दोंगड़े के बाद उड़ान: रणथम्भौर में पायोनीर तितलियाँ

दोंगड़े के बाद उड़ान: रणथम्भौर में पायोनीर तितलियाँ

लेखक: प्रवीण सिंह, धर्म सिंह गुर्जर, एवं डॉ धर्मेंद्र खांडल 

‘दोंगड़े’ — राजस्थान में अप्रैल-मई की शुरुआत में अचानक और अल्पकालिक रूप से होने वाली यह वर्षा — स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत होती है, जो कई जीवों के जीवनचक्र को सक्रिय कर देती है।

हमें अक्सर अपने बगीचे या घर के आसपास जब कोई रंग-बिरंगी तितली उड़ती दिखती है, तो मन अपने आप आनंदित हो उठता है। अब ज़रा कल्पना कीजिए — जब ऐसी ही एक प्रजाति की तितली सैकड़ों-हजारों की संख्या में, एक साथ दिखाई दे — तो वह दृश्य कैसा अद्भुत होगा!

कुछ ऐसा ही दृश्य हर साल रणथंभौर के सीमावर्ती क्षेत्रों के आस पास देखने को मिलता है। जिसे हमने शेरपुर और खिलचीपुर के गोचर भूमि में देखा। यहाँ खुली ज़मीन पर, कैर और हींश की झाड़ियों और ज़मीन पर उगे छोटे छोटे जंगली फूलों के बीच सफेद-पीली तितलियों की लहरें एकाएक दिखाई देने लगती हैं। इनके पंखों के सिरों पर काले धब्बे और काली धारियां साफ दिखाई देती हैं। नर तितलियाँ सामान्यतः फीकी रंगत वाली (हल्की पीली) और साफ-सुथरी धारियों वाली होती हैं। मादा तितलियों के अगले पंखों पर काले पैटर्न अधिक स्पष्ट होते हैं और वे आकार में थोड़ी बड़ी भी होती हैं। हाँ, मादा बड़ी होती है – क्योंकि उन्हें अपने पेट में अंडे जो पालने होते है। (Smetacek, 2012) यह नज़ारा यहाँ लगभग एक-डेढ़ महीने तक देखने को मिलता है।

pioneer, caper white, butterfly feeding nectar from Oligochaeta ramose

पायनियर तितली सबसे अधिक ब्रह्म डंडी (Oligochaeta ramose) के पुष्प पर गई (फ़ोटो: प्रवीण)

ये हैं पायनियर तितलियाँ (Belenois aurota), जिन्हें ‘कैपर व्हाइट’ भी कहा जाता है। एकाएक इनकी संख्या इतनी अधिक हो जाती है कि लगभग हर झाड़ी पर सिर्फ एक ही प्रजाति की तितलियाँ दिखाई देती है। हमारे द्वारा एक 10×10 वर्ग मीटर के क्षेत्र में की गई इनकी गिनती में हमें 500 से 1000 तितलियाँ मौजूद मिली थी। यह असाधारण दृश्य यहाँ हर साल देखने को मिलता है।

कहाँ से आती हैं ये तितलियाँ?

प्रश्न उठता है — ये तितलियाँ इतनी बड़ी संख्या में अचानक आती कहाँ से हैं? क्या ये दूरदराज़ से प्रवास करके आती हैं, जैसा कि ब्रिटिश काल के कीटविज्ञानी मूर (1890s) और बिंघम (1905) ने उल्लेख किया? या यह उनके जीवन चक्र की स्थानीय पुनरावृत्ति है?

हमारा मानना है की शायद ये तितलियाँ प्रवासी नहीं, बल्कि यहीं की निवासी हैं, जो अप्रैल  माह की पहली बारिश के साथ ही अपने छिपे हुए जीवन से बाहर आती हैं, और अचानक प्रकट हो जाती हैं। यानी इस समय अपने प्यूपा से बाहर निकल कर यह जीवन के एक नए रूप को धारण करती है। 

pioneer, caper white, butterfly feeding nectar from Convolvulus prostratus

एक नजर में देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि सफेद फूलों वाला संतरी (Convolvulus prostratus) इस क्षेत्र में सबसे अधिक मात्रा में उपलब्ध है। फ़ोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल 

इतिहास के पन्नों से

ब्रिटिश भारत में कार्यरत फ्रेडरिक मूर ने अपनी श्रृंखला “Lepidoptera Indica में पहली बार इस तितली का विस्तृत वर्णन किया। उन्होंने यह ध्यान दिया कि ये मानसून के बाद एकाएक प्रकट होती हैं और कैपेरिस के पौधों के पास मंडराती हैं। बाद में चार्ल्स बिंघम ने इनके विशाल झुंडों की दिशा — दक्षिण-पश्चिम से उत्तर-पूर्व — का वर्णन किया, जो की उनके अनुसार मानसून के समानांतर चलती प्रतीत होती थी।

जो हमने देखा

आजकल, मूर और बिंघम के वर्णन के विपरीत, हमने इन तितलियों को मानसून में नहीं देखकर इन्हें अप्रैल माह में होने वाली बारिश के बाद कैर और हींश की झाड़ियों और ज़मीन पर उगे छोटे छोटे फूलों के आस-पास बहुतायत में देखा है। हींश की झाड़ी पर तो 100-150 तितलियाँ दिखाई दे जाती है। अप्रैल- मई के समय होने वाली बारिश को स्थानीय भाषा में दोंगड़े कहा जाता है, हम सब जानते है की गर्मी के बाद में आने वाली बारिश को मानसून कहते है, वहीं ठंड में आने वाली बारिश को मावठ कहते है। दोंगड़े जो अचानक और अनिश्चित रूप से आ जाती है। यद्यपि इसका समय काल अत्यंत लघु होता है, एक या दो बारिश में यह सिमट जाता है। यह संक्षिप्त लेकिन गर्मी के मौसम में प्राणियों के लिए एक अचानक से भोजन की बहुतायत और सुखद मौसम लाने वाली जीवनदायी वर्षा अनेक प्राणियों के लिए यह वरदान और पायनियर तितली के जीवन की कुंजी है।

पायनियर तितलियों का जीवन चक्र खासतौर पर कैपरेसी कुल (Capparaceae) के पौधों से जुड़ा हुआ है। इनके मुख्य लारवल होस्ट प्लांट हींश (Capparis sepiaria) और कैर (Capparis decidua) हैं (Arora & Mondal, 1981) इस क्षेत्र में इनकी उपस्थिति विशेष रूप से इन दोनों झाड़ियों पर अधिकतम पाई गई और यही वे पौधे हैं जिन्हें ये तितलियाँ अंडे देने के लिए चुनती हैं।

पायनियर तितली शारीरिक रूप से नाजुक और गर्मी सहने में असक्षम होती है। दिन में प्रातः काल से सुबह लगभग 9 बजे तक ही यह सक्रिय रह पाती है इसके बाद होने वाली तेज धूप में यह झाड़ियों के नीचे छुप कर रहने लगती है। हालाँकि इनकी उड़ान तेज होती है परन्तु थोड़ी दूरी की होती है — साथ ही नीचे-नीचे, फुर्तीली लहरों में यह विचरण करती है। ये अधिकतर अपने होस्ट प्लांट या फूलों के इर्द-गिर्द मंडराती हैं, जिससे इनके लंबी दूरी की उड़ान की संभावना न के बराबर ही है। साथ ही रेगिस्तान में अप्रैल में स्थान विशेष पर होने वाले दोंगड़े वर्षा पूरे क्षेत्र को तितली के लिए अनुकूल नहीं बनाते है, ताकि यह प्रवर्जन के लिए दूर तक जा सके।

इन्ही बातों के आधार पर हमने यह अनुमान लगाया गया कि ये तितलियाँ यहाँ की स्थानीय हैं जो यहीं पैदा होती हैं और यहीं अपना जीवन चक्र पूर्ण करते हुए अगली पीढ़ी को जन्म देती हैं।

पायनियर तितली के जीवन चक्र के विभिन्न चरण (फ़ोटो: प्रवीण)

विस्तार में व्यवहार

वैज्ञानिकों का मानना है कि ये विशेष रूप से चौड़े और खुले आकार वाले फूलों से रस लेना पसंद करती है। सामान्यतः इसे त्रिडैक्स डेज़ी (Tridax procumbens), लैंटाना (Lantana camara), आक (Calotropis) और बेर (Ziziphus) के फूलों पर देखा गया है (Kunte, 2000; Kunte et al., 2021)

लेकिन रणथंभौर क्षेत्र में प्रातःकालीन समय के हमारे व्यवस्थित अध्ययन में यह तितली कुछ अन्य स्थानीय वनस्पतियों से रस लेती देखी गई – और वह भी सूरज की पहली किरणों के साथ!

एक नजर में देखने पर ऐसा प्रतीत होता है कि सफेद फूलों वाला संतरी (Convolvulus prostratus) इस क्षेत्र में सबसे अधिक मात्रा में उपलब्ध है — खुले मैदानों में बिखरा हुआ तथा  व्यापक रूप से फैला हुआ पुष्पों मानो इसका मुख्य नेक्टरिंग पौधा है। लेकिन जब हमने 10×10 वर्ग मीटर के प्लॉट में पुष्पों की संख्या गिनी, तो सबसे अधिक पुष्प ब्रह्म डंडी (Oligochaeta ramose) के पाए गए — लगभग 500 फूल, जो कि इस तितली की पहली पसंद साबित हुए। इसके बाद त्रिनाड़ी (Lepidagathis trinervis) के लगभग 300 पुष्प और संतरी के केवल 100 पुष्प दर्ज किए गए।

इन तीन प्रमुख पुष्पों के अतिरिक्त, पायनियर तितलियाँ कुछ और स्थानीय वनस्पतियों से भी रस लेती देखी गईं:

  • Echinops echinatus (गोल कांटेदार फूल)
  • Argemone mexicana (सत्यानाशी)
  • Evolvulus alsinoides (विष्णुकांत)
  • Solanum xanthocarpum (कांटे वाला बैंगन) और
  • Launaea procumbens (पाथरी)

पायोनीर तितली अलग-अलग फूलों से रसपान करते हुए (ब्रह्म डंडी, संतरी, खून-रोकनी, और ऊंट-कंटेली) (फ़ोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल, प्रवीण)

ये तितलियाँ दिन की शुरुआत बहुत जल्दी कर देती हैं। भोर में लगभग 6:00 बजे से ही इनकी गतिविधियाँ प्रारंभ हो जाती हैं। शुरुआत में ये तितलियाँ ब्रह्म डंडी के फूलों पर जाती हैं, फिर 7:00 बजे के बाद संतरी के नए खिले फूलों पर जिनका रंग अभी भी थोड़ा बैंगनी था और पूर्ण सफेद नहीं हुआ था, और इसके बाद अन्य उपलब्ध पुष्पों की ओर आकर्षित होती हैं।

सुबह 8:30 से 9:30 के बीच, अधिकांश तितलियाँ कैर, हींस और बेर की झाड़ियों के पास खुले स्थानों में तथा संतरी के फूलों पर पंख फैलाकर धूप सेंकती देखी जाती हैं। यह धूप सेंकना तापमान संतुलन बनाए रखने के लिए एक सामान्य और महत्वपूर्ण व्यवहार है।

इनका प्रजनन व्यवहार भी सुबह के समय, कम तापमान के दौरान ही शुरू होता है, और सामान्यतः दो घंटे तक सक्रिय रहता है। यह अवधि प्रायः 6:00 से 8:00 बजे के बीच होती है। इसके बाद, लगभग 10:00 बजे तक इनकी गतिविधियाँ लगभग समाप्त हो जाती हैं।

दोपहर के समय, अधिकांश तितलियाँ कैर और बेर जैसी झाड़ियों की छाया में विश्राम करती हुई दिखाई देती हैं। हालांकि कुछ तितलियाँ दिनभर उड़ती भी रहती हैं, परंतु गतिविधि में स्पष्ट वृद्धि शाम 4:00 बजे के आसपास पुनः देखी जाती है। रात्रि में यह तितली झाड़ी के पूर्वी हिस्से में आराम करती है ताकि पश्चिम में छिपते सूरज की गर्मी इन्हें झेलनी नहीं पड़े और सुबह का उगता सूरज इन शीतरक्त कीटो को शीघ्र इतना गर्म करदे की यह सुबह सुबह अपना कार्य प्रारंभ कर सके।

शाम के समय ज्यादातर तितलियाँ प्रायः उड़ान में व्यस्त रहती हैं, जबकि कुछ मादाएँ होस्ट प्लांट पर स्थिर बैठी हुई, पंख फैलाकर नर के संपर्क का इंतजार करती देखी जाती हैं। इस दौरान, जब भी मादा अपने आसपास किसी अन्य तितली की हलचल महसूस करती है, तो वह अपना उदर (abdomen) ऊपर की ओर उठा लेती है—एक नजर में हमने इस व्यवहार को यौन संकेत या जोड़े के चयन से जुड़ा माना।

बाद में हमने पाया कि यह “उदर उठाने” का व्यवहार प्रजनन संकेत होता है। संभोग के बाद मादा तितली ऐसा करके यह संकेत देती है कि वह पुनः संकरण के लिए तैयार नहीं है, जिससे वह अनचाहे प्रयासों से बच पाती है।

belenois aurota abdomen lifting

संभोग के बाद मादा पायनियर तितली अपना उदर ऊपर उठा लेती है — यह एक स्पष्ट संकेत होता है कि वह अब दोबारा संकरण के लिए तैयार नहीं है। (फ़ोटो: प्रवीण)

वैज्ञानिकों का यह भी मानना है की मादा तितली अपने जीवन चक्र की अगली पीढ़ी को सुनिश्चित करने के लिए, होस्ट प्लांट की पत्तियों की निचली सतह पर एकल या छोटे समूहों में अंडे देती है। ये अंडे अंडाकार, सीध में खड़े, हल्के क्रीम या पीले रंग के होते हैं जिन पर महीन रेखाएँ या खांचे स्पष्ट दिखते हैं (Sharma & Khan, 2022) आमतौर पर ये अंडे एक ही पत्ती की छाया में दिए जाते हैं ताकि अधिकतम सुरक्षा मिल सके और आद्र्रता बनी रहे।

लेकिन हमने पाया की सभी अंडे पत्तों की ऊपरी सतह पर ही दिए गए हैं, यहाँ हमने यह भी पाया की ज्यादातर अंडे दोनों किनारो से हल्की सी घुमाव वाली पत्तियों पर ही दिए गए हैं।

इस प्रक्रिया के दौरान नर तितलियाँ ‘मेट गार्डिंग’ करते देखी गई हैं — यानी संभोग के बाद वे मादा के पास रहकर उसकी रक्षा करते हैं ताकि अन्य नर तितलियाँ दोबारा संकरण का प्रयास न कर सकें। अक्सर आने वाले नर तितली को दूर भागते रहते है।

पायनियर तितली पारिस्थितिक रूप से एक दोहरी भूमिका निभाती है — एक ओर यह मौसमी वनस्पतियों, केर और हींश की पत्तियों पर अंडे देकर अपने जीवन चक्र को पूरा करती है, तो दूसरी ओर इसकी बड़ी संख्या में उपस्थिति इन पौधों के लिए एक दबाव उत्पन्न करती है। यह कैपरेसी कुल की झाड़ियों की बड़ी मात्रा में पत्तियाँ खा जाती है।

belenois aurota eggs

पायनियर तितली सामान्यतः अंडे पत्तियों की ऊपरी सतह पर देती है, और विशेष रूप से ऐसी पत्तियाँ चुनती है जो दोनों किनारों से हल्के रूप से मुड़ी हुई होती हैं। (फ़ोटो: प्रवीण)

हालाँकि, इसी संदर्भ में यह तितली अन्य जीवों के लिए भी संसाधन बन जाती है। रणथम्भौर क्षेत्र में हमारे अवलोकनों में एक विशेष जैविक अंतर्क्रिया सामने आई — यहाँ की कुछ सामाजिक मकड़ियाँ (social spiders) विशेष रूप से पायनियर तितलियों को शिकार के रूप में चुनती हैं। ये मकड़ियाँ अपने जाले या घोंसले अक्सर केर या हींश की झाड़ियों के पास या ऊपर बनाती हैं — यह एक अत्यंत चतुर रणनीति प्रतीत होती है, क्योंकि ये झाड़ियाँ पायनियर तितलियों की प्रमुख होस्ट प्लांट हैं। इन जालों में हमने एक समय में दर्जनों से लेकर सैकड़ों तक पायनियर तितलियों को फंसा हुआ पाया — जो इस बात का प्रमाण है कि यह तितली न केवल परागण जैसी पारिस्थितिक सेवाओं में भागीदार है, बल्कि खाद्य शृंखला में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी भी है। यह अंतर्क्रिया जैव विविधता के स्तर पर शिकारी-शिकार संबंधों की जटिलता को दर्शाती है, और तितलियों की अत्यधिक उपस्थिति अन्य जीवों के जीवन चक्र को भी प्रभावित कर सकती है।

belenois aurota social spider interaction

हमने पाया की सोशल स्पाइडर यहाँ केर या हींश की झाड़ियों पर अपने जाले बनाती हैं — जहाँ वे एक ही जाल में सैकड़ों पायोनीर तितलियों को फंसा लेती हैं ।  (फ़ोटो: प्रवीण)

 हमारे अवलोकनों और इस क्षेत्र की पारिस्थितिकी को देखते हुए, यह संभावना अधिक प्रबल प्रतीत होती है कि पायनियर तितली एक स्थानीय निवासी प्रजाति है, जो क्षेत्रीय जलवायु संकेतों के अनुसार प्रतिवर्ष पुनः प्रकट होती है — विशेष रूप से अप्रैल-मई की पहली वर्षा दोंगड़ेके बाद।

यह तितली न केवल हमारे मौसमीय चक्रों की संवेदनशील दूत है, बल्कि पारिस्थितिकी में विविध और कभी-कभी उलझी हुई भूमिकाओं में भी सक्रिय है — एक परागक, एक कीट, और कई शिकारी प्रजातियों के लिए पोषण का स्रोत। जलवायु परिवर्तन और भूमि उपयोग के बदलते पैटर्न के संदर्भ में, पायनियर जैसी तितलियों का दस्तावेज़ीकरण, उनकी जनसंख्या गतिशीलता और अंतर्संबंधों को समझना आज पहले से कहीं अधिक आवश्यक हो गया है। शायद इसी में भविष्य की पारिस्थितिक स्थिरता की कुंजी छुपी हो।

Cover Image: Dr Dharmendra Khandal

काईरोप्टेरोफेजी: एक शिकारी और शिकार की कहानी

काईरोप्टेरोफेजी: एक शिकारी और शिकार की कहानी

 साँप और चमगादड़, प्रकृति के दो पहरेदार! दोनों ही विचित्र, दोनों ही रहस्यमय। सांप, रेंगने वाले रहस्य के प्रतीक, भूमि के अंधेरे कोनों में छिपे रहते हैं, अपने शिकार की प्रतीक्षा करते हैं। दूसरी ओर, चमगादड़, अंधेरे आकाश के स्वामी, चुपचाप अपने पंखों की सहायता से उड़कर शिकार की तलाश करने वाले एकमात्र स्तनधारी जीव हैं।

इन दोनों प्राणियों में एक अद्भुत समानता है – निशाचर जीवन। रात की खामोशी में ही इनकी दुनिया जीवंत होती है। लेकिन क्या आपने कभी कल्पना की है, क्या ये दोनों कभी एक दूसरे के जीवन का हिस्सा बन सकते हैं? क्या उनके रास्तों में कभी कोई दिलचस्प मोड़ आ सकता है? क्या ये दो अलग-अलग दुनिया एक दूसरे पर निर्भर हो सकती हैं?

यहाँ एक और दिलचस्प पहलू उभरता है: ‘काईरोप्टेरोफेजी’। यह शब्द, चमगादड़ों को खाने की क्रिया को दर्शाता है। यह जानकर आश्चर्य हो सकता है कि कुछ साँप प्रजातियाँ, अवसर मिलने पर, चमगादड़ों का शिकार करती हैं। गुफाओं के अंधेरों में, जहाँ चमगादड़ आश्रय लेते हैं, वहाँ साँपों का छिपकर घात लगाना, प्रकृति के एक अनोखे दृश्य को उजागर करता है।

शाट्टी (Schatti, 1984) ने सर्वप्रथम इस जटिल शिकारी-शिकार संबंध पर प्रकाश डाला है। उन्होंने विशेष रूप से गुफाओं में रहने वाले साँपों की कुछ प्रजातियों को चमगादड़ों का शिकार करते हुए देखा और दर्ज किया। उनके शोध ने यह दर्शाया कि कुछ साँप, गुफा की दीवारों या छत से लटके हुए चमगादड़ों पर हमला करने के लिए अनुकूलित हो गए हैं, और उनकी विशेष शारीरिक संरचना और शिकार करने की तकनीकें उन्हें चमगादड़ों को पकड़ने में मदद करती हैं।

इसके बाद, विश्व स्तर पर हुए कई अध्ययनों से पता चलता है कि सांपों द्वारा चमगादड़ों का शिकार, कई साँप प्रजातियों में सामान्य है। ऐसे मामलों का वैज्ञानिकों द्वारा विश्लेषण करने पर 20 से अधिक सांप प्रजातियों को चमगादड़ों का शिकार करते हुए पाया गया। जिनमें मुख्यतः बोआ परिवार (बोइड्स) में यह अधिक देखा गया।

परन्तु, भारत में साँप-चमगादड़ अंतःक्रियाएँ अभी भी प्रकृति के अंधेरे कोनों में छिपी हैं। भारत में चमगादड़ों (127 प्रजातियाँ) और साँपों (लगभग 302 प्रजातियाँ) की एक समृद्ध विविधता है, लेकिन फिर भी इनकी पारिस्थितिक अंतःक्रियाओं के प्रकाशित विवरण किसी अनसुनी कहानी के बिखरे हुए पन्ने की तरह खोये हुए हैं।

हालाँकि, चमगादड़ों का शिकार करते हुए साँपों को देखना मुश्किल काम है, क्योंकि ऐसा बहुत कम होता है। और इसके लिए हमें ऐसी जगहों पर जाना पड़ता है जहाँ चमगादड़ रहते हैं, जो आमतौर पर दुर्गम या दूरदराज के क्षेत्रों में स्थित होते हैं, मानो प्रकृति इन रहस्यों को अपनी गहरी गुफाओं में छिपाकर रखना चाहती हो।

यहाँ हम आपसे राजस्थान के विभिन्न क्षेत्रों से दर्ज हुए ऐसे ही कुछ मामलों को साझा करने जा रहे हैं।

कोबरा द्वारा फलभक्षी चमगादड़ शिकार

अप्रैल 2018 में, राजस्थान के सवाई माधोपुर में रणथंभौर राष्ट्रीय उद्यान के पास एक होटल के नजदीक, एक कोबरा (Naja naja) एक फलभक्षी  चमगादड़ (Cynopterus sphinx) को निगलता हुआ देखा गया। यह घटना एक खुले क्षेत्र में घटी, जिससे अनुमान लगाया गया कि चमगादड़ शायद चंपा के पेड़ (Plumeria rubra) पर आराम कर रहा था। कोबरा को, चमगादड़ को उसके मुंह की तरफ से निगलते हुए देखा गया, और तस्वीरें सुरक्षित दूरी से ली गईं, ताकि वह उसे उल्टी न कर दे। ऐसे दृश्य, अक्सर हमारी नज़रों से ओझल रहते हैं, और यह हमें याद दिलाते हैं कि प्रकृति का हर क्षण अपनी एक अलग कहानी कहता है।

    रैट स्नेक द्वारा शिकार के प्रयास

    सितंबर 2020 में, राजस्थान के चित्तौड़गढ़ जिले के मैनाल के पास, एक प्राचीन मंदिर कई प्रकार के चमगादड़ प्रजातियों का घर है, जिनमें ब्लैक बेयरडेड टॉमब बैट (Taphozous melanopogon), नैकड-रम्पड टॉमब बैट (Taphozous nudiventris) और लेसर माउस-टेलड़ बैट (Rhinopoma hardwickii) शामिल थे। मंदिर के एक कमरे में, एक भारतीय धामन साँप (Ptyas mucosa) दीवार के एक टूटे हुए हिस्से के पास मौजूद देखा गया। वह साँप, ज़मीन से लगभग 5 फीट ऊपर, और दीवार के खुले हिस्से से करीब डेढ़ फीट की दूरी पर लटके हुए एक चमगादड़ को पकड़ने का प्रयास कर रहा था। मानो, एक प्राचीन मंदिर की दीवारों के बीच, जीवन और मृत्यु का एक छोटा सा नाटक खेला जा रहा था। साँप अपनी पूरी कोशिश कर रहा था, पर अंत में, उसकी कोशिश नाकाम रही। हमारी उपस्थिति के कारण, उसे दीवार के अंदर वापस छिपना पड़ा।

    सारांश यह की प्राचीन संरचनाएँ न केवल इतिहास की कहानियाँ सुनाती हैं, बल्कि प्रकृति के अनगिनत रहस्यों को भी अपने भीतर समेटे हुए हैं।

      फ्रॉस्टेन कैट स्नेक की उपस्थिति

      मई 2023 में, भैंसरोड़गढ़ वन्यजीव अभयारण्य के पाडाझर झरने (चित्तौड़गढ़) में, एक चूना पत्थर की गुफा के भीतर लगभग 15 फीट ऊपर एक लटकी हुई चूना पत्थर की दीवार पर दो फ्रॉस्टेन कैट स्नेक (Boiga forsteni) आराम करते हुए देखे गए। उसी गुफा में दो प्रकार के चमगादड़ भी मौजूद थे: ब्लैक बेयरडेड टॉमब बैट (Taphozous melanopogon) और लेसर माउस-टेलड़ बैट (Rhinopoma hardwickii)। यहाँ एक दिलचस्प बात देखने को मिली – जिस दीवार पर साँप थे, वहाँ चमगादड़ नहीं थे, शायद तेज़ रोशनी या साँपों की उपस्थिति के कारण। साँपों की चालें बहुत ही धीमी और सतर्क थीं।

      वहीं पास में मौजूद एक और चूना पत्थर की गुफा थी जिसके अंदर शिव मंदिर बनाया गया था और पूजा-पाठ की दैनिक क्रिया के कारण गुफा की दीवारें काली पड़ गई थी। इस मंदिर में लेसर माउस-टेलड़ बैट की एक बड़ी आबादी थी, जहाँ अप्रैल 2018 में भी एक ऐसे ही साँप को देखा था, जो फ्रॉस्टेन कैट स्नेक जैसा लग रहा था, लेकिन उसकी पहचान पूरी तरह से नहीं हो पाई थी।

      चूना पत्थर की ऊबड़-खाबड़ दीवारें साँपों के शिकार के लिए कई दरारें प्रदान करती है, और ये दृश्य हमें बताते हैं कि कैसे गुफाएँ सिर्फ पत्थर नहीं, बल्कि जीवन और मृत्यु के अनगिनत नाटकों का मंच हैं, जहाँ शिकारी और शिकार एक साथ रहते हैं।

        फ्रॉस्टेन कैट स्नेक द्वारा रणनीतिक स्थान का चुनाव

        अगस्त 2023 में, राजस्थान के बारां जिले में स्थित शाहबाद किले में भी एक फ्रॉस्टेन कैट स्नेक को किले के एक विशाल कक्ष के प्रवेश द्वार पर देखा। हैरानी की बात यह थी कि साँप ने अपनी रहने की जगह एक पुराने दरवाज़े के चौखट के ऊपर बनाई थी, जो अपने आस-पास के वातावरण से थोड़ी ही दूरी पर था। साँप के केंचुली की मौजूदगी से पता लग रहा था कि साँप इस स्थान पर नियमित रूप से आता है। यह स्थान उड़ते हुए चमगादड़ों को घात लगाकर पकड़ने के लिए एक रणनीतिक शिकारगाह की तरह प्रतीत हो रहा था।

        शाहबाद के किले में चमगादड़ के साथ मौजूद फ्रॉस्टेन कैट स्नेक (फ़ोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

        राजस्थान के इन दृश्यों से साँप और चमगादड़ों के बीच एक छिपा संबंध दिखाई देता है। ये हमें बताते हैं कि प्रकृति में अभी भी बहुत कुछ जानना बाकी है। हर जीव ज़रूरी है, और संतुलन बनाए रखना महत्वपूर्ण है। इस रिश्ते को और समझने के लिए और शोध की ज़रूरत है, और हमें इन जीवों के घरों की सुरक्षा करनी चाहिए। प्रकृति में हर जीव का सम्मान करना ज़रूरी है।

        Honouring a Legend: Dr G.V. Reddy’s Legacy in Wildlife Conservation

        Honouring a Legend: Dr G.V. Reddy’s Legacy in Wildlife Conservation

        We in the wildlife community bow our heads to honour the tragic demise of Dr. G.V. Reddy. He was one of the finest forest officers that the State of Rajasthan has ever known. His honesty and integrity were a shining example for everyone all over India working to save our natural world. He will never be forgotten. May he rest in peace.

        Valmik Thapar

        Tiger Expert

        A Life Dedicated to Rajasthan's Forests

        It was 1994. Sitting on the floor of the Rest House in Udaipur were three officers. Tea and biscuits and participatory forest management was the topic of they moment. One of them, Ashwini Upadhaya, left us in 2015. The other gentleman, GV Reddy (he hadn’t got his Phd yet) was all smiles and full of ideas. The third, Dr. Suresh Chandra shared with me this afternoon the sad news that Reddy Sir was no more. I, an absolute greenhorn that I was, quietly listened to my seniors speak and was wondering if I would ever be able to gain a fraction of understanding about the ecosystems that they had. Reddy Sir went on to serve Ranthambhore as its Deputy Field Director and later Field Director. He saw the Tiger Reserve at its worst. He toiled, harder than most of us. If today the National Park is a popular destination, a lot should be owed to him. It was he and Late Fateh Singhji who accompanied the former President of USA to the park. And there were so many fun stories he shared about that trip. As PD DRDA, he was known for cycling to the mandi for sabzi. Not many officers did that in the 1990s. Dr. Reddy was a vegetarian, a man of simple tastes, whether in clothes or in accessories or accommodation or transport. As PCCF HOFF he was my boss and he always was quite easy to interact with. A bit impulsive and short in temper when it came to blatant violations of the law, he always served with distinction. A fine student of nature, he actually had a better understanding than most people who say they do know Rajasthan’s forests. His affection for staff he always wore it on his sleeve. I am sure the news of his passing will tear up some eyes. This summer he moderated an interaction with Dr. Ulhas Karanth in Jaipur. I knew he was keeping indifferent health and told him to keep his travels to the minimum. But he being what he was, shrugged it off with a smile. So long Sir, till we get to do another trip amidst the Dhok.

        Arijit Banerjee

        IFS, (PCCF)HOFF, Forest Department - Rajasthan

        A Legacy of Conservation and Leadership

        It is with deep sorrow that we mourn the untimely passing of Dr. G.V. Reddy, a stalwart in the field of wildlife conservation. Dr. Reddy’s lifelong dedication to Rajasthan’s wildlife, spanning over three decades, leaves an indelible mark on our hearts and the landscape he worked tirelessly to protect.

        Dr. Reddy’s exemplary career, from his early days as DFO of Banswara to his transformative leadership as Chief Wildlife Warden of Rajasthan, epitomized unwavering commitment and integrity. His efforts in restoring Ranthambhore National Park and advancing conservation practices set benchmarks admired both nationally and internationally.

        Beyond his professional achievements, Dr. Reddy’s passion for wildlife and profound understanding of ecosystems made him a beacon of inspiration. His loss is deeply felt not only by his colleagues but by all who understood his vision for sustainable wildlife management.

        As we bid farewell to Dr. G.V. Reddy, let us honor his legacy by continuing to uphold his ideals of conservation and ethical governance. Our thoughts are with his family and loved ones during this difficult time.

        Rest in peace, Dr. Reddy. Your spirit will forever guide us in the protection of Rajasthan’s precious wildlife.

        Dr Dharmendra Khandal

        Conservation Biologist, Tiger Watch, Ranthambhore

        He was a down to earth personality. I remember the event of sharing with him an online scientific discussion about role of bats in spread of SARS CoV – 2 born COVID-19 and Status of bats of the Thar Desert.

        Sanecha K. R.

        Bat Expert

        Reddy Sa’ab was my first wildlife teacher who taught me the importance of wildlife when I was just 9 years old and since then I was attracted towards wildlife.

        Ghanshyam Singh

        Nature Guide - Ranthambhore

        He was so encouraging to whomsoever contacted him for any help n knowledge.
        I had my association with him from 2012 when he was CCF at Bharatpur and I organised a national seminar on Forest and wildlife:Present status and challenges ahead.
        His demise is a great loss to wildlife conservationists
        Madan Mohan

        Zoology Professor

        He was a great mam with immense knowledge and vast experience which he always wanted to share. Had the opportunity to spend a few days with him during his visit to various Biodiversity Management committees in Gurugram & Faridabad.
        Samrth Khanna

        Delhi Based Nature expert

        One of the finest officers I have ever come across in the Forest Department. As a sticker to rules, he had to face lot of difficulties in the career, including physical assault.
        Sunny Sebastian

        Journalist - The Hindu

        Ranthambhore was deeply fortunate to have Mr. Reddy at the helm, and we were proud of the India that begat him.
        Geetika Jain

        Wildlife and travel writer

        What a brave and upright officer and a gentleman he was !! I have known him for over 35 years !!
        Raja Chaterjee

        Kolkata Based Wildlife Conservationist

        Officer who made the difference in Conservation of Ranthambhore. A great officer and even greater human being.
        Manoj Dholkia

        Gujrat Wildlife expert

        वल्चर सेफ ज़ोन: गिद्धों को बचाने की एक पहल

        वल्चर सेफ ज़ोन: गिद्धों को बचाने की एक पहल

        गिद्ध, हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के अभिन्न अंग हैं, जो सफाईकर्मी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, बीते कुछ दशकों में गिद्धों की आबादी में खतरनाक गिरावट आई। गिद्धों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाना उनके संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

        गिद्ध, प्रकृति के सफाईकर्मी के रूप में जाने जाते हैं, ये मृत जानवरों को खाकर पर्यावरण को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से, विश्वभर में गिद्धों की संख्या पिछले तीन दशकों में चिंताजनक रूप से कम हुई है और इस गिरावट से राजस्थान भी अछूता नहीं रहा। हालांकि हाल ही में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार भारत में गिद्धों की संख्या स्थिर हुई है, लेकिन बढ़ नहीं रही है।

        भारतीय गिद्धों का एक समूह (फ़ोटो: बनवारी यदुवंशी)

        भारत में कभी नौ गिद्धों की प्रजातियाँ पाई जाती थीं, जिनमें से तीन – वाईट-रम्प्ड गिद्ध (Gyps bengalensis), भारतीय गिद्ध (Gyps indicus) और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध (Gyps tenuirostris) – गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं।

        इन नौ प्रजातियों में शामिल हैं: लॉन्ग-बिल्ड गिद्ध (Gyps indicus), स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध (Gyps tenuirostris), वाईट-रम्प्ड गिद्ध (Gyps bengalensis), हिमालयन ग्रिफॉन (Gyps himalayensis), यूरेशियन ग्रिफॉन (Gyps fulvus), सिनेरियस गिद्ध (Aegypius monachus), रेड-हेडेड गिद्ध (Sarcogyps calvus), इजिप्शियन गिद्ध (Neophron percnopterus), और  बेयरडेड गिद्ध (Gypaetus barbatus)

        राजस्थान, अपने शुष्क वनों और खुले मैदानों के कारण, गिद्धों के लिए महत्वपूर्ण आवास स्थल है। यहाँ बेयरडेड गिद्ध और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध को छोड़कर बाकी सातों प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से चार प्रजातियाँ निवासी हैं और यहीं प्रजनन करती हैं, जबकि तीन अन्य प्रजातियाँ प्रवासी पक्षी के रूप में ऑक्टोबर से मार्च के महीनों में यहाँ देखी जाती हैं, कभी-कभी अप्रैल के मध्य तक भी यहाँ देखी जा सकती हैं। राजस्थान में पाए जाने वाले प्रवासी गिद्धों की प्रजातियों में हिमालयन ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन, और सिनेरियस गिद्ध शामिल है।

        कोटा ज़िले में स्थितः भारतीय गिद्ध का ब्रीडिंग और नेस्टिंग साइट (फ़ोटो: बनवारी यदुवंशी)

        यहाँ ध्यान दें कि गिद्धों की संख्या में तेजी से गिरावट आने का कारण मुख्य रूप से पशुओं में इस्तेमाल की जाने वाली स्टेरॉयडमुक्त प्रज्वलनरोधी (NSAIDS) दवाएँ थी। नसाइड्स दवाओं में भी डाईक्लोफेनाक का उपयोग गिद्धों के अस्तित्व के लिए घातक साबित हुआ। डाईक्लोफेनाक को पशुओं के लिए दर्द निवारक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जो की मृत पशुओं के अवशेषों में रह जाता और जब गिद्ध इन मृत जानवरों को खाते तो डाईक्लोफेनाक उनके शरीर में प्रवेश कर उनके गुर्दे की कार्यक्षमता को नष्ट कर देता जिससे उनकी मृत्यु हो जाती थी।

        डाईक्लोफेनाक के उपयोग से मुख्य रूप प्रभावित प्रजातियों में वाईट-रम्प्ड गिद्ध, भारतीय गिद्ध और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध शामिल थे। इन तीन प्रजातियों की आबादी में 95% से अधिक की गिरावट आई थी। अन्य प्रजातियाँ भी कम संख्या में पाई जाती हैं, जिससे गिद्धों के पारिस्थितिक कार्यों पर व्यापक प्रभाव पड़ा, और शहरों और गाँव में मृत जीवों के शव कई दिनों तक सड़ते हुए देखे जाने लगे।

        डाईक्लोफेनाक को पशुओं के लिए दर्द निवारक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जो की मृत पशुओं के अवशेषों में रह जाता और जब गिद्ध इन मृत जानवरों को खाते तो डाईक्लोफेनाक उनके शरीर में प्रवेश कर उनके गुर्दे की कार्यक्षमता को नष्ट कर देता जिससे उनकी मृत्यु हो जाती थी। (फ़ोटो: प्रवीण)

        गिद्धों के लिए अन्य खतरों में शामिल है उनके आवास का नुकसान। पेड़ों को काटना और चट्टानों को तोड़ना गिद्धों के घोंसले बनाने के लिए उपयुक्त स्थानों को कम कर देता है। दूसरा कारण है विद्युत लाइन। गिद्ध बड़े पंखों वाले पक्षी होते हैं, और वे अक्सर विद्युत लाइनों से टकराकर मारे जाते हैं। इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में, गिद्धों का उनके शरीर के अंगों के लिए अवैध रूप से शिकार किया जाता है, जिन्हें तांत्रिक क्रियाओं में इस्तेमाल करने की गलत धारणा है।

        गिद्धों की इस चिंताजनक स्थिति को देखते हुए 2000 के दशक के मध्य में डाईक्लोफेनाक के पशु चिकित्सा उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया और साथ ही पशु चिकित्सकों को गिद्धों के लिए सुरक्षित दवाओं के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया गया। पूरे भारत की तरह, राजस्थान में भी डाईक्लोफेनाक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के बाद से गिद्धों की संख्या में मामूली सुधार तो हुआ है, लेकिन उनकी आबादी अभी भी अपने मूल स्तर से बहुत कम है।

        गिद्धों के संरक्षण के लिए भारत सरकार और वन्यजीव संस्थाएं मिलकर कई प्रयास कर रही हैं जिनमें वल्चर सेफ ज़ोन (वल्चर सेफ़ ज़ोन), गिद्ध अभयारण्य, संरक्षण और प्रजनन केंद्र, और जागरूकता अभियान शामिल हैं।

        गिद्ध अभयारण्य: “गिद्ध अभयारण्य” नामक विशेष क्षेत्रों की स्थापना की जा रही है। इन क्षेत्रों में पशुओं के मृत शरीरों को जहर रहित दवाओं से उपचारित किया जाता है ताकि गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन उपलब्ध हो सके। देश का एकमात्र गिद्ध अभयारण्य रामदेवरा बेट्टा हिल है, जो की कर्नाटक के रामानगर जिले में स्थित है।

        संरक्षण और प्रजनन केंद्र: देश भर में कई गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों में घायल गिद्धों का उपचार किया जाता है और स्वस्थ गिद्धों को प्रजनन के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इन केंद्रों से भविष्य में जंगल में गिद्धों को छोड़ा जा सकता है। भारत में नौ गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र (वीसीबीसी) हैं, जिनमें तीन बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) और बाकी सेंट्रल जू अथॉरिटी द्वारा प्रशासित हैं:

        • पिंजौर, हरियाणा: 2001 में गिद्ध देखभाल केंद्र के रूप में स्थापित, यह 2004 में भारत का पहला वीसीबीसी था
        • राजभटखावा, पश्चिम बंगाल: 2005 में स्थापित
        • रानी, ​​गुवाहाटी, असम: 2007 में स्थापित
        • केरवा, वन विहार राष्ट्रीय उद्यान, भोपाल, मध्य प्रदेश: 2011 में स्थापित
        • हैदराबाद के नेहरू प्राणी उद्यान में हैदराबाद गिद्ध प्रजनन केंद्र
        • जूनागढ़ गिद्ध प्रजनन केंद्र , सक्करबाग प्राणि उद्यान, जूनागढ़
        • रांची गिद्ध प्रजनन केंद्र, मगरमच्छ प्रजनन केंद्र, मुटा, रांची
        • भुवनेश्वर गिद्ध प्रजनन केंद्र, नंदनकानन प्राणि उद्यान, भुवनेश्वर

        भारत मे मौजूद गिद्ध प्रजनन केंद्र (वल्चर ब्रीडिंग सेंटर) (मैप: प्रवीण)

        वल्चर सेफ ज़ोन (वीएसजेड): वल्चर सेफ़ ज़ोन न केवल गिद्धों को बचाने में महत्वपूर्ण हैं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी लाभदायक हैं। प्रत्येक वीएसजेड, गंभीर रूप से लुप्तप्राय गिद्ध प्रजातियों में से कम से कम एक प्रजाति के जीवित कॉलोनी पर केंद्रित होती है। वीएसजेड को 100 किमी (30,000 किमी 2 से अधिक) के दायरे वाले क्षेत्रों के रूप में परिभाषित किया गया है, और यह क्षेत्र ओरिएंटल व्हाइट-बैकड गिद्धों (SAVE, 2014) के रेंज के आधार पर निर्धारित किया गया है।

        SAVE के अनुसार वीएसजेड में:

        • पशु चिकित्सा उपयोग के लिए दुकानों पर डाइक्लोफेनाक उपलब्ध नहीं होना चाहिए,
        • कम से कम 800 मवेशियों के शव के जिगर के नमूनों में कोई डाइक्लोफेनाक नहीं पाया जाना चाहिए,
        • वीएसजेड क्षेत्र के भीतर मृत गिद्धों में कोई डाइक्लोफेनाक या आंत संबंधी गठिया नहीं पाया जाना चाहिए,
        • वीएसजेड में गिद्धों की आबादी में स्थिरता या वृद्धि होनी चाहिए।

        गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन की आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है। इसके लिए इन क्षेत्रों में मवेशी आश्रयों अथवा गौशालाओं के साथ मिलकर काम किया जाता है, जहाँ गिद्धों को खाने के लिए मृत गायों को उपलब्ध कराया जाता है।

        कैलादेवी क्षेत्र में मौजूद गंभीर रूप से संकटग्रस्त भारतीय गिद्ध (फ़ोटो: प्रवीण)

        अस्थायी गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (पीवीएसजेड): जब उपरोक्त मानदंड पूरे होते हैं तभी वीएसजेड पूरी तरह से स्थापित होता है। जब तक यह स्थापित नहीं होता की उक्त मानदंड पूरे हो गए हैं तब तक इन क्षेत्रों को अस्थायी गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (प्रविशनल वल्चर सेफ़ ज़ोन) माना जाता है।

        वल्चर सेफ़ ज़ोन की शुरुआत: वर्ष 2011 में नेपाल ने स्थानीय समूहों और गैर सरकारी संगठनों का एक नेटवर्क विकसित करके वीएसजेड स्थापित करने का नेतृत्व किया, और डाईक्लोफेनाक के उपयोग में कमी और रोक सुनिश्चित करने के लिए गिद्धों के प्रजनन इलाकों के आसपास के क्षेत्रों में एक साथ काम किया।

        नेपाल द्वारा वल्चर सेफ़ ज़ोन बनाने के लिए सबसे पहले गिद्धों के प्रजनन इलाकों के आसपास के क्षेत्रों से पशु चिकित्सा के लिए डाइक्लोफेनाक के सभी उपलब्ध स्टॉक को हटाया गया और इसकी जगह गिद्ध सुरक्षित दवा मेलॉक्सिकैम को स्थापित किया गया। यह बदलाव उन्होंने प्रजनन क्षेत्रों के 50 किमी की दूरी तक के दायरे में स्थापित किया।

        डाइक्लोफेनाक को मेलोक्सिकैम से बदलने के बाद स्थानीय समुदाय के बीच एक व्यापक शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम चलाया। इस कार्यक्रम में गिद्धों के शवों को साफ करने की क्षमता के संबंध में जानकारी दी और यह भी बताया की किस प्रकार ये बीमारी के खतरों को कम करते हैं और कुत्तों की बढ़ती संख्या को भी नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इसके अलावा किसानों, पशुचिकित्सकों और फार्मासिस्टों के साथ कार्यशालाएँ आयोजित की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे डाइक्लोफेनाक के उपयोग से होने वाली समस्याओं के बारे में जानते हैं।

        नेपाल के बाद भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी वल्चर सेफ़ ज़ोन के माध्यम से गिद्धों के इन-सीटू संरक्षण पर जोर दिया।

        कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य गिद्धों की एक छोटी आबादी को संरक्षित करता है, जो की एक संभावित वल्चर सेफ़ ज़ोन भी घोषित किया जा सकता है (फ़ोटो: प्रवीण)

        राजस्थान के गिद्ध संरक्षण के प्रयास: गिद्धों की आबादी के हिसाब से देखा जाए तो राजस्थान एशिया के गिद्धों के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। देश का सबसे बड़ा राज्य होने के साथ ही यहाँ 22 जिलों में गिद्धों का आश्रय पाया गया है, जिनमें निवासी और प्रवासी गिद्ध दोनों ही शामिल हैं। प्रवासी पक्षी (मुख्यतः ईगिप्शियन वल्चर) प्रजनन के लिए यहाँ घोंसलों का निर्माण कर प्रजनन करते हैं इसलिए यहाँ गिद्धों के संरक्षण के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाना आवश्यक है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए राजस्थान के संरक्षणवादी और गैर सरकारी संस्थाएँ काफी समय से राजस्थान में गिद्ध प्रजनन केंद्र की मांग कर रहे हैं।

        गिद्ध संरक्षण के लिहाज से बीकानेर स्थित जोरबीड गिद्ध संरक्षण रिजर्व राजस्थान द्वारा किया गया एक सफल प्रयास है। हालांकि अभी तक इस क्षेत्र को वीएसजेड का दर्ज नहीं मिल पाया है।

        गिद्ध संरक्षण के लिए काम कर रहे प्रोफेसर डॉ दाऊ लाल बोहरा ने जोरबीड को वीएसजेड घोषित करवाने हेतु यहाँ आ रहे मवेशियों के शवों जी जांच कारवाई और पाया की किसी भी शव के उपचार के लिए गिद्धों के लिए हानिकारक दवाओं का उपयोग नहीं किया गया बल्कि उनके लिए सुरक्षित दवाएँ ही उपयोग की गई हैं। इसके अलावा संदिग्ध जानवरों को कुत्तों के खाने के लिए रखा जाता है। साथ ही स्थानीय औषधि विक्रेताओं को जागरूक किया जा रहा है ताकि जल्द से जल्द इस क्षेत्र को वीएसजेड घोषित किया जा सके।

        जोरबीड का गिद्धों के लिए महत्तव देखते हुए यहाँ आ रहे गिद्धों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिंगिंग और टैगिंग कार्यक्रम चलाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीएमएस सीओपी में भी राजस्थान के महत्तव और यहाँ गिद्ध संरक्षण के प्रयासों को और मजबूत करने हेतु चिंता जताई जा चुकी है। सीएमएस सीओपी उन पार्टियों का सम्मेलन है, जो जंगली जानवरों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर प्राथमिक निर्णय लेने और उनकी पालना सुनिश्चित करने के लिया बनाया गया है।

        भारत में वल्चर सेफ ज़ोन: वीएसजेड के मुख्य लक्ष्य सभी देशों में समान हैं, हालांकि मॉडल अलग-अलग देशों में और यहां तक कि एक देश के भीतर भी भिन्न देखने को मिल जाते हैं। नेपाल ने वीएसजेड पर वर्ष 2011 में काम शुरू किया, जिसके बाद भारत ने 2012 के शुरुआत में काम शुरू किया। बांग्लादेश देश ने 2014 में काम शुरू किया और वीएसजेड को गजेट अधिसूचना के माध्यम से कानूनी दर्जा देने वाला पहला देश बन गया। जबकि नेपाल और भारत में वीएसज़ेड को कोई कानूनी दर्जा नहीं प्राप्त है। भारत में 9 चयनित क्षेत्रों को गिद्धों के लिए संभावित गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (वीएसजेड) के रूप में पहचाना गया है। ये सारे क्षेत्र गिद्ध प्रजनन केंद्रों को ध्यान में रखते हुए पहचाने गए हैं। हरियाणा में पिंजौर, पश्चिम बंगाल में राजाभटखावा, असम में माजुली द्वीप के आसपास, एमपी में बुक्सवाहा, यूपी में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान और कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य, झारखंड में हज़ारीबाग़, और गुजरात में सौराष्ट्र।

        संरक्षणवादी एवं गैर सरकारी संस्थाएँ मौजूदा गिद्ध सुरक्षित क्षेत्रों को स्थापित एवं मजबूत करने और नए क्षेत्र बनाने के लिए काम कर रहे हैं। उम्मीद है कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में इस पहल से गिद्धों के संरक्षण में सफलता मिलेगी।

        (कवर फ़ोटो (बनवारी यदुवंशी): कोटा के गैपरनाथ क्षेत्र के पास भारतीय गिद्धों का एक समूह

         

        स्याहगोश (Caracal) का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र: धौलपुर करौली टाइगर रिजर्व

        स्याहगोश (Caracal) का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र: धौलपुर करौली टाइगर रिजर्व

        हाल ही में बना बाघों का नया घर – धौलपुर करौली टाइगर रिजर्व, राज्य को मध्य प्रदेश से ही नहीं जोड़ता बल्कि यह स्याहगोश (caracal) का देश में सबसे उत्तम स्थान है। यह स्थान बाघों ने अपने लिए स्वयं चयन किया है और जिस तरह बढ़ रहे है उन्होंने सबको चौंका दिया है।

        आज कल सरकार और प्रभावी लोगों की मर्जी से बाघ रिज़र्व निर्धारित होते है, जगह उचित हो या नहीं हो यह मायने नहीं रखता, धौलपुर करौली बाघ रिज़र्व का चयन बाघों ने खुद चयन किया है। राजस्थान के बाघ क्षेत्र को मध्यप्रदेश के बाघ क्षेत्र से ठीक से जोड़ने वाले इस लैंडस्केप का आने वाले समय में राज्य के बाघ संरक्षण में अपना अनूठा स्थान होगा।

        धौलपुर एवं करौली जिले के वन क्षेत्रों का टाइगर रिजर्व बनने का सफर वर्ष 2022-23 में शुरू हुआ जब राजस्थान सरकार ने इन क्षेत्रों को राज्य का पाँचवाँ टाइगर रिजर्व के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) को भेजा। एनटीसीए ने इसे विकसित करने की प्रारम्भिक मंजूरी फरवरी 2023 में दी और अगस्त 2023 में इसे देश के 54वें बाघ संरक्षित क्षेत्र के रूप में विकसित करने की अंतिम मंजूरी दी। परंतु राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना जारी करने से पहले 20 सितम्बर को मध्य प्रदेश में वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व बनाने की अधिसूचना जारी कर दी गई। धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व की अधिसूचना 6 अक्तूबर 2023 को जारी की गई, जिससे यह देश का 55वां टाइगर रिजर्व बना। टाइगर रिजर्व बनना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, क्योंकि ऐतिहासिक तौर पर बाघ इस क्षेत्र में हमेशा ही रहे हैं, सिंह और रेड्डी, 2016 के अनुसार शिकार और अन्य कारणों से बाघ यहाँ से गायब हो गये परन्तु बाघों का आखिरी जोड़ा वर्ष 1986 तक राम सागर सेंचुरी के बाड़ी कस्बे में देखा गया था।

        धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व मे मौजूद दमोह खोह परिदृश्य (फोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

        जैसा की नाम से पता चलता है, धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व राजस्थान के धौलपुर और करौली जिलों में संयुक्त रूप से फैला हुआ है। यह रणथंभौर, रामगढ़ विषधारी और मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व से बने विस्तृत टाइगर लैंडस्केप से जुड़ा हुआ है। चंबल नदी इस रिजर्व की पूर्वी सीमा निर्धारित करती है। चम्बल के दूसरी ओर मध्य प्रदेश राज्य में कूनो राष्ट्रीय उद्यान एवं माधव शिवपुरी राष्ट्रीय उद्यान के भी निकट है। यह निकटता इन क्षेत्रों के बीच जानवरों की आवाजाही को सुगमता प्रदान करेगी, जो बाघों की स्वस्थ आबादी को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। यद्यपि अभी बाघों की आवाजाही दूर की कौड़ी लगती है।

        यहाँ मौजूद भिन्न प्रकार के परिदृश्य इस क्षेत्र को वन्यजीवों की विविधता के लिए इसे उपयुक्त बनाते है। रिजर्व में विंध्याचल की पहाड़ियों का खुला क्षेत्र जिसे स्थानीय लोग डांग कहते है, गहरी झरने युक्त घाटियाँ जिसमें दमोह एवं कुशालपुर शामिल है स्थानीय लोग खो के नाम से जानते है, चम्बल के विशाल बीहड़ क्षेत्र, मिश्रित जंगल, मानव निर्मित आर्द्रभूमि और नालों में 10 महीनों तक बहता पानी और घास के खुले मैदान शामिल हैं। चंबल नदी रिजर्व के पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह जानवरों के लिए ना केवल पानी उपलब्ध कराती है, तटवर्ती आवासों को बनाए रखने में मदद करती है और वन्यजीवों की आवाजाही के लिए एक प्राकृतिक गलियारे के रूप में कार्य करती है।

        चंबल के बीहड़ एक चुनौतीपूर्ण स्थान होने के साथ ही ये स्याहगोश जैसे दुर्लभ बिल्लियों का आवास स्थल भी है (फोटो: टाइगर वॉच)

        चंबल के बीहड़ नदी के किनारे पाए जाने वाली एक अनूठी भौगोलिक विशेषता है। इन बीहड़ों का निर्माण चंबल और उसकी सहायक नदियों के कटाव से हुआ है, इन नदियों ने लाखों वर्षों में ऊबड़खाबड़ रूप से से कटाव कर भूल-भुलैया जैसे स्थान का निर्माण किया और मौसमी भारी बारिश एवं पानी के निरंतर प्रवाह के कारण इन बीहड़ों का निर्माण हुआ है। चंबल के बीहड़ एक चुनौतीपूर्ण स्थान हैं, लेकिन उनमें एक खास सुंदरता भी है जो सियहगोश जैसे दुर्लभ बिल्लियों का खास स्थान है।

        धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व के विस्तार को देखा जाए तो यह 1075 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके कुल क्षेत्र का लगभग आधा क्षेत्र, 495 वर्ग किमी, बफर के रूप में चिह्नित है, और 580 वर्ग किमी का क्षेत्र क्रांतिक व्याघ्र निवासी क्षेत्र (क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट/ CTH) के रूप में चिह्नित है।

        इसका CTH कुल तीन हिस्सों में है। पहला, धौलपुर जिले में स्थित धौलपुर अभयारण्य के सम्पूर्ण क्षेत्र (204.26 वर्ग किमी) को CTH – I माना गया है। धौलपुर एवं करौली जिले के राष्ट्रीय घड़ियाल अभयारण्य का क्षेत्र (113.10 वर्ग किमी) CTH – II बनाता है। करौली जिले के कैलादेवी अभयारण्य का वह क्षेत्र जो रणथंभोर टाइगर रिजर्व में शामिल नहीं है (290.45 वर्ग किमी) धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व (DKTR) के CTH – III का निर्माण करता है।

        धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व अर्ध-शुष्क जलवायु का क्षेत्र है। इसका मतलब है यहाँ कम बारिश के साथ गर्मी का मौसम अधिक गर्म और कुछ वर्षा के साथ ठंडी सर्दियाँ होती हैं। मुख्य पहलू है कुल मिलाकर कम वर्षा, सालाना 75 से 110 सेमी के बीच होने की संभावना रहती है। इस क्षेत्र की अधिकांश नमी मानसून के मौसम में ही आती है। दक्षिण पश्चिम मानसून के आगमन से गर्मी से कुछ राहत मिलती है। वर्षा काफ़ी बढ़ जाती है, हालाँकि यह अनियमित होती है लेकिन फिर भी यह मौसम जल स्रोतों की पूर्ति और वनस्पति विकास के लिए महत्वपूर्ण है। सर्दियाँ हल्की होती हैं और तापमान सुखद होता है, जो 10°C से 25°C तक होता है। इस अवधि में वर्षा न्यूनतम होती है। कुल मिलाकर, धौलपुर और करौली में पूरे वर्ष महत्वपूर्ण तापमान भिन्नता का अनुभव होता है।

        इतिहास

        चम्बल नदी के तट पर बसे धौलपुर को 1982 में भरतपुर से अलग कर एक जिला बनाया गया था। जिसमें चार तहसीलें, धौलपुर, राजाखेड़ा, बारी और बसेरी शामिल थीं। वर्तमान धौलपुर उत्तर में आगरा, दक्षिण में मध्य प्रदेश के मुरैना ज़िले और पश्चिम में करौली जिले से घिरा हुआ है। 1947 में लगभग 565 आधिकारिक तौर पर घोषित भारतीय रियासतें थीं। धौलपुर ब्रिटिश राज के दौरान राजपूताना राज्य के पूर्व में स्थित एक रियासत थी।

        यहाँ यह जानना रोचक है यह उस समय इसे धवलपुरी नाम से जाना जाता था। राजा ढोलन देव ने 700 ईस्वी में धवलपुरी की स्थापना की थी जबकि वर्तमान धौलपुर को 1050 ईस्वी में राजा धवल देव ने नए शहर के रूप में फिर से स्थापित किया था। राजा धवल देव को ढोलन देव तोमर के नाम से भी जाना जाता है।

        राजा ढोलन देव तोमर ने धौलपुर की स्थापना मौजूदा शहर से 10 किमी दूर बिलपुर गांव के पास की थी। इस स्थान पर किला अभी भी मौजूद है, हालाँकि यह खंडहर अवस्था में धौलपुर शहर के उद्भव का प्रमाण है। तोमरों का राज्य बाणगंगा से लेकर चम्बल नदी तक था। उन्होंने करौली के जादू राजवंश से हारने तक कई वर्षों तक इस स्थान पर शासन किया।

        धौलपुर जिले की सीमा पर मौजूद क्षतिग्रस्त बिलोनी गाँव का किला (फोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

        धौलपुर हर समय ग्वालियर की रक्षा में काम आने वाली छावनी के रूप में देखा जाता था। जैसे, 1489 में बहलोल लोदी और 1502 में सिकंदर लोदी द्वारा ग्वालियर पर कब्ज़ा करने की इच्छा के कारण धौलपुर राजा और दिल्ली के सुलतानों के बीच कई लड़ाइयाँ लड़ी गईं। धौलपुर साम्राज्य ने इस स्थान पर ही आक्रमणकारियों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे ग्वालियर को और अधिक नुकसान न हो। उस समय उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इस स्थान का उपयोग छावनी क्षेत्र के रूप में किया जाता था। इस काल में धौलपुर पर सिकंदर लोदी का रणनीतिक शासन था।

        इब्राहिम लोदी की मृत्यु के बाद धौलपुर के सेनापति मुहम्मद जैफून ने स्वयं को इस क्षेत्र का शासक घोषित कर दिया। लेकिन इब्राहिम लोदी को हराने वाले बाबर ने इस क्षेत्र को वापस पाने के लिए अपने योद्धा तलाई खान को भेजा। तलाई खान ने मुहम्मद जैफून के विद्रोह को खत्म किया और धौलपुर को मुगल साम्राज्य के अधीन कर दिया। धौलपुर को बाबर और उसके अनुयायी मुगल सम्राटों के लिए एक आकर्षक स्थान माना जाता था। वे धौलपुर के अद्भुत माहौल में अपनी रानियों के साथ पारिवारिक समय बिताते थे। अकबर ने यहाँ खानपुर और शाही तालाब में किले का निर्माण भी कराया। दिल्ली में जहाँगीर के शासनकाल के दौरान यह स्थान शाहजहाँ और नूरजहाँ के लिए भी गौरव का विषय बन गया। औरंगजेब तक, धौलपुर को मुगलों के राजनीतिक मानचित्र पर पूरी तवज्जोह मिली लेकिन उसकी मृत्यु के बाद राजा कल्याण सिंह ने इस क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया और खुद को धौलपुर का राजा घोषित कर दिया। थोड़े समय के बाद भरतपुर के महाराजा सूरज मल ने 1761 ई. में धौलपुर पर कब्ज़ा कर लिया।

        अंग्रेज हर तरफ अपने पैर पसार रहे थे। वे भारत के अधिक हिस्सों पर कब्ज़ा करने के लिए कुछ संधियाँ और सहयोगी बनाते, उसमें ग्वालियर और गोहद प्राचीन काल के महत्वपूर्ण नगर हुआ करते थे। जाटों ने अंग्रेजों की सहायता से मराठों को इस क्षेत्र से खदेड़ दिया। इसके अलावा, अंग्रेजों और मराठों के बीच धौलपुर के बदले गोहद वापस देने की संधि हुई थी। उस समय से राणा कीरत सिंह राजाखेड़ा और बारी के साथ-साथ धौलपुर के शासक बन गये। धौलपुर राज्य पर ब्रिटिश राज की छत्रछाया में जाट शासक राणा वंश का शासन हुआ करता था। आजादी के समय तक यह राजपूताना का हिस्सा बना रहा।

        करौली राज्य

        पूर्ववर्ती करौली राज्य चंबल नदी के पश्चिमी तट पर स्थित था और मत्स्य राज्यों का हिस्सा था जिसमें अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली शामिल थे। राज्य के अधिकांश हिस्सों में विंध्य तत्व वाली निचली पहाड़ियाँ थीं, जो पठार जैसी दिखती थीं और खोह से बनी गहरी घाटियाँ थीं। चंबल नदी की ओर पश्चिम की ओर बढ़ने पर 5-8 किलोमीटर चौड़े बीहड़ का सामना करना पड़ता है जो की कुछ स्थानों पर 35-50 मीटर गहरे होते हैं।

        मेवाड़ के बाद पूरे राजपूताना में करौली राज्य में वनों का सबसे बड़ा क्षेत्र था। राज्य की एक बड़ी आबादी चरवाहे गुर्जर समुदाय की होने के कारण राज्य में कृषि का व्यापक रूप से अभ्यास नहीं किया जाता था। इसलिए राज्य का दो-तिहाई हिस्सा लगभग 2000 वर्ग कि.मी. जंगल और बीहड़ के रूप में विकसित था।

        करौली राज्य में एक वन अधिकारी कनिष्ठ कर्मचारियों के साथ राजस्व विभाग के अधीन काम करता था। वनों का न तो सीमांकन किया गया और न ही उनका व्यावसायिक दोहन किया गया। वे केवल ईंधन और चारे की आपूर्ति और शिकार के उद्देश्य से थे। जंगलों में प्रवेश करने वाले सभी मवेशियों पर चराई शुल्क लगाया जाता था। राज्य शीशम और खैर जैसे पेड़ों की सख्त सुरक्षा करता था। 1944 के बाद ही, राज्य ने खैर के वाणिज्यिक निष्कर्षण और अन्य राज्यों में इसके निर्यात की अनुमति प्रदान की।

        राज्य के शासकों और उनके विशिष्ट अतिथियों को शिकार के विशेष अधिकार प्राप्त थे। आदमखोर वन्यजीवों के मामले में भी केवल शासक ही उनका शिकार कर सकता था या ऐसा करने के लिए किसी को नामित कर सकता था। यहां तक कि जागीरदार जिनके प्रशासन के तहत जंगलों पर नियंत्रण होता था, उन्हें भी शासक की अनुमति के बिना ऐसे वन्यजीवों के शिकार पर प्रतिबंध था। अवैध शिकार, लकड़ी काटने या चराने के लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान था। उदाहरण के लिए, किसी को भी जंगली सुअर का शिकार करते हुए पकड़े जाने पर तीन महीने की कैद होती थी। करौली के शासकों के अलावा, सरमथुरा को धौलपुर राज्य के हुक्मों ने भी प्रभावित किया। महाराज राणा उदयभान सिंह ने सरमथुरा में शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया था, जो उनके प्रशासन की सीमाओं से परे था। हालाँकि, शासक के प्रति अत्यधिक सम्मान के कारण, किसी ने भी आदेशों की अवहेलना करने का साहस नहीं किया।

        वर्तमान करौली के कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य के दो हिस्से कर दिए गए हैं जिसके एक हिस्से को अभी रणथम्भोर टाइगर रिज़र्व के हिस्से के रूप में जाना जाता है और दूसरे हिस्से को DKTR के हिस्से के रूप में देखा जाता है। DKTR में मंडरायल रेंज का हिस्सा शामिल किया गया है। मंडरायल करौली जिले में स्थित है, परन्तु करौली को मंडरायल के राजा ने ही बसाया था जिसे पहले कल्याणपुरी नाम से जाना जाता था।

        मंडरायल कस्बे का यह विचित्र नाम ‘मंडरायल’ एक ऋषि माण्डव्य के नाम से पड़ा था। मंडरायल नाम के पीछे एक और कहानी है की बयाना के प्रसिद्ध महाराजा विजयपाल के एक पुत्र मदनपाल या मण्डपाल ने मंडरायल को बसाया था और वहां एक किले का निर्माण संवत 1184 के लगभग कराया था। यह किला गहरे लाल बलुई पत्थरों से बना है, किले के अंदर एक और बाला किला जैसा स्थान है जो अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता था। इतिहासकार इसे ग्वालियर के किले की चाबी कहते है। ग्वालियर मध्य प्रदेश का सबसे विशाल राज्य था और इसकी ताकत लगभग आगरा या दिल्ली के समान ही थी। ग्वालियर को जितने के लिए मंडरायल को हासिल किये बिना यह मुश्किल था।

        वन क्षेत्र एवं वन्यजीव

        धौलपुर करौली टाइगर रिजर्व के वन मुख्यतः उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वनों की श्रेणी में आते हैं। यहाँ धोक एक मुख्य वृक्ष है। तेंदू और सालर भी यहाँ अच्छी संख्या में पाए जाते हैं। यहाँ के मैदानी इलाकों में कुछ जगह पलाश अथवा छीला के पेड़ पाए जाते हैं, वहीं करौली क्षेत्र में पहाड़ के तपते पठार पर छितराए खैर के पेड़ मिलते हैं। यहाँ की गहरी घाटियों के नालों के किनारे जामुन, गूलर आदि के पेड़ पाए जाते हैं। इस पूरे क्षेत्र में शीशम के पेड़ भी पाए जाते हैं। इस पूरे क्षेत्र में अनियमित रूप से बिखरी हुई शमी (Dichrostachys cinerea) की झाड़ी भी अच्छी संख्या में मौजूद है।

        विशाल वन क्षेत्र के साथ, पूर्ववर्ती करौली राज्य वन्यजीवों की संख्या में समृद्ध था। इसके दक्षिण-पूर्व की ओर, कैलादेवी के प्रसिद्ध मंदिर के आसपास वन क्षेत्र मौजूद थे। यह क्षेत्र बाघों, तेंदुओं, भालू, सांभर और जंगली सूअरों सहित अन्य प्रजातियों के लिए जाना जाता था और दक्षिण में जयपुर राज्य और पूर्व में ग्वालियर के जंगलों से सटा हुआ था। रेड्डी और सिंह, 2016 के अनुसार इस क्षेत्र में चौसिंगा मौजूद नहीं थे और चिंकारा इस क्षेत्र में व्यापक थे। काले हिरण मासलपुर और नादौती के आसपास पाए जाते थे और आज भी नादौती के आसपास पाए जाते हैं। करौली से लगभग 40 किलोमीटर उत्तर में तिमनगढ़ किला है। इस क्षेत्र में धौलपुर के जंगलों से कनेक्टिविटी के साथ अच्छा जंगल था।

        धौलपुर के संरक्षित क्षेत्र, वन विहार और राम सागर, में चीतल, सांभर और चिंकारा की बड़ी आबादी थी। राज्य में जंगली सूअरों को भी सख्ती से संरक्षित किया गया था। बाघ और तेंदुए ज्यादातर संरक्षित क्षेत्रों तक ही सीमित थे। 1960 के दशक तक राज्य के जंगली हिस्सों में भालू पाए जाते थे और चंबल के बीहड़ों में जंगली कुत्ते भी पाए जाते थे।

        1955 में, वन विहार और रामसागर, जो धौलपुर के शासकों के पूर्व शिकार अभयारण्य थे, को वन्यजीव अभयारण्य के रूप में अधिसूचित किया गया। वन विहार 25 वर्ग किमी के क्षेत्र को कवर करता है और रामसागर 34 वर्ग किमी क्षेत्र में व्याप्त है। विंध्य पठार पर स्थित ये दोनों अभयारण्य 1980 के दशक तक बाघ, तेंदुए और भालू जैसे वन्यजीवों का समर्थन करते थे।

        वर्तमान में धौलपुर करौली टाइगर रिजर्व कई लुप्तप्राय वन्यजीवों की आबादी का समर्थन करता है। भारतीय भेड़िये कैलादेवी क्षेत्र में काफी अच्छी संख्या में मौजूद हैं। सियागोश, एक प्रकार की छोटी बिल्ली, यहाँ पाई जाती है। विश्व स्तर पर सियागोश की आबादी चिंता का विषय नहीं है, लेकिन स्थानीय स्तर पर देखा जाए तो यह लुप्तप्राय है, जिसकी बची हुई आबादी के लिए यहाँ के बीहड़ उत्तम स्थान हैं। सियागोश को यहाँ टाइगर वॉच की टीम द्वारा कई बार कैमरा ट्रैप किया गया है, और उनके द्वारा लगातार निगरानी भी की जा रही है।

        ऐतिहासिक तौर पर ना मिलने वाले, वर्तमान में चौसिंगा भी इस टाइगर रिजर्व के कैलादेवी क्षेत्र में मौजूद हैं। यहाँ चौसिंगा को पहली बार टाइगर वॉच की टीम ने ही 6 जून 2020 मासलपुर से कैमरा ट्रैप किया और तब से अब तक कई बार रिपोर्ट कर चुके हैं।

        मासलपुर से टाइगर वॉच के कैमरा ट्रैप मे कैद चौसिंगा (फोटो: टाइगर वॉच वालन्टीर टीम)

        एक और स्तनधारी की लुप्तप्राय प्रजाति पैंगोलिन भी इस क्षेत्र में पाई जाती है। यहाँ उल्लेखनीय है की 2020 में टाइगर वॉच की टीम ने पैंगोलिन के शिकार की खबर वन विभाग के अधिकारियों दी थी। इसके अलावा हरी मोहन गुर्जर की निगरानी में कार्यरत टाइगर वॉच की वालन्टीर टीम द्वारा गिद्धों की एक सक्रिय कॉलोनी को थेगड़ा गौशाला से रिपोर्ट किया, जिसको देखने के लिए बॉम्बे नैच्रल हिस्ट्री सोसाइटी की टीम सहित अन्य कई संस्थाओं के लोग आ चुके है। थेगड़ा के अलावा भी इस क्षेत्र के कई हिस्सों में गिद्धों की आबादी मौजूद है।

        चम्बल नदी में गंगा नदी डॉल्फिन भी पाई जाती है, और कई बार ऊदबिलाव भी देखे गए हैं। अन्य स्तनधारियों में भालू, बघेरा, लकड़बग्घा, आदि भी यहाँ आसानी से देखे जाते हैं। 2015 में बाघों की वापसी के बाद से इस क्षेत्र में बाघों की आबादी लगातार बढ़ती ही जा रही है।

        बाघों का इतिहास

        धौलपुर राज्य में बाघ

        धौलपुर उन गणमान्य व्यक्तियों के बीच लोकप्रिय था जो बाघों का शिकार करना चाहते थे। 1890 के दशक की शुरुआत में, ऑस्ट्रिया के आर्कड्यूक जैसे शाही मेहमान धौलपुर में बाघों के शिकार के लिए आमंत्रित लोगों की सूची में थे। राजकोट के राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल सी.डब्ल्यू. वाडिंगटन, जो बाद में धौलपुर के शासक की राजनीतिक सेवाओं में शामिल हो गए, ने 1930 के दशक की शुरुआत में धौलपुर के आसपास एक ही दिन में सात बाघों के पाए जाने का उल्लेख किया था। बीकानेर के महाराज सर गंगा सिंह ने भी 1900 की शुरुआत में धौलपुर का दौरा किया था। अपनी शुरुआती दो यात्राओं में उन्होंने केसरबाग और आसपास की पहाड़ियों पर बाघ देखे।

        मार्च 1927 में महाराज गंगा सिंह ने एक बाघ को एक भैंस का शिकार करते देखा। केसरबाग और चम्बल के बीहड़ वाले क्षेत्र में इस दौरान 15 बाघों के होने का जिक्र मिलता है। महाराज गंगा सिंह एक बाघिन और शावकों को केसरबाग और तबली-का-ताल जंगल में देखे जाने का जिक्र भी करते हैं। इसके अलावा इन दिनों यहाँ के विभिन्न हिस्सों से 10 से अधिक बाघों की खबर आईं। इनमें दमोह, राय खोह, गुर्जा, तालाब शाही के पास बनास राही और रामसागर झील की खबरें और शावकों के साथ एक बाघिन की खबरें शामिल थीं। नरभदा और रिजोनी, धौलपुर में बाघों के लिए जाने जाने वाले अन्य स्थान थे।

        जून 1954 में, एक डकैत-विरोधी पुलिस गश्ती दल ने आत्मरक्षा में वन विहार में एक बाघिन और उसके छह महीने के शावक को गोली मार दी। वन विहार ने 1961 में चार, 1963 में पांच और 1966 में दो बाघों की संख्या के साथ 1960 के दशक में अपनी बाघों की आबादी को बनाए रखना जारी रखा। वन विभाग के अधिकारियों द्वारा यहाँ आखिरी बाघ का जोड़ा राम सागर अभयारण्य में 1986 तक देखा गया।

        करौली राज्य में बाघ

        करौली के जंगल बाघों के लिए जाने जाते थे। पड़ोसी राज्य ग्वालियर के महाराजा सर जीवाजीराव सिंधिया (1925-61) अधिक शिकार नहीं करते थे और वन्यजीवों के संरक्षण के पक्षधर थे इसलिए, उनके शासनकाल के दौरान, ग्वालियर क्षेत्र में बाघों की संख्या में वृद्धि हुई और कभी-कभी उन्हें चंबल पार करके करौली के करणपुर क्षेत्र में प्रवेश करते देखा गया। 1954 में, कैलाश सांखला ने ऐसे ही एक बाघ को उटगिर के किले से चंबल पार करते और एक मगर से लड़ते हुए देखा, जो असंभव प्रतीत होता है, क्योंकि चम्बल उटगिर से बहुत अधिक दूर है।

        परंपरागत रूप से, करौली में दो शिकार शिविर आयोजित किये जाते थे। शीतकालीन शिविर उत्तर में मासलपुर में आयोजित किया जाता था जबकि ग्रीष्मकालीन शिविर वर्तमान कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य में करणपुर में आयोजित किया जाता था। ये शिविर मुख्य रूप से जनता के लिए शासक के साथ बातचीत करने और उसके समक्ष अपनी शिकायतों को संबोधित करने के लिए थे। हालाँकि, उनका उपयोग शिकार के अवसर के रूप में भी किया जाता था। महाराजा गणेश पाल देव (1947-1984) ने अपने जीवनकाल में लगभग 300 बाघों का शिकार किया जिनमें से लगभग सभी करौली क्षेत्र में थे। ऐसी ही एक शिकार के दौरान, उन्हें मंडरायल के नीडर में एक ही बीट में चार बाघों का शिकार किया। उनके बड़े बेटे युवराज बृजेंद्र पाल देव ने 1939 और 1966 के बीच करौली के जंगलों में लगभग हर साल कम से कम एक बाघ का शिकार किया। उनके छोटे बेटे युवराज सुरेंद्र पाल देव ने भी लगभग 70 बाघों का शिकार किया।

        बाघों का शिकार 1960 के दशक तक जारी रहा जिससे उनकी संख्या में भारी गिरावट आई। इस क्षेत्र में बाघों का दिखना दुर्लभ हो गया था। 1967 में सरमथुरा के गद्दी क्षेत्र में आखिरी बाघ देखा गया। अंततः बाघ कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य तक ही सीमित मान लिया गया। हालाँकि, यह भी एक अल्पकालिक घटना थी। 1991-92 में सुप्रीम कोर्ट के विशेष आदेश पर कैलादेवी में गणना करायी गयी। गणना में 6-7 बाघों के साक्ष्य सामने आए, लेकिन कोई प्रत्यक्ष सामना नहीं हुआ। 2000 तक यह स्पष्ट हो गया कि बाघ करौली के सभी हिस्सों से गायब हो गया था। समकालीन समय में केवल कभी-कभार अस्थायी बाघ ही कैलादेवी में प्रवेश करते रहे। हालाँकि ये घटनाएँ दुर्लभ और अल्पकालिक थी। 2010 में, टी-7 या मोहन ने इस क्षेत्र से होकर केवलादेव-घाना तक अपनी यात्रा जारी रखी। जनवरी 2013 में, टी-26 का शावक T56 रणथंभौर से गोपाज़ घाटी के माध्यम से रिजर्व में प्रवेश किया और फिर चंबल पार करने के बाद कुनो-पालपुर अभयारण्य तक चला गया। नवंबर 2014 में, टी-71 को घंटेश्वर की खोह के पास कैलादेवी में फोटोकैप्चर किया गया था, जो की इस क्षेत्र में बाघों की वापसी की घटना थी।

        बाघों की वापसी

        2015 में वन विभाग के विशेष आग्रह पर, टाइगर वॉच की विलिज वाइल्ड्लाइफ वालन्टीर टीम को रणथंभोर ने निकले बाघों की निगरानी का कार्य दिया गया। बाघों को खोजने में कुशल इस टीम ने जल्द ही अपने कैमरा में बाघ के फोटो को कैद किया, दिन था 14 अगस्त 2015 का, जब वालन्टीर एक फोटो लेकर आया, असल में यह टाइगर की पीठ के एक थोड़े से हिस्से का फोटो था, क्योंकि बाघ कैमरा ट्रैप के एकदम नजदीक से होकर निकला था। कैलादेवी अभयारण्य में बाघ का होना ही एक बड़ी घटना थी। इस अधूरे फोटो से भी बाघ की पहचान हो गयी, और पता चल की यह फोटो ‘सुलतान’ नामक बाघ की थी।

        टाइगर वॉच की वालन्टीर टीम रणथंभोर से निकले बाघों की खोज के दौरान (फोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

        इसके बाद सुलतान की निगरानी करते हुए ही नीदर बांध के पास लगाए कैमरा ट्रैप में एक और बाघ का फोटो कैद किया गया, लेकिन यह सुलतान की ना होकर, किसी दूसरे बाघ की थी, इसकी पहचान टी-92 के रूप में की। इसके अगले दिन अलग-अलग रास्तों पर बाघ के पगमार्क मिले, जो की सुलतान के होने की पहचान की गई। कुछ दिन बाद टी-72 (सुलतान) कैलादेवी से निकल गया, जिसको टाइगर वॉच की वालन्टीर टीम ने धौलपुर के दामोह खोह में कैद किया। लगभग एक साल बाद, वालन्टीर टीम ने टी-92 को दो शावकों के साथ मंडरायल कस्बे के पास निदर का तालाब क्षेत्र में देखा और रिपोर्ट किया। टी-92 के ये शावक टी-72 के साथ हुए।

        शावक जब बड़े होने लगे तो दोनों शावक माँ से अलग हो गये। इनको नए नाम दिए गए T117 (श्री देवी) एवं T118 (देवी)। अचानक इसी बीच एक और बाघ के रणथम्भोर से कैलादेवी आने की खबर आयी। उप वन संरक्षक श्री नन्द लाल प्रजापत के विशेष आदेश पर टाइगर वॉच की टीम को उसकी मॉनिटरिंग के लिए लगाया गया और कुछ दिनों में ही इस टीम के केमरा ट्रैप में नए मेहमान की फोटो ट्रैप हुई जिसकी पहचान बाघ T116 के रूप में हुई, जो रणथम्भोर के कवालजी वन क्षेत्र से निकल कर चम्बल के रास्ते धौलपुर के सरमथुरा रेंज पहुँचा और झिरी बीहड़ में जाकर रुका।

        इसके बाद वालन्टीर टीम टी-116 की निगरानी में धौलपुर क्षेत्र में लग गई। इस दौरान टी-116 के क्षेत्र में कई गायों के शिकार मिले, तो लगने लगा, यहाँ एक से अधिक बाघ विचरण कर रहे हैं, और यही हुआ इस वन क्षेत्र में एक बाघिन शावक टी-117 का विचरण भी मिल गया एवं उसकी फोटो भी कैद हो गयी। टी-117, कैलादेवी क्षेत्र में जन्मी टी-92 “सुंदरी” की संतान थी। इस बीच टी -117 ने दो शावकों को जन्म दिया, और बाघों की संख्या इस क्षेत्र में चार हो गई।

        टी-92 कैलादेवी देवी क्षेत्र मे अपने शावकों के साथ (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

        इसके बाद 2022 में, एक और बाघ के रणथंभोर से निकलने की खबर आई, जो की वालन्टीर टीम के अनुसार गंगापुर से करौली होते हुए धौलपुर के वन विहार क्षेत्र में पाया गया, और फिर दो-तीन महीने के लिए मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में पहुँच गया और फिर वापस चम्बल के रास्ते धौलपुर आ गया। इस बाघ की पहचान टी-136 के रूप में की गई। यह बाघ अत्यंत गतिशील था और लगातार मध्य प्रदेश और राजस्थान के बीच आता-जाता रहता था। लेकिन फिर इस बाघ के जनवरी 2023 में धौलपुर से निकलकर मध्य प्रदेश में पुनः बसाये गए चीता के क्षेत्र के आस पास होने की खबर आई। इसके बाद इसके वापस धौलपुर में होने के संकेत मिले, लेकिन साक्ष्य नहीं मिले, और टीम आश्वस्त है की यह बाघ मध्य प्रदेश में रह रहा है।

        टी-136 के निगरानी के दौरान, धौलपुर में एक नए बाघ के होने का पता चला। वालन्टीर टीम ने वन विहार कोठी के पास से बाघ को कैमरा ट्रैप किया, और इसकी पहचान टी-2302 “गब्बर” के रूप में की गई। लेकिन यह बाघ कुछ दिन के बाद ही धौलपुर से निकलकर वापस करौली होते हुए रणथंभोर पहुँच गया।

        टी-117 ने अप्रैल 2023 में एक बार फिर शावकों को जन्म दिया, इस बार तीन शावक हुए, जो की धौलपुर के लिए खुशी की बात थी क्योंकि इससे यहाँ बाघों की संख्या बढ़ने लगी थी।

        इसके बाद साल 2024 भी धौलपुर के लिए सुखद लेकर आया जब जनवरी में ही रणथंभोर के कैलादेवी क्षेत्र से एक और बाघ निकलकर धौलपुर पहुँच गया, इसकी पहचान टी-2303 के रूप में हुई। इस बाघ के आगमन के साथ धौलपुर में अब कुल छः बाघ हो चुके हैं, जिनके भविष्य में बढ़ने की उम्मीद है।

        धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व के सामने समस्याएं

        नव-घोषित यह बाघ क्षेत्र, हालांकि बाघों के लिए उपयुक्त है, साथ ही यह पहला बाघ संरक्षित क्षेत्र है जिसे बाघों ने स्वयं चुना है, परंतु इस क्षेत्र के सामने कई समस्याएं भी चुनौती बनकर सामने आई हैं जिनका जल्द से जल्द निवारण नहीं हुआ तो यहाँ के वन्य जीवन को प्रभावित कर सकता है।

        1. सबसे बड़ी समस्या है लैंडस्केप को जाने बिना उसके CTH और Buffer का निर्माण करना। बाघ जिन क्षेत्रों को इस्तेमाल करता है वह क्षेत्र आज भी बाघ रिज़र्व का हिस्सा नहीं बन पाए है। इस क्षेत्र के CTH और Buffer का निर्धारण ऐसे लोगों ने किया है जिन्होंने इस रिज़र्व में पर्याप्त समय नहीं बिताया है।
        2. सबसे गंभीर समस्या यहाँ के क्षेत्रों में होने वाली खनन क्रिया है। मुख्यतः यहाँ संरक्षित क्षेत्र के पास और अंदर के क्षेत्रों में पत्थरों का खनन होता है जो की यहाँ के वन्य जीवन को अत्यंत प्रभावित करता है। यह हजार करोड़ से अधिक का अवैध व्यापार का हिस्सा है जिसमें सेंकडो नहीं वरन हजारों लोग शामिल है। इसके अलावा यहाँ चम्बल क्षेत्र में बजरी का खनन भी काफी हद तक विनाशकारी है जिसे रोकने में प्रशासन और सरकार पूरी तरह विफल है । अक्सर यह लोग रोकथाम करने पर फायरिंग आदि भी कर देते है।

          रणथंभोर के फील्ड डायरेक्टर के पद पर काम करने के दौरान श्री पी कथिरवेल धौलपुर क्षेत्र मे खनन के विरुद्ध कार्यवाही करते हुए (फोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

        3. धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व, राज्य का या संभवतः देश पहला बाघ संरक्षित क्षेत्र है जिसके अंदर भारतीय सेना अभ्यास निरंतर अंतराल पर आयोजित होता रहता है। इस क्षेत्र में आर्मी की चांदमारी या गोला बारूद का अभ्यास क्षेत्र भी है । वन विभाग ने ३० वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को सेना के लिए लीज पर दे रखा है। यह चांदमारी क्षेत्र DKTR टाइगर रिज़र्व के केंद्र में है जहाँ अक्सर सेना रात दिन अभ्यास करती है। वन विभाग के लोग अक्सर मानते है की सेना निर्धारित क्षेत्र से अधिक स्थान का उपयोग भी कर लेती है।

          सैन्य अभ्यास के बाद, ग्रामीण अभ्यास स्थल से बॉम्ब के शेल्स एकत्रित करते पाए जाते हैं (फोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

        4. पाली और जोधपुर के घुमंतू लोग अपनी भेड़ों के साथ इस क्षेत्र में लगभग दो महीने तक डेरा डालते हैं और काफी हद तक यहाँ की जैव विविधता को प्रभावित करते हैं। मध्य प्रदेश से लगे होने के कारण वहाँ के आदिवासी लोग भी इस क्षेत्र से जड़ी-बूटी के लिए वनस्पतियों का दोहन करते हैं, जिनमें प्रमुख रूप गूगल के गोंद, शतावरी की जड़ें, वरना की छाल, सब्जा के बीज आदि शामिल है।

          बाघ विचरण क्षेत्र मे मारवाड़ी लोगों के भेड़ों का दबाव (फोटो: टाइगर वॉच )

        5. इस क्षेत्र में वन्य-जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं यहाँ बसे हुए गाँव और उनमें रहने वाले लोगों की गतिविधियां। धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व के कोर में बसे गाँव जैसे की खुशलपुरा, गिरोनिया, रीछराकी, मठ, मालपुर और झरी आदि को पुनर्वासित करने के लिए प्राथमिकता दिए जाने की जरूरत है, क्योंकि बाघों की गतिविधि इसी क्षेत्र में अधिक है। मूल-भूत सुविधाओं के अभाव में बसे ये गाँव मुख्यतः वनों पर आश्रित हैं। चम्बल किनारे बसे गाँव के लोग वन क्षेत्र में अवैध खेती करते है, अंदर बसे गाँव के लोग पशुपालन एवं खनन स्थलों पर मजदूरी करते हैं। इन गाँव के विस्थापन से खनन, अवैध कटाई, एवं शिकार आदि गतिविधियों में कमी आने की संभावना है, जो की बाघों के बढ़ती आबादी के मुफीद होगा।

        इस बाघ रिज़र्व को बचाने के लिए और बाघों के लिए सुरक्षित करने के लिए कई कदम उठाने पड़ेंगे इसके लिए वन विभाग और संरक्षणवादियों को मजबूत इच्छा शक्ति दिखानी होगी।