राजस्थान राज्य किलों, महलों, गढों और गढियों के लिए जाना जाता रहा है। राजा-महाराजा, राव-उमराव सब अपनी – अपनी हैसियत अनुसार किले व महल आदि बनवाते थे। सुरक्षा व्यवस्था को पुख्ता करने एवं आन्तरिक गतिविधियों को छुपाये रखने हेतु अलग-अलग मोटाई, ऊँचाई व बनावट की प्राचीरें बनवाई जाती थी। परकोटे की प्राचीरों से घिरे क्षेत्र का कोई निश्चित पैमाना तो नहीं था फिर भी महलों के मुकाबले किलों के परकोटे से घिरा क्षेत्र अधिक होता था। कुंभलगढ के किले की प्राचीर तो लगभग 36 किमी. लम्बी बताई जाती है। सज्जनगढ अभयारण्य में स्थित सज्जनगढ वास्तव में गढ़ यानी किला नहीं है बल्कि एक महल है जिसमें चारों तरफ कोई सुरक्षा दीवार नहीं है। जयसमंद अभयारण्य में स्थित रूठी रानी का महल व हवा महल भी परकोटा विहीन हैं। नाहरगढ किला, गागरोन का किला, शेरगढ किला, शाहबाद का किला, काँकवाडी किला, बाला किला (अलवर) आदि जगहों पर बडा क्षेत्र घेरते हुऐ परकोटे बनाये गये थे। महलों व किलों की आन्तरिक सुन्दरता एक महत्वपूर्ण पहलू है। वास्तुकारीय विशेषताओं के अलावा बाहर व भीतर की हरियाली का सृजन व संधारण भी एक महत्वपूर्ण प्रबंधन क्षेत्र था। यहाँ महलों व किलों की आन्तरिक हरियाली पर कुछ प्रकाश डालना उचित होगा जो हमें तत्कालीन राजघरानों की सोच, समझ, जरूरत व उद्देश्य के ज्ञान व भान की झलक देता है।
किलों के परकोटे को विस्तार देते समय जो प्राकृतिक वन क्षेत्र घेरा जाता था उसे सुन्दरता, शीतलता, ईधन, घोडे एवं हाथियों हेतु चारे की आंशिक पूर्ती, फल आदि जरूरतों हेतु उसे सुरक्षित रखा जाता था। जो वन क्षेत्र किलों की परीधी पर बाहर विद्यमान रहता था, उसको भी सुरक्षित रखा जाता था क्युंकि बाहरी वन किले को छुपाने में मदद करते थे। ऐसे दुर्गों को आज हम वन दुर्ग के रूप में जानते हैं।
प्राचीन किलो में जहाँ अधिकांश प्राकृतिक वनस्पति को सुरक्षित रखा जाता था, वहीं महलों के परिसरों में विद्यमान काँटेदार व अनुपयोगी या कम उपयोगी वनस्पतियों को हटा दिया जाता था। राजघरानों के लोग ताजी हवा, ताजे फल, छाँया, शीतलता, सुन्दरता, लोक दवाओं, शुभ शगुन विचार व धार्मिक – सामाजिक अनुष्ठानों हेतु अनेक वृक्षों का रोपण भी महलों व किलों के प्रांगण में कराते थे। उन रोपित वृक्षों की उचित देख-भाल की जाती थी। महलों व किलों में रोपित वृक्षों के स्वयं गिरे या पुनः-पुनः फैंके बीजों से या नये रोपित पौधों से उन पसंद की प्रजातियों की अगली पीढीयाँ भी शनैः-शनैः वहाँ उगती रहती थी। पुराने वृक्ष बडे होकर या दीमक आदि के प्रकोप से समाप्त भी होते रहते थे।
महलों व किलों में रहने वाले राजपरिवारों, सैनिकों, सेवकों, अनुष्ठान कर्ताओं आदि द्वारा रोपित पौधों से तरह-तरह के लाभ लिये जाते थे। आवश्यक्तानुसार पौधों की संख्या निर्धारित की जाती थी लेकिन शगुन एवं सौभाग्य से संबंधित पौधे कम संख्या में होते थे तथा इन्हें प्रायः प्रवेश द्वारों के पास लगाया जाता था ताकि महल या किले में प्रवेश करते ही उनके दर्शन कर अच्छे शगुन का भान हो। मौलश्री जैसे वृक्षों के फूलों की महक हवा मे सुगंध घोलने के लिए जानी जाती है। कच्चे आम (कैरी) की छाछ, रायण व मौलश्री के फलों का गर्मी में सेवन आम चलन था। तत्कालीन राजपूताना (वर्तमान राजस्थान) के राजघरानों की पसंद के कुछ वृक्ष निम्न हैं जो जहाँ-तहाँ आज भी किलों – महलों में सुरक्षित नजर आते हैंः
| क्र.सं. | स्थानीय नाम | वैज्ञानिक नाम | प्रकृति | वानस्पतिक कुल | उपयोगिता |
| 1 | रायण | Manilkara hexandra | सदाबहार | Sapotaceae | सघन-शीतल छाँया, फल, सुन्दरता, झूला डालना |
| 2 | मौलश्री, बकुल | Mimusops elengi | सदाबहार | Sapotaceae | छाँया, फल, सुन्दरता, औषधीय महत्व |
| 3 | पीपल | Ficus religiosa | पतझडी/ अर्धसदाबहार | Moraceae | छायाँ, धार्मिक-सामाजिक महत्व, हवन सामग्री, झूला डालना |
| 4 | बरगद | Ficus benghalensis | सदाबहार | Moraceae | छायाँ, धार्मिक-सामाजिक महत्व, झूला डालना |
| 5 | नीम | Azadirechta indica | सदाबहार | Meliaceae | छायाँ, औषधीय महत्व (विशेषकर दाँतुन हेतु उपयोगी), झूला डालना, सुन्दरता, फल |
| 6 | खजूर | Phoenix sylvestris | सदाबहार | Arecaceae | फल, सुन्दरता, झाडू सामग्री, बर्तन सफाई हेतु रेशे, मधुर रस एवं ताडी |
| 7 | आम | Mangifera indica | सदाबहार | Anacardiaceae | छायाँ, फल, झूला, सुन्दरता, औषधीय महत्व |
| 8 | जामुन | Syzygium cumini | सदाबहार | Myrtaceae | छायाँ, फल, सुन्दरता, औषधीय महत्व |
| 9 | इमली | Tamarindus indicus | सदाबहार | Caesalpiniaceae | छायाँ, फल, सुन्दरता, औषधीय महत्व |
| 10 | लिसोडा | Cordia myxa | सदाबहार | Ehretiaceae | छायाँ, सुन्दरता, फल |
| 11 | कलम/कदम | Mitragyna parivifolia | पतझडी | Rubiaceae | सुन्दरता, धार्मिक महत्व |
| 12 | बेलपत्र | Aegle marmelos | पतझडी | Rutaceae | धार्मिक महत्व, फल, औषधीय महत्व |
प्राचीन समय में रायण व मौलश्री को प्राथमिकता से लगाया जाता था (चित्र 1 से 5)। जहाँ देवालय स्थित होते थे वहाँ पूजन हेतु पत्र सहजता से मिल सकें, अतः उपयुक्त स्थान पर बेलपत्र भी लगाया जाता था। तुलसी के पौधे भी देवालयों व निवास स्थानों के पास लगाए जाते थे। पूजा – पाठ हेतु दूब घास भी सुरक्षित जगह उगने दी जाती थी। देश में कई जगह कल्प वृक्ष (Adansonia digitata) भी लगाऐ जाते थे। मध्यप्रदेश के धार जिले में माँडू के किले एवं महलों के परिसरों में एवं आस-पास बडी संख्या में प्राचीन समय में रोपित विशाल आकार के कल्प वृक्ष दर्शनीय हैं।

चित्र 1: शेरगढ किले के प्रवेश द्वार के पास मुख्य मार्ग की बाँयीं तरफ विद्यमान दो रायण वृक्ष

चित्र 2: शेरगढ किले के प्रवेश द्वार के पास विद्यमान प्राचीन रायण वृक्षों की सघन छाँया

चित्र 3: सघन छाँया देने वाला सदाबहार मौलश्री वृक्ष.

चित्र 4: मौलश्री वृक्षः फल एवं फूलों से लदी शाखा

चित्र 5: मौलश्री वृक्ष का फल
सारणी-1 में देखेंगे तो पता चलेगा कि अधिकांश वृक्ष दीर्घजीवी व बडे आकार के हैं। इनमें अधिकांश सदाबहार या लगभग सदाबहार प्रकृति के हैं। बेलपत्र व खजूर को छोड कर कोई काँटेदार नहीं है। सभी वृक्ष स्थानीय व बहु-महत्व (multi-purpose) वाले हैं।
प्राचीन समय में कुछ वृक्षों को तो महलों व किलों के अलावा देवालयों व जलस्त्रोतों के पास भी लगाने का चलन था। पाली जिले में सादडी के पास रणकपुर जैन मंदिर में विशाल भवनों से घिरा, एकदम केन्द्रिय भाग में एक रायण का प्राचीन विशाल वृक्ष आज भी सुरक्षित है। पीपल, बरगद, बेलपत्र, जीवापूता (Drypetes roxburghii), मौलश्री आदि प्रायः शिवालयों के पास सुरक्षित मिलते हैं। प्राकृतिक रूप से शिवलिंग से समानता दर्शाने वाले फूल कोरोपिटा गुवानेन्सिस (Couroupita guianensis) नामक वृक्ष में देखे जा सकते है। आजकल दक्षिण भारत में कई जगह शिवालयों के पास यह वृक्ष भी देखने को मिलता है।
अधिक वर्षामान वाले क्षेत्रों में पानी के तालाबों-जोहडों की पाल पर भी बरगद, पीपल, बेलपत्र, जामुन, इमली, नीम, आम, कलम (कदम) लगाने-बचाने का चलन था। जिस तालाब के किनारे कलम (कदम या कदम्ब) होता है उसे बोलचाल में ’’कदमा तालाब’’ या ’’कदम्ब तालाब’’ कहते हैं। सामान्य तालाब के मुकाबले ’’कदम्ब तालाब’’ ज्यादा पूज्य माने जाते हैं। शेखावाटी से लेकर मारवाड के तालाबों के पाल वृक्षों (Embankment tree) में खारा जाल, मीठा जाल, पीपल, बरगद, खेजडी, रौंझ, बबूल, नीम, बेर, इमली, इन्द्रधोक (Anogeissus sericea nummularia) अदि विशेष महत्व रखते हैं। इसी तरह कमल को भी विशेष धार्मिक महत्व मिलता था। जिस तालाब में कमल (पदम) उगते थे उसे “पदम तालाब” नाम से आदर दिया जाता है।
वृक्षों के महत्व को जानने हेतु प्राचीन महल, किले, देवालयों एवं तालाबों के अवलोकन – अध्ययन के साथ -साथ पुरानी रूढीयों, परिपाटियों, अभिवृतियों व परंपरागत ज्ञान पर नजर जरूरी है ताकि हम प्राचीन भारतीय समाज के पुरा वैभव से रूबरू हो सकें।
सतीश कुमार शर्मा
राजस्थान वन सेवा (सेवा निवृत)
14-15, चकरिया आम्बा, रामपुरा चैराहा, झाडोल रोड़
पोस्ट – नाई, उदयपुर – 313031, राजस्थान, भारत
कवर इमेज: गागरोन क़िले की दीवार से लिया गया दृश्य (फोटो: प्रवीण)










