आदित्य ‘डिक्की’ सिंह

आदित्य ‘डिक्की’ सिंह

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आदित्य ‘डिक्की’ सिंह- वह नाम जो पर्याय है- एक आउटडोर मैन, एक वाइल्ड लाईफर, एक ग्रेट फोटोग्राफर, एक अत्यंत कुशाग्र बुद्धि का धनी, एक मित्र  जिसका दिल और घर दोनों सबके लिए खुले रहे, टाइगर को अपना भगवान मानने वाला,  सभी जीवों के प्रति दया रखने वाला,  हंसमुख, और एक उत्कृष्ट इंसान जो जाती धर्म के बोझ से आज़ाद था।

आदित्य को यह सब उसके अनोखे परिवार से मिली तालीम और लम्बी विरासत का नतीजा है।  उनका जन्म दिनांक 24 मई 1966 इलाहाबाद में हुआ। आदित्य के पिता नरेश बहादुर सिंह भदौरिया एवं माता अरुणा सिंह आज हमारे बीच आशीर्वाद देने के लिए विद्यमान है । यह परिवार मूलतः मध्यप्रदेश के भिंड क्षेत्र से सम्बन्ध रखते थे,  जो बाद में उत्तरप्रदेश के कानपुर क्षेत्र में रहने लगे। आदित्य ने भी पुनः इस चम्बल क्षेत्र को चयन किया और रणथम्भोर को अपना घर बना लिया। हालांकि पिता के सैन्य सेवा में होने के कारण उनका बचपन देश के विभिन्न हिस्सों -दिल्ली, बेंगलुरु, प्रयागराज (इलाहाबाद), जयपुर एवं बीकानेर आदि में बीता।

Aditya 'Dicky' Singh

आदित्य के पिता के पिता यानी आदित्य के दादा मेजर मोहन सिंह, एक महान वॉर वेट्रन थे, उन्होंने द्वितीय विश्व युद्ध में भाग लिया और नॉर्थ अफ्रीका में पांच देश में जर्मन एवं इटालियन फोर्सेज के खिलाफ युद्ध लड़े। इनके दादा उस ज़माने में अंग्रेजी जानने वाले सिपाही थे। दादा मेजर मोहन सिंह ने इंडियन बटालियन का हिस्सा बन कर जापानी सेना के विरुद्ध बर्मा में भी युद्ध किया। सूबेदार मोहन सिंह ने 1965 में नॉन कॉम्बैट के होते हुए, कॉम्बैट मेंबर बनाकर इंडो पाक वॉर में शामिल किये गए और मेजर बना कर लगाया गया। इस युद्ध में उन्होंने अखनूर सेक्टर एवं जम्मू एवं कश्मीर की लड़ाई में अदम्य  साहस के साथ भाग लिया, परन्तु एक भयंकर टैंक मुकाबले में वह देश के लिए 1965 में शहीद हो गए।  मेजर मोहन सिंह के सभी पुत्र एवं दामाद सेना में उच्च अफसर रहे है।    मेजर मोहन सिंह का नाम आज भी नेशनल वॉर मेमोरियल में दर्ज है। आदित्य उन्हें बड़े गर्व से याद करते थे।

आदित्य के पिता श्री नरेश बहादुर राजपूताना राइफल में ब्रिगेडियर पद पर रहे एवं रेजिमेंटल सेंटर के कमांडेंट के पद से सेवानिवृत्त हुए। आपने भी देश के लिए कई युद्धों में भाग लिया जैसे 1962, 1965 एवं 1971 और देश की अनोखी सेवा की, आपको विशिष्ट सेवा मेडल से विभूषित किया गया ।

आदित्य ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा दिल्ली के मॉडर्न स्कूल -बाराखंबा से प्राप्त की।  आदित्य जब पेपर देते थे तो उनके उत्तरों को कुंजी माना जाता था, एक बार तो उनके पेपर स्कूल के टॉयलेट में मिले क्योंकि उनके बदमाश दोस्तों उन्हें चुरा कर कॉपी करने ले गए थे। आज भी उनकी फोटो स्टाइल ही नहीं वरन उनके द्वारा ली गयी टाइगर की फोटो चुरा कर इस्तेमाल की जाती है। आप शुरुआती  दौर में 100 मीटर दौड़ के धावक हुआ करते थे। उन्हें कहा गया की आपके पांव की बनावट और लम्बाई को इस्तेमाल करो तो आप एक बहुत अच्छे धावक बन सकते हो। उन्होंने दिल्ली स्टेट को रेसिंग के लिए रिप्रेजेंट किया।


आपने बिएमएस  कॉलेज बैंगलोर से इंजीनियरिंग की जब डिक्की पास होने को थे और भाई विक्की ने भी वही कॉलेज ज्वाइन किया। आदित्य सिविल इंजीनियरिंग बनकर ब्रिज बनाने की विशेषज्ञता हासिल की। परन्तु उन्होंने आई ए एस अफसर बनने का निर्णय लिया और बिना अधिक समय गवाए वह दिल्ली काडर का आई ए एस  बन भी गए। परन्तु उन्हें जल्द ही लगने लगा की यह काम उनके दिल के करीब नहीं, उनका मानना था इस दिशा में वह अपना जीवन नहीं बिता सकते। और आई ए एस पद से अपना इस्तीफा दे दिया। इस सब के दौरान उनके जीवन में पूनम आई और उन्हें एक और परिवार मिल गया गया। संदीप और मोती लाल जी उनके ससुर हमारे साथ है।

आदित्य और पूनम ने 1998 में रणथम्भौर को अपना घर बनाने लिया और तत्पश्च्यात रणथम्भौर बाघ बन गया। सोशल मीडिया तब नहीं था, कम लोग ही बाघों के बारे में जानते थे, परन्तु आदित्य की उँगलियों पर बाघों की पीढ़ियां हुआ करती थी।  उनके लिखे ब्लॉग का इंतज़ार हुआ करता था। आदित्य वन विभाग का एक भरोसेमंद साथी था। न नाम की लालसा, न काम की शर्म, और लोगों का अनोखा जुड़ाव और नए आइडिया की भरमार। आदित्य के विश्व में हर जगह दोस्त बन गए।


रणथम्भोर बाघ एक होटल से अधिक एक स्कूल था जहाँ लोग नेचर फोटोग्राफी सिखते थे और बाघों की बात करते थे। आदित्य ने रणथम्भोर बाघ को एक जिवंत केंद्र बना कर उसे एक ऐसा हब बना दिया की यहाँ आने वाले लोग नए आईडिया, नई टेक्नोलॉजी, फोटोग्राफी के नए तरीके साझा करते थे। बाघों के ज्ञान का जो प्रसार यहाँ से साधारण लोगों में हुआ शायद अन्य स्थान से नहीं हो पाया।

आदित्य सिंह के इसी अन्दाज के कारण वह बिबिसी  के कॉलिन की रिसर्च टीम का हिस्सा बन कर सूर्योदय से सूर्यास्त तक पार्क जाने लगे। बाघों के  जीवन के छिपे हुए रहस्य जानने लगे। पिछले २० वर्षों में वाल्मीक थापर ने शायद ही कोई किताब उनकी फोटो के बिना पूरी की हो, बाघ भालू की लड़ाई , बाघ बाघ का संघर्ष , उनका कब्स का पालन आदि सभी जीवन को उन्होंने छायांकन बखूबी किया। बिबिसी  ने उनके चित्रों के साथ कई आर्टिकल लिखे।

प्रकृति और वन्य जीवन के फोटोग्राफी तक उनका जुड़ाव नहीं था वह किड्स फॉर टाइगर के सवाई माधोपुर चैप्टर के कोऑर्डिनेटर भी थे। वह एनजीओ  टाइगर वाच के साथ मिलकर अनेक कंजर्वेशन  कार्यों में एक मूक सलाहकार और सहयोगी के रूप में भूमिका निभाई।

बिबिसी  की फिल्म सफलता के बाद रणथम्भौर का कोई बिरला ही फिल्म प्रोजेक्ट उनके बिना सम्पन्न हुआ होगा।  दुनिया के नाम चिन फिल्म मेकर बाघों पर उनके साथ सलाह करके फिल्मिंग आदि का काम करने लगे जैसे Nat Geo, Animal Planet, डिस्कवरी, डिज्नी आदि।

वन और बाघों से जुड़े वैज्ञानिक दृष्टिकोण पर बेपरवाह बात करते जो उचित था वह बोले, जो कटु था वह बोले, हरदम खरे बोले, बिना लाग लपेट और स्वार्थ के बोले।  वह बाघ की एक सच्ची और असली आवाज थे।

उन्होंने हर दम उस प्राणी की चिंता की भदलाव गांव में पूनम और आदित्य ने कई टुकड़े टुकड़े खेत खरीदें और उन्हें जंगल बनाया और आज वह एक अद्भुत जगह बन गया। जहाँ हजारों धोक के पेड़ लगे है और बाघ और सांभर उसका बखूबी इस्तेमाल कर रहे है।

2012 उनके जीवन में नायरा आई, पिता आदित्य अब नायरा के साथ फोटोग्राफी करते, सफारी जाते और सफर एक दिन  (6th September 2023) अचानक रुक गया।   परन्तु वह आज रणथम्भौर के हर जर्रे में समाये हमारे साथ है।

आदित्य ‘डिक्की’ सिंह

Aditya ‘Dicky’ Singh (1966-2023): A Legacy of Conservation, Photography, and Fearless Advocacy for Tigers and Wildlife

हिंदी में पढ़िए

Aditya ‘Dicky’ Singh, a name known for many things, I shall list some of them here – from being an outdoor enthusiast, a wildlife lover, an incredible photographer, a highly intelligent individual, a friend with an open heart and a home for everyone, a devoted worshiper of tigers, a compassionate soul towards all living beings, a cheerful personality whose joie de vivre was contagious, and to an exceptional human being who was free from the shackles of societal norms. All of this was a result of the unique upbringing and rich heritage that Aditya received from his family. He was born on May 24, 1966, in Allahabad (now Prayagraj).

Aditya’s father, Brigadier Naresh Bahadur Singh Bhadauria, and mother Aruna Singh remained constant blessings throughout his life. His family originally had roots in the Bhind region of Madhya Pradesh, but later shifted to the Kanpur region of Uttar Pradesh. In an ironic twist, Aditya eventually returned to the Chambal region in adulthood, albeit this time on the other side of the Chambal river, by making Ranthambhore in Rajasthan his home. Despite a childhood that was spent constantly on the move due to his father’s military service, living in Delhi, Bangalore, Allahabad (now Prayagraj), Jaipur, and Bikaner, Aditya’s family nevertheless maintained their connections to the Chambal region.

Aditya 'Dicky' Singh

Aditya in his own way, followed in the footsteps of his courageous father and grandfather, both of whom were military veterans. His grandfather, Major Mohan Singh, was a distinguished war veteran who participated in the Second World War and fought against the Axis forces in five different countries in North Africa, and then against Pakistani irregulars in Jammu & Kashmir scarcely three years later. It was precisely because of this extensive experience, that despite being a Special List Quartermaster (non-combat role), he was appointed a Company Commander of an Infantry Battalion and given command of a Rifle Company in the Chhamb-Jaurian sector of Jammu & Kashmir during the 1965 Indo-Pak war! He made the supreme sacrifice for the nation in a fierce battle in 1965, becoming the only Quartermaster to ever fight and be martyred for the nation in the history of the Indian Armed Forces. Major Mohan Singh’s name is commemorated at the National War Memorial, and Aditya always said with great pride that he was the ‘bravest man I have never met’, having been born just one year after the war in 1966. Aditya’s father, Brigadier Naresh Bahadur, served as a Brigadier in the Rajputana Rifles and retired as the Commandant of the Regimental Center. He also saw action in various wars, such as the India-China war of 1962, the Indo-Pak wars of 1965 (in the same sector as Major Mohan Singh), and 1971. His dedication to the nation was recognized with the Vishisht Seva Medal. Aditya received his early education at Modern School, Barakhamba Road, Delhi.

Aditya was known for acing exams, and on one occasion his exam papers were stolen, leading to a hilarious incident where his friends resorted to copying his answers in the school bathroom. Even today, his photographic style has its never-ending share of mimics, and his tiger photographs are widely used by all and sundry. In his early years, Aditya excelled in 100-meter sprints. He was advised to utilize the structure and height of his legs to become a proficient sprinter and went on to represent Delhi state. Aditya first pursued engineering at BMS College, Bangalore. His brother Vikram also joined the same college. Aditya specialized in civil engineering with a focus on building bridges. He eventually decided to become an IAS officer, but soon realized that this line of work was not his true calling. He quit the IAS without wasting much time and gave up his bureaucratic career, which even today, is quite unthinkable in the Indian context. During this period, Poonam entered his life, and he thus found another family.

Aditya and Poonam chose Ranthambhore as their new home in 1998, and eventually, Ranthambhore became their tiger abode. Social media was not prevalent at the time, and few people knew anything about tigers, but Aditya’s fingers were always on the pulse of Ranthambhore’s successive tiger generations, and a steadily growing section of enthusiasts eagerly awaited his blog posts on the subject. Aditya was also a trusted partner of the Ranthambhore Forest Department. For them, Aditya brought it all to the table- a complete disinterest in fame, a lack of shame in hard work, and a unique connection with people, along with a wealth of new ideas.

After the success of the first BBC documentary he worked on, hardly any film project related to Ranthambhore could have been completed without Aditya’s inputs. He collaborated with world-renowned wildlife filmmakers, offering advice and support on filming tigers, and working with organizations like National Geographic, Animal Planet, Discovery, Disney, and more.

Often speaking fearlessly and candidly on the scientific aspects related to nature and wildlife, Aditya spoke appropriately when needed, harshly when required, yet always truthfully. He spoke without pretence, and without any selfishness, it was never about him. He was a true and authentic voice for the tigers of Ranthambhore. Aditya and Poonam’s constant concern for the well-being of Ranthambhore’s wildlife eventually led them to buy 35 acres of barren land outside Ranthambhore and over 21 years, convert it into a jungle.

Today, it has become a magnificent place where thousands of trees thrive, and both the tiger and multiple prey species benefit from it. On September 6th 2023, Aditya left for his final abode, leaving those of us who had the privilege of knowing him devastated and mourning his loss. However, we can perhaps take comfort in the fact that Aditya leaves behind a rich legacy that is truly matchless and will undoubtedly continue to be a source of inspiration for scores of future wildlife conservationists, photographers, enthusiasts and free thinkers for many years to come.

This is especially true for his young daughter Nyra, who has already begun demonstrating that she has inherited her father’s innate proficiency with the camera.

वन्य जीवों के रक्षक :  रणथम्भौर के रेस्क्यूमैन

वन्य जीवों के रक्षक :  रणथम्भौर के रेस्क्यूमैन

“वन्य जीव संरक्षण में रेस्क्यू करने वालों का हमेशा से ही एक महत्वपूर्ण स्थान रहा है जो अपनी जानपर खेल कर मुश्किल में फसे वन्यजीवों को सुरक्षित निकालकर उनकी स्थानीय लोगों की रक्षा करते हैं  | ऐसे ही उम्दा कार्य कर रहे हैं रणथम्भौर के रेस्क्यू मैन ! आइये जानते हैं इनके बारे में…”

14 नवम्बर 2016 की उस सुबह रणथम्भौर के पास सटे एक गाँव “खवा खण्डोज”  में सभी गाँव के लोगों में हड़बड़ी सी मच गई क्यों कि उन्होंने एक कुए में एक बाघिन को गिरे हुए देख था और वह जीवित थी। गाँव के लोगों ने तुरंत वन विभाग की रेस्क्यू टीम को बुलाया । टीम को सुचना मिलते ही वे पूरे दस्ते के साथ उस जगह पर पहुंचे लेकिन गांव वालो ने चारों ओर से उस कुए को घेर रखा था । उनके लिए वो सारी परिस्थिति बाघ को बिना सफारी के देख पाने का एक मौका थी। जैसे ही टीम घटना स्थल पर पहुंची तब सबसे बड़ी चुनौती उस भीड़ को दूर करना था क्योंकि उस समय वहां ग्रामीणों के अलावा रणथम्भौर के ट्यूरिज्म से जुड़े हुए लोग , मीडिया के लोग और उन्ही के वाहनों के लम्बी कतारे भी लगी हुई थी । रेस्क्यू टीम व पुलिस प्रशासन ने समझा बुझाकर भीड़ को दूर किया ।उस कुए के अंदर लग भग दो फुट पानी था जो कि , एक संकेत था की यह रेस्क्यू आसान नहीं होने वाला है। क्यों किट्रेंकुलाइज के बाद टाइगर के फेफड़ों में पानी जाने का भी डर था। मीडिया के कई लोग वहां मौजूद थे और पूरी टीम के लोग के मन में एक घबरा हट भी थी कि , कहीं रेस्क्यू सफल नही हुआ तो आगे क्या होगा ये ईश्वर ही जाने। परन्तु साहस रखते हुए पूरी टीम ने योजना बनाई और सबसे पहले टीम के एक सदस्य को बड़े आकार के पिंजरे में बैठाकर रस्सी की मदद से पिंजरे को नीचे भेजा गया।नीचे जाकर उसने बाघिन को ट्रैंक्युलाइज किया । बाघिन के बेहोश होने के बाद टीम के दो सदस्यों को खाटके सहारे कुए में उतारा गया। उन्होंने बाघिन को नजदीक से जाकर देखा तो वह बेहोश थी और उन दोनो ने उसे उठाकर स्ट्रेचर पर रखा और सुरक्षित ऊपर ले आये ।वह बाघिन आज बिलकुल सुरक्षित है।

हज़ारों लोगों की भीड़ और बाघ जैसे बड़े व खतरनाक शिकारी को सफलता पूर्वक रेस्क्यू करने वाली उस टीम के जाबाज़ सदस्य हैं राजवीर सिंह ,  राजीव गर्ग , अतुल गुर्जर , जगदीश प्रसाद जाट और जसकरण मीणा। यह टीम हर वर्ष सैकड़ों वन्य जीवों को रेस्क्यू कर उनकी जान बचाती है। आइये इस आलेख में ऐसा साहसी कार्य करने वाले जांबाज़ों के बारे में जानते हैं |

श्री राजवीर सिंह बाए अवम श्री जश्करण मीना दाये जान पर खेलकर कुए से बाघ को निकालते हुए , तत्पश्चात उसे सुरक्षित जंगल में छोड़ दिया गया |

श्री राजवीर सिंह (वनपाल) :-

वन्य जीवों से प्यार – दुलार ,  उन का पालन पोषण करना , उन्हें कैसे बचाया जाए आदि कार्यों में बचपन से ही रुचि रखने वाले राजवीर सिंह वर्तमान में न केवल रणथम्भौर बल्कि सवाई माधोपुर के आस पास के जिलों तक भी वन्य जीव रेस्क्यू के लिए जाते रहते हैं। राजवीर सिंह का जन्म सवाई माधोपुर जिले की बोंली तहसील के दतुली गांव में सन   1968  में एक साधारण से किसान परिवार में हुआ। इनके पिताजी भी वन विभाग में फॉरेस्ट गार्ड के पद पर कार्यरत थे लेकिन कम आयु में ही उन का देहांत हो गया था तथा राजवी रतब छोटे ही थे। इनकी प्राथमिक व उच्चप्राथमिक शिक्षा गांव में ही हुई और   1988  में उच्च माध्यमिक शिक्षा इन्हों ने जयपुर से प्राप्त की व 23  जनवरी   1992  को इन्होंने अनुकंपा नियुक्ति के तहत जैसलमेर स्थित इंदिरा गांधी नहर परियोजना नर्सरी में फॉरेस्टगार्ड ( वन रक्षक ) के पद पर ज्वाइन किया । लेकिन  1995  में इन का पदस्थापन रणथंभौर बाघ अभ्यारण में हो गया और तब से लेकर आज तक ये वन्य जीव रेस्क्यू टीम रणथम्भौर में ही कार्यरत हैं।

पिछले 26 वर्षों से रणथम्भौर में कार्यरत रहते हुए इन्होने बहुत से महत्वपूर्ण कार्य किये हैं तथा कई कठिन रेस्क्यू को सफलतापूर्वक अंजाम देते हुए सैकड़ों वन्य जीवों के प्राण बचाये हैं। राजवीर बताते हैं कि,  वैसे तो हर रेस्क्यू ऑपरेशन अपने आप में कठिन व चुनौतियों से भरा होता हैं परन्तु कुछऐ से हैं जो आज भी उनके ज़हन में ज्यों के त्योंहैं।

वर्ष  2011  में ,  रणथंभौर बाघ अभयारण्य से सटे हुए गांव भूरी पहाड़ी में एक रात  T7  नामक बाघ ने गांव के अंदर घुसकर एक भैस के बच्चे का शिकार किया और रात भर वहीं बैठा रहा। अगली सुबह जैसे ही गांव वालों को पता चला तो सारे गांववाले इकट्ठे होकर चारों ओर से उसे भगाने का प्रयास करने लगे और बाघ खेतों में चला गया ।तभी गाँव वालों ने वन विभाग को सूचित कर मदद मांगी ।सुचना मिलते ही वन विभाग की पूरी रेस्क्यूटी मतत्कालीन उप वन संरक्षक दौलत सिंह के साथ घटना स्थल पर पहुंची लेकिन वर्षा होने के कारण विभाग की गाड़ी अंदर तक नहीं जा सकती थी। और गाँव वाले चारों ओर से शोर मचा रहे थे तथा वन विभाग रेस्क्यू टीम को मारने पर उतारू होरहे थे। परिस्थिति को देखते हुए टीम को मजबूर होकर पैदल ही बाघ को ट्रेंकुलाइज करने के लिए आगे बढ़ना पड़ा और वहां जा कर टीम एक छोटे टीले पर खड़ी हो गई ।जैसे ही गांव वालो ने फिर से शोर –शराबा मचाना शुरू किया तो बाघ झाड़ियों में छिपने के लिए रेस्क्यू टीम की दिशा में आगे बढ़ा लेकिन टीम को बिलकुल भी अंदेशा नहीं था। हालाँकि सारे गांव वाले वस्टाफ के अन्य लोग पूरा नज़ारा साफ़ देख रहे थे । इससे पहले कोई टीम को सूचित करता दौलत सिंह को बाघ ठीक उनके सामने दिखाई दिया। बाघ को सामने देखते ही टीम ने उससे बचने की पूरी कोशिश की परन्तु वह घबराया हुआ था और बाघने पालक झपकते ही दौलत सिंह पर हमलाकर उन्हें नीचे गिरा दिया ।अपने सामने बाघ को देखते हुए भी राजवीर ने हिम्मत नही हारी और डंडे के बल से डरा धमकाकर दौलत सिंह को बाघ के कब्जे से छुड़ा लिया और उन्हें तुरंत चिकित्सीय सुविधा के लिए जयपुर ले जाया गया। तथा उस बाघ को सरिस्का भेज दिया गया ।राजवीर बताते हैं कि , यह उनके जीवन का सबसे कठिन रेस्क्यू ऑपरेशन था भले ही यह एक दुखद घटना में परिवर्तित हो गया लेकिन इसमें बाघ का कोई दोष नहीं था वह बस भीड़ से बचने कि कोशिश में था और यह हादसा हो गया । इसी सिलसिले में राजवीर को एनडीटीवी के माध्यम से अमिता भबच्चन द्वारा और उस वक्त के मुख्य मंत्रीअशोक गहलोत आदि के माध्यम से कई अवार्ड भी मिले व सम्मान भी मिला जिन्हें सारे राजस्थान वासियों ने देखा व उनका साहस बढ़ाया ।

राजवीर अब तक एक हजार से ऊपर वन्य जीवों का रेस्क्यू कर चुके हैं जिनमे  35  से अधिक रेस्क्यू बाघ के भी किए हैं ।स्टाफ के अधिकारियों का मार्गदर्शन व साथियो के मिल रहे सहयोग से ये रोज किसीन किसी बेजुबान वन्य जीव की जिंदगी को नया जीवन देने में कामयाब होर हे हैं।

राजवीर बताते हैं कि ,एक बार छान गांव से सूचना मिली कि , गांव में अंदर खेतों की तरफ बाघ घुस गया है । वे पूरे दस्ते के साथ वहां पहुचे तो गांव वालों ने कहा कि , “साहब गाड़ी को आगे तक ले जाओ आगे कोई समस्यानही है” । उनके कह ने पर टीम गाड़ी सहित आगे चली तो गई पर उन्हें पता नहीं था कि , आगे कोनसी मुसीबत आने वाली थी। टीम वहां पर पहुंची और बाघ   T28  को ट्रेंकुलाइज किया और उसे पिंजरे में डाल गाड़ी में रख लिया । लेकिन जैसे ही गाड़ी आगे बढ़ाई गई तो सारे गांव के लोगों ने इकट्ठे होकर विभाग की गाड़ी का घेरावकर लिया और बोलेकि, “गाड़ी नही निकालने देंगे , तुम लोगों ने हमारी फसले नष्ट कर दी” । इसके अलावा वहां कुछ लो गऐ से भी थे जो केवल उत्पात मचाने के मकसद से वहां इकट्ठे हुए थे और उन्होंने चारों ओर से पत्थर बाजी शुरू कर दी । टीम के लोगों को चोटें भी आई लेकिन उन्होंने जैसे – तैसे करके गाड़ी में छिपकर जान बचाई । साथ ही उस समयमौ के पर ही विभाग ने   60000  रुपये उनको फसल के नुक्सान के ऐ वजमें मुआवजे के रूप में सौंपी ।हालांकि नुकसान कुछ नही हुआ मिर्ची लोग तोड़ चुके थे लेकिन हंगामा खड़ाकर के पैसे लेना ही उनका मकसद था। परन्तु इस सारे उत्पात में बहुत समय व्यर्थ हो चूका था और बेहोश बाघ को नही रिवाइवल मिल स्का और नही पानी ।मार्च का महीना था और दिन का एक बज चुका था गर्मी बहुत तेज थी। जिसके चलते बाघ मर चुका था । टीम के लोग बताते हैं कि , अगर गाँव वाले पत्थर बाजी और हंगामा नहीं करते तो उस बाघ को आसानी से जीवित बचाया जा सकता था।

इसी प्रकार की एक अन्य घटना   17   जुलाई   2012   को भी घटी थी जब खण्डार के मेई कला गांव में बाघ  T20  ने गांव के अंदर घुसकर एक बैल का शिकार किया था। लेकिन गांव में ऐसी घटनाएं होने के समय ग्रामीणों की कुछ पूर्व नियोजित ज्वलंत मांगे भी जिंदा हो जाती है जैसे कि,  पशुओ की चराई ,जंगलो में ईंधन के लिए लकड़ी कटाई , वन्यजीवों से मानव वपशुओं की सुरक्षा आदि । इन मांगों को लेकर ऐसे मौकों पर यह ग्रामीण लोग विभाग के कर्मचारियों से बदला लेने की धारणा रखते हुए उनके कार्यों में अड़ चने पैदा करते हैं। इस घटना की सुचना जैसे ही विभाग को मिलीतो उससे पहले ही पुलिस प्रशासन वहां पर पहुंच चुका था गांव वालों ने पुलिस प्रशासन के साथ बदसलूकी की व उनको पकड़कर गाँव के स्कूल में बंदकर दिया। ऐसे माहौल को देखकर रेस्क्यू टीम घटनास्थल से  5  किलोमीटर की दूरी पर ही रुक गई और बाद में वहाँ के स्थानीय जनप्रतिनिधि व आस पास के ग्रामीणों की समझाइशके बाद जब मामला शांत हुआ तो टीम घटनास्थल के लिए रवाना हुई । गाँव वालों का आक्रोश देखकर ये अनुमान था कि , गाँव वाले मुश्किल जरूर खड़ी करेंगे इसीलिए रेस्क्यू टीम के सभी सदस्यों ने खुद को वन विभाग का न बताकर अपना हुलिया बदल लियात था इस से भीड़ शांत होकर वहां से हट गई। गांव के पास स्थित नाले के पीछे बाघ बैठा था टीम ने गाड़ी को सीधा नाले के पास लगाया और जैसे ही बाघ दिखा तुरंत उसे ट्रेंकुलाइज किया गया तथा बाघ व टीम सभी सुरक्षित निकलकर वापस आ पाए।

डॉ राजीव गर्ग बाए रंथाम्भोरे में बाघिन का उपचार करते हुए . डॉ गर्ग ने सेकेड़ो बाघ अवम बघेरों को बचाने में मुख्य भूमिका निभाई है |

 

डॉ . राजीव गर्ग :-

पेशे से एक पशु चिकित्सक होने के नाते डॉ. राजीव गर्ग की रेस्क्यू टीम में भूमि का बहुत अहम रहती है। राजीव गर्ग,  सवाई माधोपुर के रहने वाले हैं और वर्तमान में वरिष्ठ पशुचिकित्सा अधिकारी सवाईमाधोपुर के पद  पर तैनात हैं। वर्ष   1995 में ये राजकीय सेवा में शामिल हुए औऱ अब तक लगातार हजारो पशु वन्य जीवोंका चिकित्सीय उपचार कर चुके हैं। डॉ. राजीव का कहना हैं रणथम्भौर नेशनल पार्क देश व दुनियाभर में प्रसिद्ध है यहां आए दिन बाघ जंगल से बाहर की तरफ निकल जाते हैं ऐसे में उनको रेस्क्यू के लिए सुव्यवस्थित रेस्क्यू यूनिट , पर्याप्त संसाधन ,अच्छे चिकित्सक व सुगम इलाज बेहद जरूरी हैं और इसमे भी विशेषकर जब ऑपरेशन की जरूरत होती है तो एक चिकित्सक की बहुत बड़ी भूमिका रहती है।

डॉ. राजीव एक  घटना को याद करते हुए बताते हैं कि , एक बार कुतलपुरा जाटान के पास एक बाघने एक वनकर्मी  के सीने पर दोनों पैर  रखते हुए उसे लहूलुहान कर दिया था  और ग्रामीण लोगों ने आसपास भीड़ लगा रखी थी।रेस्क्यू टीम ने घायल वनकर्मी को बचा तो लिया परन्तु बाघ लगातार आबादी क्षेत्र में घूमता रहा। बाद  में  क्षेत्रीय  निदेशक के आदेश पर  रेस्क्यू टीम का गठन किया जिसमें चिकित्सक के रूप में डॉ राजीव थे और रेस्क्यू टीम ने वहां पहुंच कर उस जगह को तलाशा जहां पर बाघ का लगातार मूवमेंट था।बाघ के पगचिन्हों के आधार पर बाघ को ढूंढ लिया गया और उस जगह को चारों ओर से देखा क्योंकि रेस्क्यू करने से पहले एक समुचित व सुगम स्थान की आवश्यकता होती है जो कि , वहाँ पर्याप्त था।तभी टीम ने बाघ को डाट किया और वह थोड़ा आगे निकल गया।कुछ दूर जाकर बाघ एक झाडी के निचे जाकर बैठ गया व होश हो गया।टीम ने तुरंत उसे रेस्क्यू किया बाद में इसको वहां पर चिकित्सीय सुविधाएं उपलब्ध कराते हुए गाड़ी में बिठाकर फलौदी क्षेत्र में ले जाकर छोड़ा था उस समय वह क्षेत्र टाइगर के पर्यावास के लिए नया था।

ऐसे ही एक बाघ करौली क्षेत्र में लगातार ऐसी घटनाओं को अंजाम दे रहा था जिससे जनहानि भी हुई और ग्रामीण लोगों में दहशत भी बन गई।जिसका रेस्क्यू करना जरूरी हो गया था जैसे ही रेस्क्यूटीम को आदेश मिला तो टीम करौली पहुच गई।परन्तु वहां पर एक समस्या थी कि टाइगर के दिन में दिखने की  आशा बहुत कम थी तथा वहां काफी सारा  क्षेत्र माइंस का है।टीम सुबह जल्द ही उस क्षेत्र पर पहुंची जहां पर उसका लगातार मूवमेंट था वहां मुख्य सड़क के पास स्थित एक गोशाला को टीम ने अपना कैंप बनाया और वही से चारो तरफ उसे खोजना शुरू किया तो देखा कि बाघ ने एक सांड का शिकार किया गया था।लेकिन टाइगर वहाँ से आगे था उस जगह पर पहुँच पाना सम्भव नही था लेकिन जैसे ही शाम होगी तो यह निश्चित था कि टाइगर उस सांड के पास जरूर आएगा और टीम लगातार निगरानी करती रही।शाम के 5 बज चुके थे टीम पूर्ण रूप से अलर्ट थी और आस पास का स्थान रेस्क्यू के लिए भी सुगम था।बाघ के वहां आते ही तुरंत उसे ट्रेंकुलाइज के लिए डाट किया और डाट लगने के बाद वह उल्टियां करने लगा फिर हमने बर्फ की सिल्लियों के  साथ उपचार कर उसे पिंजरे की वेन में बंद किया और उसे रणथम्भौर स्थित भीड़ एनक्लोजर में लाकर बन्द किया गया उसके ट्रंकुलाइज से पशुपालकों व किसानों ने उसकी दहशत से राहत की सांस लेकिन पर्यटन से जुड़े हुए लोग,प्रकृति व वन्यप्रेमीबन्धुओ में मायूसी छा गई।

ऐसे ही टाइगर-24  के बारे में इनका कहना हैं कि  छ लगातार जनहानि की घटनाओं को देखते व विशेषज्ञों की सलाह को मध्यनजर रखते हुए राज्य सरकार द्वारा टी-24  को सज्जनगढ़ उदयपुर में शिप्ट करने का फैसला हुआ मई 2015  में इसे रणथम्भौर से उदयपुर स्थित बायोलॉजिकल पार्क,सज्जनगढ़ में शिफ्ट किया गया और यह पहला ही मामला था जब किसी टाइगर को रेस्क्यू करके सड़क मार्ग के द्वारा दूसरे पार्क में शिप्ट किया गया  नही तो आज तक हवाई जहाज के द्वारा ही टाइगर को एक से दूसरे पार्क में ले जाया गया हैं।

टी-24  को रेस्क्यू के लिए यहां के क्षेत्रीय निदेशक के नेतृत्व में एक टीम  का गठन हुआ जिसमे मैं एक चिकित्सक के रूप में शामिल था हमने उस टाइगर को वॉच करना शुरू किया लेकिन वह हम नही मिल पा रहा था उसको ढूंढते-ढूंढते तीन दिन बाद वह जॉन no.3 में टी-39 (मादा) के साथ एक तलाब के पास विचरण करता हुआ मिला काफी समय तक दोनों एक साथ विचरण करते रहे तो रेस्क्यू करने में समस्या थी हमने इंतजार किया बाद में टी-39 जैसे वहां से अन्यत्र चली गई तो हमने उस रास्ते पर वेट लगाया जो रास्ता पानी की तरफ नही जाता हैं तथा पानी वाले रास्ते पर हमने हमारी सारी गाड़ियां लगा दी ताकि गलती से भी टाइगर पानी की तरफ क्रॉस न कर सके हमने मौका पाते ही उसे डाट किया तो वह सामने एक पहाड़ी थी उस पर चढ़ गया वहाँ जाकर वो बेहोश हुआ तो उसे बड़ी मुश्किल नीचे लाया गया सुबह के 10 बज रहे थे बहुत तेज गर्मी थी हमने वेन के पास में नीचे जामुन की पत्ती बिछाई व बर्फ द्वारा स्प्रे के लिए तैयार किया गया बाद में हमने टाइगर को चिकित्सीय इलाज किया और वेन में सवार किया पूरे रास्ते मे बर्फ की स्प्रे करते रहे यानी कि उस केज को हमने एक वातानुकूलित केज बना दिया टाइगर काफी आराम से बैठकर गया था तथा उस भयंकर गर्मी में हमने टी-24 को 12 घण्टे की यात्रा के बावजूद पूर्ण रूप से सुरक्षित सज्जन गढ़ ले जाकर छोड़ा यह काफी लंबा रेस्क्यू था और मेरे लिए भी यह काफी महत्वपूर्ण टाइगर रेस्क्यू था।

इनका कहना कि अब तक 50 से अधिक टाईगर रेस्क्यू ऑपरेशन मेरे द्वारा किए जा चुके हैं और जहाँ तक वन्यजीवों के लिए जो कुछ मैंने किया हैं वो मैंने खुद से ही प्रेरणा लेकर यही से सीखा हैं मैंने इसके लिए कोई अलग से ट्रेनिंग नही ली हैं और नही वाइल्डलाइफ से सम्बंधित कोई अध्ययन किया हैं जो भी किया हैं मेरे ही अनुभव कोसाझा करते हुए किया हैं व सीखा हैं जामडोली जयपुर में वाइल्डलाइफ से सम्बंधित एकट्रेनिंग इंस्टिट्यूट हैं वहां पर वाइल्डलाइफ का भी कोर्स होता हैं उसमे मेने लेक्चर दिया हैं वहां पर ट्रेनिंग ले रहे लोगो के साथ मेरे अनुभव को साझा किया हैं उससे पहले भी मैं इसी इंस्टिट्यूट में वाइल्डलाइफ से सम्बंधित ट्रेनिंग दे चुका हूं साथ ही कुछ समय पहले करौली में भी मुझे उप वनसंरक्षक ने वहां के स्टाफ को ट्रेनिंग देने के लिए आमंत्रित किया था मैंने एक दिन का प्रशिक्षण व मेरा अनुभव उनके साथ भी साझा किया था।

रंथाम्भोरे के नए रेस्क्यू मेन श्री अतुल गुर्जर ( मध्य ) रेस्क्यू की विधा में अब्निपूर्ण हो गए है |

 

श्री अतुल गुर्जर :- 

30 जुलाई 1991 को सवाईमाधोपुर जिले की गंगापुरसिटी तहसील के रेंडायल “गुर्जर”  गांव में भारतीय सेना के रिटायर्ड हवलदार सियाराम गुर्जर के घर जन्मे अतुल गुर्जर आज रणथम्भौर अभयारण्य में वनरक्षक के पद पर कार्यरत हैं।वर्तमान में ये वनपाल के अतिरिक्त प्रभार के साथ आमली नाके पर तैनात हैं।इन के परिवार में दो बच्चे भी हैं जो अभी छोटे हैं वे पढाई कर रहे हैं इनकी पत्नी ग्रहणी होने के साथ-साथ बच्चो की देखरेख में लगी रहती हैं।इनका परिवार अधिकांशतः भारतीय सेना से जुड़ा हुआ है लेकिन ये शिक्षक बनना चाहते थे जिसके लिए इन्होने बी.एड. भी की।शिक्षक कम्पीटीशन के दौरान ही जून 2016 की वनरक्षक भर्ती परीक्षा में इनका चयन रणथम्भौर अभयारण्य स्थित जोगीमहल नाके पर वनरक्षक (फॉरेस्टगार्ड) के पद पर हो गया।बाद में प्रकृति व वन्यजीवों से बढ़ते लगाव को ध्यान में रखते हुए ये अपनी स्वेच्छा से रेस्क्यू टीम में चले गए और अगस्त  2017 से 2020 तक रेस्क्यू टीम के सदस्य रहे।

अतुल बताते हैं कि, रेस्क्यू टीम में आने के बाद इन्होने विभिन्न वन्यजीवों के रेस्क्यू में भाग लिया।

अप्रैल    2019  में इन्होने नर बाघ  T-91  को रामगढ़ विषधारी अभयारण्य बूंदी से रेस्क्यू कर के मुकुन्दरा हिल्स टाइगर रिज़र्व में शिप्ट करने के ऑपरेशन में भाग लिया था। नर बाघ  T-91  पहले रणथम्भौर अभयारण्य में विचरण कर रहा था लेकिन घूमता हुआ वह रामगढ़ विषधारी तक पहुंच गया। बाद में सभी अधिकारीयों ने विचार विमर्श से इस बाघ को मुकुन्दरा हिल्स भेजने का निर्णय लिया क्यों कि मुकुन्दरा हिल्स को भी टाइगर रिज़र्व की तरह विकसित करना था।

सीसीएफ के आदेश के बाद रेस्क्यू टीम रामगढ़ विषधारी बूंदी के लिए रवाना हुई और वहां पहुँचकर वहां के सम्बन्धित डीएफओ से इस रेस्क्यू के बारे में चर्चा की।इस रेस्क्यू में सीसीएफ रणथम्भौर वाई के साहू,टाइगर वॉच रणथम्भौर से कन्जर्वेशन बायलॉजिस्ट धर्मेंद्र खाण्डल,वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ.  राजीव गर्ग ,डॉ. अरविंद कोटा और जयपुर की रेस्क्यू टीमें भी शामिल थी।

जैसे ही टीम रेस्क्यू करने के लिए उस स्थान पर पहुंची तो वहां की स्थिति थोड़ी विपरीत थी।वह बाघ रणथम्भौर से निकल कर गया था लेकिन रामगढ में आकर मानवीय व्यवहार व वाहनों की आवाज को सुनकर झाड़ियों में छिपने की कोशिश करता था यानी वह अकेला बाघ एक तरह से डर-डरकर रहता था।टीम ने बाघ की निगरानी व उसे एक जगह पर बुलाने के लिए कैमरा ट्रेप के साथ बेट (एकशिकार – बछड़ा) भी बाँधा व बाघ को ढूंढना शुरू किया।बाघ कहीं दिखाई नहीं दिया फिर दो दिन बाद सुबह के 5-6 बजे बाघ बेट के पास आया तो कैमरा फ्लैश मारने लगा जैसे ही टीम ने कैमरा का फ्लैश देखा तो उन्होंने वहां जाकर उसको ट्रेंकुलाइज किया।बाघ वहां से हटकर थोड़ा दूर जाकर नाले में जाकर बैठ गया और पूरी टीम ने सर्च करना शुरू किया तो बाघ नाले के पास ही मिला तब तक वह बेहोश हो चुका था।बाघ को तुरंत गाड़ी में बिठा कर मुकुन्दरा शिप्ट किया गया और पूरी टीम के लिए ख़ुशी का मौका था क्योंकि मुकुन्दरामें  पहला बाघ ले जाने का सौभाग्य उन्हें प्राप्त हुआ।

अतुल बताते हैं कि, यह कार्य हमारी टीम के लिए एक चुनौती पूर्ण कार्य था क्योंकि रणथम्भौर हमारे लिए होम ग्राउंड की तरह हैं तो दूसरी जगह जाकर बाघ को रेस्क्यू करना हम समझते हैं कि कार्य चुनौती भरा हैं आखिर कार हम सफल हुए।

आगे अतुल बताते हैं कि , एक बार सूचना मिली कि रणथम्भौर सेंचुरी से सटे गांव छान में बाघ T23 घुस गया है और उसका रेस्क्यू करना है।रेस्क्यू टीम तैयार हुई और पूर्ण दस्ते के साथ छान गांव पहुंची।रात का समय था और छान एक बड़ी आबादी का गांव था और ऐसी जगह से बाघ को रेस्क्यू करने में काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता हैं। तो टीम ने देखाकि, गांव के अंतिम छोर की तरफ एक मकान के पीछे नाले के ऊपर बीच रोड़ पर बाघ गाय के शिकार को खा रहा था।उसके पास गांव के लोगो का भी मूवमेंट था तथा बाघ बार-बार डिस्टर्ब भी हो रहा था इसलिए उसे ट्रेंकुलाइज करना जरूरी था।टीम ने बाघ को ट्रेंकुलाइज किया और जैसे ही वह बेहोश हुआ तो उसे गाड़ी में बिठा लिया तब तक रात के 1 बज चुके थे।आस पास लोगो का हुजूम लग गया था और टीम गांव के अंतिम छोर पर थी तथा बीच गांव में होकर गाड़ी को निकालना काफी कठिन था।तभी टीम ने बोदल नाके से एक और गाड़ी बुलवाली और लोगो को समझाते हुए वहां मौजूद भीड़ को तीतर बितर किया व बाघ को सुरक्षित लेकर आ गए और इंडाला डांग मेंले जाकर उसे छोड़ दिया।

अतुल बताते हैं कि घनी आबादी और भीड़ भाड़  वाले क्षेत्र में वन्यजीवों को रेस्क्यू करने में काफी कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ता है कभी कभार स्थानीय लोगों और विभाग के बीच आपसी संघर्ष भी हो जाता है। ऐसी ही एक घटना रणथम्भौर अभयारण्य से सटे एक गांव कुंडेरा की है। जनवरी 2019 की एक सुबह विभाग को सूचना मिली कि, एक बाघ ने एक महिला को मार दिया हैं।उस समय सारे गाँव के लोगों में आक्रोश भरा हुआ था और हर तरफ हंगामा मचा हुआ था ।ऐसी स्थिति में वनविभाग टीम का वहां जाना बहुत ही जोखिम भरा कार्य था। फिर भी टीम को हिम्मत व सूझबूझ से कार्य करना जरूरी था।टीम साहस जुटाकर घटनास्थल पर पहुंची तो चारों तरफ लोगों की भीड़ लगी हुई थी।बाघ उस महिला को मारकर पास स्थित सरसों के खेतों में चला गया था।जब वहां जाकर बाघ के पगमार्क मिलेतो कुछ दुरी पर एक नाले के पास बाघ ने नीलगाय का शिकार कर रखा था।रात का समय था तो उस दिन टीम सिर्फ कैमरा लगाकर वापस लौट आई।फिर घटना के तीन दिन बाद रेस्क्यूटीम व पुलिस प्रशासन की टीम वापस उसी जगह पर पहुंची जहाँ बाघ ने नीलगाय का शिकार किया था।क्योंकि लोगो की भीड़ बढ़ गई थी तो प्रशासन का सहयोग जरूरी था।महिला की मौत की वजह से बाघ के प्रति लोगो मे काफी रोष था इसलिए टाइगर को रेस्क्यू करना बेहद जरूरी था।यानि कि, रेस्क्यूटीम के सामने एक बड़ी चुनौती थी ।बाघ उस नीलगाय के शिकार को घसीटकर पास में सरसों के खेत मे ले गया था तो टीम ने उसे घसीट के निशान को देखते हुए उसका पीछा किया परन्तु सरसो की फसल में यदि बाघ बैठा हो तो उसे देख पाना मुश्किल था इसीलिए टी\म ने ड्रोन कैमरा इस्तेमाल किया जिससे पता चला कि, टाइगर थोड़ा आगे किल के पास ही बैठा हैं।लेकिन गाड़ी को देखकर टाइगर आगे आगे जंगल की ओर चल पड़ा तो उस वक्त डीएफओ ने होशियारी दिखाते पास में वनविभाग के थर्मल कैमरे के ओपरेटर को कॉल लगाकर टाइगर की लोकेशन स्पष्ट करने को कहा तो वहां से ओपरेटरने बताया कि, “टाइगर आपके बांयी ओर कुछ ही मीटर की दूरी पर आगे की ओर जा रहा हैं”। फिर बाघ खेत की मेड पर चलता हुआ आगे की तरफ बढ़ रहा है थोड़ा पास जाकर उसे ट्रेंकुलाइज किया गया और थोड़ी देर बाद बाघ बेहोश हो गया।शाम का समय हो गया था लोगो मे बाघ को देखने की जदोजहद थी लेकिन पूरी टीम ने ततपरता दिखाते हुए बाघ को गाड़ी में शिप्ट कि या व वहां से रवाना हो गए।बाद में उसे अंदर जंगल में ले जाकर छोड़ दिया।

अतुल रेस्क्यू टीम से आने के बाद फील्ड में भी रेस्क्यू करते रहते हैं। अतुल बताते हैं कि, “मैं आज भी हमारी रेस्क्यू टीम के इंचार्ज वनपाल राजवीर सिंह को अपना आदर्श मानताहूं उनके साथ में मैंने 400  से अधिक वन्यजीवों के जीवन को बचाया हैं।उच्चाधिकारियों का मार्गदर्शन तो मुझे मिला ही हैं लेकिन वनपाल राजवीरसिंह से मुझे काफी कुछ सीखने को मिला।मेरे रेस्क्यू कार्यकाल में विभाग के लिए मैंने जितने भी अच्छे कार्य किए हैं मैं उनका श्रेय वनपाल राजवीर सिंह को देता हूं”।

श्री जगदीश प्रशाद जाट ने अनेको बार रेस्क्यू के कार्य में महत्वपूर्ण योगदान दिया है. श्री जाट हिम्मत में जज्बे से हर समय मुश्किल रेस्क्यू के दोरान आगे रहते है |

श्री जगदीश प्रसाद जाट :-

वर्तमान में रणथम्भौर बाघ अभयारण्य में फ़्लाइंग टीम में कार्यरत जगदीश प्रसाद जाट वनरक्षक न होकर राजस्थान होम गार्ड सेवा के माध्यम से वन विभाग में ड्राईवर के पद पर कार्यरत हैं।  7  दिसम्बर  1980  को इन का जन्म सवाई माधोपुर नगर से सटे हुए कस्बा ठीगला में हुआ था । इनका शिक्षा से इतना लगा वन ही रहा साथ ही परिवार भी किसान वर्ग से था तो आठवी पास करने के बाद परिवार के साथ खेती –बाड़ी केकार्यमेजुटगएऔरबादमेंसन 2005 मे राज्य होम गार्ड सेवा में इनका सिपाही के पद पर चयन हुआ । इनकी प्रथम पोस्टिंग भी इन्हें वन विभाग के अधीन कुशाली पूराना के पर मिली उसके बाद से लेकर आज तक ये वन विभाग मे ही कार्य रत हैं।

वन विभाग मे आने के बाद इन्होंने अपने स्टाफ के साथीयो से प्रकृति ववन्य जीवो के महत्व के बारे में काफी कुछ सीखा बाद में इनकी कार्य करने की रुचि बढ़ती चली गई और सन   2012  में ये स्वेच्छा से वन्य जीव रेस्क्यू टीम आ गए । वहां साथी ववरिष्ठ सदस्यों के मार्ग दर्शन में रहकर  “वन्य जीवों को कैसे बचाए ” इस बारे में इन्होंने काफी कुछ सीखा बाद में ये रेस्क्यू टीम के साथ – साथ बाघ परियोजना परिक्षेत्र , नगर परिषद व जिले के आस पास के कई शहर व कस्बो में जाने लगे जिससे इनको काफी अनुभव हो गया। जगदीश प्रसाद बताते हैं रेस्क्यू टीम में आने से पहले भी इन्हें टाइगर रेस्क्यू के लिए जाने का मौका मिला है । सन  2009  में    NTCA  द्वारा एक गाइडलाइन जारी हुई जिसमें रणथंभौर बाघ परियोजना से सरिस्का के लिए टाइगर शिफ्ट करने का प्रस्ताव था। उसमें   T-44  को सरिस्का में शिप्ट करने की मंजूरी मिली थी उस कार्य के लिए डीएफओ द्वारा एक टीम गठित की गई जिसमें जगदीश उस टीम के ड्राइवर थे ।  T-44  ( मादा )  खंडार के पास स्थित वन क्षेत्र में दूध बावड़ी के आस पास में रहती थी । रेस्क्यू टीम ने बाघिन को ढूंढा उसे ट्रेंकुलाइज करने की योजना बनाई । मौका मिलते ही बाघिन को ट्रेंकुलाइज कर दिया गया और वह थोड़ी दूर जाकर एक पेड़ के पास बैठ गई और   20  मिनट बाद में वह जैसे ही बेहोश हुई तो टीम ने उसके मुँह पर कपड़ा रखा और स्ट्रेचर पर डाल दिया । बाघिन कोरेडियो कॉलर लगाया गया और रिवाइवल देकर केंटर में रखे पिजरे में शिप्ट कर दिया । बाद में उसे हेलीकॉप्टर से सरिस्का ले जाया गया और वहां जाकर उसे एनक्लोजर में छोड़ दिया गया । जगदीश सरिस्का तक इस पूरे रेस्क्यूमें साथ में थे बाद सरिस्का में टाइगर छोड़ने के बाद वहां के विभाग , आस पास के पर्यावरण व वन्य प्रेमियो में खुशी की लहर छा गई तथा और बाघों को सरिस्का भेजने का प्रयास किया जा रहा था ।

इसी क्रम एक नर बाघ   T-12  अक्सर रणथम्भौर के बाहरी इलाके में घूमता रहता था तथा उसे सरिस्का भेजने कि योजना बनाई गई । रेस्क्यू टीम डीएफओ के निर्देशन में सुबह   8  बजे अणतपुरा के पास चिरौली वन्य क्षेत्र में पहुंच गई जहाँ पर कभी – कभार   T-12  का मूवमेंट रहता था । वहा इस टाइगर को लगातार खोज जारी थी और कुछ समय बाद बाघ मिल गया । वह सामने ही दिख रहा था लेकिन जैसे ही टीम पास जाने की कोशिश करती तो टाइगर वहां से भाग जाता ।

इस मशक्कत में दिन के   11  बज चुके थे तभी डीएफओ का मैसेज आया कि , “पूरी टीम वहां से रवाना होकर कुंडाल वन क्षेत्र पहुँचे ” और आदेश की पालना करते हुए पूरी टीम तुरन्त कुंडाल वन्य क्षेत्र पहुंच गई तब तक दोपहर के   12  बज चुके थे । वहां जाकर देखा तो   T25  एक नाले की बगल में एक बैल के किल पर बैठा था । टीम ने तुरंत बाघ को ट्रेंकुलाइज करने की योजना बनाई और वहां पर नाले का आस पास का हिस्सा था वह एक समतल सपाट क्षेत्र था तो मौका देखकर उसे डाट दी तो बाघ कुछ दूर जाकर एक झाडी के पास लेट गया व बेहोश हो गया । बाघ को तुरंत रेडियो कालर लगा या गया और रिवाइवल देकर उसे स्ट्रेचर द्वारा पिंजरे में शिप्ट किया गया बाद में उसे सड़क मार्ग से सरिस्का ले कर गए थे । परन्तु यह रेस्क्यू जितना सरल लग रहा है वास्तव में उतना सरल था नहीं । उस समय गर्मियों के दिन थे और रात के  8  बज चुके थे । टीम में ताप मान ठंडा रखने के लिए पिंजरे के ऊपर बर्फ की सिल्लियां लगाई थी । जगदीश पिंजरे वाली गाड़ी से आगे वाली गाड़ी चला रहे थे जिसमें   100 – 100  लिटर पानी की चार टंकी थी और एक   200  लीटर पानी की टंकी पिंजरे वाली गाड़ी में भी थी । जिसमें एक व्यक्ति लगातार पिंजरे पर पानी डालता रहा यानी कि ,  सरिस्का पहुचने तक   1000  लीटर पानी खर्च कर दिया ताकि बाघ को गर्मी से बचाया जा सके । बाद में सरिस्का के अंदर उसे एनक्लोजर में जाकर छोड़ दिया गया ।

जगदीश बताते हैं कि ,  कई बार रेस्क्यू इतना मुश्किल होता है कि , टीम के लोगों की जान पर ही बन आती है । ऐसी ही एक घटना वे बताते हैं जब वे रेस्क्यू टीम के साथ जंगल के अंदर ही थे । शाम के चार बज रहे थे और विभाग को सुचना मिली कि , “आपतत्काल ऑफिस पहुँचे “। ऑफिस में भी कुछ बताया नहीं गया पर पूरी टीम बरवाड़ा रोड़ की तरफ निकल पड़ी । रेस्क्यू टीम के इंचार्ज राजवीर सिंह भी साथ ही थे । आगे जाकर पाड़ली गांव की तरफ घूमे तो वहां गांव के लोगो ने शोर मचा रखा था । टीम ने जाकर वहां देखा कि , प्रशासन की गाड़ी वहां मौजूद थी उस जगह सैंकड़ों लोगो का भीड़ थी और लोगो मे काफी आक्रोश भी था । तो बाद में राजवीर सिंह ने टीम को बताया कि , “यहां एक पैंथर हैं और उसका रेस्क्यू कर के जंगल मे छोड़ना हैं “। पैंथर और टीम के बीच एक   10  फिट गहरा नाला था जिसकी चौड़ाई लगभग   15  फिट थी और उसमें  5 फिट तक पानी भी था । राजवीर सिंह और एक साथी आगे जा चुके थे और जगदीश भी नाला पार करके उनके पीछे चले गए । इन्होने पैंथर को ट्रेंकुलाइज करने की योजना बनाई । पैंथर बेंगन की क्यारी में बैठा हुआ था और जब उसे ट्रेंकुलाइज करने की कोशिश की तो वह सीधा जगदीश की तरफ़ दौड़ता आया लेकिन उन्होंने लकड़ी के जेडे की मदद से उसे नीचे गिरा दिया । पैंथर गुस्से में था उसने सीधा राजवीर सिंह की तरफ हमला किया । जगदीश ने राजवीर को बचाने के लिए उसकी ओर झपट्टा मारा तो पैंथर जगदीश की ओर हो लिया और उसने इनकी बांयी आंख के ऊपर पंजे से अटेक किया । जैसे तैसे करके इन्होने पैंथर को नीचे फेंक दिया लेकिन पैंथर ने दुबारा झपट्टा मारते हुए जगदीश का सिर पकड़कर नीचे पटक दिया जिससे उनका सिर फट गया । जगदीश की आँख और सिर से खून बहने लगा । वहीँ दूसरी और पैंथर ने फिर एक गांव के युवक की ओर झपटा जिसे टीम के लोगों ने बचा लिया । गांव के लोग गुस्से में आग –बबूला हो उठे और पैंथर खेतो की ओर भाग गया और वह भीड़ पैंथर के पीछे लग गई । उस भीड़ के हाथों में लाठी ,  कुल्हाड़ी वदांतली जैसी चीजे थी । जगदीश वहां पड़े – पड़े चिल्लाते रहे कि  “पैंथर को मत मारो पैंथर को मत मारो ”  पर वो भीड़ उसके पीछे भागती रही । पैंथर काफी आगे भाग गया था बाद में जगदीश को वहां से उठाकर जिप्सी से अस्पताल लाया गया जहां पर उनका लम्बा इलाज चला था ।

श्री जसकरण मीणा :-

वर्तमान में रेस्क्यू टीम रणथम्भौर में कार्यरत जसकरण मीणा का जन्म 1 मई 1968 को रणथम्भौर के नज़दीकी गांव सूरवाल में हुआ था । चार भाई-बहनों में सबसे बड़े जसकरण ने 10 वी की पढ़ाई गांव सूरवाल से ,उच्चमाध्यमिक शहर सवाईमाधोपुर व 1991-92  के सत्र में स्नातक की पढ़ाई सरकारी कॉलेज सवाईमाधोपुर से की हैं और  1987  में इनकी शादी हो गई थी । वर्तमान में इनके परिवार में एक बच्चा व एक बच्ची हैं जो पढाई कर रहे हैं । जसकरण वर्ष  1996  में राजस्थान होमगार्ड सिपाही के रूप में भर्ती हुए थे इस दौरान ये सवाईमाधोपुर स्थित मानटाउन पुलिस थाना,भारतीय खाध निगम कार्यालय, बाघ नियंत्रण कक्ष कलेक्ट्रेट व आकाशवाणी सवाईमाधोपुर में सिपाही पद पर सेवाएं दे चुके हैं। इसके पश्चात वर्ष  2011  में जसकरण राज्य होमगार्ड सेवा के ही माध्यम से रणथम्भौर बाघ अभ्यारण में पदस्थापन के तौर आए और तब से लेकर आज यहीं पर कार्यरत हैं। विशेषकर ये रेस्क्यू टीम में हैं जो कि , रणथम्भौर ही नही बल्कि इसके आसपास के ग्रामीण व शहरी क्षेत्र तथा सवाई माधोपुर के पडौसी जिलों तक भी वन्यजीव रेस्क्यू के लिए अपनी टीम के साथ जाते रहते हैं।

रेस्क्यू के दौरान ऐसे ही यह घटना के बारे में जसकरण बताते हैं कि , वहरदा चौकी क्षेत्र में एक भालू काफी समय से बीमार था व उसको ट्रेंकुलाइज के लिए प्रयास भी किए लेकिन हो नहीं सका।उपवन संरक्षक के आदेश पर बाद जसकरण और उनके साथी वहरदा क्षेत्र में पहुँचे , तो वहां पास में एक छोटी पहाड़ी पर भालू बैठा नजर आया। वहाँ पर ट्रैकिंग करने वाले फारेस्ट गार्ड ने भी सुचना दी कि वह तीन दिन से एक ही जगह बैठा था तथा उसमे चलने की क्षमता नही थी। उसकी कमज़ोर हालत को देखते हुए टीम ने भालू को ट्रेंकुलाइज कर ने की बजाय वैसे ही पकड़ ने की योजना बनाई ।

पूरी टीम भालू की ओर बढ़ी व सबसे आगे जसकरण थे । जब भालू और जसकरण के बीच सिर्फ पांच मीटर का फ़ासला तथा एक दम से भालू टीम की तरफ दौड़ा और सभी तेजी से भाग छुटे।जो साथी जसकरण से पीछे थे वे बहुत आगे निकल चुके थे और जसकरण पीछे रह गए।उनके पास लकड़ी का जेड़ा था लेकिन उन्होंने सोचा अगर इसके जेडे की पड़ी नहीं तो भालू उनको घायल कर देगा ।सभी भागते रहे लेकिन जैसे ही एक नाला आया तो आगे वाले दूसरी तरफ चले गए और जसकरण उनसे बिछुड़ गए।परिस्थिति कुछ ऐसी बन गई थी मानो भालू को जसकरण के अलावा और कोई नज़र नहीं आ रहा था और वो उनके पीछे पड गया तथा पकड़ भी लिया । भालू ने उनको ज़ख्मी कर दिया जिस में उनका एक पैर फैक्चर हो गया । बाद में उनके साथियों में से एक सदस्य ने बहादुरी दिखाते हुए जेडे की मदद से भालू परवार किया । टीम का कोई भी सदस्य कभी भी किसी जीव को नुक्सान पहुंचना नहीं चाहता था परन्तु उस समय जसकरण की जान बचाने के लिए यह कठोर कदम उठाना ही पड़ा । चोट लगते ही भालू जसकरण को छोड़कर  5-7  मीटर की दूरी पर जा बैठा बाद में सभी स्टाफ के साथी आ गए जो साथ मे गए थे उन्होंने जसकरण को उठाया व जिप्सी में बिठाकर अस्पताल ले गए । ऐसी ही एक घटना दर्रा वन्य जीव अभयारण्य कोटा की है जहां पर एक पैंथर वायर के फंदे में फंस गया था । सुचना मिलते ही पूरी टीम रेस्क्यू के लिए गई ।

इस रेस्क्यू में जस करण व राजवीर दोनों ही थे ।जब टीम वहां पहुंची तबतक भी वह पैंथर फंदे में फंसा हुआ ही था । राजवीर ने तुरंत बिना समय गवाय पैंथर को ट्रेंकुलाइज करने के लिए इंजेक्शन लगाया परन्तु जैसा सोचाथा वह नहीं हुआ। ट्रेंकुलाइज करने पर भी पैंथर परकुछ असर नहीं हुआ । पैंथर गुस्से में तो पहले से ही था और वह वायर को तोड़ते हुए सीधा टीम की तरफ दौड़ा और राजवीर के ऊपर से कूदकर पास के एक सरसों के खेत में जाकर बैठ गया।

बाद में टीम गाड़ी में सवार हुई और गाड़ी को सीधी सरसो के खेत मे अंदर ले गए तो जाकर देखा तो वह तब तक बेहोश हो चुका था। उसे गाड़ी में डालकर कोटा जुमेंलाकर छोड़ दिया तब जाकर यह रेस्क्यू सफल हो पाया।

इसी     प्रकार के कई रेस्क्यू ये टीम करती है तथा वन्य जीवों के प्राण बचाती है। टीम के चारों सदस्य एक दूसरे के साथ सामंजस्य बनाकर कार्य करते हैं व एक-दूसरे से रोज़ कुछ नया सीखते हैं। जैसे जसकरण और जगदीश कहते हैं कि , “रेस्क्यू टीम के इंचार्ज राजवीर सिंह से हमने रेस्क्यू के विभिन्न पहलु सीखे हैं “। तो दूसरी ओर ये सभी अपने बच्चों को वनविभाग में कार्य करते हुए देखना चाहते है। इन सभी का यह मानना है वनविभाग में भर्ती होने वाले सभी कर्मियों को वन्यजीवों के रेस्क्यू कि ट्रेनिंग मिलनी चाइये ताकि वे अपने स्तरपर छोटे-मोटे रेस्क्यू आराम से कर पाए।

हम इन सभी को इनके कार्यों के लिए शुभकामनाये देते हैं तथा आशा करते हैं कि अन्य लोगों को इनकी कहानी से काफी कुछ सिखने को मिलेगा।

Cover Photo credit: Dr. Dharmendra Khandal 

घर-घर औषधि योजना: आमजन के स्वास्थ्य के लिए सरकार की एक पहल

घर-घर औषधि योजना: आमजन के स्वास्थ्य के लिए सरकार की एक पहल

हाल ही में राजस्थान सरकार ने आमजन के स्वास्थ्य को सुरक्षित करने के लिए “घर-घर औषधि योजना” का प्रारम्भ किया है जिसके अंतर्गत औषधीय पौधों को आम जनता में निशुल्क वितरित किया जाएगा ताकि जब भी आमजन को इनकी आवश्यकता पड़े तो उन्हें ये आसानी से उपलब्ध हो सके। यह योजना आम जान में जैव विविधता के संरक्षण के लिए प्रेरणा का कार्य भी करेगी।  देखते हैं यह योजना किस प्रकार से प्रभावी होगी ?

राजस्थान के वन एवं वनों के सीमावर्ती क्षेत्र विभिन्न प्रकार की औषधीय प्रजातियों से संपन्न हैं। जिनका उपयोग आयुर्वेद तथा स्थानीय परम्परागत ज्ञान के अनुरूप स्वास्थ्य चिकित्सा के लिए होता आया है। वर्तमान में जब पूरा विश्व कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा है और ऐसे में भारत के घर-घर में आयुर्वेदिक दवाइयों, काढ़ो और जड़ीबूटियों का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है। प्रत्येक घर में लोग गिलोय व तुलसी जैसे औषधीय पौधों का काढ़ा बना कर या फिर बाजार से बने बनाये काढ़े खरीद कर सेवन कर रहे हैं ताकि वे कोरोना से बचने के लिए अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सके। इसीलिए राज्य सरकार ने ये योजना शुरू की है ताकि सभी घरों में ये औषधीय पौधे उपलब्ध हो और लोग इनका सेवन कर सके।

योजना को लागू करते समय सरकार द्वारा इसकी पूरी जानकारी व कई दिशा-निदेश जारी किए गए हैं जैसे कि, योजना कार्य कैसे करेगी और किस विभागीय स्तर पर क्या कार्य किया जाएगा साथ ही कुछ समितियां भी बनाई गई है ताकि योजना के कार्यभार को ठीक से नियंत्रित कर इसे सफल बनाया जा सके। परन्तु फिर भी योजना को लेकर आमजन और विशषज्ञों के मन में कई जिज्ञासाएं हैं और कुछ लोग इसकी सफलता व उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं।

आखिर क्या है घर-घर औषधि योजना:

घर-घर औषधि योजना के अंतर्गत वन-विभाग द्वारा औषधीय पौधों की पौधशालाएं विकसित कर तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा और कालमेघ के पौधे उगा कर आम जनता को दिए जाएंगे। आमजन को औषधीय पौधे आसानी से उपलब्ध कराना व उनको घरों में उगाने में मदद और पौधों की उपयोगिता के बारे में प्रचार-प्रसार कर जन चेतना को बढ़ा कर राजस्थान के निवासियों के स्वास्थ्य में सुधार करना इस योजना का मुख्य उद्देश्य है। इस पंच वर्षीय योजना (2021 -2022 से 2025 -2026 तक) का कुल बजट 210 करोड़ रुपए है जिसमें से 31.4 करोड़ रुपए पहले वर्ष में खर्च किए जाएंगे। इस योजना के तहत हर परिवार को चार औषधीय प्रजाति के पौधे “तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा और कालमेघ” के दो-दो पौधे (एक बार में कुल 8 पौधे) मिलेंगे और पांच साल में तीन बार तो, इस प्रकार हर परिवार को कुल 24 पौधे दिए जाएंगे।

पौधों का वितरण एवं योजना का प्रबंधन कैसे होगा ?

इस योजना को एक जन अभियान के रूप में संचालित किया जा रहा है और इसको अमल में लाने के लिए वन विभाग में HOFF और PCCF की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया है तथा जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में एक “जिला स्तरीय टास्क फाॅर्स” बनाई गई है जिसका कार्यकाल योजना अवधि तक होगा। जिसमें जिला प्रशासन के नेतृत्व में, माननीय जन-प्रतिनिधियों, पंचायती संस्थाओं, विभिन्न राजकीय विभागों व संस्थाओं, विद्यालयों आदि का सहयोग लेकर बड़े स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है।

जिला स्तरीय टास्क फाॅर्स विभिन्न तरह के कार्य करेगी जैसे कि, पौधों का वितरण, जन अभियान, योजना के लिए अतिरिक्त संसाधनों की व्यवस्था, नियमित प्रबोधन आदि।

प्रत्येक जिले में जिला स्तरीय कार्य योजना बनाई गई है जिसमें वितरण स्थानों का चयन, वितरण व्यवस्था, विभिन्न विभागों के सहयोग प्राप्त करने की व्यवस्था, प्रचार-प्रसार की रणनीति, अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था इत्यादि विषय सम्मिलित है।

उप वन संरक्षक के निर्देश अनुसार वन विभाग पौधशालाओं में इन पौधों को तैयार किया गया है और पौधों का वितरण वन विभाग की पौधशाला व अन्य स्थल जैसे चिकित्सालय या राजकीय कार्यालय पर उपलब्ध कराए जाएगे। पौधे लेने वालों परिवारों की आधार कार्ड जानकारी प्राप्त की जाएगी ताकि रिकॉर्ड रखे जा सके व मूल्याङ्कन में आसानी हो और साथ ही अगले वर्ष जिन परिवारों को पौधे दिए जाने हैं उनको चिन्हित करना आसान हो। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि, आकड़ों का यह कार्य इतना बड़ा हो जाएगा जिसको बनाये रखने के लिए एक अलग टीम की जरूरत पड़ेगी।

योजना के प्रचार प्रसार पर भी मुख्य ध्यान दिया जा रहा है जिसके लिए सबसे पहले वर्ष 2021 में वन महोत्सव की थीम “घर घर औषधि योजना” राखी गई और राज्य के सभी जिलों के वन मंडलों, रेंज, तहसीलों, पंचायतों शहरी निकायों में वन महोत्सव मनाया गया। स्थानीय निवासियों को पौधों के लाभ, प्रयोग और सार संभाल की जानकारी दी जा रही है तथा पोस्टर भी लगाए जा रहे हैं। राज्य स्तर पर मीडिया प्लान बना कर प्रचार के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग भी किया जा रहा है। कुछ लोगों का यह मानना है कि, सरकार इसके प्रचार खुद को अछूता नहीं रखना चाहती और इन सब कार्यों पर समय एवं मानव संसाधन खर्च होंगे।

इन पौधों से होने वाले लाभ:

आयुर्वेद में तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा और कालमेध जैसे औषधीय पौधों को इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए अच्छी औषधि बताया है। आइये जानते हैं इनके महत्व के बारे में :

1. तुलसी (Ocimum sanctum):

जिसे आमतौर पर तुलसी के रूप में जाना जाता है, लैमियासी परिवार का एक सुगंधित बारहमासी पौधा है। तुलसी के पारंपरिक उपयोग का भारत में एक लम्बा इतिहास है और बहुत रोगों से लड़ने की क्षमता होने के कारण इसे ‘क्वीन ऑफ हर्ब्स’ भी कहा जाता है।

तुलसी / Ocimum sanctum (फोटो: डॉ. दीप नारायण पाण्डेय)

फायदे: तुलसी को आयुर्वेद की प्राचीन संहिताओं चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता और ऋग्वेद जिनका समय कम से कम 3500-1600 ईसा पूर्व माना जाता है, में खांसी, श्वसन संबंधी विकार, विषाक्तता और गठिया के इलाज के लिये औषधि के रूप में वर्णित किया गया है। साथ ही आचार्य भावमिश्र ने भावप्रकाश के पुष्पवर्ग में तुलसी के गुणों का वर्णन किया है:

तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमञ्जरी।
अपेतराक्षसी गौरी भूतघ्नी देवदुन्दुभिः॥
तुलसी कटुका तिक्ता हृद्योष्णा दाहपित्तकृत्।
दीपनी कुष्ठकृच्छ्रास्रपार्श्वरुक्कफवातजित्।
शुक्ला कृष्णा च तुलसी गुणैस्तुल्या प्रकीर्तिता।

तुलसी पर हुए कई शोध बताते हैं कि, तुलसी का नियमित सेवन करने से सामान्य स्वास्थ्य, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, दैनिक जीवन के तनावों को कम करने, खांसी, अस्थमा, बुखार, गठिया, नेत्र रोग, अपच, उल्टी, पेट की परेशानियों, हृदय रोग, त्वचा रोग, गिंगिवाइटिस और मसूढ़ों की सूजन सहित कई अन्य बिमारियों में फायदा मिलता है। तुलसी में कफ एवं वात दोष को कम करने, पाचन शक्ति एवं भूख बढ़ाने और रक्त को शुद्ध करने वाले गुण भी होते हैं। (Cohen 2014, Jackson, 2018, Wong 2020, Maiti 2020)।

कैसे लें: तुलसी के पत्तों, जड़, तने और बीजों का औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है। इसके पत्तों को रोज सुबह खली पेट खा सकते हैं तथा इसके बीजों का चूर्ण बनाकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, तुलसी के पत्तों को कभी चबाना नहीं चाहिए बल्कि निगल लेना चाहिए। यदि निगने में मुश्किल होती है तो हाथ से उन पत्तों के छोटे टुकड़े कर लें या फिर पत्तों को गोल लपेटकर सिर्फ आगे के कृतंक दांतों से सिर्फ एक कट लगाकर निगल जाए। तुलसी के पत्ते को चाय की तरह उबालकर क्वाथ पीने सर्दी-जुकाम में फायदा होता है। वयस्क 3 – 5 पत्ते प्रतिदिन और बच्चे (3 साल से बड़े) 2- 3 पत्ते प्रतिदिन (Jackson, 2018)।

सावधानी: हालांकि वैसे तुलसी बिना किसी साइड इफेक्ट के कई चीजों में लाभकारी होती है, लेकिन इसके अत्यधिक सेवन से कुछ परेशानियां भी हो सकती हैं। इसीलिए इसे ध्यान से खाये जैसे कि, गर्म तासीर की होने के कारण तुलसी का अत्यधिक सेवन पेट में जलन पैदा कर सकता है। यदि किसी की कोई सर्जरी हुई है या होने वाली है तो तुलसी का सेवन नहीं करना चाहिए। तुलसी खून पतला करती है, जिसकी वजह से सर्जरी के दौरान या बाद में ब्लीडिंग का खतरा बढ़ सकता है। डायबिटीज़ की दवा खा रहे लोगों को तुलसी नहीं खानी चाहिए क्योंकि इससे ‘ब्लड शुगर’ लेवल कम होता है। तुलसी में पोटेशियम की मात्रा अधिक होने के कारण ‘लो ब्लड प्रेशर’ में इसे नहीं खाना चाहिए। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि, लंबे समय तक नियमित रूप से तुलसी के पत्तों का सेवन करने से यूजेनॉल (eugenol) की उपस्थिति के कारण लीवर और उसकी कोशिकाओं को नुकसान हो सकता है। इसलिए औषधि का सेवन सही मात्रा में करें। (TOI 2021, Indian.com 2021, Jackson, 2018)।

2. कालमेघ (Andrographis Paniculata):

कालमेघ एक गुणकारी औषधीय पौधा है जिसको हरा चिरायता नाम से भी जाना जाता है। इसमें एक प्रकार का क्षारीय तत्व एन्ड्रोग्राफोलाइडस और कालमेघिन पाया जाता है जिसके कारण इसका स्वाद बहुत ही कड़वा होता है।

कालमेघ / Andrographis Paniculata (फोटो: डॉ. दीप नारायण पाण्डेय)

फायदे: इसकी पत्तियों का उपयोग बुखार, पीलिया, मलेरिया, सिरदर्द, पेट के कीड़े, रक्तशोधक, विषनाशक, उच्च रक्तचाप, त्वचा रोग तथा अन्य पेट की बीमारियों में बहुत ही लाभकारी पाया गया है। सरसों के तेल में मिलाकार एक प्रकार का मलहम तैयार कर चर्म रोग जैसे दाद, खुजली इत्यादि दूर करने में बहुत उपयोगी होता है। इसकी जड़ का उपयोग भूख लगने वाली औषधि के रूप में भी होता है। (Kumar et al 2012, Balkrishan 2019, Sarah et al 2015)

आचार्य प्रियव्रत ने शपतपुष्पादी वर्ग में लिखा है की यह मुख्यतया तिक्त एवं कफ विपाका के गुणों से युक्त है।

कालमेघस्तुभूनिम्बो यवाकारफलस्तथा|
सुतिक्त: लघुरुक्षोष्ण कफपित्तपविनाशन:||    
द्वीपन:  स्वेदनो ज्ञेयः कृमिघ्न: पित्तसारकः|
यकृतरोगेक्रिमी कुष्ठेज्वरेचासौ प्रशस्यते||
 (पुष्पादि वर्ग, श्लोक-  १३५-१३६)

कैसे लें: दिनभर में एक चम्मच कालमेघ चूर्ण का सेवन किया जा सकता है। दिन में कालमेघ की ¼ टेबलस्पून या ½ टेबलस्पून की दो खुराक ले सकते हैं। इसके अलावा, कालमेघ की आठ से दस पत्तियों को एक कप पानी के साथ जूस बनाकर भी सेवन किया जा सकता है। इसकी पत्तियों के पेस्ट को घाव पर लगाया जा सकता है और पत्तियों का जूस बनाकर भी पी सकते हैं।

सावधानी: यदि कालमेघ का अत्यधिक मात्रा में सेवन किया जाए तो एलर्जी, सिरदर्द, थकान, गैस्ट्रिक समस्या, जी मचलाना, दस्त आदि शिकायते हो सकती हैं। दूसरी अंग्रेजी दवाओं के साथ इसेलेने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श ले। कालमेघ का अधिक सेवन लो बीपी और लो शुगर का कारण बन सकता है। इसलिए समय-समय पर बीपी और शुगर लेवल मॉनिटर करते रहें। गर्भावस्था और ब्रेस्टफीडिंग के दौरान कालमेघ का सेवन नहीं करें (Balkrishan 2019)।

3. गिलोय (Tinospora cordifolia):

गिलोय कभी न सूखने वाली एक बड़ी लता है। इसका तना देखने में रस्सी जैसा लगता है। इसके कोमल तने तथा शाखाओं से जडें निकलती हैं। इसके पत्ते कोमल तथा पान के आकार के और फल मटर के दाने जैसे होते हैं।

गिलोय / Tinospora cordifolia (फोटो: डॉ. दीप नारायण पाण्डेय)

गुडूची को अनेक बीमारियों के विरुद्ध प्रयोग किया जाता है। आचार्य भावमिश्र ने स्पष्ट किया है कि (भा.प्र.पू.ख. गुडुच्यादिवर्ग 6.8-10):

गुडूची कटुका तिक्ता स्वादुपाका रसायनी। संग्राहिणी कषायोष्णा लघ्वी बल्याऽग्निदीपिनी।।
दोष त्रयामतृड्दाहमेहकासांश्च पाण्डुताम्। कामला कुष्ठवातास्त्रज्वरक्रिमिवमीन्हरेत।। प्रमेहश्वासकासार्शः कृच्छ्रहृद्रोगवातनुत् ।

फायदे: गिलोय के मिस्रण और काढ़े द्वारा कई रोगों में फायदा मिलता है जैसे कि, टाइफाइड, वात, पित्त, कफ, पीलिया, साइनस, लीवर विकार, बुखार, गठिया, कब्ज, शुगर, डेंगू, चिकनगुनिया, उल्टी, साइन में जलन, एसिडिटी, त्वचा रोग, मुँह के छाले, यूरिनरी ट्रैक्ट से जुड़े रोग, फाइलेरियासिस और आंख से जुड़े तमाम रोग (saha & Ghosh 2012, Upadhyay et al 2010, Srivastava, 2020)                                        ।

कैसे लें: गिलोय को काढ़ा या फिर पत्तों के रस दोनों ही रूप में लिया जा सकता है। यदि कड़ा लेना है तो उसके तने के छोटे टुकड़ों को 100 मिली पानी में दाल कर उबाले और जब पानी 25 मिली रह जाए तब उसे पी लें। पत्तों का सीधा जूस बनाकर पिया जा सकता है। एक बार में केवल 20-30 मिली काढ़ा या फिर  20 मिली रस का सेवन करना चाहिए (Balkrishan 2019)।

सावधानी: गिलोय का सेवन यदि ज्यादा किया जाए तो इससे कब्ज और डायबटीज के रोगियों पर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं। इससे रोग प्रतिरोधक शमता अगर बहुत बढ़ जाए तो Autoimmune diseases भी हो सकती है साथ ही गर्भवती महिलायें इसका सेवन न करें।  (Balkrishan 2019, Gupta 2020)।

4. अश्वगंधा (Withania somnifera):

अश्वगंधा आयुर्वेद की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है। इसके वैज्ञानिक नाम में “somnifera” एक लैटिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “नींद लाने वाला”।

अश्वगंधा / Withania somnifera (फोटो: डॉ. दीप नारायण पाण्डेय)

फायदे: आयुर्वेद में अश्वगंधा के भी कई गुण बताए गए है। अश्वगंधा में एंटीऑक्सीडेंट, लीवर टॉनिक, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल के साथ-साथ और भी कई पोषक तत्व होते हैं जो स्वास्थ्य को बढ़ाने में मदद करते हैं। इसके अलावा इसमें एंटी-स्ट्रेस गुण भी होते है जो मानसिक तनाव जैसी गंभीर समस्या को ठीक करने में लाभदायक है और इससे अच्छी नींद आती है। स्ट्रेस को कम करने में मदद करते है। यह वाइट ब्लड सेल्स और रेड ब्लड सेल्स दोनों को बढ़ाने का काम करता है। जो कई गंभीर शारीरिक समस्याओं में लाभदायक है

गन्धान्ता   वाजिनामादिरश्वगंधा   हयाहर्या।  वराहकर्णी वरदा बलदा कुष्ठ्गंधिनी। 
अश्वगंधानिलरलेधमश्चित्र शौयज्ञयापहा। बज्या रसायनी तिक्ता कषायोष्णतिशूक्रला।। 
भावप्रकाश निघण्टु, श्लोक १८९-१९० के अनुसार अश्वगंधा में निम्न गुण है – मुख्यतया तासीर में गर्म एवं ताकत देने वाली है और पौरुष गुण को बढ़ने वाली है।   

कैसे लें : अश्‍वगंधा का इस्‍तेमाल अश्वगंधा के पत्‍ते या चूर्ण (Ashwagandha Powder) के रुप में किया जाता है। अश्वगंधा चूर्ण खाने का तरीका बहुत आसान है। पानी, शहद या फिर घी में मिलाकर अश्वगंधा चूर्ण का सेवन किया जा सकता है। इसके अलावा, अश्वगंधा कैप्सूल, अश्वगंधा चाय और अश्वगंधा का रस इस्तेमाल किया जा सकता है (Balkrishan 2019)।

सावधानी: अश्वगंधा का सेवन सीमित मात्रा में ही किया जाए तो अच्छा है क्योंकि अत्यधिक सेवन से न सिर्फ उल्टियां हो सकती हैं बल्कि पेट गड़बड़ हो सकता है। यदि लो ब्लड प्रेशर की परेशानी रहती है तो उन्हें अश्वगंधा नहीं खाना चाइये नहीं तो ब्लड प्रेशर बहुत ही ज्यादा लो हो जाएगा। नींद न आने पर अश्वगंधा का इस्तेमाल कुछ हद तक सही है, लेकिन नींद बुलाने के लिए इसका नियमित सेवन नुकसानदेह साबित हो सकता है। अश्वगंधा थाइरोइड को बढाता है अर्थात जिनको थाइरोइड की कमी की शिकायत है उनके लिए तो ये फायदेमंद है परन्तु जिन्हें पहले सेथाइरोइड ज्यादा है तो उनके लिए बहुत खतरनाक हो सकता है (Zielinski 2019 , Balkrishan 2019)

आमजन के कुछ प्रश्न व विशेषज्ञ की राय:

इस योजना को लेकर आमजन की तरफ से कई प्रश्न सामने आ रहे हैं तथा डॉ. दीप नारायण पाण्डेय, IFS (वरिष्ठ वन अधिकारी) द्वारा उन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास किया गया है।

प्रश्न 1 : कुछ पौधों को गार्डन या फ्लैट में गमलों में लगाने से इन पौधों का संरक्षण कैसे होगा?

उत्तर : आज हम उस युग में जी रहे हैं जब केवल वनों में संरक्षण करने से जैव-विविधता का संरक्षण नहीं हो सकता बल्कि हमें जैव-विविधता का संरक्षण वहीँ करना होगा जहां हम रहते और काम करते हैं। घर से वन तक सम्पूर्ण भू-परिदृश्य में जैव-विविधता संरक्षण जरुरी है। इसीलिए सबसे पहले हमें अपने घरों में पौधों को संरक्षित करना होगा।

दूसरी बात यह है कि, आयुर्वेद में उपयोग होने वाले लगभग 70-80 प्रतिशत औषधीय पौधे अभी भी वनों से प्राप्त होते हैं। यदि हम प्रत्येक घर में इन औषधीय पौधों को अपने उपयोग के लिये उगा लेते हैं तो स्वाभाविक है कि, वनों से इनका हनन हमें कम करना पड़ेगा और अप्रत्यक रूप से प्रजातियों का संरक्षण होगा।

प्रश्न 2 : केवल पौधे बाँट देने से क्या होगा?

उत्तर : दरअसल घर-घर औषधि योजना केवल पौधे बांटने की योजना नहीं है बल्कि स्वास्थ्य और संरक्षण से जुड़े उन विचारों को बांटने की भी योजना है जो औषधीय पौधों के योगदान को जन-मानस को समझाती है। एक उदाहरण देखें तो कोविड-19 की चिकित्सा के लिये अभी तक किसी भी चिकित्सा पद्धति में कोई पक्की तौर पर ज्ञात औषधि नहीं मिल सकी है। तथा, विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में औषधियों पर शोध व प्रयोग किए जा रहे है और स्वाभाविक है कि, आयुर्वेद में भी शोध और प्रयोग हो रहे है। कई शोधपत्रों से स्पष्ट हो जाता है कि, तुलसी, कालमेघ, अश्वगंधा और गिलोय रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और कुछ हद तक संक्रमित होने से बचाव भी करते हैं। तथा इन औषधियों का प्रयोग बीमारी की तीव्रता इतनी नहीं बढ़ने देता कि, व्यक्ति को अपनी जिंदगी ही गावनि पड़े।

प्रश्न 3 : घर-घर औषधि योजना के लिये तुलसी कालमेघ, अश्वगंधा और गिलोय ही क्यों चयनित किए गए?

उत्तर : यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। इस प्रश्न का उत्तर चार अलग-अलग दृष्टिकोण से समझा जा सकता है। पहला चयनित की गई चारों प्रजातियां अलग-अलग या एक दूसरे से विभिन्न अनुपातों में मिलकर अधिक से अधिक रोगों के विरुद्ध प्रभावी हो सकती हैं। दूसरा, इन चारों प्रजातियों के बारे में संहिताओं, समकालीन वैज्ञानिक शोध एवं चिकित्सा आधारित कई प्रमाण उपलब्ध है। तीसरा, इन प्रजातियों को एथनोमेडिसिन के रूप में भी जाना जाता है और पहले लोग वैद्य की सलाह से बड़ी ही सरलता से इनसे विभिन्न औषधि बना लेते थे। चौथा दृष्टिकोण चयनित प्रजातियों की जलवायुवीय आवश्यकताओं से संबंधित है जिनके आधार पर यह समझा जा सकता है कि इन प्रजातियों का राजस्थान में उगाया जा सकता है।

कालमेघ (फोटो: डॉ. दीप नारायण पाण्डेय)

आमजन के इन प्रश्नों के अलावा योजना और इसको अमल में लाने पर भी कई जिज्ञासाएं भी हैं जैसे की,

1. क्या कालमेघ आसानी से राजस्थान जैसे शुष्क व अर्ध-शुष्क पर्यावास में उग सकते हैं? क्योंकि कालमेघ नमी वाले क्षेत्र का पौधा है और इसलिए ये राजस्थान के सिर्फ कुछ जिलों में ही उग सकता है। साथ ही वन विभाग के नर्सरी कर्मचारियों को भी इसे उगाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है तो आमलोग इसे कैसे ऊगा पाएंगे?

2. नर्सरी में इन पौधों को उगाया गया है परन्तु बड़ी ही छोटी और नाजुक अवस्था वाले इन पौधों को सुरक्षित तरीके से वितरित कर हर घर तक पहुंचा पाना निश्चित ही एक मुश्किल कार्य होगा ?

3. योजना के तहत हर घर को यानी 12650000 परिवारों को पौधे वितरित किए जाएंगे। इतनी बड़ी जनसँख्या के हर घर तक पौधे पंहुचा पाना निश्चित ही बड़ा कार्य है जिसके लिए एक बड़ी टीम की आवश्यकता होगी।

4. जिला स्तरीय टास्क फाॅर्स के सदस्यों में पंचायती संस्थाएं, विभिन्न राजकीय विभाग और विद्यालय शामिल हैं। अब प्रश्न ये उठता है कि, जिन लोगों को ये कार्य दिए जाएंगे उनके लिए यह नियमित विभागीय कार्य के अलावा एक अतिरिक्त कार्य होगा और कर्मचारियों पर कार्यभार बढ़ जाएगा।

5. शुरुआत में लोग खुशी-खुशी पौधे ले तो जाएंगे और कुछ दिन ध्यान भी रख लेंगे परन्तु क्या हमेशा ध्यान रख पाएंगे ?

वैश्विक महामारी से निपटने के बाद में अर्थव्यवस्था को ग्रीन डेवलपमेंट की ओर ले जाना और पारिवारिक स्तर पर क्षमता बेहतर करना एक बड़ी प्राथमिकता होगी। विश्व भर की सरकारें महामारी से निपटने के बाद आने वाले समय में अपने आधारभूत ढांचे में भारी परिवर्तनों की घोषणा कर चुकी हैं। इस दिशा में सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय विकास के लिए तमाम योजनायें भी बन रही हैं और इनमें से कुछ तो शुरू भी हो चुकी है।

घर-घर औषधि योजना को राजस्थान में इस परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। महामारी काल में अमीर और गरीब दोनों ही प्रकार के परिवार महामारी का भयानक चेहरा देख चुके हैं। अतः परिवार के स्तर पर प्रत्येक गांव और शहर को रेसिलियंट बनाने तथा स्वास्थ्य आपदाओं से निपटने में सक्षम बनाने के लिये घर-घर औषधि योजना का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।

सन्देश यह है कि, घर-घर औषधि योजना मानव के स्वास्थ्य-रक्षण और जैव-विविधता के संरक्षण की दिशा में बहुत बड़ा कदम है। इसको सफल बनाने में प्रत्येक नागरिक का योगदान प्राप्त होगा, ऐसी आशा है।

राजस्थानी लहजे में एक विद्वान कहते है -गुडूची, कालमेघ अश्वगंधा और तुलसी जैसे पौधे पहले अपने माथे में उगाइये, मिट्टी में तो उग ही जायेंगे।
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वन्यजीवों की सेवा के लिए मैं हूँ, सदैव तत्पर

वन्यजीवों की सेवा के लिए मैं हूँ, सदैव तत्पर

“आइये जानते हैं श्री सोहनराम जाट के बारे में, एक ऐसे वनरक्षक के बारे में जिन्हें अपने परिवार से ज्यादा प्यारे हैं वन्यजीव और जो 365 दिन रहते हैं ऑन ड्यूटी…”

राजस्थान के चुरू जिले के सुजानगढ़ तहसील के छापर गांव में स्थित है “ताल छापर अभयारण्य”, जो खासतौर से अपने काले हिरणों और अलग-अलग प्रकार के खूबसूरत पक्षियों के लिए जाना जाता है। अभयारण्य का नाम इसी छापर गांव के नाम पर रखा गया है। काले हिरणों और देश-विदेश से आए पक्षियों को देखने के लिए यहां पूरे वर्ष ही पर्यटकों का जमावड़ा लगा रहता है। इसी ताल छापर अभयारण्य में पिछले 21 साल से एक वनरक्षक (फारेस्ट गार्ड) प्रकृति व वन्यजीवों के बीच में घुलमिलकर एक परिवार की तरह जीवन यापन कर रहा है।

गांव से 30 किलोमीटर की दूरी पर स्थित अपने भरे पूरे परिवार व सुख सुविधाओं को छोड़कर प्रकृति व वन्यजीवों के मोह ने उन्हें जंगल की हरी-भरी घास व प्राकृतिक छटाओ के बीच रहने को मजबूर कर रखा है। जंगल की रक्षा के लिए रोज मीलों दूर पेट्रोलिंग करना वर्तमान समय के अनुसार एक कठिन चुनौती तो है लेकिन, उनका शौक ही यही है कि, ये हमेशा 24 घंटे घूमते रहे। ये अपने परिवार से मिलने के लिए महीने में एक बार जाते हैं जिसमें भी शाम को जाते हैं और सुबह वाली बस में बैठकर अभयारण्य वापिस लौट आते हैं।

ताल छापर अभयारण्य”, जो खासतौर से अपने काले हिरणों और अलग-अलग प्रकार के खूबसूरत पक्षियों के लिए जाना जाता है। (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल )

इनके बारे में स्टाफ के साथी व संबंधित अधिकारी भी बताते हैं कि, घर पर भले ही ये किसी जरूरी काम में व्यस्त ही क्यूँ न हो लेकिन, विभाग से कोई जरूरी सूचना आती है तो ये घरेलू कार्य को छोड़कर तुरन्त अभयारण्य पहुँच जाते है। कभी-कभार बीच में ऐसा भी हुआ है कि, ये कार्य से कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अपने घर जा रहे थे और इन्हें सुचना मिली कि, विभाग में कुछ जरुरी कार्य आया है तो तुरंत आधे रस्ते में ही बस से उतर एवं दूसरी बस में बैठ कर वापस आ जाते थे। यानी घर, परिवार, गांव व रिश्तेदार आदि से कहि गुना अधिक इन्हें प्रकृति व उसमें बस रहे जीवों से प्रेम है। दिन-रात उनकी सेवा में कभी पैदल तो कभी साइकिल से गस्त करना इनकी रोज़ की दिनचर्या है।

ऐसे कर्मठशील, प्रकृति व वन्यजीव प्रेमी वनरक्षक का नाम है “सोहनराम जाट”। जो कि पिछले 21 वर्षों से ऑफिस रेंज ताल छापर चुरू में तैनात है। सोहनराम का जन्म 1 जुलाई 1966 को चुरू जिले की सुजानगढ़ अब बिंदासर तहसील के सांडवा-भोमपुरा गांव के एक किसान परिवार में हुआ। उस समय मे कम उम्र में ही शादी का प्रचलन था तथा परिवार द्वारा इनका भी विवाह जल्दी ही करवा दिया गया। इनकी धर्मपत्नी “पतासी देवी” एक ग्रहणी है। इनके परिवार में तीन बेटा व एक बेटी है और इनका बड़ा बेटा विदेश में एक कम्पनी में नौकरी करता है बाकी बच्चे अभी पढ़ाई कर रहे हैं।

सोहनराम बताते है कि, बचपन में इनको खुद को पढाई से इतना लगाव नहीं था, पिताजी खेतीबाड़ी करते थे तो ये भी खेती के कार्यो में पिताजी का हाथ बंटाते थे।

गांव के पास स्थित एक पौधशाला में शाम के वक्त ये रोज़ जाया करते थे तो वहां पर मौजूद वनपाल ने इन्हें पौधशाला में काम करने के लिए कहा और भरोसा भी दिलाया कि, समयनुसार कभी नियमित भी हो जाओगे। सोहनराम जिस तरह घरेलू कार्यो में जुटते थे उसी तरह इन्होंने पौधशाला में काम की जिम्मेदारी भी ले ली। इनकी मेहनत के चलते दो साल बाद इन्हें वनकर्मी के रूप में नियमित नियुक्ति पत्र मिल गया।

पढाई में महज साक्षर होने के बावजूद इन्होंने वन व वन्यजीवों के महत्व को वन्यप्रेमी गहनता से समझा और चार साल गाव में स्थित पौधशाला में नौकरी करने के बाद इनका पदस्थापन रेंज ऑफिस ताल छापर चूरू में हो गया और पिछले 21 साल से अभी यहीं पर तैनात हैं।

वनविभाग में आने के बाद से लेकर आज तक सोहनराम का जीवन पूरी तरह से वन सेवा में समर्पित है और आज 55 साल की उम्र में भी उनके काम करने के हौसले व जज्बात दोगुनी हिम्मत के साथ बरकरार हैं।

वन्यजीवों को प्राथमिक उपचार देते हुए सोहनराम जाट

वर्ष 2009 और 2010 में आए भीषण चक्रवात से छापर ताल में वन सम्पदा व वन्यप्राणियों को काफी नुकसान उठाना पड़ा था। उस समय सोहनराम के लिए सैंकड़ो की संख्या में जीव जंतुओं की हानि एवं घायल होने का मंजर उनके जीवन का एक मुश्किल दौर था और इतना मुश्किल कि, उस पल को याद करके तो काफी दुःख होता है। उस परिस्थिति में लम्बे समय तक सोहनराम वन्यजीवों को बचाने व सुरक्षित स्थानों पर पहुचाने में लगे रहते थे और आठ से दस दिन तक लगातार जंगल में रहकर भोजन मिला तो खा लिया नही मिला तो नही ही सही लेकिन उस समय जितना हो सका वन्यप्राणियों को बचाया। सोहनराम के साथी बताते हैं कि, लगातार कई दिनों तक पानी में काम करने की वह से उनके पैरों में खड्डे पड़ गए थे परन्तु फिर भी सोहन सिंह पैरों पर कपडे की पट्टी बाँध कर दिन रात वन्यजीवों को बचाने में लगे रहे।

श्री सोहनराम जाट लगभग 24 घंटे सतर्क रहते हैं और अभ्यारण्य के आसपास गश्त करते हैं।

सोहनराम बताते हैं कि, ताल छापर अभयारण्य के आसपास बावरिया समाज के लोगों के कुछ ठिकाने हैं और यही लोग कई बार वन्यजीवों के शिकार की घटनाओं को अंजाम देते हैं। ऐसी परिस्थिति में सोहनराम अपने दिन के अधिकत्तर समय गश्त करते रहते हैं और लगभग 24 घंटे सतर्क रहते हैं। वे बताते हैं की गश्त के समय ये अवैध गतिविधियों की खोज खबर निगरानी के लिए इधर-उधर घूमते रहते हैं। और ऐसे ही एक बार इन्हें अभयारण्य से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित कुम्हारों की ढाणी से सूचना मिली कि, तीन बावरिया समाज के लोगों ने हिरन का शिकार करा है। सुचना मिलते ही विभाग वालों ने एक टीम गठित की और एक निजी वाहन के साथ पुलिस को सूचना देकर अतिरिक्त जाब्ता भी मंगवाया। सोहनराम और उनकी टीम वहाँ से रवाना हुए और करीब साढ़े तीन घण्टे की मशक्कत के बाद वो शिकारी उनके हाथ लगे। उन शिकारियों के पास से एक मृत चिंकारा व लोमड़ी बरामद हुई। शिकारियों को तुरंत गिरफ्तार कर लिया गया व जांच पूरी होने के बाद उनको जेल भी हुई।

पकड़े गए शिकारियों के साथ सोहनराम जाट और उनकी टीम

एक बार ऐसी ही एक घटना अभयारण्य से 30 किलोमीटर दूर स्थित गांव के एक विशेष समाज के लोगों द्वारा की गई। ये लोग पहले भी कई शिकार की घटनाओं को अंजाम दे चुके थे। लेकिन गांव में किसी को गिरफ्तार करना या फिर पूछताछ करना एक चुनौती भरा कार्य था। ऐसे में परिस्थिति को समझते हुए सोहनराम ने अपने विभाग को और फिर पुलिस को सूचित किया। वन विभाग की टीम जैसे ही उस गाँव में पहुंची तो लोगों की भीड़ जमा हो गई और तभी पुलिस की टीम भी वहां आ पहुँची। तुरंत शिकारियों को गिरफ्तार किया व उनके पास एक चिंकारा और लोमड़ी की खाल बरामद हुई, साथ ही चार बन्दूक व तीन तलवारें भी जब्त की गई। पुलिस कार्यवाही के बाद उन लोगो को जेल भी हुई।

सोहनराम बताते हैं कि, अभयारण्य के आस-पास काफी संख्या आवारा कुत्ते घूमते रहते हैं जो वन्यप्राणियों को भी नुकसान पहुंचाते हैं क्योंकि ये कुत्ते 4 -5 के छोटे समूह में एक साथ एक हिरन पर हमला कर उसे घायल कर मार देते हैं। ऐसे में वन्य प्राणियों से उनकी सुरक्षा करना भी एक चुनौती हैं सोहनराम लगातार उनको सुरक्षा देने में लगे रहते हैं साथ घायल हिरणों का उपचार करके उसको सुरक्षित स्थान पर छोड़ देते हैं। सोहनराम बताते हैं कि, पहले वे जानवर के घायल होने पर डॉक्टर को बुलाते थे परन्तु धीरे-धीरे उन्होंने खुद घायल जानवरों का चोट-मोटा इलाज करना सीख लिया और अब वे खुद ही सभी जानवरों का इलाज करते हैं और अब तक ये कुल 300 हिरणों को बचा चुके हैं।

सोहनराम बताते हैं कि, तालछापर अभयारण्य के आसपास में काफी सारे गांव बसे हुए हैं और गांव में बसे हुए लोगों का वन्यजीवों व वनों से काफी लगाव है। उनसे विभाग वालों का भी काफी अच्छा तालमेल रहता है और वे विभाग के कार्य का पूर्ण रुप से समर्थन करते हैं। इसके चलते यहां पर अवैध चराई पर अवैध कटाई की घटनाएं बिल्कुल नहीं है और मैं भी पूर्ण जिम्मेदारी के साथ अपने कर्तव्य को निभाने की कोशिश करता रहता हूँ। मैं वर्ष के 365 में से 345-50 दिन तालछापर को देता हूँ और मेरा मन मेरे परिवार से ज्यादा तालछापर के लिए समर्पित है और मैं चाहता हूं कि, मेरे सेवाकाल के बाकी के 5 साल भी इसी तरह से वन सेवा में समर्पित रहे।

आज हमारे वन विभाग को सोहनराम जैसे और निष्ठावान कर्मियों की जरूरत है जो सदैव तत्पर रहकर वन्यजीवों के संरक्षण के लिए कार्य करें। हम सोहन सिंह के कार्य एवं जज्बे की सराहना करते हैं और आशा करते हैं कि, नए आने वाले नौजवान वन कर्मी उनसे बहुत कुछ सीखेंगे।

प्रस्तावित कर्ता: श्री सूरत सिंह पूनिया (Member of state wildlife board Rajasthan)
लेखक:

Shivprakash Gurjar (L) is a Post Graduate in Sociology, he has an interest in wildlife conservation and use to write about various conservation issues.

Meenu Dhakad (R) has worked with Tiger Watch as a conservation biologist after completing her Master’s degree in the conservation of biodiversity. She is passionately involved with conservation education, research, and community in the Ranthambhore to conserve wildlife. She has been part of various research projects of Rajasthan Forest Department.

कैमरा ट्रैपिंग के माहिर वनरक्षक: भैराराम बिश्नोई

कैमरा ट्रैपिंग के माहिर वनरक्षक: भैराराम बिश्नोई

“भैराराम, एक ऐसे वनरक्षक जिन्हें कैमरा ट्रैपिंग कर वन्यजीवों की गतिविधियों की निगरानी करने तथा स्कूली छात्रों को वन्यजीवों के बारे में जागरूक करने में है अटूट रूचि”।

अप्रैल 2020 में, जब पूरा विश्व कोरोना से लड़ रहा था, उस समय भी हमारे वनकर्मी अपनी पूर्ण निष्ठा के साथ वन्यजीवों के संरक्षण में लगे हुए थे। और उस समय एक ऐसी घटना हुई जिसने राजस्थान के कई वन्यजीव प्रेमियों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया।

एक मादा बघेरा (leopard) ने आबादी गाँव के एक सुने घर में तीन बच्चों को जन्म दिया और रोज़ वहां आने-जाने लगी क्योंकि, वह घर गाँव के बाहर एक नाले के पास स्थित था और नाले के दूसरी तरफ जंगल था। उस सुने घर के आसपास खेत थे और इसी वजह से बघेरे के लिए वहाँ आना-जाना कोई मुश्किल नहीं था। एक रात गाँव के किसी व्यक्ति ने मादा बघेरा को उस घर में घुसते हुए देखा और सुबह होते ही उसने यह बात गांव के लोगों को बताई। जैसे ही गांव के लोग उस घर पर पहुँचे तो उन्होंने देखा वहां बघेरे के तीन बच्चे सो रहे थे और मादा वहां नहीं थी। गाँव वालों ने तुरंत वन विभाग को बताया विभाग ने एक वन रक्षक के साथ दो और गार्ड वहाँ भेजे तो वहाँ पर मौजूद ग्रामीण उनसे बहस करने लगे कि, ” इन बच्चों की माँ तो यहाँ हैं ही नहीं इनको यहाँ से हटाओ”।

ऐसी स्थिति वन विभाग के कर्मियों के सामने हमेशा चुनौती पूर्ण होती हैं जिसमें ग्रामीणों के साथ सामंजस्य भी जरूरी हैं तो उस वन्यजीव व उसके बच्चों का संरक्षण भी बहुत जरूरी हैं इसलिए ऐसे समय में धैर्य की जरूरत होती हैं।

कैमरा ट्रैप लगाते हुए वनरक्षक

वहाँ पर मौजूद उस वनरक्षक के द्वारा योजनाबद्ध तरीके से इस कार्य को अंजाम दिया गया। पहले कैमरा ट्रैप की मदद से देखा कि, माँ आती है या नहीं? पहली रात बघेरा माँ आयी और तीन बच्चों में से एक को ले गयी अगली सुबह उस वनरक्षक ने कैमरा ट्रैप की फोटो गाँव वालों को दिखाई तो गांव वाले भी सहमत थे कि, ये बारी-बारी से अपने बच्चों को सुरक्षित जगह पर ले जाएगी। उस रात फिर कैमरा लगाया माँ आयी और एक बच्चे को ले गयी।

अपने बच्चे को लेजाती हुई बघेरा माँ

अपने बच्चे को लेजाती हुई बघेरा माँ

परन्तु तीसरी रात माँ आयी ही नहीं। तो उस वनरक्षक ने दो और दिन इंतज़ार करने का सोचा और उसने किसी पशु चिकित्सक की सलाह के अनुसार उस शावक की देख-रेख करी। दो दिन बाद माँ वहां आयी और उस आखरी बच्चे को भी ले गयी। इस पूरी घटना के समय 6 दिनों तक वह वनरक्षक उसी गाँव में एक मंदिर में रहा, रोज़ रात कैमरा ट्रैप लगाना, उन शावकों व ग्रामीणों की निगरानी भी जरूरी थी क्योंकि आबादी क्षेत्र से सटे हुए उस घर में खतरा यही थी कि, कहीं अचानक ग्रामीण आ जाए और वह मादा बघेरा उन पर हमला न कर दे। परन्तु इस कठिन परिस्थिति में भी उस वनरक्षक ने अपनी सूझबूझ और बहादुरी से काम लिया।

शावक को दूध पीलाते हुए वनरक्षक

तो ऐसे चुनौती पुर्ण कार्य को अंजाम देने वाले मेहनती वन रक्षक है “भैराराम बिश्नोई”, जो वर्तमान में कुम्भलगढ़ अभयारण्य (राजसमन्द डिवीज़न) में वनरक्षक (Forest Guard) के पद पर तैनात हैं।

भैराराम बताते हैं कि, उन्हें कैमरा ट्रैपिंग करना और वन्यजीवों की मॉनिटरिंग करना बहुत पसंद है। कैमरा ट्रैपिंग से इन्होने वन्यजीवों के कई ख़ास पलों को दर्ज़ किया है जिन्हें दिन में यूँ देख पाना मुश्किल होता है। इतने वर्षों की अपनी कार्यसेवा के दौरान कई बार भैराराम ने न सिर्फ मुश्किल बल्कि खतरनाक कार्यवाहियों में भी बड़ी सूझ-बुझ से भूमिका निभाई है।

“भैराराम बिश्नोई”, वर्तमान में कुम्भलगढ़ अभयारण्य (राजसमन्द डिवीज़न) में वनरक्षकके पद पर तैनात हैं।

“मारवाड़ की मरूगंगा” लूणी नदी के किनारे बसे छोटे से गांव काकाणी के किसान परिवार में जन्मे भैराराम बिश्नोई वनरक्षक में भर्ती होकर वर्तमान में वन संपदा व जीव जंतुओं के प्रति सजगतापूर्वक कार्य कर रहे हैं। काकाणी गांव विश्नोई बहुल हैं जो हैंड प्रिंटिंग और नक्काशीदार मिट्टी के बर्तनों के लिए प्रसिद्ध है। यहां के लोग प्रकृति में मौजूद सभी जीव जंतुओं के लिए जागरूक हैं और इनकी रक्षा के लिए जान तक कुर्बान करने के लिए तैयार हो जाते हैं। बिश्नोई बहुल इस गांव में पेड़ काटना पूर्ण रूप से प्रतिबंधित है। वन विभाग में आने से पहले भैराराम वन एवं वन्यजीवों की विशेषताओं से अनभिज्ञ थे और गांव के आसपास के क्षेत्र के अन्य युवाओं में भी वनों के प्रति कार्य करने की इच्छा शक्ति नही थी तथा ये खुद भी अपने जीवन को सुगम बनाने के लिए प्रयासरत थे।

वतर्मान में 35 वर्षीय, भैराराम की स्कूली शिक्षा गाँव में ही हुई और स्नातक की पढ़ाई के लिए ये जय नारायण व्यास विश्विद्यालय, जोधपुर चले गए। अध्ययन के समय अध्यापक व पुलिस बनने का हुनर इन्हें दिन रात सोने नही देता था, लेकिन उससे पहले वर्ष 2013 की वनरक्षक भर्ती प्रतियोगी परीक्षा में इनको सफलता मिली तो आज प्रकर्ति के रहस्य को भलीभांति लोगों के बीच मे प्रसारित करना व वनों के प्रति लोगों को प्रेरित करना इनकी कार्यशैली का मुख्यरूप से मजबूत हिस्सा है। पर्यावरण संरक्षण एवं वन्यजीवों के उत्थान में इनका अहम योगदान हैं वन्यजीवों के बारे में विस्तृत अध्ययन करने के उपरांत ये आलेख तैयार कर लोगों के बीच जागरूकता कार्यक्रम भी चलाते हैं ताकि आमजन भी वन वनस्पति और वन्यजीवों की विशेषताओं से परिचित हो सके तथा उनके संरक्षण में अपनी भागीदारी निभा सके।

भैराराम बताते हैं कि, अभयारण्य के आसपास कई गाँव स्थित हैं और ये लोग विभिन्न कारणों जैसे जलाऊ लकड़ी, जड़बुटियाँ और पेड़ों से गोंद निकालने के लिए वन क्षेत्र के अंदर घुस आते हैं। राजस्थान सरकार द्वारा किसी भी संरक्षित क्षेत्र में पेड़ों से गोंद निकालना एक गैर कानूनी कार्य है परन्तु फिर भी कुछ समुदायों के लोग अवैध रूप से अभयारण्य में घुस आते हैं और “सालार (Boswellia serrata)” का गोंद निकालते हैं। ये लोग पेड़ के तने पर चीरा लगा देते हैं और जब 10 से 12 दिनों में गोंद इक्कठा हो जाता है तो उसे निकाल कर ले जाते हैं।

एक रोज़ भैराराम और उनके साथी गस्त के लिए निकले तो उन्हें एक कैंप मिला जहाँ 15 से 20 गोंद निकालने वाले लोग रह रहे थे। उनकी ज्यादा संख्या को समझते हुए भैराराम वहां से वापिस आ गए और अपने वरिष्ठ अधिकारियों व साथियों से चर्चा कर योजना बनाई। अगले रोज विभाग की 17 लोगों की एक टीम रात को वहां उनके कैंप पर पहुंची और मुज़रिमों को दोनों तरफ से घेर लिया। जब घेरा गया तो एक तरफ कम गहरी खाई थी और वो सभी लोग उस खाई में कूद गए और केवल एक मुजरिम ही हाथ लग पाया। परन्तु उनके ठिकाने की तलाशी लेने पर उनके पास से बन्दुक, छर्रे, चाक़ू और कुछ मीट बरामद हुआ। लैब से जांच करवाने पर मालूम हुआ की वह सांबर का मीट था। अभी उस मुजरिम पर क़ानूनी कार्यवाही चल रही है।

कैमरा ट्रैपिंग के अलावा भैराराम वन्यजीवों को रेस्क्यू करने में भी निपुण हैं और आज तक इन्होने 5 लेपर्ड, 50-60 मगरमच्छ, 100 अजगर और कुछ अन्य जीव रेस्क्यू किये हैं।

भैराराम बताते हैं कि, एक बार उन्होंने 100 फ़ीट गहरे कुए से मगरमच्छ को बाहर निकाला था। गुराभोप सिंह नामक इनकी बीट के पास एक गाँव में एक छोटा कुआ था, जिसमें हर वर्ष बारिश के दौरान पानी भर जाता था। इसी दौरान एक मगरमच्छ उस कुए में रहने लग गया। दिन के कुछ समय वह बाहर रहता और आसपास हलचल होते ही तुरंत कुए के अंदर चला जाता था। परन्तु कुछ दिन बाद जैसे पानी सूखने लगा वह मगरमच्छ उस कुए में ही रह गया। तब फिर गाँव के लोगों ने भैराराम को बुलाया। भैराराम अपनी टीम के साथ घटना स्थल पर पहुंचे और इन्होने तुरंत बिजली से चलने वाले मोटर मंगवा कर कुए का सारा पानी बाहर निकाला। तब उपकरणों की कमी होने के कारण इनके साथी कुए में जाने से डर रहे थे परन्तु तभी भैराराम ने कुए के अंदर जाने का फैसला किया। भैराराम और उनके एक साथी ने उस सौ फ़ीट गहरे कुए में जाकर मगरमच्छ को बाहर निकाला।

एक बार ऐसी घटना भी हुई कि, अभयारण्य के पास एक एन्क्लोज़र था जहाँ पेड़ पौधे उगे हुए थे और काम करने वाले कई मज़दूर वहां आया करते थे। वहां अक्सर एक मादा भालू अपने दो छोटे बच्चों के साथ घुमा करती थी जिन्हें लोग देखा करते थे तथा उनके लिए वह एक साधारण सी बात बन गई थी। फिर एक दिन एक बच्चा गाँव के पास चला गया और एक नाले में गिर गया। सुबह के समय मज़दूरों ने उसको देखा और सोचा की आसपास माँ होगी अभी चला जाएगा। परन्तु वो बच्चा शाम तक भी वही बैठा रहा और यह स्थिति देख लोगो ने भैराराम को बुलाया। भैराराम और उनकी टीम ने उस बच्चे को नाले से निकाल कर वापिस एन्क्लोज़र के पास छोड़ दिया तथा कुछ रोज़ तक लगातार एन्क्लोज़र के आसपास कैमरा ट्रैप लगाया और पाया की दोनों बच्चे अपनी माँ के साथ ठीक हैं।

पैंगोलिन को रेस्क्यू करते हुए भैराराम

भैराराम बताते हैं कि,एक बार अभयारण्य के पास स्थित एक गाँव में कुछ लोगों ने पैंगोलिन को मगरमच्छ का बच्चा समझ कर तालाब में डाल दिया था और जब पैंगोलिन बार-बार बाहर आने की कोशिश कर रहा था तो उसे डंडे से मार-मार कर जान से मार दिया। इस घटना के बाद भैराराम ने गाँव वालों को इसके बारे में जागरूक किया। जिसके बाद दोबारा जब पैंगोलिन गाँव के लोगों को मिला तो उन्होंने तुरंत विभाग वालो को सूचित किया और पैंगोलिन को रेस्क्यू कर वापिस अभ्यारण्य में छोड़ दिया गया।

समय के साथ-साथ भैराराम ने नई-नई चीजे सीखने में भी बहुत रुचि दिखाई है जैसे की उन्होंने खुद का निजि कैमरा खरीद कर अभयारण्य में और उसके आसपास के क्षेत्र में घूम कर वन्यजीवों की फोटोग्राफी तथा पक्षियों की पहचान के बारे में सीखा।

ज़मीनी स्तर पर वन्यजीवों के लिए काम करने के अलावा भैराराम शिक्षक होने में भी रूचि रखते हैं। इसके लिए हर वर्ष जब वन्यजीव सप्ताह में अभयारण्य के पास स्थित विद्यालयों के बच्चों को अभयारण्य लाया जाता है तो भैराराम उनको वन और वन्यजीवों के महत्त्व के बारे में समझाते एवं उनको जागरूक करते हैं। इसके अलावा भी कई बार भैराराम आसपास के स्कूलों में जाकर बच्चों को वन्यजीवों के बारे में पढ़ाते हैं।

भैराराम की कड़ी मेहनत को देखते हुए आज सभी वन अधिकारी उनकी प्रसंशा करते हैं

वन्यजीवों के प्रति इनके कार्य व ग्रामीण लोगों में जागरूकता फैलाने के लिए इनको जिला स्तर पर सम्मानित भी किया गया है। इसके अलावा भैराराम को क्रिकेट खेलने का विशेष शौक है तथा पिछले दो वर्षों से All India Forest National games में वन विभाग की टीम की तरफ क्रिकेट खेल रहे हैं और छ बार मैन ऑफ़ द मैच बन चुके हैं।

भैराराम मानते हैं कि, अभयारण्य में वर्षा ऋतू में दिन प्रतिदिन मगरमच्छ और अजगर बाहर निकल आते हैं तथा आसपास स्थित खेत, घर या फार्महाउस में पहुँच जाते हैं। मुश्किल यह है कि, इन सबको रेस्क्यू करने के लिए इनकी टीम के पास सिर्फ रस्सी ही है और ऐसे जानवरों को पकड़ने के लिए विभाग के पास नई तकनीक के उपकरण (equipment) होने चाइये।

इनके अनुसार वन क्षेत्र में कार्य करने वाले सभी कर्मियों को कैमरा ट्रैपिंग और वन्यजीवों के रेस्क्यू के बारे में पूरी ट्रेनिंग देनी चाहिए, क्योंकि यही एकमात्र विधि है जिसके कारण वन्यजीवों को बिना परेशान किये हम उनकी निगरानी कर सकते हैं तथा मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम कर सकते हैं। साथ ही हर संरक्षित क्षेत्र के आसपास स्थित ग्रामीण लोगों को वन्यजीवों व उनके महत्त्व के बारे में जागरूक करना चाइये तथा किस प्रकार वे संरक्षण में विभाग कि मदद कर सकते है उसके लिए भी उनको सूचित करना चाहिए।

प्रस्तावित कर्ता: श्री राहुल भटनागर (सेवा निवृत मुख्य वन संरक्षक, कुम्भलगढ़ अभयारण्य), डॉ सतीश कुमार शर्मा (सेवा निवृत सहायक वन संरक्षक उदयपुर)
लेखक: 

Meenu Dhakad (L) has worked with Tiger Watch as a conservation biologist after completing her Master’s degree in the conservation of biodiversity. She is passionately involved with conservation education, research, and community in the Ranthambhore to conserve wildlife. She has been part of various research projects of Rajasthan Forest Department.

Shivprakash Gurjar (R) is a Post Graduate in Sociology, he has an interest in wildlife conservation and use to write about various conservation issues.