राजस्थान के बाघ अभयारण्यों से गाँवों के विस्थापन की तथ्यात्मक कहानी

राजस्थान के बाघ अभयारण्यों से गाँवों के विस्थापन की तथ्यात्मक कहानी

भारत के जंगलों में, जहाँ बाघ की दहाड़ के बीच हज़ारों परिवारों का शोर भी सुनाई देता है, वहाँ उनके खेत, उनके पशु, उनके देवता और उनके पुरखों के स्मारक स्थल — सब उसी जंगल से जुड़े हैं। लेकिन जब भारत ने अपने बाघों को बचाने का फ़ैसला किया, तो सबसे पहला सवाल यही उठा: क्या बाघ और इंसान एक ही ज़मीन पर रह सकते हैं? यद्यपि, इस यक्ष प्रश्न के उत्तर पर आज भी मतभेद बना हुआ है।

इस सवाल को समझने के लिए पहले ‘विस्थापन’ को समझना ज़रूरी है। ‘विस्थापन’ यानी किसी गाँव या बस्ती को उसकी पुरानी जगह से हटाकर कहीं और बसाना — जो इस देश में बाँध, सड़क और विकास की अन्य गतिविधियों के लिए होता ही रहता है। टाइगर रिज़र्व के संदर्भ में विस्थापन के लिए ग्रामीणों की सहमति सर्वोपरि होती है, और इसीलिए इसे ‘स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन’ कहा जाता है। वन विभाग का तर्क है कि जब गाँव बाघ के ‘क्रिटिकल हैबिटेट’ — यानी उसके मुख्य इलाक़े — में बसे हों, तो न तो बाघ सुरक्षित रह पाता है और न ही ग्रामीण।

एक ओर, जंगल के अंदर रहने वाले लोग लकड़ी, चारा, पानी और ज़मीन के लिए उसी वन पर निर्भर होते हैं। उनके मवेशी बाघ के प्राकृतिक शिकार को प्रभावित करते हैं, और कभी-कभी बाघ खुद उनके पशुओं को उठा ले जाता है — इससे मानव-वन्यजीव संघर्ष बढ़ता है। दूसरी ओर, वन्यजीव विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर बाघ को एक बड़ा और सुरक्षित क्षेत्र मिले, तो उसकी संख्या सुरक्षित रह सकती है।

इसलिए यह बहस सिर्फ़ पर्यावरण की नहीं, बल्कि न्याय, संस्कृति, पहचान और आजीविका की भी है। इस लेख में हम इसी जटिल सवाल के विभिन्न पहलुओं को राजस्थान के संदर्भ में समझेंगे — 1976 के रणथम्भौर से लेकर आज के धौलपुर-करौली तक, और पशु चराने वाले परिवारों से लेकर नेचर गाइड बन चुके युवाओं तक के सफ़र की चर्चा करेंगे।

जंगल बचाने की नींव

ब्रिटिश राज के दौर में, सिर पर सफारी टोपी लगाए, हाथ में राइफ़ल थामे और अभी-अभी मारे गए बाघ पर पैर टिकाए खड़े ‘साहब-शिकारी’ की तस्वीर बेहद आम थी। आज़ादी के बाद भी यह सिलसिला रुका नहीं। किसी को ठीक-ठीक यह तक नहीं पता था कि भारत के जंगलों में कितने बाघ बचे हैं, और उन्हें अंधाधुंध मारा जा रहा था।

बीसवीं सदी के आरंभ में, अनुमान के अनुसार, भारत में बाघों की संख्या लगभग 40,000 थी। लेकिन शिकार, जंगलों की कटाई और खेती के विस्तार ने इस संख्या को बुरी तरह घटा दिया। गिरावट इतनी तेज़ थी कि 1972 में हुए देश के पहले बाघ सर्वेक्षण में मोटे तौर पर यह अनुमान लगाया गया कि भारत में बाघों की संख्या घटकर महज़ 1,827 रह गई थी।[2]

बाघ की यह दुर्दशा अकेले भारत की चिंता नहीं रह गई थी। 1969 में अंतरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) ने अपनी आम सभा दिल्ली में आयोजित की। राजस्थान के वनाधिकारी कैलाश संखला ने इसी सभा में अपना पर्चा ‘द वैनिशिंग टाइगर’ प्रस्तुत किया, और सभा ने एक प्रस्ताव (GA 1969 RES 015) पारित कर बाघ के शिकार पर रोक (मोरेटोरियम) तथा प्रजाति की रक्षा के लिए तत्काल क़दमों की माँग की। इसी अपील के बाद भारतीय वन्यजीव बोर्ड ने राज्यों से पाँच साल के लिए बाघ के शिकार पर प्रतिबंध लगाने को कहा, और 1970 तक देश में बाघ के शिकार पर पूरी रोक लग गई।[1]

प्रिंस फिलिप, महारानी एलिज़ाबेथ, जयपुर के महाराजा और महारानी रणथंभौर में।
चित्र: साइमन एंड शूस्टर (Simon & Schuster)

लेकिन अंतरराष्ट्रीय समुदाय इतने भर से आश्वस्त नहीं हुआ। 1972 में वर्ल्ड वाइड फंड फ़ॉर नेचर के प्रभावशाली ट्रस्टी गाय माउंटफ़र्ट ने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गाँधी से मुलाक़ात कर उनसे इस प्रजाति को विलुप्ति से बचाने का आग्रह किया। पर्यावरण और संरक्षण के प्रति गहरी रुचि रखने वाली प्रधानमंत्री ने स्थिति का अध्ययन करने और आगे की योजना बनाने के लिए विशेषज्ञों का एक दल गठित किया। डॉ. करण सिंह की अध्यक्षता वाले इस दल ने अगस्त 1972 में अपनी रिपोर्ट सौंपी, और इसी से भारत के बाघ-संरक्षण कार्यक्रम का खाका तैयार हुआ — वही कार्यक्रम जो आगे चलकर ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ कहलाया। इसी दौर में वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 भी पारित हुआ। जाने-माने संरक्षणवादी एच. एस. पंवर ने इन वर्षों को देश में संरक्षण के प्रति नज़रिये में आए एक ‘आमूल बदलाव’ के रूप में याद किया है।[1][2]

इन्हीं प्रयासों की परिणति 1 अप्रैल 1973 को हुई, जब इंदिरा गाँधी ने ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की औपचारिक शुरुआत की। शुरुआत में यह कार्यक्रम छह वर्षों के लिए — अप्रैल 1973 से मार्च 1979 तक — सोचा गया था। इसका घोषित उद्देश्य था: भारत में बाघों की एक व्यवहार्य आबादी बनाए रखना, और इन क्षेत्रों को राष्ट्रीय धरोहर के रूप में सदा के लिए सुरक्षित रखना, ताकि आने वाली पीढ़ियाँ इनसे लाभ, शिक्षा और आनंद पा सकें। टास्क फ़ोर्स ने अलग-अलग पारिस्थितिकी-तंत्रों का प्रतिनिधित्व करने वाले चुनिंदा अभयारण्यों से शुरुआत करने का सुझाव दिया था, और लॉन्च के समय देश के नौ जंगलों को इसमें शामिल किया गया। रणथम्भौर इन्हीं नौ अभयारण्यों में से एक था।[2]

इसी के साथ वह प्रक्रिया शुरू हुई जो आज भी जारी है — जंगल को बाघों के अनुकूल और अधिक सुरक्षित बनाने की प्रक्रिया, जिसका सबसे दुष्कर और महत्त्वपूर्ण कार्य है: जंगल के अंदर बसे गाँवों का विस्थापन।

पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी एक बाघ शावक को गोद में लिए हुए। बाईं ओर मूल ऐतिहासिक छायाचित्र, दाईं ओर Artificial Intelligence (AI) की सहायता से उन्नत एवं रंगीन किया गया संस्करण। स्रोत: इंटरनेट पर उपलब्ध सार्वजनिक अभिलेखीय छवि।

विस्थापन का ढाँचा

टाइगर रिज़र्व से गाँवों का विस्थापन एक ऐसी प्रक्रिया है जो दशकों में बनी कई नीतियों और क़ानूनों से नियंत्रित होती है। इन्हें समझे बिना यह विषय अधूरा रहेगा।

वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 और प्रोजेक्ट टाइगर

1972 के वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम ने बाघ के शिकार पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाया और राष्ट्रीय उद्यानों व अभयारण्यों को क़ानूनी दर्जा दिया। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत के साथ यह वैज्ञानिक सोच और स्पष्ट हो गई कि बाघ को प्रजनन और अस्तित्व के लिए विशाल और अबाधित आवास चाहिए, जिस पर उसका अपना एकाधिकार हो। इसलिए तय हुआ कि उसके ‘कोर एरिया’ को मानव गतिविधियों से पूरी तरह मुक्त — यानी ‘अक्षुण्ण’ (inviolate) — रखना होगा। तर्क यह था कि मवेशियों की चराई, जलावन-लकड़ी की कटाई और खेती जंगल को खंडित करती है और हिरन जैसे प्राकृतिक शिकार-आधार को घटाती है।

लेकिन एक अहम बात यह है कि 1972 के अधिनियम में विस्थापन के लिए कोई अलग, अधिकार-आधारित नीति नहीं थी। 1973 में प्रोजेक्ट टाइगर की आकस्मिक शुरुआत के बाद गाँवों को मुख्यतः इसी अधिनियम की सामान्य शक्तियों और कार्यकारी आदेशों के सहारे हटाया गया। जब किसी इलाक़े को राष्ट्रीय उद्यान घोषित करने की मंशा अधिसूचित होती, तो ज़िला कलेक्टर पर ‘अधिकारों के निपटान’ (Settlement of Rights) की ज़िम्मेदारी आ जाती — यानी उस सीमा के भीतर मौजूद मानव अधिकारों का अधिग्रहण, समाप्ति या स्थानांतरण। चूँकि ये इलाक़े नए टाइगर रिज़र्व के कोर के रूप में सख़्त राष्ट्रीय उद्यानों में बदले जा रहे थे, व्यवहार में यह ‘निपटान’ गाँवों को खाली कराने का रूप ले लेता था।[16]

उस दौर की सोच को ‘फ़ोर्ट्रेस कंज़र्वेशन’ (क़िलेबंद संरक्षण) कहा जाता है — यह मान्यता कि प्रकृति की सबसे अच्छी रक्षा उसे इंसानों से पूरी तरह अलग रखकर ही होती है। चूँकि उस समय न तो निर्वाचित ग्राम सभाएँ थीं और न ही वन अधिकार अधिनियम जैसा कोई क़ानून, इसलिए विस्थापन वन विभाग के ऊपर से थोपे गए आदेशों के ज़रिए होता था। उदाहरण के लिए, रणथम्भौर में 1973 से 1979 के बीच 12 गाँवों के 800 परिवारों को बाहर बसाया गया, ताकि अवैध शिकार पर रोक लगे और उजड़ा आवास फिर से पनप सके।

इन शुरुआती विस्थापनों में आज जैसे तय मुआवज़े, क़ानूनी सुरक्षा-कवच या पुनर्वास के दिशा-निर्देश मौजूद नहीं थे, इसलिए ये अक्सर वनवासी समुदायों के लिए बेहद कष्टकारी साबित हुए। इन्हीं कठोर और ग़ैर-मानकीकृत विस्थापनों के अनुभव ने आगे चलकर 2006 में अधिनियम के संशोधन की ज़मीन तैयार की।

2006 के संशोधन में ‘क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट’ (CTH) की अवधारणा लाई गई — यानी ऐसे कोर क्षेत्र जिन्हें बाघ के लिए अक्षुण्ण रखना ज़रूरी है। साथ ही यह स्पष्ट किया गया कि CTH से कोई भी विस्थापन स्वैच्छिक हो, उचित मुआवज़े सहित हो और स्थानीय समुदायों की सहमति से ही हो। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) इस पूरी प्रक्रिया की देखरेख करता है।

वन अधिकार अधिनियम, 2006

2006 में वन अधिकार अधिनियम (FRA) के आने के बाद विस्थापन की प्रक्रिया और जटिल हो गई। इस क़ानून ने अनुसूचित जनजातियों और अन्य पारंपरिक वनवासियों को अपनी ज़मीन पर क़ानूनी अधिकार दिए। FRA के तहत यह तय हुआ कि जब तक सामुदायिक और व्यक्तिगत वन अधिकारों की मान्यता नहीं हो जाती, तब तक विस्थापन ग़ैर-क़ानूनी है। हालाँकि ज़मीन पर यह नियम अक्सर टूटता भी रहा — कई जगह FRA की प्रक्रिया पूरी किए बिना ही परिवारों को विस्थापित कर दिया गया। वर्ष 2025 में केंद्रीय जनजातीय मंत्रालय ने एक नया नीति-ढाँचा जारी किया, जिसमें कहा गया कि विस्थापन ‘अपवादस्वरूप, स्वैच्छिक और प्रमाण-आधारित’ होना चाहिए।

NTCA के 2008 के दिशा-निर्देश

फ़रवरी 2008 में NTCA ने स्वैच्छिक ग्राम पुनर्स्थापन के विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए। इनमें परिवारों को दो विकल्प दिए गए।

पहला — नक़दी पैकेज: प्रति परिवार 10 लाख रुपये (जो बाद में बढ़ाकर 15 लाख कर दिए गए), जिसके तहत परिवार ख़ुद ज़मीन और मकान की व्यवस्था करता है।

दूसरा — ज़मीन पैकेज: मूल ज़मीन के बराबर नई ज़मीन, मकान के लिए 1.5 लाख रुपये और सामुदायिक सुविधाएँ।

सबसे अहम बात यह थी कि यह पूरी प्रक्रिया ‘स्वैच्छिक’ थी — परिवार और ग्राम सभा की सहमति के बिना कोई विस्थापन नहीं।

राजस्थान सरकार की नीतियाँ: 2002, 2022, 2025

जैसा ऊपर ज़िक्र हुआ, रणथम्भौर में विस्थापन 1970 के दशक में ही शुरू हो चुका था; लेकिन राजस्थान में इसकी पहली औपचारिक नीति 2 नवंबर 2002 को जारी हुई। इसी के तहत रणथम्भौर के पादरा गाँव के 111 परिवारों को खण्डार के पास गणेशनगर गाँव में बसाया गया — यह 2002 की नीति के बाद की पहली बड़ी विस्थापन कार्रवाई थी।

हालाँकि गणेशनगर गाँव को बसाने को वन भूमि की बड़ी हानि के रूप में भी देखा जाता है, क्योंकि यह स्थान बाघों के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण माना जाता है। कहा जाता है कि लोगों को जंगल के एक किनारे से निकालकर दूसरे किनारे पर ही बसा दिया गया — जबकि उस दौर में सरकारों के पास मुआवज़ा देने के लिए पर्याप्त धनराशि उपलब्ध थी।

7 सितंबर 2022 को इस पैकेज में बड़ा संशोधन हुआ, और फिर 24 जुलाई 2025 को एक नया आदेश जारी किया गया। नए आदेश में ज़मीन पैकेज के अंतर्गत मूल ज़मीन के साथ 1 हेक्टेयर अतिरिक्त भूमि (जिसमें कम से कम 0.8 हेक्टेयर सिंचित या 1.6 हेक्टेयर असिंचित), भूमिहीनों को भी न्यूनतम ज़मीन, और रहने के लिए कम से कम 5,400 वर्ग फ़ुट का आवासीय प्लॉट देने का प्रावधान किया गया। नक़दी पैकेज में NTCA के नियमानुसार प्रति परिवार 15 लाख रुपये की व्यवस्था रखी गई। दोनों में से कोई एक विकल्प परिवार चुन सकता है। यह राशि CAMPA और वन्यजीव फंड से दी जाती है, जिससे राज्य सरकार पर अलग से वित्तीय बोझ नहीं पड़ता।

रणथंभौर के कोर क्षेत्र में स्थित अनंतपुरा गाँव, पुनर्वास से पूर्व (1976) कॉपीराइट: Tiger Watch.

1976 की कहानी

क़ानून और नीतियों का यह ढाँचा जिन असली घटनाओं पर खड़ा है, उनमें सबसे पहली और सबसे चर्चित कहानी रणथम्भौर की है। राजस्थान का रणथम्भौर — जहाँ आज दुनिया भर के पर्यटक बाघ देखने आते हैं — कभी एक ऐसा जंगल था जिसमें गाँव और जंगल एक-दूसरे में गुँथे हुए थे। 1973 में जब इसे टाइगर रिज़र्व घोषित किया गया, तब 392 वर्ग किलोमीटर के इस वन क्षेत्र में कुल 16 गाँव थे। इनमें से 12 गाँव जंगल के एकदम भीतरी हिस्से में गहरे बसे हुए थे और शेष 4 बाहरी परिधि में। ये सभी गाँव 16 अलग-अलग पॉकेट्स में बिखरे हुए थे, जिससे वन्यजीवों के लिए कोई एकसूत्र, निर्बाध आश्रय-स्थल नहीं बचा था। बड़े भूखंडों पर खेती होती थी और अत्यधिक चराई से जंगल की घास तेज़ी से ख़त्म हो रही थी। वन्यजीव दिन में छिपे रहते और रात में ही निकलते।

ऐसे में तत्कालीन उप-क्षेत्र निदेशक फतेह सिंह राठौड़ को इन 12 भीतरी गाँवों के विस्थापन की ज़िम्मेदारी सौंपी गई। उन्होंने एक ऐसा रास्ता चुना जो उस ज़माने में भी असामान्य था और आज भी एक मिसाल बना हुआ है — दबाव नहीं, भरोसा। वे गाँव-गाँव जाते, लोगों के बीच बैठते और उनकी ज़रूरतें सुनते।

“जंगल और उसके सभी प्राणी ईश्वर की रचना हैं। क्या देवी दुर्गा — जो राक्षसों का नाश करती हैं — स्वयं बाघ पर सवार नहीं होतीं? इस दिव्य सृष्टि को बिगाड़ने का हक़ किसी इंसान को नहीं है। जंगल को उसके वास्तविक स्वरूप में लौटाना होगा।” — फतेह सिंह राठौड़, ग्राम चौपालों पर (Ward, Geoffrey C., and Diane Raines Ward, Tiger-Wallahs, New York: HarperCollins, 1993)

1975 में ज़िला स्तर पर ‘प्रोजेक्ट टाइगर विलेज रिलोकेशन कमेटी’ बनाई गई, जिसमें ज़िला प्रमुख, फ़ील्ड डायरेक्टर और ज़िला कलेक्टर शामिल थे। समिति की 27 दिसंबर 1975 की बैठक में तय हुआ कि विस्थापन दो चरणों में होगा — पहले 6 गाँव डुमोदा के पास कैलाशपुरी में, और फिर 6 गाँव छान-फरिया के पास गोपालपुरा में। सरकार की ओर से वन भूमि को राजस्व विभाग को हस्तांतरित करने की स्वीकृति मिलते ही काम शुरू हो गया।

12 गाँव, 200 परिवार, एक नया जीवन

सन् 1976 में यह ऐतिहासिक काम मूर्त रूप लेने लगा। पहली सफलता अणतपुरा गाँव से आई — जगन गुर्जर नाम के एक स्थानीय युवक ने पहल की, लोगों को समझाया, और गाँव राज़ी हो गया। छितर गुर्जर ने भी इसमें सहयोग दिया। एक बार शुरुआत होने के बाद बाक़ी गाँव भी एक के बाद एक हटने लगे। सुबह-सुबह ट्रकों की क़तार आती; लोग आँखों में आँसू और सपने लिए अपना सामान लादते, और एक गहरी ख़ामोशी में अपने पुराने घर, गली और गाँव को अलविदा कहते। पेड़ों से लिपटकर रोते लोग फतेह सिंह को भी भावुक कर देते थे। उन्हीं के शब्दों में —

“यह मेरा सबसे कठिन काम था। लोग पेड़ों से लिपटकर रोए। उन्हें लगता था कि उनका भविष्य बिल्कुल अँधेरे में है। सभी बुज़ुर्गों ने कहा, ‘हमने यहीं पूरी ज़िंदगी गुज़ारी है, हमें यहीं मरने दो।’ मैं भी उनके साथ रो रहा था — क्योंकि मेरे भीतर कहीं यह एहसास था कि वे उस चीज़ की क़ीमत चुका रहे हैं जिसे शायद वे कभी समझ न पाएँ।” — फतेह सिंह राठौड़ (Sanctuary Asia, Vol. XXVIII, No. 3, जून 2008; जेनिफ़र स्कारलॉट के साथ साक्षात्कार)

1976 में आरम्भ हुए पुनर्वास ने रणथंभौर के प्राकृतिक आवासों को मानव दबाव से मुक्त करने और बाघों सहित वन्यजीवों के संरक्षण के लिए आधार तैयार किया। विस्थापित होते ग्रामीण अपना सामान लेकर नए ठिकाने की ओर जाते हुए। कॉपीराइट: Tiger Watch.

एक साल के भीतर सभी 12 गाँव — अणतपुरा, बेरदा, हनुत्या, लकड़दा, फुलेड़ी, छिंदावली, चिरोली, प्रेमपुर, लाहपुर, गुड़ा, क़िला रणथम्भौर और नागदी-रेहमानपुर — खाली हो गए। ये सभी मुख्यतः गुर्जर समुदाय के गाँव थे। कुल 200 परिवार और लगभग 800 लोग अपनी पुरानी ज़मीन छोड़कर नई जगह बसे। उनके साथ लगभग 2,500 मवेशी (भैंस, गाय, बैल, ऊँट, बकरी और खच्चर) भी नए ठिकाने पर आए। सात गाँव — अणतपुरा, बेरदा, हनुत्या, लकड़दा, फुलेड़ी, छिंदावली और चिरोली — कैलाशपुरी (डुमोदा) में बसाए गए, और पाँच गाँव — प्रेमपुर, लाहपुर, गुड़ा, क़िला रणथम्भौर और नागदी-रेहमानपुर — गोपालपुरा (छान) में।

ज़मीन, मुआवज़ा और सुविधाएँ

इस विस्थापन में एक ऐसा पैकेज तैयार किया गया जो उस दौर में अभूतपूर्व था। प्रत्येक परिवार को उसकी मूल ज़मीन के बराबर नई ज़मीन दी गई, और साथ में 5 बीघा अतिरिक्त भूमि का बोनस भी — हर भूमिधारक तथा परिवार के मुखिया को। यहाँ तक कि जो परिवार पहले भूमिहीन थे, उन्हें भी 5 बीघा ज़मीन दी गई। कुल 2,681 बीघा 9 बिस्वा (लगभग 687.5 हेक्टेयर) भूमि वन विभाग से राजस्व विभाग को पुनर्वास हेतु हस्तांतरित की गई — कैलाशपुरी में 1,587 बीघा 9 बिस्वा (लगभग 407 हेक्टेयर) और गोपालपुरा में 1,094 बीघा (लगभग 280.5 हेक्टेयर)।

अचल संपत्ति के लिए नक़दी मुआवज़ा भी दिया गया; 12 गाँवों को कुल ₹4,52,829 का नक़द मुआवज़ा मिला। विस्थापन की सम्पूर्ण लागत ₹5,49,914 रही — जो आज के मूल्यों में लगभग ₹3.5 से 4 करोड़ के बराबर है। इसके अलावा जो सुविधाएँ प्रदान की गईं, वे जंगल में कभी नसीब नहीं हुई थीं: सभी चल संपत्ति को नए स्थान तक पहुँचाने के लिए वाहन, नगर नियोजक (टाउन प्लानर) द्वारा तैयार कैलाशपुरी का मास्टर प्लान, धार्मिक भावनाओं की रक्षा के लिए मंदिर का निर्माण, एक माध्यमिक स्कूल, सामुदायिक कुएँ और डीज़ल पम्प की व्यवस्था, और आस-पास के गाँवों से जोड़ने के लिए सड़कें।

जंगल का पुनर्जन्म

फतेह सिंह की मेहनत का नतीजा देखने में देर नहीं लगी। 1976 में ही उन्होंने रणथम्भौर में पहली बाघिन देखी, जिसे उन्होंने प्यार से ‘पद्मिनी’ नाम दिया। जो खेत कभी मानवीय गतिविधियों से भरे रहते थे, वहाँ घास के मैदान लहलहा उठे। सांभर और चीतल चरने लगे, और बाघ दिन में भी खुलकर विचरने लगा। 1973 में यहाँ बाघों की संख्या महज़ 17–18 थी; आज 70 से अधिक बाघ यहाँ हैं। रणथम्भौर आज दुनिया में बाघ देखने की सबसे बेहतरीन जगहों में से एक है।

डुमोदा के निकट बसाया गया पुनर्वासित गाँव कैलाशपुरी, 1976, रणथंभौर के कोर क्षेत्र से स्थानांतरित परिवारों की नई बसावट। कॉपीराइट: Tiger Watch.

राजस्थान के अन्य टाइगर रिज़र्व: वर्तमान परिदृश्य

रणथम्भौर की कहानी आधी सदी पुरानी है — और एक सफलता की कहानी भी। लेकिन विस्थापन का वही सवाल राजस्थान के बाक़ी टाइगर रिज़र्व में आज भी अनसुलझा है: कहीं अधूरा, कहीं विवादित, तो कहीं बिलकुल नई राह पर।

सरिस्का — बाघ भी गए, गाँव भी रहे

अलवर ज़िले में 1978 में घोषित सरिस्का टाइगर रिज़र्व लापरवाही का एक महँगा सबक है। 2004 में जब एक सर्वेक्षण में यहाँ से बाघों के पूरी तरह ग़ायब हो जाने की बात सामने आई, तो पूरे देश में हलचल मच गई; इसका मुख्य कारण स्थानीय शिकारी गिरोहों द्वारा किया गया अवैध शिकार और जंगल पर लगातार बना मानव दबाव माना गया। इसके बाद ही केंद्र ने ‘टाइगर टास्क फ़ोर्स’ गठित की और 28 दिसंबर 2007 को सरिस्का के ‘क्रिटिकल टाइगर हैबिटेट’ (CTH) को अधिसूचित किया गया।[6][5]

28 जून 2008 को रणथम्भौर से एक बाघ को हेलिकॉप्टर से लाकर सरिस्का में छोड़ा गया — यह देश का पहला ‘एरियल’ बाघ-स्थानांतरण था। इसके बाद और बाघ लाए गए, और आज यहाँ इनकी संख्या लगभग 48 है।[7][8]

सरिस्का के CTH में 29 गाँव हैं। 2007–08 की NTCA पुनर्स्थापन योजना के तहत भगानी गाँव के 21 परिवार सबसे पहले स्वेच्छा से हटे। मार्च 2024 तक 5 गाँव — भगानी, उमरी, रोटक्याला, पनीधाल और डाबली — पूरी तरह विस्थापित हो चुके थे (कुल 322 परिवार)। विस्थापन के लिए चिह्नित गाँवों के कुल 1,471 परिवारों में से 973 अब तक हट चुके हैं, जबकि सुकोला, क्रास्का, देवरी, कांकवाड़ी और हरिपुरा जैसे गाँवों की प्रक्रिया अभी अधूरी है।[11][8]

लेकिन कहानी का दूसरा पहलू भी है। विस्थापित परिवारों की शिकायत है कि उन्हें पर्याप्त ज़मीन और रोज़गार नहीं मिला। डाबकन जैसे गाँव, जिन्हें 2017–18 में विस्थापन के लिए चुना गया था, आज भी अधर में लटके हैं — वन विभाग ने वहाँ बिजली, पानी और पक्के मकान जैसी बुनियादी सुविधाएँ रोक दीं, और लोग वर्षों से अनिश्चितता में जी रहे हैं। आदिवासी परिवारों ने FRA के तहत सामुदायिक वन अधिकारों की मान्यता के बिना विस्थापन का विरोध किया और अदालत का दरवाज़ा खटखटाया।

अब दबाव दोनों ओर से बढ़ रहा है। सरिस्का के 48 बाघों में 13 शावक ऐसे हैं जिन्हें आने वाले महीनों में अपना अलग इलाक़ा चाहिए; जगह न मिली तो उनके आबादी की ओर बढ़ने का ख़तरा है। सुप्रीम कोर्ट ने मार्च 2026 तक शेष विस्थापन पूरा करने का आदेश दिया है, फिर भी बचे हुए गाँवों के लिए न ज़मीन तय हुई है और न मुआवज़ा। यही सरिस्का और रणथम्भौर के प्रबंधन का फ़र्क़ है — एक जगह प्रक्रिया ने भरोसा जीता, दूसरी जगह भरोसा टूटा।

मुकुंदरा हिल्स — गिरधरपुरा की दोहरी त्रासदी

कोटा और झालावाड़ के बीच फैला मुकुंदरा हिल्स 2013 में अधिसूचित राजस्थान का तीसरा टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH लगभग 417 वर्ग किलोमीटर है। इसके CTH में 14 गाँव हैं। मार्च 2024 तक यहाँ केवल 2 गाँव — लक्ष्मीपुरा (30 में से 29 परिवार) और खरली बावरी (24 में से 17 परिवार) — विस्थापित हो सके हैं। बड़े गाँवों की प्रक्रिया अभी आधी-अधूरी है: मशालपुरा के 301 परिवारों में से 156, और घाटी जागीर के 58 में से 21 परिवार ही अब तक हटे हैं, जबकि दामोदरपुरा के 153 परिवारों का विस्थापन शुरू ही नहीं हुआ। मशालपुरा में तो चार परिवार आज भी जाने को तैयार नहीं हैं।[11][9]

रफ़्तार इतनी धीमी रही कि आवंटित पैसा भी पूरा ख़र्च नहीं हो पाया — मुकुंदरा के पुनर्स्थापन के लिए जारी ₹39.16 लाख की राशि अनखर्च रह गई और 2020 में उसे फिर से मान्य (revalidate) कराना पड़ा। नतीजा यह कि यह रिज़र्व का एक हिस्सा आज भी बाघों से लगभग ख़ाली है — यहाँ बमुश्किल एक बाघ-बाघिन की जोड़ी, उनके शावक और दो उप-वयस्क बाघिनें हैं।[10][8]

इसी पृष्ठभूमि में गिरधरपुरा का ज़िक्र ज़रूरी है, क्योंकि यह गाँव एक दोहरी त्रासदी का प्रतीक है। 1960 के दशक में गाँधी सागर बाँध के निर्माण के समय इसे पहले ही एक बार विस्थापित किया जा चुका था; और अब, दशकों बाद, उसी नई जगह को मुकुंदरा के CTH में शामिल कर लिया गया — यानी दूसरा विस्थापन। दो बार उजड़ चुके इन परिवारों के लिए यह पहचान, विश्वास और आसरे का सवाल है। वे पूछते हैं: “अगर अगली बार फिर कोई योजना आई, तो क्या तीसरी बार हटना होगा?”

रामगढ़ विषधारी — नई शुरुआत

बूँदी ज़िले में 2022 में अधिसूचित रामगढ़ विषधारी राजस्थान का चौथा टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH लगभग 482 वर्ग किलोमीटर है। इसके CTH में 8 गाँव हैं। मार्च 2024 तक यहाँ एक भी गाँव पूरी तरह विस्थापित नहीं हुआ है; केवल गुलखेड़ी गाँव की प्रक्रिया शुरू हुई है, जहाँ 208 परिवारों में से 40 अब तक हटे हैं।[13][11]

धौलपुर-करौली — सह-अस्तित्व की नई प्रयोगशाला

धौलपुर-करौली टाइगर रिज़र्व (DKTR) राजस्थान का पाँचवाँ टाइगर रिज़र्व है, जिसका CTH 599.64 वर्ग किलोमीटर है और बफ़र ज़ोन लगभग 458.24 वर्ग किलोमीटर। रिज़र्व के कोर क्षेत्र में 52 गाँव और बफ़र क्षेत्र में 108 गाँव बसे हैं, फिर भी अब तक CTH से किसी भी गाँव का विस्थापन प्रस्तावित नहीं है। जहाँ रणथम्भौर और सरिस्का विस्थापन के मॉडल रहे, वहीं DKTR को एक अलग राह — बाघ और इंसान के सह-अस्तित्व — की प्रयोगशाला के रूप में देखा जा रहा है।[12]

धौलपुर–करौली टाइगर रिजर्व का कोर क्षेत्र। यहाँ स्थित 52 छोटे-बड़े गाँवों में से अब तक एक भी गाँव का पुनर्वास प्रारम्भ नहीं हुआ है।
कॉपीराइट: Tiger Watch.

विस्थापन के बाद जंगल की वापसी

हर पूरा हुआ विस्थापन अपने पीछे दो कहानियाँ छोड़ जाता है — एक जंगल की, और दूसरी उन परिवारों की जो वहाँ से गए। पहले जंगल की बात।

किसी गाँव के खाली होने के बाद वहाँ क्या बचता है? टूटी हुई दीवारें, पुराने कुएँ, मंदिरों के खंडहर, खेतों की मेड़ें, और कभी-कभी तुलसी का एक पौधा जो आज भी उग आता है। लेकिन इन्हीं खाली जगहों में धीरे-धीरे जंगल वापस आने लगता है। रणथम्भौर में जहाँ कभी खेत थे, वहाँ अब घास के मैदान हैं। जहाँ मवेशी चरते थे, वहाँ सांभर और चीतल हैं। जहाँ इंसानी रोशनी थी, वहाँ अब बाघ बेधड़क विचरता है। सरिस्का में भी भगानी गाँव के खाली होते ही पुरानी इमारतें तोड़ दी गईं, ताकि जंगल को जगह मिल सके। पन्ना और रणथम्भौर के अध्ययन बताते हैं कि विस्थापित गाँवों की जगहों पर पहले शाकाहारी वन्यजीव और फिर शिकारी जल्दी लौट आते हैं।

रणथम्भौर के जंगल में आज भी कुछ पुरानी दीवारें खड़ी हैं। सफ़ारी पर जाने वाले पर्यटक इन्हें देखते हैं — ये खंडहर एक पुराने जीवन की याद हैं, और इनमें उन लोगों की स्मृतियाँ बसी हैं जिन्होंने यह जंगल बाघ के लिए वापस कर दिया।

नए गाँव

दूसरी कहानी परिवारों की है। नए गाँवों में जाने के बाद शुरुआती दौर में उनकी मुश्किलें बढ़ जाती हैं। जंगल में जो मुफ़्त था — लकड़ी, पत्ते, जड़ी-बूटियाँ, चारा — वह अब बाहर ख़रीदना पड़ता है। नई ज़मीन पर शुरू-शुरू में फ़सल नहीं उगती। और पड़ोसी गाँव वाले नए आए परिवारों को कभी-कभी संदेह से देखते हैं।

फिर भी समय के साथ तस्वीर बदलती है। 1976 में विस्थापित रणथम्भौर के परिवारों के बसने के बाद सेंटर फ़ॉर एनवायरनमेंट एजुकेशन (CEE), अहमदाबाद की एक टीम ने कैलाशपुरी में सर्वेक्षण किया। उनकी रिपोर्ट में दर्ज है:[18]

“लोग अपने नए गाँव में संतुष्ट दिखे; कुछ ने कहा कि यहाँ जीवन जंगल के उन गाँवों से बेहतर है जहाँ से वे आए हैं।” — Centre for Environment Education, अहमदाबाद — कैलाशपुरी सर्वेक्षण 

कैलाशपुरी और गोपालपुरा — आज की तस्वीर

आज कैलाशपुरी में 300 परिवार हैं और कुल आबादी 1,601 है। 1976 में वन विभाग द्वारा बनाया गया सामुदायिक कुआँ आज भी है — जिसे 1992–93 में वन विभाग ने और गहरा करवाकर दुरुस्त किया। स्कूल और मंदिर, दोनों वन विभाग ने बनवाए थे, जो आज भी गाँव की धड़कन हैं। गाँव का पशुधन — 452 भैंस, 170 गाय, 130 बैल, 3 ऊँट, 622 बकरियाँ और 2 खच्चर, यानी कुल 1,379 पशु — बताता है कि पशुपालन आज भी इन परिवारों की रीढ़ है।

गोपालपुरा में 70 परिवार हैं और आबादी 288। यहाँ 500 बीघा भूमि पर खेती होती है। पशुओं के पानी के लिए वन विभाग ने एक ‘खेल’ (टंका) बनवाया, जबकि मंदिर पंचायत ने बनवाया। पशुधन में 20 भैंस, 150 गाय, 100 बकरी, 40 भेड़ और 2 ऊँट हैं। गोपालपुरा के लोगों ने आस-पास की वन भूमि पर इको-डेवलपमेंट कार्य शुरू किए हैं, और दो बायो-गैस इकाइयाँ भी स्थापित की गई हैं।

रणथम्भौर के दूसरे (हाल के) दौर के विस्थापन में परिवारों को 2.5 लाख रुपये की सहायता राशि, 60×90 फ़ीट का आवासीय भूखंड और 6 बीघा 7 बिस्वा कृषि भूमि दी गई। ये नवस्थापित गाँव अभी भी बुनियादी सुविधाओं — स्वास्थ्य केंद्र, स्कूल — के लिए विकास की राह पर हैं।

रणथंभौर से पुनर्वासित गाँवों के नेचर गाइड, जो आज रणथंभौर टाइगर रिजर्व में कार्यरत हैं।
कॉपीराइट: मीठालाल गुर्जर.

नई पहचान बनाते युवा

पुनर्वास की कहानी का सबसे उम्मीद भरा अध्याय वह है जो आज लिखा जा रहा है। पुनर्वासित गाँवों के युवा अब केवल मज़दूरी तक सीमित नहीं हैं। पशुपालन में भी एक बड़ा बदलाव आया है: जहाँ पहले देसी नस्लें जंगल में चरती थीं, अब परिवार उन्नत नस्ल के पशु पालने लगे हैं। डेयरी उद्योग से जुड़ाव बढ़ा है, जो नियमित आमदनी का ज़रिया बन रहा है। युवाओं ने ट्रैक्टर-चालन, छोटे व्यापार, निर्माण और परिवहन में भी पैर जमाए हैं।

2023 में रणथम्भौर के तत्कालीन फील्ड डायरेक्टर पी. कथीरवेल के निर्देश पर रणथम्भौर से विस्थापित गाँवों के 52 युवाओं को, और इको-डेवलपमेंट कमेटी के माध्यम से 30 युवाओं को, नेचर गाइड के रूप में नियुक्त किया। जो जंगल कभी इनकी आजीविका का केंद्र था, अब वही जंगल इन्हें नई पहचान दे रहा है — लेकिन इस बार वन्यजीवों के दोस्त और रक्षक के रूप में।

ग़ैर-सरकारी संगठन टाइगर वॉच ने रणथम्भौर के बाहर बसे पुनर्वासित गाँवों — अनंदीपुरा और गिरिराजपुरा — में दो शिल्प-कौशल विकास केंद्र स्थापित किए हैं, जहाँ महिलाएँ और युवा हस्तशिल्प, बुनाई और पारंपरिक कलाओं का प्रशिक्षण ले रहे हैं। साथ ही अनंदीपुरा में एक डिजिटल शिक्षा केंद्र भी है, जो इन गाँवों के बच्चों को आधुनिक शिक्षा और मुख्यधारा से जोड़ रहा है। यह तस्वीर बताती है कि जब विस्थापन सम्मान के साथ होता है — और पुनर्वास के बाद सतत सहयोग भी मिले — तो यह केवल एक जगह से दूसरी जगह जाना नहीं, बल्कि एक नई संभावना का द्वार भी हो सकता है।

आनंदीपुरा गाँव में टाइगर वॉच के ‘वन्य सखी’ कार्यक्रम की प्रतिभागी महिलाएँ।
कॉपीराइट: Tiger Watch.

एक बड़ा सवाल

जंगल में रहने वाले लोगों के लिए यह सिर्फ़ एक जगह नहीं है — यह उनकी दुनिया है। उनके देवता वहाँ के पेड़ों में हैं, उनके पुरखों की राख उस मिट्टी में मिली है, और उनकी भाषा में उन पेड़-पौधों के नाम हैं जो किसी शब्दकोश में नहीं मिलेंगे। कई परिवारों का कहना है कि ‘स्वैच्छिक विस्थापन’ का नाम तो ज़रूर है, लेकिन ज़मीन पर दबाव बहुत होता है। जंगल के अंदर नई सड़क और इमारत बनाने की इजाज़त नहीं, खेतों में नलकूप नहीं, बच्चों के लिए स्कूल और अस्पताल नहीं — यही धीमा दबाव उन्हें हटने पर मजबूर करता है।

केंद्र सरकार के 2024 के आँकड़ों के अनुसार, 1973 से अब तक देश भर में 257 गाँवों के 25,007 परिवारों को विस्थापित किया जा चुका है। लेकिन अभी भी 64,801 परिवार टाइगर रिज़र्व के कोर एरिया में रह रहे हैं, और इन सबके विस्थापन एक लंबा तथा बेहद ख़र्चीला काम है।[14]

वन्यजीव विशेषज्ञों का तर्क है कि बाघ को जीवित रहने के लिए बड़ा, निर्बाध क्षेत्र चाहिए। एक बाघ का ‘होम रेंज’ 100 से 400 वर्ग किलोमीटर तक हो सकता है। जब इस इलाक़े में गाँव, खेत और मवेशी होते हैं, तो बाघ का व्यवहार बदल जाता है — वह रात का शिकारी बन जाता है और प्रजनन कम कर देता है। रणथम्भौर का उदाहरण देखें: 1976 में जब 12 गाँव हटे, तब यहाँ बमुश्किल 17–18 बाघ थे; आज 70 से अधिक हैं। फिर भी, भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) के एक हालिया अध्ययन में कहा गया है कि सभी गाँवों को हटाना ‘न व्यावहारिक है और न वास्तविक’ — इसके बजाय उन गाँवों को प्राथमिकता मिलनी चाहिए जो बाघ के मुख्य ‘कॉरिडोर’ में हैं।[14]

क्या विस्थापन ही एकमात्र विकल्प है?

CTH (कोर एरिया) से विस्थापन वैज्ञानिक और क़ानूनी, दोनों दृष्टि से ज़रूरी है। लेकिन बफ़र ज़ोन की बात अलग है। वहाँ सह-अस्तित्व — बाघ और इंसान का साथ-साथ जीना — संभव भी है और व्यावहारिक भी। नेपाल, केन्या और ज़ांबिया जैसे देशों में ‘कम्यूनिटी-बेस्ड कंज़र्वेशन’ सफलतापूर्वक चल रहा है, और भारत में भी बफ़र ज़ोन में ऐसे प्रयोग हुए हैं। रणथम्भौर के बफ़र में नेचर गाइड, EDC कार्यक्रम और टाइगर वॉच के कौशल केंद्र — ये सब इसी सोच की देन हैं: स्थानीय लोग संरक्षण के दुश्मन नहीं, बल्कि उसके सबसे बड़े भागीदार बन सकते हैं।

असली बात यह है: जब विस्थापन सही तरीक़े से होता है — सही मुआवज़ा, सही सुविधाएँ और लोगों की सच्ची इच्छा से — तो जंगल भी बचता है और लोग भी ख़ुश रहते हैं। और जब यह ज़बरदस्ती होता है या वादे टूट जाते हैं, तो लोग नाराज़ होते हैं, बाघों पर दोष मढ़ा जाता है और संरक्षण की भावना ही ख़त्म हो जाती है। इसलिए दोनों विकल्प — CTH से विस्थापन और बफ़र में सह-अस्तित्व — एक-दूसरे के पूरक हैं, विरोधी नहीं।

गाँवों के पुनर्वास और आवास संरक्षण के परिणामस्वरूप बढ़ी बाघों की संख्या ने रणथंभौर को राजस्थान के अन्य टाइगर रिजर्वों के लिए बाघ स्थानांतरण का स्रोत क्षेत्र बना दिया है। कॉपीराइट: डॉ. धर्मेन्द्र खंडाल.

राजस्थान में विस्थापन की स्थिति (मार्च 2024)

(नीचे दी गई जानकारी राजस्थान वन विभाग के अभिलेखों पर आधारित है।)

राजस्थान के टाइगर रिज़र्व — क्षेत्रफल (वर्ग किलोमीटर)

टाइगर रिज़र्वCTHबफ़रकुल
रणथम्भौर1,113.36297.921,411.28
सरिस्का881.11332.231,213.34
मुकुंदरा हिल्स417.17342.82759.99
रामगढ़ विषधारी481.911,019.981,501.89
धौलपुर-करौली599.64458.241,057.88
कुल3,493.192,451.195,944.38

स्वैच्छिक ग्राम विस्थापन की प्रगति

टाइगर रिज़र्वCTH में गाँवपूर्णतः विस्थापितप्रक्रिया में
रणथम्भौर6589
सरिस्का2956
मुकुंदरा हिल्स1422
रामगढ़ विषधारी801
धौलपुर-करौली52*
कुल1681518

* राजस्थान के अन्य चार रिज़र्व के आँकड़े ‘विस्थापन हेतु चिह्नित’ गाँवों के हैं (कुल 116)। धौलपुर-करौली के 52 गाँव कोर/CTH में मौजूद हैं (बफ़र में 108), पर अभी इनमें से किसी का विस्थापन प्रस्तावित नहीं है।

रणथम्भौर — परिवारवार विवरण (मार्च 2024)

गाँवकुल परिवारविस्थापित
इन्दाला3333
पादरा111111
मछनकी5959
मोरडुंगरी157154
भीड़164139
गाड़ीतालाड़ा4949
काथुली151141
काला खोहेरा4646
कलीभट4743
हिंदवार575373
मुंदरहेड़ी16172
बेराई भीमपुरा10291
डांगरा8349
उँची ग्वाड़ी143116
चोड़क्या कलाँ11573
चोड़क्या खुर्द185
मरमड़ा245220
कुल2,2591,774

बाघ भारत की धरोहर है — इसे बचाना हम सबकी ज़िम्मेदारी है। लेकिन यह ज़िम्मेदारी सिर्फ़ उन लोगों पर नहीं थोपी जा सकती जो सदियों से जंगल के साथ जी रहे हैं और जिनका इस संकट में कोई हाथ नहीं था। रणथम्भौर का उदाहरण बताता है कि जब विस्थापन सम्मान के साथ होता है, तो यह दोनों तरफ़ फ़ायदेमंद हो सकता है। 1976 में जिन 200 परिवारों ने अपनी जड़ें छोड़ीं, उनके वंशज आज नेचर गाइड हैं, शिल्पकार हैं, डेयरी किसान हैं, डिजिटल रूप से जुड़े नागरिक हैं — और रणथम्भौर में 70 से अधिक बाघ हैं।

राजस्थान में अभी भी सैकड़ों गाँव टाइगर रिज़र्व के कोर में हैं; 15 पूरी तरह विस्थापित हो चुके हैं और 18 प्रक्रिया में हैं। यह काम लंबा, महँगा और नाज़ुक है। लेकिन अगर CTH में विस्थापन और बफ़र में सह-अस्तित्व — दोनों विकल्पों को एक साथ, समझदारी से चलाया जाए — तो न सिर्फ़ बाघ बचेंगे, बल्कि जो परिवार जाएँगे, वे भी एक बेहतर जीवन की उम्मीद लेकर जाएँगे।

“जंगल बचाने के लिए पहले लोगों का दिल जीतना होता है।” — फतेह सिंह राठौड़

यही सबसे बड़ा सबक है — जो 1976 में भी सच था, और आज भी उतना ही ज़रूरी है।

संदर्भ:

[1] IUCN (2023), “A catalyst for change” — Project Tiger and IUCN Resolution GA 1969 RES 015. iucn.org/story/202311/catalyst-change

[2] “Project Tiger,” Wikipedia. en.wikipedia.org/wiki/Project_Tiger

[3] Ward, Geoffrey C., and Diane Raines Ward. Tiger-Wallahs: Encounters with the Men Who Tried to Save the Greatest of the Great Cats. New York: HarperCollins, 1993.

[4] Sanctuary Asia, Vol. XXVIII, No. 3 (जून 2008) — फतेह सिंह राठौड़ का जेनिफ़र स्कारलॉट के साथ साक्षात्कार।

[5] Shrivastava, Shubhi. “Dabkan Village with Uncertain Future: A Study of Village Relocation in Sariska Tiger Reserve.” IJCRT, Vol. 10, Issue 5 (May 2022), IJCRT2205864. ijcrt.org

[6] “Sariska Tiger Reserve,” Wikipedia. en.wikipedia.org/wiki/Sariska_Tiger_Reserve

[7] India Together (6 Aug 2008), “Relocation of tigers to Sariska proceeds, amidst caution.” indiatogether.org/relocn-environment

[8] राजस्थान पत्रिका (27 अक्टूबर 2025), “सरिस्का–मुकुन्दरा टाइगर रिज़र्व से 18 गांवों का विस्थापन अटका.” patrika.com

[9] NDTV राजस्थान — मुकुंदरा टाइगर रिज़र्व: मशालपुरा के चार परिवार हटने को तैयार नहीं। rajasthan.ndtv.in

[10] NTCA / Project Tiger Division, पत्र सं. 4-1(43)/2019-PT (5 अगस्त 2020) — मुकुंदरा हिल्स टाइगर रिज़र्व ग्राम पुनर्स्थापन।

[11] राजस्थान वन विभाग / NTCA — स्वैच्छिक ग्राम विस्थापन प्रगति, राजस्थान के टाइगर रिज़र्व (31 मार्च 2024 तक)।

[12] “Dholpur-Karauli: India’s 54th Tiger Reserve” (2023), Drishti IAS. drishtiias.com

[13] “Dholpur-Karauli tiger reserve approved; Rajasthan’s fifth, India’s 54th” (Aug 2023), India TV — Ramgarh Vishdhari (2022) as Rajasthan’s fourth reserve. indiatvnews.com

[14] Mongabay-India (Jan 2025), “Relocating villages in core tiger areas based on science.” india.mongabay.com

[15] The Diplomat (July 2025), “Between Tigers and Tradition: The Complex Reality of Village Relocation in India.” thediplomat.com

[16] The Indian Express, “Explained: Village relocation from tiger reserves.” indianexpress.com

[17] Drishti IAS, “NTCA’s Plan on Relocation of Villages.” drishtiias.com

[18] Centre for Environment Education (CEE), अहमदाबाद — कैलाशपुरी पुनर्वास सर्वेक्षण रिपोर्ट।

नोट: कुछ ऐतिहासिक और स्थानीय आँकड़े (1976 के पैकेज का विवरण, गाँवों के नाम, पशुधन आदि) राजस्थान वन विभाग के अभिलेखों तथा क्षेत्रीय शोध-सामग्री पर आधारित हैं।

Book Review: Col. Kesari Singh Kanota – The “Tiger”

Book Review: Col. Kesari Singh Kanota – The “Tiger”

A Majestic Chronicle of Wilderness, Valor, and Heritage

Col. Kesari Singh Kanota – The Tiger is not merely a memoir—it is a vivid tapestry of Rajasthan’s royal legacy, its wilderness past, and the life of one of India’s most fascinating soldier-naturalists, Col. Kesari Singh Kanota. This book stands as both a personal history and a cultural document that bridges the past grandeur of princely India with the evolving spirit of conservation.

Authorship and Publishing

  • Compiled by: Thakur Raghunath Singh Kanota, the author’s son and an eloquent narrator in his own right.

  • Assistance by: Harsh Vardhan, and Ravi Singh (WWF India), among others.

  • Publisher: Sushil Kumari, Narain Niwas, Jaipur

  • Design & Production: It’s A Design Studio, Jaipur

  • Published: May 2025

  • ISBN: 978-93-6045-900-0

  • Price: ₹399

Who Was Col. Kesari Singh Kanota?

Col. Kesari Singh (1892–1980), known affectionately as “Tiger Kesri,” was a scion of the Kanota royal family in Jaipur and a man of many avatars: a soldier, a poet, a wildlife expert, and an administrator par excellence. Educated at Mayo College, Ajmer, he served in senior positions in Kashmir, Gwalior, and Jaipur States—handling forests, public works, and police.

But beyond his bureaucratic distinction, he was most revered for his deep connection with nature and wildlife. A man who not only hunted in the age of shikars but later became an ardent advocate of conservation, writing six books on wildlife and ecosystems.

Highlights from the Book

Tales of the Tiger

From the slopes of Kashmir to the forests of Gwalior and the rugged terrain of Ranthambhore, Col. Kesari Singh’s encounters with tigers and other wild beasts are narrated with poetic flair, scientific precision, and heartfelt reverence. He hosted Queen Elizabeth and the Duke of Edinburgh on tiger safaris, and wrote passionately about animal behavior, including that of sloth bears, panthers, and even rare Himalayan species.

Heritage and Legacy

The book is also a story of place. From his ancestral Kanota haveli to the self-designed Kesar Garh Castle (built without an architect, inspired by wild nests), Col. Kesari’s life is as much about conserving culture as it is about conserving forests.

History through Personal Lens

The narrative threads together familial anecdotes, letters, and diaries. With deep links to General Amar Singh (his brother), Sir Pratap Singh of Marwar, and Maharaja Sawai Man Singh II of Jaipur, it offers insider perspectives on princely India’s transition into the modern republic.

Conservation Before It Was Cool

Decades before “Project Tiger” became policy in 1973, Col. Kesari Singh was warning of declining wildlife. His writings on forest restoration, habitat degradation, and biodiversity loss are eerily prophetic.

Writing Style & Content

The book is laced with elegant, often witty prose. His reflections—on the ethics of hunting, beauty of the wilderness, or structure of rifles—are seasoned with old-world charm yet brimming with ecological foresight. The chapters such as Hints on Tiger Shooting, Wildlife Laws, and Vocabulary and Animal Behavior make this part memoir, part wildlife manual.

Why It Matters – For Rajasthan, For India

This book is a must-read for anyone passionate about biodiversity, history, and cultural landscapes. For the Rajasthan Biodiversity Network audience, The Tiger is both a tribute and a toolkit—a rare document that fuses Rajput gallantry with ecological sensitivity.

Col. Kesari Singh’s life reminds us that conservation is not just a modern concept—it is rooted in our soil, our stories, and our responsibilities.

Ranthambhore: A Journey Through Historical Names

Ranthambhore: A Journey Through Historical Names

According to the Archaeological Survey of India, the history of Ranthambhore is believed to be 1,500 years old.

However, was this place always known by the same name?

My curiosity did not stop at this single question; I also wondered about the origin of the name.

When was it first referred to as Ranthambhore?

The answers to these questions are neither straightforward nor entirely precise, but through fragments of historical accounts, I have tried to piece together the story behind the name.

Historically, this place has been known by four distinct names:

Ranasthambhapur, Ranthambhore, Ranatbhanwar, and Ranantpur

These names, too, appear in various forms across different sources. Most historical accounts suggest that the name Ranthambhore originated from two words: Ran and Thambhore.

Ran refers to a battlefield, a term still used for the plateau behind the main fort, where Akbar’s army is said to have waged war and fired cannonballs at the fort.

Thambhore refers to the hill where the fort is located. The word Thambhore is thought to mean “forehead,” as the hill resembles a prominent brow in the landscape.

However, this explanation has some inconsistencies. For instance, the plateau behind the fort might have been named Ran after the battle during Akbar’s time, but significant battles before this era seem unlikely, as earlier armies lacked artillery, making an assault from this location improbable. Most historians agree that significant conflicts, such as those with the Khilji forces, likely took place near the Delhi Gate of the fort, not at the plateau. Moreover, local inhabitants have never referred to the hill as Thambhore.

The name Ranatbhanwar has been associated with the Ganesh deity enshrined within the fort. In Rajasthan, Bhanwar is a term often used for the son of a king, and Ganesh is revered as the son of Shiva.

The term Ranantpur appears in a poetic context and lacks substantial historical evidence to support its usage.

Mangalana inscription erected by Jaitra Singh of Ajmer in 1215 AD

Kwalji Shiva Temple inscription from 1288 AD

The oldest and most reliable evidence of the name comes from two ancient inscriptions. The first is the Mangalana inscription from 1215 AD, commissioned by Jaitra Singh of Ajmer for a stepwell, now housed in a museum in Ajmer. The second is an inscription from 1288 AD, found in the Kwalji Shiva temple- Indergarh (Bundi), installed by a prominent minister of that time. Both inscriptions primarily document the reign of the Chauhan rulers and mention the term Ranasthambhapur, the oldest known name for Ranthambhore.

The term Ranasthambhapura is derived from three words:

Ran (War)+ Sthambha (Pillar)+ Pur (Place)

Together, it signifies a place upheld by the pillars of war. Over time, this name evolved into Ranthambhore, which remains in use today.

Thus, Ranasthambhapur is the earliest documented name for this historically significant place. Beyond this, no further explanations are available regarding the origin of the name.

Ranthambhore: A Journey Through Historical Names

रणथम्भौर: इतिहास के नामों का सफर

भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग के अनुसार रणथम्भौर का इतिहास 1500 वर्ष पुराना माना गया है।

क्या प्रारम्भ से इस स्थान का यही नाम रहा होगा?

यह मेरी इस विषय में एक मात्र जिज्ञासा यही नहीं थी, बल्कि दूसरी यह भी थी की इस शब्द की उत्पत्ति कैसे हुई?

किस काल में सबसे पहले इसे रणथम्भौर नाम से जाना गया होगा।

उत्तर सीधा नहीं है और शायद सटीक भी नहीं हो परन्तु फिर भी इतिहास के इस पन्ने के कुछ बिखरे टुकड़े में यहाँ संजो पाया हूँ।  इस स्थान को मुख्य तौर पर 4 अलग-अलग नाम से जाना गया है:

रणस्तम्भपुर, रणथम्भौर रणतभँवर एवं रनंतपुर

इनको भी कई प्रकार से लिखा जाता है। अधिकांश पुस्तकों में वर्णन है की रणथम्भौर शब्द की व्युत्पत्ति दो शब्दों के मिलन से हुई है – रण एवं थम्भोर।  रण उस स्थल को कहते है जहाँ निरंतर युद्ध होता है, इस नाम से आज भी मुख्य किले के पीछे एक पहाड़ी मैदान है जहाँ से अकबर की सेना ने युद्ध किया था और किले पर तोप के गोले बरसाए थे। एवं दूसरा थम्भोर यानी वह पहाड़ी है जहाँ आज भी मुख्य किला अवस्थित है। थम्भोर का अर्थ है सिर के सामने का हिस्सा जो माथा कहलाता है।

कहते है यह पहाड़ी माथे के रूप में सामने है। इस व्याख्या में कई विसंगतियाँ है जैसे रण की पहाड़ी युद्ध के कारण रण नाम से जाने जाने लगी परन्तु यहाँ से अकबर के पहले किसी ने शायद ही युद्ध किया हो, क्योंकि किसी के पास तोपखाना हुआ ही नहीं करता था। तोपों के बिना इस स्थान से युद्ध असंभव है। मानते है की खिलजी आदि की फ़ौज से मुख्य युद्ध रणथम्भौर किले के दिल्ली दरवाजे से हुआ होगा एवं कोई दूसरा स्थान नहीं हो सकता। यदि देखे तो रणथम्भौर शब्द का उपयोग तो अकबर से पहले होता रहा है। दूसरा कभी भी थम्भोर नाम से इस पहाड़ी को कोई स्थानीय लोग बुलाते ही नहीं है।

रणतभँवर शब्द किले में विराजे गणेश जी के लिए उपयोग लिया गया है क्योंकि यह शिव के पुत्र है और राजा के पुत्र को राजस्थान में भंवर कहा जाता है। रनंतपुर किसी कवि द्वारा इस्तेमाल किया गया है अतः इसका कोई अधिक आधार नहीं है।

अजमेर के जैत्र सिंह द्वारा 1215 AD में बनवायी गयी मंगलाना का शिलालेख

क्वालजी शिव मंदिर का शिलालेख 1288 ई.

असल में अभी तक मिले प्रमाण के अनुसार सबसे अधिक प्राचीन सबूत दो प्राचीन शिलालेखों में मिलते है। एक है मंगलाना का शिलालेख जो 1215 AD में अजमेर के जैत्र सिंह द्वारा बनवायी गयी एक बावड़ी में लगवाया गया था, जो आज अजमेर के एक संग्रहालय में मौजूद है। दूसरा इसी तरह का एक और शिलालेख  जो 1288 AD में लगाया गया जो की क्वालजी नामक शिव मंदिर में लगा है जिसे उस समय के किसी प्रभावी मंत्री ने लगवाया था। इन दोनों शिलालेखों में मुख्य तय चौहान राजाओं की प्रस्तुति लिखी गयी  है, और साथ ही एक शब्द लिखा है जिसकी हमें तलाश है वह है रणस्तम्भपुर और यही है रणथम्भौर का प्राचीनतम नाम।

रणस्तम्भपुर तीन शब्द से बना हुआ है – रण (War) + स्तम्भ (Pillar) + पुर (Place)

यानी ऐसा स्थान जो युद्ध के स्तम्भ पर टिका हो। समय के साथ यही नाम रणथम्भौर के रूप में चर्चित हुआ। अतः यह नाम अभी तक मिले सभी नामों से प्राचीन है।  इसके आगे इसका कोई  स्पष्टीकरण नहीं है।

वन दुर्ग

वन दुर्ग

दुर्ग :-1

सुनहरी रोशनी से दमकते जालोर के एक पहाड़ का नाम है स्वर्णगिरि जिस पर बना है एक विशाल किला – जालोर फोर्टउतना ही पुराना जितना शायद रणथम्भोर (१ हजार साल)। आज कल किले मुझे अच्छे लगते है, क्योंकि इनमें रहती है कहानियां और चमगादड़ें। कहानियां सभी को अच्छी लगती है और चमगादड़ें शायद सबसे कम पसंद किये जाने वाला प्राणी है। खैर अपनी अपनी पसंद है, मुझे वहां मिले Leschenault’s rousette (Rousettus leschenaultii) का एक बड़ा समूह- लगभग 250, वह भी एक ही कमरे में। पता नहीं जालोर के आस पास कोनसा फल होता है जिसके कारण वो वहां है? आस पास जानकारी के नाम पर ASI का जाना पहचाना नीला बोर्ड लगा था, जिस पर शायद यही लिखा होगा “यह बड़ा सुरक्षित स्मारक है औकात में रहना वर्ना घर आकर मारेंगे”। कहानी मुझे नहीं मिली सो आप इस बेतरतीब बात से काम चलाए।

दुर्ग :- 2

खीदरपुर डाँगरी- गंगापुर कस्बे का एक छोटी चौकी नुमा किला है, बिना प्लास्टर के करीने से रखे पत्थरों से बना यह छोटा फोर्ट जिस प्रकार के एक पहाड़ के खुले मैदानी हिस्से में है, उसे स्थानीय लोग डांग कहते है, खुला स्थान विशाल नहीं है, अतः उसे डांगरी कर दिया गया होगा। रणथम्भौर से भटका एक बाघ पूरी मानसून सत्र इसके आस पास आनंद से रह कर जाने कहाँ कहाँ होते हुए मुरैना (मध्य प्रदेश) चला गया। आज कल यह कभी मध्यप्रदेश के मुरैना और कभी राजस्थान के धौलपुर में घूमता है -शायद इन दिनों का सबसे शानदार यायावर है। चीता वाले भी इसी बाघ से चिंतित थे कि कहीं कुनो नहीं आ जाए, बघेरे पहले ही उन्हें परेशान कर रहे है। बकरी चराने वाले युवक ने आस पास पहाड़ के कोने में कुछ रॉक पेंटिंग भी दिखा दी तो लगा कभी कोई और भी घुमक्कड़ लोग इस जगह से अपना नाता रखते होंगे। मेरे लिए एक दोपहर बाघ के चले जाने के बाद, चुपचाप इस स्थान को देखना अत्यंत आनंद दायक था। यहाँ बाघ की कहानी अभी भी सबके जुबान पर थी, पर इस बार चमगादड़ नहीं थी।

 

दुर्ग :- 3
उटगिर का किला (करौली)- यह किला कुछ वर्षों पहले तक था डकैतों का घर (कभी कभार आज भी) और शिकारियों की छुपने की जगह (कभी कभार आज भी) हुआ करता था। चारों तरफ जंगल, चम्बल नदी से मात्र 3 किलोमीटर दूर, एकल पहाड़ी पर बना यह किला, एक अत्यंत रहस्यमय स्थान पर है। किले तक जाने के लिए जिस तरह के रास्ते का इस्तेमाल करना पड़ता है, वह है चम्बल के बीहड़ और दर्रे।
किले के अंदर जाते ही आपको अहसास होगा की किला आपको देख कर चौंक जाता है, और कह उठता हो, अरे आप कैसे आये?
साँस की गति में नियंत्रण के बाद नजर आता है विशाल जंगल का खूबसूरत फैलाव और चांदी सी चमकती सर्पीली बलखाती चम्बल नदी का अद्भुत दृश्य। भालू, बघेरे और सेही के निशानों से भरे इस किले में बाघ भी कभी कभी आ जाता है। कुछ अबाबील पक्षी अपनी हलकी फुलकी आवाजों से यहाँ की चुप्पी भगाते रहते है।
इस किले को देख कर लगता है की काश वन विभाग (या कोई और विभाग) इतना सक्षम होता की जंगल के साथ साथ इतिहास के इन खास पन्नों को भी बचा पाता। राजस्थान के वनों में सैकड़ों की संख्या में किले है, कितना बचाए कोई? कैसे बचाये कोई ? क्या तरीके हो की इन छतनार बरगदों की छाँव से ढके और कठफड़ीयो की लहराती जड़ों से जकड़े अद्भुत किलों की हालत ठीक हो सके ?
मुट्ठी में प्रश्न रख कर घूमना बेकार है अतः इन्हें फेसबुक की दिवार पर उड़ेल देना ही ठीक होगा, इसलिए यह सब आपको समर्पित। यहाँ की कहानी प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की यात्रा और बाघ के शिकारियों से जुड़ी है, कभी फिर लिखूंगा, हाँ चमगादड़ यहाँ खूब मिलती है – अधिकतर चूहे जैसे दिखने वाली Lesser mouse-tailed bat (Rhinopoma hardwickii)।
शाम तक नीचे उतरना जरुरी था सो किले को बोल दिया अच्छा भाई किले राम -राम !
दुर्ग :- 4
Karauli old palace
आधे रास्ते से पहले मन करेगा वापस चलो, तंग गलीयों में लहराते बाइकर सामने आकर कट मारकर निकल जायेगा इस से पहले के रुकी साँस चले, एक बड़े सींगों का सांड आपके सामने आजाता है, आप ठिठक कर खड़े रह जाते हो। आप सोचोगे की आज यहां कोई अनर्थ अवश्य होगा, सांड का ख्याल आगे बढे, इससे पहले चप्पल में एक अम्मा, अपनी छड़ी फटकारती, बाप की गाली देती और अनायास ही आपकी हिम्मत बढ़ा देती है और निकल जाती है, असल में इसी दुःख से, वर्षों बाद में इस किले नुमा महल तक पहुंचा, परन्तु तंग गली के आगे इस महल में जिंदगी रुक सी गयीं है, यहाँ आकर ही पता लगेगा करौली के महल क्या है। यहाँ के राजा बड़े सज्जन व्यक्ति है, वन्य जीवों के जानकर और उनसे प्रेम रखने वाले। पर जीवों ने कभी उनके प्रेम की कदर नहीं की, कबूतर और रीसस बंदरों से यहां के महल के गुंबद, छतरियां, मेहराबें, कंगूरे, झरोखे, बुर्जे, खम्भे, चौखटे, टोडे, सीढियाँ, रोशनदान, खिड़कियां, दरवाजे आदि सब डरते है। लाल बलुआ पत्थर से बना यह महल दर्शाता है यहाँ के कारीगरों के पास कंप्यूटर से चलने वाले लेजर कटर पहले से ही थे।यहाँ कहानियों के अम्बार लगे है इन सब ने मुझे चमगादड़ों को भूला दिया। यह महल आपको कहेगा बेटा पूरा तो देख कर जाते।
दुर्ग :- 5
रामगढ़ किला (बारां):

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हर किला इतिहास का अहम् हिस्सा होता है और इस से जुड़ी कोई कहानी आपकी उंगली पकड़ कर, आपको वहां तक लेकर जाती है। यह बहुत कम ही होता है, जब कोई किला अचानकआपके सामने आ जाये। परन्तु रामगढ़ का किला मुझे एक बाघ ने दिखाया। एक नया नया जवान बाघ रणथम्भोर से निकला और मुँह किया कोटा की तरफ, उसे ढूंढने निकली टाइगर वॉच की टीम ने पहला पगमार्क का फोटो भेजा, जिसके साथ GPS लोकेशन भी थी। में नदी के किनारे चलते बाघ की स्थिति गूगल मैप पर देखते हुए, उसके आगामी रास्ते का अंदाज लगाने का प्रयास कर रहा था, ताकि वहां उसका पीछा करती हमारी टीम को बाघ के आगे बढ़ने के संभावित मार्ग पर कोई टिप्स मिल सके। बस इसी क्रम में खोजते- खोजते पार्वती नदी से थोड़ा छिटका हुआ- एक अनोखा गोला दिखा, पहले लगा यह कोई प्राकृतिक संरचना नहीं है
, परन्तु फिर पता लगा यह तो कोई एक क्रेटर है, जिसे रामगढ़ के नाम से जाना जाता है, अब तक लूनर सुना था बस।मेरे घर से 100 किलोमीटर दूर एक इम्पैक्ट क्रेटर है, और मुझे 10 वर्षो में कभी खबर नहीं लगी।
खैर दूसरे दिन सूरज देर से उठा और में पहले, समय से क्रेटर के पास पहुँच चूका था और यह अनुभव अद्भुत था, जिसके बीच में है 2 झील है और अंदर वाली के आस पास एक महादेव का एक 10 वीं शताब्दी का खंडित मंदिर है, बहुत ही खूबसूरत और सलाउद्दीन अहमद साहिब ने व्यक्तिगत रूचि लेकर ठीक करवाया था इसे, यह बात एक स्थानिक पुजारी ने बताई, और क्रेटर के गोलाकार पहाड़ का एक तरफ मुँह खुला है और एक भुजा पर था प्राचीन किला- रामगढ़ किला। यहाँ भी किला? शायद सबसे अनोखी जगह बना राजस्थान का एक किला होगा। फूटा टुटा है पर किसी भी और किले से अनोखी जगह पर स्थित है। आप इसे क्रेटर जा कर भी आसानी से नहीं देख सकते, थोड़ी पूछताछ तो लगती है और यही मजा है।
यह आलेख हिंदी भाषा में लिखा गया है, आपका ट्रांसलेटर ऐप आपको अलग अलग भाषा में दिखा रहा होगा।
दुर्ग :-6
Devgir (karauli)
क्या चम्बल किनारे बचा खुचा खण्डर देवगिर कोई किला था या जैन देवालय? मुझे पता नहीं। जो भी रहा हो, आज कल यहाँ के लोग इसे किला ही कहते है। अब यह इमारत धीरे धीरे से मर रही है और परन्तु ख़ुशी इस बात की है कि यह शांत मौत मर रही है, किसी ने सीमेंट के प्लास्टर या चमक दार टाइल लगा कर बचाने की कोशिश की होती तो यह शर्म से मर रही होती। कितनी ही ऐसी पुरानी इमारते है जिनका पुनरुद्धार के नाम पर क्या क्या हुआ है।
खैर दो दशको से देख रहा हूँ, लगता है इन पर उगे गुर्जन के पेड़ अब इसे जल्द ही गिरा देंगे, परन्तु देख कर लगता है उनकी खुद की सांस अटकी है, कितनों ने तो दीवारों से फिसल कर खुद जान गवां दी।
यहाँ मिले चरचरी गांव के मियांजी से जब उनके हाल-चाल पूछा तो बोले, यहाँ कोंच की फली से भरे जंगल में कौन आता है, कभी कोई मूर्ति चोर या कोई बकरियों का रखवाला, वह भी खुद के हाल से ज्यादा किले के हाल बयां कर रहे थे।
इधर उधर 10-11वीं शताब्दी के उत्कीर्ण शिलाखंड बिखरे पड़े है, जो हर साल कम होते जा रहे है। किले की और क्या बात करे अब यह चम्बल का किनारा भर रह गया है। इस किले की जड़ों में चम्बल बहती है और इसी के किनारे पर 4 -5 मादा घड़ियालों के अंडे देने का स्थान भी है। यही तो वह जगह है जहाँ घड़ियाल के अंडो को मात्र सियार ही नहीं बघेरा भी खाने आता है। यह वह जगह है, जहां मैंने देखा की एक नर घड़ियाल ने नदी में जाने कौन सी आवाजों और तरंगों का मिश्रण पैदा किया की उसके बच्चों की और बढ़ता एक बड़ा मगर वापस घूम गया।
इस किले के आस पास गोहटा का थाक (स्थानीय भाषा में उथले पानी का स्थान) है, जो चम्बल को आसानी से पार कर राजस्थान से मध्यप्रदेश आने जाने का एक सुगम स्थान है।
मैंने चम्बल को इस जगह जीप से तो पार कर लिया पर, यह नदी के किनारे को शायद बर्दाश्त नहीं हुआ और मेरी गाड़ी नदी से निकल कर किनारे के दलदल में फंस गयी। छोटी गाडी में सोने की बजाय जमीं पर नीचे ही सोना पड़ा और यहाँ एक साफ जगह में सिर के नीचे लगाने के लिए एक छोटी हांड़ी का सहारा भी मिल गया था, सुबह पता लगा वह एक शमशान घाट भी था और हांड़ी किसी कर्मकांड का हिस्सा रही होगी और हद तो तब थी जब रात में साफ दिखने वाली जगह पुरानी चित्ता की राख थी।
इसके बाद हर यात्रा में टोर्च ले जाना आवश्यक हो गया, लम्बी यात्रा में मोबाइल तो अक्सर पहले ही प्राण त्याग देते है । दलदल इतना भयानक था की सुबह एक गाय भी फंस गयी। गाय और गाड़ी कैसे निकली होगी आप कल्पना नहीं कर सकते। खैर उस दिन राख में लिपटे शैव भेष में घड़ियालों के साथ चम्बल स्नान के अलावा कोई उपाय न था। डुबकी के साथ अनायास ही हर हर गंगे ही निकल रहा था और चम्बल का साथी किनारा बेवजह शायद और नाराज हो रहा होगा, उसे क्या पता चम्बल कहाँ जाएगी। किला तो कुछ खास बचा नहीं, पर यहां का किनारा बड़ा सुन्दर है, पर मेरे से थोड़ा नाराज है, शायद आप जा कर कभी मना लो।
दुर्ग :- 7
शेखावाटी की हवेलियां :
लगभग पचास वर्ष पूर्व एक अंग्रेज व्यक्ति- आइला कूपर (Ilay Cooper) राजस्थान के एक कस्बे- चूरू में आया, जिसके पिता ने ब्रिटिश फ़ौज के लिए भारत में काम किया था, वह उन दिनों चूरू के भित्ति चित्र वाली इमारतें देख कर आश्चर्यचकित था। दस वर्ष पश्चात 1985 में उसने चूरू कस्बे के एक सरकारी अध्यापक के साथ मिलकर दो वर्ष तक INTACH के लिए 2260 हवेलियां, छतरियां, कुँए, धर्मशाला आदि के स्थापत्य कला और भित्ति चित्र का एक गहन सर्वे किया। पहली बार इन इमारतों में बनी कई वर्ग किलोमीटर (वर्ग फुट में नहीं) भीति चित्रों (फ्रेस्को) का एक अनोखा विश्लेषण किया गया। यह अध्यापक श्री रविंद्र शर्मा (Ravindra Sharma) मेरे परिवार के संजीदा लोगों मे से एक है। उनका यह विशाल सर्वे INTACH के संग्रहालय में बंद पड़ा है, परन्तु इन सब प्रयासों ने शेखावाटी को पर्यटन के नक़्शे पर लाने में मदद की।
राजस्थान ही नहीं बल्कि भारत का सबसे अलग किस्म का हिस्सा है “शेखावाटी” जहां राजा से प्रभावी और समृद्ध वहां की प्रजा थी। यहाँ राजा के महल जर्जर और इन व्यापारियों की हवेलियां अधिक भव्य हुआ करती थी। यहाँ की प्रजा का रसूख अधिक और राजा साधारण थे। यह उस काल में राज तंत्र ने कैसे होने दिया होगा ? यह क्षेत्र है, उन साहसी व्यापारियों का क्षेत्र रहा जिन्होंने सम्पूर्ण भारत (विश्व कहो तो अतिशयोक्ति नहीं) में अपना व्यापार फैलाया। इस जगह से सम्बन्ध रखने वाले व्यापारी लोग थे -बिरला, सिंघानिया, बजाज, रुइया, लोहिया, गोयनका, पीरामल, और न जाने कौन कौन से बिज़नेस टाइकून।
राजस्थान के तीन जिलों में शेखावाटीऔर लगभग उसी तरह का क्षेत्र फैला है- सीकर, झुंझुनू एवं चूरू, जो मुख्यतया जयपुर एवं बीकानेर प्रिंसली स्टेट का हिस्सा हुआ करता था।
शेखावाटी में प्रमुखता से छोटी, बड़ी और बहुत बड़ी आकार की सैंकड़ों सूंदर सूंदर हवेलियां और अन्य इमारतें है। हवेली एक तरह का घर है जिस के बीच में कोर्टयार्ड होता है और चारो तरफ कमरे ही कमरे। इन हवेलियों पर सुंदर चित्रकारी है और उनके विषय है -राम, कृष्ण और सामान्य जन जीवन। यह इतनी अधिक मात्रा में है की आप इन्हें देख कर विस्मित रह जाते हो। इन के मालिकों के पास इतने पैसे कहाँ से आये की उन्होंने महलों के अंदर की जाने वाली चित्रकारी हवेली के बाहरी हिस्से में भी करवा दी थी। यदि आपने राजस्थान के महलों में चित्रकारी देखी है तो आप जानकर चौंक जायेंगे की राजस्थान के इस छोटे हिस्से में ही पुरे राजस्थान की 95 % भित्ति चित्रकारी मिलती है।
इस क्षेत्र के व्यापारियों ने अंग्रेज व्यापारियों में एक विश्वास पैदा किया की वह उनके लिए इस अनजाने देश में सबसे महत्वपूर्ण व्यापार सहयोगी बन कर उभरे, भारत के कच्चे माल को ढूंढना और बिना गफलत किये समय पर उपलब्ध करवाना, पैसे के लेन देन को दुरुस्त रखना, आदि उनका मुख्य काम हुआ करता था। इसमें इस सहयोग को देश भक्ति और गद्दारी के तराजू पर नहीं तौले, यह शुद्ध व्यापारिक समझौतों पर आधारित सम्बन्ध थे। यदि इस व्यापारी वर्ग को गहनता से देखे तो उनके व्यक्तिगत जीवन में धर्मपरायणता, समाज सेवा और सहज जीवन जीने की कला अपना एक खास महत्व रखती थी।
अंग्रेजों ने भी इन लोगों को महत्व दिया, उनकी सुरक्षा को पुख्ता किया और इस क्षेत्र में शांति स्थापित करने के लिए 1835 में अंग्रेजों ने एक शेखावाटी ब्रिगेड बनाई जिसका नेतृत्व एक ब्रिटिश ऑफिसर -मेजर फोरेस्टर ने किया और उसने बलपूर्वक स्थानीय छोटे राजाओं को लगभग शक्तिहीन कर दिया, जो शासन की बजाय लूट खसोट में लग चुके थे। उनके किले ध्वस्त कर दिए और सभी व्यापारियों को इतनी ताकत दी के वे अपने वैभव का बिना भय के प्रदर्शन करने लगे। और यही वह एक कारण था, कि कहते है अधिकांश हवेलियां और अन्य भव्य इमारत 1835 के बाद ही निर्मित हुई।
मेरे अध्यापक भाई आज समाप्त होती इस विरासत पर चिंता जाहिर करते है और जाने कितनी कहानियां कहते है, जो उस सर्वे के दौरान उनके साथ हुई , उन सब पर चर्चा अगले सीजन में करते है।
आप Ravindra Sharma से और Ilay Cooper (https://www.ilaycooper.com) से और ज्यादा परिचित यहाँ हो सकते है।
श्री रविंद्र शर्मा के भाई श्री अरविन्द शर्मा Arvind Sharma अब यही ज्ञान तीन दशकों से अधिक समय से लोगों तक लेकर जा रहे है। यहाँ उनके संग्रह से कुछ चित्र बिना आज्ञा अधिकारपूर्वक इस्तेमाल कर रहा हूँ।
दुर्ग :- 8
बयाना किला (भरतपुर) :
खजाने की चर्चा भर भी एक बेहद रोमांच दिलाने वाला अहसास कराती है। क्या आप जानते है भारत के एक सबसे दुर्लभ खजाने की खोज के बारे में , जो राजस्थान के बयाना किले के पास एक गांव में सन् 1946 में की गयी थी ?
यहाँ लगभग 1500 वर्ष पुरानी, गुप्त काल की 2150 दुर्लभ स्वर्ण मुद्राएं मिली थी, जिसे ‘सिक्कों का अम्बार’ ”Hoard of Bayana” कहा जाता है। यह एक गांव के कुछ बच्चों को मिले और उन्होंने गांव में वितरित कर दिए, गांव वालों ने तुरंत 300 के लगभग स्वर्ण मुद्राओं को पिघला कर उनके प्रमाण नष्ट कर दिये। इसकी भनक भरतपुर के राजा को लग गयी, उस समय भरतपुर के महाराज थे श्री बृजेन्द्र सिंह, उन्होंने इस खजाने की 1821 स्वर्ण मुद्राओं को संग्रहित कर पिघलने से बचा लिया।
यह किसी दूसरे का खजाना छीनने की बात नहीं थी, यह इतिहास को बचाने की कहानी थी। उन्होंने इस खजाने को ठीक से एक नुमिस्मैटिस्ट से अध्ययन करवा कर संग्रहालय को भेंट कर दिया।कितनी कहाँ भेजी मुझे ठीक से पता नहीं, पर चाहो तो आप को यह खजाना नेशनल म्यूजियम दिल्ली और शायद भरतपुर के म्यूजियम में देखने को मिल सकता है। इसके बारे में और अधिक यहाँ पढ़े https://www.livehistoryindia.com/…/the-bayana-hoard-of… )
खैर मेरा विषय था बयाना का किला और देखो माया ने मुझे अपनी और खींच लिया। बयाना का किला एक उत्तंग और विशाल पहाड़ पर है। यह किला मेरे लिए रोचक इसलिए था, की यहाँ से खिलजी का एक भाई उलुघ खान रणथम्भौर युद्ध के लिए आया था। रणथम्भोर अभियान को बीच में छोड़ उसे मंगोलों से युद्ध करने काबुल जाना पड़ा परन्तु मेरे लिए यह बेहद रोचक था कि बयाना कैसा किला है। जहाँ मेरे सबसे पसंदीदा राजा महाराणा सांगा ने युद्ध लड़े। सांगा कम चर्चित महाराणा है परन्तु वे स्वाभिमानी होने के साथ कुशल रणनीतिज्ञ भी थे।
सो बयाना का किला कितना बड़ा है ? अब आप यह जानकर हैरान होंगे की जहाँ रणथम्भौर का विशाल किला 1 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है और चित्तौड़गढ़ का किला 3 वर्ग किलोमीटर से अधिक नहीं, वहीँ बयाना का किला 15-16 वर्ग किलोमीटर में फैला है, मुझे ठीक से पता नहीं कुम्भलगढ़ कितना बड़ा है, उसकी दीवारें 36 किलोमीटर की है जो चीन के बाद सबसे लम्बी ऐतिहासिक दीवार कहते है। बयाना किले में जहां लम्बी दीवारें बनी है और कहीं कहीं भौगोलिक अवरोधों का बेहद खूबी से इस्तेमाल किया गया है।
यहाँ की दो और बेहद रोचक बाते है, एक है एक कुतुब मीनार जैसी मीनार जिस पर फारसी में कुरान की आयतें लिखी है। इसमें अनेक चमगादड़ प्रेम से रहती है। दूसरा है यहाँ एक स्तम्भ है जो 20 फ़ीट से अधिक लम्बा एक पत्थर से बना है, जिसे भीम की लाट कहते है, उस पर देवनागरी में किसी राजा की विजय गाथा लिखी है। यह लाट 1650 वर्ष पुरानी बताई जाती है और जिसने भी इस पर जो कुछ भी लिखा है वह बेहद खूबसूरती से लिखा है। बयाना का किला आपको मुंबई दिल्ली रेल मार्ग पर भरतपुर से पहले दिखता है। अक्सर लोग इसके नीचे से निकल जाते है पर ऊंचाई पर होने के कारण इसे देखने की हिम्मत नहीं करते।
दुर्ग :- 9
शाहबाद किला (बारां)
खबर आई की टमाटर मोग्या का भाई बारां, कुनो और शिवपुरी के जंगलों से बघेरे की खाले इकट्ठी कर रहा है। उसके राजस्थान में पारिवारिक सम्बन्ध है और रणथम्भौर के आस पास भी आता रहता है। तय हुआ उसे पकड़वाना है और फलां शख्स इसमें मदद करेगा, परन्तु पकड़ना कहाँ है? जगह तय करनी है और पुलिस के आला अफसर से बात करनी है , और तभी यह काम ठीक से होगा। खैर पूरी तारीफ के साथ कहूंगा ऐसे कामों के लिए राजस्थान पुलिस तो हर दम जूते बांध के तैयार रहती है। कहा गया इस काम के लिए शाहबाद किला सबसे उपयुक्त जगह है, पुलिस पहले से छुप कर बैठ सकती है। अतः इसे देखना था। किले की रेकी एक सहज यात्रा थी सो साथ में दिव्या (पत्नी) और घर का कुत्ता भी गए थे।
किला बेहद शानदार है, एक दम मंदिरों, मकबरों और दीवारों की दुनिया; बुर्जों, चौबारों और छतरियों की दुनिया, विशाल पहाड़ों, दरख्तों और दर्रों की दुनिया।इतिहास में रूचि रखने वाले मुझे अक्सर पूछते रहते थे, कभी शाहबाद गए हो ? चलो अब यह कलंक भी दूर हुआ। शायद यह उनके लिए सबसे दूर स्थित किला हैं। यहाँ मैंने पाया की में अकेला नहीं यहां आने वाला, यहाँ की हर दीवारों पर कोयले और चुने से आधी दुनिया के तो नाम लिखे थे, कुछ के तो एड्रेस और फ़ोन नंबर भी थे।
एक बुर्ज पर रखी तोप उसी तेवर से तनी है जैसे पहले कभी हुआ करती होगी, उसे देखो तो लगता है, कह रही हो “बस एक बार मेरे पिछवाड़े में दियासलाई लगा दे, उन नामकुलों के घर पर मौत बन के बरसूँगी, जिसने मेरे इस किले की दीवारों पर अपने नाम पोते है”। भाइयों इतिहास की कालिख अब न मिटनी हमसे, इस तरह की कालिख ना पोते वही सबसे अच्छा है।
असल में मुझे इस किले की दीवारों से बाहर झाँकने में और भी अधिक आनंद आया, और इस किले के बाहर देख कर लगता है इस जंगल को हम अभ्यारण्य क्यों नहीं बना पाए, हालांकि अभी भी देर नहीं हुई, आएगा कोई इन्हें बचाने वाला भी कभी। विंध्यन पहाड़ी में बहते कुंडा खो के झरने के पास के खड़े किनारों पर आज भी कई गिद्ध अपने घर बना कर रहते है।
तब तक दिव्या ने यहाँ टमाटर काट कर सैंडविच बनाया और कुछ दिनों बाद में उस टमाटर के भाई को पुलिस ने डबल रोटी बनाया, हाँ उसके साथ एक बघेरे की खाल भी पकड़ी थी। (पुलिस के शांतनु सिंह जी कोटा वाले और अंशुमान भोमिया जी को धन्यवाद)
दुर्ग :- 10
खण्डार किला (Sawai Madhopur)
आज कल इतिहास एक चर्चा नहीं बहस का विषय है, हर चौराहे पर बॉलीवुड की कोई फिल्म की चर्चा से शुरू होता है और एक छोटे द्वन्द तक बमुश्किल रुक पता है। एक बोला मराठे अफगानिस्तान में कंधार तक अपना परचम लहरा रहे थे, यह सुनते ही राजस्थान के दौसा जिले के एक राजपूत की आँखों से अंगारे फूटे पड़े, बोले कोई लूट के लिए इधर उधर भागना परचम नहीं था। यह लोग मुगलों से बुरे थे, इन्होंने उस ज़माने में हमारे परिवार के दुधमुहे बच्चे तक नहीं छोड़े। इन लूट कर भागने वालों पर आज बॉलीवुड के लोग फिल्में बना कर हमें इतिहास पढ़ा रहे है और कह रहे है, यह हिन्दू राष्ट्र रक्षक थे ? अब लगने लगा मेरे से यह विवाद यहाँ तक नहीं रुकना। खैर बीच में ही चाय आ गई और विषयान्तर करने में मदद मिल गई।
इतिहास ने लोगों को व्यक्तिगत, समाज और देश स्तर पर अलग अलग रूप से एक साथ प्रभावित किया है, कोई व्यक्तिगत नुकसान, समाज और देश स्तर पर फायदे का हो सकता है अतः इसे अलग अलग तरह से देखा भी जा सकता है।
हालाँकि सदियों से भारत सांस्कृतिक रूप से एक था, परन्तु तब राजनीतिक दृष्टिकोण से पूरी तरह विखंडित था। उस ज़माने में गाय, गंगा, गीता, और गणेश सबके साझे थे बाकी सभी विखंडित था। मुझे लगता है चाय आज सांस्कृतिक जुड़ाव का क्विक फिक्स साधन है।
खण्डार एक अत्यंत प्राचीन किला है, परन्तु बाद में मराठा-राजपूत संघर्ष में राजपूतों की एक महत्वपूर्ण छावनी जो दक्षिण से होने वाले आक्रमण को झेलती थी। मराठो से बचने के लिए राजस्थान ने चम्बल के किनारे बने पुराने किलों को सुधरवाया गया जैसे – मंडरायल, ऊटगिर, खण्डार आदि और उनके पीछे नए किलों की क़तार बनायीं गयी। शायद बरवाड़ा, बोंली, भरतून, ककोड़ और शिवाड़ आदि उनके उदाहरण है।
सवाई माधोपुर में दो किले है एक रणथम्भौर और दूसरा खण्डार। रणथम्भौर चन्द्रमा का वह हिस्सा है जो चमकदार है और खण्डार वह जो हरदम अंधकार में रहता है। दोनों के मध्य 13-14 किलोमीटर की दूरी है। इसके बाद भी खण्डार की चर्चा लगभग नगण्य। इतना पास एक और विशाल किला क्यों है ? क्या आपस में साझेदारी थी ? एक जानकार बोले जैसे दुधारी तलवार के दोनों तरफ धार होती है और उसे खांडा कहते है वैसे ही यह किला है, एक धार रणथम्भौर तो खांडे के दूसरी तरफ खण्डार, पता नहीं यह शब्द जाल था या खण्डार नाम की व्युत्पत्ति का कारण।
किले का द्वार किसी तिलिस्मी दुनिया का लगता है। यहाँ का हवामहल किसी विलासी राजा का महल लगता है। शिवालय के देव को खजाने ढूंढने वालों ने खोदकर किनारे कर दिया, जिसे कभी कोई रानी, एक बूढ़े पुजारी के अलावा किसी को छूने नहीं देती होगी। आज तालाब में बस शैवाल जिन्दा है और बाकि सब निष्प्राण, परन्तु निस्तेज नहीं। किसी एकल योद्धा की तरह खुले में खड़ा है, यह खण्डार का किला, रणथंभौर की तरह पहाड़ियों की गोद में छिपकर नहीं बैठा। तोपे लोगों ने कुल्हाड़ी और गंडे- ताबीज बनाने के लिए चुरा ली और लोग कहते है यहाँ कुरान लिखे पत्थर थे, जो एक मियाँजी ने ही बेच दिए। कोई ऐसा कोना नहीं बचा जो धन की लालसा में खोदा नहीं गया और कोई ऐसे कोने में पड़ा पत्थर नहीं जो किसी धन से कम हो, परन्तु उसे कौन जाने।
खण्डार देखने कभी कभी कोई जाता है, परन्तु जयंती माता का मंदिर आज भी यहाँ का सबसे अधिक आस्था का बिंदु है और सेंकडो लोग उन्हें सहाय माता के रूप में सहायता मांगने आते है। पीछे के दरवाज़े पर हनुमान जी की प्रतिमा है जो बाघ के आने जाने के रास्ते में है, महीने में 2 -3 बार बाघ भी आता है और बघेरे और भालू यहाँ हर दम रहते है। सांभर हिरण के सींग बिखरे मिल जाते है। नेचर ट्रेल के साथ किला दर्शन यहाँ संभव है जिसमें सभी जानवरों के चिन्ह मिल जाते है। आप किला देखे और मुझे किसी बहस का हिस्सा न बनाले।
दुर्ग :- 11
तिमनगढ़ (मासलपुर – करौली):
राजस्थान पुलिस द्वारा अपने नए ऑफिसर्स को ट्रेनिंग के दौरान एक केस स्टडी पढ़ाई जाती है, और वह है- जयपुर निवासी मूर्ति तस्कर वामन नारायण घीया के संघटित मूर्ति चोरी गैंग के पर्दाफाश करने और उसे जेल भेजने की। पुलिस के वरिष्ठ अफसर श्री आनंद श्रीवास्तव की अगुआई में इस बड़े केस को अंजाम दिया गया था। इस तस्कर के लिए कहा जाता है की उसने- राजस्थान के अनेक जिलों से मुख्यतया- चित्तौड़गढ़ के मंदिरों, चम्बल के बीहड़ों और इनके अलावा देश के कोने कोने से 700 से अधिक दुर्लभ और प्राचीन मूर्तियों को देसी – विदेशी संग्रहकर्ताओं को ऊँचे दामों में बेच दिया था। इसके बारे में देश विदेश में खूब छपा है।
कहते है, मूर्ति चोरों का राजस्थान में सबसे अधिक प्रिय स्थान रहा है – तिमनगढ़ का किला। यह करौली के मासलपुर क्षेत्र में स्थित है जो एक खास तरह के पान की पैदावार के लिए प्रसिद्ध है। पता नहीं उस मुलायम पान की मानिंद ही करौली के लाल बलुआ पत्थर भी है की उन्हें यहाँ चाहे जैसा रूप दे दिया गया है। कहते है, 1100 ईस्वी में बने तिमनगढ़ दुर्ग का यह नाम वहां के यदुवंशी राजा तिमनपाल के नाम से दिया गया था। यहां के सब राज परिवार के लोग अपने नाम के आगे पाल लगते है, जो कृष्ण वंशज गौ पालक होने के कारण पड़ा।यहाँ के राजा हिन्दू थे, परन्तु तिमनगढ़ के टूटे फूटे अवशेषों में जैन मंदिरों के अवशेष भी बहुतायत में मिलते है।
आज इसकी हालत देखकर लगता है किसी ने एक कांच के फूलदान को कई सो फ़ीट ऊपर उठा कर पटक दिया हो। इस किले के अंदर की इमारतों का मलबा किसी भयानक भूकंप के बाद का दृश्य लगता है। शुरू में मोहमद गौरी की फ़ौज ने इसका यह हाल किया था, परन्तु इस किले को फिर बना दिया गया, और फिर किसी ने तोड़ दिया। अवशेषों से पता लगा है, इस किले में कभी ५० मंदिर थे, जिनमें १० तो विशाल श्रेणी के थे। परन्तु जो कुछ खंडित मूर्तियां और पत्थरों में उकेरे कला के आयाम बचे थे, उन्हें हमारे ही देश के घीया जैसे लोगों ने लूट कर बेच दिया। अब भी कुछ बचा था। यहाँ के गांव वाले अक्सर कहते है, विदेशी राजनयिक लोग आकर मूर्ति ले जाते थे। खैर यह बात कितनी सत्य है पता नहीं, परन्तु इस तरह के लोग अवश्य शामिल रहे होंगे। एक स्थानीय व्यक्ति बोला, पहले आस पास के कुछ लोग अपने बिस्तर, भूसे एवं मिट्टी के नीचे मूर्तियां छिपा कर रखते थे, ताकि मौका मिलने पर उसे बेच सके। आज इस किले की बाहरी दीवार भर बची है और यह वैसे ही लगता है, जैसे किसी पुस्तक का बाहरी कवर पेज बचा हो और अंदर से सारे पन्ने किसी ने फाड़ दिए हो।
आप जब इस लुटे तिमनगढ़ को देखोगे तो दिल बैठ सा जायेगा। हर पत्थर, हर ज़र्रा कराह रहा है। कभी हो सके तो अपने पाषाण मन से जाओ और इस मृतपाय किले को सांत्वना दे आओ।
यहाँ विस्तार से पढ़े घीया केस के बारे में https://www.newyorker.com/magazine/2007/05/07/the-idol-thief )।
दुर्ग :-  12
जोहड़े

जल के महत्व को समझते हुए राजस्थान में झीलों और तालाबों के अलावा जल संचय के और अनेक प्रयोग हुए है, जिनमें मुख्य थे – नाड़ी, बावड़ी, झालरा, खडीन, कुंड, केवडिया (यह आपने नहीं सुना होगा), टांके, टोबे और जोहड़े आदि। जल बहुतायत वाले दक्षिण राजस्थान में जहाँ खूबसूरत झीले अधिक है, वहीं पश्चिम में शानदार बावड़ियां, तो उतर राजस्थान में हर घर में कुंड थे, शेखावाटी और आस पास क्षेत्रों के जोहड़े दर्शनीय है। इन सभी का उपयोग धीरे धीरे सांकेतिक या नाम मात्र का बचा है, परन्तु इसका अफ़सोस सभी राजस्थान वासियों को है। कुछ लोग उन्हें पर्यटन के महत्व से विकसित करना चाहते है और इसी जोश में सरकार के प्रतिनिधि इतना अधिक धन व्यय कर देते है, की मूल स्वरूप ही नष्ट हो जाता है।
चुने पत्थर से बने चौड़े जल संचयन के वर्गाकार संरचना को जोहड़ों कहते है। इन जोहड़ों पर भी अन्य इमारतों की तरह, चूना, दही, दूध, संगमरमर की धूल से बने अराइश की एक चमकदार परावर्तक सतह लगाई जाती थी, जो न केवल आंखों को बल्कि आपके स्पर्श को एक मुलायम अहसास देती है। यह विधा शायद राजस्थान में सर्वाधिक उत्कर्ष तक विकसित हुई। यह एक तरह का कैनवास था, जिन पर राजस्थान के उत्कृष्ट चित्रकारों से मिनिएचर पेंटिंग भी बनवाई गयी।

 

जोहड़े का निर्माण अक्सर खेतों, गोचर या ओरण में होता था, जहाँ मिट्टी में जिप्सम की अधिकता हो जो जल को लम्बे समय तक जमीन में रोके रखे एवं रिसाव हो जाने से रोके रखने में सक्षम हो। बलुई टीलों के मध्य जिप्सम के इन मैदानों के मध्य में बनाए गए हल्के गहरे गड्ढे में बारिश की हर बूंद को करीने से सुरक्षित किया जाता रहा है।
चूरू स्थित सेठानी का जोहड़ा सबसे सुंदर माना गया है। कहते है छप्पन के अकाल में राहत कार्य चलने के लिए एक वणिक वर्ग की महिला ने अपने परिवार को इस जोहड़ निर्माण के लिए प्रेरित किया। चूरू के निवासी इसे अत्यंत आदर से देखते और दिखाते है। कुछ अलग अलग जोहड़ों की तस्वीरें आपके लिए यहाँ है, जरूर देखे।

 

दुर्ग :-  13
भागागढ़ (Udaipur)
कन्हैया लाल सेठिया जी राजस्थान के एक बड़े कवि थे और उन्होंने महाराणा प्रताप पर एक मार्मिक कविता लिखी थी।जो पढ़ते वक्त आपके दिल को छू जाती है और राणा प्रताप के जीवन संघर्षों का दर्शन कराती है। वह कविता यह की महाराणा जंगलों की खाक छान रहे है, और अपने पुत्र के लिए एक हरे घास रोटी की इंतजाम भी बमुश्किल ही कर पाए और वह भी एक “बन बिलावडो ले भाग्यो”। जब बचपन में इस पढ़ा तो लगा, महाराणा बड़े बेचारे, मोहताज और लाचार राजा मात्र ही रह गए थे। हल्दीघाटी के बाद उन्होंने सब कुछ खो दिया था, इस राजा ने फिर आगे के युद्ध कैसे किये होंगे। ऐसी दयनीय हालत में वह कैसे मुगलों की जयपुर राज्य के राजपूतों से समर्थित सेना से मुकाबले की सोच पाए होंगे। असल में सेठिया जी की उस सुंदर कविता को अपना एक गहन मतलब है, परन्तु उसे इतिहास भी न मान बैठे।उनकी सेना के लोग भील थे जो बन बिलाव क्या वन व्याघ्र को कुछ न समझे।
असल में महाराणा हल्दीघाटी के युद्ध के बाद भी 30 और वर्षों तक और जिन्दा रहे। और तो और मात्र दस वर्ष पश्चात उन्होंने एक भीषण युद्ध किया, जिसे आज हम दिवेर का युद्ध के रूप में जानते है, इसमें उन्होंने मुगलों को हरा कर अपने राज्य का अधिकांश हिस्सा वापस भी ले लिया था।
इस विजय के पीछे उनकी एक सतत रणनीति अवश्य रही होगी और जनता का अटूट साथ रहा होगा। असल में वे सभी समाजों को साथ लेकर चलने वाले अद्भुत रक्षक और पराक्रमी राजा थे। वह कोई जिद्दी शासक भर नहीं थे, न ही वह कोई अव्यवहारिक योद्धा थे, जो ढाई मण का भाला और अकल्पनीय भारी तलवार लेकर युद्ध में अकुशल तरह का प्रदर्शन करें। कुछ लोग उनका इस तरह से लार्जर देन लाइफ छवि घड़ने के चक्कर में उनके असली संघर्षों को कमतर कर देते है। उनका साथ प्रकृति और सामान्य जनता दोनों ने दिया था। उस ज़माने में अक्सर राजा, उसका परिवार और मात्र राजपूत जाति के लोग ही युद्ध लड़ते थे। और यह सब किले में बंद होकर प्रजा से अलग-थलग पड़ जाते थे, परन्तु महाराणा के साथ थी बहु संख्यक प्रजा और उन्होंने मेवाड़ की प्रजा के बल पर युद्ध लड़ा और दूसरा साथ दिया दक्षिण राजस्थान की प्राकृतिक विरासत ने।
कई बार कुछ युद्ध एक लड़ाई से समाप्त नहीं होता, इसके कई दौर हो सकते है, जैसे कुस्ती में कई बाउट के बाद निर्णय होता है। इसी तरह महाराणा अपने इरादों पर कायम रहे और अनिर्णीत फैसले के साथ इस धरा से विदा हुए, और विदा होने से पहले अधिकांश राज्य उन्होंने प्राप्त कर लिया था।
उनका एक किला भागागढ़, मुझे कोटड़ा के जंगलों में मिला, जो राजस्थान के सबसे अधिक घने जंगल का क्षेत्र है। यहाँ बिना चुने के पत्थरों को जमा कर रखा गया है। जिसके आस पास का क्षेत्र फुलवारी वन अभ्यारण्य का हिस्सा है। यह किला नीचे से नहीं दिखता है, यहाँ का भील समुदाय उनके के लिए मुख्य सहयोगी बना। उनका यह किला रणनीति के तौर पर इतना छुपा हुआ था, की कुछ हिस्से में तो पेड़ों ने सूरज के आने पर भी रोक लगा रखी थी, क्योंकि उनपर छद्म रूप से अनेक हमले हुए थे।इसी तरह के दो और किले यहाँ स्थित है – जुड़लीगढ़ और देवलीगढ़। यहाँ भागागाढ़ के निचे स्थित दीवार आदि की एक झलक दिखा रहा हूँ। यह राजस्थान के दैया वन खंड का हिस्सा है और गुजरात की सीमा पर स्थित है। यहाँ के एक ऊंचाई पर एक गांव माल श्रवण है, जो भालुओं से भरा है और ऊँचा और दूर है, पता नहीं कैसे लोग अपना जीवन यापन करते है।आप इस तीर्थ पर अनावश्यक रूप से पर्यटन के लिए नहीं जाए। फुलवारी अवश्य जाए यह राजस्थान की सबसे सुंदर सैंक्चुअरी है।
दुर्ग :-  14
मंडरायल किला (करौली)
मंडरायल एक पुराने कस्बे सा कस्बा है, इसके पीछे एक पहाड़ी और जिसके सिर पर एक किला है। हाँ, राजस्थान में कस्बे और शहर किलों के आस पास ही तो बनते थे, अन्य प्रदेशों की तरह इस सूखे प्रदेश में नदियां तो है नहीं। माना जाता है, इस कस्बे का यह विचित्र नाम ‘मंडरायल’ एक ऋषि माण्डव्य के नाम से पड़ा था।
पुराणों में कहानी है की माण्डव्य ऋषि एक बार किसी झूठे चोरी के आरोप में फंस गए थे और उन्हें सूली पर चढ़ाने का दंड मिला। सूली पर चढ़ा दिए गए। परन्तु सूली पूरी तरह उनको भेद नहीं पायी, फिर भी उसकी तीक्ष्ण नोक, उनके जिस भी हिस्से (इसका अंदाजा आप लगाए कहाँ ?) में गयी, वह निकल नहीं पायी, और उसे अंततः काट कर अलग कर दिया गया, और नोक वहीं चुभी रह गयी। मानते है यह इसलिए हुआ की उन्होंने बचपन में एक पक्षी को कुछ इसी तरह सताया था। वह उसी नोक के साथ विचित्र तरह से चलते रहे, और तबसे उनका नाम बदल के अणि माण्डव्य रख दिया गया था।
खैर मंडरायल नाम के पीछे एक और कहानी है की बयाना के प्रसिद्ध महाराजा विजयपाल के एक पुत्र मदनपाल या मण्डपाल ने मंडरायल को बसाया था और वहां एक किले का निर्माण संवत 1184 के लगभग कराया था।
खैर, यह किला उसी माण्डव्य ऋषि को चुभी तीक्ष्ण नोक के समान ग्वालियर को भी सतत चुभता रहा था। इतिहासकार इसे ग्वालियर के किले की चाबी कहते है। ग्वालियर मध्य प्रदेश का सबसे विशाल राज्य था और इसकी ताकत लगभग आगरा या दिल्ली के समान ही थी। इसलिए ग्वालियर को जितने के लिए मंडरायल को हासिल किये बिना यह मुश्किल था।
प्रारंभिक मुगल काल के दौरान, जयपुर राज्य के आंतरिक झगड़ों से परेशान होकर वहां के राजा पूरणमल ने मुगलों का सहारा लिया। हुमायूँ के कहने पर पूरणमल ने बयाना के युद्ध में उन्हें सहयोग दिया। इसके बाद जब वह मंडरायल की और मुड़े तो यह जगह उन पर भारी पड़ गयी और वह इस युद्ध में खेत हुए, यह जयपुर के लिए भी शूल के समान ही रहा।
मंडरायल करौली जिले में स्थित है, परन्तु करौली को मंडरायल के राजा ने ही बसाया था और पहले उसका नाम कल्याणपुरी था।
खैर मंडरायल वन और चम्बल नदी से घिरा क्षेत्र है, यह रणथम्भौर वन विभाग के कैला देवी हिस्से में ही आता है, जब सरकार ने कहा की क्रिटिकल टाइगर हैबिटैट का क्षेत्र निर्धारित कीजिये, जो बाघों के लिए कैला देवी में सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा होगा तो, रणथम्भौर वन विभाग ने कैलादेवी की इस मंडरायल रेंज को पूरी तरह नकार दिया था बाकि सारे क्षेत्र को CTH बना दिया था। बाघ भी इज्जत लेने पर उतारू थे, जैसे ही रणथम्भोर में बाघ बढे वे कैला देवी की और रुखसत हुए और पूरे कैला देवी के CTH जंगल को छोड़, यहीं मंडरायल आकर बसे और पनपे, जिसे शुरुआत में वन विभाग ने बाघ के दृष्टिकोण से कम महत्व का माना था। यह हमारे बाघों के लायक स्थान चयन के ज्ञान को दर्शाता है। खैर यहाँ से बाघों के सिलसिलेवार तरीके से गायब होने ने विभाग की हालत अणि माण्डव्य जैसी बना रखी है। सुल्तान, सुंदरी नामक बाघों के यहाँ से गायब हो ने बाद भी यह सिलसिला अभी तक रुका नहीं है।
यह किला गहरे लाल बलुई पत्थरों से बना है, किले के अंदर एक और बाला किला जैसा स्थान है जो अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान करता था। बघेरे इस पूरे किले का बढ़िया इस्तेमाल करते है। हालांकि यहां इंसानी दखल बहुत है और दिन में अक्सर मंडरायल कस्बे की औरते लकड़ी चुनने और बकरिया चराने जाते रहती है। यहाँ कांटे वाली जाल झाड़ी की बहुतायत है जो सावधानी नहीं बरती तो यह किला किसी की भी हालत भी अणि माण्डव्य के समान कर सकता है।
दुर्ग :- 15
Shergarh Fort (Baran)
एक नदी है परवन, जो चम्बल की छोटी बहन है, उसका आधार कार्ड पर नाम है पार्वती, पर इसके किनारे के सभी लोग इसे प्यार से परवन ही बोलते है। परवन नदी का चम्बल के जीवन में बड़ा योगदान है। एक ज़माने तक उसकी बड़ी बहन चम्बल, एक दस्यु की तरह हुआ करती थी, जो निर्बाध जंगलों में बहती थी, परन्तु अब कोटा से पहले पहले ही इंसानो ने इसे चार बड़े बांधों में कैद कर लिया है। इन बांधो ने लगभग इसका प्रवाह पूरी तरह ही खत्म कर दिया है। परवन नदी अवश्य चम्बल के इस हालात से दुखी है, और उसे अपना पूरा पानी दे देती है, पानी पहले भी देती थी, तब इसका कोई मायना नहीं था, परन्तु अब यह चम्बल के पानी में आधे से अधिक इजाफा करता है, बस इसीलिए चम्बल आज जिन्दा है। सो चम्बल के लिए परवन बचानी है क्योंकि चम्बल तो हमने पहले ही कैद में डाल रखी है।
परवन के किनारे पर एक किला है, जिसका पहले नाम था कोषवर्धन जिसे शेरशाह सूरी ने काबिज कर जोरी से नाम रख दिया शेरगढ़। न जाने कितनी बार किले का मालिक बदला, किले का नाम भी बदला, परन्तु परवन का इस किले प्रति प्रेम नहीं बदला, यह आज भी इसकी पीठ पर लहरों से होले होले थापी मार इसे दिलासा देती रहती है। इस किले को वाकई दिलासा देने की ज़रूरत है, क्योंकि आज कल इसके सभी पीछे पड़े है।
किले में प्रवेश करते ही मिलता है एक दाढ़ी वाले मियां जी, जो आप को आदर से कहते है में यहाँ का किलेदार हूँ बेटा, और आप सीधे जाओ और खूब किला देखो। फिर पता लगता है आप किले में नहीं अभी तक तो खाली शेरगढ़ के दीवारों से बंद गांव में आये थे, फिर लगभग १ किलोमीटर आगे चलने के बाद किला आता है, जहाँ एक और शख्स मिलता है, जो कहता है में हूँ यहाँ का असली किलेदार ASI की तरफ से और फिर आपको एक सरकार का फरमान पकड़ा देता है जिस पर लिखा है, आप आगे कैमरा नहीं ले जा सकते। कारण वह बताते नहीं और फीस वह लेते नहीं और आसपास गांव वालों की भीड़ में सेटिंग वो कर पाते नहीं । छोडो जी, फ़ोन से काम चलाएंगे। जैसे किला तो हम कैमरे वालों ने ही बर्बाद किया है।अंदर जाते ही मिलेंगे आपको दो घनघोर गंदे सूचना पट्ट जो इस किले का इतिहास बताते है। हालाँकि कहानी अच्छे से लिखी है, किसने कब कैसे बनवाया आदि, परन्तु यह पट्ट बेहद ही अटपटे लगते है।
आजकल इसकी काली दीवारों पर किया जा रहा है, चुना प्लास्टर और पीला रंग जो इसे चमका देगा। कहते है लाल कप्तान नामक फिल्म ने भी इस किले को आस पास के लोगों के मध्य चमका दिया है, तबसे ASI को भी यह जगह महत्वपूर्ण लगने लगी है।
किले के बाहर एक खूबसूरत जंगल है उसका नाम है शेरगढ़ वन्य जीव अभ्यारण्य और यह शायद अपने अच्छे दिनों की और जा रहा है। इन दिनों वन विभाग इसके संरक्षण के लिए कुछ संजीदा हुआ है, कभी कभी उन्हें इस जंगल को भी चीता घर बनाने की हुक उठती है। जो शायद मेरे हिसाब से उचित नहीं।
यहाँ सबके लायक कुछ है, मुस्लिम मजारे, जैन, बौद्ध और हिन्दू धर्म के देवालय है, और प्रकृति प्रेमियों के लिए जंगल, नदी और पहाड़ है। एक मंदिर में तो गज़ब काले पत्थर की मूर्ति है, जो एक बार चोर उठा ले गए थे, पर पुलिस की मुस्तैदी से वापिस आगयी थी।इस मूर्ति के बारे में ज्यादा पूछने पर मंदिर का पुजारी आप पर भी शक करने लगता है। इसी जगह के आस पास मिले एक ठेकेदार जी, जो अन्य मंदिरों और इमारतों को ASI के तरीके से ठीक कर रहे है, नाम है कोई तो मीणा जी, जो वजीरपुर- सवाई माधोपुर के रहने वाले थे, वे बोले चुना, पीसी ईंट, गुड़ का घोल, और बेल फल की सुखी गिरी को मिलाकर प्लास्टर तैयार करते है। यह सर्दी में किसी मिठाई की रेसिपी अधिक लग रही थी।
परवन एक जीवित नदी है हमने एक ज़माने पहले इसका हमने एक सर्वे किया था और पाया की इसमें जगह जगह घड़ियाल मिलते है l हमने एक अमेरिका के मगरमच्छ विशेषज्ञ के साथ इस के सम्बन्ध में लम्बा शोध पत्र भी छापा था। एक नदी में ठीक ठाक मात्रा में अति संकटापन्न प्राणी का मिलना सुखद है, यह उसके जिंदा होने के प्रमाण है। इस नदी पर अब एक नया और बड़ा बांध बनेगा। इसलिए आज कल भारतीय वन्यजीव शोध संस्थान (WII) इस पर शोध कर रहा है की, एक नए बांध बनाने से क्या होगा। आप भी जानते है क्या होगा, WII वाले भी जानते है क्या होगा, बस अभी परवन को पता नहीं, उसका क्या होगा। आप भी मत बताना क्या होगा, उसे दिलासा देने वाला उधर कोई नहीं है।
किले तो बनते बिगड़ते रहते है, नदियाँ और पहाड़ हमसे नहीं बनेंगे, अतः मैंने फैसला किया है यह सीरीज यही समाप्त करूँ और नदी, पहाड़ और प्रकृति पर ही कुछ लिखूं पढू। भूल-चूक, लेन -देन माफ़ करें।
राजस्थान के अंतिम जंगली चीता की कहानी

राजस्थान के अंतिम जंगली चीता की कहानी

कई विवादों और शंकाओं के बीच भारत देश में अब चीता को पुनः स्थापित किया जाने वाला हैं। राजस्थान राज्य के कुछ क्षेत्र भी इसके लिए उपयुक्त माने गए हैं। परन्तु क्या आप जानते हैं की राजस्थान में अंतिम चीता कहाँ और कब पाया जाता था ?

इसे जानने के लिए हमें भारत के एक महान प्रकृतिवादी इतिहासकार श्री दिव्यभानु सिंह के एक लंबे शोध पत्र को सूक्ष्मता से देखना होगा जो उन्होंने एक युवा शोधार्थी रजा काज़मी के साथ बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी के जर्नल -JBNHS 2019 में प्रकाशित किया हैं।

A fresco painting in Bundi .

इस शोध पत्र में ईस्वी सं 1772 से भारत और पाकिस्तान से चीता के 199 रिकॉर्ड समाहित किये हैं।  यानी पिछले लगभग 250 वर्षो में  चीता से संबंधित अधिकांश उद्धरण इस शोध पत्र में शामिल हैं। इन माहिर शोधकर्ताओं के अन्वेषण से शायद ही कोई चीता के रिकॉर्ड अछूते रहे होंगे।

यदि राजस्थान की बात करें तो इस शोध पत्र के अनुसार चीता के मात्र 12 रिकॉर्ड (टेबल 1) ही प्राप्त हुए है।  इन रिकॉर्ड की समीक्षा करे तो देखेंगे की  इन में 6 रिकॉर्ड गैर विशिष्ट प्रकार के हैं, यानी ऐसे रिकॉर्ड जो दर्शाते हैं कि भारत के कई राज्यों में चीता की उपस्थिति दर्ज की गयी हैं, जिनमें राजस्थान भी शामिल हैं, परन्तु ऐसे रिकॉर्ड  एक  स्थान विशेष को इंगित नहीं करते हैं जहाँ चीता देखा गया । यह रिकॉर्ड मात्र साहित्यिक विवेचना के क्रम में समाहित हुए है। जैसे की उदाहरण के लिए हम एक रिकॉर्ड लेते हैं –  स्टेरनदेल, (Sterndale,1884) ने लिखा की चीता ” Central or Southern India, and in the North-West from Kandeish, through Scinde and Rajpootana to the Punjab,…… In India the places where it most common are Jeypur in Upper India, and Hyderabad in Southern India ”  में पाया जाता है। इस रिकॉर्ड से यह सत्यापित नहीं होता की स्टेरनदेल ने किस तारीख को अथवा किस स्थान पर चीता देखा हैं।

बाकी बचे 6 रिकॉर्ड इन मे से 4 रिकॉर्ड पालतू चीता के दर्शाये गए हैं, जो भरतपुर, अलवर और जयपुर से प्राप्त हुए हैं। इन पालतू चीता के सन्दर्भ में प्रामाणिक तथ्य उपलब्ध नहीं हैं कि वह कहाँ से लाये गए है। राजस्थान के दो पूर्व वन्य जीव प्रतिपलाकों श्री विष्णु दत्त शर्मा एवं श्री कैलाश सांखला (1984) के अनुसार जयपुर में उपलब्ध सारे पालतू चीता अफ्रीका या काबुल, अफगानिस्तान से आते रहे हैं एवं श्री दिव्यभानुसिंह के अनुसार यह ग्वालियर (उन्हें अफ्रीका से आते थे, ऐसा प्रमाण नहीं मिला) से आते थे। अतः इन्हें किसी भी तरह राजस्थान का नहीं माना जा सकता हैं।

खैर अब बचे मात्र 2 प्रमाण जो राजस्थान के जंगली चीता होने के करीब हैं –

एक हैं प्रसाद गांव से जो दक्षिण उदयपुर में स्थित हैं। रिकॉर्ड धारक के अनुसार एक चीता रात में कैंप के करीब कुत्ते ढूंढ़ते हुए घूम रहा था। इस प्रमाण में दो संदेह पैदा होते हैं की क्या दक्षिण राजस्थान के घने जंगल चीता के लिए मुनासिब थे ? दूसरा की क्या चीता वाकई कुत्तों का शिकार करता रहा होगा? कहीं वह एक बघेरा/ तेंदुआ तो नहीं था जिसे चीता नाम से दर्ज  कर लिया गया होगा ? क्योंकि दक्षिण राजस्थान में आज भी तेंदुआ को चितरा नाम से जाना जाता हैं।

दूसरा प्रमाण कुआं खेड़ा गांव से हैं जो कोटा जिले के रावतभाटा क्षेत्र का एक गांव हैं जो मध्यप्रदेश की सीमा पर स्थित हैं।  यह निःसंदेह एक चीता के बारे में ही हैं, जिसे दुर्भाग्य से एक बाघ ने मौत के घाट उतार दिया था।  इस रिकॉर्ड के संकलनकर्ता विलियम राइस एक अत्यंत माहिर शिकारी थे।

विलियम राइस 25 वी बॉम्बे रेजिमेंट में लेफ्टिनेंट पद पर थे और उन्होंने अपने शिकार के संस्मरण में लिखा है कि, किस प्रकार से उन्होंने पांच वर्षो के समय में 156 बड़े शिकार किये जिनमें 68 बाघ मारे एवं 30 को घायल करते हुए कुल 98 बाघों का शिकार किया, मात्र 4 बघेरे मारे एवं 3 घायल करते हुए कुल 7 बघेरे एवं 25 भालू मारे एवं 26 घायल किये और इस तरह कुल 51 भालुओं का शिकार किया। उन्हें लगता था कि, लोग उनके इस साहसिक कारनामे पर कोई विश्वास नहीं करेगा, इसलिए उन्होंने सात चश्मदीद अफसरों के नाम इस तथ्य के साथ में उल्लेखित किये हैं। यह अधिकांश वन्य प्राणी उन्होंने कोटा के वर्तमान में गांधी सागर, जवाहर सागर, राणा प्रताप सागर, बिजोलिया, मांडलगढ़, भेसरोडगढ़ आदि क्षेत्र से मारे थे।

A tamed cheetah in Alwar c. 1890

इस चीता के प्रमाण को संदेह से नहीं देखा जा सकता कि उन्हें इस प्राणी के बारे में पता नहीं था। यद्यपि, उन्हें स्वयं को भी संदेह हुआ की इस घने वन एवं पहाड़ी प्रदेश में यह प्राणी किस प्रकार आ गया जबकि यह मैदानी हिस्सों  का प्राणी हैं।

हालांकि इस अंतिम प्रमाण पर भी संदेह किया जाता हैं की यह कोई पालतू चीता था जो भटक कर पहाड़ी क्षेत्र में आ गया हो ? क्योंकि कोटा एवं बूंदी राज्य के भित्ति चित्रों में पालतू चीता रखने के प्रमाण मिलते हैं। कई बार शिकार के दौरान चीता भटक कर खो जाते थे, एवं कभी मिल जाते थे कभी नहीं मिलते थे।  शायद यह चीता भी इसी प्रकार का रहा हो।

इस तरह पूरे 250 वर्षो में यही प्रमाण जंगली चीता के सन्दर्भ में प्राप्त हुए हैं जो ईस्वी सन् 1852 में मिला था, यानी लगभग 170 वर्षों पहले हमारे राज्य में कोई चीता ऐसे जंगल में मिला था, जहाँ इस रिकॉर्ड धारक विलियम राइस के अनुसार वह नहीं हो सकता हैं।

 

S.no. yearPlace Remarks Reference
1C. 1840Bharatpur, RajasthanCoursing with CheetahOrlich, 1842
2C.1852Kooakhera (Kuvakhera), RajasthanOne dead cheetah killed by a tigerRice, 1857
3c. 1860Jaipur, RajasthanPhotograph of two cheetah with keepersFabb, 1986
428 December 1865Pursad village, RajasthanAuthor sees a cheetah prowling near the camp in search of dogsRousselet and Buckie 1882
5c. 1880Sind, Rajputana, Punjab, Central, southern, and N.W. India.Cheetah ReportedMurray, 1884
6c. 1884Central, Southern India, north-west from Khandesh through Sind and Rajputana to the Punjab, commonest in Jaipur and Hyderabad (in the Deccan)Cheetahs reportedSterndale, 1884
71889Jaipur, RajasthanCoursing with CheetahsO’shea, 1890
81892-93Alwar, RajasthanTame Cheetahs seenGardner, 1895
91892Punjab, Rajputana Central India up to BengalCheetahs reportedSanyal, 1892
10c.1907Central India, Rajputana, PunjabCheetahs reportedLydekker, 1907
11c.1920Northern India, Punjab, Rajputana, Central India, Central Provinces, almost upto BengalCheetahs reportedBurke, 1920
12c.1932Rajputana, Central India, Central Provinces, PunjabCheetahs reportedAlexander & Martin-Leake, 1932

References :-

Divyabhanusinh & R. Kazmi, ‘Asiatic Cheetah Acinonyx jubatus venaticus in India: A Chronology of Extinction and Related Report’, J. Bombay Nat. Hist. Soc 116, 2019. doi: 10.17087/jbnhs/2019/v116/141806

V. Sharma & K. Sankhala, ‘Vanishing Cats of Rajasthan’, in P. Jackson (ed.), The Plight of the Cats. Proceedings from the Cat Specialist Group meeting in Kanha National Park. IUCN Cat Specialist Group, Bougy-Villars, Switzerland, 1984, pp. 117-135.

W. Rice, Tiger-Shooting in India: Being an Account of Hunting Experiences on Foot in Rajpootana During the Hot Season, from 1850 to 1854. Smith, Elder & Co., London, 1857.

Divyabhanusinh, The End of a Trail: The Cheetah in India (2nd edn.) Oxford University Press, New Delhi, 2002.

Authors:

Dr. Dharmendra Khandal (L) has worked as a conservation biologist with Tiger Watch – a non-profit organisation based in Ranthambhore, for the last 16 years. He spearheads all anti-poaching, community-based conservation and exploration interventions for the organisation.

Mr. Ishan Dhar (R) is a researcher of political science in a think tank. He has been associated with Tiger Watch’s conservation interventions in his capacity as a member of the board of directors.

 

Cover photo caption & credit: Human-wildlife conflict is as old as mankind itself. A revealing cave painting from Bundi. (Photo: Dr. Dharmendra Khandal)