वेडर्स ऑफ द इंडियन सबकॉन्टीनैन्ट: भारतीय उपमहाद्वीप के परिप्रक्ष में एक बेहतरीन सन्दर्भ ग्रन्थ

वेडर्स ऑफ द इंडियन सबकॉन्टीनैन्ट: भारतीय उपमहाद्वीप के परिप्रक्ष में एक बेहतरीन सन्दर्भ ग्रन्थ

जलाशयों के किनारे-किनारे, जल रेखा व कीचड़युक्त आवास को पसंद करने वाले पक्षियों को ‘‘वेडर्स’’ नाम से जाना जाता है। इस वर्ग के पक्षी तैरते नहीं हैं बल्कि पानी के किनारे-किनारे या कुछ दूर पानी या कीचड़ में चलते हुये ही भोजन ढूंढते हैं। इस वर्ग के कुछ पक्षी पानी के अन्दर उगे पौधों की पत्तियों या दूसरी तैरती हुई वस्तुओं पर भी चलकर अपना भोजन ढंूढ लेते हैं। इस वर्ग में स्नाइप, जकाना, ऑयस्टरकैचर, प्लोवर, लैपविंग, वुडकॉक, गौडविट करलेव, विमब्रेल, रैडशैंक, ग्रीनशैंक, सेन्डपाइपर, टैटलर, टर्नस्टोन, डॉविचर, सैन्डरलिंग, स्टिन्ट, रफ, आइबिसबिल, स्टिल्ट, एवोसेट, फैलारोप, थिक-नी, करसर एवं प्रेटिनकॉल शामिल हैं।

इस वर्ग के अनेक पक्षियों को सही-सही पहचानना कई वर्ष तक पक्षी अवलोकन करने के बाद भी कठिन लगता है। प्रायः कई पक्षियों के अच्छे क्लोज अप फोटो खींच लेने के बाद फोटो को तसल्लीपूर्वक देखने पर भी पहचान में संशय बना रहता है। वेडर वर्ग के देशान्तर गमन कर सर्दी में हमारे जलाशयों पर पहुंचने वाले पक्षियों को भी पहचानने में कठिनाई बनी रहती है।

इस कठिनाई को दूर करने का सराहनीय प्रयास भारत के जाने-माने पक्षीविद   श्री हरकीरत सिंह संघा ने किया है। विशेष बात यह है कि श्री संघा राजस्थान के निवासी हैं। उन्होने जो स्तुतियोग्य पुस्तक प्रकाशित की है उसका विवरण निम्न है:-

पुस्तक का नाम  :-  वेडर्स ऑफ द इंडियन सब-कॉन्टीनेन्ट ( Waders of the Indian subcontinent )
भाषा                :- अंग्रेजी
पृष्ठ संख्या         :-  XVI + 520
प्रकाशन वर्ष      :- 2021
प्रकाशक           :- लेखक स्वयं (विष्व प्रकृति निधि-भारत के आंषिक सहयोग से)
मूल्य                 :-3500.00 रूपये
मंगाने का पता     :- श्री हरकीरत सिंह संघा, बी-27, गौतम मार्ग, हनुमान नगर,
जयपुर-302021, भारत

इस संदर्भ ग्रन्थ में 84 प्रजातियो के वेडर वर्ग के पक्षियों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत किया है। प्रत्येक प्रजाति के स्थानीय नाम, पुराने नाम, वितरण, फील्ड में  पहचानने हेतु विशेष गुणों की जानकारी, शारीरिक नाप, आवास, स्वभाव, भोजन, प्रजनन, गमन, संरक्षण स्थिति आदि की विस्तृत, आद्यतन एवं प्रमाणिक जानकारी प्रस्तुत की गई है। पुस्तक में 450 रंगीन फोटो, 540 पेन्टिंग, उपमहाद्वीप में वितरण को स्पष्टता से प्रदर्शित करने वाले रंगीन मैप आदि प्रचुरता से दिये गये हैं। इतनी सामग्री को एक ही जगह सहज उपलब्धता से हम फील्ड में वेडर्स को अच्छी तरह पहचान सकते हैं। इस पुस्तक की छपाई अच्छी है एवं कागज भी उत्तम क्वालिटी का प्रयोग किया गया है। कवर पेज आकर्षक व विषय को सार्थक करता है। कुल मिलाकर यह ग्रन्थ गागर में सागर है।

यह पुस्तक भारत, बांगलादेश, भूटान, मालद्वीप, नेपाल, पाकिस्तान, श्रीलंका एवं चांगोस, जो कि भारतीय उपमहाद्वीप के देश हैं, सभी के लिये समान रूप से उपयोगी है।

यह पुस्तक पठनीय व संग्रहणीय है। इसे सहजता से फील्ड में उपयोग किया जा सकता है। यह पुस्तक हर पक्षी अवलोकक के लिये बहुत ही उपयोगी फील्ड गाइड तो है ही, शोधार्थियों व अध्यापकों हेतु भी अत्यंत उपयोगी संदर्भ है।

कार्वी: राजस्थान के फूलों की रानी

कार्वी: राजस्थान के फूलों की रानी

कर्वी (Storbilanthescallosa) दक्षिणी अरावली की कम ज्ञात झाड़ीदार पौधों की प्रजाति है। यह पश्चिमी घाट और सतपुड़ा पहाड़ियों में एक प्रसिद्ध प्रजाति है, लेकिन राजस्थान के मूल निवासियों से ज्यादा परिचित नहीं है। यह अद्भुत प्रजाति आठ साल में एक बार खिलती है। पश्चिमी घाट में, इसका अंतिम फूल 2016 में देखा गया था और अगला फूल आठ साल के अंतराल के बाद 2024 में होगा।

दक्षिणी अरावली के सिरोही जिले में माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य कर्वी स्क्रब के लिए प्रसिद्ध है। यह अद्भुत झाड़ीदार प्रजाति माउंट आबू की ऊपरी पहुंच के पहाड़ी ढलानों तक ही सीमित है। यह इस खूबसूरत पहाड़ी के निचले क्षेत्र और निचली ढलानों में अनुपस्थित है। माउंट आबू के अलावा जोधपुर से भी कर्वी की खबर है। लेकिन यह बहुत ही असामान्य है कि जोधपुर में उच्च वर्षा क्षेत्र की एक प्रजाति देखी जाती है। दक्षिणी राजस्थान के फुलवारी-की-नल और सीतामाता वन्यजीव अभयारण्यों के कई हिस्सों में कर्वी के बड़े और निरंतर पैच देखे जा सकते हैं। यह प्रजाति उदयपुर और राजसमंद जिलों के संगम पर जरगा पहाड़ियों और कुभलगढ़ पहाड़ियों में भी पाई जाती है। कर्वी के छोटे-छोटे पैच जर्गा हिल्स में नया जरगा और जूना जर्ग मंदिरों के आसपास देखे जा सकते हैं। माउंट आबू के बाद, जरगा हिल्स राजस्थान की दूसरी सबसे ऊंची पहाड़ी है।

कर्वी एक सीधा झाड़ी है, ऊंचाई में 1.75 मीटर तक बढ़ता है। इस प्रजाति की पत्तियाँ अण्डाकार, बड़े आकार की, दाँतेदार किनारों वाली होती हैं। पत्तियों में 8-16 जोड़ी नसें होती हैं जो दूर से स्पष्ट दिखाई देती हैं। चमकीले नीले फूल पत्तियों की धुरी में विकसित होते हैं जो न केवल तितलियों और मधुमक्खियों को बल्कि मनुष्यों को भी आकर्षित करते हैं।

कर्वी स्ट्रोबिलैन्थेस से संबंधित है, फूल वाले पौधे परिवार एसेंथेसी के जीनस से संबंधित है। इस जीनस की लगभग 350 प्रजातियाँ विश्व में पाई जाती हैं और लगभग 46 प्रजातियाँ भारत में पाई जाती हैं। राजस्थान में, इस जीनस की केवल दो प्रजातियों को जाना जाता है, अर्थात् स्ट्रोबिलेंथेस्कैलोसा और स्ट्रोबिलेंथेशालबर्गि। इनमें से अधिकांश प्रजातियां एक असामान्य फूल व्यवहार दिखाती हैं, जो 1 से 16 साल के खिलने वाले चक्रों में भिन्न होती हैं। स्ट्रोबिलांथेसकुंथियाना या नीलकुरिंजी, जिसका 12 साल का फूल चक्र होता है, दक्षिण भारत के पश्चिमी घाट, विशेष रूप से नीलगिरी पहाड़ियों का प्रसिद्ध पौधा है। हर 12 साल में एक बार नीलकुरिंजी खिलता है। पिछले 182 वर्षों की अवधि के दौरान, यह केवल 16 बार ही खिल पाया है। यह वर्ष 1838, 1850, 1862, 1874, 1886, 1898, 1910, 1922, 1934, 1946, 1958, 1970, 1982, 1994, 2006 और 2018 में खिल चुका है। अगला फूल 2030 में दिखाई देगा। रंग का फूल इसलिए नाम नीलकुरिंजी। जब यह बड़े पैमाने पर खिलता है, तो नीलगिरि पहाड़ियाँ ‘नीले रंग’ की हो जाती हैं, इसलिए नीलगिरि पहाड़ियों को उनका नाम ‘नीलगिरी’ (नील = नीला, गिरि = पहाड़ी) मिला। नीलगिरी में जब नीलकुरिंजी खिलता है, तो इस फूल वाले कुंभ को देखने के लिए बड़ी संख्या में पर्यटक वहां पहुंचते हैं। इस प्रकार, नीलकुरिंजी-केंद्रित पर्यावरण-पर्यटन नीलगिरी में रोजगार के अवसर पैदा कर रहा है।

कर्वी (स्ट्रोबिलांथेस्कलोसा) को “राजस्थान का नीलकुरिंजी” कहा जा सकता है। इसका आठ साल का खिलने वाला चक्र है। यह आठ साल में एक बार खिलता है। यानी इस प्रजाति में एक सदी में सिर्फ 12 बार ही फूल आते हैं। एक साथ बड़े पैमाने पर फूल आने के बाद, सभी पौधे एक साथ मर जाते हैं जैसे ‘सामूहिक आत्महत्या’ फैशन में। इस प्रकार, कर्वी हमारे राज्य का एक मोनोकार्पिक पौधा है। कर्वी लंबे अंतराल में खिलने वाला फूल है, इसलिए इसके फूलों को प्लीटेसियल कहा जाता है, यानी वे लंबे अंतराल में एक बार खिलते हैं। अपने जीवन के पहले वर्ष के दौरान बीज के अंकुरण के बाद, कर्वी को आम तौर पर विकसित होने में सात साल लगते हैं और अपने आठ साल में खिल जाते हैं; इसके बाद जीवन में एक बार बड़े पैमाने पर फूल आने के बाद, झाड़ियाँ अंततः मर जाती हैं। गर्मियों के दौरान, कर्वी झाड़ियाँ सूखी, पत्ती रहित और बेजान जैसी दिखती हैं, लेकिन मानसून की शुरुआत के बाद उनमें हरे पत्ते आ जाते हैं। इनकी पत्तियाँ बड़े आकार की होती हैं और पौधे बहुत कम दूरी पर बहुत निकट से उगते हैं और वन तल पर घना झुरमुट बनाते हैं। उनके जीवन के बीज अंकुरण वर्ष से लेकर सातवें वर्ष तक वर्षा ऋतु में केवल टहनियों के बढ़ने से पत्ते बनते हैं लेकिन आठवें वर्ष के मानसून के दौरान उनके व्यवहार में एक शक्ति परिवर्तन देखा जाता है। पत्तियों के अलावा, वे फूल भी पैदा करना शुरू कर देते हैं। अब बड़े पैमाने पर फूल अगस्त के मध्य से सितंबर के अंत तक देखे जा सकते हैं, लेकिन ढलानों के विभिन्न ऊंचाई पर मार्च तक छोटे पॉकेट में फूल देखे जा सकते हैं। पत्तियों के निर्वासन में स्पाइक्स में बड़े आकार के, दिखावटी, नीले फूल विकसित होते हैं। फूल परागकणों और अमृत से भरपूर होते हैं जो बड़ी संख्या में तितलियों, मधुमक्खियों, पक्षियों और अन्य जीवों की प्रजातियों की एक विस्तृत श्रृंखला को आकर्षित करते हैं।

आमतौर पर एक एकल कर्वी फूल का जीवनकाल 15 से 20 दिनों के बीच रहता है। फूल आने के बाद बड़े पैमाने पर फल लगते हैं। फल ठंड और गर्म मौसम में पकते हैं और अगले साल तक सूख जाते हैं। कर्वी के पौधों में बड़े पैमाने पर बुवाई देखी जाती है। इस व्यवहार को मास्टिंग कहा जाता है। पिछले सात वर्षों की पूरी संग्रहीत खाद्य सामग्री का उपयोग फूल, फल और बीज पैदा करने के लिए किया जाता है। अब पौधे पूरी तरह से समाप्त हो गए हैं। बीजों के परिपक्व होने के बाद, उनके अंदर के फल उन्हें बनाए रखते हैं। चूंकि, फलों में अभी भी बीज मौजूद होते हैं, इसलिए उन्हें प्रकृति की अनियमितताओं से अधिकतम सुरक्षा मिलती है। सूखे मेवे अपने मृत पौधों पर अगले मानसून की प्रतीक्षा करते हैं। अगले साल के मानसून की शुरुआत के साथ, फलों की पहली बारिश होती है और सूखे मेवे नमी को अवशोषित करते हैं और एक पॉप के साथ खुलते हैं। पहाड़ी, जहां कर्वी उगते हैं, सूखे बीज की फली के फटने की तेज आवाज से भर जाते हैं, जो विस्फोटक रूप से उनके बीजों को बिखरने के लिए खोलते हैं। अब जल्द ही नए पौधे अंकुरित होते हैं और जंगल के गीले फर्श में अपनी जड़ें जमा लेते हैं। इस प्रकार, कर्वी की पूरी मृत पीढ़ी को नई पीढ़ी द्वारा तुरंत बदल दिया जाता है। नमी और तापमान के कारण पुरानी पीढ़ी के मृत पौधे सड़ने लगते हैं। जल्द ही वे अपने ‘बच्चों’ के लिए खाद बन जाते हैं।

जब कर्वी फूल, सीतामाता अभयारण्य में भागीबाउरी से सीतामाता मंदिर तक और फुलवारी-की-नल अभयारण्य में लुहारी से सोनाघाटी तक, ट्रेकिंग को गुस्सा आता है। माउंट आबू अभयारण्य की ऊपरी पहुंच के सभी ट्रेकिंग मार्ग कर्वी के खिलने पर सुरम्य हो जाते हैं। कर्वी के फूलों के वर्षों के दौरान विशेष रूप से नया जरगा और जूना जर्गटेम्पल्स के पास जरगा पहाड़ियों की यात्रा एक जीवन भर की उपलब्धि है।

राज्य में कर्वी के खिलने के प्रामाणिक रिकॉर्ड गायब हैं। राज्य के विभिन्न हिस्सों में कर्वी के खिलने के रिकॉर्ड को बनाए रखना स्थानीय विश्वविद्यालयों और वन विभाग का कर्तव्य है। वन अधिकारियों को सलाह दी जाती है कि जब वे मैदान में हों तो प्रकृति की इस अद्भुत घटना का अनुभव करें। एक वन अधिकारी अपनी सेवा अवधि में मुश्किल से चार खिलते चक्र देख सकता है। कृपया कर्वी के अगले खिलने वाले मौसम की उपेक्षा न करें।

पाना – पाना में पानरवा  !! “फुलवारी अभ्यारण की एक रोमांचक यात्रा”

पाना – पाना में पानरवा !! “फुलवारी अभ्यारण की एक रोमांचक यात्रा”

अगस्त 1986 में एक दिन कमलनाथ पर्वत और फिर जाडापीपला गांव से जंगलों की पैदल यात्रा करता हुआ मैं ढाला गाँव पहुँचा | यहाँ से पानरवा पहुँचने के लिये एक ऊँचा पर्वत चढकर और फिर एक दूसरे पहाड के बीच से एक दर्रे को पार करना पडता है। पानरवा पहुँचने के बाद फुलवारी अभयारण्य के जंगल भी दिखने लग जाते है। ढाला गाँव में  एक बुजुर्ग अनुभवी भील को साथ लिया जो पहले पहाड की चोटी  तक मुझे रास्ता दिखाने के लिये आगे आया। चढाई कठिन थी लेकिन चढना ही था। पहाड की चोटी पर पहुँचते ही बुजुर्ग ने अपनी उंगली पश्चिम दिशा में करते हुऐ उत्साह से कहा – लो साब ये देखो पाना – पाना में पानरवा !! यानी वह कहना चाह रहा था कि यहाँ से आगे हर पत्ते – पत्ते में पानरवा है। यानी अब आपको रास्ते भर पानरवा का एहसास होता रहेगा। पहाड की चोटी से अभी भी पानरवा कोई 7-8 किमी. दूर था। लेकिन पहाडों पर हरियाली आन्नदित करने वाली थी जो किसी भी दूरी को  थकान रहित करने में सक्षम थी। इस नजारे को बाद में मैनें सेकड़ो बार पैदल चल -चल कर देखा है। पानरवा सुंदर गाँव है जिसका जिक्र कर्नल टाॅड ने भी किया है।

गर्मी में जब तनस ( Ougeinia oogeinsis ) वृक्ष सफ़ेद फूलो से लद जाते है तो पहाड़ो के ढाल जगह – जगह ` फुलवारी ` नाम को साकार कर देते है |

प्राचीन काल में पानरवा एक छोटा ठिकाना रहा है जो तत्कालीन मेवाड़ राज्य के दक्षिणी छोर पर गुजरात सीमा पर स्थित भोमट भूखंड है। तत्कालीन काल में  मेवाड राज्य के अन्तर्गत होते हुये भी यह ठिकाना सदैव स्वायत्तशासी रहा। इस भूखंड की वैद्यानिक स्थिति भूतकाल में अन्य जागीरों से भिन्न रही। यह क्षेत्र भूतकाल में भौगोलिक रूप से अगम्य रहा जिससे वह स्वतंत्र सा रहा। यहाँ सोलंकी शासकों का राज्य रहा जिनका मेवाड की बजाय गुजरात के जागीरदारों से ज्यादा संबंध रहा। पानरवा ठिकाना पूर्ण दीवानी, फौजदारी, माली एवं पुलिस अधिकारों का प्रयोग करता था। यहाँ के ठिकानेदार सोलंकी राजवंश के हैं जो पहले रावत तथा बाद में राणा की उपाधि धारण करने लगे। वर्ष 1478 ई. में अक्षयराज सोलंकी ने पानरवा पर अधिकार किया। तब से आगामी 470 वर्षों तक यह ठिकाना उनके वंशजों के पास बना रहा। 1948 ई. में राजस्थान राज्य निर्माण के बाद जब जागीरी व्यवस्था समाप्त हुई, तब इस सोलंकी ठिकाने का भी राजस्थान के नये एकीकृत राज्य में विलय हो गया। यहाँ सोलंकियों की अभी तक 22 पीढियाँ रही हैं। वर्तमान में 22 वी पीढी का प्रतिनिधित्व राणा मनोहरसिंह सोलंकी करते हैं।

दुर्लभ पीला पलाश ( Butea monosperma var.lutea ) फुलवारी में कहीं – कहीं विघमान है | लाल फूलों के पलाशों के बीच इस उपप्रजाति का पुष्पन दूर से ही नजर आ जाता है |

पानरवा एवं आस-पास के जंगल देखने लायक हैं। ये जंगल जूडा, ओगणा, कोटडा, अम्बासा, डैया, मामेर आदि जगहों तक फैले हैं जो गुजरात के खेडब्रह्म, आन्तरसुंबा व वणज तक फैले हैं। पानरवा के जंगल जैव विविधता, सघनता एवं सुन्दरता के लिये जाने जाते हैं। अक्टूबर 6, 1983, को पानरवा के जंगलों को फुलवाडी की नाल अभयारण्य नाम से एक अभयारण्य के रूप में घोषित किया गया। वाकल नदी यहाँ के सघन वनों के बीच से निकल कर गऊपीपला गाँव के पास गुजरात में प्रवेश कर जाती है। एक समय था जब यह पश्चिम प्रवाह वाली नदी वर्ष पर्यन्त बहती रहती थी लेकिन अब यह 8-9 माह ही बह पाती है। भले ही कुछ दिनों इसका बहाव रूकता हो लेकिन इसके पाट में जगह- जगह गहरे पानी के दर्रे सालभर भरे रहते हैं। बीरोठी गाँव के पास वाकल नदी में मानसी नदी भी मिल जाती है। इस संगम से गऊपीपला गाँव तक नदी में 34 पानी के दर्रे हैं जो नदी का प्रवाह रूकने के बाद भी वन्यजीवों को पेयजल उपलब्ध कराते हैं।

गर्मी के प्रारंभ में पतझड़ के बाद जब पर्ण विहीन टहनियों पर सफ़ेद – नीले – ललाई मिश्रण वाले रंगों से रंगे कचनार ( Bauhinia ariegata ) पुष्पन करते है तो घाटियों की फिजा ही बदल जाती है |

फुलवाडी की नाल अभयारण्य दक्षिण अरावली क्षेत्र में विद्यमान है। यह अभयारण्य ’’नालों’’ का अभयारण्य कहलाता है। दो पहाडों के बीच गलीनुमा घाटी स्थानीय भाषा में ’’नाल’’ नाम से जानी जाती है। इस अभयारण्य में फुलवाडी की नाल, गामडी की नाल, खाँचन की नाल, ढेढरी की नाल, गुरादरा की नाल, हुकेरी की नाल, बडली की नाल, केवा की नाल आदि प्रसिद्व नाल हैं। अरावली की नाल,  विंद्याचल के खोहों  ( Gorges ) की बनावट में अलग होते हैं। विंद्याचल के खोह ’’U’ आकार के खडे तटों वाले होते हैं लेकिन अरावली की नाल कुछ-कुछ ’’V’’ आकार के होते हैं तथा ढालू तट वाले होते हैं।

 

आदिवासी अपने देवालयों में मनोती पूर्ण होने पर टेराकोटा का बना घोडा अपर्ण करते है आस्था के प्रतिक “ भडेर बावसी” के “ थान “ पर धर्मावाल्म्भियो द्वारा अर्पित घोड़ो का हुजूम |

फुलवारी की नाल एक अद्भुत अभयारण्य है। यह राजस्थान में अरावली का एकमात्र ऐसा अभयारण्य है जहाँ काले धौंक (Anogeisus pendula) का एक भी वृक्ष नहीं है बल्कि काले धौंक का स्थान सफेद धौंक  (Anogeissus latifolia) ने ले लिया। राजस्थान के श्रेष्ठतम बाँस वन इस अभयारण्य में विद्यमान हैं। गामडी की नाल जैसे क्षेत्र में बाँस की ऊँचाई 24 फुट से ऊपर चली गई है। याद रहें वन विभाग के मापदण्ड अनुसार राजस्थान में 24 फुट बाँस को प्रथम श्रेणी बाँस माना जाता है। यह अभयारण्य जंगली केलों (Ensete superbum) की भी शरणस्थली है। केलों के झुरमुट रामकुण्डा वन से लेकर जूडा तक पहाडों पर इस कदर फैले है कि एक बार तो पश्चिमघाट के जंगल भी फीके पड जाते हैं। इस क्षेत्र में जंगली केला, जंगली हल्दी, जंगली अदरक (Costus peciosa),भौमिक ऑर्किड व पश्चिमी घाट तथा प्रायःद्विपीय प्रजातियों का बाँस एवं अन्य वनों में बाहुल्य है जिससे इन्हें ’’दक्षिण भारतीय शुष्क पतझडी वन’’ के रूप में जाना गया है।

फुलवारी अभयारण्य में कटावली जेर, अम्बावी, कवेल, महाद, अम्बामा एवं आम्बा (लुहारी गाँव के पास) क्षेत्र में महुआ वृक्ष राजस्थान के सर्वश्रेष्ठ महुआकुंज बनाते हैं। इन पर वृक्षीय आर्किडों का नजारा देखने लायक होता है। वर्षा में जब आर्किडों में फूल आते हैं तो वह नजारा अविस्मरणीय होता है। शीशम बेल, सफेद फूलों  का बाँदा (Dendrophthoe falcata), हिरोई बेल (Porana paniculata), श्योनख, पाडल, काली शीशम, बीजा, सादड, मोजाल, उम्बिया, जंगली मीठा करौंदा, कार्वी, हस्तीकर्ण (लीया मैक्रोफिल्ला), उडनगिलहरी, वृक्षीय मकडियाँ, वृक्षीय चीटियाँ, चैसिंगा, वृक्षीय साँपों की चार प्रजातियाँ, चट्टानों पर लगने वाली मधुमक्खी ’’राॅक बी’’ जैसी जैव विविधता की बहुलता इस अभयारण्य को विशिष्ठ बनाती है। वर्षा के बाद एवं सर्दी के आगमन से पूर्व दो ऋतुओं की संधी पर जब यहाँ हिरोई बेल पुष्पन करती है तो लगता हैं मानों जगह – जगह रूई के छोटे – बडे बादल भूमी पर गिर गये हों। यह वह नजारा है जो इस अभयारण्य के नाम को सार्थक करता हैं। यहाँ दुनियाँ का सबसे छोटा हिरण ’’माउस डियर’’ भी पूर्व में देखा जा चुका है लेकिन अभी उसकी स्थिति के बारे में ज्यादा सूचनायें उपलब्ध नहीं हैं। राजस्थान की फल खाने वाली चमगादड ’बागल’ भी सबसे अधिक इसी अभयारण्य में विद्यमान है। एक समय था जब यहाँ बाघों  का बाहुल्य था लेकिन अब वे नहीं रहे।मेवाड के रियासतकालीन शिकारगाहों में जहाँ शिकार होदियों (औदियों) का बाहुल्य है उसके विपरीत यहाँ कोई शिकार औदी नहीं है। यहाँबाघ का शिकार शिकार होदियों की बजाय दूसरी विधियों से किया जाता था। इस अभयारण्य में जुडलीगढ, देवलीगढ एवं भागागढ नामक छोटे- छोटे किले महाराणा प्रताप से संबंधित रहें है जिनमें भागागढ ज्यादा प्रसिद्ध है जो केवल  गाँव के पास सघन वन में स्थित है। मुगलकालीन हमलों में  महाराणा प्रताप यहाँ के जंगलों में रहे थे। उस समय इन किलों का उपयोग विभिन्न कार्यो में किया गया था। अभयारण्य में ’’बीज फाडिया’’ नामक ’फटा’ हुआ पहाड भी देखने लायक है जहाँ भालूओं व भमर नामक मधुमक्खियों का बडा बसेरा हैं।

खाँचन क्षेत्र में वाकल नदी में लंगोटिया भाटा नामक ’’द्वीपीय चट्टान ( Island Rock ) देखने लायक है। आदिवासियों का कहना है कि यह भगवान हनुमान का ’लंगोट’ है जो लक्ष्मण की मूर्छा के समय संजीवनी बूँटी के पहाड को परीवहन के समय हनुमान जी के तन से खुलकर यहाँ गिर गई था। लोग इस चट्टान के प्रति आपार सम्मान का भाव रखते हैं। परिस्थतिकी पर्यटकों हेतु यह लोकप्रिय सैल्फीपोईन्ट भी है।

पफ – थ्रोटेड बैबलर ( Pellorneum ruficeps ) जैसे अनेक दुर्लभ पक्षी फुलवारी के “ नाल – आवासो” में जब – तब देखने को मिल जाते है |

 

पानरवा में ब्रिटिशकाल का एक विश्राम गृह भी है जो वर्षा में ठहरने व सामने वाकल की बहती जलराशी को निहारने का अद्भुत मौका देता है। इस विश्राम ग्रह में रूक कर प्रकृति व स्थिानिय संस्कृति को पास से देखा व समझा जा सकता है।

हो सके तो आप वर्षा से सर्दी तक पानरवा अवश्य जाईऐ और वहाँ के ’पाने-पाने’ से जुुडिऐ। वहाँ ’पाने – पाने’ में पानरवा बसता है! हरा- भरा पानरवा!!

कार्वी: आठ साल में फूल देने वाला राजस्थान का अनूठा पौधा

कार्वी: आठ साल में फूल देने वाला राजस्थान का अनूठा पौधा

कार्वी, राजस्थान का एक झाड़ीदार पौधा जिसकी फितरत है आठ साल में एक बार फूल देना और फिर मर जाना…

कार्वी एक झाड़ीदार पौधा है जिसे विज्ञान जगत में “स्ट्रोबाइलैंथस कैलोसा (strobilanthes callosa)” कहा जाता है। भारत में कई स्थानों पर इसे मरुआदोना नाम से भी जाना जाता है। एकेंथेंसी (Acantheceae) कुल के इस पौधे का कुछ वर्ष पहले तक “कार्वीया कैलोसा (Carvia Callosa)” नाम रहा है। यह उधर्व बढ़ने वाला एक झाड़ीदार पौधा है जो पास-पास उगकर एक घना झाड़ीदार जंगल सा बना देता है। इसकी ऊंचाई 1.0 से 1.75 मीटर तक पाई जाती है और पत्तियां 8-20 सेंटीमीटर लंबी एवं 5-10 सेंटीमीटर चौड़ी व् कुछ दीर्घवृत्ताकार सी होती हैं जिनके किनारे दांतेदार होते हैं। पत्तियों में नाड़ियों के 8-16 जोड़े होते हैं जो स्पष्ट नज़र आते हैं। कार्वी में अगस्त से मार्च तक फूल व फल आते हैं। इसपर बड़ी संख्या में बड़े आकार के गहरे नीले रंग के आकर्षक फूल आते हैं और फूलों के गुच्छे पत्तियों की कक्ष में पैदा होते हैं तथा दूर से ही नजर आते हैं।

कार्वी एक झाड़ीदार पौधा है और इसपर बड़ी संख्या में बड़े आकार के गहरे नीले रंग के आकर्षक फूल आते हैं। (फोटो: श्री महेंद्र दान)

भारतीय वनस्पतिक सर्वेक्षण विभाग (Botanical Survey of India) द्वारा प्रकाशित “फ्लोरा ऑफ राजस्थान” के खण्ड-2 के अनुसार राजस्थान में यह पौधा आबू पर्वत एवं जोधपुर में पाया जाता है। इसके अलावा यह महाराष्ट्र, कर्नाटक, मध्यप्रदेश और पश्चिमी घाट की पहाड़ियों में दूर-दूर तक फैला हुआ है तथा मध्यप्रदेश में सतपुड़ा बाघ परियोजना क्षेत्र में इसका अच्छा फैलाव है।

आलेख के लेखक ने अपनी वन विभाग में राजकीय सेवा के दौरान इसे “फुलवारी की नाल, सीता माता एवं कुंभलगढ़ अभयारण्य” में जगह-जगह अच्छी संख्या में देखा है। सीता माता अभयारण्य में भागी बावड़ी से वाल्मीकि आश्रम तक यह खूब नज़र आता है और फुलवारी की नाल में खांचन से लोहारी की तरफ जाने पर “सोना घाटी क्षेत्र में दिखता है। दक्षिणी अरावली में यह प्रजाति अच्छे वन क्षेत्रों में कई जगह विद्यमान है। कमलनाथ, राम कुंडा, लादन, जरगा आदि वन खंडों में यह पायी जाती है। जरगा पर्वत पर बनास नदी के उस पार से नया जरगा मंदिर की तरफ यह झाडी जगह-जगह वितरित है। जब इसमें फूल आ रहे हो उस समय इसको ढूंढना है पहचानना बहुत सरल हो जाता है।

माउंट आबू अभयारण्य में कार्वी के फूलों को देखते हुए पर्यटक (फोटो: श्री महेंद्र दान)

फूल देना और फिर मर जाना है फितरत इसकी…

स्ट्रोबाइलैंथस वंश के पौधों का फूल देने का तरीका सबसे अनूठा है। इनमें 1 से 16 वर्षों के अंतराल पर फूल देने वाली भिन्न-भिन्न प्रजातियां ज्ञात हैं। इस वंश में “कुरंजी या नील कुरंजी (strobilanthes kunthiana)” सबसे प्रसिद्ध है जो हर 12 वर्ष के अंतराल पर सामुहिक पुष्पन करते हैं और फिर सामूहिक ही मृत्यु का वरण कर लेते हैं।

इस प्रजाति में नीलगिरी के पश्चिमी घाट के अन्य भागों में वर्ष 1838,1850,1862,1874,1886,1898,1910,1922,1934,1946,1958,1970,1982,1994, 2006 एवं 2018 में पुष्पन हुआ है अगला पुष्पन अब 2030 में होगा। स्ट्रोबाइलैंथस वेलिचाई में हर साल, स्ट्रोबाइलैंथस क्सपीडेट्स में हर सातवे साल तो राजस्थान में उगने वाले स्ट्रोबाइलैंथस कैलोसा अथवा कार्वी में हर आठवे साल फूल आते हैं।

राजस्थानी कार्वी करता है एक शताब्दी में बारह बार पुष्पन

राजस्थान में पायी जाने वाली प्रजाति स्ट्रोबाइलैंथस कैलोसा आठ साल के अंतराल पर पुष्पन करती है इसके पौधे 7 साल तक बिना फूल पैदा किए बढ़ते रहते है और आठवां वर्ष इनके जीवन चक्र के लिए एक अहम वर्ष होता है। वर्षा प्रारंभ होते ही गर्मी का मारा सूखा-सूखा सा पौधा हरा भरा हो जाता है तथा अगस्त से पुष्पन प्रारंभ करता है। पुष्पन इतनी भारी मात्रा में दूर-दूर तक होता है कि, आप दिनभर झाड़ियों के बीच ही रहना पसंद करते हैं। चारों तरफ बड़े-बड़े फूलों का चटक नीला रंग अद्भुत नजारा पेश करता है ऐसे समय में मधुमक्खियां, तितलियां,भँवरे व अन्य तरह-तरह के कीट-पतंगे व पक्षी फूलों पर मंडराते नजर आते हैं।

पुष्पन का यह क्रम 15-20 दिन तक चलता है तत्पश्चात फल बनने की प्रक्रिया प्रारंभ हो जाती है। वर्षा समाप्ति के बाद भूमि व पौधे के शरीर की नमी  का उपयोग कर फल बढ़ते व पकते रहते हैं और मार्च के आते-आते फल पक कर तैयार हो जाते हैं लेकिन बीज नीचे भूमि पर न गिरकर फलों में ही फंसे रह जाते हैं। (फोटो: श्री महेंद्र दान)

इधर राजस्थान में अप्रैल से गर्मी का मौसम शुरू हो जाता है और 8 साल का जीवन पूर्ण कर कार्वी खड़ा-खड़ा सूख जाता है यानी पौधे का जीवन समाप्त हो जाता है। इस तरह के पौधे को प्लाइटेशियल (plietesials) कहा जाता है। ऐसे पौधे कई साल बढ़वार करते हैं तथा फिर एक साल फूल देकर मर जाते हैं। अरावली में यही व्यवहार बांस का है जो 40 साल के अंतराल पर फूल व बीज देकर दम तोड़ देता है। प्लाइटेशियल पौधे की एक विशेषता और है कि, यह पौधे अधिक मात्रा में बीज पैदा करते हैं यह व्यवहार मास्टिंग (Masting) कहलाता है।

मानसून काल प्रारंभ होने पर वर्षा जल एवं हवा में मौजूद नमी को कार्वी का आद्रताग्राही फल सोख लेता है तथा फूलकर फटता हुआ कैद बीजों को बाहर उड़ेल देता है। बीज बिना इंतजार किए सामूहिक अंकुरण करते हैं और वनतल से विदा हुए बुजुर्ग कार्वी पौधों का स्थान उनके “बच्चे” यानी नए पौधे ले लेते हैं। अब यह नन्हे पौधे अगले 7 साल बढ़ते रहेंगे और अपने पूर्वजों की तरह आठवे साल पुष्पन करेंगे। इस तरह दो शताब्दीयो में कोई 25 बार यानी एक शताब्दी में 12 बार (या तेरह बार) पुष्पन करते हैं।

राजस्थान में सीता माता, फुलवारी, आबू पर्वत एवं कुंभलगढ़ में इस प्रजाति के पुष्पन पर अध्ययन की जरूरत है। इसके 8 साल के चक्रीय पुष्पन को ईको-टूरिज्म से जोड़कर स्थानीय लोगों को रोजगार के अवसर भी उपलब्ध कराए जा सकते हैं।

पौधशालाओं में पौध तैयार करके दक्षिण राजस्थान में इस प्रजाति का विस्तार भी संभव है। कार्वी क्षेत्रों में तैनात वनकर्मी भी इसपर निगरानी रखे तथा पुष्पन वर्ष की जानकारी आमजन को भी दे। वे स्वयं भी इसका आनंद लें क्योंकि राजकीय सेवाकाल में वे चार बार से अधिक इस घटना को नही देख पाएंगे।

 

Cover photo credit : Shri Mahendra Dan

आखिर क्या होते हैं “प्राणी प्रमाण” ?

आखिर क्या होते हैं “प्राणी प्रमाण” ?

हम जब वन क्षेत्र मे जाते हैं तो उस प्राकृतिक आवास के वन्य प्राणी हमें कहीं न कहीं, किसी न किसी जैविक गतिविधि में लिप्त नजर आते हैं। हर प्राणी, हर जगह एवं हर समय दिखाई नहीं देता। प्रत्येक वन्य प्राणी का अपना विशिष्ठि स्वभाव होता है। सबके अपने जगने, सोने, भोजन प्राप्ति हेतु  क्रियाशाील होने, प्रजनन गतिविधियाँ करने, खेलने, सुस्तानें, धूप सेकने, आदि का एक खास समय होता है। कुछ प्राणी रात्रि में सक्रिय रहते हैं एवं दिन में सोते रहते हैं या आराम करते हैं। इन्हें रात्रिचार (Nocturnal) प्राणी कहते हैं। कुछ सुबह-शाम सक्रिय रहते हैं बाकी रात्रि व दिन में सोते रहते हैं या आराम करते हैं। इन्हें क्रीपसकुलर (Cripuscular) प्राणी कहते हैं।

वन क्षेत्र के पथ पर वन्यजीव के पगचिन्ह (फोटो: डॉ जॉय गार्डनर)

इस तरह सक्रियता के आधार पर प्राणियों के तीन वर्ग होते हैं। इन वर्गों के कुछ उदाहरण निम्न हैं

क्र सं
वर्ग
उदाहरण
1 दिनचारी बन्दर, लंगूर, साँभर*, चीतल*, काला हिरण, चिंकारा, हाथी, गंगा डॉलफिन, नेवले, खरगोश*, जंगली मुर्गे, तीतर, बटेर, तोते आदि।
2 रात्रिचारी साँभर#, चीतल#, खरगोश#, जरख, भारतीय लोमड़ी, सिंह, बाघ$, तेंदुआ, शियागोश, रस्टी-स्पॉटेड कैट, मछुआ बिल्ली, छोटा बिज्जू, काला बिज्जू, पैंगोलिन, छुछुंदर, झाऊ चूहा, सेही, उडन गिलहरी, बागल, चमगादड. उल्लू, नाइटजार आदि।
3 क्रीपसकुलर बाघ, चूहा, हिरण, ऊद बिलाव, पतासी पक्षी आदि।

* रात्रिचर व्यवहार भी करते हैं , # दिनचारी व्यवहार भी करते हैं , $ क्रीपसकुलर व्यवहार भी करते हैं

दिनचारी प्राणी भी पूरे दिन सक्रिय नहीं रहते बल्कि कुछ खास घन्टों में ही अपनी सक्रियता ज्यादा बनाये रखते हैं बाकि समय किसी सुरक्षित जगह व्यतीत करते हैं। यही बात रात्रिचर प्राणियों पर लागू होती है। वे भी कुछ खास घन्टों अधिक सक्रिय रहते है। बाकी समय सुरक्षित जगह पर चले जाते हैं।

वन्यजीवों के चिन्हों का अवलोकन करते हुए वन्यजीव प्रेमी (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

कोई व्यक्ति प्राणी अवलोकन हेतु वन में दिन में निकलता है एवं माना उसे उडन गिलहरी की तलाश है तो चाहे वह वन में कितना ही घूमे, संभावना यह रहेगी कि उसे उडन गिलहरी नहीं मिलेगी। उडन गिलहरी रात्रि में निकलेगी जबकि व्यक्ति उसे दिन में तलाश कर रहा है। यानी प्राणी भौतिक रूप से साक्षात दिन में नज़र नहीं आयेगा, परन्तु रात्रि में जब वह सक्रिय बना रहा था उस समय उसने कई प्रमाण पीछे छोडे़ होंगे जो प्रकृति में मिलने की पूरी संभावना होती है। मसलन किसी महुये या सालर वृक्ष के नीचे टहनियों के छोर पत्तियों के भूमि पर बेतरतीब बिखरे मिलेंगे। यदि इन टहनियों के निचले चोरों का अवलोकन किया जाये तो पायेंगे कि वहाँ इनसाइजर दाँतों से कुतरने के स्पष्ट निशान हैं। यह एक ऐसा पुख्ता प्रमाण है जो दिन में गिलहरी दिखाई न देने के बावजूद रात्रि में उसकी उपस्थिती को निश्चायक रूप से प्रमाणित करता है। यहाँ महुये की कुतरी टहनियां “प्राणी प्रमाण“ कहलायेंगी। प्रकृति में जब भी हम वन पथों, पगंडडियों या आवास के दूसरे भागों में घूमते हैं, हमें तरह-तरह के प्राणी प्रामाण देखने को मिलाते हैं। ये सब किसी न किसी प्रजाति विशेष के चिन्ह या प्रमाण होते हैं जो उसकी उपस्थिति को सिद्व करते हैं। जब भी हम वन में अकेले जायें या एक गाइड के रूप में जायें, प्राणी नजर नहीं भी आ रहे हो तो रास्तों पर व उनके आस-पास, तिराहों व चौराहों पर ध्यान से देखेंगे तो कोई न कोई निशानात अवश्य मिलेंगे।

आजकल वन्यजीवों की गतिविधियों की निगरानी करने के लिए “कैमरा ट्रैपिंग” तकनीक का प्रयोग किया जाता है (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

कुछ प्राणी प्रमाण :

प्रकृति में अनेक प्राणी प्रमाण देखने को मिलते हैं। हमारे क्षेत्र में मिलने वाले कुछ प्राणी प्रमाण निम्न हैः

  • चलने के दौरान बने पैरों के निशान (Pugmark & Hoof Mark)
  • रेंगने के निशान: सरीसृप् वर्गो के प्रार्णीयों के चलने के दौरान पैर,पेट व पूँछ द्वारा बनाये घसीट जैसे निशान
  • घसीट के निशानः माँसाहारी प्राणी कई बार शिकार को घसीट कर सुरक्षित स्थान पर ले जाते हैं। शिकार को घसीटने से जमीन की घास व पौधे मुड़ जाते हैं तथा एक घसीट का स्वच्छ निशान बन जाता है।
  • कंकाल व शव के अवशेषः माँसाहारी प्राणियों द्वारा किसी शाकाहारी का शिकार करने के बाद उसे खाने के उपरान्त हडियों का ढाँचा छोड दिया जाता है। ताजा स्थिति में खाल,बाल,पेट में भरा चारा आदि भी मौके पर मिलते हैं। दुर्गन्ध भी मिलती है। समय के साथ जरख प्राणी कंकाल को भी इधर-उधर कर देते हैं फिर भी कुछ अवशेष कई दिनों तक पड़े मिल जाते हैं।

बाघ और जंगल कैट के पगचिन्ह (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

  • किलः माँसाहारी प्राणी द्वारा बडा शाकाहारी मारने पर वह एक से अधिक दिन खाया जाता है। मरा हुआ प्राणी किल के रूप मेें जाना जाता है। कई बार किल पर दूर से देखने पर गिद्व व कौवे भी मँडराते देखे जाते हैं। किल दो प्रजातियों की उपस्थिती सिद्व करता है। एक शाकाहारी प्रजाति व दूसरी माँसहारी प्रजाति की।
  • पंखः पक्षी मॉल्टिग द्वारा अपने पंख स्वयं भी गिराते हैं एवं किसी शिकारी प्राणी द्वारा मारे जाने पर भी बेतरतीब पंख बिखरे मिल सकते हैं। पंखों को पहचान कर पक्षी की प्रजाति पहचानी जा सकती है।

आंकड़ों का संग्लन करते समय हमेशा पगचिन्ह के साथ एक मापक रखना चाहिए ताकि पगचिन्ह के आकार का अंदाजा लगाया जा सके (फोटो: डॉ जॉय गार्डनर)

  • छाल उतारने व छाल खाने के निशानः नर साँभर व नर चीतल एन्टलरों की वेलवेट सूख जाने पर किसी वृक्ष के तने या टहनी के एण्टलर रगड़-रगड़ कर सूखी खाल उतारते हैं। इस प्रयास में वृक्ष की छाल भी छिल जाती है। साँभर चीतल के मुकाबले अधिक ऊंचाई पर छाल उतारता है। इस तरह वृक्ष की छिली छाल व उसकी ऊंचाई को देख कर साँभर व चीतल की उपस्थिति जानी जा सकती है। सेही व लंगूर भी हरे वृक्षों व झाडियों की छाल को खाते हैं। सेेही छाल उतारने में ऊपरी व निचले जबडे के 2-2 इनसाइजर दाँतों का उपयोग करती है अतः छीलने के स्थान पर दो-दो इनसाइजरों के स्पष्ट निशान मिलते हैं। लंगूर केनाइन का उपयोग करता है अतः पौधे के तने पर अकेले केनाइन का लकीरनुमा निशान मिलता है।
  • नखर चिन्हः तेदुआ जब वृक्ष पर चढता है तो अपने नाखून छाल में गडा कर चढता व उतरता है। इस प्रयास में तने की छाल में खरौंचनुमा निशान उभर आते हैं। भालू चढता है तब भी वृक्ष की छाल में नाखून गड़ाने से खरौंच का निशान बनता है। लेकिन तेदुऐ के नाखून पैने होने से छाल में सँकरी व गहरी खरौंच बनती है।
  • घौंसलेः हर पक्षी के घौंसले की बनावट, रखने का स्थान,बनाने में प्रयोग की गई सामग्री के बहुत अंतर होता है। घौंसले के प्रकार को देख कर पक्षी की प्रजाति को पहचाना जा सकता है। घौंसलों के पास टूटे अण्डों के खोल, बीटों के प्रकार आदि का मुल्यांकन कर भी पक्षीयों की प्रजाति को पहचाना जा सकता है। घौंसले किसी प्रजाति के वहाँ होने के अच्छे प्रमाण होते हैं।
  • अवाजेंः जंगल में तरह-तरह की आवाज़ें सुनने को मिलती हैं। बाघ या तेंदुऐ की उपस्थिति में शाकाहारी प्राणी जैसे साँभर, चीतल, नीलगाय आदि डर के मारे अलार्म काल निकलते हैं। इन आवाजों को पहचान कर शाकाहारी प्रजाति की उपस्थिति व प्रजाति का निर्धारण किया जा सकता है। माँसाहारी के वहाँ होने का भी प्रमाणीकरण हो जाता है। ऐसे ही डिस्ट्रेसकॉल भी बिल्ली या साँप पास होने पर पक्षी करते हैं। पक्षियों के बच्चे भोजन माँगने हेतु बैगिंगकाल करते है। प्रजनन में प्राणी प्रणय आवाजें निकालते हैं। आवाजों को समझने का एक पृथक विज्ञान है जिसे “आवाज विज्ञान“ कहते हैं।

अन्य प्रमाणः कुतरे फल व बीज, केंचुली,मल, मैंगणी, बिल, मल की ढेरी, मुड़ी हुई घास, चरे हुये पौधे, वृक्षों के तनों पर रगड़ के निशान या कींचड़ रगडने के निशान, बीटिंग पाथ(बार-बार चलने से बने रास्ते) आदि प्रकृति में अनेक प्राणियों की उपस्थिति का संकेत देते हैं।

सेही का मल (फोटो: श्री महेंद्र दन)

निम्न स्थानों पर प्राणियों के अप्रत्यक्ष प्रमाण मिलने की संभावना अधिक रहती हैः
  1. कच्चे वन पथ
  2. पगंडडिया व गेम टेªल
  3. तिराहे व चौराहे
  4. जल स्त्रोतों के पास
  5. दो आवासों के मिलन स्थल पर

सेही के पैर, इस से आप अंदाज लगा सकते हैं की इसका पगचिन्ह कैसा दिखेगा (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

प्राणी प्रमाणों का महत्वः

हम हर बार उस समय जंगल में नहीं जा सकते जब कोई प्राणी सक्रिय रूप से घूम रहा हो। हम नियमों एवं प्रबन्ध व्यवस्था का पालन करते हुये किसी खास घन्टों में ही जंगल में जा सकते हैं। हो सकता है उन घन्टों में प्राणी अपनी दैनिक क्रियाएं पूर्ण कर सोने व आराम करने चला गया हो। इन विषम घन्टों में यदि हम प्राणी प्रमाणों को ढूंढें तो हमारी यात्रा का उद्देश्य व आनन्द किसी हद तक पूर्ण हो जाते हैं। अतः प्राणी प्रमाणों को ढूढने की काबलियत व उनको समझने की क्षमता विकसित करनी चाहिये।