राजस्थान के बाघ अभयारण्यों से गाँवों के विस्थापन की तथ्यात्मक कहानी

राजस्थान के बाघ अभयारण्यों से गाँवों के विस्थापन की तथ्यात्मक कहानी

भारत के जंगलों में, जहाँ बाघ की दहाड़ के बीच हज़ारों परिवारों का शोर भी सुनाई देता है, वहाँ उनके खेत, उनके पशु, उनके देवता और उनके पुरखों के स्मारक स्थल — सब उसी जंगल से जुड़े हैं। लेकिन जब भारत ने अपने बाघों को बचाने का फ़ैसला किया, तो सबसे पहला सवाल यही उठा: क्या बाघ और इंसान एक ही ज़मीन पर रह सकते हैं? यद्यपि, इस यक्ष प्रश्न के उत्तर पर आज भी मतभेद बना हुआ है।

इस सवाल को समझने के लिए पहले ‘विस्थापन’ को समझना ज़रूरी है। ‘विस्थापन’ यानी किसी गाँव या बस्ती को उसकी पुरानी जगह से हटाकर कहीं और बसाना — जो इस देश में बाँध, सड़क और विकास की अन्य गतिविधियों के लिए होता ही रहता है। टाइगर रिज़र्व के संदर्भ में विस्थापन के लिए ग्रामीणों की सहमति सर्वोपरि होती है, और इसीलिए इसे ‘स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन’ कहा जाता है। वन विभाग का तर्क है कि जब गाँव बाघ के ‘क्रिटिकल हैबिटेट’ — यानी उसके मुख्य इलाक़े — में बसे हों, तो न तो बाघ सुरक्षित रह पाता है और न ही ग्रामीण।

एक ओर, जंगल के अंदर रहने वाले लोग लकड़ी, चारा, पानी और ज़मीन के लिए उसी वन पर निर्भर होते हैं। उनके मवेशी बाघ के प्राकृतिक शिकार को प्रभावित करते हैं, और कभी-कभी बाघ खुद उनके पशुओं को उठा ले जाता है — इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। दूसरी ओर, वन्यजीव विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर बाघ को एक बड़ा और सुरक्षित क्षेत्र मिले, तो उसकी संख्या सुरक्षित रह सकती है।

इसलिए यह बहस सिर्फ़ पर्यावरण की नहीं, बल्कि न्याय, संस्कृति, पहचान और आजीविका की भी है। इस लेख में हम इसी जटिल सवाल के विभिन्न पहलुओं को राजस्थान के संदर्भ में समझेंगे — 1976 के रणथम्भौर से लेकर आज के धौलपुर-करौली तक, और पशु चराने वाले परिवारों से लेकर नेचर गाइड बन चुके युवाओं तक के सफ़र की चर्चा करेंगे।

जंगल बचाने की नींव

ब्रिटिश राज के दौर में, सिर पर सफारी टोपी लगाए, हाथ में राइफ़ल थामे और अभी-अभी मारे गए बाघ पर पैर टिकाए खड़े ‘साहब-शिकारी’ की तस्वीर बेहद आम थी। आज़ादी के बाद भी यह सिलसिला रुका नहीं। किसी को ठीक-ठीक यह तक नहीं पता था कि भारत के जंगलों में कितने बाघ बचे हैं, और उन्हें अंधाधुंध मारा जा रहा था।

बीसवीं सदी के आरंभ में, अनुमान के अनुसार, भारत में बाघों की संख्या लगभग 40,000 थी। लेकिन शिकार, जंगलों की कटाई और खेती के विस्तार ने इस संख्या को बुरी तरह घटा दिया। गिरावट इतनी तेज़ थी कि 1972 में हुए देश के पहले बाघ सर्वेक्षण में मोटे तौर पर यह अनुमान लगाया गया कि भारत में बाघों की संख्या घटकर महज़ 1,827 रह गई थी।[2]

बाघ की यह दुर्दशा अकेले भारत की चिंता नहीं रह गई थी। 1969 में अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने अपनी आम सभा दिल्ली में आयोजित की। राजस्थान के वनाधिकारी कैलाश संखला ने इसी सभा में अपना पर्चा ‘द वैनिशिंग टाइगर’ प्रस्तुत किया, और सभा ने एक प्रस्ताव (GA 1969 RES 015) पारित कर बाघ के शिकार पर रोक (मोरेटोरियम) तथा प्रजाति की रक्षा के लिए तत्काल क़दमों की माँग की। इसी अपील के बाद भारतीय वन्यजीव बोर्ड ने राज्यों से पाँच साल के लिए बाघ के शिकार पर प्रतिबंध लगाने को कहा, और 1970 तक देश में बाघ के शिकार पर पूरी रोक लग गई।[1]

प्रिंस फिलिप, महारानी एलिज़ाबेथ, जयपुर के महाराजा और महारानी रणथंभौर में।
चित्र: साइमन एंड शूस्टर (Simon & Schuster)

लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय इतने भर से आश्वस्त नहीं हुआ। 1972 में वर्ल्ड वाइड फंड फ़ॉर नेचर के प्रभावशाली ट्रस्टी गाय माउंटफ़र्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से मुलाक़ात कर उनसे इस प्रजाति को विलुप्ति से बचाने का आग्रह किया। पर्यावरण और संरक्षण के प्रति गहरी रुचि रखने वाली प्रधानमंत्री ने स्थिति का अध्ययन करने और आगे की योजना बनाने के लिए विशेषज्ञों का एक दल गठित किया। डॉ. करण सिंह की अध्यक्षता वाले इस दल ने अगस्त 1972 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, और इसी से भारत के बाघ-संरक्षण कार्यक्रम का खाका तैयार हुआ — वही कार्यक्रम जो आगे चलकर ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ कहलाया। इसी दौर में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 भी पारित हुआ। जाने-माने संरक्षणवादी एच. एस. पंवर ने इन वर्षों को देश में संरक्षण के प्रति नज़रिये में आए एक ‘आमूल बदलाव’ के रूप में याद किया है।[1][2]

इन्हीं प्रयासों की परिणति 1 अप्रैल 1973 को हुई, जब इंदिरा गाँधी ने ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की औपचारिक शुरुआत की। शुरुआत में यह कार्यक्रम छह वर्षों के लिए — अप्रैल 1973 से मार्च 1979 तक — सोचा गया था। इसका घोषित उद्देश्य था: भारत में बाघों की एक व्यवहार्य आबादी बनाए रखना, और इन क्षेत्रों को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में सदा के लिए सुरक्षित रखना, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इनसे लाभ, शिक्षा और आनंद पा सकें। टास्क फ़ोर्स ने अलग-अलग पारिस्थितिकी-तंत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले चुनिंदा अभयारण्यों से शुरुआत करने का सुझाव दिया था, और लॉन्च के समय देश के नौ जंगलों को इसमें शामिल किया गया। रणथम्भौर इन्हीं नौ अभयारण्यों में से एक था।[2]

इसी के साथ वह प्रक्रिया शुरू हुई जो आज भी जारी है — जंगल को बाघों के अनुकूल और अधिक सुरक्षित बनाने की प्रक्रिया, जिसका सबसे दुष्कर और महत्त्वपूर्ण कार्य है: जंगल के अंदर बसे गाँवों का विस्थापन।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक बाघ शावक को गोद में लिए हुए। बाईं ओर मूल ऐतिहासिक छायाचित्र, दाईं ओर Artificial Intelligence (AI) की सहायता से उन्नत एवं रंगीन किया गया संस्करण। स्रोत: इंटरनेट पर उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखीय छवि।

विस्थापन का ढाँचा

टाइगर रिज़र्व से गाँवों का विस्थापन एक ऐसी प्रक्रिया है जो दशकों में बनी कई नीतियों और क़ानूनों से नियंत्रित होती है। इन्हें समझे बिना यह विषय अधूरा रहेगा।

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और प्रोजेक्ट टाइगर

1972 के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम ने बाघ के शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया और राष्ट्रीय उद्यानों व अभयारण्यों को क़ानूनी दर्जा दिया। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के साथ यह वैज्ञानिक सोच और स्पष्ट हो गई कि बाघ को प्रजनन और अस्तित्व के लिए विशाल और अबाधित आवास चाहिए, जिस पर उसका अपना एकाधिकार हो। इसलिए तय हुआ कि उसके ‘कोर एरिया’ को मानव गतिविधियों से पूरी तरह मुक्त — यानी ‘अक्षुण्ण’ (inviolate) — रखना होगा। तर्क यह था कि मवेशियों की चराई, जलावन-लकड़ी की कटाई और खेती जंगल को खंडित करती है और हिरन जैसे प्राकृतिक शिकार-आधार को घटाती है।

लेकिन एक अहम बात यह है कि 1972 के अधिनियम में विस्थापन के लिए कोई अलग, अधिकार-आधारित नीति नहीं थी। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की आकस्मिक शुरुआत के बाद गाँवों को मुख्यतः इसी अधिनियम की सामान्य शक्तियों और कार्यकारी आदेशों के सहारे हटाया गया। जब किसी इलाक़े को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने की मंशा अधिसूचित होती, तो ज़िला कलेक्टर पर ‘अधिकारों के निपटान’ (Settlement of Rights) की ज़िम्मेदारी आ जाती — यानी उस सीमा के भीतर मौजूद मानव अधिकारों का अधिग्रहण, समाप्ति या स्थानांतरण। चूँकि ये इलाक़े नए टाइगर रिज़र्व के कोर के रूप में सख़्त राष्ट्रीय उद्यानों में बदले जा रहे थे, व्यवहार में यह ‘निपटान’ गाँवों को खाली कराने का रूप ले लेता था।[16]

उस दौर की सोच को ‘फ़ोर्ट्रेस कंज़र्वेशन’ (क़िलेबंद संरक्षण) कहा जाता है — यह मान्यता कि प्रकृति की सबसे अच्छी रक्षा उसे इंसानों से पूरी तरह अलग रखकर ही होती है। चूँकि उस समय न तो निर्वाचित ग्राम सभाएँ थीं और न ही वन अधिकार अधिनियम जैसा कोई क़ानून, इसलिए विस्थापन वन विभाग के ऊपर से थोपे गए आदेशों के ज़रिए होता था। उदाहरण के लिए, रणथम्भौर में 1973 से 1979 के बीच 12 गाँवों के 800 परिवारों को बाहर बसाया गया, ताकि अवैध शिकार पर रोक लगे और उजड़ा आवास फिर से पनप सके।

इन शुरुआती विस्थापनों में आज जैसे तय मुआवज़े, क़ानूनी सुरक्षा-कवच या पुनर्वास के दिशा-निर्देश मौजूद नहीं थे, इसलिए ये अक्सर वनवासी समुदायों के लिए बेहद कष्टकारी साबित हुए। इन्हीं कठोर और ग़ैर-मानकीकृत विस्थापनों के अनुभव ने आगे चलकर 2006 में अधिनियम के संशोधन की ज़मीन तैयार की।

2006 के संशोधन में ‘क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट’ (CTH) की अवधारणा लाई गई — यानी ऐसे कोर क्षेत्र जिन्हें बाघ के लिए अक्षुण्ण रखना ज़रूरी है। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि CTH से कोई भी विस्थापन स्वैच्छिक हो, उचित मुआवज़े सहित हो और स्थानीय समुदायों की सहमति से ही हो। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) इस पूरी प्रक्रिया की देखरेख करता है।

वन अधिकार अधिनियम, 2006

2006 में वन अधिकार अधिनियम (FRA) के आने के बाद विस्थापन की प्रक्रिया और जटिल हो गई। इस क़ानून ने अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को अपनी ज़मीन पर क़ानूनी अधिकार दिए। FRA के तहत यह तय हुआ कि जब तक सामुदायिक और व्यक्तिगत वन अधिकारों की मान्यता नहीं हो जाती, तब तक विस्थापन ग़ैर-क़ानूनी है। हालाँकि ज़मीन पर यह नियम अक्सर टूटता भी रहा — कई जगह FRA की प्रक्रिया पूरी किए बिना ही परिवारों को विस्थापित कर दिया गया। वर्ष 2025 में केंद्रीय जनजातीय मंत्रालय ने एक नया नीति-ढाँचा जारी किया, जिसमें कहा गया कि विस्थापन ‘अपवादस्वरूप, स्वैच्छिक और प्रमाण-आधारित’ होना चाहिए।

NTCA के 2008 के दिशा-निर्देश

फ़रवरी 2008 में NTCA ने स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन के विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए। इनमें परिवारों को दो विकल्प दिए गए।

पहला — नक़दी पैकेज: प्रति परिवार 10 लाख रुपये (जो बाद में बढ़ाकर 15 लाख कर दिए गए), जिसके तहत परिवार ख़ुद ज़मीन और मकान की व्यवस्था करता है।

दूसरा — ज़मीन पैकेज: मूल ज़मीन के बराबर नई ज़मीन, मकान के लिए 1.5 लाख रुपये और सामुदायिक सुविधाएँ।

सबसे अहम बात यह थी कि यह पूरी प्रक्रिया ‘स्वैच्छिक’ थी — परिवार और ग्राम सभा की सहमति के बिना कोई विस्थापन नहीं।

राजस्थान सरकार की नीतियाँ: 2002, 2022, 2025

जैसा ऊपर ज़िक्र हुआ, रणथम्भौर में विस्थापन 1970 के दशक में ही शुरू हो चुका था; लेकिन राजस्थान में इसकी पहली औपचारिक नीति 2 नवंबर 2002 को जारी हुई। इसी के तहत रणथम्भौर के पादरा गाँव के 111 परिवारों को खण्डार के पास गणेशनगर गाँव में बसाया गया — यह 2002 की नीति के बाद की पहली बड़ी विस्थापन कार्रवाई थी।

हालाँकि गणेशनगर गाँव को बसाने को वन भूमि की बड़ी हानि के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि यह स्थान बाघों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि लोगों को जंगल के एक किनारे से निकालकर दूसरे किनारे पर ही बसा दिया गया — जबकि उस दौर में सरकारों के पास मुआवज़ा देने के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध थी।

7 सितंबर 2022 को इस पैकेज में बड़ा संशोधन हुआ, और फिर 24 जुलाई 2025 को एक नया आदेश जारी किया गया। नए आदेश में ज़मीन पैकेज के अंतर्गत मूल ज़मीन के साथ 1 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि (जिसमें कम से कम 0.8 हेक्टेयर सिंचित या 1.6 हेक्टेयर असिंचित), भूमिहीनों को भी न्यूनतम ज़मीन, और रहने के लिए कम से कम 5,400 वर्ग फ़ुट का आवासीय प्लॉट देने का प्रावधान किया गया। नक़दी पैकेज में NTCA के नियमानुसार प्रति परिवार 15 लाख रुपये की व्यवस्था रखी गई। दोनों में से कोई एक विकल्प परिवार चुन सकता है। यह राशि CAMPA और वन्यजीव फंड से दी जाती है, जिससे राज्य सरकार पर अलग से वित्तीय बोझ नहीं पड़ता।

रणथंभौर के कोर क्षेत्र में स्थित अनंतपुरा गाँव, पुनर्वास से पूर्व (1976) कॉपीराइट: Tiger Watch.

1976 की कहानी

क़ानून और नीतियों का यह ढाँचा जिन असली घटनाओं पर खड़ा है, उनमें सबसे पहली और सबसे चर्चित कहानी रणथम्भौर की है। राजस्थान का रणथम्भौर — जहाँ आज दुनिया भर के पर्यटक बाघ देखने आते हैं — कभी एक ऐसा जंगल था जिसमें गाँव और जंगल एक-दूसरे में गुँथे हुए थे। 1973 में जब इसे टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया, तब 392 वर्ग किलोमीटर के इस वन क्षेत्र में कुल 16 गाँव थे। इनमें से 12 गाँव जंगल के एकदम भीतरी हिस्से में गहरे बसे हुए थे और शेष 4 बाहरी परिधि में। ये सभी गाँव 16 अलग-अलग पॉकेट्स में बिखरे हुए थे, जिससे वन्यजीवों के लिए कोई एकसूत्र, निर्बाध आश्रय-स्थल नहीं बचा था। बड़े भूखंडों पर खेती होती थी और अत्यधिक चराई से जंगल की घास तेज़ी से ख़त्म हो रही थी। वन्यजीव दिन में छिपे रहते और रात में ही निकलते।

ऐसे में तत्कालीन उप-क्षेत्र निदेशक फतेह सिंह राठौड़ को इन 12 भीतरी गाँवों के विस्थापन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना जो उस ज़माने में भी असामान्य था और आज भी एक मिसाल बना हुआ है — दबाव नहीं, भरोसा। वे गाँव-गाँव जाते, लोगों के बीच बैठते और उनकी ज़रूरतें सुनते।

“जंगल और उसके सभी प्राणी ईश्वर की रचना हैं। क्या देवी दुर्गा — जो राक्षसों का नाश करती हैं — स्वयं बाघ पर सवार नहीं होतीं? इस दिव्य सृष्टि को बिगाड़ने का हक़ किसी इंसान को नहीं है। जंगल को उसके वास्तविक स्वरूप में लौटाना होगा।” — फतेह सिंह राठौड़, ग्राम चौपालों पर (Ward, Geoffrey C., and Diane Raines Ward, Tiger-Wallahs, New York: HarperCollins, 1993)

1975 में ज़िला स्तर पर ‘प्रोजेक्ट टाइगर विलेज रिलोकेशन कमेटी’ बनाई गई, जिसमें ज़िला प्रमुख, फ़ील्ड डायरेक्टर और ज़िला कलेक्टर शामिल थे। समिति की 27 दिसंबर 1975 की बैठक में तय हुआ कि विस्थापन दो चरणों में होगा — पहले 6 गाँव डुमोदा के पास कैलाशपुरी में, और फिर 6 गाँव छान-फरिया के पास गोपालपुरा में। सरकार की ओर से वन भूमि को राजस्व विभाग को हस्तांतरित करने की स्वीकृति मिलते ही काम शुरू हो गया।

12 गाँव, 200 परिवार, एक नया जीवन

सन् 1976 में यह ऐतिहासिक काम मूर्त रूप लेने लगा। पहली सफलता अणतपुरा गाँव से आई — जगन गुर्जर नाम के एक स्थानीय युवक ने पहल की, लोगों को समझाया, और गाँव राज़ी हो गया। छितर गुर्जर ने भी इसमें सहयोग दिया। एक बार शुरुआत होने के बाद बाक़ी गाँव भी एक के बाद एक हटने लगे। सुबह-सुबह ट्रकों की क़तार आती; लोग आँखों में आँसू और सपने लिए अपना सामान लादते, और एक गहरी ख़ामोशी में अपने पुराने घर, गली और गाँव को अलविदा कहते। पेड़ों से लिपटकर रोते लोग फतेह सिंह को भी भावुक कर देते थे। उन्हीं के शब्दों में —

“यह मेरा सबसे कठिन काम था। लोग पेड़ों से लिपटकर रोए। उन्हें लगता था कि उनका भविष्य बिल्कुल अँधेरे में है। सभी बुज़ुर्गों ने कहा, ‘हमने यहीं पूरी ज़िंदगी गुज़ारी है, हमें यहीं मरने दो।’ मैं भी उनके साथ रो रहा था — क्योंकि मेरे भीतर कहीं यह एहसास था कि वे उस चीज़ की क़ीमत चुका रहे हैं जिसे शायद वे कभी समझ न पाएँ।” — फतेह सिंह राठौड़ (Sanctuary Asia, Vol. XXVIII, No. 3, जून 2008; जेनिफ़र स्कारलॉट के साथ साक्षात्कार)

1976 में आरम्भ हुए पुनर्वास ने रणथंभौर के प्राकृतिक आवासों को मानव दबाव से मुक्त करने और बाघों सहित वन्यजीवों के संरक्षण के लिए आधार तैयार किया। विस्थापित होते ग्रामीण अपना सामान लेकर नए ठिकाने की ओर जाते हुए। कॉपीराइट: Tiger Watch.

एक साल के भीतर सभी 12 गाँव — अणतपुरा, बेरदा, हनुत्या, लकड़दा, फुलेड़ी, छिंदावली, चिरोली, प्रेमपुर, लाहपुर, गुड़ा, क़िला रणथम्भौर और नागदी-रेहमानपुर — खाली हो गए। ये सभी मुख्यतः गुर्जर समुदाय के गाँव थे। कुल 200 परिवार और लगभग 800 लोग अपनी पुरानी ज़मीन छोड़कर नई जगह बसे। उनके साथ लगभग 2,500 मवेशी (भैंस, गाय, बैल, ऊँट, बकरी और खच्चर) भी नए ठिकाने पर आए। सात गाँव — अणतपुरा, बेरदा, हनुत्या, लकड़दा, फुलेड़ी, छिंदावली और चिरोली — कैलाशपुरी (डुमोदा) में बसाए गए, और पाँच गाँव — प्रेमपुर, लाहपुर, गुड़ा, क़िला रणथम्भौर और नागदी-रेहमानपुर — गोपालपुरा (छान) में।

ज़मीन, मुआवज़ा और सुविधाएँ

इस विस्थापन में एक ऐसा पैकेज तैयार किया गया जो उस दौर में अभूतपूर्व था। प्रत्येक परिवार को उसकी मूल ज़मीन के बराबर नई ज़मीन दी गई, और साथ में 5 बीघा अतिरिक्त भूमि का बोनस भी — हर भूमिधारक तथा परिवार के मुखिया को। यहाँ तक कि जो परिवार पहले भूमिहीन थे, उन्हें भी 5 बीघा ज़मीन दी गई। कुल 2,681 बीघा 9 बिस्वा (लगभग 687.5 हेक्टेयर) भूमि वन विभाग से राजस्व विभाग को पुनर्वास हेतु हस्तांतरित की गई — कैलाशपुरी में 1,587 बीघा 9 बिस्वा (लगभग 407 हेक्टेयर) और गोपालपुरा में 1,094 बीघा (लगभग 280.5 हेक्टेयर)।

अचल संपत्ति के लिए नक़दी मुआवज़ा भी दिया गया; 12 गाँवों को कुल ₹4,52,829 का नक़द मुआवज़ा मिला। विस्थापन की सम्पूर्ण लागत ₹5,49,914 रही — जो आज के मूल्यों में लगभग ₹3.5 से 4 करोड़ के बराबर है। इसके अलावा जो सुविधाएँ प्रदान की गईं, वे जंगल में कभी नसीब नहीं हुई थीं: सभी चल संपत्ति को नए स्थान तक पहुँचाने के लिए वाहन, नगर नियोजक (टाउन प्लानर) द्वारा तैयार कैलाशपुरी का मास्टर प्लान, धार्मिक भावनाओं की रक्षा के लिए मंदिर का निर्माण, एक माध्यमिक स्कूल, सामुदायिक कुएँ और डीज़ल पम्प की व्यवस्था, और आस-पास के गाँवों से जोड़ने के लिए सड़कें।

जंगल का पुनर्जन्म

फतेह सिंह की मेहनत का नतीजा देखने में देर नहीं लगी। 1976 में ही उन्होंने रणथम्भौर में पहली बाघिन देखी, जिसे उन्होंने प्यार से ‘पद्मिनी’ नाम दिया। जो खेत कभी मानवीय गतिविधियों से भरे रहते थे, वहाँ घास के मैदान लहलहा उठे। सांभर और चीतल चरने लगे, और बाघ दिन में भी खुलकर विचरने लगा। 1973 में यहाँ बाघों की संख्या महज़ 17–18 थी; आज 70 से अधिक बाघ यहाँ हैं। रणथम्भौर आज दुनिया में बाघ देखने की सबसे बेहतरीन जगहों में से एक है।

डुमोदा के निकट बसाया गया पुनर्वासित गाँव कैलाशपुरी, 1976, रणथंभौर के कोर क्षेत्र से स्थानांतरित परिवारों की नई बसावट। कॉपीराइट: Tiger Watch.

राजस्थान के अन्य टाइगर रिज़र्व: वर्तमान परिदृश्य

रणथम्भौर की कहानी आधी सदी पुरानी है — और एक सफलता की कहानी भी। लेकिन विस्थापन का वही सवाल राजस्थान के बाक़ी टाइगर रिज़र्व में आज भी अनसुलझा है: कहीं अधूरा, कहीं विवादित, तो कहीं बिलकुल नई राह पर।

सरिस्का — बाघ भी गए, गाँव भी रहे

अलवर ज़िले में 1978 में घोषित सरिस्का टाइगर रिज़र्व लापरवाही का एक महँगा सबक है। 2004 में जब एक सर्वेक्षण में यहाँ से बाघों के पूरी तरह ग़ायब हो जाने की बात सामने आई, तो पूरे देश में हलचल मच गई; इसका मुख्य कारण स्थानीय शिकारी गिरोहों द्वारा किया गया अवैध शिकार और जंगल पर लगातार बना मानव दबाव माना गया। इसके बाद ही केंद्र ने ‘टाइगर टास्क फ़ोर्स’ गठित की और 28 दिसंबर 2007 को सरिस्का के ‘क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट’ (CTH) को अधिसूचित किया गया।[6][5]

28 जून 2008 को रणथम्भौर से एक बाघ को हेलिकॉप्टर से लाकर सरिस्का में छोड़ा गया — यह देश का पहला ‘एरियल’ बाघ-स्थानांतरण था। इसके बाद और बाघ लाए गए, और आज यहाँ इनकी संख्या लगभग 48 है।[7][8]

सरिस्का के CTH में 29 गाँव हैं। 2007–08 की NTCA पुनर्स्थापन योजना के तहत भगानी गाँव के 21 परिवार सबसे पहले स्वेच्छा से हटे। मार्च 2024 तक 5 गाँव — भगानी, उमरी, रोटक्याला, पनीधाल और डाबली — पूरी तरह विस्थापित हो चुके थे (कुल 322 परिवार)। विस्थापन के लिए चिह्नित गाँवों के कुल 1,471 परिवारों में से 973 अब तक हट चुके हैं, जबकि सुकोला, क्रास्का, देवरी, कांकवाड़ी और हरिपुरा जैसे गाँवों की प्रक्रिया अभी अधूरी है।[11][8]

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। विस्थापित परिवारों की शिकायत है कि उन्हें पर्याप्त ज़मीन और रोज़गार नहीं मिला। डाबकन जैसे गाँव, जिन्हें 2017–18 में विस्थापन के लिए चुना गया था, आज भी अधर में लटके हैं — वन विभाग ने वहाँ बिजली, पानी और पक्के मकान जैसी बुनियादी सुविधाएँ रोक दीं, और लोग वर्षों से अनिश्चितता में जी रहे हैं। आदिवासी परिवारों ने FRA के तहत सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता के बिना विस्थापन का विरोध किया और अदालत का दरवाज़ा खटखटाया।

अब दबाव दोनों ओर से बढ़ रहा है। सरिस्का के 48 बाघों में 13 शावक ऐसे हैं जिन्हें आने वाले महीनों में अपना अलग इलाक़ा चाहिए; जगह न मिली तो उनके आबादी की ओर बढ़ने का ख़तरा है। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2026 तक शेष विस्थापन पूरा करने का आदेश दिया है, फिर भी बचे हुए गाँवों के लिए न ज़मीन तय हुई है और न मुआवज़ा। यही सरिस्का और रणथम्भौर के प्रबंधन का फ़र्क़ है — एक जगह प्रक्रिया ने भरोसा जीता, दूसरी जगह भरोसा टूटा।

मुकुंदरा हिल्स — गिरधरपुरा की दोहरी त्रासदी

कोटा और झालावाड़ के बीच फैला मुकुंदरा हिल्स 2013 में अधिसूचित राजस्थान का तीसरा टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH लगभग 417 वर्ग किलोमीटर है। इसके CTH में 14 गाँव हैं। मार्च 2024 तक यहाँ केवल 2 गाँव — लक्ष्मीपुरा (30 में से 29 परिवार) और खरली बावरी (24 में से 17 परिवार) — विस्थापित हो सके हैं। बड़े गाँवों की प्रक्रिया अभी आधी-अधूरी है: मशालपुरा के 301 परिवारों में से 156, और घाटी जागीर के 58 में से 21 परिवार ही अब तक हटे हैं, जबकि दामोदरपुरा के 153 परिवारों का विस्थापन शुरू ही नहीं हुआ। मशालपुरा में तो चार परिवार आज भी जाने को तैयार नहीं हैं।[11][9]

रफ़्तार इतनी धीमी रही कि आवंटित पैसा भी पूरा ख़र्च नहीं हो पाया — मुकुंदरा के पुनर्स्थापन के लिए जारी ₹39.16 लाख की राशि अनखर्च रह गई और 2020 में उसे फिर से मान्य (revalidate) कराना पड़ा। नतीजा यह कि यह रिज़र्व का एक हिस्सा आज भी बाघों से लगभग ख़ाली है — यहाँ बमुश्किल एक बाघ-बाघिन की जोड़ी, उनके शावक और दो उप-वयस्क बाघिनें हैं।[10][8]

इसी पृष्ठभूमि में गिरधरपुरा का ज़िक्र ज़रूरी है, क्योंकि यह गाँव एक दोहरी त्रासदी का प्रतीक है। 1960 के दशक में गाँधी सागर बाँध के निर्माण के समय इसे पहले ही एक बार विस्थापित किया जा चुका था; और अब, दशकों बाद, उसी नई जगह को मुकुंदरा के CTH में शामिल कर लिया गया — यानी दूसरा विस्थापन। दो बार उजड़ चुके इन परिवारों के लिए यह पहचान, विश्वास और आसरे का सवाल है। वे पूछते हैं: “अगर अगली बार फिर कोई योजना आई, तो क्या तीसरी बार हटना होगा?”

रामगढ़ विषधारी — नई शुरुआत

बूँदी ज़िले में 2022 में अधिसूचित रामगढ़ विषधारी राजस्थान का चौथा टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH लगभग 482 वर्ग किलोमीटर है। इसके CTH में 8 गाँव हैं। मार्च 2024 तक यहाँ एक भी गाँव पूरी तरह विस्थापित नहीं हुआ है; केवल गुलखेड़ी गाँव की प्रक्रिया शुरू हुई है, जहाँ 208 परिवारों में से 40 अब तक हटे हैं।[13][11]

धौलपुर-करौली — सह-अस्तित्व की नई प्रयोगशाला

धौलपुर-करौली टाइगर रिज़र्व (DKTR) राजस्थान का पाँचवाँ टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH 599.64 वर्ग किलोमीटर है और बफ़र ज़ोन लगभग 458.24 वर्ग किलोमीटर। रिज़र्व के कोर क्षेत्र में 52 गाँव और बफ़र क्षेत्र में 108 गाँव बसे हैं, फिर भी अब तक CTH से किसी भी गाँव का विस्थापन प्रस्तावित नहीं है। जहाँ रणथम्भौर और सरिस्का विस्थापन के मॉडल रहे, वहीं DKTR को एक अलग राह — बाघ और इंसान के सह-अस्तित्व — की प्रयोगशाला के रूप में देखा जा रहा है।[12]

धौलपुर–करौली टाइगर रिजर्व का कोर क्षेत्र। यहाँ स्थित 52 छोटे-बड़े गाँवों में से अब तक एक भी गाँव का पुनर्वास प्रारम्भ नहीं हुआ है।
कॉपीराइट: Tiger Watch.

विस्थापन के बाद जंगल की वापसी

हर पूरा हुआ विस्थापन अपने पीछे दो कहानियाँ छोड़ जाता है — एक जंगल की, और दूसरी उन परिवारों की जो वहाँ से गए। पहले जंगल की बात।

किसी गाँव के खाली होने के बाद वहाँ क्या बचता है? टूटी हुई दीवारें, पुराने कुएँ, मंदिरों के खंडहर, खेतों की मेड़ें, और कभी-कभी तुलसी का एक पौधा जो आज भी उग आता है। लेकिन इन्हीं खाली जगहों में धीरे-धीरे जंगल वापस आने लगता है। रणथम्भौर में जहाँ कभी खेत थे, वहाँ अब घास के मैदान हैं। जहाँ मवेशी चरते थे, वहाँ सांभर और चीतल हैं। जहाँ इंसानी रोशनी थी, वहाँ अब बाघ बेधड़क विचरता है। सरिस्का में भी भगानी गाँव के खाली होते ही पुरानी इमारतें तोड़ दी गईं, ताकि जंगल को जगह मिल सके। पन्ना और रणथम्भौर के अध्ययन बताते हैं कि विस्थापित गाँवों की जगहों पर पहले शाकाहारी वन्यजीव और फिर शिकारी जल्दी लौट आते हैं।

रणथम्भौर के जंगल में आज भी कुछ पुरानी दीवारें खड़ी हैं। सफ़ारी पर जाने वाले पर्यटक इन्हें देखते हैं — ये खंडहर एक पुराने जीवन की याद हैं, और इनमें उन लोगों की स्मृतियाँ बसी हैं जिन्होंने यह जंगल बाघ के लिए वापस कर दिया।

नए गाँव

दूसरी कहानी परिवारों की है। नए गाँवों में जाने के बाद शुरुआती दौर में उनकी मुश्किलें बढ़ जाती हैं। जंगल में जो मुफ़्त था — लकड़ी, पत्ते, जड़ी-बूटियाँ, चारा — वह अब बाहर ख़रीदना पड़ता है। नई ज़मीन पर शुरू-शुरू में फ़सल नहीं उगती। और पड़ोसी गाँव वाले नए आए परिवारों को कभी-कभी संदेह से देखते हैं।

फिर भी समय के साथ तस्वीर बदलती है। 1976 में विस्थापित रणथम्भौर के परिवारों के बसने के बाद सेंटर फ़ॉर एनवायरनमेंट एजुकेशन (CEE), अहमदाबाद की एक टीम ने कैलाशपुरी में सर्वेक्षण किया। उनकी रिपोर्ट में दर्ज है:[18]

“लोग अपने नए गाँव में संतुष्ट दिखे; कुछ ने कहा कि यहाँ जीवन जंगल के उन गाँवों से बेहतर है जहाँ से वे आए हैं।” — Centre for Environment Education, अहमदाबाद — कैलाशपुरी सर्वेक्षण 

कैलाशपुरी और गोपालपुरा — आज की तस्वीर

आज कैलाशपुरी में 300 परिवार हैं और कुल आबादी 1,601 है। 1976 में वन विभाग द्वारा बनाया गया सामुदायिक कुआँ आज भी है — जिसे 1992–93 में वन विभाग ने और गहरा करवाकर दुरुस्त किया। स्कूल और मंदिर, दोनों वन विभाग ने बनवाए थे, जो आज भी गाँव की धड़कन हैं। गाँव का पशुधन — 452 भैंस, 170 गाय, 130 बैल, 3 ऊँट, 622 बकरियाँ और 2 खच्चर, यानी कुल 1,379 पशु — बताता है कि पशुपालन आज भी इन परिवारों की रीढ़ है।

गोपालपुरा में 70 परिवार हैं और आबादी 288। यहाँ 500 बीघा भूमि पर खेती होती है। पशुओं के पानी के लिए वन विभाग ने एक ‘खेल’ (टंका) बनवाया, जबकि मंदिर पंचायत ने बनवाया। पशुधन में 20 भैंस, 150 गाय, 100 बकरी, 40 भेड़ और 2 ऊँट हैं। गोपालपुरा के लोगों ने आस-पास की वन भूमि पर इको-डेवलपमेंट कार्य शुरू किए हैं, और दो बायो-गैस इकाइयाँ भी स्थापित की गई हैं।

रणथम्भौर के दूसरे (हाल के) दौर के विस्थापन में परिवारों को 2.5 लाख रुपये की सहायता राशि, 60×90 फ़ीट का आवासीय भूखंड और 6 बीघा 7 बिस्वा कृषि भूमि दी गई। ये नवस्थापित गाँव अभी भी बुनियादी सुविधाओं — स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल — के लिए विकास की राह पर हैं।

रणथंभौर से पुनर्वासित गाँवों के नेचर गाइड, जो आज रणथंभौर टाइगर रिजर्व में कार्यरत हैं।
कॉपीराइट: मीठालाल गुर्जर.

नई पहचान बनाते युवा

पुनर्वास की कहानी का सबसे उम्मीद भरा अध्याय वह है जो आज लिखा जा रहा है। पुनर्वासित गाँवों के युवा अब केवल मज़दूरी तक सीमित नहीं हैं। पशुपालन में भी एक बड़ा बदलाव आया है: जहाँ पहले देसी नस्लें जंगल में चरती थीं, अब परिवार उन्नत नस्ल के पशु पालने लगे हैं। डेयरी उद्योग से जुड़ाव बढ़ा है, जो नियमित आमदनी का ज़रिया बन रहा है। युवाओं ने ट्रैक्टर-चालन, छोटे व्यापार, निर्माण और परिवहन में भी पैर जमाए हैं।

2023 में रणथम्भौर के तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर पी. कथीरवेल के निर्देश पर रणथम्भौर से विस्थापित गाँवों के 52 युवाओं को, और इको-डेवलपमेंट कमेटी के माध्यम से 30 युवाओं को, नेचर गाइड के रूप में नियुक्त किया। जो जंगल कभी इनकी आजीविका का केंद्र था, अब वही जंगल इन्हें नई पहचान दे रहा है — लेकिन इस बार वन्यजीवों के दोस्त और रक्षक के रूप में।

ग़ैर-सरकारी संगठन टाइगर वॉच ने रणथम्भौर के बाहर बसे पुनर्वासित गाँवों — अनंदीपुरा और गिरिराजपुरा — में दो शिल्प-कौशल विकास केंद्र स्थापित किए हैं, जहाँ महिलाएँ और युवा हस्तशिल्प, बुनाई और पारंपरिक कलाओं का प्रशिक्षण ले रहे हैं। साथ ही अनंदीपुरा में एक डिजिटल शिक्षा केंद्र भी है, जो इन गाँवों के बच्चों को आधुनिक शिक्षा और मुख्यधारा से जोड़ रहा है। यह तस्वीर बताती है कि जब विस्थापन सम्मान के साथ होता है — और पुनर्वास के बाद सतत सहयोग भी मिले — तो यह केवल एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं, बल्कि एक नई संभावना का द्वार भी हो सकता है।

आनंदीपुरा गाँव में टाइगर वॉच के ‘वन्य सखी’ कार्यक्रम की प्रतिभागी महिलाएँ।
कॉपीराइट: Tiger Watch.

एक बड़ा सवाल

जंगल में रहने वाले लोगों के लिए यह सिर्फ़ एक जगह नहीं है — यह उनकी दुनिया है। उनके देवता वहाँ के पेड़ों में हैं, उनके पुरखों की राख उस मिट्टी में मिली है, और उनकी भाषा में उन पेड़-पौधों के नाम हैं जो किसी शब्दकोश में नहीं मिलेंगे। कई परिवारों का कहना है कि ‘स्वैच्छिक विस्थापन’ का नाम तो ज़रूर है, लेकिन ज़मीन पर दबाव बहुत होता है। जंगल के अंदर नई सड़क और इमारत बनाने की इजाज़त नहीं, खेतों में नलकूप नहीं, बच्चों के लिए स्कूल और अस्पताल नहीं — यही धीमा दबाव उन्हें हटने पर मजबूर करता है।

केंद्र सरकार के 2024 के आँकड़ों के अनुसार, 1973 से अब तक देश भर में 257 गाँवों के 25,007 परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है। लेकिन अभी भी 64,801 परिवार टाइगर रिज़र्व के कोर एरिया में रह रहे हैं, और इन सबके विस्थापन एक लंबा तथा बेहद ख़र्चीला काम है।[14]

वन्यजीव विशेषज्ञों का तर्क है कि बाघ को जीवित रहने के लिए बड़ा, निर्बाध क्षेत्र चाहिए। एक बाघ का ‘होम रेंज’ 100 से 400 वर्ग किलोमीटर तक हो सकता है। जब इस इलाक़े में गाँव, खेत और मवेशी होते हैं, तो बाघ का व्यवहार बदल जाता है — वह रात का शिकारी बन जाता है और प्रजनन कम कर देता है। रणथम्भौर का उदाहरण देखें: 1976 में जब 12 गाँव हटे, तब यहाँ बमुश्किल 17–18 बाघ थे; आज 70 से अधिक हैं। फिर भी, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि सभी गाँवों को हटाना ‘न व्यावहारिक है और न वास्तविक’ — इसके बजाय उन गाँवों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो बाघ के मुख्य ‘कॉरिडोर’ में हैं।[14]

क्या विस्थापन ही एकमात्र विकल्प है?

CTH (कोर एरिया) से विस्थापन वैज्ञानिक और क़ानूनी, दोनों दृष्टि से ज़रूरी है। लेकिन बफ़र ज़ोन की बात अलग है। वहाँ सह-अस्तित्व — बाघ और इंसान का साथ-साथ जीना — संभव भी है और व्यावहारिक भी। नेपाल, केन्या और ज़ांबिया जैसे देशों में ‘कम्यूनिटी-बेस्ड कंज़र्वेशन’ सफलतापूर्वक चल रहा है, और भारत में भी बफ़र ज़ोन में ऐसे प्रयोग हुए हैं। रणथम्भौर के बफ़र में नेचर गाइड, EDC कार्यक्रम और टाइगर वॉच के कौशल केंद्र — ये सब इसी सोच की देन हैं: स्थानीय लोग संरक्षण के दुश्मन नहीं, बल्कि उसके सबसे बड़े भागीदार बन सकते हैं।

असली बात यह है: जब विस्थापन सही तरीक़े से होता है — सही मुआवज़ा, सही सुविधाएँ और लोगों की सच्ची इच्छा से — तो जंगल भी बचता है और लोग भी ख़ुश रहते हैं। और जब यह ज़बरदस्ती होता है या वादे टूट जाते हैं, तो लोग नाराज़ होते हैं, बाघों पर दोष मढ़ा जाता है और संरक्षण की भावना ही ख़त्म हो जाती है। इसलिए दोनों विकल्प — CTH से विस्थापन और बफ़र में सह-अस्तित्व — एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।

गाँवों के पुनर्वास और आवास संरक्षण के परिणामस्वरूप बढ़ी बाघों की संख्या ने रणथंभौर को राजस्थान के अन्य टाइगर रिजर्वों के लिए बाघ स्थानांतरण का स्रोत क्षेत्र बना दिया है। कॉपीराइट: डॉ. धर्मेन्द्र खंडाल.

राजस्थान में विस्थापन की स्थिति (मार्च 2024)

(नीचे दी गई जानकारी राजस्थान वन विभाग के अभिलेखों पर आधारित है।)

राजस्थान के टाइगर रिज़र्व — क्षेत्रफल (वर्ग किलोमीटर)

टाइगर रिज़र्वCTHबफ़रकुल
रणथम्भौर1,113.36297.921,411.28
सरिस्का881.11332.231,213.34
मुकुंदरा हिल्स417.17342.82759.99
रामगढ़ विषधारी481.911,019.981,501.89
धौलपुर-करौली599.64458.241,057.88
कुल3,493.192,451.195,944.38

स्वैच्छिक ग्राम विस्थापन की प्रगति

टाइगर रिज़र्वCTH में गाँवपूर्णतः विस्थापितप्रक्रिया में
रणथम्भौर6589
सरिस्का2956
मुकुंदरा हिल्स1422
रामगढ़ विषधारी801
धौलपुर-करौली52*
कुल1681518

* राजस्थान के अन्य चार रिज़र्व के आँकड़े ‘विस्थापन हेतु चिह्नित’ गाँवों के हैं (कुल 116)। धौलपुर-करौली के 52 गाँव कोर/CTH में मौजूद हैं (बफ़र में 108), पर अभी इनमें से किसी का विस्थापन प्रस्तावित नहीं है।

रणथम्भौर — परिवारवार विवरण (मार्च 2024)

गाँवकुल परिवारविस्थापित
इन्दाला3333
पादरा111111
मछनकी5959
मोरडुंगरी157154
भीड़164139
गाड़ीतालाड़ा4949
काथुली151141
काला खोहेरा4646
कलीभट4743
हिंदवार575373
मुंदरहेड़ी16172
बेराई भीमपुरा10291
डांगरा8349
उँची ग्वाड़ी143116
चोड़क्या कलाँ11573
चोड़क्या खुर्द185
मरमड़ा245220
कुल2,2591,774

बाघ भारत की धरोहर है — इसे बचाना हम सबकी ज़िम्मेदारी है। लेकिन यह ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन लोगों पर नहीं थोपी जा सकती जो सदियों से जंगल के साथ जी रहे हैं और जिनका इस संकट में कोई हाथ नहीं था। रणथम्भौर का उदाहरण बताता है कि जब विस्थापन सम्मान के साथ होता है, तो यह दोनों तरफ़ फ़ायदेमंद हो सकता है। 1976 में जिन 200 परिवारों ने अपनी जड़ें छोड़ीं, उनके वंशज आज नेचर गाइड हैं, शिल्पकार हैं, डेयरी किसान हैं, डिजिटल रूप से जुड़े नागरिक हैं — और रणथम्भौर में 70 से अधिक बाघ हैं।

राजस्थान में अभी भी सैकड़ों गाँव टाइगर रिज़र्व के कोर में हैं; 15 पूरी तरह विस्थापित हो चुके हैं और 18 प्रक्रिया में हैं। यह काम लंबा, महँगा और नाज़ुक है। लेकिन अगर CTH में विस्थापन और बफ़र में सह-अस्तित्व — दोनों विकल्पों को एक साथ, समझदारी से चलाया जाए — तो न सिर्फ़ बाघ बचेंगे, बल्कि जो परिवार जाएँगे, वे भी एक बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर जाएँगे।

“जंगल बचाने के लिए पहले लोगों का दिल जीतना होता है।” — फतेह सिंह राठौड़

यही सबसे बड़ा सबक है — जो 1976 में भी सच था, और आज भी उतना ही ज़रूरी है।

संदर्भ:

[1] IUCN (2023), “A catalyst for change” — Project Tiger and IUCN Resolution GA 1969 RES 015. iucn.org/story/202311/catalyst-change

[2] “Project Tiger,” Wikipedia. en.wikipedia.org/wiki/Project_Tiger

[3] Ward, Geoffrey C., and Diane Raines Ward. Tiger-Wallahs: Encounters with the Men Who Tried to Save the Greatest of the Great Cats. New York: HarperCollins, 1993.

[4] Sanctuary Asia, Vol. XXVIII, No. 3 (जून 2008) — फतेह सिंह राठौड़ का जेनिफ़र स्कारलॉट के साथ साक्षात्कार।

[5] Shrivastava, Shubhi. “Dabkan Village with Uncertain Future: A Study of Village Relocation in Sariska Tiger Reserve.” IJCRT, Vol. 10, Issue 5 (May 2022), IJCRT2205864. ijcrt.org

[6] “Sariska Tiger Reserve,” Wikipedia. en.wikipedia.org/wiki/Sariska_Tiger_Reserve

[7] India Together (6 Aug 2008), “Relocation of tigers to Sariska proceeds, amidst caution.” indiatogether.org/relocn-environment

[8] राजस्थान पत्रिका (27 अक्टूबर 2025), “सरिस्का–मुकुन्दरा टाइगर रिज़र्व से 18 गांवों का विस्थापन अटका.” patrika.com

[9] NDTV राजस्थान — मुकुंदरा टाइगर रिज़र्व: मशालपुरा के चार परिवार हटने को तैयार नहीं। rajasthan.ndtv.in

[10] NTCA / Project Tiger Division, पत्र सं. 4-1(43)/2019-PT (5 अगस्त 2020) — मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिज़र्व ग्राम पुनर्स्थापन।

[11] राजस्थान वन विभाग / NTCA — स्वैच्छिक ग्राम विस्थापन प्रगति, राजस्थान के टाइगर रिज़र्व (31 मार्च 2024 तक)।

[12] “Dholpur-Karauli: India’s 54th Tiger Reserve” (2023), Drishti IAS. drishtiias.com

[13] “Dholpur-Karauli tiger reserve approved; Rajasthan’s fifth, India’s 54th” (Aug 2023), India TV — Ramgarh Vishdhari (2022) as Rajasthan’s fourth reserve. indiatvnews.com

[14] Mongabay-India (Jan 2025), “Relocating villages in core tiger areas based on science.” india.mongabay.com

[15] The Diplomat (July 2025), “Between Tigers and Tradition: The Complex Reality of Village Relocation in India.” thediplomat.com

[16] The Indian Express, “Explained: Village relocation from tiger reserves.” indianexpress.com

[17] Drishti IAS, “NTCA’s Plan on Relocation of Villages.” drishtiias.com

[18] Centre for Environment Education (CEE), अहमदाबाद — कैलाशपुरी पुनर्वास सर्वेक्षण रिपोर्ट।

नोट: कुछ ऐतिहासिक और स्थानीय आँकड़े (1976 के पैकेज का विवरण, गाँवों के नाम, पशुधन आदि) राजस्थान वन विभाग के अभिलेखों तथा क्षेत्रीय शोध-सामग्री पर आधारित हैं।

राजस्थान के महलों एवं दुर्गों के वृक्ष

राजस्थान के महलों एवं दुर्गों के वृक्ष

राजस्थान राज्य किलों, महलों, गढों और गढियों के लिए जाना जाता रहा है। राजा-महाराजा, राव-उमराव सब अपनी – अपनी हैसियत अनुसार किले व महल आदि बनवाते थे। सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने एवं आन्तरिक गतिविधियों को छुपाये रखने हेतु अलग-अलग मोटाई, ऊँचाई व बनावट की प्राचीरें बनवाई जाती थी। परकोटे की प्राचीरों से घिरे क्षेत्र का कोई निश्चित पैमाना तो नहीं था फिर भी महलों के मुकाबले किलों के परकोटे से घिरा क्षेत्र अधिक होता था। कुंभलगढ के किले की प्राचीर तो लगभग 36 किमी. लम्बी बताई जाती है। सज्जनगढ अभयारण्य में स्थित सज्जनगढ वास्तव में गढ़ यानी किला नहीं है बल्कि एक महल है जिसमें चारों तरफ कोई सुरक्षा दीवार नहीं है। जयसमंद अभयारण्य में स्थित रूठी रानी का महल व हवा महल भी परकोटा विहीन हैं। नाहरगढ किला, गागरोन का किला, शेरगढ किला, शाहबाद का किला, काँकवाडी किला, बाला किला (अलवर) आदि जगहों पर बडा क्षेत्र घेरते हुऐ परकोटे बनाये गये थे। महलों व किलों की आन्तरिक सुन्दरता एक महत्वपूर्ण पहलू है। वास्तुकारीय विशेषताओं के अलावा बाहर व भीतर की हरियाली का सृजन व संधारण भी एक महत्वपूर्ण प्रबंधन क्षेत्र था। यहाँ महलों व किलों की आन्तरिक हरियाली पर कुछ प्रकाश डालना उचित होगा जो हमें तत्कालीन राजघरानों की सोच, समझ, जरूरत व उद्देश्य के ज्ञान व भान की झलक देता है।

किलों के परकोटे को विस्तार देते समय जो प्राकृतिक वन क्षेत्र घेरा जाता था उसे सुन्दरता, शीतलता, ईधन, घोडे एवं हाथियों हेतु चारे की आंशिक पूर्ती, फल आदि जरूरतों हेतु उसे सुरक्षित रखा जाता था। जो वन क्षेत्र किलों की परीधी पर बाहर विद्यमान रहता था, उसको भी सुरक्षित रखा जाता था क्युंकि बाहरी वन किले को छुपाने में मदद करते थे। ऐसे दुर्गों को आज हम वन दुर्ग के रूप में जानते हैं।

प्राचीन किलो में जहाँ अधिकांश प्राकृतिक वनस्पति को सुरक्षित रखा जाता था, वहीं महलों के परिसरों में विद्यमान काँटेदार व अनुपयोगी या कम उपयोगी वनस्पतियों को हटा दिया जाता था। राजघरानों के लोग ताजी हवा, ताजे फल, छाँया, शीतलता, सुन्दरता, लोक दवाओं, शुभ शगुन विचार व धार्मिक – सामाजिक अनुष्ठानों हेतु अनेक वृक्षों का रोपण भी महलों व किलों के प्रांगण में कराते थे। उन रोपित वृक्षों की उचित देख-भाल की जाती थी। महलों व किलों में रोपित वृक्षों के स्वयं गिरे या पुनः-पुनः फैंके बीजों से या नये रोपित पौधों से उन पसंद की प्रजातियों की अगली पीढीयाँ भी शनैः-शनैः वहाँ उगती रहती थी। पुराने वृक्ष बडे होकर या दीमक आदि के प्रकोप से समाप्त भी होते रहते थे।

महलों व किलों में रहने वाले राजपरिवारों, सैनिकों, सेवकों, अनुष्ठान कर्ताओं आदि द्वारा रोपित पौधों से तरह-तरह के लाभ लिये जाते थे। आवश्यक्तानुसार पौधों की संख्या निर्धारित की जाती थी लेकिन शगुन एवं सौभाग्य से संबंधित पौधे कम संख्या में होते थे तथा इन्हें प्रायः प्रवेश द्वारों के पास लगाया जाता था ताकि महल या किले में प्रवेश करते ही उनके दर्शन कर अच्छे शगुन का भान हो। मौलश्री जैसे वृक्षों के फूलों की महक हवा मे सुगंध घोलने के लिए जानी जाती है। कच्चे आम (कैरी) की छाछ, रायण व मौलश्री के फलों का गर्मी में सेवन आम चलन था। तत्कालीन राजपूताना (वर्तमान राजस्थान) के राजघरानों की पसंद के कुछ वृक्ष निम्न हैं जो जहाँ-तहाँ आज भी किलों – महलों में सुरक्षित नजर आते हैंः

क्र.सं.स्थानीय नामवैज्ञानिक नामप्रकृतिवानस्पतिक कुलउपयोगिता
1रायण

Manilkara

hexandra

सदाबहारSapotaceaeसघन-शीतल छाँया, फल, सुन्दरता, झूला डालना
2मौलश्री, बकुलMimusops elengiसदाबहारSapotaceaeछाँया, फल, सुन्दरता, औषधीय महत्व
3पीपलFicus religiosaपतझडी/ अर्धसदाबहारMoraceaeछायाँ, धार्मिक-सामाजिक महत्व, हवन सामग्री, झूला डालना
4बरगदFicus benghalensisसदाबहारMoraceaeछायाँ, धार्मिक-सामाजिक महत्व, झूला डालना
5नीमAzadirechta indicaसदाबहारMeliaceaeछायाँ, औषधीय महत्व (विशेषकर दाँतुन हेतु उपयोगी), झूला डालना, सुन्दरता, फल
6खजूरPhoenix sylvestrisसदाबहारArecaceaeफल, सुन्दरता, झाडू सामग्री, बर्तन सफाई हेतु रेशे, मधुर रस एवं ताडी
7आमMangifera indicaसदाबहारAnacardiaceaeछायाँ, फल, झूला, सुन्दरता, औषधीय महत्व
8जामुनSyzygium cuminiसदाबहारMyrtaceaeछायाँ, फल, सुन्दरता, औषधीय महत्व
9इमलीTamarindus indicusसदाबहारCaesalpiniaceaeछायाँ, फल, सुन्दरता, औषधीय महत्व
10लिसोडाCordia myxaसदाबहारEhretiaceaeछायाँ, सुन्दरता, फल
11कलम/कदमMitragyna parivifolia पतझडीRubiaceaeसुन्दरता, धार्मिक महत्व
12बेलपत्रAegle marmelosपतझडीRutaceaeधार्मिक महत्व, फल, औषधीय महत्व

प्राचीन समय में रायण व मौलश्री को प्राथमिकता से लगाया जाता था (चित्र 1 से 5)। जहाँ देवालय स्थित होते थे वहाँ पूजन हेतु पत्र सहजता से मिल सकें, अतः उपयुक्त स्थान पर बेलपत्र भी लगाया जाता था। तुलसी के पौधे भी देवालयों व निवास स्थानों के पास लगाए जाते थे। पूजा – पाठ हेतु दूब घास भी सुरक्षित जगह उगने दी जाती थी। देश में कई जगह कल्प वृक्ष (Adansonia digitata) भी लगाऐ जाते थे। मध्यप्रदेश के धार जिले में माँडू के किले एवं महलों के परिसरों में एवं आस-पास बडी संख्या में प्राचीन समय में रोपित विशाल आकार के कल्प वृक्ष दर्शनीय हैं।

चित्र 2.3: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प काल क्लोजअप

चित्र 1: शेरगढ किले के प्रवेश द्वार के पास मुख्य मार्ग की बाँयीं तरफ विद्यमान दो रायण वृक्ष 

शेरगढ किले के प्रवेश द्वार के पास विद्यमान प्राचीन रायण वृक्षों की सघन छाँया

चित्र 2: शेरगढ किले के प्रवेश द्वार के पास विद्यमान प्राचीन रायण वृक्षों की सघन छाँया 

सघन छाँया देने वाला सदाबहार मौलश्री वृक्ष

चित्र 3: सघन छाँया देने वाला सदाबहार मौलश्री वृक्ष.     

चित्र 2.3: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प काल क्लोजअप

चित्र 4: मौलश्री वृक्षः फल एवं फूलों से लदी शाखा 

चित्र 2.4: मित्रागायना पार्वीफोलिया: पुष्प मुण्ड क्लोजअप

चित्र 5: मौलश्री वृक्ष का फल

सारणी-1 में देखेंगे तो पता चलेगा कि अधिकांश वृक्ष दीर्घजीवी व बडे आकार के हैं। इनमें अधिकांश सदाबहार या लगभग सदाबहार प्रकृति के हैं। बेलपत्र व खजूर को छोड कर कोई काँटेदार नहीं है। सभी वृक्ष स्थानीय व बहु-महत्व (multi-purpose) वाले हैं।

प्राचीन समय में कुछ वृक्षों को तो महलों व किलों के अलावा देवालयों व जलस्त्रोतों के पास भी लगाने का चलन था। पाली जिले में सादडी के पास रणकपुर जैन मंदिर में विशाल भवनों से घिरा, एकदम केन्द्रिय भाग में एक रायण का प्राचीन विशाल वृक्ष आज भी सुरक्षित है। पीपल, बरगद, बेलपत्र, जीवापूता (Drypetes roxburghii), मौलश्री आदि प्रायः शिवालयों के पास सुरक्षित मिलते हैं। प्राकृतिक रूप से शिवलिंग से समानता दर्शाने वाले फूल कोरोपिटा गुवानेन्सिस (Couroupita guianensis) नामक वृक्ष में देखे जा सकते है। आजकल दक्षिण भारत में कई जगह शिवालयों के पास यह वृक्ष भी देखने को मिलता है।

अधिक वर्षामान वाले क्षेत्रों में पानी के तालाबों-जोहडों की पाल पर भी बरगद, पीपल, बेलपत्र, जामुन, इमली, नीम, आम, कलम (कदम) लगाने-बचाने का चलन था। जिस तालाब के किनारे कलम (कदम या कदम्ब) होता है उसे बोलचाल में ’’कदमा तालाब’’ या ’’कदम्ब तालाब’’ कहते हैं। सामान्य तालाब के मुकाबले ’’कदम्ब तालाब’’ ज्यादा पूज्य माने जाते हैं। शेखावाटी से लेकर मारवाड के तालाबों के पाल वृक्षों (Embankment tree) में खारा जाल, मीठा जाल, पीपल, बरगद, खेजडी, रौंझ, बबूल, नीम, बेर, इमली, इन्द्रधोक (Anogeissus sericea nummularia) अदि विशेष महत्व रखते हैं। इसी तरह कमल को भी विशेष धार्मिक महत्व मिलता था। जिस तालाब में कमल (पदम) उगते थे उसे “पदम तालाब” नाम से आदर दिया जाता है।

वृक्षों के महत्व को जानने हेतु प्राचीन महल, किले, देवालयों एवं तालाबों के अवलोकन – अध्ययन के साथ -साथ पुरानी रूढीयों, परिपाटियों, अभिवृतियों व परंपरागत ज्ञान पर नजर जरूरी है ताकि हम प्राचीन भारतीय समाज के पुरा वैभव से रूबरू हो सकें।

सतीश कुमार शर्मा

राजस्थान वन सेवा (सेवा निवृत)

14-15, चकरिया आम्बा, रामपुरा चैराहा, झाडोल रोड़

पोस्ट – नाई, उदयपुर – 313031, राजस्थान, भारत

sksharma56@gmail.com

कवर इमेज: गागरोन क़िले की दीवार से लिया गया दृश्य (फोटो: प्रवीण)

वल्चर सेफ ज़ोन: गिद्धों को बचाने की एक पहल

वल्चर सेफ ज़ोन: गिद्धों को बचाने की एक पहल

गिद्ध, हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के अभिन्न अंग हैं, जो सफाईकर्मी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, बीते कुछ दशकों में गिद्धों की आबादी में खतरनाक गिरावट आई। गिद्धों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाना उनके संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

गिद्ध, प्रकृति के सफाईकर्मी के रूप में जाने जाते हैं, ये मृत जानवरों को खाकर पर्यावरण को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से, विश्वभर में गिद्धों की संख्या पिछले तीन दशकों में चिंताजनक रूप से कम हुई है और इस गिरावट से राजस्थान भी अछूता नहीं रहा। हालांकि हाल ही में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार भारत में गिद्धों की संख्या स्थिर हुई है, लेकिन बढ़ नहीं रही है।

भारतीय गिद्धों का एक समूह (फ़ोटो: बनवारी यदुवंशी)

भारत में कभी नौ गिद्धों की प्रजातियाँ पाई जाती थीं, जिनमें से तीन – वाईट-रम्प्ड गिद्ध (Gyps bengalensis), भारतीय गिद्ध (Gyps indicus) और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध (Gyps tenuirostris) – गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं।

इन नौ प्रजातियों में शामिल हैं: लॉन्ग-बिल्ड गिद्ध (Gyps indicus), स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध (Gyps tenuirostris), वाईट-रम्प्ड गिद्ध (Gyps bengalensis), हिमालयन ग्रिफॉन (Gyps himalayensis), यूरेशियन ग्रिफॉन (Gyps fulvus), सिनेरियस गिद्ध (Aegypius monachus), रेड-हेडेड गिद्ध (Sarcogyps calvus), इजिप्शियन गिद्ध (Neophron percnopterus), और  बेयरडेड गिद्ध (Gypaetus barbatus)

राजस्थान, अपने शुष्क वनों और खुले मैदानों के कारण, गिद्धों के लिए महत्वपूर्ण आवास स्थल है। यहाँ बेयरडेड गिद्ध और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध को छोड़कर बाकी सातों प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से चार प्रजातियाँ निवासी हैं और यहीं प्रजनन करती हैं, जबकि तीन अन्य प्रजातियाँ प्रवासी पक्षी के रूप में ऑक्टोबर से मार्च के महीनों में यहाँ देखी जाती हैं, कभी-कभी अप्रैल के मध्य तक भी यहाँ देखी जा सकती हैं। राजस्थान में पाए जाने वाले प्रवासी गिद्धों की प्रजातियों में हिमालयन ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन, और सिनेरियस गिद्ध शामिल है।

कोटा ज़िले में स्थितः भारतीय गिद्ध का ब्रीडिंग और नेस्टिंग साइट (फ़ोटो: बनवारी यदुवंशी)

यहाँ ध्यान दें कि गिद्धों की संख्या में तेजी से गिरावट आने का कारण मुख्य रूप से पशुओं में इस्तेमाल की जाने वाली स्टेरॉयडमुक्त प्रज्वलनरोधी (NSAIDS) दवाएँ थी। नसाइड्स दवाओं में भी डाईक्लोफेनाक का उपयोग गिद्धों के अस्तित्व के लिए घातक साबित हुआ। डाईक्लोफेनाक को पशुओं के लिए दर्द निवारक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जो की मृत पशुओं के अवशेषों में रह जाता और जब गिद्ध इन मृत जानवरों को खाते तो डाईक्लोफेनाक उनके शरीर में प्रवेश कर उनके गुर्दे की कार्यक्षमता को नष्ट कर देता जिससे उनकी मृत्यु हो जाती थी।

डाईक्लोफेनाक के उपयोग से मुख्य रूप प्रभावित प्रजातियों में वाईट-रम्प्ड गिद्ध, भारतीय गिद्ध और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध शामिल थे। इन तीन प्रजातियों की आबादी में 95% से अधिक की गिरावट आई थी। अन्य प्रजातियाँ भी कम संख्या में पाई जाती हैं, जिससे गिद्धों के पारिस्थितिक कार्यों पर व्यापक प्रभाव पड़ा, और शहरों और गाँव में मृत जीवों के शव कई दिनों तक सड़ते हुए देखे जाने लगे।

डाईक्लोफेनाक को पशुओं के लिए दर्द निवारक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जो की मृत पशुओं के अवशेषों में रह जाता और जब गिद्ध इन मृत जानवरों को खाते तो डाईक्लोफेनाक उनके शरीर में प्रवेश कर उनके गुर्दे की कार्यक्षमता को नष्ट कर देता जिससे उनकी मृत्यु हो जाती थी। (फ़ोटो: प्रवीण)

गिद्धों के लिए अन्य खतरों में शामिल है उनके आवास का नुकसान। पेड़ों को काटना और चट्टानों को तोड़ना गिद्धों के घोंसले बनाने के लिए उपयुक्त स्थानों को कम कर देता है। दूसरा कारण है विद्युत लाइन। गिद्ध बड़े पंखों वाले पक्षी होते हैं, और वे अक्सर विद्युत लाइनों से टकराकर मारे जाते हैं। इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में, गिद्धों का उनके शरीर के अंगों के लिए अवैध रूप से शिकार किया जाता है, जिन्हें तांत्रिक क्रियाओं में इस्तेमाल करने की गलत धारणा है।

गिद्धों की इस चिंताजनक स्थिति को देखते हुए 2000 के दशक के मध्य में डाईक्लोफेनाक के पशु चिकित्सा उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया और साथ ही पशु चिकित्सकों को गिद्धों के लिए सुरक्षित दवाओं के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया गया। पूरे भारत की तरह, राजस्थान में भी डाईक्लोफेनाक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के बाद से गिद्धों की संख्या में मामूली सुधार तो हुआ है, लेकिन उनकी आबादी अभी भी अपने मूल स्तर से बहुत कम है।

गिद्धों के संरक्षण के लिए भारत सरकार और वन्यजीव संस्थाएं मिलकर कई प्रयास कर रही हैं जिनमें वल्चर सेफ ज़ोन (वल्चर सेफ़ ज़ोन), गिद्ध अभयारण्य, संरक्षण और प्रजनन केंद्र, और जागरूकता अभियान शामिल हैं।

गिद्ध अभयारण्य: “गिद्ध अभयारण्य” नामक विशेष क्षेत्रों की स्थापना की जा रही है। इन क्षेत्रों में पशुओं के मृत शरीरों को जहर रहित दवाओं से उपचारित किया जाता है ताकि गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन उपलब्ध हो सके। देश का एकमात्र गिद्ध अभयारण्य रामदेवरा बेट्टा हिल है, जो की कर्नाटक के रामानगर जिले में स्थित है।

संरक्षण और प्रजनन केंद्र: देश भर में कई गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों में घायल गिद्धों का उपचार किया जाता है और स्वस्थ गिद्धों को प्रजनन के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इन केंद्रों से भविष्य में जंगल में गिद्धों को छोड़ा जा सकता है। भारत में नौ गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र (वीसीबीसी) हैं, जिनमें तीन बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) और बाकी सेंट्रल जू अथॉरिटी द्वारा प्रशासित हैं:

  • पिंजौर, हरियाणा: 2001 में गिद्ध देखभाल केंद्र के रूप में स्थापित, यह 2004 में भारत का पहला वीसीबीसी था
  • राजभटखावा, पश्चिम बंगाल: 2005 में स्थापित
  • रानी, ​​गुवाहाटी, असम: 2007 में स्थापित
  • केरवा, वन विहार राष्ट्रीय उद्यान, भोपाल, मध्य प्रदेश: 2011 में स्थापित
  • हैदराबाद के नेहरू प्राणी उद्यान में हैदराबाद गिद्ध प्रजनन केंद्र
  • जूनागढ़ गिद्ध प्रजनन केंद्र , सक्करबाग प्राणि उद्यान, जूनागढ़
  • रांची गिद्ध प्रजनन केंद्र, मगरमच्छ प्रजनन केंद्र, मुटा, रांची
  • भुवनेश्वर गिद्ध प्रजनन केंद्र, नंदनकानन प्राणि उद्यान, भुवनेश्वर

भारत मे मौजूद गिद्ध प्रजनन केंद्र (वल्चर ब्रीडिंग सेंटर) (मैप: प्रवीण)

वल्चर सेफ ज़ोन (वीएसजेड): वल्चर सेफ़ ज़ोन न केवल गिद्धों को बचाने में महत्वपूर्ण हैं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी लाभदायक हैं। प्रत्येक वीएसजेड, गंभीर रूप से लुप्तप्राय गिद्ध प्रजातियों में से कम से कम एक प्रजाति के जीवित कॉलोनी पर केंद्रित होती है। वीएसजेड को 100 किमी (30,000 किमी 2 से अधिक) के दायरे वाले क्षेत्रों के रूप में परिभाषित किया गया है, और यह क्षेत्र ओरिएंटल व्हाइट-बैकड गिद्धों (SAVE, 2014) के रेंज के आधार पर निर्धारित किया गया है।

SAVE के अनुसार वीएसजेड में:

  • पशु चिकित्सा उपयोग के लिए दुकानों पर डाइक्लोफेनाक उपलब्ध नहीं होना चाहिए,
  • कम से कम 800 मवेशियों के शव के जिगर के नमूनों में कोई डाइक्लोफेनाक नहीं पाया जाना चाहिए,
  • वीएसजेड क्षेत्र के भीतर मृत गिद्धों में कोई डाइक्लोफेनाक या आंत संबंधी गठिया नहीं पाया जाना चाहिए,
  • वीएसजेड में गिद्धों की आबादी में स्थिरता या वृद्धि होनी चाहिए।

गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन की आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है। इसके लिए इन क्षेत्रों में मवेशी आश्रयों अथवा गौशालाओं के साथ मिलकर काम किया जाता है, जहाँ गिद्धों को खाने के लिए मृत गायों को उपलब्ध कराया जाता है।

कैलादेवी क्षेत्र में मौजूद गंभीर रूप से संकटग्रस्त भारतीय गिद्ध (फ़ोटो: प्रवीण)

अस्थायी गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (पीवीएसजेड): जब उपरोक्त मानदंड पूरे होते हैं तभी वीएसजेड पूरी तरह से स्थापित होता है। जब तक यह स्थापित नहीं होता की उक्त मानदंड पूरे हो गए हैं तब तक इन क्षेत्रों को अस्थायी गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (प्रविशनल वल्चर सेफ़ ज़ोन) माना जाता है।

वल्चर सेफ़ ज़ोन की शुरुआत: वर्ष 2011 में नेपाल ने स्थानीय समूहों और गैर सरकारी संगठनों का एक नेटवर्क विकसित करके वीएसजेड स्थापित करने का नेतृत्व किया, और डाईक्लोफेनाक के उपयोग में कमी और रोक सुनिश्चित करने के लिए गिद्धों के प्रजनन इलाकों के आसपास के क्षेत्रों में एक साथ काम किया।

नेपाल द्वारा वल्चर सेफ़ ज़ोन बनाने के लिए सबसे पहले गिद्धों के प्रजनन इलाकों के आसपास के क्षेत्रों से पशु चिकित्सा के लिए डाइक्लोफेनाक के सभी उपलब्ध स्टॉक को हटाया गया और इसकी जगह गिद्ध सुरक्षित दवा मेलॉक्सिकैम को स्थापित किया गया। यह बदलाव उन्होंने प्रजनन क्षेत्रों के 50 किमी की दूरी तक के दायरे में स्थापित किया।

डाइक्लोफेनाक को मेलोक्सिकैम से बदलने के बाद स्थानीय समुदाय के बीच एक व्यापक शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम चलाया। इस कार्यक्रम में गिद्धों के शवों को साफ करने की क्षमता के संबंध में जानकारी दी और यह भी बताया की किस प्रकार ये बीमारी के खतरों को कम करते हैं और कुत्तों की बढ़ती संख्या को भी नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इसके अलावा किसानों, पशुचिकित्सकों और फार्मासिस्टों के साथ कार्यशालाएँ आयोजित की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे डाइक्लोफेनाक के उपयोग से होने वाली समस्याओं के बारे में जानते हैं।

नेपाल के बाद भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी वल्चर सेफ़ ज़ोन के माध्यम से गिद्धों के इन-सीटू संरक्षण पर जोर दिया।

कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य गिद्धों की एक छोटी आबादी को संरक्षित करता है, जो की एक संभावित वल्चर सेफ़ ज़ोन भी घोषित किया जा सकता है (फ़ोटो: प्रवीण)

राजस्थान के गिद्ध संरक्षण के प्रयास: गिद्धों की आबादी के हिसाब से देखा जाए तो राजस्थान एशिया के गिद्धों के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। देश का सबसे बड़ा राज्य होने के साथ ही यहाँ 22 जिलों में गिद्धों का आश्रय पाया गया है, जिनमें निवासी और प्रवासी गिद्ध दोनों ही शामिल हैं। प्रवासी पक्षी (मुख्यतः ईगिप्शियन वल्चर) प्रजनन के लिए यहाँ घोंसलों का निर्माण कर प्रजनन करते हैं इसलिए यहाँ गिद्धों के संरक्षण के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाना आवश्यक है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए राजस्थान के संरक्षणवादी और गैर सरकारी संस्थाएँ काफी समय से राजस्थान में गिद्ध प्रजनन केंद्र की मांग कर रहे हैं।

गिद्ध संरक्षण के लिहाज से बीकानेर स्थित जोरबीड गिद्ध संरक्षण रिजर्व राजस्थान द्वारा किया गया एक सफल प्रयास है। हालांकि अभी तक इस क्षेत्र को वीएसजेड का दर्ज नहीं मिल पाया है।

गिद्ध संरक्षण के लिए काम कर रहे प्रोफेसर डॉ दाऊ लाल बोहरा ने जोरबीड को वीएसजेड घोषित करवाने हेतु यहाँ आ रहे मवेशियों के शवों जी जांच कारवाई और पाया की किसी भी शव के उपचार के लिए गिद्धों के लिए हानिकारक दवाओं का उपयोग नहीं किया गया बल्कि उनके लिए सुरक्षित दवाएँ ही उपयोग की गई हैं। इसके अलावा संदिग्ध जानवरों को कुत्तों के खाने के लिए रखा जाता है। साथ ही स्थानीय औषधि विक्रेताओं को जागरूक किया जा रहा है ताकि जल्द से जल्द इस क्षेत्र को वीएसजेड घोषित किया जा सके।

जोरबीड का गिद्धों के लिए महत्तव देखते हुए यहाँ आ रहे गिद्धों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिंगिंग और टैगिंग कार्यक्रम चलाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीएमएस सीओपी में भी राजस्थान के महत्तव और यहाँ गिद्ध संरक्षण के प्रयासों को और मजबूत करने हेतु चिंता जताई जा चुकी है। सीएमएस सीओपी उन पार्टियों का सम्मेलन है, जो जंगली जानवरों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर प्राथमिक निर्णय लेने और उनकी पालना सुनिश्चित करने के लिया बनाया गया है।

भारत में वल्चर सेफ ज़ोन: वीएसजेड के मुख्य लक्ष्य सभी देशों में समान हैं, हालांकि मॉडल अलग-अलग देशों में और यहां तक कि एक देश के भीतर भी भिन्न देखने को मिल जाते हैं। नेपाल ने वीएसजेड पर वर्ष 2011 में काम शुरू किया, जिसके बाद भारत ने 2012 के शुरुआत में काम शुरू किया। बांग्लादेश देश ने 2014 में काम शुरू किया और वीएसजेड को गजेट अधिसूचना के माध्यम से कानूनी दर्जा देने वाला पहला देश बन गया। जबकि नेपाल और भारत में वीएसज़ेड को कोई कानूनी दर्जा नहीं प्राप्त है। भारत में 9 चयनित क्षेत्रों को गिद्धों के लिए संभावित गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (वीएसजेड) के रूप में पहचाना गया है। ये सारे क्षेत्र गिद्ध प्रजनन केंद्रों को ध्यान में रखते हुए पहचाने गए हैं। हरियाणा में पिंजौर, पश्चिम बंगाल में राजाभटखावा, असम में माजुली द्वीप के आसपास, एमपी में बुक्सवाहा, यूपी में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान और कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य, झारखंड में हज़ारीबाग़, और गुजरात में सौराष्ट्र।

संरक्षणवादी एवं गैर सरकारी संस्थाएँ मौजूदा गिद्ध सुरक्षित क्षेत्रों को स्थापित एवं मजबूत करने और नए क्षेत्र बनाने के लिए काम कर रहे हैं। उम्मीद है कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में इस पहल से गिद्धों के संरक्षण में सफलता मिलेगी।

(कवर फ़ोटो (बनवारी यदुवंशी): कोटा के गैपरनाथ क्षेत्र के पास भारतीय गिद्धों का एक समूह

 

स्याहगोश (Caracal) का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र: धौलपुर करौली टाइगर रिजर्व

स्याहगोश (Caracal) का सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र: धौलपुर करौली टाइगर रिजर्व

हाल ही में बना बाघों का नया घर – धौलपुर करौली टाइगर रिजर्व, राज्य को मध्य प्रदेश से ही नहीं जोड़ता बल्कि यह स्याहगोश (caracal) का देश में सबसे उत्तम स्थान है। यह स्थान बाघों ने अपने लिए स्वयं चयन किया है और जिस तरह बढ़ रहे है उन्होंने सबको चौंका दिया है।

आज कल सरकार और प्रभावी लोगों की मर्जी से बाघ रिज़र्व निर्धारित होते है, जगह उचित हो या नहीं हो यह मायने नहीं रखता, धौलपुर करौली बाघ रिज़र्व का चयन बाघों ने खुद चयन किया है। राजस्थान के बाघ क्षेत्र को मध्यप्रदेश के बाघ क्षेत्र से ठीक से जोड़ने वाले इस लैंडस्केप का आने वाले समय में राज्य के बाघ संरक्षण में अपना अनूठा स्थान होगा।

धौलपुर एवं करौली जिले के वन क्षेत्रों का टाइगर रिजर्व बनने का सफर वर्ष 2022-23 में शुरू हुआ जब राजस्थान सरकार ने इन क्षेत्रों को राज्य का पाँचवाँ टाइगर रिजर्व के रूप में विकसित करने का प्रस्ताव राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) को भेजा। एनटीसीए ने इसे विकसित करने की प्रारम्भिक मंजूरी फरवरी 2023 में दी और अगस्त 2023 में इसे देश के 54वें बाघ संरक्षित क्षेत्र के रूप में विकसित करने की अंतिम मंजूरी दी। परंतु राज्य सरकार द्वारा अधिसूचना जारी करने से पहले 20 सितम्बर को मध्य प्रदेश में वीरांगना दुर्गावती टाइगर रिजर्व बनाने की अधिसूचना जारी कर दी गई। धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व की अधिसूचना 6 अक्तूबर 2023 को जारी की गई, जिससे यह देश का 55वां टाइगर रिजर्व बना। टाइगर रिजर्व बनना कोई आश्चर्य की बात नहीं थी, क्योंकि ऐतिहासिक तौर पर बाघ इस क्षेत्र में हमेशा ही रहे हैं, सिंह और रेड्डी, 2016 के अनुसार शिकार और अन्य कारणों से बाघ यहाँ से गायब हो गये परन्तु बाघों का आखिरी जोड़ा वर्ष 1986 तक राम सागर सेंचुरी के बाड़ी कस्बे में देखा गया था।

धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व मे मौजूद दमोह खोह परिदृश्य (फोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

जैसा की नाम से पता चलता है, धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व राजस्थान के धौलपुर और करौली जिलों में संयुक्त रूप से फैला हुआ है। यह रणथंभौर, रामगढ़ विषधारी और मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिजर्व से बने विस्तृत टाइगर लैंडस्केप से जुड़ा हुआ है। चंबल नदी इस रिजर्व की पूर्वी सीमा निर्धारित करती है। चम्बल के दूसरी ओर मध्य प्रदेश राज्य में कूनो राष्ट्रीय उद्यान एवं माधव शिवपुरी राष्ट्रीय उद्यान के भी निकट है। यह निकटता इन क्षेत्रों के बीच जानवरों की आवाजाही को सुगमता प्रदान करेगी, जो बाघों की स्वस्थ आबादी को बनाए रखने के लिए महत्वपूर्ण है। यद्यपि अभी बाघों की आवाजाही दूर की कौड़ी लगती है।

यहाँ मौजूद भिन्न प्रकार के परिदृश्य इस क्षेत्र को वन्यजीवों की विविधता के लिए इसे उपयुक्त बनाते है। रिजर्व में विंध्याचल की पहाड़ियों का खुला क्षेत्र जिसे स्थानीय लोग डांग कहते है, गहरी झरने युक्त घाटियाँ जिसमें दमोह एवं कुशालपुर शामिल है स्थानीय लोग खो के नाम से जानते है, चम्बल के विशाल बीहड़ क्षेत्र, मिश्रित जंगल, मानव निर्मित आर्द्रभूमि और नालों में 10 महीनों तक बहता पानी और घास के खुले मैदान शामिल हैं। चंबल नदी रिजर्व के पारिस्थितिकी तंत्र का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह जानवरों के लिए ना केवल पानी उपलब्ध कराती है, तटवर्ती आवासों को बनाए रखने में मदद करती है और वन्यजीवों की आवाजाही के लिए एक प्राकृतिक गलियारे के रूप में कार्य करती है।

चंबल के बीहड़ एक चुनौतीपूर्ण स्थान होने के साथ ही ये स्याहगोश जैसे दुर्लभ बिल्लियों का आवास स्थल भी है (फोटो: टाइगर वॉच)

चंबल के बीहड़ नदी के किनारे पाए जाने वाली एक अनूठी भौगोलिक विशेषता है। इन बीहड़ों का निर्माण चंबल और उसकी सहायक नदियों के कटाव से हुआ है, इन नदियों ने लाखों वर्षों में ऊबड़खाबड़ रूप से से कटाव कर भूल-भुलैया जैसे स्थान का निर्माण किया और मौसमी भारी बारिश एवं पानी के निरंतर प्रवाह के कारण इन बीहड़ों का निर्माण हुआ है। चंबल के बीहड़ एक चुनौतीपूर्ण स्थान हैं, लेकिन उनमें एक खास सुंदरता भी है जो सियहगोश जैसे दुर्लभ बिल्लियों का खास स्थान है।

धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व के विस्तार को देखा जाए तो यह 1075 वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। इसके कुल क्षेत्र का लगभग आधा क्षेत्र, 495 वर्ग किमी, बफर के रूप में चिह्नित है, और 580 वर्ग किमी का क्षेत्र क्रांतिक व्याघ्र निवासी क्षेत्र (क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट/ CTH) के रूप में चिह्नित है।

इसका CTH कुल तीन हिस्सों में है। पहला, धौलपुर जिले में स्थित धौलपुर अभयारण्य के सम्पूर्ण क्षेत्र (204.26 वर्ग किमी) को CTH – I माना गया है। धौलपुर एवं करौली जिले के राष्ट्रीय घड़ियाल अभयारण्य का क्षेत्र (113.10 वर्ग किमी) CTH – II बनाता है। करौली जिले के कैलादेवी अभयारण्य का वह क्षेत्र जो रणथंभोर टाइगर रिजर्व में शामिल नहीं है (290.45 वर्ग किमी) धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व (DKTR) के CTH – III का निर्माण करता है।

धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व अर्ध-शुष्क जलवायु का क्षेत्र है। इसका मतलब है यहाँ कम बारिश के साथ गर्मी का मौसम अधिक गर्म और कुछ वर्षा के साथ ठंडी सर्दियाँ होती हैं। मुख्य पहलू है कुल मिलाकर कम वर्षा, सालाना 75 से 110 सेमी के बीच होने की संभावना रहती है। इस क्षेत्र की अधिकांश नमी मानसून के मौसम में ही आती है। दक्षिण पश्चिम मानसून के आगमन से गर्मी से कुछ राहत मिलती है। वर्षा काफ़ी बढ़ जाती है, हालाँकि यह अनियमित होती है लेकिन फिर भी यह मौसम जल स्रोतों की पूर्ति और वनस्पति विकास के लिए महत्वपूर्ण है। सर्दियाँ हल्की होती हैं और तापमान सुखद होता है, जो 10°C से 25°C तक होता है। इस अवधि में वर्षा न्यूनतम होती है। कुल मिलाकर, धौलपुर और करौली में पूरे वर्ष महत्वपूर्ण तापमान भिन्नता का अनुभव होता है।

इतिहास

चम्बल नदी के तट पर बसे धौलपुर को 1982 में भरतपुर से अलग कर एक जिला बनाया गया था। जिसमें चार तहसीलें, धौलपुर, राजाखेड़ा, बारी और बसेरी शामिल थीं। वर्तमान धौलपुर उत्तर में आगरा, दक्षिण में मध्य प्रदेश के मुरैना ज़िले और पश्चिम में करौली जिले से घिरा हुआ है। 1947 में लगभग 565 आधिकारिक तौर पर घोषित भारतीय रियासतें थीं। धौलपुर ब्रिटिश राज के दौरान राजपूताना राज्य के पूर्व में स्थित एक रियासत थी।

यहाँ यह जानना रोचक है यह उस समय इसे धवलपुरी नाम से जाना जाता था। राजा ढोलन देव ने 700 ईस्वी में धवलपुरी की स्थापना की थी जबकि वर्तमान धौलपुर को 1050 ईस्वी में राजा धवल देव ने नए शहर के रूप में फिर से स्थापित किया था। राजा धवल देव को ढोलन देव तोमर के नाम से भी जाना जाता है।

राजा ढोलन देव तोमर ने धौलपुर की स्थापना मौजूदा शहर से 10 किमी दूर बिलपुर गांव के पास की थी। इस स्थान पर किला अभी भी मौजूद है, हालाँकि यह खंडहर अवस्था में धौलपुर शहर के उद्भव का प्रमाण है। तोमरों का राज्य बाणगंगा से लेकर चम्बल नदी तक था। उन्होंने करौली के जादू राजवंश से हारने तक कई वर्षों तक इस स्थान पर शासन किया।

धौलपुर जिले की सीमा पर मौजूद क्षतिग्रस्त बिलोनी गाँव का किला (फोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

धौलपुर हर समय ग्वालियर की रक्षा में काम आने वाली छावनी के रूप में देखा जाता था। जैसे, 1489 में बहलोल लोदी और 1502 में सिकंदर लोदी द्वारा ग्वालियर पर कब्ज़ा करने की इच्छा के कारण धौलपुर राजा और दिल्ली के सुलतानों के बीच कई लड़ाइयाँ लड़ी गईं। धौलपुर साम्राज्य ने इस स्थान पर ही आक्रमणकारियों को रोकने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिससे ग्वालियर को और अधिक नुकसान न हो। उस समय उपयुक्त भौगोलिक परिस्थितियों के कारण इस स्थान का उपयोग छावनी क्षेत्र के रूप में किया जाता था। इस काल में धौलपुर पर सिकंदर लोदी का रणनीतिक शासन था।

इब्राहिम लोदी की मृत्यु के बाद धौलपुर के सेनापति मुहम्मद जैफून ने स्वयं को इस क्षेत्र का शासक घोषित कर दिया। लेकिन इब्राहिम लोदी को हराने वाले बाबर ने इस क्षेत्र को वापस पाने के लिए अपने योद्धा तलाई खान को भेजा। तलाई खान ने मुहम्मद जैफून के विद्रोह को खत्म किया और धौलपुर को मुगल साम्राज्य के अधीन कर दिया। धौलपुर को बाबर और उसके अनुयायी मुगल सम्राटों के लिए एक आकर्षक स्थान माना जाता था। वे धौलपुर के अद्भुत माहौल में अपनी रानियों के साथ पारिवारिक समय बिताते थे। अकबर ने यहाँ खानपुर और शाही तालाब में किले का निर्माण भी कराया। दिल्ली में जहाँगीर के शासनकाल के दौरान यह स्थान शाहजहाँ और नूरजहाँ के लिए भी गौरव का विषय बन गया। औरंगजेब तक, धौलपुर को मुगलों के राजनीतिक मानचित्र पर पूरी तवज्जोह मिली लेकिन उसकी मृत्यु के बाद राजा कल्याण सिंह ने इस क्षेत्र पर कब्ज़ा कर लिया और खुद को धौलपुर का राजा घोषित कर दिया। थोड़े समय के बाद भरतपुर के महाराजा सूरज मल ने 1761 ई. में धौलपुर पर कब्ज़ा कर लिया।

अंग्रेज हर तरफ अपने पैर पसार रहे थे। वे भारत के अधिक हिस्सों पर कब्ज़ा करने के लिए कुछ संधियाँ और सहयोगी बनाते, उसमें ग्वालियर और गोहद प्राचीन काल के महत्वपूर्ण नगर हुआ करते थे। जाटों ने अंग्रेजों की सहायता से मराठों को इस क्षेत्र से खदेड़ दिया। इसके अलावा, अंग्रेजों और मराठों के बीच धौलपुर के बदले गोहद वापस देने की संधि हुई थी। उस समय से राणा कीरत सिंह राजाखेड़ा और बारी के साथ-साथ धौलपुर के शासक बन गये। धौलपुर राज्य पर ब्रिटिश राज की छत्रछाया में जाट शासक राणा वंश का शासन हुआ करता था। आजादी के समय तक यह राजपूताना का हिस्सा बना रहा।

करौली राज्य

पूर्ववर्ती करौली राज्य चंबल नदी के पश्चिमी तट पर स्थित था और मत्स्य राज्यों का हिस्सा था जिसमें अलवर, भरतपुर, धौलपुर और करौली शामिल थे। राज्य के अधिकांश हिस्सों में विंध्य तत्व वाली निचली पहाड़ियाँ थीं, जो पठार जैसी दिखती थीं और खोह से बनी गहरी घाटियाँ थीं। चंबल नदी की ओर पश्चिम की ओर बढ़ने पर 5-8 किलोमीटर चौड़े बीहड़ का सामना करना पड़ता है जो की कुछ स्थानों पर 35-50 मीटर गहरे होते हैं।

मेवाड़ के बाद पूरे राजपूताना में करौली राज्य में वनों का सबसे बड़ा क्षेत्र था। राज्य की एक बड़ी आबादी चरवाहे गुर्जर समुदाय की होने के कारण राज्य में कृषि का व्यापक रूप से अभ्यास नहीं किया जाता था। इसलिए राज्य का दो-तिहाई हिस्सा लगभग 2000 वर्ग कि.मी. जंगल और बीहड़ के रूप में विकसित था।

करौली राज्य में एक वन अधिकारी कनिष्ठ कर्मचारियों के साथ राजस्व विभाग के अधीन काम करता था। वनों का न तो सीमांकन किया गया और न ही उनका व्यावसायिक दोहन किया गया। वे केवल ईंधन और चारे की आपूर्ति और शिकार के उद्देश्य से थे। जंगलों में प्रवेश करने वाले सभी मवेशियों पर चराई शुल्क लगाया जाता था। राज्य शीशम और खैर जैसे पेड़ों की सख्त सुरक्षा करता था। 1944 के बाद ही, राज्य ने खैर के वाणिज्यिक निष्कर्षण और अन्य राज्यों में इसके निर्यात की अनुमति प्रदान की।

राज्य के शासकों और उनके विशिष्ट अतिथियों को शिकार के विशेष अधिकार प्राप्त थे। आदमखोर वन्यजीवों के मामले में भी केवल शासक ही उनका शिकार कर सकता था या ऐसा करने के लिए किसी को नामित कर सकता था। यहां तक कि जागीरदार जिनके प्रशासन के तहत जंगलों पर नियंत्रण होता था, उन्हें भी शासक की अनुमति के बिना ऐसे वन्यजीवों के शिकार पर प्रतिबंध था। अवैध शिकार, लकड़ी काटने या चराने के लिए कड़ी सज़ा का प्रावधान था। उदाहरण के लिए, किसी को भी जंगली सुअर का शिकार करते हुए पकड़े जाने पर तीन महीने की कैद होती थी। करौली के शासकों के अलावा, सरमथुरा को धौलपुर राज्य के हुक्मों ने भी प्रभावित किया। महाराज राणा उदयभान सिंह ने सरमथुरा में शिकार पर प्रतिबंध लगा दिया था, जो उनके प्रशासन की सीमाओं से परे था। हालाँकि, शासक के प्रति अत्यधिक सम्मान के कारण, किसी ने भी आदेशों की अवहेलना करने का साहस नहीं किया।

वर्तमान करौली के कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य के दो हिस्से कर दिए गए हैं जिसके एक हिस्से को अभी रणथम्भोर टाइगर रिज़र्व के हिस्से के रूप में जाना जाता है और दूसरे हिस्से को DKTR के हिस्से के रूप में देखा जाता है। DKTR में मंडरायल रेंज का हिस्सा शामिल किया गया है। मंडरायल करौली जिले में स्थित है, परन्तु करौली को मंडरायल के राजा ने ही बसाया था जिसे पहले कल्याणपुरी नाम से जाना जाता था।

मंडरायल कस्बे का यह विचित्र नाम ‘मंडरायल’ एक ऋषि माण्डव्य के नाम से पड़ा था। मंडरायल नाम के पीछे एक और कहानी है की बयाना के प्रसिद्ध महाराजा विजयपाल के एक पुत्र मदनपाल या मण्डपाल ने मंडरायल को बसाया था और वहां एक किले का निर्माण संवत 1184 के लगभग कराया था। यह किला गहरे लाल बलुई पत्थरों से बना है, किले के अंदर एक और बाला किला जैसा स्थान है जो अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता था। इतिहासकार इसे ग्वालियर के किले की चाबी कहते है। ग्वालियर मध्य प्रदेश का सबसे विशाल राज्य था और इसकी ताकत लगभग आगरा या दिल्ली के समान ही थी। ग्वालियर को जितने के लिए मंडरायल को हासिल किये बिना यह मुश्किल था।

वन क्षेत्र एवं वन्यजीव

धौलपुर करौली टाइगर रिजर्व के वन मुख्यतः उष्णकटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वनों की श्रेणी में आते हैं। यहाँ धोक एक मुख्य वृक्ष है। तेंदू और सालर भी यहाँ अच्छी संख्या में पाए जाते हैं। यहाँ के मैदानी इलाकों में कुछ जगह पलाश अथवा छीला के पेड़ पाए जाते हैं, वहीं करौली क्षेत्र में पहाड़ के तपते पठार पर छितराए खैर के पेड़ मिलते हैं। यहाँ की गहरी घाटियों के नालों के किनारे जामुन, गूलर आदि के पेड़ पाए जाते हैं। इस पूरे क्षेत्र में शीशम के पेड़ भी पाए जाते हैं। इस पूरे क्षेत्र में अनियमित रूप से बिखरी हुई शमी (Dichrostachys cinerea) की झाड़ी भी अच्छी संख्या में मौजूद है।

विशाल वन क्षेत्र के साथ, पूर्ववर्ती करौली राज्य वन्यजीवों की संख्या में समृद्ध था। इसके दक्षिण-पूर्व की ओर, कैलादेवी के प्रसिद्ध मंदिर के आसपास वन क्षेत्र मौजूद थे। यह क्षेत्र बाघों, तेंदुओं, भालू, सांभर और जंगली सूअरों सहित अन्य प्रजातियों के लिए जाना जाता था और दक्षिण में जयपुर राज्य और पूर्व में ग्वालियर के जंगलों से सटा हुआ था। रेड्डी और सिंह, 2016 के अनुसार इस क्षेत्र में चौसिंगा मौजूद नहीं थे और चिंकारा इस क्षेत्र में व्यापक थे। काले हिरण मासलपुर और नादौती के आसपास पाए जाते थे और आज भी नादौती के आसपास पाए जाते हैं। करौली से लगभग 40 किलोमीटर उत्तर में तिमनगढ़ किला है। इस क्षेत्र में धौलपुर के जंगलों से कनेक्टिविटी के साथ अच्छा जंगल था।

धौलपुर के संरक्षित क्षेत्र, वन विहार और राम सागर, में चीतल, सांभर और चिंकारा की बड़ी आबादी थी। राज्य में जंगली सूअरों को भी सख्ती से संरक्षित किया गया था। बाघ और तेंदुए ज्यादातर संरक्षित क्षेत्रों तक ही सीमित थे। 1960 के दशक तक राज्य के जंगली हिस्सों में भालू पाए जाते थे और चंबल के बीहड़ों में जंगली कुत्ते भी पाए जाते थे।

1955 में, वन विहार और रामसागर, जो धौलपुर के शासकों के पूर्व शिकार अभयारण्य थे, को वन्यजीव अभयारण्य के रूप में अधिसूचित किया गया। वन विहार 25 वर्ग किमी के क्षेत्र को कवर करता है और रामसागर 34 वर्ग किमी क्षेत्र में व्याप्त है। विंध्य पठार पर स्थित ये दोनों अभयारण्य 1980 के दशक तक बाघ, तेंदुए और भालू जैसे वन्यजीवों का समर्थन करते थे।

वर्तमान में धौलपुर करौली टाइगर रिजर्व कई लुप्तप्राय वन्यजीवों की आबादी का समर्थन करता है। भारतीय भेड़िये कैलादेवी क्षेत्र में काफी अच्छी संख्या में मौजूद हैं। सियागोश, एक प्रकार की छोटी बिल्ली, यहाँ पाई जाती है। विश्व स्तर पर सियागोश की आबादी चिंता का विषय नहीं है, लेकिन स्थानीय स्तर पर देखा जाए तो यह लुप्तप्राय है, जिसकी बची हुई आबादी के लिए यहाँ के बीहड़ उत्तम स्थान हैं। सियागोश को यहाँ टाइगर वॉच की टीम द्वारा कई बार कैमरा ट्रैप किया गया है, और उनके द्वारा लगातार निगरानी भी की जा रही है।

ऐतिहासिक तौर पर ना मिलने वाले, वर्तमान में चौसिंगा भी इस टाइगर रिजर्व के कैलादेवी क्षेत्र में मौजूद हैं। यहाँ चौसिंगा को पहली बार टाइगर वॉच की टीम ने ही 6 जून 2020 मासलपुर से कैमरा ट्रैप किया और तब से अब तक कई बार रिपोर्ट कर चुके हैं।

मासलपुर से टाइगर वॉच के कैमरा ट्रैप मे कैद चौसिंगा (फोटो: टाइगर वॉच वालन्टीर टीम)

एक और स्तनधारी की लुप्तप्राय प्रजाति पैंगोलिन भी इस क्षेत्र में पाई जाती है। यहाँ उल्लेखनीय है की 2020 में टाइगर वॉच की टीम ने पैंगोलिन के शिकार की खबर वन विभाग के अधिकारियों दी थी। इसके अलावा हरी मोहन गुर्जर की निगरानी में कार्यरत टाइगर वॉच की वालन्टीर टीम द्वारा गिद्धों की एक सक्रिय कॉलोनी को थेगड़ा गौशाला से रिपोर्ट किया, जिसको देखने के लिए बॉम्बे नैच्रल हिस्ट्री सोसाइटी की टीम सहित अन्य कई संस्थाओं के लोग आ चुके है। थेगड़ा के अलावा भी इस क्षेत्र के कई हिस्सों में गिद्धों की आबादी मौजूद है।

चम्बल नदी में गंगा नदी डॉल्फिन भी पाई जाती है, और कई बार ऊदबिलाव भी देखे गए हैं। अन्य स्तनधारियों में भालू, बघेरा, लकड़बग्घा, आदि भी यहाँ आसानी से देखे जाते हैं। 2015 में बाघों की वापसी के बाद से इस क्षेत्र में बाघों की आबादी लगातार बढ़ती ही जा रही है।

बाघों का इतिहास

धौलपुर राज्य में बाघ

धौलपुर उन गणमान्य व्यक्तियों के बीच लोकप्रिय था जो बाघों का शिकार करना चाहते थे। 1890 के दशक की शुरुआत में, ऑस्ट्रिया के आर्कड्यूक जैसे शाही मेहमान धौलपुर में बाघों के शिकार के लिए आमंत्रित लोगों की सूची में थे। राजकोट के राजकुमार कॉलेज के प्रिंसिपल सी.डब्ल्यू. वाडिंगटन, जो बाद में धौलपुर के शासक की राजनीतिक सेवाओं में शामिल हो गए, ने 1930 के दशक की शुरुआत में धौलपुर के आसपास एक ही दिन में सात बाघों के पाए जाने का उल्लेख किया था। बीकानेर के महाराज सर गंगा सिंह ने भी 1900 की शुरुआत में धौलपुर का दौरा किया था। अपनी शुरुआती दो यात्राओं में उन्होंने केसरबाग और आसपास की पहाड़ियों पर बाघ देखे।

मार्च 1927 में महाराज गंगा सिंह ने एक बाघ को एक भैंस का शिकार करते देखा। केसरबाग और चम्बल के बीहड़ वाले क्षेत्र में इस दौरान 15 बाघों के होने का जिक्र मिलता है। महाराज गंगा सिंह एक बाघिन और शावकों को केसरबाग और तबली-का-ताल जंगल में देखे जाने का जिक्र भी करते हैं। इसके अलावा इन दिनों यहाँ के विभिन्न हिस्सों से 10 से अधिक बाघों की खबर आईं। इनमें दमोह, राय खोह, गुर्जा, तालाब शाही के पास बनास राही और रामसागर झील की खबरें और शावकों के साथ एक बाघिन की खबरें शामिल थीं। नरभदा और रिजोनी, धौलपुर में बाघों के लिए जाने जाने वाले अन्य स्थान थे।

जून 1954 में, एक डकैत-विरोधी पुलिस गश्ती दल ने आत्मरक्षा में वन विहार में एक बाघिन और उसके छह महीने के शावक को गोली मार दी। वन विहार ने 1961 में चार, 1963 में पांच और 1966 में दो बाघों की संख्या के साथ 1960 के दशक में अपनी बाघों की आबादी को बनाए रखना जारी रखा। वन विभाग के अधिकारियों द्वारा यहाँ आखिरी बाघ का जोड़ा राम सागर अभयारण्य में 1986 तक देखा गया।

करौली राज्य में बाघ

करौली के जंगल बाघों के लिए जाने जाते थे। पड़ोसी राज्य ग्वालियर के महाराजा सर जीवाजीराव सिंधिया (1925-61) अधिक शिकार नहीं करते थे और वन्यजीवों के संरक्षण के पक्षधर थे इसलिए, उनके शासनकाल के दौरान, ग्वालियर क्षेत्र में बाघों की संख्या में वृद्धि हुई और कभी-कभी उन्हें चंबल पार करके करौली के करणपुर क्षेत्र में प्रवेश करते देखा गया। 1954 में, कैलाश सांखला ने ऐसे ही एक बाघ को उटगिर के किले से चंबल पार करते और एक मगर से लड़ते हुए देखा, जो असंभव प्रतीत होता है, क्योंकि चम्बल उटगिर से बहुत अधिक दूर है।

परंपरागत रूप से, करौली में दो शिकार शिविर आयोजित किये जाते थे। शीतकालीन शिविर उत्तर में मासलपुर में आयोजित किया जाता था जबकि ग्रीष्मकालीन शिविर वर्तमान कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य में करणपुर में आयोजित किया जाता था। ये शिविर मुख्य रूप से जनता के लिए शासक के साथ बातचीत करने और उसके समक्ष अपनी शिकायतों को संबोधित करने के लिए थे। हालाँकि, उनका उपयोग शिकार के अवसर के रूप में भी किया जाता था। महाराजा गणेश पाल देव (1947-1984) ने अपने जीवनकाल में लगभग 300 बाघों का शिकार किया जिनमें से लगभग सभी करौली क्षेत्र में थे। ऐसी ही एक शिकार के दौरान, उन्हें मंडरायल के नीडर में एक ही बीट में चार बाघों का शिकार किया। उनके बड़े बेटे युवराज बृजेंद्र पाल देव ने 1939 और 1966 के बीच करौली के जंगलों में लगभग हर साल कम से कम एक बाघ का शिकार किया। उनके छोटे बेटे युवराज सुरेंद्र पाल देव ने भी लगभग 70 बाघों का शिकार किया।

बाघों का शिकार 1960 के दशक तक जारी रहा जिससे उनकी संख्या में भारी गिरावट आई। इस क्षेत्र में बाघों का दिखना दुर्लभ हो गया था। 1967 में सरमथुरा के गद्दी क्षेत्र में आखिरी बाघ देखा गया। अंततः बाघ कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य तक ही सीमित मान लिया गया। हालाँकि, यह भी एक अल्पकालिक घटना थी। 1991-92 में सुप्रीम कोर्ट के विशेष आदेश पर कैलादेवी में गणना करायी गयी। गणना में 6-7 बाघों के साक्ष्य सामने आए, लेकिन कोई प्रत्यक्ष सामना नहीं हुआ। 2000 तक यह स्पष्ट हो गया कि बाघ करौली के सभी हिस्सों से गायब हो गया था। समकालीन समय में केवल कभी-कभार अस्थायी बाघ ही कैलादेवी में प्रवेश करते रहे। हालाँकि ये घटनाएँ दुर्लभ और अल्पकालिक थी। 2010 में, टी-7 या मोहन ने इस क्षेत्र से होकर केवलादेव-घाना तक अपनी यात्रा जारी रखी। जनवरी 2013 में, टी-26 का शावक T56 रणथंभौर से गोपाज़ घाटी के माध्यम से रिजर्व में प्रवेश किया और फिर चंबल पार करने के बाद कुनो-पालपुर अभयारण्य तक चला गया। नवंबर 2014 में, टी-71 को घंटेश्वर की खोह के पास कैलादेवी में फोटोकैप्चर किया गया था, जो की इस क्षेत्र में बाघों की वापसी की घटना थी।

बाघों की वापसी

2015 में वन विभाग के विशेष आग्रह पर, टाइगर वॉच की विलिज वाइल्ड्लाइफ वालन्टीर टीम को रणथंभोर ने निकले बाघों की निगरानी का कार्य दिया गया। बाघों को खोजने में कुशल इस टीम ने जल्द ही अपने कैमरा में बाघ के फोटो को कैद किया, दिन था 14 अगस्त 2015 का, जब वालन्टीर एक फोटो लेकर आया, असल में यह टाइगर की पीठ के एक थोड़े से हिस्से का फोटो था, क्योंकि बाघ कैमरा ट्रैप के एकदम नजदीक से होकर निकला था। कैलादेवी अभयारण्य में बाघ का होना ही एक बड़ी घटना थी। इस अधूरे फोटो से भी बाघ की पहचान हो गयी, और पता चल की यह फोटो ‘सुलतान’ नामक बाघ की थी।

टाइगर वॉच की वालन्टीर टीम रणथंभोर से निकले बाघों की खोज के दौरान (फोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

इसके बाद सुलतान की निगरानी करते हुए ही नीदर बांध के पास लगाए कैमरा ट्रैप में एक और बाघ का फोटो कैद किया गया, लेकिन यह सुलतान की ना होकर, किसी दूसरे बाघ की थी, इसकी पहचान टी-92 के रूप में की। इसके अगले दिन अलग-अलग रास्तों पर बाघ के पगमार्क मिले, जो की सुलतान के होने की पहचान की गई। कुछ दिन बाद टी-72 (सुलतान) कैलादेवी से निकल गया, जिसको टाइगर वॉच की वालन्टीर टीम ने धौलपुर के दामोह खोह में कैद किया। लगभग एक साल बाद, वालन्टीर टीम ने टी-92 को दो शावकों के साथ मंडरायल कस्बे के पास निदर का तालाब क्षेत्र में देखा और रिपोर्ट किया। टी-92 के ये शावक टी-72 के साथ हुए।

शावक जब बड़े होने लगे तो दोनों शावक माँ से अलग हो गये। इनको नए नाम दिए गए T117 (श्री देवी) एवं T118 (देवी)। अचानक इसी बीच एक और बाघ के रणथम्भोर से कैलादेवी आने की खबर आयी। उप वन संरक्षक श्री नन्द लाल प्रजापत के विशेष आदेश पर टाइगर वॉच की टीम को उसकी मॉनिटरिंग के लिए लगाया गया और कुछ दिनों में ही इस टीम के केमरा ट्रैप में नए मेहमान की फोटो ट्रैप हुई जिसकी पहचान बाघ T116 के रूप में हुई, जो रणथम्भोर के कवालजी वन क्षेत्र से निकल कर चम्बल के रास्ते धौलपुर के सरमथुरा रेंज पहुँचा और झिरी बीहड़ में जाकर रुका।

इसके बाद वालन्टीर टीम टी-116 की निगरानी में धौलपुर क्षेत्र में लग गई। इस दौरान टी-116 के क्षेत्र में कई गायों के शिकार मिले, तो लगने लगा, यहाँ एक से अधिक बाघ विचरण कर रहे हैं, और यही हुआ इस वन क्षेत्र में एक बाघिन शावक टी-117 का विचरण भी मिल गया एवं उसकी फोटो भी कैद हो गयी। टी-117, कैलादेवी क्षेत्र में जन्मी टी-92 “सुंदरी” की संतान थी। इस बीच टी -117 ने दो शावकों को जन्म दिया, और बाघों की संख्या इस क्षेत्र में चार हो गई।

टी-92 कैलादेवी देवी क्षेत्र मे अपने शावकों के साथ (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

इसके बाद 2022 में, एक और बाघ के रणथंभोर से निकलने की खबर आई, जो की वालन्टीर टीम के अनुसार गंगापुर से करौली होते हुए धौलपुर के वन विहार क्षेत्र में पाया गया, और फिर दो-तीन महीने के लिए मध्य प्रदेश के ग्वालियर जिले में पहुँच गया और फिर वापस चम्बल के रास्ते धौलपुर आ गया। इस बाघ की पहचान टी-136 के रूप में की गई। यह बाघ अत्यंत गतिशील था और लगातार मध्य प्रदेश और राजस्थान के बीच आता-जाता रहता था। लेकिन फिर इस बाघ के जनवरी 2023 में धौलपुर से निकलकर मध्य प्रदेश में पुनः बसाये गए चीता के क्षेत्र के आस पास होने की खबर आई। इसके बाद इसके वापस धौलपुर में होने के संकेत मिले, लेकिन साक्ष्य नहीं मिले, और टीम आश्वस्त है की यह बाघ मध्य प्रदेश में रह रहा है।

टी-136 के निगरानी के दौरान, धौलपुर में एक नए बाघ के होने का पता चला। वालन्टीर टीम ने वन विहार कोठी के पास से बाघ को कैमरा ट्रैप किया, और इसकी पहचान टी-2302 “गब्बर” के रूप में की गई। लेकिन यह बाघ कुछ दिन के बाद ही धौलपुर से निकलकर वापस करौली होते हुए रणथंभोर पहुँच गया।

टी-117 ने अप्रैल 2023 में एक बार फिर शावकों को जन्म दिया, इस बार तीन शावक हुए, जो की धौलपुर के लिए खुशी की बात थी क्योंकि इससे यहाँ बाघों की संख्या बढ़ने लगी थी।

इसके बाद साल 2024 भी धौलपुर के लिए सुखद लेकर आया जब जनवरी में ही रणथंभोर के कैलादेवी क्षेत्र से एक और बाघ निकलकर धौलपुर पहुँच गया, इसकी पहचान टी-2303 के रूप में हुई। इस बाघ के आगमन के साथ धौलपुर में अब कुल छः बाघ हो चुके हैं, जिनके भविष्य में बढ़ने की उम्मीद है।

धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व के सामने समस्याएं

नव-घोषित यह बाघ क्षेत्र, हालांकि बाघों के लिए उपयुक्त है, साथ ही यह पहला बाघ संरक्षित क्षेत्र है जिसे बाघों ने स्वयं चुना है, परंतु इस क्षेत्र के सामने कई समस्याएं भी चुनौती बनकर सामने आई हैं जिनका जल्द से जल्द निवारण नहीं हुआ तो यहाँ के वन्य जीवन को प्रभावित कर सकता है।

  1. सबसे बड़ी समस्या है लैंडस्केप को जाने बिना उसके CTH और Buffer का निर्माण करना। बाघ जिन क्षेत्रों को इस्तेमाल करता है वह क्षेत्र आज भी बाघ रिज़र्व का हिस्सा नहीं बन पाए है। इस क्षेत्र के CTH और Buffer का निर्धारण ऐसे लोगों ने किया है जिन्होंने इस रिज़र्व में पर्याप्त समय नहीं बिताया है।
  2. सबसे गंभीर समस्या यहाँ के क्षेत्रों में होने वाली खनन क्रिया है। मुख्यतः यहाँ संरक्षित क्षेत्र के पास और अंदर के क्षेत्रों में पत्थरों का खनन होता है जो की यहाँ के वन्य जीवन को अत्यंत प्रभावित करता है। यह हजार करोड़ से अधिक का अवैध व्यापार का हिस्सा है जिसमें सेंकडो नहीं वरन हजारों लोग शामिल है। इसके अलावा यहाँ चम्बल क्षेत्र में बजरी का खनन भी काफी हद तक विनाशकारी है जिसे रोकने में प्रशासन और सरकार पूरी तरह विफल है । अक्सर यह लोग रोकथाम करने पर फायरिंग आदि भी कर देते है।

    रणथंभोर के फील्ड डायरेक्टर के पद पर काम करने के दौरान श्री पी कथिरवेल धौलपुर क्षेत्र मे खनन के विरुद्ध कार्यवाही करते हुए (फोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

  3. धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व, राज्य का या संभवतः देश पहला बाघ संरक्षित क्षेत्र है जिसके अंदर भारतीय सेना अभ्यास निरंतर अंतराल पर आयोजित होता रहता है। इस क्षेत्र में आर्मी की चांदमारी या गोला बारूद का अभ्यास क्षेत्र भी है । वन विभाग ने ३० वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को सेना के लिए लीज पर दे रखा है। यह चांदमारी क्षेत्र DKTR टाइगर रिज़र्व के केंद्र में है जहाँ अक्सर सेना रात दिन अभ्यास करती है। वन विभाग के लोग अक्सर मानते है की सेना निर्धारित क्षेत्र से अधिक स्थान का उपयोग भी कर लेती है।

    सैन्य अभ्यास के बाद, ग्रामीण अभ्यास स्थल से बॉम्ब के शेल्स एकत्रित करते पाए जाते हैं (फोटो: डॉ धर्मेन्द्र खांडल)

  4. पाली और जोधपुर के घुमंतू लोग अपनी भेड़ों के साथ इस क्षेत्र में लगभग दो महीने तक डेरा डालते हैं और काफी हद तक यहाँ की जैव विविधता को प्रभावित करते हैं। मध्य प्रदेश से लगे होने के कारण वहाँ के आदिवासी लोग भी इस क्षेत्र से जड़ी-बूटी के लिए वनस्पतियों का दोहन करते हैं, जिनमें प्रमुख रूप गूगल के गोंद, शतावरी की जड़ें, वरना की छाल, सब्जा के बीज आदि शामिल है।

    बाघ विचरण क्षेत्र मे मारवाड़ी लोगों के भेड़ों का दबाव (फोटो: टाइगर वॉच )

  5. इस क्षेत्र में वन्य-जीवन को सबसे अधिक प्रभावित करते हैं यहाँ बसे हुए गाँव और उनमें रहने वाले लोगों की गतिविधियां। धौलपुर-करौली टाइगर रिजर्व के कोर में बसे गाँव जैसे की खुशलपुरा, गिरोनिया, रीछराकी, मठ, मालपुर और झरी आदि को पुनर्वासित करने के लिए प्राथमिकता दिए जाने की जरूरत है, क्योंकि बाघों की गतिविधि इसी क्षेत्र में अधिक है। मूल-भूत सुविधाओं के अभाव में बसे ये गाँव मुख्यतः वनों पर आश्रित हैं। चम्बल किनारे बसे गाँव के लोग वन क्षेत्र में अवैध खेती करते है, अंदर बसे गाँव के लोग पशुपालन एवं खनन स्थलों पर मजदूरी करते हैं। इन गाँव के विस्थापन से खनन, अवैध कटाई, एवं शिकार आदि गतिविधियों में कमी आने की संभावना है, जो की बाघों के बढ़ती आबादी के मुफीद होगा।

इस बाघ रिज़र्व को बचाने के लिए और बाघों के लिए सुरक्षित करने के लिए कई कदम उठाने पड़ेंगे इसके लिए वन विभाग और संरक्षणवादियों को मजबूत इच्छा शक्ति दिखानी होगी।

 

“सांभर झील की पारिस्थितिकी पर अवैध नमक व्यापार का खतरा”

“सांभर झील की पारिस्थितिकी पर अवैध नमक व्यापार का खतरा”

भारत के हर एक हिस्से से अंग्रेज अपना लाभ उठा रहे थे, कहीं से कॉफी, कहीं से चाय और कहीं से मसाले, राजस्थान से उन्हें आज्ञाकारी सैनिक और बुद्धिमान व्यापारी तो मिले ही साथ ही उन्हें मिला सांभर झील का नमक। नमक की एक चुटकी हम सब के लिए किसी जादू से कम नहीं है, खाने में इसके इधर उधर होने पर बेहतरीन से बेहतरीन ख़ानसामा की इज्जत दाव पर लग जाती है। परन्तु नमक मात्र स्वाद का मसला नहीं है, बल्कि नमक हमारे शरीर की एक महत्ती जरूरत है, शायद इसी कारण यह हमारे भोजन का एक अहम् हिस्सा भी बन गया है। नमक मानव शरीर की तंत्रिका आवेगों को संचालित करने, मांसपेशियों को अनुबंधित करने और शरीर में पानी एवं खनिजों के उचित संतुलन को बनाए रखने के लिए एक अत्यंत आवश्यक अवयव है।

सांभर झील का एक दृश्य

सांभर झील का एक दृश्य (फोटो: धर्मेन्द्र खांडल)

नमक को शुरुआती खाद्य प्रसंस्करण के लिए भी इस्तेमाल किया जाता था। यदि मछली को नमकीन बनाने की कला न होती, तो यूरोपीय लोगों ने अपनी मछली पकड़ने को यूरोप के तटों तक ही सीमित कर दिया होता और नई दुनिया की खोज में देरी की होती।

आज भी नमक का इतिहास हमारे दैनिक जीवन को छूता है। महीने के अंत में मिलने वाली सैलरी (वेतन) शब्द की उत्पत्ति साल्ट (नमक) शब्द से ही हुई है। प्रारंभिक रोमन सैनिकों को दिए जाने वाले विशेष नमक राशन को सलारियम अर्जेंटम के नाम से जाना जाता था, जो अंग्रेजी शब्द सैलरी का जनक है। इसी जरूरत को ध्यान में रख इस के उत्पादन स्थलों पर शासकों ने अधिकार बनाये रखा और लोगों की ज़िन्दगी को अपनी मुट्ठी में बंद रखा। जरुरत के हिसाब से उनके हलक से टैक्स निकालते रहे।

वर्तमान समय में भारत में तीन मुख्य नमक उत्पादक राज्य है – गुजरात, तमिलनाडु और राजस्थान। यह देश के उत्पादन का लगभग 96 प्रतिशत हिस्सा उत्पादित करते हैं। कुल उत्पादन में गुजरात का योगदान 76.7 प्रतिशत है, इसके बाद तमिलनाडु (11.16%) और राजस्थान (9.86%) का स्थान है। शेष 2.28% उत्पादन आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल, गोवा, हिमाचल प्रदेश, दीव और दमन से आता है।

राजस्थान के थार रेगिस्तान में कई नमक की झीलें हैं। इनमें से कुछ प्रमुख हैं – सांभर, कुचामन, डीडवाना आदि। सांभर झील असल में एक प्रसिद्ध वेटलैंड है जहाँ कई प्रकार के प्रवासी पक्षी आते है, यह झील किसी भी प्रकृतिवादी के लिए स्वर्ग के समान है। चारों ओर से अरावली से घिरी यह झील राजस्थान के नागौर, अजमेर और जयपुर जिलों में फैली हुई है। इसे मेंधा, रूपनगढ़, खंडेल और करियन नदियों से पानी मिलता है। झील की गहराई गर्मियों के दौरान 60 सेमी से लेकर मानसून के दौरान लगभग 3 मीटर तक होती है। जैसे शिकारी पक्षी पेरीग्रीन और लग्गर फाल्कन तो अक्सर यहाँ मिल ही जाते है, परन्तु कम नजर आने वाले शिकारी पक्षी जैसे मर्लिन और साकेर फाल्कन आदि भी सांभर झील में गाहे बगाहे नजर आ जाते है। यह अद्भुत लैंडस्केप पक्षी दर्शन के अलावा आजकल प्री-वेडिंग शूट का प्रमुख स्थल बन गया है। यहाँ हुए दो विवाह भी अत्यंत प्रचलित रहे है। महाभारत में सांभर झील का उल्लेख राक्षस राजा वृषपर्वा के राज्य के एक हिस्से के रूप में किया गया है। सांभर में उनके पुजारी शुक्राचार्य रहा करते थे, उनकी बेटी देवयानी और राजा ययाति के मध्य यहाँ विवाह हुआ था। आज भी झील के पास देवयानी का मंदिर है। हालांकि कालान्तर में भी सांभर झील मुगल बादशाह अकबर का जोधपुर की राजकुमारी जोधाबाई के विवाह के लिए विख्यात हुआ था।

पेरग्रीन फाल्कन यहाँ आसानी से मिलने वाले शिकारी पक्षी है

पेरग्रीन फाल्कन यहाँ आसानी से मिलने वाले शिकारी पक्षी है (फोटो: धर्मेन्द्र खांडल)

1884 में, सांभर झील में उत्खनन कार्य किया गया और उस खुदाई के दौरान मिट्टी के स्तूप के साथ कुछ टेराकोटा संरचनाएं, सिक्के और मुहरें मिलीं। सांभर मूर्तिकला कला बौद्ध धर्म से प्रभावित प्रतीत होती है। बाद में, 1934 के आसपास, एक बड़े पैमाने पर व्यवस्थित और वैज्ञानिक उत्खनन किया गया, जिसमें बड़ी संख्या में टेराकोटा मूर्तियां, पत्थर के बर्तन और सजाए गए डिस्क पाए गए। सांभर से प्राप्त कई मूर्तियां अल्बर्ट हॉल संग्रहालय में मौजूद हैं।

कैसे बनी सांभर झील और कैसे बनता है नमक ? :

मिथकों के अनुसार जब एक राक्षस दुर्गामासुर ने धरती पर सूखा और अकाल फैला दिया, तो पृथ्वी पर रहने वालों को सो वर्षों तक इसकी पीड़ा सहनी पड़ी। तब ऋषियों ने देवी लक्ष्मी को याद किया, वह प्रसन्न होकर दुनिया में नीले रंग का रूप लिए अवतरित हुई। देवी ने भी धरती पर दुःख देख उन्होंने अपनी आंखों से लगातार आंसू बहाए और लोगों को पुनः जीवन योग्य सुविधा प्रदान की। परन्तु उसके आँखों के आंसुओं से बहने वाली धाराओं ने एक लवणीय झील का निर्माण किया।

नमक के ढेर और क्यारियां

नमक के ढेर और क्यारियां (फोटो: धर्मेन्द्र खांडल)

इस देवी का नाम शाकम्भरी था जो शाक-सब्जी की देवी है। इस देवी का एक मंदिर सांभर झील में एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित है। जो एक महान राजा पृथ्वीराज चौहान के समय बनाया गया था। एक अन्य दंतकथा के अनुसार मां शाकंभरी की कृपा से यहां चांदी की भूमि उत्पन्न हुई। चांदी को लेकर लोगों में झगड़े शुरू हो गए। इस समस्या को नियंत्रित करने के लिए मां ने चांदी को नमक में बदल दिया। इस तरह से सांभर झील की उत्पत्ति हुई।

परन्तु अब तक की वैज्ञानिक मान्यताओं के अनुसार इस झील की उत्पत्ति के संबंध में कई परिकल्पना हैं। उनमें से एक यह है कि ये झीलें टेथिस सागर के अवशेष के रूप में विद्यमान हैं, जो लगभग 70 mya वर्ष पहले भारतीय और यूरेशियन प्लेटों के टकराने से पहले इस क्षेत्र में मौजूद था। हालांकि हाल ही में हुए कई अध्ययनों के अनुसार इस झील की समुद्री द्वारा उत्पत्ति की उपरोक्त परिकल्पना के लिए कोई सबूत नहीं मिले हैं।

इसके विपरीत नए अध्ययन की परिकल्पना के अनुसार इस झील का पानी उल्कापिंड मूल का है और नमक स्थानीय रूप से इस क्षेत्र में चट्टानों के अपक्षय से प्राप्त होता है। ये झील टर्मिनल झील के रूप में व्यवहार करती हैं; यह मानसून के मौसम (जून-सितंबर) के दौरान पानी प्राप्त करते हैं और शेष वर्ष के दौरान वाष्पित हो जाते हैं (कोई बहिर्प्रवाह नहीं होता है और वाष्पीकरण प्रवाह के बराबर होता है)। यानी यह झील स्थानीय वर्षा द्वारा पोषित संचय और वाष्पीकरण चक्रों द्वारा बनाई गई हैं।यानी इसमें आने वाले नदी नाले यहीं पर समाप्त हो जाते है और आगे नहीं बहते है। वैसे राजस्थान में मुझे एक भी प्राकृतिक रूप से बनी मीठे पानी की झील नहीं मिली जितनी भी प्राकृतिक झीलें है वह खारे पानी की ही है।

सांभर झील में उत्पादित नमक को धोने के लिए एक रेल कनेक्टिविटी भी है।

सांभर झील में उत्पादित नमक को धोने के लिए एक रेल कनेक्टिविटी भी है (फोटो: धर्मेन्द्र खांडल)

नमक निर्माण और इस पर लगने वाले टैक्स का इतिहास :

नमक उत्पादन का सर्वप्रथम प्रमाण लगभग 6,000 ईसा पूर्व का है जो रोमानिया के पोयाना स्लैटिनी-लुनका में एक उत्खनन में मिला है। भारतीय उपमहाद्वीप में, नमक उत्पादन का प्रमाण सिंधु घाटी सभ्यता से मिलता है, जो लगभग 2500 ईसा पूर्व विकसित हुई थी। गुजरात में लोथल जैसे स्थलों की खुदाई में नमक के बर्तनों और नमक निकालने के लिए उपयोग किए जाने वाले उपकरणों की मौजूदगी का पता चला है, जो प्राचीन काल में भी नमक के महत्व को दर्शाता है। साथ ही भारत में नमक पर कराधान भी प्राचीन काल से होता आया है। सभी कालों में यह राजस्व एकत्रित करने का सबसे अधिक लोकप्रिय माध्यम रहा है।

कहते है एक समय नमक टैक्स चीन के राजस्व के आधे से अधिक था और इसी धन से चीन की महान दीवार के निर्माण में योगदान दिया। चन्द्रगुप्त मौर्य के काल में भी नमक पर कर प्रचलित रहा है। अर्थशास्त्र, जो लोगों के विभिन्न कर्तव्यों का वर्णन करता है, कहता है कि नमक कर इकट्ठा करने के लिए लवणनाध्यक्ष नामक एक विशेष अधिकारी को नियुक्त किया गया था।बंगाल में, मुग़ल साम्राज्य के काल में नमक कर लागू था, जो हिंदुओं के लिए 5% और मुसलमानों के लिए 2.5% था।

हालाँकि, मुगल सम्राट अकबर (1542-16051) के शासनकाल तक झील के संचालन की एक व्यवस्थित प्रणाली शुरू नहीं की गई थी। उनके समय में झील से लगभग 250,000 रुपये प्रति वर्ष की आय होती थी। जब औरंगजेब गद्दी पर बैठा (16582) तो आय धीरे-धीरे बढ़कर 15 लाख रुपये हो गई।, मुगलों के पतन के साथ राजस्व में गिरावट आई और लगभग 1770 में, जयपुर और जोधपुर के लोगों ने बिना किसी संघर्ष के झील पर कब्ज़ा कर लिया। अगले युग के दौरान झील का प्रबंधन राजपूतों और मराठों के बीच आगे और पीछे चला गया। इतिहास इस बारे में मौन है कि उन दिनों (1770-1834) जब तक 1835 में अंग्रेजों ने झील पर कब्ज़ा नहीं कर लिया, तब तक कितना राजस्व प्राप्त हुआ था। जयपुर और जोधपुर की संयुक्त सरकार, शामलात ने 1844 से झील पर काम किया (गोपाल और शर्मा 1994)।

उस समय नावा और गुढ़ा नगण्य बस्तियाँ थीं, लेकिन धीरे-धीरे नमक बाजार के रूप में विकसित हो गईं। जब जोधपुर ने नावा और गुढ़ा में नमक का काम विकसित करना शुरू किया, तो जयपुर को ईर्ष्या होने लगी। इससे दोनों राज्यों के बीच निरंतर कलह बनी रही।

यह तब तक चलता रहा जब तक कि 1870 में नावा और गुढ़ा सहित झीलों पर अंग्रेजों ने कब्जा नहीं कर लिया – परन्तु अंग्रेजों ने इसे नमक उत्पादन के मुख्य केंद्र के रूप में विकसित किया। वर्ष 1870 से 1873 के मध्य सांभर झील के नमक उत्पादन के प्रबंधक रहे सहायक साल्ट कमिश्नर आर एम एडम लिखते है की ” सांभर और नावा गुढ़ा झील से नमक का औसत उत्पादन लगभग 1,400,000 मन या 51,429 टन है। अकेले सांभर में पिछले 17 वर्षों का औसत उत्पादन 690,000 मन था। उपरोक्त अवधि के दौरान सबसे बड़ा उत्पादन, यानी 1,360,000 मन, 1869 में हुआ था, और 1868 की अल्प वर्षा और अकाल के कारण श्रमिकों की प्रचुर आपूर्ति के कारण यह हो पाया ; जबकि 1863 में सबसे कम उत्पादन, यानी 1,504 मन, पिछले वर्ष की अत्यधिक वर्षा के कारण हुआ था, जिसने झील को इतना ऊंचा उठा दिया था कि शहर के कुछ निचले हिस्सों में भी बाढ़ आ गई थी” परन्तु सबसे अधिक चौंकाने वाले आंकड़े नमक ढुलाई को लेकर थे की – 150 वर्ष पूर्व नमक निर्यात के लिए आवश्यक गाड़ी में 300,000 बैल, 66,000 ऊंट, 18,000 गाड़ियां और 5,000 गधे थे। यदि आप उस दृश्य को एक बार अपने मन में जिवंत कर देखे तो विचार करे की सांभर का क्या माहौल रहा होगा, शायद कोई अंतहीन मेले जैसा माहौल होगा।

एडम द्वारा बनाया गया सांभर झील का नक्शा

एडम द्वारा बनाया गया सांभर झील का नक्शा (नक्शा सार्वजनिक डोमेन से)

Sambhar Map

सांभर झील के आस पास के क्षेत्र की वर्तमान स्तिथि (बिंग सॅटॅलाइट व्यू)

आधुनिक समय में, महात्मा गांधी ने भारत में स्वशासन के लिए लोकप्रिय समर्थन जुटाने के साधन के रूप में ब्रिटिश नमक कानूनों की अवहेलना की। हालांकि, नमक कर लागू रहा और इसे तभी निरस्त किया गया जब जवाहरलाल नेहरू 1946 में अंतरिम सरकार के प्रधान मंत्री बने। स्वतंत्रता के बाद भारतीय राज्यों के एकीकरण पर 1950 में झील का स्वामित्व राजस्थान राज्य सरकार को दे दिया गया। आज इसकी भूमि का पट्टा राजस्थान सरकार के साथ हिंदुस्तान साल्ट्स के संयुक्त उद्यम सांभर साल्ट्स को दे दिया गया है।
स्वतंत्रता के बाद, नमक कर को बाद में नमक उपकर अधिनियम, 1953 के माध्यम से भारत में फिर से लागू किया गया। 2017 में वस्तु एवं सेवा कर को खत्म कर दिया गया और सफल बनाया गया, जिसमें नमक पर कर नहीं लगता है।

भारत में अंग्रेजों द्वारा बनाई गई ग्रेट साल्ट हेज : 

भारत के नमक निर्माण करने वाले हिस्से को एक लम्बी बाड़ द्वारा अलग किया गया और नमक के व्यापार पर नियंत्रण किया गया। क्या कभी आपने सोचा है यह बाड़ से क्या मतलब है ? ग्रेट इंडियन सॉल्ट हेज असल में कांटो की एक घनी बाड़ थी जिसने भारत को दो भागो में बाँट दिया था i वैसे ही जैसे आप अपने खेत को दो भागों में विभाजित करते हो। इसमें मुख्य रूप से कांटेदार पेड़ों और झाड़ियों की एक विशाल क़तार थी, जो पत्थर की दीवार और खाइयों से पूरक थी, जिसके पार कोई भी इंसान या बोझ वाला जानवर या वाहन बिना गुजर नहीं सकता था, इसकी लम्बाई 3700 किलोमीटर थी। यानी यह एक तरह की इनलैंड कस्टम लाइन थी, जो भारत के ब्रिटिश औपनिवेशिक शासकों द्वारा तटीय क्षेत्रों से नमक की तस्करी को रोकने के लिए बनायी गयी थी। यह ऐ ओ ह्यूम 1870 ने बनायीं थी। उन्होंने यह नमक की आवाजाही को नियंत्रित करने वाले सीमा शुल्क विभाग के खर्च को कम करने के लिए किया था। इसे ग्रेट हेज के नाम से जाना जाता है। इसके माध्यम से देश वासी लगभग दो महीने की आय के बराबर नमक कर देने के लिए मजबूर होते थे। इस बाड़ की सुरक्षा लगभग 12,000 पुरुषों और छोटे अधिकारियों द्वारा की जाती थी। इसी तरह पूरे इतिहास में, नमक सरकारी एकाधिकार और विशेष करों के अधीन रहा है।

1870 के दशक की अंतर्देशीय सीमा शुल्क रेखा (लाल) और ग्रेट हेज (हरा) का मार्ग

1870 के दशक की अंतर्देशीय सीमा शुल्क रेखा (लाल) और ग्रेट हेज (हरा) का मार्ग (सौ: विकिपिडिया)

नमक व्यापार की वर्तमान स्थिति और सांभर के बिगड़ते हालात:

कहते है सांभर के पानी में सोडियम क्लोराइड की उच्च मौजूदगी के कारण यहां के नमक की बहुत अधिक मांग है। झील के नमक उत्पादन का प्रबंधन सांभर साल्ट्स लिमिटेड (एसएसएल) द्वारा किया जाता है, जो हिंदुस्तान साल्ट्स लिमिटेड और राजस्थान सरकार का संयुक्त उद्यम है। परन्तु एक अनुमान के अनुसार सांभर झील से हर साल 32 लाख टन स्वच्छ नमक का उत्पादन होता है, जिसमें से 30 लाख टन का उत्पादन अवैध रूप से होता है।

सांभर झील के उत्तरी और पश्चिमी तट विशेष रूप से अवैध नमक उत्पादन के लिए कुख्यात हैं। इस गतिविधि से क्षेत्र की पारिस्थितिकी बुरी तरह प्रभावित हुई है और पिछले कुछ वर्षों में झील में सर्दियों में रहने वाले फ्लेमिंगो की संख्या में भारी गिरावट आई है। नावा में, निजी नमक उत्पादकों द्वारा बोरवेल खोदने, अवैध पंप द्वारा पानी निकालने और बिजली के केबल बिछाने के लिए कई अर्थमूविंग मशीनें, हेवी ड्यूटी कंप्रेसर और ड्रिल मशीनें देखी जा सकती हैं।

बोरवेल और उन तक पहुंचते बिजली के तार

बोरवेल और उन तक पहुंचते बिजली के तार (फोटो: धर्मेन्द्र खांडल)

अवैध भूजल निकासी के लिए बिजली चोरी से निपटने के लिए, सांभर साल्ट्स लिमिटेड द्वारा राजस्थान उच्च न्यायालय के समक्ष राजस्थान राज्य बिजली वितरण कंपनी (डिस्कॉम) के खिलाफ एक रिट याचिका दायर की गई थी। जनता के दबाव में राज्य सरकार को विनोद कपूर समिति का गठन करना पड़ा। अपनी 2010 की रिपोर्ट में, समिति ने “झील में नमकीन पानी निकालने के अवैध कारोबार” पर प्रकाश डाला। रिपोर्ट में कहा गया है कि वेटलैंड क्षेत्र में 13,000 से अधिक अवैध ट्यूबवेल हैं। अब हालात और भी बदतर हुए है। यह हजारों करोड़ रुपये का अवैध कारोबार है। इस रिपोर्ट में इसे रोकने के लिए कई प्रकार के सुझाव दिए गए परन्तु क्षेत्र में व्यापार और राजनीतिक हितों के बीच सांठगांठ इतनी अधिक है कि क्षेत्र की पारिस्थितिकी को होने वाले नुकसान को रोक पाना असंभव लगता है।

सांभर झील की इकोलॉजी :

भारत के थार रेगिस्तान में सबसे बड़ी अंतर्देशीय खारी झीलों में से एक है, इसके जैविक महत्व के कारण 1990 में इसे रामसर साइट घोषित किया गया था। यह जयपुर, राजस्थान के पश्चिम में स्थित है। यह नमक की झील एक विशाल खारे आर्द्रभूमि का निर्माण करती है, जो कच्छ के रण के बाहर राजहंस (flamingo) के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है। सांभर साल्ट झील एक शीतोष्ण अति लवणीय पारिस्थितिकी तंत्र है।

फ्लेमिंगो के बिना सांभर अधूरा है।

फ्लेमिंगो के बिना सांभर अधूरा है (फोटो: धर्मेन्द्र खांडल)

झील की जलवायु उष्णकटिबंधीय मानसूनी है। वर्ष को अलग-अलग गर्मी, बारिश और सर्दी के मौसम के साथ चिह्नित किया जाता है। गर्मियों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस (113 डिग्री फारेनहाइट) तक पहुँच जाता है और सर्दियों में 5 डिग्री सेल्सियस (41 डिग्री फारेनहाइट) तक नीचे चला जाता है।

झील के आसपास 38 गांव हैं जिस कारण इस पर अत्यंत मानवीय दबाव है – प्रमुख बस्तियों में सांभर, गुढ़ा, जब्दीनगर, नवा, झाक, कोर्सिना, झापोक, कांसेडा, कुनी, त्योड़ा, गोविंदी, नंधा, सिनोदिया, अरविक की ढाणी, खानदजा, खाखड़की, केरवा की ढाणी, राजास, जालवाली की ढाणी आदि शामिल हैं।

यहाँ आर्द्रभूमि उत्तरी एशिया से प्रवास करने वाले हजारों पक्षियों के लिए एक प्रमुख शीतकालीन क्षेत्र है। झील में उगने वाले विशेष शैवाल और बैक्टीरिया आकर्षक जल रंग प्रदान करते हैं और यह झील की पारिस्थितिकी के मुख्य घटक है। इस झील के पानी में नमक (NaCl) की सांद्रता हर मौसम में अलग-अलग होती है। पैन (क्यार) में नमक की मात्रा अलग-अलग होती है और तदनुसार, haloalkaliphilic सूक्ष्मजीवों के कारण नमकीन पानी का रंग हरा, नारंगी, गुलाबी, बैंगनी, गुलाबी और लाल होता है। जो प्रवासी पक्षियों को भोजन देते है। आसपास के जंगलों में अन्य जंगली सूअर, नीलगाय और लोमड़ियों स्वतंत्र रूप से विचरण करती हैं।

ब्लैक स्टोर्क का एक समूह सांभर झील के किनारे पर

ब्लैक स्टोर्क का एक समूह सांभर झील के किनारे पर (फोटो: धर्मेन्द्र खांडल)

सांभर लेक में मछलीया नहीं मिलती परन्तु कई प्रकार के क्रस्टेसियन यहाँ मिलते है- यानी झींगा और क्रिल्ल समूह से सम्बन्ध रखने वाले जीव, जो कई प्राणियों का भोजन है। पक्षी विज्ञानी आर. एम. एडम, जो सांभर में सहायक आयुक्त थे, कुचामन और नवा सहित झील और इसके आसपास के क्षेत्रों के पक्षीविज्ञान संबंधी रिकॉर्ड प्रकाशित करने वाले पहले व्यक्ति थे (एडम 1873, 1874 ए-बी)। झील के पक्षी जीवन पर उनके विस्तृत नोट्स अभी भी जानकारी का एकमात्र प्रामाणिक स्रोत बने हुए हैं और इसे एक बेंचमार्क अध्ययन माना जाता है। एडम ने 244 पक्षी प्रजातियां दर्ज की थी। एडम के पेपर को वर्तमान संदर्भ में एक पक्षिविद श्री हरकीरत सांघा ने विश्लेषण किया है। सांघा के फ्लेमिंगो की दोनों प्रजातियों पर लिखे नोट्स का ज्यों का त्यों उल्लेख यहाँ कर रहा हूँ – “ग्रेटर फ्लेमिंगो नियमित और आम शीतकालीन आगंतुक। वे आम तौर पर अगस्त के दूसरे सप्ताह तक पहुंचते हैं और झील पर उनका रहना काफी हद तक पानी की उपलब्धता पर निर्भर करता है। सामान्य वर्षा वाले वर्षों में वे फरवरी तक झील छोड़ देते हैं, जब उच्च स्तर के वाष्पीकरण और नमक उत्पादन के लिए पानी के उपयोग के कारण झील सूखने लगती है। हालाँकि, ‘बाढ़’ के वर्षों के दौरान (उदाहरण के लिए, जुलाई 1977-जून 1978), जब झील गर्मियों में भी गीली रहती है, ग्रेटर और लेसर फ्लेमिंगो दोनों को पूरे वर्ष में दर्ज किया गया था (सांघा 1998)। आगमन और प्रस्थान की अंतिम तिथियां क्रमशः 10 अगस्त 1996 और 6 अप्रैल 1996 हैं। 1991 और 2009 के बीच आर्द्रभूमि की कई यात्राओं के दौरान राजहंस की पूरी गणना की गई और दो प्रजातियों के वितरण की योजना बनाई गई। हाल ही में प्रकाशित साहित्य (गोपाल और शर्मा 1994) के विपरीत, ग्रेटर फ्लेमिंगो हमेशा लेसर फ्लेमिंगो की तुलना में कम संख्या में थे। 25 जनवरी 1998 को 10,000 से अधिक की गिनती की गई। हालांकि 2 नवंबर 2001 को झील के किनारे तटबंध के पास एक अंडा पाया गया था, लेकिन इस प्रजाति ने सांभर में कभी भी सफलतापूर्वक प्रजनन नहीं किया, क्योंकि आदर्श जल परिस्थितियाँ उनके लिए उपलब्ध नहीं हैं।

सांभर झील में एक घोडा मकोड़ा (लार्ज अंट) तेजी से इधर उधर गतिमान रहते है।

सांभर झील में एक घोडा मकोड़ा (लार्ज अंट) तेजी से इधर उधर गतिमान रहते है (फोटो: धर्मेन्द्र खांडल)

सांघा लिखते है की लेसर फ्लेमिंगो बहुत आम है और झील पर सबसे प्रचुर प्रजाति है। परन्तु वे आगे लिखते है की अजीब बात है, एडम ने सांभर में अपने निवास के “पहले दो वर्षों के दौरान” इसका अवलोकन नहीं किया। वह कहते हैं कि “एक स्थानीय निवासी ने उन्हें बताया कि उन्होंने कमोबेश छोटे राजहंस देखे हैं, जिनके बारे में उनका कहना है कि वे छह या सात साल बाद झील पर आते हैं।” सांघा लिखते है की 1990 से मैं नियमित रूप से लेसर फ्लेमिंगो को देखता रहा हूं। झुंड बारिश की पहली भारी बारिश के बाद दिखाई देते हैं और उनके रहने की अवधि झील में पानी की मात्रा पर निर्भर करती है। सबसे प्रारंभिक आगमन तिथि 7 अगस्त 1998 दर्ज की गई थी जब 7,000 से अधिक देखे गए थे। वे आमतौर पर मार्च के अंत तक चले जाते हैं, लेकिन अंतिम तिथि 6 अप्रैल 1996 दर्ज की गई है। रिकॉर्ड संख्या 23 सितंबर 1995 को देखी गई थी जब 20,000 से अधिक का अनुमान लगाया गया था। जनवरी की शुरुआत से मार्च 1996 के अंत तक लगभग 18,000 फ्लेमिंगो देखे गए। 4 जनवरी 2009 को सी. 15,000 थे।

इस तरह यह लवणीय झील कई प्रकार के जीवों का अनोखा पर्यावास है।

सांभर झील की इकोलॉजी में बदलाव :

अब फिजा बदल रही है ।इस झील के बारे में एडम ने कभी लिखा था की – “बारिश में अत्यंत वीरान झील एक अत्यंत सुंदर दृश्य में बदल जाता है। साफ वातावरण जगमगा उठता है और दूर-दूर तक फैली पहाड़ियों की निचली श्रृंखला बैंगनी रंग में रंग जाती है, रेतीले टीले हरे रंग से ढक जाते हैं, और झील का तल 20 मील लंबाई और लगभग 5 इंच चौड़ाई में पानी के विस्तृत विस्तार में परिवर्तित हो जाता है। इस सब को बढ़ाने के लिए, छोटी-छोटी कलगीदार लहरें लहरा रही हैं, और पूरी सतह पक्षी-जीवन से भरी हुई है। राजहंसों के घने समूह को हर जगह तैरते या झील के तल में बहते, ऊपर की ओर उड़ते हुए, “सभी शानदार चीजों की समृद्ध छटा” के साथ, या भोजन की तलाश में किनारे पर चुपचाप घूमते हुए देखा जा सकता है। बड़े और छोटे पक्षियों की लंबी कतारें, सभी प्रकार के पंखों के, भव्य गुलाबी रंग के वयस्क फ्लेमिंगो से लेकर मटमैले भूरे और सफेद युवा फ्लेमिंगो तक, पश्चिम से पूर्व तक यहां मार्च करते हैं, और सभी अपने सिर नीचे झुकाते खाना खोजते हुए”

साकेर एक अत्यंत दुर्लभ शिकारी पक्षी है।

साकेर एक अत्यंत दुर्लभ शिकारी पक्षी है (फोटो: धर्मेन्द्र खांडल)

वे आगे लिखते है की सिंचाई के लिए सांभर के आसपास उपयोग में आने वाले खुले कुएं लगभग 30 या 40 फीट व्यास और 20 फीट गहरे खेतों में खोदे गए हैं। इनके किनारे विलो, बाघ और सरपत घास (प्रजातियों का वर्णन स्पष्ट नहीं है ) आदि की प्रजातियों से घने रूप से ढके हुए हैं, और कई पक्षियों का पसंदीदा निवास स्थान हैं। वर्तमान में पानी का लेवल लगभग 100 फ़ीट से भी गहरा चला गया है।

वर्तमान में यहाँ वर्षा के आंकड़े पैटर्न में किसी बड़े बदलाव का संकेत नहीं देते हैं, लेकिन झील में जल की आवक में भारी कमी आई है दूसरी और शैवाल में उल्लेखनीय वृद्धि झील के अस्तित्व के लिए गंभीर चिंता का विषय है। यह आसपास की मानवजनित गतिविधियों और झील के जलग्रहण क्षेत्र में चेक बांधों और एनीकटों के निर्माण के कारण हो सकता है जो झील में अपवाह को रोकते हैं और शैवाल की अनुकूल वृद्धि प्रदान करते हैं। सांभर झील को पानी लाने वाली अधिकांश नदियाँ रेत से भर गई हैं। जिस कारण ताजे पानी का मार्ग अवरुद्ध हो गया है। दूसरी और आस पास अनियमित वर्षा और अत्यधिक दोहन के कारण सरकार ने खेती को बचाने के लिए इधर उधर चेक्ड बाँध एवं एनीकट बनाकर जल प्रवाह को रोकने अथवा जल संचय हेतु जल स्तर में सुधार करने की नीति बनाई। इसके कारण स्थिति और भी विकट हो गयी है, जलग्रहण क्षेत्र से झील में पानी का प्रवाह बंद होता जा रहा है।

कम ताज़ा पानी के कारण उपमृदा पानी और अधिक लवणीय हो गया है और एक अध्ययन के अनुसार इसकी सांद्रता 18 to 24°Be तक पहुंच गई है। वर्तमान स्थिति को पुनर्जीवित करने के लिए, वर्षा जल जलग्रहण क्षेत्र से झील तक पहुंचना चाहिए।नहीं तो बढ़ते सूखे दिनों के कारण हवा -आँधी और तूफ़ान के माध्यम से नमक पास के क्षेत्र में ले जाएँगी और वह क्षेत्र भी खारा होता जाएगा।

एक अध्ययन के अनुसार सांभर झील की फाइटोप्लांकटन प्रजातियों की संरचना पहले बताई गई 20 जेनेरा से घटकर केवल 11 (नोस्टॉक, माइक्रोसिस्टिस, स्पिरुलिना, अपानोकैप्सा, ऑसिलेटोरिया, मेरिस्मोपेडिया, नित्ज़स्चिया, नेविकुला, सिनेड्रा, कोस्मेरियम और क्लॉस्टेरियम) रह गई है। (Jakher, Bhargava & Sinha,1990)

नवंबर 2019 में, झील क्षेत्र में लगभग 20,000 प्रवासी पक्षी रहस्यमय तरीके से मृत पाए गए थे। बोटुलिस्म को इसका कारण माना गया और अनेक लोग इस से सहमत नहीं लगते है। परन्तु अभी तक बोटुलिस्म ही प्रामाणिक कारण माना जाता है। झील के उत्तरी किनारे बिजली की तारों से पटा हुआ है। लोगों ने झील के पेट में हजारों की संख्या में बोरवेल खुदा दिए है ताकि १-२-३ किलोमीटर दूर तक अपने खेत में खारा पानी लेजा कर नमक बनाया जा सके। तीन और के किनारे नमक की क्यारियों से अटे पड़े है, झील के माता मंदिर वाले किनारे में भी मानवीय गतिविधियां जोरो पर है।

2019 में सांभर में हुई हजारों पक्षियों की मौत को सबसे पहले उजागर करने वाले पक्षी विशेषज्ञ श्री किशन मीणा और एक सरकारी कर्मचारी मृत पक्षी दिखता हुआ

2019 में सांभर में हुई हजारों पक्षियों की मौत को सबसे पहले उजागर करने वाले पक्षी विशेषज्ञ श्री किशन मीणा और एक सरकारी कर्मचारी मृत पक्षी दिखता हुआ (फोटो: धर्मेन्द्र खांडल)

2019 में हुई घटना के दौरान इस प्रकार मृत पक्षियों का ढेर एकत्रित किया जा रहा था।

2019 में हुई घटना के दौरान इस प्रकार मृत पक्षियों का ढेर एकत्रित किया जा रहा था (फोटो: धर्मेन्द्र खांडल)

सांभर झील संरक्षण के प्रयास :

अनेक लोग आज कल झील की चिंता करने लगे है। परन्तु PIL और मुखर मीडिया रिपोर्ट्स के बाद भी नतीजा सिफर रहा है। मात्र वर्ष 2014 में, भारत हेवी इलेक्ट्रिकल्स लिमिटेड और पावर ग्रिड कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड सहित छह सार्वजनिक उपक्रमों ने कंपनी के तहत भूमि पर दुनिया की सबसे बड़ी 4,000 मेगावाट की अल्ट्रा-मेगा सौर ऊर्जा परियोजना स्थापित करने की योजना बनाई थी। लेकिन राज्य में एक अत्यंत बुद्धिमान वन अधिकारी की चौकस निगाहों के कारण इस परियोजना को रोक दिया गया और गुजरात में स्थानांतरित कर दिया गया, नहीं तो यह झील पूरी तरह बरबाद हो जाती। इस अधिकारी का नाम उजागर करना ठीक नहीं है। वरना इसके पैरोकार कम और गाली देने वाले ज्यादा लोग मिल जायेंगे।

यह झील धीरे धीरे अपने गुणों के कारण मारी जा रही है। इसे बचाना अब असंभव लगता है।

 

References

  1. Adam, R. M. 1873. Notes on the birds of Sambhur Lake and its vicinity. Stray Feathers 1 (5): 361–404.
  2. Adam, R. M. 1874a. Additional notes on the birds of Sambhur Lake and its vicinity. Stray Feathers 2 (4&5): 337–341.
  3. Adam, R. M. 1874b. Letters to the Editor. [“Since writing my additional note I find that the under mentioned bird has been shot at Sambhar:- …”]. Stray Feathers 2 (4&5): 465–466.
  4. Jakher G. R., S. C. Bhargava & R. K. Sinha, (1990), Comparative limnology of Sambhar and Didwana lakes (Rajasthan, NW India) Hydrobiologia
टॉडगढ़ रावली वन्यजीव अभ्यारण्य

टॉडगढ़ रावली वन्यजीव अभ्यारण्य

 

यह जगह अनोखी है, हर कोना प्रकृति के रंग से रंगा हुआ और इतिहास की गाथाओं से लबरेज़। यह बात उस स्थान से जुड़ी है जिसका नाम है – टॉडगढ़ रावली वन्यजीव अभ्यारण्य। यह राजस्थान के दो महत्वपूर्ण पारिस्थितिकी तंत्रो के मिलन स्थान पर फैला हुआ है – एक तरफ थार का मरुस्थल है तो दूसरी तरफ विश्व की एक प्राचीनतम पर्वतमाला -अरावली। वर्ष 1983 में स्थापित इस लम्बवत अभ्यारण्य का राजस्थान के तीन जिलों में प्रसार है – अजमेर, पाली एवं राजसमंद। अरावली मेवाड़ और मारवाड़ क्षेत्रों के मध्य अवरोध के रूप में स्थित है जिसे स्थानीय भाषा में आड़े आना कहते है यानी “आड़ा वाला” जिसे ही कालांतर में अरावली कहा जाने लगा।

टॉडगढ़ से दिखनेवाला अरावली के प्रसार एक दृश्य

इतिहास की कई कहानियां की चर्चा अधिक नहीं होती, परन्तु जरुरी नहीं की उनका महत्व कम हो – जैसे दक्षिणी छोर का हिस्सा – दीवर- जहाँ महाराणा प्रताप ने अकबर की सेना को परास्त किया एवं अपने खोये राज्य का अधिकांश हिस्सा पुनः प्राप्त किया। दीवर के रास्ते के एक तरफ राजस्थान का एक अत्यंत खूबसूरत राष्ट्रीय उद्यान – कुम्भलगढ़ है तो दूसरी यह अनोखा वन्यजीव अभ्यारण टॉडगढ़ रावली है, इन दोनों के मध्य स्थित है दिवेर की नाल (गोर्ज)। वानस्पतिक तौर पर विविधता से भरे इस घुमावदार नाल (गोर्ज) में बघेरे राज करते है। अक्सर यह कुम्भलगढ़ की दीवार पर सुस्ताते मिल जाते है। टॉडगढ़ रावली वन्यजीव अभ्यारण्य एवं कुम्भलगढ़ दोनों इन दोनों को मिलाकर अरावली राष्ट्रीय उद्यान की स्थापना प्रस्तावित है कभी शायद सरकार बाघों से फुर्सत पाकर इन उपेक्षित पड़े क्षेत्रों पर भी मेहरबान होगी।

भील बेरी झरना

इसी तरह मध्य हिस्से के ऊँचे स्थान पर बसा टॉडगढ़ कस्बा जिसके नाम पर इस अभ्यारण्य को नाम मिला स्थित है, यहाँ का इतिहास भी कुछ कम नहीं है। अजमेर जिले के अंतिम छोर में अरावली पर्वत श्रृंखला में टॉडगढ़ बसा हुआ है, जि‍सके चारो और एवं आस पास पहाड़ियां एवं वन्य अभ्यारण्य है। टॉडगढ़ को राजस्थान का मिनी माउंट आबू भी कहते हैं, क्योंकि यहां की जलवायु माउंट आबू से काफी मिलती है व माउंट आबू की भांति इसकी ऊंचाई  भी समुद्र तल से काफी अधिक हैं। टॉडगढ़ का पुराना नाम बरसा वाडा था। जिसे बरसा नाम के गुर्जर जाति के व्यक्ति ने बसाया था। टॉडगढ़ के आसपास रहने वाले लोग स्वतंत्र विचारधारा  हुआ करते थे एवं मेवाड़ एवं अजमेर के शासक भी इनसे बिना वजह नहीं टकराते थे। लेफ्टिनेंट कर्नल जेम्स टॉड ने इस क्षेत्र को नियंत्रण में लेने के लिए स्थानीय राज्य का सहयोग किया ओर इस स्थान का नाम टॉडगढ़ पड़ा ।  वर्ष 1818 में जेम्स टॉड को राजस्थान के मेवाड़ राज्य के राजनीतिक प्रतिनिधि के तौर पर पद स्थापित किया गया।  टॉडगढ़ के आसपास का क्षेत्र मेर जनजाति द्वारा अधिवासित होने के कारण मेरवाड़ा नाम से जाना जाता है।

टेल्ड जे तितली।

पांच वर्ष के थोड़े अंतराल के पश्चात (1823 में) उन्हें स्वास्थ्य कारणों से ब्रिटेन वापिस जाना पड़ा, परन्तु युद्ध और राजनीतिक दांव पेंच के माहिर टॉड ने राजपुताना के इतिहास पर  अनेक शोध पूर्ण जानकारियों का संकलन किया जो वर्ष 1829 में  Annals and Antiquities of Rajast’han or the Central and Western Rajpoot States of India के नाम से प्रकाशित हुआ।  यहीं वह दस्तावेज है जहाँ सबसे पहले राजस्थान शब्द का इस्तेमाल हुआ परन्तु टॉड ने Rajasthan को Rajast’han के रूप में लिखा था।

थार मरुस्थल की शुष्क एवं गर्म हवाओं को दक्षिण राजस्थान जाने से रोकने में यह अभ्यारण्य सबसे अधिक प्रभावी भूमिका अदा करता है। वर्षा काल में यहाँ कई नाले ओर झरने बहने लगते है, परन्तु भागोरा फॉरेस्ट ब्लॉक का 55 मीटर ऊँचा झरना भील बेरी  देखते ही बनता है, जो शायद राजस्थान के अरावली में स्थित सर्वाधिक ऊँचे झरनों में शुमार होता है।अभ्यारण्य में अरावली की प्रमुख चोटियों में से एक ‘गोरम घाट चोटी’ अवस्थित है जिसकी समुद्र तल से ऊंचाई ९२७ मीटर है। वनस्पति  विविधता के तौर पर यहां मरुस्थल और अरावली दोनों के घटक देखने को मिल जाते है।

स्लेंडर रेसर एक अत्यंत खूबसूरत सांप है जो यहाँ गाहे बगाहे मिल जाता है।

मानसूनी वर्षा वाला क्षेत्र होने के कारण यहां पर पतझण वन पाये जाते हैं। यहां पर प्रमुख रूप से अरावली का मुख्य वृक्ष धोक (Anogeissus pendula), कम मिट्टी ओर सूखे पर्वतों पर उगने वाला खैर (Acacia catechu), ऊँचे पहाड़ो ओर खड़ी ढलानों पर उगने वाले पेड़ सालर (Boswellia serrata), सूखे पत्थरों पर उगने वाला पेड़ गुर्जन (Lannea coromandelica), मैदानी भागो में उगने वाला वृक्ष ढाक या पलास (Butea monosperma),  कँटीला पेड़ हिंगोट (Balanites aegyptiaca), विशाल वृक्ष बरगद (Ficus begnhaleniss), मरुस्थलीय स्थिर टीलों पर उगने वाला पेड़ कुंभट (Senegalia senegal), लवणीय भूमि का वृक्ष पीलू (Salvedora persica) व खट्टे फल पैदा करने वाला इमली वृक्ष (Tamarindus indica) आदि वृक्ष अधिक मात्रा में पाये जाते है। यह वन भारत के अत्यंत सुन्दर झाड़ीदार वन के रूप में विख्यात है, जहाँ करील (Caparis  decidua), डांसर (Rhus mysorensis), जैसी झाड़ियाँ भी बहुतायत में मिलती है साथ बेर झाड़ी  (Zizyphus mauritiana) की भरमार इस स्थान को अनेक पक्षियों के लिए सुगम भोजन उपलब्धता करवाता है।  इन तीनों झाड़ियों के फल पक्षियों को अत्यंत लुभाते है ओर छोटे पक्षियों को पर्याप्त आश्रय के स्थान उपलब्ध करवाता है। यहाँ दो अत्यंत सुन्दर और दुर्लभ होती जा रही चिड़ियाएं मिलती है जिनमें वाइट बेलिड मिनिविट -white-bellied minivet (Pericrocotus erythropygius)  ओर वाइट नैपड टिट – white-naped tit (Machlolophus nuchalis) है। इनके अलावा विलुप्त होती जा रही गिद्ध प्रजातियां भी प्रसिद्ध मंदिर दुधलेश्वर महादेव के पास मिल जाते है। टॉडगढ़ रावली वन्यजीव अभ्यारण्य  धूसर जंगली मुर्गों  -Gray junglefowl (Gallus sonneratii) के विस्तार की उत्तरी सीमा माना जाता हैं।

वाइट बेलिड मिनिविट पक्षी यहाँ अक्सर दिख जाते है

यहाँ का सबसे अधिक आकर्षण का केंद्र है घोरम घाट रेलवे ट्रैक , जहाँ से ट्रेन झरनों, सुरंगो, ओर मनोहारी वन क्षेत्रों से भरपूर मार्ग से गुजरती है। यहां से गुजरने वाली ट्रेन लोगों में सदैव कौतुहल का विषय रहती है। यह रेलवे लाइन अब उन चुनिंदा रेल मार्गों में बची है जो मीटर गेज श्रेणी में आती है, साथ ही यह राजस्थान की एकमात्र माउंटेन रेलवे अथवा टॉय ट्रेन के समक्ष हेरिटेज रेलवे लाइन के रूप में मानी गयी है। यद्यपि यह इस वन क्षेत्र के लिए  निसंदेह अभिशाप होगी।

वन क्षेत्र से गुजरती ट्रैन सुहानी तो लगती है परन्तु यह यहाँ की पारिस्थितिक तंत्र के लिए सबसे अधिक बड़ी चुनौती भी है।

टॉडगढ़ रावली वन्य जीव अभ्यारण्य के पास स्थित कुम्भलगढ़ राष्ट्रीय उद्यान में बाघों को स्थापित करने के प्रयास चल रहे है अतः आने वाले समय में कुम्भलगढ़ से सटे इस इस अभ्यारण में संरक्षण के कार्य अधिक तेज होने की संभावना है। इस क्षेत्र में अंतिम बाघ 1964 में देखा जाना माना जाता है। यद्यपि यह नामुमकिन लगता है कि बढ़ते राजमार्गों के जाल से यह स्थान कभी सुरक्षित रह पायेगा, साथ ही बढ़ते धार्मिक पर्यटन के प्रभाव  इस स्थान के लिए एक बहुत बड़ा खतरा है।
परन्तु अनेकों खतरों ओर समस्याओं ऐसे जूझता यह अभ्यारण्य अभी तक जैव विविधता के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान बना हुआ है , हमें प्रयास करना होगा यह अपने प्राकृतिक स्वरूप को बनाये रखे।

Dr. Dharmendra Khandal (L) has worked as a conservation biologist with Tiger Watch – a non-profit organisation based in Ranthambhore, for the last 16 years. He spearheads all anti-poaching, community-based conservation and exploration interventions for the organisation.

Mr. Rajdeep Singh Sandu (R)  :-is a lecturer of political science. He is interested in history, plant ecology and horticulture.

सभी फोटोग्राफ: धर्मेंद्र खांडल