the field of locust survey and surveillance for quick transmission of locust survey data, their analysis, decision making, mapping of survey areas through computerization, adoption of new software like eLocust2/ eLocust3 and RAMSES.

Historically, people were incapable of protecting crops from locusts, however, today we have the advantage of deeper knowledge and technology to fight locusts than ancestors, but still the spread over a huge area (16–30 million km), limited Resources, underdeveloped infrastructure and permeability of those areas, etc. make locusts difficult to control or contain.

Currently, the primary method of controlling desert locust swarm is small concentrated doses of organophosphate chemicals (the major ingredient in herbicides and pesticides). Which are done by spraying ultra-low volume (ULV) with vehicle-mounted or aerial sprayers. Locusts acquire the chemical either directly or indirectly by walking on the plant or eating their residues. These controls are carried out entirely by government agencies. DPPQ&S has approved 4 pesticides for use in scheduled desert areas of India. 11 pesticides have been approved for control of desert locust on crops and trees.

Organic pesticides made from fungi, bacteria, and neem extracts are also used to prevent locusts. The effectiveness of many biological pesticides is comparable to traditional chemical pesticides but in general, it takes a longer time to kill pests. To prevent these, farmers in the affected areas have started growing crops that can be harvested before the local swarm season. Additionally, inhibition of serotonin has succeeded in controlling the number of locusts in laboratories, but the field test of this technique is yet to be done.

Desert locust predator includes wasps and flies, parasitoid wasps, predator beetle larvae, birds and reptiles as natural enemies. Recently, Dr Dharmendra Khandal has seen Jacobin cuckoo, peahen hunting them in Sawai Madhopur. But these predators have the impression that they can be effective in keeping solitary populations under control. Due to a large number of locusts in the swarm and hopper bands, their influence against them is limited.

Although it is almost impossible to stop a grasshopper attack, their severity can be reduced by controlling the swarms, destroying a large number of eggs. Stringent efforts are being made in the affected countries to control the current ‘plague’. But how they will end up is difficult to say. At present, only the monsoon will control their swarm to some extent.

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