कोटा के गैपरनाथ क्षेत्र में सूखे पेड़ पर बसेरा करते भारतीय गिद्ध

वल्चर सेफ ज़ोन: गिद्धों को बचाने की एक पहल

गिद्ध, हमारे पारिस्थितिकी तंत्र के अभिन्न अंग हैं, जो सफाईकर्मी के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि, बीते कुछ दशकों में गिद्धों की आबादी में खतरनाक गिरावट आई। गिद्धों के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाना उनके संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

गिद्ध, प्रकृति के सफाईकर्मी के रूप में जाने जाते हैं, ये मृत जानवरों को खाकर पर्यावरण को संतुलित रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन दुर्भाग्य से, विश्वभर में गिद्धों की संख्या पिछले तीन दशकों में चिंताजनक रूप से कम हुई है और इस गिरावट से राजस्थान भी अछूता नहीं रहा। हालांकि हाल ही में प्रकाशित एक शोध पत्र के अनुसार भारत में गिद्धों की संख्या स्थिर हुई है, लेकिन बढ़ नहीं रही है। इस लेख में जानिए कि वल्चर सेफ ज़ोन (Vulture Safe Zone) क्या है, इसके मानदंड क्या हैं, और भारत व राजस्थान में गिद्धों को बचाने के लिए क्या प्रयास हो रहे हैं।

सूखे घास के मैदान में एक मृत पशु के शव के आसपास इकट्ठा भारतीय गिद्धों का झुंड
भारतीय गिद्धों का एक समूह (फ़ोटो: बनवारी यदुवंशी)

भारत और राजस्थान में गिद्धों की प्रजातियाँ

भारत में कभी नौ गिद्धों की प्रजातियाँ पाई जाती थीं, जिनमें से तीन – वाईट-रम्प्ड गिद्ध (Gyps bengalensis), भारतीय गिद्ध (Gyps indicus) और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध (Gyps tenuirostris) – गंभीर रूप से संकटग्रस्त हैं।

इन नौ प्रजातियों में शामिल हैं: लॉन्ग-बिल्ड गिद्ध (Gyps indicus), स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध (Gyps tenuirostris), वाईट-रम्प्ड गिद्ध (Gyps bengalensis), हिमालयन ग्रिफॉन (Gyps himalayensis), यूरेशियन ग्रिफॉन (Gyps fulvus), सिनेरियस गिद्ध (Aegypius monachus), रेड-हेडेड गिद्ध (Sarcogyps calvus), इजिप्शियन गिद्ध (Neophron percnopterus), और बेयरडेड गिद्ध (Gypaetus barbatus)

राजस्थान, अपने शुष्क वनों और खुले मैदानों के कारण, गिद्धों के लिए महत्वपूर्ण आवास स्थल है। यहाँ बेयरडेड गिद्ध और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध को छोड़कर बाकी सातों प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से चार प्रजातियाँ निवासी हैं और यहीं प्रजनन करती हैं, जबकि तीन अन्य प्रजातियाँ प्रवासी पक्षी के रूप में अक्टूबर से मार्च के महीनों में यहाँ देखी जाती हैं, कभी-कभी अप्रैल के मध्य तक भी यहाँ देखी जा सकती हैं। राजस्थान में पाए जाने वाले प्रवासी गिद्धों की प्रजातियों में हिमालयन ग्रिफॉन, यूरेशियन ग्रिफॉन, और सिनेरियस गिद्ध शामिल हैं।

कोटा ज़िले में चट्टान की दरार पर बने घोंसले में चूज़े के साथ बैठा भारतीय गिद्ध
कोटा ज़िले में स्थितः भारतीय गिद्ध का ब्रीडिंग और नेस्टिंग साइट (फ़ोटो: बनवारी यदुवंशी)

गिद्धों की संख्या क्यों घटी? डाइक्लोफेनाक और अन्य खतरे

यहाँ ध्यान दें कि गिद्धों की संख्या में तेजी से गिरावट आने का कारण मुख्य रूप से पशुओं में इस्तेमाल की जाने वाली स्टेरॉयडमुक्त प्रज्वलनरोधी (NSAIDs) दवाएँ थीं। नसाइड्स दवाओं में भी डाइक्लोफेनाक का उपयोग गिद्धों के अस्तित्व के लिए घातक साबित हुआ। डाइक्लोफेनाक को पशुओं के लिए दर्द निवारक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जो की मृत पशुओं के अवशेषों में रह जाता और जब गिद्ध इन मृत जानवरों को खाते तो डाइक्लोफेनाक उनके शरीर में प्रवेश कर उनके गुर्दे की कार्यक्षमता को नष्ट कर देता जिससे उनकी मृत्यु हो जाती थी।

डाइक्लोफेनाक के उपयोग से मुख्य रूप से प्रभावित प्रजातियों में वाईट-रम्प्ड गिद्ध, भारतीय गिद्ध और स्लेंडर-बिल्ड गिद्ध शामिल थे। इन तीन प्रजातियों की आबादी में 95% से अधिक की गिरावट आई थी। अन्य प्रजातियाँ भी कम संख्या में पाई जाती हैं, जिससे गिद्धों के पारिस्थितिक कार्यों पर व्यापक प्रभाव पड़ा, और शहरों और गाँव में मृत जीवों के शव कई दिनों तक सड़ते हुए देखे जाने लगे।

लाल मिट्टी पर पड़े मृत मवेशी के शव पर भोजन करते गिद्ध
डाइक्लोफेनाक को पशुओं के लिए दर्द निवारक के रूप में इस्तेमाल किया जाता था, जो की मृत पशुओं के अवशेषों में रह जाता और जब गिद्ध इन मृत जानवरों को खाते तो डाइक्लोफेनाक उनके शरीर में प्रवेश कर उनके गुर्दे की कार्यक्षमता को नष्ट कर देता जिससे उनकी मृत्यु हो जाती थी। (फ़ोटो: प्रवीण)

गिद्धों के लिए अन्य खतरों में शामिल है उनके आवास का नुकसान। पेड़ों को काटना और चट्टानों को तोड़ना गिद्धों के घोंसले बनाने के लिए उपयुक्त स्थानों को कम कर देता है। दूसरा कारण है विद्युत लाइन। गिद्ध बड़े पंखों वाले पक्षी होते हैं, और वे अक्सर विद्युत लाइनों से टकराकर मारे जाते हैं। इसके अलावा कुछ क्षेत्रों में, गिद्धों का उनके शरीर के अंगों के लिए अवैध रूप से शिकार किया जाता है, जिन्हें तांत्रिक क्रियाओं में इस्तेमाल करने की गलत धारणा है।

गिद्धों की इस चिंताजनक स्थिति को देखते हुए 2000 के दशक के मध्य में डाइक्लोफेनाक के पशु चिकित्सा उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया गया और साथ ही पशु चिकित्सकों को गिद्धों के लिए सुरक्षित दवाओं के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित किया गया। पूरे भारत की तरह, राजस्थान में भी डाइक्लोफेनाक के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाने के बाद से गिद्धों की संख्या में मामूली सुधार तो हुआ है, लेकिन उनकी आबादी अभी भी अपने मूल स्तर से बहुत कम है।

अपडेट (2026): डाइक्लोफेनाक के बाद तीन और पशु-दवाओं पर रोक लग चुकी है। अगस्त 2023 में भारत सरकार ने पशु चिकित्सा में एसिक्लोफेनाक और कीटोप्रोफेन के उपयोग पर प्रतिबंध की अधिसूचना जारी की। एसिक्लोफेनाक मवेशी के शरीर में पहुँचते ही डाइक्लोफेनाक में बदल जाता है, इसलिए यह गिद्धों के लिए उतना ही घातक है। इसके बाद जनवरी 2025 में पशुओं के इलाज में निमेसुलाइड के उपयोग पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। (स्रोत: SAVE, 2023; SAVE, 2025)

भारत में गिद्ध संरक्षण के प्रयास

गिद्धों के संरक्षण के लिए भारत सरकार और वन्यजीव संस्थाएं मिलकर कई प्रयास कर रही हैं जिनमें वल्चर सेफ ज़ोन (Vulture Safe Zone), गिद्ध अभयारण्य, संरक्षण और प्रजनन केंद्र, और जागरूकता अभियान शामिल हैं।

गिद्ध अभयारण्य

“गिद्ध अभयारण्य” नामक विशेष क्षेत्रों की स्थापना की जा रही है। इन क्षेत्रों में पशुओं के मृत शरीरों को जहर रहित दवाओं से उपचारित किया जाता है ताकि गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन उपलब्ध हो सके। देश का एकमात्र गिद्ध अभयारण्य रामदेवरा बेट्टा हिल है, जो की कर्नाटक के रामनगर ज़िले (अब बेंगलुरु दक्षिण ज़िला) में स्थित है।

गिद्ध संरक्षण एवं प्रजनन केंद्र (VCBC)

देश भर में कई गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र स्थापित किए गए हैं। इन केंद्रों में घायल गिद्धों का उपचार किया जाता है और स्वस्थ गिद्धों को प्रजनन के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। इन केंद्रों से भविष्य में जंगल में गिद्धों को छोड़ा जा सकता है। भारत में नौ गिद्ध संरक्षण और प्रजनन केंद्र (वीसीबीसी) हैं, जिनमें तीन बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (बीएनएचएस) और बाकी सेंट्रल जू अथॉरिटी द्वारा प्रशासित हैं:

  • पिंजौर, हरियाणा: 2001 में गिद्ध देखभाल केंद्र के रूप में स्थापित, यह 2004 में भारत का पहला वीसीबीसी था
  • राजाभातखावा, पश्चिम बंगाल: 2005 में स्थापित
  • रानी, गुवाहाटी, असम: 2007 में स्थापित
  • केरवा, वन विहार राष्ट्रीय उद्यान, भोपाल, मध्य प्रदेश: 2011 में स्थापित
  • हैदराबाद के नेहरू प्राणी उद्यान में हैदराबाद गिद्ध प्रजनन केंद्र
  • जूनागढ़ गिद्ध प्रजनन केंद्र , सक्करबाग प्राणि उद्यान, जूनागढ़
  • रांची गिद्ध प्रजनन केंद्र, मगरमच्छ प्रजनन केंद्र, मुटा, रांची
  • भुवनेश्वर गिद्ध प्रजनन केंद्र, नंदनकानन प्राणि उद्यान, भुवनेश्वर
भारत का नक्शा जिसमें पिंजौर, राजाभातखावा, रानी, भोपाल, रांची, भुवनेश्वर, हैदराबाद और जूनागढ़ के गिद्ध प्रजनन केंद्र दिखाए गए हैं
भारत मे मौजूद गिद्ध प्रजनन केंद्र (वल्चर ब्रीडिंग सेंटर) (मैप: प्रवीण)

वल्चर सेफ ज़ोन (Vulture Safe Zone) क्या है?

वल्चर सेफ़ ज़ोन (वीएसजेड) न केवल गिद्धों को बचाने में महत्वपूर्ण हैं, बल्कि पूरे पारिस्थितिकी तंत्र के लिए भी लाभदायक हैं। प्रत्येक वीएसजेड, गंभीर रूप से लुप्तप्राय गिद्ध प्रजातियों में से कम से कम एक प्रजाति के जीवित कॉलोनी पर केंद्रित होती है। वीएसजेड को 100 किमी त्रिज्या (30,000 वर्ग किमी से अधिक) के दायरे वाले क्षेत्रों के रूप में परिभाषित किया गया है, और यह क्षेत्र ओरिएंटल व्हाइट-बैकड गिद्धों (SAVE, 2014) के रेंज के आधार पर निर्धारित किया गया है।

वल्चर सेफ ज़ोन के मानदंड

SAVE (Saving Asia’s Vultures from Extinction) के अनुसार वीएसजेड में:

  • पशु चिकित्सा उपयोग के लिए दुकानों पर डाइक्लोफेनाक उपलब्ध नहीं होना चाहिए,
  • कम से कम 800 मवेशियों के शव के जिगर के नमूनों में कोई डाइक्लोफेनाक नहीं पाया जाना चाहिए,
  • वीएसजेड क्षेत्र के भीतर मृत गिद्धों में कोई डाइक्लोफेनाक या आंत संबंधी गठिया नहीं पाया जाना चाहिए,
  • वीएसजेड में गिद्धों की आबादी में स्थिरता या वृद्धि होनी चाहिए।

अपडेट (2026): समय के साथ SAVE ने इन मानदंडों को अधिक व्यावहारिक बनाया है। नए मानदंडों में दवा दुकानों के सर्वेक्षण में 10% से कम दुकानों पर ही कोई विषैली NSAID दवा उपलब्ध होना, कम से कम 25 गिद्धों की दो वर्ष तक (या उतने ही “बर्ड-ईयर्स” की) लगातार ट्रैकिंग, और यह पुष्टि कि किसी भी गिद्ध की मृत्यु NSAID विषाक्तता से नहीं हुई, शामिल हैं। (स्रोत: SAVE; SAVE, 2026)

गिद्धों के लिए सुरक्षित भोजन की आपूर्ति सुनिश्चित की जाती है। इसके लिए इन क्षेत्रों में मवेशी आश्रयों अथवा गौशालाओं (जैसे करौली की ठेकरा गौशाला) के साथ मिलकर काम किया जाता है, जहाँ गिद्धों को खाने के लिए मृत गायों को उपलब्ध कराया जाता है।

कैलादेवी क्षेत्र में तीन भारतीय गिद्धों का नज़दीकी चित्र
कैलादेवी क्षेत्र में मौजूद गंभीर रूप से संकटग्रस्त भारतीय गिद्ध (फ़ोटो: प्रवीण)

अस्थायी (प्रोविज़नल) वल्चर सेफ ज़ोन

जब उपरोक्त मानदंड पूरे होते हैं तभी वीएसजेड पूरी तरह से स्थापित होता है। जब तक यह स्थापित नहीं होता कि उक्त मानदंड पूरे हो गए हैं तब तक इन क्षेत्रों को अस्थायी गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (प्रोविज़नल वल्चर सेफ़ ज़ोन, पीवीएसजेड) माना जाता है।

वल्चर सेफ ज़ोन की शुरुआत: नेपाल मॉडल

वर्ष 2011 में नेपाल ने स्थानीय समूहों और गैर सरकारी संगठनों का एक नेटवर्क विकसित करके वीएसजेड स्थापित करने का नेतृत्व किया, और डाइक्लोफेनाक के उपयोग में कमी और रोक सुनिश्चित करने के लिए गिद्धों के प्रजनन इलाकों के आसपास के क्षेत्रों में एक साथ काम किया।

नेपाल द्वारा वल्चर सेफ़ ज़ोन बनाने के लिए सबसे पहले गिद्धों के प्रजनन इलाकों के आसपास के क्षेत्रों से पशु चिकित्सा के लिए डाइक्लोफेनाक के सभी उपलब्ध स्टॉक को हटाया गया और इसकी जगह गिद्ध सुरक्षित दवा मेलॉक्सिकैम को स्थापित किया गया। यह बदलाव उन्होंने प्रजनन क्षेत्रों के 50 किमी की दूरी तक के दायरे में स्थापित किया।

डाइक्लोफेनाक को मेलॉक्सिकैम से बदलने के बाद स्थानीय समुदाय के बीच एक व्यापक शिक्षा और जागरूकता कार्यक्रम चलाया। इस कार्यक्रम में गिद्धों के शवों को साफ करने की क्षमता के संबंध में जानकारी दी और यह भी बताया कि किस प्रकार ये बीमारी के खतरों को कम करते हैं और कुत्तों की बढ़ती संख्या को भी नियंत्रित करने में मदद करते हैं। इसके अलावा किसानों, पशुचिकित्सकों और फार्मासिस्टों के साथ कार्यशालाएँ आयोजित की ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि वे डाइक्लोफेनाक के उपयोग से होने वाली समस्याओं के बारे में जानते हैं।

इस मेहनत का नतीजा दिसंबर 2021 में सामने आया, जब नेपाल का गंडकी-लुम्बिनी वल्चर सेफ़ ज़ोन पहला “पूर्णतः सुरक्षित” वीएसजेड घोषित किया गया। यहाँ टैग किए गए वयस्क गिद्धों की वार्षिक उत्तरजीविता दर 97% से अधिक पाई गई। (स्रोत: SAVE, 2021)

नेपाल के बाद भारत, पाकिस्तान और बांग्लादेश ने भी वल्चर सेफ़ ज़ोन के माध्यम से गिद्धों के इन-सीटू संरक्षण पर जोर दिया।

कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य की झाड़ीदार पहाड़ी पर बैठे गिद्ध और उनके बीच खड़ा एक सियार
कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य गिद्धों की एक छोटी आबादी को संरक्षित करता है, जो की एक संभावित वल्चर सेफ़ ज़ोन भी घोषित किया जा सकता है (फ़ोटो: प्रवीण)

राजस्थान में गिद्ध संरक्षण और जोड़बीड़

गिद्धों की आबादी के हिसाब से देखा जाए तो राजस्थान एशिया के गिद्धों के लिए महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है। देश का सबसे बड़ा राज्य होने के साथ ही यहाँ 22 जिलों में गिद्धों का आश्रय पाया गया है, जिनमें निवासी और प्रवासी गिद्ध दोनों ही शामिल हैं। प्रवासी पक्षी (मुख्यतः ईगिप्शियन वल्चर) प्रजनन के लिए यहाँ घोंसलों का निर्माण कर प्रजनन करते हैं इसलिए यहाँ गिद्धों के संरक्षण के लिए सुरक्षित क्षेत्र बनाना आवश्यक है। इन बातों को ध्यान में रखते हुए राजस्थान के संरक्षणवादी और गैर सरकारी संस्थाएँ काफी समय से राजस्थान में गिद्ध प्रजनन केंद्र की मांग कर रहे हैं।

गिद्ध संरक्षण के लिहाज से बीकानेर स्थित जोड़बीड़ गिद्ध संरक्षण रिज़र्व राजस्थान द्वारा किया गया एक सफल प्रयास है। हालांकि अभी तक इस क्षेत्र को वीएसजेड का दर्जा नहीं मिल पाया है।

गिद्ध संरक्षण के लिए काम कर रहे प्रोफेसर डॉ दाऊ लाल बोहरा ने जोड़बीड़ को वीएसजेड घोषित करवाने हेतु यहाँ आ रहे मवेशियों के शवों की जांच करवाई और पाया कि किसी भी शव के उपचार के लिए गिद्धों के लिए हानिकारक दवाओं का उपयोग नहीं किया गया बल्कि उनके लिए सुरक्षित दवाएँ ही उपयोग की गई हैं। इसके अलावा संदिग्ध जानवरों को कुत्तों के खाने के लिए रखा जाता है। साथ ही स्थानीय औषधि विक्रेताओं को जागरूक किया जा रहा है ताकि जल्द से जल्द इस क्षेत्र को वीएसजेड घोषित किया जा सके।

जोड़बीड़ का गिद्धों के लिए महत्व देखते हुए यहाँ आ रहे गिद्धों का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर रिंगिंग और टैगिंग कार्यक्रम चलाया जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सीएमएस सीओपी में भी राजस्थान के महत्व और यहाँ गिद्ध संरक्षण के प्रयासों को और मजबूत करने हेतु चिंता जताई जा चुकी है। सीएमएस सीओपी उन पार्टियों का सम्मेलन है, जो जंगली जानवरों की प्रवासी प्रजातियों के संरक्षण पर प्राथमिक निर्णय लेने और उनकी पालना सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है।

भारत में वल्चर सेफ ज़ोन

वीएसजेड के मुख्य लक्ष्य सभी देशों में समान हैं, हालांकि मॉडल अलग-अलग देशों में और यहां तक कि एक देश के भीतर भी भिन्न देखने को मिल जाते हैं। नेपाल ने वीएसजेड पर वर्ष 2011 में काम शुरू किया, जिसके बाद भारत ने 2012 के शुरुआत में काम शुरू किया। बांग्लादेश ने 2014 में काम शुरू किया और वीएसजेड को गजेट अधिसूचना के माध्यम से कानूनी दर्जा देने वाला पहला देश बन गया। जबकि नेपाल और भारत में वीएसजेड को कोई कानूनी दर्जा नहीं प्राप्त है। भारत में 9 चयनित क्षेत्रों को गिद्धों के लिए संभावित गिद्ध सुरक्षित क्षेत्र (वीएसजेड) के रूप में पहचाना गया है। ये सारे क्षेत्र गिद्ध प्रजनन केंद्रों को ध्यान में रखते हुए पहचाने गए हैं। हरियाणा में पिंजौर, पश्चिम बंगाल में राजाभातखावा, असम में माजुली द्वीप के आसपास, एमपी में बुक्सवाहा, यूपी में दुधवा राष्ट्रीय उद्यान और कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य, झारखंड में हज़ारीबाग़, और गुजरात में सौराष्ट्र।

संरक्षणवादी एवं गैर सरकारी संस्थाएँ मौजूदा गिद्ध सुरक्षित क्षेत्रों को स्थापित एवं मजबूत करने और नए क्षेत्र बनाने के लिए काम कर रहे हैं। उम्मीद है कि पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में इस पहल से गिद्धों के संरक्षण में सफलता मिलेगी।

राजस्थान बायोडायवर्सिटी नेटवर्क अब पूरे राजस्थान में गिद्धों के बसेरा (रूस्टिंग) और घोंसला (नेस्टिंग) स्थलों का सर्वेक्षण शुरू कर रहा है। किसी भी भावी वल्चर सेफ ज़ोन की नींव यही आँकड़े होते हैं। यदि आप अपने ज़िले को अच्छी तरह जानते हैं, तो इस सर्वेक्षण से जुड़ने के बारे में यहाँ पढ़ें

कवर फ़ोटो: कोटा के गैपरनाथ क्षेत्र के पास भारतीय गिद्धों का एक समूह (फ़ोटो: बनवारी यदुवंशी)

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