हाल ही में राजस्थान सरकार ने आमजन के स्वास्थ्य को सुरक्षित करने के लिए “घर-घर औषधि योजना” का प्रारम्भ किया है जिसके अंतर्गत औषधीय पौधों को आम जनता में निशुल्क वितरित किया जाएगा ताकि जब भी आमजन को इनकी आवश्यकता पड़े तो उन्हें ये आसानी से उपलब्ध हो सके। यह योजना आम जान में जैव विविधता के संरक्षण के लिए प्रेरणा का कार्य भी करेगी।  देखते हैं यह योजना किस प्रकार से प्रभावी होगी ?

राजस्थान के वन एवं वनों के सीमावर्ती क्षेत्र विभिन्न प्रकार की औषधीय प्रजातियों से संपन्न हैं। जिनका उपयोग आयुर्वेद तथा स्थानीय परम्परागत ज्ञान के अनुरूप स्वास्थ्य चिकित्सा के लिए होता आया है। वर्तमान में जब पूरा विश्व कोरोना जैसी महामारी से जूझ रहा है और ऐसे में भारत के घर-घर में आयुर्वेदिक दवाइयों, काढ़ो और जड़ीबूटियों का इस्तेमाल काफी बढ़ गया है। प्रत्येक घर में लोग गिलोय व तुलसी जैसे औषधीय पौधों का काढ़ा बना कर या फिर बाजार से बने बनाये काढ़े खरीद कर सेवन कर रहे हैं ताकि वे कोरोना से बचने के लिए अपनी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा सके। इसीलिए राज्य सरकार ने ये योजना शुरू की है ताकि सभी घरों में ये औषधीय पौधे उपलब्ध हो और लोग इनका सेवन कर सके।

योजना को लागू करते समय सरकार द्वारा इसकी पूरी जानकारी व कई दिशा-निदेश जारी किए गए हैं जैसे कि, योजना कार्य कैसे करेगी और किस विभागीय स्तर पर क्या कार्य किया जाएगा साथ ही कुछ समितियां भी बनाई गई है ताकि योजना के कार्यभार को ठीक से नियंत्रित कर इसे सफल बनाया जा सके। परन्तु फिर भी योजना को लेकर आमजन और विशषज्ञों के मन में कई जिज्ञासाएं हैं और कुछ लोग इसकी सफलता व उपयोगिता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हैं।

आखिर क्या है घर-घर औषधि योजना:

घर-घर औषधि योजना के अंतर्गत वन-विभाग द्वारा औषधीय पौधों की पौधशालाएं विकसित कर तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा और कालमेघ के पौधे उगा कर आम जनता को दिए जाएंगे। आमजन को औषधीय पौधे आसानी से उपलब्ध कराना व उनको घरों में उगाने में मदद और पौधों की उपयोगिता के बारे में प्रचार-प्रसार कर जन चेतना को बढ़ा कर राजस्थान के निवासियों के स्वास्थ्य में सुधार करना इस योजना का मुख्य उद्देश्य है। इस पंच वर्षीय योजना (2021 -2022 से 2025 -2026 तक) का कुल बजट 210 करोड़ रुपए है जिसमें से 31.4 करोड़ रुपए पहले वर्ष में खर्च किए जाएंगे। इस योजना के तहत हर परिवार को चार औषधीय प्रजाति के पौधे “तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा और कालमेघ” के दो-दो पौधे (एक बार में कुल 8 पौधे) मिलेंगे और पांच साल में तीन बार तो, इस प्रकार हर परिवार को कुल 24 पौधे दिए जाएंगे।

पौधों का वितरण एवं योजना का प्रबंधन कैसे होगा ?

इस योजना को एक जन अभियान के रूप में संचालित किया जा रहा है और इसको अमल में लाने के लिए वन विभाग में HOFF और PCCF की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया गया है तथा जिला कलेक्टर की अध्यक्षता में एक “जिला स्तरीय टास्क फाॅर्स” बनाई गई है जिसका कार्यकाल योजना अवधि तक होगा। जिसमें जिला प्रशासन के नेतृत्व में, माननीय जन-प्रतिनिधियों, पंचायती संस्थाओं, विभिन्न राजकीय विभागों व संस्थाओं, विद्यालयों आदि का सहयोग लेकर बड़े स्तर पर अभियान चलाया जा रहा है।

जिला स्तरीय टास्क फाॅर्स विभिन्न तरह के कार्य करेगी जैसे कि, पौधों का वितरण, जन अभियान, योजना के लिए अतिरिक्त संसाधनों की व्यवस्था, नियमित प्रबोधन आदि।

प्रत्येक जिले में जिला स्तरीय कार्य योजना बनाई गई है जिसमें वितरण स्थानों का चयन, वितरण व्यवस्था, विभिन्न विभागों के सहयोग प्राप्त करने की व्यवस्था, प्रचार-प्रसार की रणनीति, अतिरिक्त वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था इत्यादि विषय सम्मिलित है।

उप वन संरक्षक के निर्देश अनुसार वन विभाग पौधशालाओं में इन पौधों को तैयार किया गया है और पौधों का वितरण वन विभाग की पौधशाला व अन्य स्थल जैसे चिकित्सालय या राजकीय कार्यालय पर उपलब्ध कराए जाएगे। पौधे लेने वालों परिवारों की आधार कार्ड जानकारी प्राप्त की जाएगी ताकि रिकॉर्ड रखे जा सके व मूल्याङ्कन में आसानी हो और साथ ही अगले वर्ष जिन परिवारों को पौधे दिए जाने हैं उनको चिन्हित करना आसान हो। कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि, आकड़ों का यह कार्य इतना बड़ा हो जाएगा जिसको बनाये रखने के लिए एक अलग टीम की जरूरत पड़ेगी।

योजना के प्रचार प्रसार पर भी मुख्य ध्यान दिया जा रहा है जिसके लिए सबसे पहले वर्ष 2021 में वन महोत्सव की थीम “घर घर औषधि योजना” राखी गई और राज्य के सभी जिलों के वन मंडलों, रेंज, तहसीलों, पंचायतों शहरी निकायों में वन महोत्सव मनाया गया। स्थानीय निवासियों को पौधों के लाभ, प्रयोग और सार संभाल की जानकारी दी जा रही है तथा पोस्टर भी लगाए जा रहे हैं। राज्य स्तर पर मीडिया प्लान बना कर प्रचार के लिए सोशल मीडिया का प्रयोग भी किया जा रहा है। कुछ लोगों का यह मानना है कि, सरकार इसके प्रचार खुद को अछूता नहीं रखना चाहती और इन सब कार्यों पर समय एवं मानव संसाधन खर्च होंगे।

इन पौधों से होने वाले लाभ:

आयुर्वेद में तुलसी, गिलोय, अश्वगंधा और कालमेध जैसे औषधीय पौधों को इम्यूनिटी बढ़ाने के लिए अच्छी औषधि बताया है। आइये जानते हैं इनके महत्व के बारे में :

1. तुलसी (Ocimum sanctum):

जिसे आमतौर पर तुलसी के रूप में जाना जाता है, लैमियासी परिवार का एक सुगंधित बारहमासी पौधा है। तुलसी के पारंपरिक उपयोग का भारत में एक लम्बा इतिहास है और बहुत रोगों से लड़ने की क्षमता होने के कारण इसे ‘क्वीन ऑफ हर्ब्स’ भी कहा जाता है।

तुलसी / Ocimum sanctum (फोटो: डॉ. दीप नारायण पाण्डेय)

फायदे: तुलसी को आयुर्वेद की प्राचीन संहिताओं चरकसंहिता, सुश्रुतसंहिता और ऋग्वेद जिनका समय कम से कम 3500-1600 ईसा पूर्व माना जाता है, में खांसी, श्वसन संबंधी विकार, विषाक्तता और गठिया के इलाज के लिये औषधि के रूप में वर्णित किया गया है। साथ ही आचार्य भावमिश्र ने भावप्रकाश के पुष्पवर्ग में तुलसी के गुणों का वर्णन किया है:

तुलसी सुरसा ग्राम्या सुलभा बहुमञ्जरी।
अपेतराक्षसी गौरी भूतघ्नी देवदुन्दुभिः॥
तुलसी कटुका तिक्ता हृद्योष्णा दाहपित्तकृत्।
दीपनी कुष्ठकृच्छ्रास्रपार्श्वरुक्कफवातजित्।
शुक्ला कृष्णा च तुलसी गुणैस्तुल्या प्रकीर्तिता।

तुलसी पर हुए कई शोध बताते हैं कि, तुलसी का नियमित सेवन करने से सामान्य स्वास्थ्य, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, दैनिक जीवन के तनावों को कम करने, खांसी, अस्थमा, बुखार, गठिया, नेत्र रोग, अपच, उल्टी, पेट की परेशानियों, हृदय रोग, त्वचा रोग, गिंगिवाइटिस और मसूढ़ों की सूजन सहित कई अन्य बिमारियों में फायदा मिलता है। तुलसी में कफ एवं वात दोष को कम करने, पाचन शक्ति एवं भूख बढ़ाने और रक्त को शुद्ध करने वाले गुण भी होते हैं। (Cohen 2014, Jackson, 2018, Wong 2020, Maiti 2020)।

कैसे लें: तुलसी के पत्तों, जड़, तने और बीजों का औषधि के रूप में प्रयोग किया जाता रहा है। इसके पत्तों को रोज सुबह खली पेट खा सकते हैं तथा इसके बीजों का चूर्ण बनाकर भी इस्तेमाल किया जा सकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि, तुलसी के पत्तों को कभी चबाना नहीं चाहिए बल्कि निगल लेना चाहिए। यदि निगने में मुश्किल होती है तो हाथ से उन पत्तों के छोटे टुकड़े कर लें या फिर पत्तों को गोल लपेटकर सिर्फ आगे के कृतंक दांतों से सिर्फ एक कट लगाकर निगल जाए। तुलसी के पत्ते को चाय की तरह उबालकर क्वाथ पीने सर्दी-जुकाम में फायदा होता है। वयस्क 3 – 5 पत्ते प्रतिदिन और बच्चे (3 साल से बड़े) 2- 3 पत्ते प्रतिदिन (Jackson, 2018)।

सावधानी: हालांकि वैसे तुलसी बिना किसी साइड इफेक्ट के कई चीजों में लाभकारी होती है, लेकिन इसके अत्यधिक सेवन से कुछ परेशानियां भी हो सकती हैं। इसीलिए इसे ध्यान से खाये जैसे कि, गर्म तासीर की होने के कारण तुलसी का अत्यधिक सेवन पेट में जलन पैदा कर सकता है। यदि किसी की कोई सर्जरी हुई है या होने वाली है तो तुलसी का सेवन नहीं करना चाहिए। तुलसी खून पतला करती है, जिसकी वजह से सर्जरी के दौरान या बाद में ब्लीडिंग का खतरा बढ़ सकता है। डायबिटीज़ की दवा खा रहे लोगों को तुलसी नहीं खानी चाहिए क्योंकि इससे ‘ब्लड शुगर’ लेवल कम होता है। तुलसी में पोटेशियम की मात्रा अधिक होने के कारण ‘लो ब्लड प्रेशर’ में इसे नहीं खाना चाहिए। डब्ल्यूएचओ का कहना है कि, लंबे समय तक नियमित रूप से तुलसी के पत्तों का सेवन करने से यूजेनॉल (eugenol) की उपस्थिति के कारण लीवर और उसकी कोशिकाओं को नुकसान हो सकता है। इसलिए औषधि का सेवन सही मात्रा में करें। (TOI 2021, Indian.com 2021, Jackson, 2018)।

2. कालमेघ (Andrographis Paniculata):

कालमेघ एक गुणकारी औषधीय पौधा है जिसको हरा चिरायता नाम से भी जाना जाता है। इसमें एक प्रकार का क्षारीय तत्व एन्ड्रोग्राफोलाइडस और कालमेघिन पाया जाता है जिसके कारण इसका स्वाद बहुत ही कड़वा होता है।

कालमेघ / Andrographis Paniculata (फोटो: डॉ. दीप नारायण पाण्डेय)

फायदे: इसकी पत्तियों का उपयोग बुखार, पीलिया, मलेरिया, सिरदर्द, पेट के कीड़े, रक्तशोधक, विषनाशक, उच्च रक्तचाप, त्वचा रोग तथा अन्य पेट की बीमारियों में बहुत ही लाभकारी पाया गया है। सरसों के तेल में मिलाकार एक प्रकार का मलहम तैयार कर चर्म रोग जैसे दाद, खुजली इत्यादि दूर करने में बहुत उपयोगी होता है। इसकी जड़ का उपयोग भूख लगने वाली औषधि के रूप में भी होता है। (Kumar et al 2012, Balkrishan 2019, Sarah et al 2015)

आचार्य प्रियव्रत ने शपतपुष्पादी वर्ग में लिखा है की यह मुख्यतया तिक्त एवं कफ विपाका के गुणों से युक्त है।

कालमेघस्तुभूनिम्बो यवाकारफलस्तथा|
सुतिक्त: लघुरुक्षोष्ण कफपित्तपविनाशन:||    
द्वीपन:  स्वेदनो ज्ञेयः कृमिघ्न: पित्तसारकः|
यकृतरोगेक्रिमी कुष्ठेज्वरेचासौ प्रशस्यते||
 (पुष्पादि वर्ग, श्लोक-  १३५-१३६)

कैसे लें: दिनभर में एक चम्मच कालमेघ चूर्ण का सेवन किया जा सकता है। दिन में कालमेघ की ¼ टेबलस्पून या ½ टेबलस्पून की दो खुराक ले सकते हैं। इसके अलावा, कालमेघ की आठ से दस पत्तियों को एक कप पानी के साथ जूस बनाकर भी सेवन किया जा सकता है। इसकी पत्तियों के पेस्ट को घाव पर लगाया जा सकता है और पत्तियों का जूस बनाकर भी पी सकते हैं।

सावधानी: यदि कालमेघ का अत्यधिक मात्रा में सेवन किया जाए तो एलर्जी, सिरदर्द, थकान, गैस्ट्रिक समस्या, जी मचलाना, दस्त आदि शिकायते हो सकती हैं। दूसरी अंग्रेजी दवाओं के साथ इसेलेने से पहले अपने डॉक्टर से परामर्श ले। कालमेघ का अधिक सेवन लो बीपी और लो शुगर का कारण बन सकता है। इसलिए समय-समय पर बीपी और शुगर लेवल मॉनिटर करते रहें। गर्भावस्था और ब्रेस्टफीडिंग के दौरान कालमेघ का सेवन नहीं करें (Balkrishan 2019)।

3. गिलोय (Tinospora cordifolia):

गिलोय कभी न सूखने वाली एक बड़ी लता है। इसका तना देखने में रस्सी जैसा लगता है। इसके कोमल तने तथा शाखाओं से जडें निकलती हैं। इसके पत्ते कोमल तथा पान के आकार के और फल मटर के दाने जैसे होते हैं।

गिलोय / Tinospora cordifolia (फोटो: डॉ. दीप नारायण पाण्डेय)

गुडूची को अनेक बीमारियों के विरुद्ध प्रयोग किया जाता है। आचार्य भावमिश्र ने स्पष्ट किया है कि (भा.प्र.पू.ख. गुडुच्यादिवर्ग 6.8-10):

गुडूची कटुका तिक्ता स्वादुपाका रसायनी। संग्राहिणी कषायोष्णा लघ्वी बल्याऽग्निदीपिनी।।
दोष त्रयामतृड्दाहमेहकासांश्च पाण्डुताम्। कामला कुष्ठवातास्त्रज्वरक्रिमिवमीन्हरेत।। प्रमेहश्वासकासार्शः कृच्छ्रहृद्रोगवातनुत् ।

फायदे: गिलोय के मिस्रण और काढ़े द्वारा कई रोगों में फायदा मिलता है जैसे कि, टाइफाइड, वात, पित्त, कफ, पीलिया, साइनस, लीवर विकार, बुखार, गठिया, कब्ज, शुगर, डेंगू, चिकनगुनिया, उल्टी, साइन में जलन, एसिडिटी, त्वचा रोग, मुँह के छाले, यूरिनरी ट्रैक्ट से जुड़े रोग, फाइलेरियासिस और आंख से जुड़े तमाम रोग (saha & Ghosh 2012, Upadhyay et al 2010, Srivastava, 2020)                                        ।

कैसे लें: गिलोय को काढ़ा या फिर पत्तों के रस दोनों ही रूप में लिया जा सकता है। यदि कड़ा लेना है तो उसके तने के छोटे टुकड़ों को 100 मिली पानी में दाल कर उबाले और जब पानी 25 मिली रह जाए तब उसे पी लें। पत्तों का सीधा जूस बनाकर पिया जा सकता है। एक बार में केवल 20-30 मिली काढ़ा या फिर  20 मिली रस का सेवन करना चाहिए (Balkrishan 2019)।

सावधानी: गिलोय का सेवन यदि ज्यादा किया जाए तो इससे कब्ज और डायबटीज के रोगियों पर दुष्प्रभाव पड़ सकते हैं। इससे रोग प्रतिरोधक शमता अगर बहुत बढ़ जाए तो Autoimmune diseases भी हो सकती है साथ ही गर्भवती महिलायें इसका सेवन न करें।  (Balkrishan 2019, Gupta 2020)।

4. अश्वगंधा (Withania somnifera):

अश्वगंधा आयुर्वेद की दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण औषधीय पौधा है। इसके वैज्ञानिक नाम में “somnifera” एक लैटिन भाषा का शब्द है जिसका अर्थ है “नींद लाने वाला”।

अश्वगंधा / Withania somnifera (फोटो: डॉ. दीप नारायण पाण्डेय)

फायदे: आयुर्वेद में अश्वगंधा के भी कई गुण बताए गए है। अश्वगंधा में एंटीऑक्सीडेंट, लीवर टॉनिक, एंटी-इंफ्लेमेटरी, एंटी-बैक्टीरियल के साथ-साथ और भी कई पोषक तत्व होते हैं जो स्वास्थ्य को बढ़ाने में मदद करते हैं। इसके अलावा इसमें एंटी-स्ट्रेस गुण भी होते है जो मानसिक तनाव जैसी गंभीर समस्या को ठीक करने में लाभदायक है और इससे अच्छी नींद आती है। स्ट्रेस को कम करने में मदद करते है। यह वाइट ब्लड सेल्स और रेड ब्लड सेल्स दोनों को बढ़ाने का काम करता है। जो कई गंभीर शारीरिक समस्याओं में लाभदायक है

गन्धान्ता   वाजिनामादिरश्वगंधा   हयाहर्या।  वराहकर्णी वरदा बलदा कुष्ठ्गंधिनी। 
अश्वगंधानिलरलेधमश्चित्र शौयज्ञयापहा। बज्या रसायनी तिक्ता कषायोष्णतिशूक्रला।। 
भावप्रकाश निघण्टु, श्लोक १८९-१९० के अनुसार अश्वगंधा में निम्न गुण है – मुख्यतया तासीर में गर्म एवं ताकत देने वाली है और पौरुष गुण को बढ़ने वाली है।   

कैसे लें : अश्‍वगंधा का इस्‍तेमाल अश्वगंधा के पत्‍ते या चूर्ण (Ashwagandha Powder) के रुप में किया जाता है। अश्वगंधा चूर्ण खाने का तरीका बहुत आसान है। पानी, शहद या फिर घी में मिलाकर अश्वगंधा चूर्ण का सेवन किया जा सकता है। इसके अलावा, अश्वगंधा कैप्सूल, अश्वगंधा चाय और अश्वगंधा का रस इस्तेमाल किया जा सकता है (Balkrishan 2019)।

सावधानी: अश्वगंधा का सेवन सीमित मात्रा में ही किया जाए तो अच्छा है क्योंकि अत्यधिक सेवन से न सिर्फ उल्टियां हो सकती हैं बल्कि पेट गड़बड़ हो सकता है। यदि लो ब्लड प्रेशर की परेशानी रहती है तो उन्हें अश्वगंधा नहीं खाना चाइये नहीं तो ब्लड प्रेशर बहुत ही ज्यादा लो हो जाएगा। नींद न आने पर अश्वगंधा का इस्तेमाल कुछ हद तक सही है, लेकिन नींद बुलाने के लिए इसका नियमित सेवन नुकसानदेह साबित हो सकता है। अश्वगंधा थाइरोइड को बढाता है अर्थात जिनको थाइरोइड की कमी की शिकायत है उनके लिए तो ये फायदेमंद है परन्तु जिन्हें पहले सेथाइरोइड ज्यादा है तो उनके लिए बहुत खतरनाक हो सकता है (Zielinski 2019 , Balkrishan 2019)

आमजन के कुछ प्रश्न व विशेषज्ञ की राय:

इस योजना को लेकर आमजन की तरफ से कई प्रश्न सामने आ रहे हैं तथा डॉ. दीप नारायण पाण्डेय, IFS (वरिष्ठ वन अधिकारी) द्वारा उन प्रश्नों के उत्तर देने का प्रयास किया गया है।

प्रश्न 1 : कुछ पौधों को गार्डन या फ्लैट में गमलों में लगाने से इन पौधों का संरक्षण कैसे होगा?

उत्तर : आज हम उस युग में जी रहे हैं जब केवल वनों में संरक्षण करने से जैव-विविधता का संरक्षण नहीं हो सकता बल्कि हमें जैव-विविधता का संरक्षण वहीँ करना होगा जहां हम रहते और काम करते हैं। घर से वन तक सम्पूर्ण भू-परिदृश्य में जैव-विविधता संरक्षण जरुरी है। इसीलिए सबसे पहले हमें अपने घरों में पौधों को संरक्षित करना होगा।

दूसरी बात यह है कि, आयुर्वेद में उपयोग होने वाले लगभग 70-80 प्रतिशत औषधीय पौधे अभी भी वनों से प्राप्त होते हैं। यदि हम प्रत्येक घर में इन औषधीय पौधों को अपने उपयोग के लिये उगा लेते हैं तो स्वाभाविक है कि, वनों से इनका हनन हमें कम करना पड़ेगा और अप्रत्यक रूप से प्रजातियों का संरक्षण होगा।

प्रश्न 2 : केवल पौधे बाँट देने से क्या होगा?

उत्तर : दरअसल घर-घर औषधि योजना केवल पौधे बांटने की योजना नहीं है बल्कि स्वास्थ्य और संरक्षण से जुड़े उन विचारों को बांटने की भी योजना है जो औषधीय पौधों के योगदान को जन-मानस को समझाती है। एक उदाहरण देखें तो कोविड-19 की चिकित्सा के लिये अभी तक किसी भी चिकित्सा पद्धति में कोई पक्की तौर पर ज्ञात औषधि नहीं मिल सकी है। तथा, विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों में औषधियों पर शोध व प्रयोग किए जा रहे है और स्वाभाविक है कि, आयुर्वेद में भी शोध और प्रयोग हो रहे है। कई शोधपत्रों से स्पष्ट हो जाता है कि, तुलसी, कालमेघ, अश्वगंधा और गिलोय रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाते हैं और कुछ हद तक संक्रमित होने से बचाव भी करते हैं। तथा इन औषधियों का प्रयोग बीमारी की तीव्रता इतनी नहीं बढ़ने देता कि, व्यक्ति को अपनी जिंदगी ही गावनि पड़े।

प्रश्न 3 : घर-घर औषधि योजना के लिये तुलसी कालमेघ, अश्वगंधा और गिलोय ही क्यों चयनित किए गए?

उत्तर : यह एक महत्वपूर्ण प्रश्न है। इस प्रश्न का उत्तर चार अलग-अलग दृष्टिकोण से समझा जा सकता है। पहला चयनित की गई चारों प्रजातियां अलग-अलग या एक दूसरे से विभिन्न अनुपातों में मिलकर अधिक से अधिक रोगों के विरुद्ध प्रभावी हो सकती हैं। दूसरा, इन चारों प्रजातियों के बारे में संहिताओं, समकालीन वैज्ञानिक शोध एवं चिकित्सा आधारित कई प्रमाण उपलब्ध है। तीसरा, इन प्रजातियों को एथनोमेडिसिन के रूप में भी जाना जाता है और पहले लोग वैद्य की सलाह से बड़ी ही सरलता से इनसे विभिन्न औषधि बना लेते थे। चौथा दृष्टिकोण चयनित प्रजातियों की जलवायुवीय आवश्यकताओं से संबंधित है जिनके आधार पर यह समझा जा सकता है कि इन प्रजातियों का राजस्थान में उगाया जा सकता है।

कालमेघ (फोटो: डॉ. दीप नारायण पाण्डेय)

आमजन के इन प्रश्नों के अलावा योजना और इसको अमल में लाने पर भी कई जिज्ञासाएं भी हैं जैसे की,

1. क्या कालमेघ आसानी से राजस्थान जैसे शुष्क व अर्ध-शुष्क पर्यावास में उग सकते हैं? क्योंकि कालमेघ नमी वाले क्षेत्र का पौधा है और इसलिए ये राजस्थान के सिर्फ कुछ जिलों में ही उग सकता है। साथ ही वन विभाग के नर्सरी कर्मचारियों को भी इसे उगाने में काफी मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है तो आमलोग इसे कैसे ऊगा पाएंगे?

2. नर्सरी में इन पौधों को उगाया गया है परन्तु बड़ी ही छोटी और नाजुक अवस्था वाले इन पौधों को सुरक्षित तरीके से वितरित कर हर घर तक पहुंचा पाना निश्चित ही एक मुश्किल कार्य होगा ?

3. योजना के तहत हर घर को यानी 12650000 परिवारों को पौधे वितरित किए जाएंगे। इतनी बड़ी जनसँख्या के हर घर तक पौधे पंहुचा पाना निश्चित ही बड़ा कार्य है जिसके लिए एक बड़ी टीम की आवश्यकता होगी।

4. जिला स्तरीय टास्क फाॅर्स के सदस्यों में पंचायती संस्थाएं, विभिन्न राजकीय विभाग और विद्यालय शामिल हैं। अब प्रश्न ये उठता है कि, जिन लोगों को ये कार्य दिए जाएंगे उनके लिए यह नियमित विभागीय कार्य के अलावा एक अतिरिक्त कार्य होगा और कर्मचारियों पर कार्यभार बढ़ जाएगा।

5. शुरुआत में लोग खुशी-खुशी पौधे ले तो जाएंगे और कुछ दिन ध्यान भी रख लेंगे परन्तु क्या हमेशा ध्यान रख पाएंगे ?

वैश्विक महामारी से निपटने के बाद में अर्थव्यवस्था को ग्रीन डेवलपमेंट की ओर ले जाना और पारिवारिक स्तर पर क्षमता बेहतर करना एक बड़ी प्राथमिकता होगी। विश्व भर की सरकारें महामारी से निपटने के बाद आने वाले समय में अपने आधारभूत ढांचे में भारी परिवर्तनों की घोषणा कर चुकी हैं। इस दिशा में सामाजिक, आर्थिक एवं पर्यावरणीय विकास के लिए तमाम योजनायें भी बन रही हैं और इनमें से कुछ तो शुरू भी हो चुकी है।

घर-घर औषधि योजना को राजस्थान में इस परिप्रेक्ष्य में महत्वपूर्ण माना जा रहा है। महामारी काल में अमीर और गरीब दोनों ही प्रकार के परिवार महामारी का भयानक चेहरा देख चुके हैं। अतः परिवार के स्तर पर प्रत्येक गांव और शहर को रेसिलियंट बनाने तथा स्वास्थ्य आपदाओं से निपटने में सक्षम बनाने के लिये घर-घर औषधि योजना का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है।

सन्देश यह है कि, घर-घर औषधि योजना मानव के स्वास्थ्य-रक्षण और जैव-विविधता के संरक्षण की दिशा में बहुत बड़ा कदम है। इसको सफल बनाने में प्रत्येक नागरिक का योगदान प्राप्त होगा, ऐसी आशा है।

राजस्थानी लहजे में एक विद्वान कहते है -गुडूची, कालमेघ अश्वगंधा और तुलसी जैसे पौधे पहले अपने माथे में उगाइये, मिट्टी में तो उग ही जायेंगे।
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