राजस्थान के संरक्षित क्षेत्र

राजस्थान के संरक्षित क्षेत्र

संरक्षित क्षेत्र, ऐसे क्षेत्र होते हैं जिन्हें उनकी प्राकृतिक, पर्यावरणीय, जैव-विविधता और सांस्कृतिक महत्व के कारण परिवर्तन या हानि से सुरक्षा प्रदान की जाती है। इन क्षेत्रों में मानव हस्तक्षेप और संसाधनों का दोहन बहुत ही सीमित और नियंत्रित हो। संरक्षित क्षेत्रों की व्यापक रूप से स्वीकृत परिभाषा इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) द्वारा संरक्षित क्षेत्रों के अपने वर्गीकरण दिशानिर्देशों में प्रदान की गई है। जिसके अनुसार “संरक्षित क्षेत्र कानूनी या अन्य प्रभावी साधनों के माध्यम से मान्यता प्राप्त एक स्पष्ट रूप से परिभाषित भौगोलिक स्थान होता है जो प्रकृति के दीर्घकालिक संरक्षण के साथ पारिस्थितिक तंत्र सेवाओं और सांस्कृतिक मूल्यों को संरक्षित करने के लिए समर्पित और प्रबंधित है”

संरक्षित क्षेत्र, सुरक्षा के भिन्न स्तर और देश के सक्षम कानूनों या शामिल अंतर्राष्ट्रीय संगठनों के नियमों के आधार पर कई प्रकार के होते हैं। भारत में संरक्षित क्षेत्र में राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, कंजर्वेशन / कम्यूनिटी रिजर्व और टाइगर रिजर्व शामिल हैं। इसमें आरक्षित वन शामिल नहीं हैं।

संरक्षित क्षेत्र (PA) को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 में परिभाषित किया गया है। धारा 2 (24A) कहती है: “संरक्षित क्षेत्र” का अर्थ है राष्ट्रीय उद्यान, अभयारण्य, संरक्षण / सामुदायिक अभयारण्य। इन्हें “संरक्षित क्षेत्र” नामक अध्याय IV के तहत अधिसूचित किया गया है।

दूसरी ओर एक टाइगर रिजर्व को “राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण” (NTCA) नामक अध्याय IV B के तहत अधिसूचित किया गया है। राष्ट्रीय उद्यानों और वन्यजीव अभयारण्यों के क्षेत्रों को शामिल करके टाइगर रिज़र्व का गठन किया जाता है। यह धारा 38 V (4) (i) द्वारा अनिवार्य है। चूंकि, टाइगर रिजर्व के सभी अधिसूचित कोर या क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट या तो अभयारण्य हैं या बाघों की आबादी वाले राष्ट्रीय उद्यान हैं इसलिए उन्हें भी PA माना जाता है। यहाँ आपको बात दें कि धारा 38 V (4) (ii) के अनुसार टाइगर रिजर्व में अधिसूचित बफ़र या परिधीय क्षेत्रों को संरक्षण की कमतर आवश्यकता होती है इसलिए उन्हें PA कि श्रेणी से बाहर रखा गया है। इनमें पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESZ) भी शामिल हैं जो PA को घेरते हैं।

राजस्थान के सभी संरक्षित क्षेत्रों को दर्शाता मानचित्र

राष्ट्रीय उद्यान:

अभयारण्य के भीतर या बाहर एक क्षेत्र को उसके पारिस्थितिक, जीव-जंतु, वनस्पतीय, भू-आकृति, या प्राणी-शास्त्रीय महत्व के कारण रक्षा, वन्यजीवों या उनके पर्यावरण का प्रचार या विकास करने के उद्देश्य से राज्य सरकार द्वारा इनको राष्ट्रीय उद्यान के रूप में गठित करने के लिए अधिसूचित किया जा सकता है। राष्ट्रीय उद्यान के अंदर किसी भी मानवीय गतिविधि की अनुमति नहीं होती सिवाय राज्य के मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक द्वारा अध्याय 4 में दी गई शर्तों के तहत स्वीकृत गतिविधियों के।

वन्यजीव अभयारण्य:

किसी भी आरक्षित वन या प्रादेशिक जल से युक्त क्षेत्र के अलावा कोई क्षेत्र यदि पर्याप्त पारिस्थितिक, जीव-जंतु, वनस्पतीय, भू-आकृति, प्राकृतिक या जूलॉजिकल महत्व का हो तो राज्य सरकार द्वारा वन्यजीव या उसके पर्यावरण की रक्षा, प्रचार या विकास के उद्देश्य से अभयारण्य के रूप में गठित करने के लिए अधिसूचित किया जा सकता है। अभयारण्य क्षेत्र के अंदर कुछ प्रतिबंधित मानव गतिविधियों की अनुमति होती है जो कि WPA 1972 के अध्याय IV में दिए गए हैं।

रामगढ विषधारी अभयारण्य और वहां की जैव-विविधता (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

कंजर्वेशन / कम्यूनिटी रिजर्व:

संरक्षित क्षेत्रों को चिह्नित करने वाले शब्द हैं जो आम तौर पर स्थापित राष्ट्रीय उद्यानों, वन्यजीव अभयारण्यों और आरक्षित और संरक्षित जंगलों के बीच बफर जोन के रूप में कार्य करते हैं। ऐसे क्षेत्र यदि निर्जन और पूरी तरह से भारत सरकार के स्वामित्व में हों, लेकिन समुदायों और सामुदायिक क्षेत्रों द्वारा निर्वाह के लिए उपयोग किये जाते हों या भूमि के छोटे हिस्से का निजी स्वामित्व होने कि स्थिति में संरक्षण क्षेत्रों के रूप में नामित किया जा सकता है।

संरक्षित क्षेत्रों में इन श्रेणियों  को पहली बार 2002 के वन्यजीव (संरक्षण) संशोधन अधिनियम में पेश किया गया था। भूमि के निजी स्वामित्व और भूमि उपयोग के कारण मौजूदा या प्रस्तावित संरक्षित क्षेत्रों में कम सुरक्षा के कारण इन श्रेणियों को जोड़ा गया था।

जोड़ बीड गधवाला कंजर्वेशन रिजर्व, बीकानेर (फोटो: डॉ. दाऊ लाल बोहरा)

राजस्थान में संरक्षित क्षेत्रों कि स्थिति:

राजस्थान के संरक्षित क्षेत्रों के बारे में यहाँ के लोगों को कोई स्पष्ट जानकारी नहीं मालूम पड़ती। अक्सर यहाँ लोगों द्वारा अलग-अलग जानकारियाँ उपलब्ध कराई जाती है। यहाँ तक कि भिन्न सरकारी संस्थाओं द्वारा भी अलग – अलग जानकारी उपलब्ध कराई जाती है। WII-ENVIS के वेब पोर्टल के अनुसार राजस्थान में 4 राष्ट्रीय उद्यान और 25 वन्यजीव अभयारण्य हैं। राजस्थान सरकार के एनवायरनमेंट पोर्टल के अनुसार यहाँ 3 राष्ट्रीय उद्यान और 26 अभयारण्य हैं।

राजस्थान में तीन राष्ट्रीय उद्यान, 27 वन्यजीव अभयारण्य, 14 कंजर्वेशन रिजर्व, और तीन टाइगर रिजर्व हैं। यहाँ अभी तक एक भी कम्यूनिटी रिजर्व घोषित नहीं किया गया है, लेकिन इस संबंध में सरकार के प्रयास जारी हैं। यहाँ यह भी उलेखनिए है कि डेसर्ट नैशनल पार्क और सरिस्का नैशनल पार्क को राजस्थान सरकार कि अधिसूचना के अनुसार राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया है लेकिन वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि अधिसूचना के अनुसार ये अभयारण्य ही हैं जिनके नाम में नैशनल पार्क शब्द जोड़ा गया है, और राजस्थान में सिर्फ राष्ट्रीय उद्यान ही हैं।

क्रम. सं. संरक्षित क्षेत्र संख्या क्षेत्र (sq.km.) कवरेज % (राज्य में)
1 राष्ट्रीय उद्यान 3 608.38 0.18
2 वन्यजीव अभ्यारण्य 27 9152.33 2.67
3 कंजर्वेशन रिजर्व 14 667.01 0.19
4 टाइगर रिजर्व 3 3384.62 0.99
  योग (total) 47 13812.4* 4.04

* योग, संरक्षित क्षेत्रों के एरिया के ओवरलैप को छोड़कर

भैंसरोडगढ़ अभयारण्य (फोटो: डॉ. एन.कृष्णेन्द्र सिंह)

 

राजस्थान में संरक्षित क्षेत्रों की सूची (जुलाई, 2020)
S. No. संरक्षित क्षेत्र का नाम जिला क्षेत्र (प्रति वर्ग कि.मी.) मुख्य वन्यजीव अधिसूचना नं. और तारीख
A नेशनल पार्क
1 रणथंभौर नेशनल पार्क सवाई माधोपुर 282.03 बाघ, पैंथर, भालू, सांभर, चीतल F11(26)Revenue/8/80/ Dated 01.11.1980
2 केवलादेव नेशनल पार्क भरतपुर 28.73 निवासी और प्रवासी पक्षी, चीतल, अजगर, ब्लू बुल, सांभर F3(5)(9)/8/72/Dated 27.08.1981
3 मुकुंदरा हिल्स नेशनल पार्क कोटा, चित्तौड़गढ़ 297.62 बाघ, पैंथर, चिंकारा, भालू, चीतल, लकड़बग्घा, जंगली सूअर F11(56)Van/2011/Part Dated 09.01.2012.
Overlap with Darrah Sanctuary, Jawaharsagar Sanctuary and National Chambal Sanctuary
  कुल क्षेत्र 608.38  
B वन्यजीव अभयारण्य
1 सरिस्का अभयारण्य अलवर 491.99 बाघ F39(2)Forest/55/ Dated 01.11.1955
2 सरिस्का ‘ए’ अभयारण्य अलवर 3.01 सांभर, चीतल, पैंथर P1(24)Van/08/ Dated 20.06.2012
3 दरा अभयारण्य कोटा, झालावाड़ 71.31 पैंथर, भेड़िया, सियार, चीतल, लोमड़ी, सांभर, स्लोथ भालू, साही F39(2)Forest/55/ Dated 01.11.1955
Overlap with Mukundara Hills National Park.
Area based on MHTR notifications
4 जवाहरसागर अभयारण्य कोटा, बूंदी, चित्तौड़गढ़ 156.62 पैंथर, भालू, भेड़िया, घड़ियाल, मगरमच्छ, चीतल, लकड़बग्घा, लोमड़ी, सियार F11(5)13/Revenue/8/73/ Dated 09.10.1975 Overlap with Mukundara Hills National Park
Area based on MHTR notifications
5 जयसमंद अभयारण्य उदयपुर 52.34 निवासी पक्षी, लकड़बग्घा, सियार, चिंकारा F39(2)Forest/55/ Dated 01.11.1955
6 फुलवारी कि नाल अभयारण्य उदयपुर 511.41 पैंथर, लकड़बग्घा, जंगली बिल्ली, सियार, फॉक्स F11(1)/Revenue/8/83/ Dated 06.10.1983
7 सज्जनगढ़ अभयारण्य उदयपुर 5.19 पैंथर, लकड़बग्घा, जंगली बिल्ली, सियार, फॉक्स F11(64)/Revenue/8/86/ Dated 17.02.1987
8 सीतामाता अभयारण्य उदयपुर, चित्तौड़गढ़ 422.94 फ्लाइंग गिलहरी, पैंथर, जंगली बिल्ली, सांभर, लकड़बग्घा, सिवेट F11(9)Revenue/8/78/ Dated 02.01.1979
9 माउंट आबू अभयारण्य सिरोही 326.1 पैंथर, भालू, लकड़बग्घा, भेड़िया, साही P.11(40)Van/97/ Dated 15.04.2008
10 ताल छापर अभयारण्य चूरू। 7.19 ब्लैक बक, निवासी पक्षी F379/Revenue/8/59/ Dated 04.10.1962
11 राष्ट्रीय चम्बल घड़ियाल अभयारण्य कोटा, बूंदी, सवाईमाधोपुर, करोली, धौलपुर 564.03 घड़ियाल, मगरमच्छ, कछुआ, डॉल्फिन, भालू, चिंकारा, ऊदबिलाव F11(39)Revenue/8/78/ Dated 07.12.1979
Overlap with Mukundara Hills National Park
Area as per DGPS survey
12 नाहरगढ़ अभयारण्य जयपुर 52.4 लकड़बग्घा, सियार, लोमड़ी, खरगोश F11(39)Revenue/8/80 Dated 22.09.1980
13 जमवा रामगढ़ अभयारण्य जयपुर 300 पैंथर, चीतल, जंगली सूअर, लकड़बग्घा, सियार F11(12)Revenue/8/80/ Dated 31.05.1982
14 डेजर्ट नेशनल पार्क अभयारण्य जैसलमेर, बाड़मेर 3162 चिंकारा, डेजर्ट कैट, फॉक्स, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड F3(1)73/Revenue/8/79/ Dated 04.08.1980
15 रामगढ़ विषधारी  अभयारण्य बूंदी 303.05 पैंथर, लकड़बग्घा, स्लोथ भालू, सियार, लोमड़ी, चीतल F11(1)/Revenue/8/79/ Dated 20.05.1982
After de-notification
16 केलादेवी अभयारण्य करोली, सवाई माधोपुर 676.82 पैंथर, चीतल, चिंकारा, सांभर, भालू, लकड़बग्घा, जंगली सूअर, भेड़िया F11(28)/Revenue/8/83/ Dated 19.07.1983
17 शेरगढ़ अभयारण्य बारां। 81.67 पैंथर, चीतल, चिंकारा, जंगली सूअर F11(35)/Revenue/8/83/ Dated 30.07.1983
18 तोडगढ़ रावली अभयारण्य राजसमंद, अजमेर, पाली 495.27 पैंथर, लकड़बग्घा, भेड़िया, हरे कबूतर, जंगल मुर्गी F11(56)/Revenue/8/82/ Dated 28.09.1983
19 कुंभलगढ़ अभयारण्य राजसमंद, उदयपुर, पाली 610.53 पैंथर, स्लोथ भालू, लकड़बग्घा, जंगली सूअर, चार सींग वाले मृग, सांभर F10(26)Revenue/A/71/ Dated 13.07.1971
20 सवाईमानसिंह अभयारण्य सवाई माधोपुर 113.07 बाघ, पैंथर, लकड़बग्घा, लोमड़ी, भालू, चीतल, सांभर F11(28)/Revenue/8/84/ Dated 30.11.1984
21 सवाईमाधोपुर अभयारण्य सवाई माधोपुर 131.3 बाघ, पैंथर, लकड़बग्घा, लोमड़ी, भालू, चीतल, सांभर F/39/(2)For/55 dated 07.11.1955
Overlap with Ranthambhore National Park
22 भेंसरोडगढ़ अभयारण्य चित्तौड़गढ़ 201.4 पैन्थर, चौसिंघा, चिंकारा,लोमड़ी, लकड़बग्घा F11(44)/Revenue/8/81/ Dated 05.02.1983
23 बस्सी अभयारण्य चित्तौड़गढ़ 138.69 चीतल, चिंकारा, पैन्थर, लकड़बग्घा, जंगल कैट F11(41)/Revenue/8/86/ Dated 29.08.1988
24 वन विहार अभयारण्य धौलपुर 25.6 भालू, भेड़िया, चीतल, सांभर, लोमड़ी, जंगल कैट F39(2)Forest/55/ Dated 01.11.1955
25 रामसागर अभयारण्य धौलपुर 34.4 भेड़िया, लकड़बग्घा, लोमड़ी, चीतल F39(2)FOR/55/ Dated 07.11.1955
26 केसरबाग अभयारण्य धौलपुर 14.76 भेड़िया, लकड़बग्घा, लोमड़ी, चितल F39(26)FOR/55/ Dated 07.11.1955
27 बांध बरेठा अभयारण्य भरतपुर 199.24  प्रवासी पक्षी F11(1)/Enviorment/ Dated 07.10.1985
  कुल क्षेत्र 9152.33    
C कॉनजर्वेसन रिजर्व
1 बीसलपुर कंजर्वेशन रिजर्व टोंक 48.31 काला हिरण, लकड़बग्घा, भेड़िया, सियार P.3(19)Van/2006/ Dated 13.10.2008
2 जोड़ बीड गधवाला कंजर्वेशन रिजर्व, बीकानेर बीकानेर 56.47  काला हिरण, जंगल कैट, जंगली सुअर P.3(22)Van/2008/ Dated 25.11.2008
3 सुंधामाता कंजर्वेशन रिजर्व जालोर, सिरोही 117.49  पैन्थर, भालू, भेड़िया, लकड़बग्घा, चिंकारा P.3(22)Van/2008/ Dated 25.11.2008
4 गुढ़ा विश्सियान कंजर्वेशन रिजर्व जोधपुर 2.32  चिंकारा, काला हिरण, जंगली सूअर P.3(2)Van/2011/ Dated 15.12.2011
5 शाकंबरी कंजर्वेशन रिजर्व सीकर, जंजैहली 131  सांभर, पॉर्क्यपाइन, लॉनदी, जंगली बिल्ली, लकड़बग्घा P.3(16)Van/2009/ Dated 09.02.2012
6 गोगेलाव कंजर्वेशन रिजर्व नागौर 3.58  चिंकारा, खरगोश, काला हिरण P.3(17)Van/2011/ Dated 09.03.2012
7 बीर झुंझुनू कंजर्वेशन रिजर्व जंजैहलू 10.47  खरगोश, हेज हॉग, प्रवासी पक्षी P.3(47)Van/2008/ Dated 09.03.2012
8 रोटु कंजर्वेशन रिजर्व नागौर 0.73   P.3(8)Van/2011/ Dated 29.05.2012
9 उम्मेदगंज पक्षी विहार कंजर्वेशन रिजर्व शहर 2.72  प्रवासी पक्षी F3(1) FOREST/ 2012 dated 5.11.2012
10 जवाईबंद तेंदुआ संरक्षण रिजर्व डंडे 19.79  पैन्थर F3(1) FOREST/ 2012 dated 27.02.2013
11 बंसियाल खेतड़ी कंजर्वेशन रिजर्व झुंझुनू 70.18   F3(13) FOREST/ 2016 dated 01.03.2017
12 बंसियाल खेतड़ी बागोर कंजर्वेशन रिजर्व झुंझुनू 39.66   F3(13) FOREST/ 2016 dated 10.04.2018
13 जवाई बंद लीपॉर्ड कंजर्वेशन रिजर्व द्वितीय डंडे 61.98 पैन्थर F3(4) FOREST/ 2012 PT dated 15.06.2018
14 मनसा माता कंजर्वेशन रिजर्व झुंझुनू 102.31   F3(9) FOREST/ 2013 Jaipur dated 18.11.2019
  कुल क्षेत्र 667.01    
D टाइगर रिजर्व
1 रणथंभौर टाइगर रिजर्व सवाईमाधोपुर, करौली, बूंदी, टोंक 1411.29   F3(34)FOREST/2007 dated 28.12.2007 (CTH Notification) and F3(34)FOREST/2007 dated 06.07.2012 (Buffer Notification)
Overlap with Ranthambhore National Park, Sawaimadhopur Sanctuary, Sawaimansingh Sanctuary, Keladevi Sanctuary and National Chambal Sanctuary
2 सरिस्का टाइगर रिजर्व अलवर, जयपुर 1213.34   F3(34)FOREST/2007 dated 28.12.2007 (CTH Notification) and F3(34)FOREST/2007 dated 06.07.2012 (Buffer Notification)
Overlap with Sariska Sanctuary, Sariska A Sanctuary and Jamwaramgarh Sanctuary
3 मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व कोटा, बूंदी, झालावाड़, चित्तौड़गढ़ 759.99   F3(8)FOREST/2012 dated 09.04.2013 (CTH Notification) and F3(8)FOREST/2012 dated 09.04.2013 (Buffer Notification)
Overlap with Mukundara Hills National Park, Darrah Sanctuary, Jawaharsagar Sanctuary and National Chambal Sanctuary
  कुल क्षेत्र 3384.62   राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के साथ ओवरलैप को छोड़कर
  महायोग 13812.4   टाइगर रिजर्व, राष्ट्रीय उद्यानों और अभयारण्यों के बीच सभी ओवरलैप को छोड़कर

Source: Wildlife (Planning) Wing, Department of Forests and Wildlife, Government of Rajasthan.

Cover Photo Credits: Dr. Dharmendra Khandal

 

कुत्तो का वायरस बाघों के लिए खतरा: कैनाइन मोर्बिली वायरस

कुत्तो का वायरस बाघों के लिए खतरा: कैनाइन मोर्बिली वायरस

कुत्तों से फैला कैनाइन मोर्बिली वायरस या कैनाइन डिस्टेंपर वायरस शेर और बाघ के लिए खतरा बना गया है। यह वायरस कभी भी उनपर कहर बरपा सकता है। अभी तक इसके संक्रमण से जूझ रहे शेर-बाघों को बचाने वाली कोई वैक्सीन तक नहीं है।

अखिल भारतीय बाघ सर्वेक्षण में उपयोग किए गए कैमरा-ट्रैप ने 17 बाघ अभयारण्यों में बाघों की तुलना से ज्यादा आवारा कुत्तों को कैप्चर किया। कुत्तों और पशुधन दोनों की उपस्थिति महत्वपूर्ण संख्या में कम से कम 30 टाइगर रिजर्व में दर्ज की गई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि पहले से ही अवैध शिकार और पर्यावास कि कमी आदि चुनौतियों से जूझ रहे बाघ, शेर और अन्य जंगली मांसाहारी, इन जंगली और परित्यक्त कुत्तों और पशुओं (कैटल), के प्रसार से विभिन्न रोगों का संचरण और संक्रमण जल्द ही इनकी विलुप्त हो रही आबादी को लुप्तप्राय कर सकता है।(Jay Mazumdar, 2020)

यहाँ आप वन्यजीवों में खतरे के रूप में उभरे वायरस के बारे में पढ़ने जा रहे हैं। वर्ष 2018 में गुजरात के 23 शेरों कि मौत का कारण बना कैनाइन डिस्टेम्पर वायरस (सीडीवी) एक संक्रामक वायरस है। मूलतः कुत्तों में फैलने वाले इस वायरस से ग्रसित जानवरों का बचना बेहद मुश्किल होता है। सीडीवी पॅरामीक्सोविरइडे (Paramyxoviridae) परिवार के मोर्बिली वायरस जीनस का सदस्य है। सीडीवी एक एनवेलप्ड़पले ओमॉरफीक आरएनए वायरस है, जिसका बाहरी एन्वेलपहेमगलुटिनीन और फ्यूज़न प्रोटीन का बना होता है। ये प्रोटीन, वायरस को नॉर्मल सेल से जुडने और अंदर प्रवेश कर संक्रमित करने में मदद करते हैं। मोर्बिलीवायरस, मध्यम-से-गंभीर श्वसन, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, इम्युनोसुप्रेशन और न्यूरोलॉजिकल रोगों को भिन्न प्रकार के जीवों जैसे की मनुष्य (खसरा वायरस), मांसाहारी (कैनाइनडिस्टेंपर वायरस), मवेशी (रिन्डरपेस्ट वायरस) डॉल्फ़िन और अन्य लुप्तप्राय वन्यजीव प्रजातियों को संक्रमित करने के कारण जाना जाता है। कुत्तों में इसके संक्रमण से गंभीर, बहु-तंत्रीय रोग हो सकते है जो मुख्य रूप से गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, श्वसन और न्यूरोलॉजिकलसिस्टम को प्रभावित करते हैं। (Appel M. J.1987)

कुत्ते वन्यजीवों के शिकार का उपभोग करते हुए उसे CDV से संक्रमित कर देते हैं और जब वन्यजीव अपने शिकार को खत्म करने के लिये वापस लौटता तो इस घातक बीमारी की चपेट में आ जाता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

अपने नाम के बावजूद, कैनाइन डिस्टेम्पर वायरस को ऑर्डर कार्निवोरा में विभिन्न प्रकार की प्रजातियों को संक्रमित करने के लिए जाना जाता है। यहां तक कि वर्ष 2013 में गैर-मानवीय प्राइमेट भी सीडीवी से संक्रमित हो गए हैं, जिससे संभावित मानव संक्रमण कि भी संभावनाएँ बढ़ गई है। फेलिड्स को सीडीवी के लिए ज्यादातर प्रतिरोधी माना जाता था लेकिन अमेरिकी जूलॉजिकल पार्कों में रहने वाले बंदी बाघों, शेरों, तेंदुओं और जगुआर में घातक संक्रमणों की एक श्रृंखलाने इस धारणा को गलत साबित किया। फिर, 1994 में, तंजानिया के सेरेनगेटी नेशनल पार्क में कुल शेरों की आबादी के लगभग एक तिहाई शेरों का संक्रमण से मौत होना साबित करता था कि बड़ी बिल्लियाँ इससे बची ना थी। उनकी मौतों के साथ ही सेरेनगेटी इकोसिस्टम के भीतर विभिन्न प्रकार के मांसाहारियों में होने वाली मौतों के लिए सीडीवी को जिम्मेदार ठहराया गया था। उसके बाद फिर ऐसे कई मामले सामने आए जिनमे अन्य फेलिड्स की आबादीजैसे कि बॉबकैट, कनाडा लिनक्स, यूरेशियन लिनक्स, गंभीर रूप से लुप्तप्राय इबेरियन लिनक्स, और अमूर बाघ भी शामिल थे। (Terio, KA. 2013)

इसके अलावा भारत में देखें तो, थ्रेटेड टैक्स (Threatened Taxa) में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि राजस्थान के रणथंभौर नेशनल उद्यान (Ranthambhore National Park) के समीप 86% कुत्तों का परीक्षण किये जाने के बाद इनके रक्तप्रवाह में CDV एंटीबॉडीज़ के होने की पुष्टि की गई है। इसका अर्थ है कि ये कुत्ते या तो वर्तमान में CDV से संक्रमित हैं या अपने जीवन में कभी-न-कभी संक्रमित हुए हैं और उन्होंने इस बीमारी पर काबू पा लिया है। इस अध्ययन में यह इंगित किया गया है कि उद्यान में रहने वाले बाघों और तेंदुओं में कुत्तों से इस बीमारी के हस्तांतरण का खतरा बढ़ रहा है। अक्सर ऐसा होता है कि शेर/ बाघ एक बार में पूरे शिकार को नहीं खाते हैं। कुत्ते उस शिकार का उपभोग करते हुए उसे CDV से संक्रमित कर देते हैं। शेर/बाघ अपने शिकार को खत्म करने के लिये वापस लौटता है और इस घातक बीमारी की चपेट में आ जाता है।(Sidhu et al, 2019)
वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशन सोसाइटी, कॉर्नेल और ग्लासगो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक वायरस के लिए नियंत्रण उपायों (जैसे कि एक टीका देना, आदि जो इन जानवरों के लिए सुरक्षित हो) को विकसित करके इसके संकट को दूर करने के लिए तेजी से कार्रवाई करने का आग्रह कर रहे हैं। उन्होंने कैनाइन डिस्टेंपर वायरस का नाम बदलकर कार्निवॉर डिस्टेम्पर वायरस रखने का भी सुझाव दिया है ताकि जानवरों की विस्तृत श्रृंखला को दिखाया जा सके जो वायरस का संचरण करते हैं और बीमारी से पीड़ित हो सकते हैं।

कैनाइन डिस्टेंपर कैसे फैलता है?

कुत्ते में सीडीवी के संक्रमण के तीन मुख्य तरीके हैं – एक संक्रमित जानवर या वस्तु के साथ सीधे संपर्क के माध्यम से, एयरबोर्न एक्सपोज़र के माध्यम से, और प्लसेन्टा के माध्यम से। कैनाइन डिस्टेंपर वायरस शरीर कि लगभग सभी प्रणालियों को प्रभावित करता है। 3-6 महीने की उम्र के पिल्ले विशेष रूप से अतिसंवेदनशील होते हैं। सीडीवी एरोसोल की बूंदों के माध्यम से और संक्रमित शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क के 6 से 22 दिन बाद से फैलता है, जिसमें नाक और नेत्र संबंधी स्राव, मल और मूत्र शामिल हैं। यह इन तरल पदार्थों से दूषित भोजन और पानी से भी फैल सकता है। जब संक्रमित कुत्ते या जंगली जानवर खाँसते, छींकते या भौंकते हैं, तो एयरोसोल की बूंदों को पर्यावरण में छोड़ते हैं जो कि आस-पास के जानवरों और सतहों को संक्रमित करते है। संक्रमण और बीमारी के बीच का समय 14 से 18 दिनों का होता है, हालाँकि संक्रमण के 3 से 6 दिन बाद बुखार आ सकता है।डिस्टेम्पर वायरस पर्यावरण में लंबे समय तक नहीं रहता है और अधिकांश कीटाणुनाशकों द्वारा नष्ट किया जा सकता है। जबकि डिस्टेम्पर-संक्रमित कुत्ते कई महीनों तक वायरस का प्रवाह कर सकते हैं और अपने आसपास के कुत्तों को जोखिम में डालते हैं।

कैनाइन डिस्टेम्पर वाइरस संरचना (Source – veteriankey.com)

 

सीडीवी संक्रमण द्वारा प्रभावित एनाटॉमिक साइट्स (Source – veteriankey.com)

कैनाइन डिस्टेम्पर के लक्षण:

कैनाइन डिस्टेम्पर के प्रारम्भिक लक्षणों के दौरान आँखों से पानी के साथ मवाद जैसा पदार्थ निकलता है। इसके बाद बुखार, भूख ना लगना, और नाक बहने जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं। अन्य लक्षणों में उलटी, दस्त, अत्यधिक लार, खांसी, और सांस लेने में तकलीफ शामिल है। यदि तंत्रिका संबंधी लक्षण विकसित होते हैं, तो असंयम हो सकता है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के संकेतों में मांसपेशियों या मांसपेशियों के समूहों की एक स्थानीय अनैच्छिक ट्विचिंग शामिल है। जबड़ों में ऐंठन, जिसे आमतौर पर “च्यूइंग-गम फिट”, या अधिक उपयुक्त रूप से “डिस्टेंपर मायोक्लोनस” के रूप में वर्णित किया जाता है, भी लक्षण में शामिल है। जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है जानवर प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता, असंयम, चक्कर, दर्द या स्पर्श के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि, और मोटर क्षमताओं के बिगड़ने के लक्षण दिखा सकता है। कुछ मामलों में संक्रमण अंधापन और पक्षाघात का कारण बन सकते हैं।

कैनाइन डिस्टेम्पर के प्रारम्भिक लक्षणों के दौरान आँखों से पानी के साथ मवाद जैसा पदार्थ निकलता है। इसके बाद बुखार, भूख ना लगना, और नाक बहने जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

कैनाइन डिस्टेम्पर का निवारण:

दुर्भाग्य से इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है, लेकिन उपचार के तौर पर लक्षणों को नियंत्रित करना शामिल है। हालांकि कैनाइन डिस्टेंपर का इलाज इस बात पर भी निर्भर है कि जानवर की प्रतिरक्षा प्रणाली कितनी मजबूत है और वायरस का असर कितना है। इसके अलावा यदि इस बीमारी का निदान व इलाज शुरुआती चरणों में शुरू कर दिया जाए तो इसे आसाानी से नियंत्रित किया जा सकता है।
कुत्तों के लिए कैनाइन डिस्टेंपर के खिलाफ कई टीके मौजूद हैं। कीटाणुनाशक, डिटर्जेंट के साथ नियमित सफाई से वातावरण से डिस्टेम्पर वायरस नष्ट हो जाता है। यह कमरे के तापमान (20-25 डिग्री सेल्सियस) पर कुछ घंटों से अधिक समय तक पर्यावरण में नहीं रहता है, लेकिन ठंड से थोड़े ऊपर तापमान पर छायादार वातावरण में कुछ हफ्तों तक जीवित रह सकता है। यह अन्य लेबिल वायरस के साथ, सीरम और ऊतक के मलबे में भी लंबे समय तक बना रह सकता है। कई क्षेत्रों में व्यापक टीकाकरण के बावजूद, यह कुत्तों की एक बड़ी बीमारी है।
आरक्षित वनों से डिस्टेम्पर के रोकथाम के लिए सर्वप्रथम राष्ट्रीय उद्यानों के आसपास के क्षेत्र में मुक्त घुमने वाले और घरेलू कुत्तों का टीकाकरण किया जाना चाहिये। इस बीमारी को पहचानने तथा इसके संबंध में आवश्यक अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है। जहाँ कहीं भी मांसाहारी वन्यजीवों में CDV के लक्षणों का पता चलता है वहाँ संबंधित जानकारियों का एक आधारभूत डेटा तैयार किया जाना चाहिये ताकि भविष्य में ज़रूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल किया जा सकें। नियंत्रण उपायों पर विचार करने के क्रम में स्थानीय CDV अभयारण्यों में घरेलू पशुओं की भूमिका को विशेष महत्तव दिया जाना चाहिये तथा इस संबंध में उपयोगी अध्ययन किये जाने चाहिये।
इस समस्या का सबसे आसान तरीका है- इस रोग की रोकथाम। वन्यजीवों की आबादी में किसी भी बीमारी का प्रबंधन करना बेहद मुश्किल होता है। सरकार को देश में वन्यजीव अभयारण्यों के समीप कुत्तों के टीकाकरण के लिये पहल शुरू करनी चाहिये।

सन्दर्भ :

1. Appel M. J.Canine distemper virus Virus infections of carnivores. Appel M. J. 1987 133 159 Elsevier SciencePublishers B. V. Amsterdam, The Netherlands Google Scholar
2. Terio KA, Craft ME. Canine distemper virus (CDV) in another big cat: should CDV be renamed carnivore distemper virus?. mBio. 2013;4(5):e00702-e713. Published 2013 Sep 17. doi:10.1128/mBio.00702-13American Society for Microbiology
3. Mazumdar J. What camera traps saw during survey: More domestic dogs than tigers in major reserves. Indianexpress.com. Published 2020 Aug 3. https://indianexpress.com/article/cities/delhi/tiger-reserves-domestic-dogs-india-survey-6536467/
4. Sidhu, N., Borah, J., Shah, S., Rajput, N., & Jadav, K. K. (2019). Is canine distemper virus (CDV) a lurking threat to large carnivores? A case study from Ranthambhore landscape in Rajasthan, India. Journal of Threatened Taxa, 11(9), 14220-14223. https://doi.org/10.11609/jott.4569.11.9.14220-14223

 

 

रामगढ विषधारी अभयारण्य–राजस्थान के बाघों का अनौपचारिक आशियाना

रामगढ विषधारी अभयारण्य–राजस्थान के बाघों का अनौपचारिक आशियाना

हमेशा से बाघों के अनुकूल रहा, राजस्थान का एक ऐसा क्षेत्र जो बाघ पर्यावास बनने को तैयार है लेकिन सरकारी अटकलों और तैयारियों  कि कमी के कारण आधिकारिक तौर पर बाघों से वंचित है।

रामगढ़ विषधारी अभयारण्य राज्य के बूंदी जिले में 304 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत एक जलपूर्ण वन क्षेत्र है। राज्य ने इसे 20 मई 1982 को राजस्थान वन्य प्राणी और पक्षी संरक्षण अधिनियम, 1951 की धारा 5 के अंतर्गत अभयारण्य घोषित किया। रामगढ़, रणथंभोर टाइगर रिजर्व के दक्षिण कि ओर एक पहाड़ों से घिरा वन क्षेत्र है जो कि मेज नदी द्वारा दो असमान भागों में विभाजित होता है। मेज नदी इस वन क्षेत्र के कई जलश्रोत को जलपूर्ण कर इस वन क्षेत्र कि जीवन रेखा के रूप में काम करती है। रणथंभोर से जुड़ा होने के कारण यह बफर ज़ोन का भी काम करता है जिसकी वजह से रणथंभोर से निकले हुए बाघ अक्सर यहाँ पहुँच जाते है।

रामगढ़ का इतिहास:

रामगढ़ का इतिहास, वन्यजीवों से लेकर इंसानों के खूनी गाथाओं से भरा हुआ है।अधिकांश राजपूत शासक एक दूसरे के राज्यों में मेहमान के तौर पर शिकार, विशेष रूप से स्वयं के राज्यों में अनुपलब्ध जीवों के शिकार के लिए आमंत्रित करते रहते थे। अक्सर ये शिकार यात्राएँ उनके बीच घनिष्ठ संबंधों, विवाह, दोस्ती और साझा हित से जुड़ी रियासतों, के अस्तित्व को प्रतिबिंबित और प्रबलित करते थे।

बाघों की बड़ी आबादी कि वजह से, बूंदी बाघों के शिकार के लिए एक लोकप्रिय स्थान था। जबकि आम तौर पर बाघों का  शिकार राज्यों द्वारा अपने आपसी संबंधों को मजबूत करने में मददगार साबित होता था, बूंदी के मामले में यह उसके विपरीत साबित हुआ है। ब्रिटिश एजेंट जेम्स टोड के ऐनल्ज़ एण्ड एंटीकुईटीस के अनुसार यहाँ अहेरिया (वसंत के समय का शिकार) का त्यौहार मेवाड़ के महारनाओं के लिए तीन बार घातक साबित हुआ (Hughes, 2013)। 1531 में एक शिकार के दौरान बूंदी के राव सूरजमल और मेवाड़ के महाराणा रतन सिंह के बीच एक झगड़े का उल्लेख है जिसमें दोनों महाराज एक दूसरे को मार डालते हैं। टोड के अनुसार महाराणा रतन सिंह द्वारा चोरी से हाड़ा महाराज सुरजमल कि बहन से विवाह करने के कारण बदले कि भावना में शिकार के दौरान झगड़े में एक दूसरे को मार डालते हैं। ऐसी ही एक घटना 1773 में दोहराई गई जब बूंदी के राव राजा अजीत सिंह ने मेवाड़ के महाराणा अरसी सिंह को शिकार के दौरान ही मार डाला। टोड के अनुसार महाराणा कि मौत मेवाड़ के रईसों द्वारा प्रभावित था जिन्हें महाराज अरसी स्वीकार नहीं थे (Crooke, 2018)।

Ramgarh Hunting Lodge: बूंदी के महाराज रामसिंह द्वारा मेज नदी के किनारे शिकार के महल का निर्माण करवाया गया था।ब्रिटिश एजेंट जेम्सटोड के अनुसार राजा राम को शिकार का जुनून उन्हें अपने पिता से विरासत में मिला, और यहां तक कि इस ग्यारह वर्ष कि उम्र में उन्हें अपने पहले शिकार करने पर बूंदी के रईसों से नजर और बधाई मिली। (फोटो: प्रवीण कुमार)

महारजाओं के शिकार के साथ ही यहाँ बेहिसाब वन्यजीवों का भी शिकार हुआ है। जेम्स टॉड ने अपने ऐनल्ज़ में ही बताया है कि बूंदी के शासक राव राजा बिशन सिंह (मृत्यु 1821) ने 100 से अधिक शेर और कई बाघ मारे थे। बेशक शिकार के लिए ऐसा जुनून उस एक शेर के जितना ही खतरनाक साबित हो सकता है जिसका शिकार किया जाता था, और ऐसा हुआ भी जब अपने किसी शिकार अभियानों में से एक के दौरानएक शेर द्वारा राजा पर हमला किया गया जिसके परिणामस्वरूप महाराज ने एक अंग को खो दिया और जीवन भर के लिए अपंग होकर रह गए (Crooke, 2018)। इन बेहिसाब शिकारों के कारण 1830 तक यहाँ से शेर विलुप्त हो चुके थे (Singh & Reddy, 2016)I

रुडयार्ड किपलिंग अपने 1890 के दशक के बूंदी दौरे के बारे में बताते हैं कि जब अंग्रेज बूंदी आए तो उन्हे सुख महल में ठहराया गया जहां उन्होंने अपनी पुस्तक “किम” के कुछ अंश पूरा किया। उसी दौरान उन्होंने बूंदी के डिस्पेंसरी का दौरा किया, तो उन्होंने एक रजिस्टर पाया (ऑपरेशन बुक) जिसमें अस्पताल में आने वाले लोगों की बीमारियों को अंग्रेजी में सूचीबद्ध किया गया था। उनमें से एक सप्ताह में अक्सर तीन-चार मामले, शेर के काटने के होते थे, जिसे सूची में “लायन बाइट” के तौर पर सूचित किया गया था। जुलोजिकल सटीकता देखने पर उन्होंने इसमें बाघ के काटने की संभावना पाई (Kipling,1899)।

1899-90 में राज्य के बहुत से वन्यजीव, विशेष रूप से चीतल और सांभर जैसी प्रजातियां, एक गंभीर सूखे के कारण मारे गए। हालांकि, आने वाले वर्षों में शिकार पर रोक लगने के बाद, वन्यजीवों की आबादी वापस आ गई। 1960 के दशक में भी, बूंदी में 50 साल पहले जंगलों में पाई जाने वाली सभी प्रजातियों का उचित प्रतिनिधित्व था। लेकिन, 1920 से बूंदी ने बाघों के शिकार के आगंतुकों का स्वागत करना शुरू किया जिससे राज्य ने शिकार का उच्च स्तर अनुभव किया। इस समय तक तत्कालीन शासक, महराओ राजा रघुबीर सिंह, पहले ही लगभग 100 बाघों को मार चुके थे। इस छोटे से राज्य में हर साल औसतन सात बाघ मारे जाते थे। हालांकि पूर्व नियमों के अनुसार बाघिनों के शिकार को हतोत्साहित किया गया था, लेकिन कुछ निजी रिकॉर्डों को देखते हुए, ऐसा प्रतीत होता है कि या तो नियम 1930 के दशक से बदल गए थे या उनका पालन नहीं हो रहा था। हालांकि, शिकार और पर्यावास में परिवर्तन के बावजूद यहाँ 1941 में 75 बाघ थे (Playne, et al.,1922)I

1945 में बाघ शिकार के नियमों में ढील दी गई और कई लोग शिकार के शाही खेल में भाग लेने के लिए शामिल होने लगे। 1950 के दशक में, एक बाघिन ने फूल सागर के आसपास के जंगल में दो शावकों को जन्म दिया। उसी अवधि के आसपास फूल सागर पैलेस में आमंत्रित लोगों के साथ क्रिसमस की शिकार पार्टियां लोकप्रिय हो गईं और 1950 के दशक के अंत से बाघों का अवैध शिकार भी शुरू हुआ। 1952 में, लॉर्ड माउंटबेटन ने बूंदी में दो बाघों का शिकार किया; एक फूल सागर में और दूसरा रामगढ़ में। 1955 और 1965 के बीच, महाराव राजा बहादुर सिंह ने अकेले बूंदी के जंगलों में 27 बाघों का शिकार किया। यहाँ के जंगलों में 1957 से 1967 के बीच नौ बाघों का शिकार अवैध शिकारियों द्वारा किया गया। 1960 के दशक तक बाघ काफी सीमित क्षेत्रों तक ही पाए जाते थे। हालांकि, ये बाघ और बाघ-शिकारियों के लिए बदलते समय थे क्यूँकि वन विभाग ने बाघों के शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया था (Singh & Reddy, 2016)I

1982 में अभयारण्य घोषित होने के साथ इस क्षेत्र कि सुरक्षा और बढ़ी। इस क्षेत्र के बाघों में विशेष रुचि रखने वाले वन रक्षक लड्डू राम के अनुसार, 1983 में रामगढ़ और शिकार्बुरज ब्लॉक के बीच तीन बाघ थे, और 1986 में छह। 1990 में, उनका मानना है कि पूरे इलाके में 11 बाघ थे, जो बिजोलिया, बांद्रा पोल, मांडू और झारपीर में फैले थे- ये सभी रामगढ़ रेंज में हैं (Singh & Reddy, 2016)I

1985 में, लोहारपुरा घाटी में एक बाघ को अवैध रूप से मार दिया गया था। इसके बाद 1991 को एक और ऐसी घटना हुई जब पिपलिया मणिकचौथ में गोरधन की पहाड़ी पर एक और बाघ की मौत हो गई। तत्कालीन उप वन संरक्षक के एल सैनी और रेंज ऑफिसर पूरण मल जाट द्वारा, 23 – 24 जनवरी को शिकारी रंगलाल मीणा को बाघ के शिकार के संदेह में गिरफ्तार किया गया। हालांकि रंगलाल मीणा मोतीपुरा गाँव का एक माना हुआ शिकारी था, लेकिन उक्त शिकार में वह शामिल ना था। उस रेंज के तत्कालीन गार्ड भूरा मीणा कि रंगलाल से आपसी मतभेद के कारण अत्यधिक प्रतारणा के कारण मौत हो गई। हिरासत में मौत होने के कारण इस क्षेत्र में एक उग्र आंदोलन शुरू हुआ। इस आंदोलन का नेतृत्व किया वहाँ के विधायक राम नारायण मीणा ने। आंदोलन में लोगों ने रेंज ऑफिस जला दिया, गार्ड्स को बाहर निकाल दिया, और लगभग डेढ़ साल तक फॉरेस्ट गार्ड्स को अभयारण्य में प्रवेश न करने दिया। अभयारण्य अधिकारियों द्वारा पर्यवेक्षण और सक्रिय प्रबंधन के अभाव में वन्यजीवों की सुरक्षा बुरी तरह से विफल रही।

अभयारण्य कि सुरक्षा में वर्ष 2000 में सहायक वन संरक्षक मुकेश सैनी के नेतृत्व में बढ़ी। प्रारम्भिक अड़चनों के बाद उन्होंने अपनी सूज-बूझ से विधायक राम नारायण मीणा का समर्थन हासिल किया और अभयारण्य में  कोयला बनाने पर रोक लगवाई। इनके बाद उप वन संरक्षक श्रुति शर्मा ने अभयारण्य में कैम्प करके स्वयं कि निगरानी में कई विकास कार्य करवाए।

रामगढ़ के वन:

यहाँ के जंगलों को चैंपियन और सेठ वन वर्गीकरण 1968 के अनुसार उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन श्रेणी में वर्गीकृत किया जा सकता है। जलवायु स्थिति से परे, एडैफिक और बायोटिक कारक मुख्य रूप से इन वनों की संरचना, वितरण और गुणवत्ता का निर्धारण करते हैं। यहाँ के वन खंडों को पूर्णतया धोक (Anogeissus pendula) के वन, धोक के मिश्रित वन, धोक कि झाड़ियाँ, खैर (Acacia catechu) के वन, उष्णकटिबंधीय शुष्क मिश्रित वन, उष्णकटिबंधीय नम मिश्रित वन,घास के मैदान, आदि के रूप में पहचाना जा सकता है (Nawar, 2015)I

धोक के वन में लगभग 80%, Anogeissus pendula पाया जाता है जो कि यहाँ के पहाड़ी क्षेत्रों में अधिक है, Grewia flavescens यहाँ धोक का एक सामान्य सहयोगी है। धोक के मिश्रित वनों में धोक, अन्य पर्णपाती प्रजातियों, जैसे कडाया (Sterculia urens), सालर (Boswellia serrata), पलाश (Butea monosperma), खैर (Acacia catechu), आदि के साथ पाया जाता है। धोक इन वनों कि भी प्रमुख प्रजाति है, सालर और कडाया ढलानों पर मौजूद हैं, जबकि पलाश घाटी क्षेत्रों में आता है। इन जंगलों में Grewia flavescens, Capparis decidua, Cassia tora, Calotropis procera आदि जैसी झाड़ी प्रजातियां भी शामिल है।

यहाँ शुष्क मिश्रित वनों के कुछ पैच भी मौजूद है जिसमें चुरेल (Holoptelea integrifolia), गुर्जन (Lannea coromandelica), पलाश, कड़ाया, धोक के साथ शामिल हैं। बबूल (Acacia nilotica) अवस्था परिवर्तन कालिक क्षेत्रों में और असमान सतहों पर पाया जाता है। नम मिश्रित वनों में Syzygium cumini, Ficus racemosa, Diospyros melanoxylon, Phoenix sylvestris,Flacourtia indica, Mallotus philippensis, Terminalia bellirica and Mangifera indica आदि पाए जाते हैं।  इस तरह के जंगल पानी की धाराओं, झीलों और जलाशयों के आसपास के घाटी क्षेत्रों में आम हैं। जलीय वनस्पतियों में नेलुम्बो न्यूसीफेरा, निमफेया नौचली, अजोला पिनाटा, ट्रापा नटंस, इपोमिया एक्वाटिक, यूट्रीकुलरिया औरिया आदि शामिल हैं।

रामगढ़ के वन्यजीव:

रामगढ़ विषधारी वन्यजीव अभयारण्य रणथंभौर टाइगर रिजर्व के लिए सॅटॅलाइट क्षेत्र के रूप में विस्तारित होने की क्षमता रखता है। यह अभयारण्य रणथंभौर टाइगर रिजर्व से निकले हुए बाघों का पसंदीदा क्षेत्र है। बाघ के अलावा यहाँ मांसाहारी जीवों में बघेरा, भेड़िया, लकड़बग्धा, सियार, लोमड़ी, सियागोश, रस्टी स्पॉटेड कैट, और जंगल कैट आदि पाए जाते हैं।

मानसून के दौरान, अभ्यारण्य में पानी व्यापक होता है जिसके कारण वन्यजीव असुविधाजनक आर्द्रभूमि से बचने हेतु ऊंचाई वाले क्षेत्रों में पलायन करते हैं। अक्टूबर और नवंबर के बाद वे नीचे घाटियों की ओर बढ़ना शुरू करते हैं और बाद में नदियों और नालों वाले क्षेत्रों में। मई और जून के शुष्क और गर्म महीनों के दौरान लगभग सभी जानवर सीमित वाटर हॉलस के पास ही पाए जाते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

शाकाहारी जीवों में हनुमान लंगूर, चीतल, सांभर, चिंकारा, नीलगाय, और खरगोश अच्छी संख्या में हैं और सभी मौसमों में आसानी से देखे जा सकते हैं। सर्वाहारी स्थानपाई जीवों में यहाँ भालू, जंगली सूअर, और इंडियन सॅमाल सिविट पाए जाते हैं। यहाँ नेवले की दो प्रजातियाँ इंडियन ग्रे मोंगूस एवं रडी मोंगूस, चींटीखोर, और साही भी पाए जाते हैं।

वन्यजीव गणना के दौरान रामगढ़ महल के पास जलश्रोतों पर भालू, बघेरा हनुमान लंगूर इत्यादि आसानी से एवं अच्छी संख्या में देखने को मील जाते हैं (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

अभयारण्य में स्थितः रामगढ़ गाँव कई प्रजातियों के सांपों के लिए जाना जाता है, संभवतः इसी कारण इसको विषधारी अभयारण्य कहा जाता है। है। यहाँ पक्षियों किभी काफी विविधता मौजूद हैं जिनमें कई प्रकार के शिकारी पक्षी जैसे भारतीय गिद्ध, बोनेलीज़ ईगल,आदि, विभिन्न प्रजातियों के पैराकीट, ओरिएण्टल व्हाइट आई, गोल्डन ओरिओल, पर्पल सनबर्ड, हरियल, पपीहा, नवरंग, कोयल, येलो थ्रोटेड स्पैरो, सरकीर मालकोहा, बुलबुल, फ्लाई कैचर्स इत्यादि शामिल हैं।

1899-90 में राज्य के बहुत से वन्यजीव, विशेष रूप से चीतल और सांभर जैसी प्रजातियां, एक गंभीर सूखे के कारण मारे गए। हालांकि, आने वाले वर्षों में शिकार पर रोक लगने के बाद, वन्यजीवों की आबादी वापस आ गई। 1960 के दशक में भी, बूंदी में 50 साल पहले जंगलों में पाई जाने वाली सभी प्रजातियों का उचित प्रतिनिधित्व था। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

रामगढ़, रणथंभोर और बाघ:

रामगढ़-विषधारी और रणथंभौर के बीच मौजूदा वन कनेक्टिविटी, हालांकि कमजोर है, लेकिन फिर भी बाघों को इस पारंपरिक मार्ग से पलायन करने में काफी हद तक सहायक है। यह मार्ग बूंदी के उत्तरी हिस्सों में तलवास और अंतर्दा के जंगलों से गुजरता है। 2007 के आसपास, एक युवा क्षणस्थायी बाघ, युवराज, द्वारा रणथंभौर से बूंदी की दिशा में जाने का प्रयास किया गया लेकिन अपने गंतव्य तक पहुँचने से पहले ही सखावडा के पास बच्चू, मूल्या और सक्रमा नाम के तीन शिकारी भाइयों द्वारा उसका शिकार कर दिया गया। अगस्त 2013 में, एक और युवा क्षणस्थायी बाघ, T-62 कि मौजूदगी को तलवास के पास कैमरा ट्रैप द्वारा स्थापित किया गया था। अटकलें यह है कि बाघ रामगढ़-विषधारी वन्यजीव अभयारण्य में पशुधन शिकार पर 2015 की शुरुआत तक रहा और फिर रणथंभौर की दिशा में वापस यात्रा किया।

2017 में भी  एक बाघ, T-91 रणथम्भोर से निकल कर रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में पहुँच गया जिसको लगभग पाँच महीने कि निगरानी के बाद 3 अप्रैल 2018 को मुकंदरा टाइगर रिज़र्व में शिफ्ट किया गया। इसके बाद भी यहाँ 2 बाघों की उपस्थिति दर्ज हुई जिनमें से एक युवा नर T-115 चम्बल के किनारे व दूसरा बाघ T-110 जो कि पहले भी यहाँ अपना इलाका बना चुका है।

बाघ, T-91 रणथम्भोर से निकलकर रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में पहुँच गया जिसको लगभग पाँच महीने कि निगरानी के बाद 3 अप्रैल 2018 को मुकंदरा टाइगर रिज़र्व में शिफ्ट किया गया। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

बाघों द्वारा इस पारंपरिक मार्ग के उपयोग को देखते हुए, जब रणथंभोर में बाघों कि आबादी बड़ी तो बाघ विशेषज्ञ वाल्मीक थापर और वर्तमान प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन सेना प्रमुख) डॉ जी.वी रेड्डी ने रामगढ़ विषधारी अभयारण्य को रणथंभोर के तीसरे डिवीजन के रूप में विकसित करने कि परियोजना पर विचार किया। जिसका प्रस्ताव वाई के साहू के निर्देशन में धर्मेन्द्र खांडल ने तैयार किया।

रणथंभोर के बफर एरिया को, जो कि इन्दरगढ़ के वनों से लेकर रामगढ़ अभ्यारण्य तक को पहले टाइगर रिजर्व के खंड के रूप विकसित करने पर बल दिया गया। प्रस्तावित किया गया कि पूर्ण रूप से विकसित होने के पश्चात रामगढ़ को स्वतंत्र टाइगर रिजर्व घोषित किया जाए। इस प्रस्ताव के पीछे का तर्क था कि रणथंभोर के हिस्सा होने पर विभाग द्वारा संचालित रणथंभौर बाघ संरक्षण फाउंडेशन (RTCF) कि धनराशि को रामगढ़ के विकास के लिए उपयोग किया जा सकेगा।

रामगढ़ का रणथंभोर के तीसरे खंड के रूप में विकसित होने से, डॉ धर्मेन्द्र खांडल के अनुसार, सबसे बड़ा फायदा यह होगा कि बाघों के स्थानांतरण में आने वाली वैधानिक अड़चनें समाप्त हो जाएंगी। आमतौर पर बाघों को एक रिजर्व से दूसरे तक पहुंचाने में कई वैधानिक समस्याएं आती हैं जैसे कि राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण द्वारा स्वीकृति लेना आदि। रणथंभोर का हिस्सा होने से बाघों को आसानी से बिना किसी विलंब के बाघों कि बढ़ती आबादी को रामगढ़ स्थानांतरित किया जा सकेगा।

आज रामगढ़ पुन: अपने गौरवशाली अतीत की ओर अग्रसर हो रहा है। NTCA द्वारा यहाँ रणथम्भौर से 2 बाघों को पुनर्वासित करने की मंजूरी पहले ही दी जा चुकी है। शिफ्टिंग के प्रथम चरण में आने वाली बाधाओं को दूर करने के लिए यहाँ सुरक्षा की दृष्टी से वन्यजीव विभाग ने अतिरिक्त वनकर्मियों को तैनात करने के साथ ही जिन विचरण मार्गो से पूर्व में ‘युवराज’ नाम का बाघ, T-62, T-91 रणथम्भौर से निकलकर रामगढ़ तक पहुंचे थे, को भी दुरुस्त करने का कार्य किया गया है।वन्यजीव संरक्षण में वर्षों से प्रयासरत बूंदी जिले के विट्ठल सनाढ्य,  पृथ्वी सिंह राजावत, ओम प्रकाश “कुकी” आदि जैसे वरिष्ठ संरक्षणवादी, एन.टी.सी.ए. की मन्जूरी के बाद आशा में हैं कि फिर से रामगढ़ में बाघों की दहाड़ गुंजायमान होगी।

 

सन्दर्भ:
  1. Hughes, J. (2013). Animal Kingdoms: Hunting, the Environment, and Power in the Indian Princely States. Permanent Black, Ranikhet.
  2. Crooke, William. (Ed.). (2018). Annals and Antiquities of Rajasthan, v. 3 of 3 by James Tod. eBook, Public domain in the USA. http://www.gutenberg.org/ebooks/57376
  3. Singh, P., Reddy, G.V. (2016). Lost Tigers Plundered Forests: A report tracing the decline of the tiger across the state of Rajasthan (1900 to present), WWF-India, New Delhi.
  4. Rudyard Kipling. (1899).“The Comedy of Errors and the Exploitation of Boondi,” in From Sea to Sea; Letters of Travel, vol. 1 (New York: Doubleday & McClure Company), 151.
  5. Playne, S., Solomon, R.V., Bond, J.V. and Wright, A. (1922). Indian States: A Biographical, Historical and Administrative Survey. Asian Educational Services, New Delhi.
  6. Nawar, K. (2015). Floristic and Ethnobotanical Studies ofRamgarh Vishdhari Wild Life Sanctuary ofBundi (Rajasthan). A THESISSubmitted for The Award of Ph.D. Degreein The Faculty of Science ofUNIVERSITY OF KOTA, KOTA., pg. 64.

 

 

 

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व – राज्य में बाघ संरक्षण का नवविहान

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व – राज्य में बाघ संरक्षण का नवविहान

मुकुन्दरा के संरक्षण के पहिये में तब स्पंदन आया, जब रणथम्भोर से मीलों की दूरी तय कर के आये एक बाघ – “ब्रोकन टेल” की वर्ष 2003 में भारतीय रेल से हुई टक्कर में मृत्यु हो गयी। किसी ने सोचा ना था रणथम्भोर और मुकुन्दरा में कोई गलियारा अब भी बचा है। इस बाघ ने लोगों को एक विचार दिया, की मुकुन्दरा को बाघों के लिए एक सुरक्षित स्थल बनाया जा सकता है। यहाँ के लोगों ने अपने प्रयासों से इसे टाइगर रिज़र्व बनवाकर इस दिशा में एक महत्वाकांक्षी कदम बढ़ाया है।

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व हाड़ौती में स्थित राजस्थान का तीसरा बाघ संरक्षित क्षेत्र है जो कि हाड़ौती के तीन जिलों – कोटा, बूंदी, झालावाड़ और मेवाड़ के चित्तौड़गढ़ में विद्यमान है। चारों ओर घने जंगलों से घिरा हाड़ौती क्षेत्र चम्बल, काली सिन्ध, पार्वती, परवन जैसी बड़ी व अनेक छोटी-छोटी सदावाही नदियों के कारण जल समृद्ध है। इन नदियों के किनारे कहीं ऊंचे पर्वत, कहीं गहरी घाटियां और बीहड़ जंगल हैं। विंध्यन पर्वतमाला के पहाड़ी मैदान और मालवा पठार से जुड़े होने के कारण यह एक पहाड़ी क्षेत्र है जिसमें मुख्य पर्वत दरा या मुकुन्दरा हिल्स है।

यह रिजर्व कोटा के दक्षिणी भाग पर एक रेखाकारित (linear) वन क्षेत्र है जो चित्तौडगढ़ में, भैंसरोडगढ़ अभयारण्य के पास स्थित श्रीपुरा गाँव से बाडोली होते हुए दक्षिण-पूर्वी दिशा कि तरफ झालावाड़ के गागरोन में परवन और आहू नदियों के संगम तक विस्तृत है। यह वन क्षेत्र मुख्यतः दो समान्तर संकीर्ण रूप से 80 किलोमीटर कि लंबाई में फैली पर्वतमाला के रूप में है। मुकुन्दरा हिल्स कि समुद्र तल से औसत ऊंचाई 300 मीटर जो चाँद बावडी नामक स्थान पर 517 मीटर की उच्चतम ऊंचाई प्राप्त करता है। इन दोनों पर्वतमालाओं के बीच में सघन और सुन्दर वन हैं जो कई प्रकार के वन्यजीवों के लिए जाने जाते हैं। राजस्थान सरकार द्वारा इन घने जंगलों एवं वन्यजीवों को संरक्षित करने के लिए इन्हें वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया गया जिनको दरा और जवाहर सागर वन्यजीव अभयारण्य के नाम से जाना गया।

मुकुन्दरा का इतिहास एक झलक में

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व की पृष्ठ भूमि में कोटा का अत्यन्त प्राचीन एवं गौरवशाली इतिहास छिपा है। इस क्षेत्र में आदिम युगीन बस्तियों का प्रसार चम्बल अथवा चर्मण्यवती नदी के किनारे हुआ जिससे मुकुन्दरा हिल्स को आदि मानव की शरणस्थली होने का गौरव प्राप्त हुआ। मुकुन्दरा कि पहाड़ियों में बनी प्राकृतिक गुफाओं में आदिम युगीन मानव के कुछ शैल चित्र खोजे गये हैं जिनमें आदिम युगीन जीवन शैली को दर्शाया गया है साथ ही विभिन्न प्रकार के जीवों कि कई आकृतियाँ भी उकेरी गई हैं। ये शैलचित्र युक्त गुफाएँ चम्बल किनारे पहाड़ियों, नारसिंही माताजी, जवाहर सागर बांध, गैपरनाथ, गराडिया महादेव, दरा और कोलीपुरा स्थितः “डाकन का टोल” पर देखे जा सकते हैं। (Sharma, 2017)

Rock Painting - Mukundara

आदिम युगीन जीवन शैली को दर्शाता “डाकन का टोल” पर स्थितः शैलचित्र (फ़ोटो: प्रवीण कुमार)

शैल चित्रों के अलावा यहाँ कुछ प्राचीन शैल आकृतियाँ भी मिली हैं। ब्रिटिश राजनैतिक अभिकर्ता और खोजकर्ता जेम्स टॉड ने 1820 के दशक में 5वीं शताब्दी की एक खंडहर संरचना, “भीम की चौरी” का पता लगाया था। टॉड ने अपने एनल्स एंड एंटीक्विटीज़ ऑफ राजस्थान नामक पुस्तक में उल्लेख किया है कि 17वीं शताब्दी में कोटा के एक शासक ने इसके पास ही एक नई हवेली या कोठी बनाने के लिए इसके पत्थरों का इस्तेमाल किया था। 1998 में, इस हवेली के परिसर में एक खोज के दौरान मकरप्रणाल के रूप में नक्काशी की गई एक प्राचीन आकृति मिली। (Narayan & Mankodi, 2010)

मुकुन्दरा में दो महत्त्वपूर्ण रियासत कालीन गाँव भी हैं। गिरधरपुरा गाँव कोटा राज्य के बसने के पहले से अस्तित्व में है जो कि एक टकसाल हुआ करता था और यहाँ अदालत भी बैठती थी। आज भी गाँव में जगह-जगह प्राचीन मंदिर, बावडी और मकान देखे जा सकते है। दूसरा गाँव है मंदिर गढ़। इतिहासकार डॉ फिरोज अहमद के अनुसार इस गाँव को मालवा के शासक राजा नर बरमन ने बारहवीं सदी में बसाया और कई मंदिर बनवाए इसलिए इसे मंदिर गढ़ कहा जाता है। वहीं कुछ लोगों का मानना है कि इसका नाम महेंद्र भील के नाम पर महेंद्रगढ़ रखा गया था जो कालांतर में मंदिर गढ़ के नाम से जाना जाने लगा। इस गाँव के मंदिरों को मुग़ल शासकों द्वारा खंडित कर दिया गया था। खंडित मूर्तियाँ जगह-जगह ज़मीन में गड़ी हुई देखी जा सकती हैं।

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व में ऐतिहासिक महत्व के कई किले भी शामिल हैं जिनमें सबसे महत्त्वपूर्ण है गागरोन का किला। युनेस्को विश्व विरासत गागरोन किला झालावाड़ से 10 किमी दूर काली सिंध नदी और आहु नदी के संगम पर स्थित है। तीन ओर से आहू और काली सिंध के पानी से घिरा हुआ यह एक जलदुर्ग एवं गिरीदुर्ग है। किला विंध्य हिल रेंज की सीधी खड़ी चट्टानों पर एक पठार के पूरे खंड को कवर करता है। किले में तीन परकोटे है जबकि राजस्थान के अन्य किलो में दो ही परकोटे होते है। इसके दो प्रवेश द्वार है जिनमे से एक पहाड़ी की तरफ खुलता है तो दूसरा नदी की तरफ। नदी के किनारे, 93.6 मीटर की ऊँचाई पर सीधी खड़ी पहाड़ी, गिध-कराई किले को दुर्गम बनती थी जिसका निष्पादन (फांसी का दंड) के लिए भी उपयोग किया जाता था। इस किले का निर्माण बारहवीं सदी में डोड परमार शासकों द्वारा करवाया गया था, जो बाद में खींची (चौहान) शासकों के शक्ति केन्द्र के रूप में विख्यात हुआ। (UNESCO Addendum, 2013)

विश्व विरासत होने के साथ ही ये दुर्ग हीरामन तोते के लिए भी जाना जाता है जिसे यहाँ गागरोनी तोता (Alexandrine parakeet – Psittacula eupatria) कहा जाता है। गागरोनी तोता पुराने समय में यहाँ हजारों कि संख्या में पाए जाते थे जो अब अज्ञात कारणों से बहुत कम रह गए हैं।

कोटा शहर चंबल नदी के दाहिने किनारे पर राजस्थान के दक्षिण-पूर्वी भाग में स्थित है, जिसे हाड़ौती या हाड़ाओं की भूमि के रूप में जाना जाता है। ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार कोटा की स्थापना तात्कालिक बूंदी महाराज समर सिंह के पुत्र जेटसी द्वरा भील सरदार ‘कोट्या’ को 1264 के एक युद्ध में मार कर की गयी। कोट्या भील चंबल नदी के निकट स्थित अकेलगढ़ का शासक था जिसके किले के अवशेष आज भी उपस्थित है। जेटसी का पुत्र सुरजन, कोट्या की वीरता से प्रभावित था तथा इस भीलों के राज्य का नाम कोटा रख दिया। संभवतः कोटा एक-मात्र नगर है जो किसी विजयी के स्थान पर पराजित व्यक्ति के नाम पर बना है। (Crooke, 2018)

तत्कालीन कोटा राज्य बूंदी, जयपुर, मेवाड़, झालावाड़, टोंक और मध्य प्रदेश की रियासतों से घिरा हुआ था। यह सभी राजपूताना रियासतों के सबसे बड़े जंगलों में से एक था, जो 1900 के शुरुआती भाग में लगभग 3600 वर्ग किमी के क्षेत्र को आच्छादित किये हुए था। इन वनों में विभिन्न प्रकार के बड़े मांसाहारी जीव जैसे बाघ, बघेरा, भालू, लकड़बग्धा और भेड़िये शामिल थे। शाकाहारी वन्यजीवों में सांभर, चीतल, चौसिंघा, नीलगाय और जंगली सूअर भी इन वन खंडों में पाए गए थे। बोराबास विशेष रूप से चीतल समृद्ध होता था जहाँ कभी एक झुण्ड में 500 से अधिक चीतल दिखाई देते थेl कोटा के आसपास काले हिरण और जंगली सुअर आम थे। (Singh & Reddy, 2016)

प्राकृतिक सौन्दर्य और वन्यजीवों का स्वछन्द विचरण यहाँ के शासकों को आखेट के लिए आकर्षित करता था। लेकिन मालवा पठार से लगा हुआ दरा का विस्तृत पहाड़ी क्षेत्र भौगोलिक दृष्टि से दुर्गम क्षेत्र था। जिसको आसानी से केवल दर्रा की नाल (दरा) से होकर ही पार किया जा सकता था। चित्तौड़ से झालावाड़ जाने के लिए यह एकमात्र मार्ग था जो कि कोलीपुरा से 38 किलोमीटर दूर था। यह क्षेत्र कोटा रियासत के द्वितीय शासक राव मुकुन्द का पसंदीदा आखेट क्षेत्र था, राव मुकुन्द की इस क्षेत्र में अत्यधिक रुची होने के कारण दरा कि पहाड़ियों का नाम मुकुन्द दरा पहाड़ियां रख दिया गया था, जिसे कालांतर में मुकुन्दरा (मुकुन्दरा हिल्स) के नाम से जाना गया। टाईगर रिजर्व का नाम पहले राजीव गांधी टाइगर रिजर्व प्रस्तावित था लेकिन इसके मुख्यतः मुकुन्दरा हिल्स पर होने के कारण और दरा के ऐतिहासिक महत्व से प्रेरित होकर मुकुन्दरा हिल्स टाईगर रिजर्व रखा गया है।

राव मुकुन्द अक्सर मुकुन्दरा हिल्स क्षेत्र में आखेट के लिए शिविर आयोजित किया करते थे तथा इस प्रयोजन हेतु राव मुकुन्द ने दरा में महल का निर्माण कराया। यह महल, दरा महल या शिकारगाह के नाम से जाना जाता है जिसे प्रायः जानकारी के अभाव में कई लोग अबली मीणी का महल समझते हैं। जबकि अबली मिणी का महल दरा महल से कुछ ही दूर पहाड़ी पर राव मुकुन्द सिंह द्वारा खैराबाद की रहने वाली उनकी ख्वास अबली मिणी के लिए बनवाया गया था।

राव मुकुन्द सिंह (1648-1658)

मुग़ल बादशाह जहाँगीर द्वारा दरा के क्षेत्र (तत्कालीन खैराबाद के निकट) में सन् 1605 से 1627 ईस्वी के बीच शिकार का वर्णन तुज़्क-ए-जहाँगीरी (जहाँगीर की जीवनी) में किया गया हैं जिसके अलग-अलग अनुवादकों के अलग-अलग वर्णन मिलते हैं। अनुवादक अलेक्जेंडर रोजर के अनुवाद में जहाँगीर को एक शिकार यात्रा के दौरान शिकार शिविर के पास सड़क पर 14  सैंडग्राउस, 3 हेरोन, नीलगाय आदि के शिकार का वर्णन है। उसी शिविर के दौरान बादशाह ने घिरी गाँव के पास एक बब्बर शेर के होने कि खबर पाकर शिकार किया। जैसा कि बब्बर शेर की बहादुरी  स्थापित थी, बादशाह उसकी आंतों को देखना चाहता था तथा उन्हें निकाले जाने पर पाया कि अन्य जानवरों के विपरीत शेर के पित्ताशय उनके जिगर के भीतर थे। बादशाह जहांगीर को लगा शायद शेर इस कारण से साहसी होते है, जबकि असलियत में शेर के पित्ताशय अन्य जानवरों के समान ही होते हैं। (Roger, 2016)

थैक्सन के अनुवाद के अनुसार इस यात्रा के दौरान बादशाह ने 3 हेरोन, नीलगाय, चौसिंघा और बाघ का शिकार किया था। यहाँ यह विचारनिए है कि उल्लेखित हेरोन कि जगह वहाँ सारस या अन्य कोई पक्षी भी हो सकता है। बादशाह के शिकार का विवरण दर्शाता है कि यहाँ बाघ और शेर पाए जाते थे। (Thackston, 1999)

कोटा के कई लघु चित्रों में शेर और चीता शामिल हैं जो यहाँ इनके अस्तित्व को दर्शाते है। चित्रों के आधार पर, कोटा में 18वीं शताब्दी तक शेर थे। 1695-1707 ईस्वी कि एक उत्कृष्ट तस्वीर में कोटा के महाराव राम सिंह I को मुकुन्दरा में शेरों का शिकार करते चित्रित किया गया है। इस तस्वीर में राव राम सिंह I को चार महिलाओं के साथ मचान पर बैठा दिखाया गया है। (Anupama Thakur, 2009)

रामसिंह प्रथम ने दरा के पास ही वर्तमान रावंठा गाँव में एक महल बनवाया था जो कि ब्रिटिश सरकार के राजनीतिक अभिकर्ता कर्नल टॉड के अनुसार पिंडारियो के विरुद्ध युद्ध के समय अक्सर उपयोग में लिया जाता था। उस दौरान यहाँ पर बहुत सघन जंगल थे जिसकी वजह से कालांतर में इस महल को शिकारगाह के रूप में विकसित किया गया, पूर्व में महल का नाम महाराव राम सिंह के नाम पर रामठा महल था, परंतु कालांतर में इसे रावंठा महल के नाम से जाना जाने लगा। राव रामसिंह ने इस महल के पास ही दो पहाड़ियों के बीच एक पक्का बाँध बनाकर एक तालाब का भी निर्माण कराया था, जिसे रामसागर के नाम से जाना जाता है। इस तालाब के भीतर एक जनाना तथा एक मर्दाना दो शिकार मालाओं का निर्माण कराया गया था। ये शिकारमाले दर्शाते हैं कि उस समय महिलायें भी शिकार में रुचि रखती थीं तथा महाराज के साथ आखेट पर जाया करती थी।

रामसागर तालाब के भीतर मौजूद जनाना माला एवं मर्दाना माला (फ़ोटो: हरी मोहन मीना)

उस जमाने में इस रामसागर से एक पक्का धौरा (नाली) भी बनवाया गया था, जिससे आस-पास के क्षेत्र में सिंचाई के लिये पानी लिया जाता था। इसके अलावा झामरा, बेवडा तलाई, गड्ढे का माला, करौंदी कंजार के माले भी शिकार के लिए बनवाए गए शिकारमाले में शामिल है। ऐसा माना जाता है कि महाराव उम्मेद सिंह द्वितीय के शासनकाल के दौरान कोटा रियासत में 150 शिकारमाले हुआ करते थे जहां से वे प्रतिवर्ष 4-5 बाघों का शिकार किया करते थे। (Singh & Reddy, 2016)

शेवदर गंगेयाजी द्वारा चित्रित एक तस्वीर में महाराज दुर्जन साल और जसवंत सिंह को एक सुंदर हरे भरे जंगल में शेर के परिवार देखते हुए दर्शाया गया है जो एक शेर परिवार के साथ उनकी मुठभेड़ को दर्शाता है। 1784 में जोशी हथुवा की एक पेंटिंग में अलनिया के जंगलों में महाराज उम्मेद सिंह प्रथम (1771-1819) को शिकार करते हुए दिखाया गया है। (Thakur, 2009)

कोटा के जंगलों में ढोल (जंगली कुत्ते) भी पाए जाते थे। इन जंगलों में इनको 1920 तक देखा गया जब बीकानेर के महाराजा गंगा सिंह ने बोरबन (संभवतः बोराबास) में एक को देखकर अपनी डायरी में नोट किया, निश्चित रूप से तब भी यह दुर्लभ रहा होगा।

आधुनिक भारतीय शासक अपने शिकार में सैन्य टुकड़ी को भी शामिल किया करते थे जिससे उनकी सेना युद्ध के लिए तैयार हमेशा तयार रहे। उन्नीसवीं सदी की शुरुआत में कोटा राज्य से ढेरों सैन्य टुकड़ी के शिकार में शामिल होने कि गतिविधियों को जेम्स टॉड ने “ए स्पीशीज़ ऑफ पेटी वार” के रूप में चित्रित किया था। (Hughes, 2009)

दरा हमेशा से बाघों का पर्यावास रहा है, 1950 तक कोटा के अधिकतर जंगलों में बाघ पाए जाते थे, जो शिकार के कारण कोटा से विलुप्त हो गए। प्रिया सिंह और डॉ जी वी रेड्डी कि एक रिपोर्ट के अनुसार 1950 – 60 के दशक के दौरान हाड़ौती क्षेत्र में 100 बाघों का शिकार हुआ। 1960 के दशक तक बाघ सिर्फ दरा जैसे जंगलों तक सीमित रह गए, जिसके बाद आबादी घटती गई और 1984 में छीपाबड़ौद क्षेत्र में एक अवयस्क बाघ कि स्थानीय शीर्षस्थ स्टेशन अधिकारी द्वारा तुरंत गोली मारकर हत्या करने के बाद लुप्त हो गई।

मुकुन्दरा के वन:

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व के पहाड़ी इलाके, घाटियां और नदी-नाले इस क्षेत्र में समृद्ध जैव-विविधता को बनाए रखते हैं। यहाँ के जंगलों को चैंपियन और सेठ वन वर्गीकरण 1968 के अनुसार 2 व्यापक वन श्रेणियों में वर्गीकृत किया जा सकता है, उष्णकटिबंधीय कांटेदार वन और उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वन।

धोक (Anogeissus pendula) यहाँ के जंगलों में मिलने वाला मुख्य वृक्ष है, धोक के बाद यहाँ पलाश (Butea monosperma), तेंदू (Diospyros melanoxylon), कड़ाया (Sterculia urens) यहाँ के अधिकांश पहाड़ी क्षेत्रों में पाए जाते हैं। बारिश के दिनों में, काले और सफेद धोक (Anogeissus pendula & A. latifolia) के पेड़ पहाड़ियों को हरियाली देते हैं। शुष्क ग्रीष्मकाल में, पलाश और सेमल अपने फूलों की लाल आभा देकर आकर्षक छटा प्रदान करते हैं।

Wetland - Mukundara

मुकुन्दरा के कई नम-भूमि क्षेत्रों के पास अर्जुन, जामुन बहेड़ा, आदि के छोटे समूह पाए जाते हैं।

करोंदा (Carrisa congesta), गुरजन (Lannea coromandelica), बहेड़ा (Terminalia bellirica), सालर (Boswellia serrata), अमलतास (Cassia fistula), बांस (Dendrocalamus strictus), महुआ (Madhuca indica), बील (Aegle marmelos), बबूल, जामुन (Syzygium cumini), पीपल (Ficus religiosa), बरगद (Ficus benghalensis), नीम (Azadirachta indica), इमली (Tamarindus indica), आम (Mangifera indica) आदि के पेड़ इस वन क्षेत्र में प्रचुर मात्रा में है। अर्जुन (Terminalia arjuna), दूधी (Wrightia tinctoria) और कदंब (Mitragyna parviflora)  भी नम स्थलों और धाराओं में पनपते हैं।

यहाँ कई जगह छोटे भाग में धोक, धावडा, अर्जुन, असान (Terminalia tomentosa), हरड़ (Terminalia chebula), सिरस (Albizia lebbeck), शीशम (Dalbergia spp.), चुरेल (Holoptelea integrifolia) आदि और इनके सहयोगी मिश्रित विविध वन बनाते हैं।

कांटेदार वनों का विस्तार तुलनात्मक रूप से कम दिखाई देता है, इन वनों में खैर (Acacia Senegal), रोंज (Acacia leucophloea), कैर (Capparis decidua), गोया खैर (Dichrostachys cinerea), डंडा ठोर (Euphorbia neriifolia), गुलाबी बबूल (Mimosa hamata) आदि पाए जाते हैं।

कई दुर्लभ पौधों की प्रजातियाँ जैसे सर्पडंडी (Adansonia digitata), खेजरी (Prosopis cineraria), गूगल (Commiphora mukul), विजयसार (Petrocarpus marsupium) जंगली केला (Ensete superbum), उपरारोही और थलीए ऑर्किड जैसे वांडा (Vanda tessilata), Aerides, नर्विलिया (Nervilia araguna), कंदिल पौधे जैसे प्यूरीया (Puraria tuberilata), Corallocarpus epigeous, आरिसेमा (Arisema torusum), हल्दी (Curcuma longa) आदि जैसे पौधे भी मुकुन्दरा में पाए जाते हैं। (Dadhich, 2002)

मुकुन्दरा के वन्यजीव:

यह एक सुखद बात है कि बाघ एक बार फिर से इस क्षेत्र में एक प्रमुख आकर्षण बन चुके हैं। बाघों के अलावा मुकुन्दरा अन्य वन्यजीवों के लिए भी जाना जाता है। यहाँ मांसाहारी जीवों में बघेरा, भेड़िया, लकड़बग्धा, सियार, लोमड़ी  और जंगल कैट आदि पाए जाते हैं।

शाकाहारी जीवों में हनुमान लंगूर, चीतल, सांभर, चिंकारा, नीलगाय, और खरगोश अच्छी संख्या में हैं और सभी मौसमों में आसानी से देखे जा सकते हैं। सर्वाहारी स्थानपाई जीवों में यहाँ भालू, जंगली सूअर, और इंडियन सॅमाल सिविट पाए जाते हैं। यहाँ कई जगह नेवले, चींटीखोर, और साही भी पाए जाते हैं। यहाँ सरीसृपों कि 18 प्रजातियाँ पाई जाती है जिनमें भारतीय अजगर यहाँ मिलने वाला सबसे बड़ा सरीसृप है। (Sultana, 2007)

मुकुन्दरा से पक्षियों की 225 से अधिक प्रजातियां अनुमानित कि गई हैं। जिनमें कई प्रकार के शिकारी पक्षी, उल्लू, सारस क्रेन, क्रेस्टेड सरपेंट, ईगल, शॉट टोड ईगल, पैराडाइज फ्लाई कैचर, इंडियन पिट्टा, विभिन्न प्रजातियों के पैराकीट, प्रिनिया,  नाइटजार, स्टॉर्क बिल्ड किंगफिशर, और मुनिया आदि विशेष आकर्षण के केंद्र हैं।

गागरोन के पास स्थितः लक्ष्मीपुरा और नोलाव के तालाब, गिरधरपुरा के छोटे और बड़े तालाब, श्रीपुरा का तालाब मुकुन्दरा के कुछ महत्त्वपूर्ण आर्द्रभूमि के रूप में प्रवासी पक्षियों का पर्यावास बनाते हैं जहां सर्दियों में हजारों कि संख्या में पक्षी देखे जा सकते हैं। इनके अलावा कडप का खाल में मगर और कछुए देखे जा सकते हैं।

Felis Chaus - Mukundara

सावनभादों बांध के पास जंगल कैट (Felis chaus) को आसानी से देखी जा सकता है।

मुकुन्दरा के सावन भादों बांध में लगभग 80 मगरमच्छ वन विभाग ने छोड़े हैं, जो कि एक बाघ प्रयवास के लिए गलत निर्णय साबित हो सकता है। इस बांध पर कई प्रकार के शिकारी पक्षी देखे जा सकते है, यह प्रवासी गिद्धों  का फीडिंग ग्राउन्ड है। यहाँ जंगल कैट (Felis chaus) भी आसानी से देखी जा सकती है।

दक्षिण-पूर्व एशिया की सबसे बड़ी लुप्तप्राय लॉंग बिल्ड वल्चर कि कालोनी चंबल की लहरदार घाटियों में स्थित है। इन वल्चरस को गैपरनाथ और गराडिया कि कराइयों के पास आसमान में उड़ान भरते देखा जा सकता है। मुकुन्दरा रिजर्व के चम्बल नदी में चिकने फर वाले उदबिलावों को बार-बार कूदते हुए देखा जा सकता है। ये सुबह से शाम के समय बहुत सक्रिय रहते हैं और मानवों के हलचल को महसूस करते ही जोर-जोर से शोर करने लगते हैं। यहाँ कई घंटों तक मगर को बिना हिले डुले घूप सेकते हुए नदी के किनारे और नदी के बीच चट्टानों देखा जा सकता है।

बाघ संरक्षित क्षेत्र होने का सफर:

कोटा के आम जनों का ध्यान मुकुन्दरा हिल्स के टाइगर रिजर्व बनने कि संभावनाओं पर वर्ष 2003 में केंद्रित हुआ जब उन्होंने एक बाघ को अपने वन क्षेत्र में मृत पाया। उस समय किसी ने भी नहीं सोचा होगा कि एक अकल्पनीय मेहमान उनके वनों कि परिभाषा बदल देगा।

2002 में, जब रणथम्भोर प्रबंधन रिजर्व से निकले एक बाघ को खोजने की कोशिश कर रहा था, तब दरा से खबर आई कि कुछ लोगों ने बाघ के पैरो के निशान देखे। पहले तो दरा में बाघ की मौजूदगी की संभावना को खारिज कर दिया गया था, लेकिन पगमार्क के सबूत मौजूद थे। 15 जुलाई 2003 को एक दिल दहला देने वाले दृश्य ने इस रहस्य को सुलझा दिया जब रात में एक बाघ द्रुतगामी राजधानी एक्सप्रेस की चपेट में आने से दरा रेलवे ट्रैक के पास मृत पाया गया। उस मृत बाघ कि पहचान उस समय नहीं हो पाई थी, वन विभाग उसे मध्य प्रदेश से आया हुआ बाघ बात रहा था। वहीं दूसरी ओर रणथम्भोर से निकला बाघ अभी तक लापता था। (Khandal et al., 2014)

Broken Tail

वन्यजीव प्रेमी श्री रवींद्र सिंह तोमर द्वारा 2003 मे लिया गया ‘ब्रोकन टेल’ के रेल दुर्घटना मे मारे जाने के बाद का चित्र जिसने दरा के वनों कि परिभाषा बदलने मे महत्त्वपूर्ण योगदान दिया।

पूरी कहानी आखिरकार अप्रैल, 2005 में सामने आई, जब वन अधिकारियों ने रणथम्भोर के लापता बाघ ‘ब्रोकन टेल’ कि तस्वीर का मिलान मृत बाघ कि तस्वीर से किया। दरा में पाया गया मृत बाघ ‘ब्रोकन टेल’ ही था यह स्थापित हो चुका था। ‘ब्रोकन टेल’ रणथम्भोर से 140 किमी की दूरी तय करके यहाँ पहुँचा था। वह घटना आज भी कोटा के वन्यजीव प्रेमी श्री  रवींद्र सिंह तोमर की आंखों में सुस्पष्ट है। इन्होंने ही उस ऐतिहासिक चित्र को अपने कैमरे में कैद किया जिसने बाघ का दुखद अंत दिखाया। मुकुन्दरा हिल्स को राज्य का तीसरा बाघ अभयारण्य बनाने में उस तस्वीर का अहम योगदान है।

इस दुर्घटना में ‘ब्रोकन टेल’ की मृत्यु के बाद बाघों के जीवन की ऐसी समस्याएँ सामने आईं जिसके बारे में किसी ने कभी नहीं सोचा था – बाघों को अधिक स्थान और आसपास के बाघ पर्यावास (habitat) के साथ संयोजकता (corridor) की आवश्यकता है।  वन विभाग ने इस तथ्य को स्थापित किया कि ‘ब्रोकन टेल’ ने कोटा पहुंचने के लिए विभिन्न पहाड़ी मार्गों का उपयोग किया। फिल्म निर्माता कोलिन स्टैनफोर्ड जॉनसन द्वारा ब्रोकन टेल पर निर्मित एक डॉकउमेन्टरी ने साक्ष्य एकत्र किए और साबित किया कि कोटा तक जाने के लिए बाघ ने पहाड़ी गलियारे का उपयोग किया। ‘ब्रोकन टेल’ द्वारा इस्तेमाल किया गया सटीक मार्ग हमेशा एक रहस्य रहेगा लेकिन एक अन्य बाघिन (टी -35) इस संबंध में अधिक प्रकाश डालती है।

यह अक्सर माना जाता है कि केवल बाघ ही रणथम्भोर से बाहर निकलते हैं लेकिन इस बाघिन ने इस धारणा को गलत साबित किया। टी -35 मूल रूप से रणथम्भोर के गिलई सागर क्षेत्र से थी जो बाहर निकलकर कोटा – सुल्तानपुर क्षेत्र में दिसम्बर 2009  में पाई गई। यह बाघिन मार्च 2016 में खेवड़ा गांव के पास मृत पाए जाने तक इस क्षेत्र में रही।

टी -35 के बाद, रणथम्भोर से एक और बाघ टी – 98 निकला जो आश्चर्यजनक रूप से सुल्तानपुर के जंगलों से होते हुए दरा पहुँचा। नियमित अंतराल पर बाघों का आना साबित करता रहा है कि यह इलाका बाघों के लिए उपयुक्त है जिसे सरिस्का, रथम्भौर, बूंदी और कोटा को मध्य प्रदेश से जोड़ने वाला एक बड़ा गलियारा (corridor) बनाया जा सकता है। मुकुन्दरा को रणथम्भोर से कम से कम दो संभावित गलियारे जोड़ते हैं – एक इंद्रगढ़ के माध्यम से – लाखेरी –  रामगढ़ विषधारी अभयारण्य – डाबी – जवाहर सागर अभयारण्य और दूसरा चंबल और कालीसिंध नदियों से गागरोन होते हुए दरा तक।

इन घटनाओं से प्रभावित होकर तथा रणथम्भौर में बाघों की बढ़ती आबादी और मुकुन्दरा को रणथम्भौर के एक उपग्रह कोर क्षेत्र के रूप में विकसित होने की क्षमता को देखते हुए राजस्थान सरकार ने 9 अप्रैल 2013 को अधिसूचना जारी करके मुकुन्दरा को एक बाघ आरक्षित क्षेत्र घोषित किया। मुकुन्दरा हिल्स के टाइगर रिजर्व बनने में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंदरा राजे के प्रयास और बाघ विशेषज्ञ वाल्मीक थापर कि सलाह उल्लेखनीय है। ऐसा भी नहीं है कि ये फैसला अचानक लिया गया हो, दरा के वन क्षेत्र को मुकन्दरा टाइगर रिजर्व बनाने का सफर सरकारी स्तर पर 1988 में तत्कालीन वन विभाग के अधिकारियों द्वारा शुरू किया जा चुका था। इसे जवाहर सागर से जोड़ कर विस्तृत राष्ट्रीय उद्यान बनाने की अवधारणा कुछ अधिकारियों कि थी तथा इसका प्रारूप बनाकर राज्य सरकार को प्रस्ताव भेजा गया। संभवतः इन्हीं प्रयासों का नतीजा था कि 2004 में दरा को मुकन्दरा राष्ट्रीय उद्यान घोषित किया गया।

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व का मानचित्र (राजस्थान बाइओडाइवर्सटी ऑर्ग, प्रवीण कुमार)

2013 कि अधिसूचना के अनुसार दरा अभयारण्य, जवाहर सागर अभयारण्य, और मुकुन्दरा राष्ट्रीय उद्यान के क्षेत्रों को सम्मिलित करके मुकुन्दरा देश का बयालीसवाँ टाइगर रिजर्व बना। जिसका कुल क्षेत्र 755.99 वर्ग किलोमीटर है। इसमें 417.17 वर्ग किलोमीटर क्रिटिकल टाइगर हैबिटैट (कोर एरिया) और 342.82 वर्ग किलोमीटर बफर एरिया है। कोर एरिया दर्रा वन्यजीव अभयारण्य और जवाहर सागर वन्यजीव अभयारण्य को बनाया गया है। चार नदियां चम्बल, काली सिंध, आहू और आमझर इसकी सीमा निर्धारित करती हैं।

मुकुन्दरा में बाघों कि वापसी:

मुकुन्दरा हिल्स के टाइगर रिजर्व बनने में तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के प्रयास और बाघ विशेषज्ञ वाल्मीक थापर कि सलाह उल्लेखनीय है। मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व में बाघों कि वापसी के लिए काम 2016 में राजस्थान के तात्कालिक मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक डॉ जी वी रेड्डी कि निगरानी में शुरू हुआ। शुरुआत में NTCA के निर्देशानुसार बाघों के पुनर्वास के लिए शेलजर को उपयुक्त मानते हुए अहाता (enclosure) बनाया गया, लेकिन राजस्थान स्टेट वाइल्ड्लाइफ बोर्ड कि स्टैन्डींग कमिटी ने दरा के वनों को उपयुक्त मानते हुए बाघ पुनर्वासित करने के निर्देश दिए। दरा के वनों को रक्षित करने का कार्य श्री एन सी गोयल के निगरानी में हुआ। दरा के इस वन को चारों तरफ 12 फुट कि दीवार से सुरक्षित करके बाघ के लिए एनक्लोजर बना लगभग 400 जानवर बाघ के शिकार के आधार के रूप में छोड़े गए, जिनमें ज्यादातर चीतल शामिल थे। बाघ को नई जगह के अनुकूल बनाने के लिए पहले एंकलोजर में और फिर बाघ के सामान्य व्यवहार के संकेत दिखने पर बाहर स्थानांतरित कर दिया जाना तय हुआ।

सारी तैयारियों के बावजूद मुकुन्दरा में किस बाघ को भेजना है यह तय नहीं हो पा रहा था, इसी बीच रणथम्भोर से एक बाघ (टी – 91) निकलकर बूंदी के रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में पहुँच गया था जिसको ट्रैक करना मुश्किल हो रहा था। वन विभाग और रणथम्भोर में बाघों के संरक्षण के लिए काम कर रही संस्था, टाइगर वॉच कि टीम लगभग पाँच महीने संयुक्त रूप से काम करके इस बाघ को ट्रैक कर रहे थे। ट्रैकिंग के दौरान पता चल कि बाघ जंगल छोड़कर लगातार आबादी वाले क्षेत्रों कि तरफ बढ़ रहा था। नतीजतन, स्थानीय लोगों में घबराहट की भावना थी और बाघ को शिकारियों से शिकार का खतरा भी था। तय हुआ कि इस बाघ को मुकुन्दरा में स्थानतारित किया जाएगा।

आखिरकार, 3 अप्रैल 2018, को वर्षों के इंतज़ार के बाद, मुकुन्दरा को पहला बाघ टी -91 के रूप में मिला। निर्धारित तारीख को वन विभाग की एक टीम द्वारा बूंदी के रामगढ़ विषधारी अभयारण्य में टी-91 को ट्रेंकुलाइज कर, गले में रेडियो कॉलर लगा कर दरा के एनक्लोजर में पहुँचाया दिया गया। स्थानांतरण रणथंभौर के फील्ड डायरेक्टर श्री वाई के साहू मार्गदर्शन में हुआ। बाघ को मुकुन्दरा में आने पर नया नाम मिला मुकुन्दराज, जिसे MT-01 के नाम से भी जाना जाता है।

Mukundraj

टी-91 को बूंदी के रामगढ़ विषधारी अभ्यारण्य से दरा स्थितः सुरक्षित क्षेत्र मे स्थानतंत्रित करने के बाद कि तस्वीर (डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

मुकुन्दराज के बाद, रणथम्भोर कि चार बाघिनों टी -102, टी -104, टी -105 और टी -106 को मुकुन्दरा के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया था। ये वो बाघिनें थी जो अपना नया क्षेत्र बनाने की कोशिश कर रही थी या रणथम्भोर से निकलने की कगार पर थीं।  जिनमें से टी -106 को पुनर्वास के लिए चुना गया और 18 दिसम्बर 2018 को ट्रैंगक्वलाइज़ करके लाया गया। इसका नाम MT-02 पड़ा।

मुकुन्दरा में बसने के लिए तीसरे बाघ का चुनाव खुद बाघ ने किया। अपने बाघों को खोने के लिए ख्यात रणथम्भोर एक और बाघ टी – 98 के रूप में खो चुका था, आश्चर्यजनक रूप से ये बाघ सुल्तानपुर के रास्ते मुकुन्दरा पहुँच गया। जब एनक्लोजर के बाहर भी बाघ के हलचल कि आहट मिली तब मुकुन्दरा के डायरेक्टर के अनुरोध पर टाइगर वॉच कि टीम ने एनक्लोजर के बाहर कैमरे लगा कर बाघ को ट्रैक और मानिटर करना शुरू किया। आखिरकार 10 फ़रवरी 2019 को एनक्लोजर के बाहर लगे कैमरा ट्रैप में उसकी फोटो कैद हो गयी। यह बाघ मुकुन्दरा और रणथम्भोर के बीच प्राकृतिक बाघ गलियारे से होते हुए कई दिन सुल्तानपुर के जंगलों में बिताने के बाद अपने आप यहाँ पहुँचा। शुरुआत में इस बाघ के भविष्य को लेकर संशय था लेकिन बाद में इसे मुकुन्दरा के तीसरे बाघ के रूप में स्वीकार करते हुए MT- 03 नाम दिया गया।

टी -98 के बाद मुकुन्दरा को एक और बाघिन टी-83, 12 अप्रैल 2019 को मिली। इसे रणथम्भोर के आमा घाटी से लाकर मुकुन्दरा के एंकलोजर में छोड़ा गया था, जिसे बाद में MT-04 के नाम से जाना गया।

इसके बाद मुकुन्दरा के जंगलों से 2 जून, 2020 को एक बड़ी खबर आई कि यहाँ बाघिन MT-02 को दो शावकों के साथ देखा है। दोनों शावक करीब ढाई माह के थे। यहाँ बाघों की शिफ्टिंग के दो साल बाद बाघिन ने शावकों को जन्म दिया। कोरोना काल में छाई मायूसी के बीच मुकुंदरा टाइगर रिजर्व से आई ये खबर यहाँ के लोगों के लिए एक खुशी कि बात थी, जिसकी खुशी मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने भी ट्वीट के माध्यम से जताई और कहा कि इनका आना हमारे लिए उत्साह जैसा है। हमें मिलकर बाघों का और वन्यजीवों का संरक्षण करना है।

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व:  आगे की राह

कोटा के लोगों कि मेहनत रंग लाई और आज मुकुन्दरा के वन एक बार फिर से बाघ की दहाड़ से गूंज रहे हैं। मुकुन्दरा हिल्स आज एक टाइगर रिजर्व के रूप में ढल चुका है। बाघों का उपहार कोटा वासियों के लिए एक जिम्मेदारी भी है। जिम्मेदारी बाघ को सुरक्षित रखने कि, कोर एरिया से जैविक दबाब कम करने कि, मानव-पशु संघर्ष जैसी घटनाओं को रोकने कि। मुकुन्दरा के विकास में कई ऐसे कारक है जो विकास में अवरोधक साबित हो सकते हैं। (फ़ोटो: हरी मोहन मीना)

मुकुन्दरा के विकास में सबसे बड़ा अवरुद्ध साबित होता है कोर एरिया को कवर करते पर्याप्त बफर एरिया का ना होना। जैसा कि शुरुआत में बताया गया था मुकुन्दरा एक रेखाकारित आकार में फैला वन क्षेत्र है जिसके कारण ये रिजर्व लगातार जैविक दबाब को झेलता है। पर्याप्त बफर ना होने के कारण पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 10 जनवरी 2020 को मसौदा अधिसूचना जारी करते हुए मुकुन्दरा के कई हिस्सों में 1 किलोमीटर दायरे के इको-सेन्सिटिव ज़ोन बनाने के निर्देश जारी करते हुए मंत्रालय ने 60 के भीतर सुझाव और आपत्तियां मांगी थी। यह राज्य का पहला बाघ अभयारण्य है जिसके लिए इको-सेन्सिटिव ज़ोन घोषित हुआ है।

मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिजर्व के दायरे में गिरधरपुरा, दामोदरपुरा, लक्ष्मीपुरा, मशालपुरा, खरली बावड़ी, रूपपुरा कोलीपुरा, दरा, भूखी, घाँटी, बगीचा, रोझड़ा तालाब, नारायणपुरा, अंबा रानी, और नोसेरा समेत 14 गांव है। ये कोटा के अलावा बूंदी, झालावाड़ व चित्तौड़गढ़ जिलों की सीमा में है। मुकुन्दरा के इन गाँवों के बड़ी संख्या में ग्रामीण गरीबी रेखा से नीचे जीवन यापन करते हैं और अपने पशुधन – बकरियों, भेड़ों, और मवेशियों – पर जीवित रहने के लिए बहुत अधिक निर्भर हैं जो कि स्वाभाविक रूप से रिजर्व में अपार जैविक दबाव का कारण है। जहां मुकुन्दरा कि परिधि के अंदर के 14 गाँव पूरी तरह वन संपदा पर आश्रित हैं तो वहीं परिधि के बाहर वाले गाँवों का दबाब भी है।

मुकुन्दरा के टाइगर रिजर्व बनने के बाद केंद्र सरकार ने इन गाँवों के विस्थापन कि मंजूरी दे दी है जिसके अंतर्गत अभी खरली बावड़ी व लक्ष्मीपुरा को विस्थापित किया जा चुका है। लेकिन फिर भी गाँवों का विस्थापन एक बड़ी समस्या है क्योंकि लोग विस्थापित होने को तैयार नहीं हैं, ज्यादातर ग्रामीणों को लगता है कि उन्हें उचित मुआवजा नहीं मील रहा। गिरधरपुरा गाँव के लोग इसलिए जाने को तैयार नहीं क्योंकि ये लोग हाल ही में बंदा गाँव से पुनर्वासित होकर यहाँ स्थापित हुए है। राणाप्रताप सागर बांध के निर्माण के लिए इन्होंने बंदा गाँव छोड़ था। प्रबंधन को इनके विस्थापन के लिए अन्य ठोस और कारगर फैसले लेने कि जरूरत है।

मुकुन्दरा कि तीसरी बड़ी समस्या है टाइगर रिजर्व के बीच से निकलते रेल मार्ग और राष्ट्रीय राजमार्ग। दरा के संकीर्ण पहाड़ियों के बीच से निकलता रेल मार्ग वन्यजीवों के लिए घातक सिद्ध होता रहा है। दिल्ली – मुंबई रेलमार्ग होने के कारण यह अत्यंत व्यस्त रहता है। यहाँ 2003 में ब्रोकन टैल के अलावा 2017 में एक भालू, 2018 में एक बघेरा और न जाने कितने ही छोटे वन्यजीव मारे जा चुके हैं। वहीं दूसरी ओर दरा के बीच से राष्ट्रीय राजमार्ग भी अक्सर सड़क दुर्घटनाओं का साक्षी रहता है। इसके साथ ही रेलगाड़ियों और सड़क वाहनों से होने वाले ध्वनि और भिन्न प्रकार के प्रदूषण वन्यजीवों के सामान्य जीवन में बाधक साबित होते हैं। हालांकि सड़क समस्या का समाधान सुरंग मार्ग के रूप में प्रस्तावित हो चुका है लेकिन फिर भी इसे बनकर तैयार होने तक समस्या जस की तस बनी रहेगी। वहीं रेल मार्ग का कोई विकल्प नहीं है।

मुकुन्दरा कि चौथी समस्या है वन्यजीवों के शिकार कि। वन्यजीवों का शिकार कभी प्रतिष्ठा के लिए, कभी सजावट के लिए, स्मृति चिन्ह के रूप में, तो कभी पारंपरिक एशियाई उपचार के लिए हजारों सालों से होता आया है। शिकार कि समस्या लगभग सभी जगह के वनों में आम है। यहाँ कई प्रकार के वन्यजीवों के शिकार कि घटनाएँ सामने आती रहती हैं। मुकुन्दरा डायरेक्टर द्वारा संचालित वन विभाग कि टीम यहाँ के वन्यजीवों कि रक्षा कर रही है। तथा बाघ द्वारा मवेशी के शिकार किए जाने पर ग्रामीणों की समस्याओं का निवारण वन विभाग द्वारा जल्द से जल्द किया जाता है ताकि लोगों में बाघ को लेकर कोई नकारात्मक विचार न आए।

Chambal - Mukundara

चारों ओर घने जंगलों से घिरा हाड़ौती क्षेत्र चम्बल, काली सिन्ध, पार्वती, परवन जैसी बड़ी व अनेक छोटी-छोटी सदावाही नदियों के कारण जल समृद्ध है। (फ़ोटो: हरी मोहन मीना)

मुकुन्दरा कि पाँचवी समस्या है रिजर्व में फैलती आक्रामक पौधों की प्रजातियां (invasive plant species)। मुकुन्दरा में कई विदेशी आक्रामक प्रजातियों का विस्तार बेहद तेजी से हो रहा है जैसे के विलायती बबूल (Prosopis juliflora), पुवाड (Cassia tora), कसोद (C. uniflora) और जंगली तुलसी (Hyptis suaveolens)। विलायती बबूल एक कठिन प्रजाति है जिसके काँटे वन्यजीवों को नुकसान पहुंचाते हैं। यह मुकुन्दरा में कई जगह फैल चुका है जिसमे एंकलोजर भी शामिल है, वन विभाग इसके प्रसार को प्रभावी ढंग से जड़ से उखाड़ के संबोधित कर सकता है ताकि एंकलोजर में इसके फैलाव को कम किया जा सके। जंगली तुलसी का विस्तार ज्यादातर रास्तों और तालाबों के किनारे देखा जा सकता है। सावन-भादों बांध, श्रीपुरा,  लक्ष्मीपुरा और नोलाव के तालाब वाले क्षेत्र में ये काफी हद तक फैल चुका है। पुवाड एवं जंगली तुलसी को काट के और ठंडे मौसम में जला के खत्म किया जा सकता है।

इन समस्याओं के अलावा यहाँ के वनों को और अधिक विकसित और लोगों को जागरूक करने कि आवश्यकता है। यहाँ के लोगों को भी समझना होगा कि बाघ केवल एक करिश्माई प्रजाति या कुछ दूर जंगल में रहने वाला एक अन्य जंगली जानवर नहीं है। बाघ अपने पारिस्थितिक तंत्र में शीर्ष शिकारियों के रूप में काम करते हैं जिनको शिकार के लिए परस्पर बड़े क्षेत्रों की आवश्यकता होती है। बाघों के बिना, पूरा पारिस्थितिक तंत्र ध्वस्त हो जाएगा। यहाँ के लोगों को इस रिजर्व को एक जिम्मेदारी के तौर पर देखना एवं इसके विकास के लिए काम करना होगा।

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पैंगोलिन: अत्यंत दुर्लभ जीव की बढ़ती समस्याएं

पैंगोलिन: अत्यंत दुर्लभ जीव की बढ़ती समस्याएं

एक नजर में दिखने पर किसी को अचम्भित कर देने वाला शर्मीले स्वभाव का वन्यजीव पैंगोलिन राजस्थान में बहुत ही कम तथा सीमित स्थानों पर पाया जाता है, इसकी दुर्लभता के कारण कभी किसी ने सोचा भी न होगा कि पैंगोलिन कि तस्करी राजस्थान से भी हो सकती है।

जून 2020 में मध्य प्रदेश वन विभाग कि स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने एक बड़ी सफलता के साथ वीडियो शेयरिंग साइट यूट्यूब (YouTube) पर पैंगोलिन शल्क बेचने वाले तस्करों के एक गिरोह का भंडाफोड़ किया है। पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया है जिनकी पहचान शेर सिंह धाकड़ और राजस्थान के निवासी वकिल उर्फ पप्पू के रूप में हुई है। एसटीएफ के अधिकारी रितेश सरोठिया के अनुसार, एसटीएफ विंग ने शिवपुरी जिले के निवासी शेर सिंह धाकड़ के कब्जे से 2.7 किलोग्राम पैंगोलिन शल्क जब्त किया है। वैश्विक ग्राहकों को आमंत्रित करने के लिए उसने यू-ट्यूब पर अपना मोबाइल नंबर दिखाया था, एसटीएफ ने इसको पकड़ने के लिए एक ग्राहक भेजा और मौके पर गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, 10वीं कक्षा का टॉपर धाकड़, पप्पू से शल्क खरीदता था।

वीडियो शेयरिंग साइट यूट्यूब (YouTube) पर पैंगोलिन शल्क बेचने वाला शेर सिंह “शेरु” जब्त शल्कों के साथ (फ़ोटो: रितेश सरोठिया)

अवैध नेटवर्क के भंडाफोड़ के बाद एसटीएफ की यह 12 राज्यों से 165वीं गिरफ्तारी है। इससे पूर्व रणथंभोर स्थित टाइगर वॉच संस्था द्वारा दी गई एक महत्वपूर्ण सूचना के अंतर्गत कार्यवाही करते हुए एसटीएफ द्वारा 27-28 किलो पैंगोलिन शल्क जब्त किया गया तथा एक तस्कर दम्पत्ति (मुन्नी और हरी सिंह) कि गिरफ़्तारी भी कि गई। कार्यवाही के दौरान पाया गया कि भिंड / मोरेना स्थित मोगया सहित अन्य शिकारी जाति के लोग इनकी तस्करी में मदद करते थे और बाघ, बघेरा और अन्य वन्यजीवों कि भी तस्करी में शामिल थे। विश्व में सबसे ज्यादा पैंगोलिन कि तस्करी की जाती है और हर दिन लगभग तस्कर और शिकारी पैंगोलिन शल्क के साथ पकड़े जाते हैं। इसका अन्धाधुन्ध शिकार, बड़े पैमाने पर तस्करी, तेजी से बढ़ता शहरीकरण व इनके घटते प्राकृतिक आवासों से इनकी संख्या में भारी गिरावट आयी है।

पैंगोलिन एक गैर आक्रामक खूबसूरत लेकिन शर्मीला स्तनधारी जीव है। दूर से देखने पर यह छोटा डायनासोर जैसा प्रतीत होता है। गहर-भूरे, पीले-भूरे अथवा रेतीले रंग के इस शुण्डाकार निशाचर जीव को फोलिडोटा (Pholidota) ऑर्डर में रखा गया है। पैंगोलिन का छोटा शरीर एक चीड़ शंकु (pine cone) के समान होता है जिसकी लम्बाई लगभग दो मीटर तथा वजन लगभग पैंतीस किलो तक का होता है। इसके शरीर पर केराटिन के बने शल्क नुमा (scaly) संरचना होती है जो कि इस मासूम जीव का एकमात्र रक्षा तंत्र है। पैंगोलिन ऐसे शल्कों वाला अकेला ज्ञात स्तनधारी है। हालांकि वर्मी (Armadillo) भी कवच युक्त होते हैं लेकिन उनका कवच चमड़े का बना होता है। खतरा महसूस होने पर ये चेहरे को पूंछ में छुपा कर खुद को लपेटकर अच्छी तरह से संरक्षित एक गेंद का रूप ले लेते हैं। नुकीले शल्क इन्हें शिकारियों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। इनकी पूंछ नुकीले काँटों के रूप में विकसित होती है जिन्हें ये हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

पैंगोलिन नाम मलय शब्द पेंगुलिंग से आया है, जिसका अर्थ है “जो लिपटकर गोल हो जाता है” भारत में इसे चींटीखोर, वज्रशल्क या सल्लू साँप भी कहते हैं। इस जिज्ञासु कीटभक्षी की विश्व भर में आठ प्रजातियां हैं जो अफ्रीकी और एशियाई महाद्वीप पर पाए जाते हैं। इन आठों ज्ञात प्रजातियों को मनीडे (Manidae) परिवार में रखा गया है। इस परिवार में इनको तीन जातियों में बांटा गया है, मानिस (Manis), फेटाजीनस (Phataginus) और स्मटसिया (Smutsia)। एशिया में पाई जाने वाली चारों प्रजातियां मनीस में शामिल हैं, जबकि अफ्रीका में रहने वाली चार प्रजातियां फेटाजीनस और स्मट्सिया में शामिल हैं।

 

भारतीय पैंगोलिन एक निशाचर प्राणी है जो दिन के समय अपनी माँद में आराम करते हैं और रात में भोजन कि तलाश में बाहर आते हैं। दिन में नींद व आराम में खलल न हो इस हेतु यह बिल के मुहाने को मिट्टी से हल्का सा बन्द कर देता है। ये लगभग 11 फुट गहरी सुरंग खोदकर अपने रहने के लिए 4 प्रकार के माँद का निर्माण करते हैं। पैंगोलिन मुख्यतः कीटभक्षी होते हैं, उनके आहार में अधिकांश चींटियों और दीमक की विभिन्न प्रजातियां शामिल हैं। इनके अलावा ये अन्य कीड़ों, विशेष रूप से लार्वा का भी उपभोग करते हैं। इन्हे आहार में ज्यादा बदलाव पसंद नहीं है, कीटों कि कई प्रजातियाँ उपलब्ध होने के बावजूद भी केवल एक या दो प्रजातियों का ही उपभोग करते हैं। एक पैंगोलिन प्रति दिन 140 से 200 ग्राम कीटों का उपभोग कर सकता है। (Mahmood et al., 2014)

पैंगोलिन की दृष्टि असामान्य रूप से कमजोर होती है जिसकी कमी अत्यधिक विकसित गंध लेने और सुनने की क्षमता से पूरी करते हैं। पैंगोलिन में दांतों कि भी कमी होती है इसलिए इनमें चींटियों और दीमक को खाने के लिए अन्य भौतिक विशेषताएँ विकसित हुई है। जैसे कि मजबूत कंकाल संरचना, मजबूत नुकीले नाखूनों से लैस पंजे। वे अपने शक्तिशाली पंजों का उपयोग दीमक के टीले खोदने और फाड़ने तथा शिकार को पेड़, जमीन और वनस्पति के बीच खोजने के लिए करते हैं। उनकी जीभ और पेट कि संरचना कीटों को पचाने में सहायता करती है। उनकी चिपचिपी लार चींटियों और दीमकों को जीभ से चिपकाने में सहायक होती है। दांतों कि कमी के कारण वे शिकार खोजते (foraging) समय छोटे पत्थरों को निगलते हैं जो उनके पेट में जमा होकर चींटियों को पीसने में मदद करता है। (Mohapatra et al., 2014)

खतरा महसूस होने पर पैंगोलिन एक स्कंक के स्प्रे के समान गुदा के पास ग्रंथियों से एक विषाक्त-महक वाले रसायन का उत्सर्जन कर सकता है। पैंगोलिन की जीभ विशालकाय चींटीखोर कि तरह बहुत लंबी होती है। बड़े पैंगोलिन 1.5 फुट तक अपनी जीभ का विस्तार कीट सुरंगों के अंदर जांच करने और अपने शिकार को प्राप्त करने के लिए उपयोग करते हैं।

 

पैंगोलिन अपने जीवन का अधिकांश भाग एकांत में व्यतीत करते हैं और वर्ष में केवल एक बार प्रजनन करने के लिए गर्मियों या सर्दियों में मिलते हैं। नर अपने क्षेत्र को मूत्र या मल से चिह्नित करते हैं जिससे कि मादाएँ उनको खोज सके। मादाओं के लिए प्रतिस्पर्धा होने पर नर अपने पूंछ का उपयोग आपसी युद्ध के लिए करते हैं। गर्भधारण की अवधि 65 से 70 दिनों कि होती है। इस दौरान नर व मादा पैंगोलिन जोड़े में रहते हैं। मादा साल में एक ही शिशु (पैंगोपप्स) को जन्म देती है। जन्म के समय वजन 80 से 450 ग्राम और औसत लंबाई 150 मिमी (6 इंच) होता है। जन्म के समय शल्क नरम और सफेद होते हैं जो कि कई दिनों के बाद एक वयस्क पैंगोलिन के समान कठोर और काले हो जाते हैं। थोड़े बड़े होने पर पैंगोपप्स को मादाएँ अपनी पूँछ पर बिठाकर जंगल में विहार कराने के दौरान सुरक्षा तथा भोजन खोजने व खाने का हुनर भी सिखाती है। कुछ महीनों बाद शिशु अपनी माँ से अलग हो जाता है। पैंगोलिन पेड़ों पर चढ़ने व पानी में तैरने में दक्ष होते हैं।

भारतीय पैंगोलिन कि उपस्थिति को विभिन्न प्रकार के वनों से दर्ज किया गया है, जिसमें श्रीलंकाई वर्षावन और मैदानी क्षेत्र से लेकर मध्य पहाड़ी स्तर शामिल हैं। यह घास के मैदानों और माध्यमिक जंगलों में भी पाया जा सकता है, तथा रेगिस्तानी क्षेत्रों के लिए अच्छी तरह से अनुकूलित है लेकिन बंजर और पहाड़ी क्षेत्र इसके पसंदीदा आवासों में शामिल है। कभी – कभी यह पैंगोलिन उच्चतम ऊंचाई वाले स्थान जैसे कि श्रीलंका के 1100 मीटर कि ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों और भारत में 2300 मीटर कि ऊंचाई वाले नीलगिरि पहाड़ों पर भी देखा गया है। यह नरम और अर्ध-रेतीली मिट्टी पसंद करता है, जो कि इनके बिल खोदने के लिए उपयुक्त होते है। (Mohapatra et al., 2015)

वैसे तो पैंगोलिन अपने पर्यावास में व्यापक रूप से वितरित हैं लेकिन कहीं भी आसानी से नहीं दिखते। वर्ष 2019 में राजस्थान के कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में 25 सालों बाद पहली बार नजर आया। कुम्भलगढ़ के अलावा जयपुर, सवाई माधोपुर, बारां, और कोटा में भी इसकी उपस्थिति दर्ज कि गई है।(मानचित्र: समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों पर आधारित)

पैंगोलिन अपने प्राकृतिक आवासों में दीमक और चींटियों की आबादी को नियंत्रित कर प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। लेकिन ग्रामीण व आदिवासी लोग अपनी बेवकूफी व नासमझी के कारण निहायती भोले इन जीवों का बर्बरता पूर्वक शिकार करते हैं। साथ ही हाल के कुछ वर्षों में, लोगों द्वारा पेड़ों कि कटाई से वन क्षेत्र में व्यापक कमी आई है जिसने कई प्रकार के पर्यायवासों को नष्ट कर दिया है। नए और सुगम यातायात सुविधाओं और अच्छे पैसे मिलने के कारण शिकारियों ने स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय खपत के लिए कई दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियों की तलाश और तस्करी तेजी से बढ़ा दी है। (Dr Jeff Salz, 2020)

चींटियों की बांबी के पास रहने वाले इस जानवर की तलाश में शिकारियों को मुश्किल नहीं होती। इसके अलावा इसे मारने के लिए उन्हें खास हथियार भी नहीं ले जाने पड़ते हैं। छूने या खतरे का आभास होने पर पेंगोलिन खुद को शल्कों (खोल) में समेटकर फुटबाल की तरह गोल हो जाता है। इसके बाद वह देख ही नहीं पाता कि उस पर हमला किया जा रहा है। शिकारी आसानी से उसे पीट-पीटकर मार डालते हैं।

इसका मांस लजीज होने से चीन व वियतनाम जैसे कई देशों के होटल व रेस्टोरेंट में खाने की लिए बेधड़क परोसा जाता है। वैश्विक स्तर पर इनके मांस, चमड़ी, शल्क, हड्डियां व अन्य शारीरिक अंगों की अधिक मांग होने से इनका बड़े पैमाने पर शिकार करवाया जाता है तथा राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इनकी भारी मात्रा में तस्करी की जाती है। दूसरी ओर चीन व थाईलैंड जैसे कई देशों में इसके शल्कों का उपयोग यौनवर्धक औषधि व नपुसंकता दूर करने के लिये भी किया जाता है। जबकि आज तक इसका कोई वैज्ञानिक सबूत उपलब्ध नहीं है। पैंगोलिन से बने काढ़े और संक्रमित तरल पदार्थ से इलाज करवाने हेतु पिछले वर्ष तक चीनी सरकार द्वारा नागरिकों को स्वास्थ्य बीमा के रूप में मदद भी दी जाती थी।

यूएस पार्टी सर्किट में शल्क का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। हाल ही में इंटरपोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, पैंगोलिन के 26 प्रतिशत शल्कों को अमेरिका में भेजा जाता है। शल्क का उपयोग क्रिस्टल, मेथामफेटामाइन (methamphetamine ) के निर्माण के लिए किया जाता है, जो पार्टी ड्रग क्रिस्टल मेथ या क्रैंक (crystal meth or crank) का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। जानकारी के मुताबिक शल्कों को निकालने की लिये निर्दयतापूर्वक इन्हें जिन्दा ही खौलते गर्म पानी में डाल दिया जाता है। शल्कों का व्यापार गैर कानूनी होने के बावजूद भारत में आज भी इनकी बिक्री बेखौफ होकर धड़ल्ले से होती है।

हालांकि पर्यावरण एवं वन विभाग इन वन्य जीवों की ताजा स्थिति बताने में गुरेज करते हैं। लेकिन फिर भी कुछ राज्यों के विभाग इनके संरक्षण के लिए उतक्रिस्ट कार्य कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के अलावा उत्तराखंड वन विभाग ने भी विशेष कार्य बल संगठित किया है जो पंगोलीन को रेडियो टैग करने का कार्य कर रहा है। रेडियो टैग का कार्य अभी शुरुवाती दौर में है और फिलहाल मध्य प्रदेश वन विभाग ने अभी तक दो और उत्तराखंड वन विभाग ने एक पैंगोलिन को टैग किया है। (TOI, 2020)

अन्तरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के नवीनतम अपडेट (2019) के अनुसार पैंगोलिन का भविष्य, आबादी में तेजी से कमी आने के कारण निराशाजनक दिखाई देता है। IUCN के अनुसार विश्व कि आठ प्रजातियों में से तीन प्रजातियाँ (चीनी, सुंडा, और फिलीपीन पैंगोलिन) गंभीर रूप से विलुप्तप्राय हैं, तीन विलुप्तप्राय (भारतीय, सफेद पेट वाले और विशाल पैंगोलिन) और बाकी के दो असुरक्षित है।

पहले से ही दुर्लभ और संकटग्रस्त इस जीव कि समस्याएं और बधाई है चीनी शोधकर्ताओं के नए शोध ने। साउथ चाइना एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का दावा है कि पैंगोलिन, चमगादड़ों और मनुष्यों के बीच कोरोना वायरस का एक मध्यवर्ती मेजबान हो सकता है। इसका अंदाजा पैंगोलिन में पहचाने गए वायरस से लगाया गया जो कि 99% कोरोना वायरस के समान था। हालांकि पैंगोलिन को कोरोना वायरस के कई स्ट्रैनस की मेजबानी के लिए जाना जाता है लेकिन इस प्रेस विज्ञप्ति के पीछे का शोध अभी तक वैज्ञानिक साहित्य में प्रकाशित नहीं हुआ है जिससे इन दावों का मूल्यांकन करना मुश्किल हो जाता है।

वैज्ञानिकों द्वारा वायरस को स्थानांतरित करने का संदेह मात्र पैंगोलिन पर ही नहीं रहा। कोविड-19 के शुरुआती दिनों में चीनी शोधकर्ताओं ने बताया कि मूल रूप से सांप संभावित कैरियर थे लेकिन अब उन्होंने इस विचार का खंडन कर दिया है। 22 मार्च को प्रकाशित एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि वायरस की प्रोटीन संरचना और जीनोम प्रभावी रूप से सांपों से अलग है।

अभी सर्वसम्मति यह है कि कोरोना वायरस के मूल स्रोत चमगादड़ हैं। चमगादड़ SARS-CoV-2 वायरस के साथ अन्य कई वायरस के एक प्राकृतिक संग्रह केन्द्र के रूप में कार्य करते हैं। 2000 के दशक की शुरुआत में भी चमगादड़ ही SARS वायरस के लिए जिम्मेदार थे। लेकिन एक विचार ये भी है कि किसी अन्य जानवर ने वायरस को चमगादड़ से मनुष्यों में पहुँचाया होगा जो पैंगोलिन हो सकता है। अवैध चीनी व्यापार द्वारा पैंगोलिन का पारंपरिक चीनी चिकित्सा में उपयोग मनुष्यों में संचरण के लिए एक वेक्टर के रूप में सुझाया गया था। पैंगोलिन कोरोवायरस के कई वंशों की खोज और SARS-CoV-2 से उनकी समानता से संकेत मिलता है कि पैंगोलिन SARS-CoV-2 जैसे कोरोनवायरस के होस्ट हो सकते हैं। हालांकि, पूरे जीनोम की तुलना में पाया गया कि पैंगोलिन और मानव कोरोनवायरस अपने RNA का 92% ही साझा करते हैं। (Cyranoski et al., 2020)

अभी तक कोई निर्णायक शोध नहीं होने के बावजूद चीनी वैज्ञानिकों द्वारा पैंगोलिन को वायरस के संभावित ट्रांसमीटर के रूप में सूचीबद्ध करने पर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है। इन शुरुआती अटकलों के कारण पहले से ही संकटग्रस्त इस स्तनपायी के लिए और संकट उत्पन्न हुए हैं। आज बड़े पैमाने पर इनकी हत्या करने का प्रोत्साहन उसी प्रकार मिल है जैसा कि SARS के प्रकोप के दौरान एशियाई पाम सिवेट के साथ हुआ था। (CBS News, 2004) बहरहाल, पंगोलिन के अवैध व्यापार को समाप्त करना वन्यजीवों के उपभोग से जुड़े संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में योगदान दे सकता है। कोरोना वायरस महामारी के पीछे वन्यजीव व्यापार कि अहम भूमिका को देखते हुए चीन के अधिकारी इसे वन्यजीव बाजारों को खत्म करने वाले एक संकेत के रूप में ले रहे हैं। जो कि आने वाले समय में वन्यजीवों के लिए एक अच्छी खबर हो सकती है।

पंगोलीन संरक्षण के लिए 2016 में, कई देशों ने पैंगोलिन की सभी आठ प्रजातियों को CITES Appendix I श्रेणी में सूचीबद्ध करने के लिए मतदान कर इनके व्यापार पर प्रतिबंध लगाया था। IUCN SSC पैंगोलिन स्पेशलिस्ट ग्रुप ने भी इनके संरक्षण के लिए वर्ष 2014 में “Scaling up Pangolin conservation” नाम से वैश्विक कार्य योजना प्रारंभ कि। (IUCN SSC)

भारत में पाए जाने वाले दोनों प्रजातियों (भारतीय और चीनी पैंगोलिन) को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची 1 भाग 1 के तहत सूचीबद्ध किया गया है। इसका शिकार करना, इसको सताना, मारना या पीटना, विष देना, तस्करी करना यह सब गैर कानूनी एवं अपराध की श्रेणी में आते हैं। यह प्रजाति विलुप्त न हो इस हेतु लोगों में जागरूकता लाने व इसके संरक्षण के लिये विश्व भर में प्रतिवर्ष फरवरी माह के तीसरे शनिवार को ‘वर्ल्ड पैंगोलिन डे’ (विश्व चींटीखोर दिवस) मनाया जाता है। लेकिन भारत में इसके प्रति लोगों में उत्साह नजर नहीं आता है।

References:

  1. Cyranoski, David. (2020-02-07). Did pangolins spread the China coronavirus to people? Nature. DOI: 1038/d41586-020-00364-2
  2. Mohapatra, R.K., Panda, S. (2014). Behavioural Descriptions of Indian Pangolins (Manis crassicaudata) in Captivity. International Journal of Zoology. Hindawi Publishing Corporation. Vol. 2014, Article ID 795062. http://dx.doi.org/10.1155/2014/795062
  3. IUCN SSC Pangolin specialist group, Red List Update: https://www.pangolinsg.org/2019/12/23/iucn-red-list-update-highlights-need-for-concerted-conservation-action-for-pangolins/
  4. Zhang, Y. (2020). Protein Structure and Sequence Reanalysis of 2019-nCoV. Proteome Res. 2020, 19, 4, 1351–1360 Publication Date: March 22, 2020 https://doi.org/10.1021/acs.jproteome.0c00129
  5. Mohapatra, R.K., Et al. (2015). A note on the illegal trade and use of pangolin body parts in India. TRAFFIC Bulletin Vol. 27 No. 1. https://www.pangolinsg.org/wp-content/uploads/sites/4/2018/06/Mohapatra-et-al_2015_A-note-on-the-illegal-trade-and-use-of-pangolin-body-parts-in-India.pdf
  1. Mahmood; Irshad; Hussain (2014). “Habitat preference and population estimates of Indian pangolin”. Russian Journal of Ecology. 45 (1): 70–75. DOI:10.1134/s1067413614010081
  2. In a first, MP shows way, radio-tags two pangolins: https://timesofindia.indiatimes.com/city/nagpur/in-a-first-mp-shows-way-radio-tags-two-pangolins/articleshow/cms
  3. Scientists radio-tag Indian pangolin (2020): https://www.thehindu.com/sci-tech/energy-and-environment/scientists-radio-tag-indian-pangolin/articleece
  4. MP: Wildlife STF arrests two for selling pangolin scales on YouTube (2020): https://timesofindia.indiatimes.com/city/bhopal/mp-stf-wildlife-arrests-two-for-selling-pangolin-scales-on-youtube/articleshow/76717230.cms
  5. Civet Cat Slaughter To Fight SARS (2004): https://www.cbsnews.com/news/civet-cat-slaughter-to-fight-sars/