राजस्थान में मिला एक नया मेंढक : Uperodon globulosus (इंडियन बलून फ्रॉग )

राजस्थान में मिला एक नया मेंढक : Uperodon globulosus (इंडियन बलून फ्रॉग )

“राजस्थान के चित्तौरगढ़ जिले की एक पिता पुत्र की जोड़ी ने अपनी सुबह की सैर के दौरान खोजी एक नयी मेंढक प्रजाति।”

राजस्थान के बेंगु (चित्तौरगढ़ जिले ) कस्बे में 21  जुलाई 2020 को राज्य के लिए एक नए मेंढक को देखा गया। यह मेंढक Uperodon globulosus है इसे सामान्य भाषा में “इंडियन बलून फ्रॉग” भी कहा जाता है क्योंकि यह अपना शरीर एक गुब्बारे की भांति फुला लेता है।  राजस्थान में इस मेंढक की खोज एक पिता पुत्र की जोड़ी ने की है- श्री राजू सोनी एवं उनके 12 वर्षीय पुत्र श्री दीपतांशु सोनी जब सुबह की सैर के लिए जा रहे थे तो उन्हें यह मेंढक रास्ते पर मिला, उस स्थान के पास लैंटाना की घनी झाड़ियां है एवं मूंगफली एवं मक्के के खेत है।  श्री सोनी ने  मोबाइल के सामान्य कैमरे से इसके कुछ चित्र लिए। जिनके माध्यम से प्रसिद्द जीव विषेशज्ञ श्री सतीश शर्मा ने इस मेंढक की पहचान की।  राजस्थान में इसी Uperodon जीनस के दो अन्य  मेंढक भी मिलते है –Uperodon systoma एवं Uperodon taprobanicus।  श्री राजू सोनी सरकारी अस्पताल में नर्स के पद पर कार्यरत है। टाइगर वॉच के श्री धर्मेंद्र खांडल मानते है की यह यद्पि  Uperodon globulosus प्रतीत होता है  परन्तु एक पूर्णतया नवीन प्रजाति भी हो सकती है, अतः इस पर गंभीता से शोध की आवश्यकता है।

Uperodon globulosus “इंडियन बलून फ्रॉग” (फोटो: श्री राजू सोनी)

Uperodon globulosus location map

 

Uperodon globulosus का पर्यावास जहाँ यह पाया गया (फोटो: श्री राजू सोनी)

इस मेंढक Uperodon globulosus की खोज एक जर्मन वैज्ञानिक Albert Günther ने 1864 में की थी। यह एक भूरे रंग का गठीले शरीर का  मेंढक है जो 3  इंच तक के आकार का होता है। शुष्क राज्य राजस्थान में मेंढ़को में अब तक मिली यह 14 वे नंबर की प्रजाति है I राजस्थान में इसका पहली बार मिलना अत्यंत रोचक है एवं हमें यह बताता है की राजस्थान में मेंढको पर खोज की संभावना अभी भी बाकि हैI

श्री राजू सोनी चित्तौरगढ़ के सरकारी अस्पताल में नर्स के पद पर कार्यरत है तथा वन्यजीवों की फोटोग्राफी के साथ-साथ उनके संरक्षण में रूचि रखते है।
श्री दीपतांशु सोनी अपने पिता के साथ खोजयात्राओं में जाते हैं तथा वनजीवों में रूचि रखते हैं।

 

घड़ियालों के नए आवास की खोज

घड़ियालों के नए आवास की खोज

“टाइगर वॉच द्वारा किये गए एक सर्वेक्षण में, पार्वती नदी में घड़ियालों की एक आबादी की खोज के साथ ही यह पुष्टि की गयी है की पार्वती नदी घड़ियालों के लिए एक नया उपयुक्त आवास है।”

घड़ियाल, जो कभी गंगा की सभी सहायक नदियों में पाए जाते थे, समय के साथ मानवीय हस्तक्षेपों और लगातार बढ़ते जल प्रदुषण के कारण गंगा से विलुप्त हो गए, तथा आज यह केवल चम्बल तक ही सिमित है। वर्तमान में चम्बल नदी में 600 व्यस्क घड़ियाल ही मौजूद है तथा यह अपने आवास के केवल 2 प्रतिशत भाग में ही सिमित हैं, जबकि सन् 1940 में घड़ियाल कि आबादी 5000-10000 थी। पृथ्वी पर जीवित मगरमच्छों में से सबसे लम्बे मगरमच्छ “घड़ियाल” केवल भारतीय उपमहाद्वीप पर  ही पाए जाते है। एक समय था जब घड़ियाल भारतीय उपमहाद्वीप कि लगभग सभी नदियों में पाये जाते थे परंतु आज यह केवल चम्बल नदी में ही मिलते हैं। सन् 1974 में इनकी आबादी में 98 प्रतिशत गिरावट देखते हुए वैज्ञानिकों द्वारा इसे विलुप्तता के करीब माना जाने लगा तथा IUCN कि लाल सूची (red list) में इनको घोर-संकटग्रस्त (Critically Endangered) श्रेणी में शामिल किया गया। स्थिति को देखते हुए सरकार व वैज्ञानिकों ने एक साथ इसके संरक्षण के लिए ठोस कदम उठाये और घड़ियालों के फलने-फूलने के लिए विशेष स्थान उपलब्ध कराने हेतु नए अभयारण्यों की स्थापना की गई। राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य (NCS) भारत का पहला और एकमात्र संरक्षित क्षेत्र हैं जो तीन राज्यों में फैला हुआ है तथा मुख्यरूप से मगरमच्छ प्रजाति के संरक्षण के लिए बनाया गया है। आज, चंबल अभयारण्य में गंभीर रूप से लुप्तप्राय घड़ियाल (Gavialis gangeticus) की सबसे बड़ी और विकासक्षम प्रजनन आबादी पायी जाती है। चम्बल नदी की तीन मुख्य सहायक नदियाँ हैं; पार्वती, कालीसिंध व बनास नदी, तथा पार्वती-चम्बल संगम से लेकर 60 किमी तक पार्वती नदी संरक्षित क्षेत्र में शामिल है, परन्तु अन्य दो नदियाँ NCS के बाहर हैं। प्रतिवर्ष चम्बल नदी में घड़ियालों की आबादी के लिए सर्वेक्षण किये जाते हैं तथा हर प्रकार की गतिविधि पर नज़र रखी जाती है, परन्तु इसकी सहायक नदियों में इनकी मौजूदगी व स्थिति का कोई दस्तावेजीकरण नहीं है।

घड़ियाल, को कभी-कभी गेवियल भी कहा जाता है, यह एक प्रकार के एशियाई मगरमच्छ होते हैं जो स्वच्छ प्रदुषण रहित नदियों में रहते हैं, तथा अपने लंबे, पतले, सकड़े जबड़े के द्वारा पहचाना जाता हैं। यह भूमि के लिए अच्छी तरह से अनुकूल नहीं हैं, और इसलिए ये आमतौर पर केवल धूप सेकने और घोंसले तक जाने के लिए ही पानी से बहार निकलते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

वैज्ञानिकों और प्रकृतिवादियों के लिए बहुत ही ख़ुशी की बात यह है की हाल ही में हुए एक अध्ययन से घड़ियालों की एक बड़ी आबादी की उपस्थिति पार्वती व बनास नदी तथा इनके प्रजनन की पुष्टि पार्वती नदी से की गई है। यह अध्ययन रणथम्भौर स्थित टाइगर वॉच संस्था द्वारा रणथम्भौर के भूतपूर्व फील्ड डायरेक्टर श्री वाई.के साहू के दिशा निर्देशों में वर्ष 2015 से 2017 तक किया गया तथा इसकी रिपोर्ट 17 जनवरी को आईयूसीएन पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। इस अध्ययन के लिए प्रेरणा तब मिली जब वर्ष 2014 में एक घड़ियाल को रणथम्भौर वन विभाग द्वारा बनास नदी से बचाया गया था। इस अध्ययन के अंतर्गत वर्ष 2015 से 2017 तक प्रतिवर्ष सभी तीन सहायक नदियों पर सर्वेक्षण किये गए, ताकि घड़ियाल व मगरमच्छों की उपस्थिति के लिए प्रत्येक सहायक नदी की क्षमता का आकलन किया जा सके। वर्ष 2015 व 2016 में फरवरी माह में सर्वेक्षण किए गए तथा वर्ष 2017 में प्रजनन आबादी की मौजूदगी जानने के लिए जून माह में भी सर्वेक्षण किए गए। प्रत्येक सहायक नदी के बहाव क्षेत्र (पार्वती 67 किमी, काली सिंध 24 किमी, बनास 53 किमी) का सर्वेक्षण किया गया, तथा नदी के किनारे पर सभी प्रकार की मानवीय गतिविधियों को भी दर्ज किया गया।

इस अध्ययन द्वारा यह पता चला की पार्वती नदी में घड़ियालों की एक अच्छी आबादी और बनास नदी में कुछ पृथक घड़ियाल उपस्थिति है, जबकि कालीसिंध नदी में केवल मगर ही पाए जाते हैं।

घड़ियाल अन्य मगरमच्छों की तरह शिकार नहीं करते हैं- इनके थूथन (snout) में संवेदी कोशिकाएँ होती हैं जो पानी में होने वाले कंपन को पता लगाने में मदद करती हैं। यह पानी के अंदर अपने मुँह को खोल कर धीरे-धीरे मछली के पास जाते हैं और दुरी शून्य होने पर फुर्ती से मछली को जबड़े में पकड़ लेते हैं, जिसमे सौ से अधिक दांतों के साथ पंक्तिबद्ध होते हैं। जहाँ वयस्क मछली खाते हैं, तो वहीँ इनके छोटे बच्चे कीड़े, क्रस्टेशियन और मेंढक खाते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

पार्वती नदी का सर्वेक्षण:

पार्वती नदी में वर्ष 2015 में 14 और 2016 में 29 वयस्क घड़ियाल दर्ज किये गए, तथा सर्वेक्षण के दौरान एक नर घड़ियाल भी पाया गया, जिसके कारण वर्ष 2017 में सर्वेक्षण प्रजनन के समय यानी जून माह में किया और इस वर्ष कुल 48 वयस्क और 203 घड़ियाल के छोटे बच्चे पाए गए। पार्वती नदी (~ लंबाई में 159 किमी) मध्य प्रदेश में विंध्य पहाड़ियों की उत्तरी ढलानों से निकलती है और यह बारां जिले के चतरपुरा गाँव के पास से राजस्थान में प्रवेश करती है, जहाँ यह मध्य प्रदेश और राजस्थान के बीच 18 किलोमीटर की सीमा बनाती है। फिर बहती हुए यह नदी कोटा जिले के पाली गांव के पास चम्बल नदी में मिल जाती है। यह एक सतत बहने वाली नदी है जिसके किनारे रेत, चट्टानों और शिलाखंडों से युक्त होने के कारण अपने आप में ही एक अद्वितीय पारिस्थितिक तंत्र है।

पार्वती नदी में घड़ियालों का वितरण दर्शाता मानचित्र

बनास नदी का सर्वेक्षण:

अध्ययन के दौरान बनास नदी में वर्ष 2015 में 1 और 2016 में केवल 5 घड़ियाल ही पाए गए। यह घड़ियाल के कोई स्थायी आबादी नहीं थे, बल्कि वर्षा ऋतु में नदी में पानी बढ़ जाने की वजह से चम्बल नदी से बह कर इधर आ जाते हैं और नदी में पानी कम हो जाने के समय ये कुछ छोटे इलाके जहाँ पानी हो वही मुख्य आबादी से दूर पृथक रह जाते है। बनास नदी (~ 512 किमी) की उत्पत्ति राजसमंद जिले के कुंभलगढ़ से लगभग 5 किलोमीटर दूर अरावली की खमनोर पहाड़ियों से होती है। यह राजस्थान के मेवाड़ क्षेत्र से उत्तर-पूर्व की ओर बहती है, और सवाई माधोपुर जिले के रामेश्वर गाँव के पास चम्बल में मिल जाती है। इस नदी पर वर्ष 1999 में बीसलपुर बांध के निर्माण के बाद यह सूख गई तथा यह केवल तब ही बहती है जब वर्षा ऋतु में बाँध से अधिशेष पानी निकाला जाता है, और अन्य समय इसके कुछ गहरे कुंडों में ही पानी बचता है, तथा इन कुंडों का आपस में बहुत कम या कोई प्रवाह नहीं होता है।

बनास नदी में घड़ियालों का वितरण दर्शाता मानचित्र

कालीसिंध नदी का सर्वेक्षण:

अध्ययन के दौरान इस नदी में कोई घड़ियाल नहीं मिला परन्तु इस नदी में मगरों की उपस्थिति पायी गयी। काली सिंध नदी (~ 145 किमी) मध्य प्रदेश के बागली (जिला देवास) से निकलती है और अहु, निवाज और परवन इसकी सहायक छोटी नदियां हैं। यह नदी राजस्थान में प्रवेश कर बारां और झालावाड़ जिलों से होकर उत्तर की ओर बहती है तथा कोटा जिले के निचले हिस्से में चम्बल में मिल जाती है। इस नदी के किनारे मुख्यरूप से सूखे, मोटी रेत, कंकड़-पत्थर और चट्टानों से भरे हुए हैं, परिणाम स्वरूप इसके किनारे कठोर, चट्टानी और बंजर हैं।

पार्वती नदी का 60 किमी का हिस्सा राष्ट्रीय चम्बल घड़ियाल अभयारण्य के अंतर्गत संरक्षित है। पहले, इस हिस्से का घड़ियालों द्वारा इस्तेमाल किये जाने के कोई रेकॉर्ड नहीं थे, परन्तु इस अध्ययन ने दृढ़ता से यह स्थापित किया है की पार्वती नदी का यह संरक्षित खंड चम्बल घड़ियाल अभयारण्य के भीतर घड़ियाल आवास का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है, क्योंकि घड़ियालों की एक आबादी इस हिस्से का घोंसले बनाने, प्रजनन, छोटे घड़ियालों के लिए उत्तम पर्यावास है। इसके विपरीत, सर्वेक्षण की गई अन्य दो नदियाँ बनास और कालीसिंध घड़ियाल के आवास के लिए बिलकुल भी उपयुक्त नहीं हैं। जहाँ एक तरफ बनास नदी पर बने बीसलपुर बाँध के कारण नदी कुछ छोटे गहरे खंडित कुंडों में बदल दिया है, और नदी केवल मानसून के दौरान बहती है जब बांध के द्वार खुले होते हैं। इस दौरान कभी-कभी, कुछ घड़ियाल चम्बल से बहकर इधर आ जाते है और पानी का स्तर कम होने पर इन्हींखंडों में फँसकर रह जाते हैं। वही दूसरी ओर कालीसिंध नदी मुख्यतः चट्टानी हैं, जिसमें रेतीले क्षेत्र बहुत ही कम हैं। चम्बल अभयारण्य की सीमा के बहार होने और किसी भी प्रकार का संरक्षण नहीं होने के कारण इस नदी के आसपास मानवीय हस्तक्षेप व् दबाव बहुत अधिक है।

घड़ियाल, ग्रीष्म ऋतू के शुष्क मौसम के दौरान अपने घोंसले बनाते व् प्रजनन करते हैं, और मादाएं धीमे बहाव वाले किनारे पर रेत में अंडे देती हैं। लगभग 70 दिनों के बाद बच्चे अण्डों से बाहर आते हैं, और यह अपनी मां के साथ कई हफ्तों या महीनों तक रहते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

मौसमी रूप से कम पानी की अवधि के दौरान, पार्वती और काली सिंध नदियाँ चंबल के लिए पानी का प्राथमिक स्रोत हैं। तीन बड़े बाँध (गांधी सागर, जवाहर सागर, और राणा प्रताप सागर) और कोटा बैराज ने चम्बल की मुख्यधारा में पानी के बहाव को गंभीर रूप से सीमित कर दिया है, जिसके कारण शुष्क मौसम के दौरान जल निर्वहन लगभग शून्य होता है। इस प्रकार पार्वती नदी न सिर्फ चम्बल के लिए प्रमुख जल स्रोत के रूप में अपनी भूमिका निभाती है बल्कि पार्वती नदी के निचले हिस्से घड़ियाल के लिए उपयुक्त अन्य आवास भी प्रदान करती हैं।

घड़ियाल पर्याप्त रेत के साथ स्वच्छ व् तेजी से बहने वाली नदियों को पसंद करते हैं, और उसमें भी विशेष रूप से गहरे पानी वाले स्थान इन्हें ज्यादा पसंद होता है। हाल ही में हुए कुछ अध्ययनों से पता चलता है कि घड़ियाल मौसमी लम्बी दूरी की यात्रा भी करते हैं, जहाँ यह मानसून में अच्छा भोजन उपलब्ध करवाने वाले प्रमुख संगमों के आसपास रहते हैं तो वहीं मानसून के बाद, सर्दियों, और मानसून के पहले यह अपने प्रजनन व् घोंसला बनाने वाले स्थानों पर चले जाते हैं। मादा घड़ियाल विशेष रूप से रेतीले हिस्सों पर स्थित उपनिवेशों में घोंसला बनाना पसंद करते हैं जो गहरे पानी से सटे हुए हो तथा वहां रेत की मात्रा भी ज्यादा हो। यह भी देखा गया है की घड़ियालों का पसंदीदा क्षेत्र दशकों तक एक ही रहता है परन्तु नदी की स्थानीय स्थलाकृतियों में आने वाले बदलाव के आधार पर यह थोड़ा बहुत बदलते भी रहते हैं। लोगों द्वारा पारंपरिक नदी गतिविधियां घड़ियाल को नदी के आस-पास के आवासों का उपयोग करने से नहीं रोकती हैं, लेकिन घड़ियाल आमतौर पर उन क्षेत्रों में रहने से अक्सर बचते है जहाँ रेत खनन और मछली पकड़ने का कार्य किया जाता है। नदियों में जुड़ाव होना भी बहुत ही आवश्यक है क्योंकि यह घड़ियाल को प्रजनन और घोंसले बनाने के लिए अपनी जगह बदलने के लिए सक्षम बनाता है।

यह अध्ययन न केवल चम्बल अभयारण्य के अपस्ट्रीम खंडों के उपयुक्त घड़ियाल आवास और महत्वपूर्ण जल स्रोत के रूप में महत्व पर प्रकाश डालता है, बल्कि पार्वती सर्वेक्षणों से प्रजनन, वयस्कों और घड़ियालों के घोंसलों की पुष्टि भी करता हैं। परन्तु अध्ययन में इन नदियों के आसपास कई मानवीय गतिविधियां जैसे जल प्रदूषण, मछली पकड़ना, नदी के पानी की निकासी, रेत खनन आदि दर्ज की गई जो इन घड़ियालों और मगरों के अस्तित्व को खतरे में डालती हैं। नदियों में पानी कम होने, मछलियों के कम होने के कारण और कई बार मछलियों के जाल में फंस जाने के कारण भी इनकी संख्या कम हो गई है। इन गतिविधियों के साथ-साथ कई बार मानव-घड़ियाल संघर्ष भी इनके लिए बड़ा खतरा बनजाता है, ऐसा वर्ष 2016 में बनास नदी के पास हुआ था जब कुछ लोगों ने एक नर घड़ियाल की दोनों आँखें फोड़ दी और उसके मुंह के ऊपर वाला जबड़ा भी तोड़ दिया।

आज हम देखे तो सभी मानवीय गतिविधियां (जल प्रदूषण, मछली पकड़ना, नदी के पानी की निकासी, रेत खनन आदि) अभ्यारण्य के पुरे पारिस्थितिक तंत्र को प्रभावित कर घड़ियालों तथा अन्य जीवों के अस्तित्व को एक बड़े खतरे में डालती  हैं और इसीलिए वर्तमान में आवश्यकता है स्थानीय लोगों को जागरूक किया जाए तथा अभ्यारण्य के आसपास अवैध मानवीय गतिविधियों को नियंत्रित किया जाये।

सन्दर्भ:
  • Khandal, D., Sahu, Y.K., Dhakad, M., Shukla, A., Katdare, S. and Lang, J.W. 2017. Gharial and mugger in upstream tributaries of the Chambal river, North India. Crocodile Specialist Group Newsletter 36(4): 11.16

 

एलो ट्राईनर्विस: राजस्थान की एक नई एलो प्रजाति

एलो ट्राईनर्विस: राजस्थान की एक नई एलो प्रजाति

“राजस्थान के बीकानेर जिले में पायी गई एक नई वनस्पति प्रजाति… “  

केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI), जोधपुर और बोटैनिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के कुछ शोधकर्ताओं द्वारा राजस्थान के बीकानेर जिले से एलो ट्राईनर्विस (Aloe trinervis) नामक एक नई वनस्पति की प्रजाति की खोज की गई है।  इस प्रजाति में फूलों के ब्रैट्स में तीन तंत्रिकाएं (nerve) मौजूद होने के कारण इस प्रजाति का नाम ट्राईनर्विस रखा गया हैं क्योंकि यह लक्षण इस प्रजाति के लिए विशेष और अद्वितीय हैं तथा इस प्रजाति में जून-अगस्त माह में फूल तथा सितम्बर-अक्टूबर माह में फल आते हैं।

Aloe trinervis के फूल (फोटो: Kulloli et. al.)

वनस्पतिक जगत के परिवार Asphodelaceae के जीनस “Aloe” में लगभग 600 प्रजातियां शामिल हैं जो ओल्ड वर्ल्ड (अफ्रीका, एशिया और यूरोप) सहित, दक्षिणी अफ्रीका, इथियोपिया और इरिट्रिया में वितरित हैं। इस जीनस की प्रजातियां शुष्क परिस्थितियों में फलने-फूलने के लिए अनुकूलित होती हैं तथा इनकी मोटी गुद्देदार पत्तियों में पानी संचित करने के टिश्यू होने के साथ-साथ एक मोटी छल्ली (cuticle) होती है। हालांकि भारत में इन सभी प्रजातियों में से केवल एक ही प्रजाति “अलो वेरा (Aloe vera)” सबसे अधिक व्यापकरूप से वितरित है। शोधकर्ताओं; सी.एस. पुरोहित, आर.एन. कुल्लोली और सुरेश कुमार की कड़ी मेहनत द्वारा इस नई प्रजाति की रिपोर्ट के साथ ही अब भारत में इस जीनस की दो प्रजातियां हो गई हैं। डॉ चंदन सिंह पुरोहित बोटैनिकल सर्वे ऑफ इंडिया में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत हैं। यह घासों के विशेषज्ञ हैं जिन्होंने 100 से अधिक शोध पत्र, 2 पुस्तकें प्रकाशित की हैं। डॉ रविकिरन निंगप्पा कुल्लोली, पिछले 12 वर्षों से रेगिस्तान की जैव विविधता पर शोध कर रहे है। इन्होने प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पत्रिकाओं में 30 शोध पत्र प्रकाशित किए हैं तथा वर्तमान में यह राजस्थान और गुजरात राज्यों के वन क्षेत्रों के आनुवंशिक संसाधनों के दस्तावेजीकरण और मानचित्रण पर कार्य कर रहे है। डॉ सुरेश कुमार, सेवानिवृत्त प्रधान वैज्ञानिक (आर्थिक वनस्पति विज्ञान) और केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) जोधपुर के विभागाध्यक्ष थे। इन्होने डेजर्ट इकोलॉजी पर विशेषज्ञता हासिल की है और अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पत्रिकाओं 250 से अधिक शोधपत्र और 10 पुस्तके प्रकाशित की हैं। साथ ही इन्होने चट्टानी, चूना पत्थर और जिप्सम वाले परियावासो को पुनः स्थापित करने तकनीक विकसित की है।

आखिर एलो ट्राईनर्विस और एलो वेरा में अंतर क्या है: एलो ट्राईनर्विस में पत्तियों के सिरों पर हल्के घुमावदार छोटे कांटे होते हैं, 3-नर्व्ड ब्रैक्ट्स, शाखित पुष्पक्रम (inflorescence), हल्के पीले-हरे रंग के फूल मध्य से भूरे व् 31-34 मिमी तक लम्बे होते हैं तथा इनके पुंकेसर की लम्बाई 29–33 मिमी तक होती हैं। जबकि एलो वेरा में पत्तियों के सिरों पर त्रिकोणाकार छोटे कांटे होते हैं, 5-नर्व्ड ब्रैक्ट्स, अशाखित पुष्पक्रम (inflorescence), संतरी-पीले रंग के फूल 29-30 मिमी तक लम्बे होते हैं तथा इनके पुंकेसर की लम्बाई 24–26 मिमी तक होती हैं। वर्तमान में इस नई प्रजाति एलो ट्राईनर्विस को शिवबाड़ी-जोरबीर संरक्षित क्षेत्र, बीकानेर, राजस्थान से एकत्रित किया गया हैं।

Aloe trinervis: A, inflorescence; B, leaf upper surface and margin; C, leaf lower surface and margin; D, white spots in young leaves; E, teeth; F, bract; G, bud; H, flower; I, perianth outer side; J, perianth inner side; K, stamens; L, pistil (Photo: C.S. Purohit & R.N. Kulloli).

Comparative plant parts of Aloe trinervis and Aloe vera (A & B) with respect to (1) inflorescence, (2) corolla ventral view, (3) corolla dorsal view, (4) teeth arrangement, (5) bud, (6) floral bract, (7) teeth shape (Photo: C.S. Purohit & R.N. Kulloli).

दोनों प्रजातियों एलो वेरा और एलो ट्राईनर्विस को CAZRI, जोधपुर में डेजर्ट बॉटनिकल गार्डन में लगाया गया है, तथा इसके नमूने BSI, AZRC, जोधपुर में संगृहीत हैं। स्थानीय लोग इसकी पत्तियों को सब्जी और अचार बनाने के लिए इकट्ठा करते हैं। इसकी पत्तियों का उपयोग त्वचा उपचार के लिए औषधीय रूप के रूप में भी किया जाता है। और जानकारी के लिए सन्दर्भ में दिए शोधपत्र को देखें।

संदर्भ:
  • Cover picture Kulloli et. al.
  • Kumar S., Purohit C.S., and Kulloli R. N. 2020. Aloe trinervis sp. nov.: A new succulent species of family Asphodelaceae from Indian Desert. Journal of Asia-Pacific Biodiversity. 13:325-330.
शोधकर्ता:

Dr. Chandan Singh Purohit (1)(L&R): Dr. C.S. Purohit is working as Scientist at Botanical Survey of India. He is grass expert and published more than 100 research papers, 2 books on taxonomy, conservation biology, new taxa. He has also worked on vegetation of Shingba Rhododendron Sanctuary, Sikkim.

Dr. Kulloli Ravikiran Ningappa (2): He is working on desert biodiversity since last  12 years. He has published 30 research papers in reputed international and national journals. He has hands on GIS mapping, Species Distribution Modelling. Currently he is working on documentation and mapping of Forest Genetic Resources of Rajasthan and Gujarat states.

Dr. Suresh Kumar (3): He is retired Principal Scientist (Economic Botany) & Head of Division of Central Arid Zone Research Institute (CAZRI) Jodhpur. He has expertise on Desert Ecology and published more than 250 research papers in international and national journals and 10 books. He has developed technology to rehabilitate rocky habitats, limestone, gypsum and lignite mine spoils.

 

 

 

 

टिड्डी या लोकस्ट: दुनिया का सबसे पुराना प्रवासी कीट

टिड्डी या लोकस्ट: दुनिया का सबसे पुराना प्रवासी कीट

टिड्डी दल का आगमन आम तो बिल्कुल नहीं है, वे एक क्रम का पालन करते हुए आते हैं। पहले, एक काफी छोटा झुंड मानो उन्हें भूमि का सर्वेक्षण करने के लिए भेजा गया हो। और फिर आती है एक ऐसी लहर जिसका सिर्फ एक उद्देश्य – दुनिया से हरियाली खत्म करने का…

कीट दुनिया में मानव जाति की तुलना में काफी पहले से मौजूद रहे हैं। जमीन के नीचे से लेकर पहाड़ी कि चोटी तक सर्वव्यापी कीट मनुष्य के जीवन से बहुत हद जुड़े हुए हैं। कुछ उपयोगी हैं तो कुछ अत्यधिक हानिकारक हैं। इन्हीं हानिकारक कीटों में शामिल हैं रेगीस्तानी टिड्डे (डेजर्ट लोकस्ट) जो मनुष्य के लिए चुनौतियों कि पराकाष्ठा रचते हैं। एफएओ के अनुसार ये दुनिया की दस फीसदी आबादी की ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं जिससे इन्हें दुनिया का सबसे खतरनाक कीट भी कहा जाता है। इनसे उत्पन्न चुनौतियाँ नई भी नहीं है, वे आदि काल से मानव जाति के लिए संकट साबित होते रहे हैं।

औसतन हर छह वर्षों में एक बार जरूर आते हैं, और ऐसे आते हैं मानो जैसे मनुष्यों का अंत करके ही जाएंगे। वे घरों पर पूरी तरह छा जाते हैं, खिड़कियों पर झूलते हैं, गुजरती गाड़ियों से टकराते हैं और ऐसे काम करते हैं जैसे कि उन्हें सिर्फ विनाश के ही लिए भेजा गया है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

ये अत्यधिक गतिशील झुंड में मॉरीतानिया (Mauritania) से भारत और तुर्कमेनिस्तान से तंजानिया तक एक विशाल क्षेत्र को प्रभावित करते हैं जिसके कारण इन देशों में रहने वाले लोग बुरी तरह से फसलों के नुकसान को झेलते हैं। विश्व बैंक सहित कई विकास एजेंसियों ने प्रभावित देशों को इनके नियंत्रण में सहायता की है, पर स्थिति में कुछ बदलाव नहीं आया है, क्योंकि इनके आने का कोई निश्चित समय नहीं है। ये अनियमित अंतराल पर तो कभी-कभी कई वर्षों के अंतराल के बाद दिखाई देते हैं। इस अनियमितता को टिड्डी गतिविधि की आवधिकता (periodicity) कहा जाता है। जिसके 1812 के बाद से भारत में कम से कम 15 चक्र दर्ज किए गए हैं। पिछले साठ वर्षों में रेगिस्तानी टिड्डे कि दो बड़ी लहरें (1968, 1993) देखने को मिली है और ये लगातार आज भी अनियमित अंतराल पर आते हैं और एक महामारी बनकर उभरते हैं।

वर्ष 2020, मानव जाति के लिए अब तक काफी चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है। जहां एक ओर पूरी दुनिया नॉवेल कोरोनोवायरस महामारी से लड़ रही है और इसके प्रसार को रोकने के लिए ज़िंदगियाँ समेट अपने घरों में बंद है, तो वही दूसरी ओर कुछ अफ्रीकी और एशियाई देशों में प्रकृति ने टिड्डियों के झुंड (लोकस्ट स्वॉर्म) के रूप में एक नया खतरा पैदा किया है। ये टिड्डियाँ एक बार फिर अपने विकराल रूप में हमारे सामने हैं और फसलों पर कहर बरपा रहे हैं। इस बार इनके आगमन के अलग-अलग कारण बताए जा रहे हैं, कोई बदलते भूमि स्वरूप को कारण बता रहा, तो कोई रेगिस्तानी क्षेत्रों में बढ़ी हरियाली, वही कुछ ऐसे भी हैं जो पृथ्वी के बढ़ते तापमान को कारण बता रहे हैं। इनके आगमन के बारे में जानने से पहले लोकस्ट से संक्षिप्त में परिचित हो लेते हैं।

लोकस्ट एक्रीडिडे (Acrididae) परिवार से छोटी सींग वाले टिड्डे (short-horned grasshopper) की कुछ प्रजातियों के झुंड बनाने कि अवस्था (स्वार्मिंग फेज) है। लोकस्ट और ग्रासहॉपर की प्रजातियों के बीच कोई टैक्सोनोमिक अंतर नहीं है, ये ग्रासहॉपर कि तरह ही दिखते हैं लेकिन व्यवहार में उनसे बिल्कुल अलग होते हैं। ग्रासहॉपर कृषि भूमि पर पाए जाते हैं जबकि लोकस्ट रेगिस्तानी और शुष्क परिस्थितियों में पाए जाते हैं। ग्रासहॉपर में कोई रूपात्मक बदलाव देखने को नहीं मिलता जबकि लोकस्ट के नब्बे दिनों के जीवनकाल में कई बदलाव देखने को मिलते हैं।

लोकस्ट दुनिया का सबसे पुराना एवं अत्यधिक विनाश क्षमता के कारण ध्यानाकर्षी प्रवासी कीट है। लोकस्ट मुख्यतः ग्रासहॉपर ही होते हैं जो सूखे घास के मैदान और रेगिस्तानी इलाकों में अत्यधिक पाए जाते हैं। आमतौर पर लोग ग्रासहॉपर (long-horned grasshopper) को भी लोकस्ट समझ बैठते हैं क्यूँकि ग्रासहॉपर भी गर्मियों कि अनुकूल परिस्थितियों में प्रजनन कर संख्या बढ़ाते हैं और एक सीमित क्षेत्र में फसलें नष्ट करते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

ये टिड्डे आमतौर पर एकान्त वासी होते हैं लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में फेनोटाइपिक बदलाव (phenotypic shift) के कारण संख्या बढ़ने पर व्यवहार में कुछ बदलाव (phase change) के साथ ये झुण्ड में रहना (ग्रीगेरियस) और प्रवासी व्यवहार (migratory behaviour) का प्रदर्शन करने लगते हैं। बस इसी आधार पर इनको परिभाषित किया गया है। इस परिवर्तन को तकनीकी भाषा में “घनत्व-निर्भर फेनोटाइपिक प्लास्टिसिटी” (density-dependent phenotypic plasticity) कहा जाता है।

पहली बार बोरिस उवरोव (Boris Uvarov) ने अपरिपक्व टिड्डे (immature hopper) के झुंड में रहने वाले हॉपर के रूप में विकसित होने को फेज पॉलीमोरफिसम बताते हुए इनके दो चरणों (phases) कि व्याख्या की, पहला सॉलिटेरिया (solitaria) और दूसरा ग्रेगारिया (gregaria)। इन्हें वैधानिक (statary) और प्रवासी रूप (morphs) के रूप में भी जाना जाता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

एकान्तवासी टिड्डे शुष्क मौसम के दौरान सीमित क्षेत्र में बचे पेड़-पौधों के कारण एक साथ रहने के लिए मजबूर होते हैं। पीछे के पैरो की बढ़ती स्पर्श उत्तेजना से सेरोटोनिन के स्तर में वृद्धि होती है जो कि टिड्डे का रंग बदलने, अधिक खाने, और आसानी से प्रजनन करने का कारण बनता है। टिड्डियों का प्रजनन रेगीस्तानी इलाकों में होता है और अक्सर वनों, कृषि क्षेत्रों और देहाती आजीविका के साथ मेल खाता है। टिड्डियों के लिए कूल तीन प्रजनन के मौसम होते हैं (i) विन्टर ब्रीडिंग [नवंबर से दिसंबर], (ii) स्प्रिंग ब्रीडिंग [जनवरी से जून] और (iii) समर ब्रीडिंग [जुलाई से अक्टूबर]। भारत में टिड्डी प्रजनन का केवल एक मौसम, समर ब्रीडिंग, देखने को मिलता है। पड़ोसी देश पाकिस्तान में स्प्रिंग और समर ब्रीडिंग दोनों हैं।

टिड्डियों का जीवन चक्र तीन अलग-अलग चरण होते हैं, अंडा, हॉपर और वयस्क। टिड्डियाँ नम रेतीली मिट्टी में 10 सेन्टमीटर कि गहराई पर अंडे देती हैं। ग्रेगेरीअस मादाएँ आमतौर पर 2-3 बीजकोष (pods) में अंडे देती हैं जिसके एक पॉड में 60-80 अंडे होते हैं। सॉलिटेरियस मादा ज्यादातर 3-4 बीजकोष में औसतन 150-200 अंडे देती है। अंडों के विकास की दर मिट्टी की नमी और तापमान पर निर्भर करता है। 15°C से नीचे कोई विकास नहीं होता है। ऊष्मायन अवधि (incubation period) इष्टतम तापमान (Optimum temperature) 32-35 डिग्री सेल्सियस के बीच 10-12 दिन का होता है।

दुनिया भर में ग्रासहॉपर कि लगभग 28500 प्रजातियाँ हैं जिनमें से मात्र 500 ऐग्रिकल्चरल पेस्ट के रूप में मौजूद है और केवल 20 ही ऐसे हैं जो लोकस्ट बनने कि क्षमता रखते हैं। भारत में मुख्य तौर से चार प्रजातियां, रेगिस्तानी टिड्डा या डेसर्ट लोकस्ट (Schistocerca gregaria), अफ्रीकी प्रव्राजक टिड्डा या अफ्रीकन माइग्रटोरी लोकस्ट (Locusta migratoria), बम्बई टिड्डा या बॉम्बे लोकस्ट (Patanga succincta) और वृक्षीय टिड्डा या ट्री लोकस्ट (Anacridium spp.) सक्रिय रहती हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

ऊष्मायन पूरा होने के बाद अंडे हैच होते हैं और निम्फ (युवा) बाहर आते हैं जिन्हें “हॉपर” कहा जाता है। ग्रीगेरियस चरण में 5 इंस्टार और सॉलीटेरियस आबादी में 5-6 इंस्टार होते हैं। प्रत्येक इंस्टार में एक अलग वृद्धि और विशेष रंग का परिवर्तन होता है। हॉपर का विकास दर तापमान पर निर्भर करता है। जहां 37°C के औसत तापमान पर 22 दिन लगते हैं तो वही 22°C के औसत तापमान पर 70 दिनों तक कि देरी हो सकती है।

पाँचवी इन्स्टार अवस्था के बाद हॉप्पर वयस्क हो जाते है। इस परिवर्तन को ‘फलेजिन्ग’ कहा जाता है और युवा वयस्क को ‘फलेजलिङ्ग’ या ‘अपरिपक्व वयस्क’ कहा जाता है।  यौन परिपक्वता की अवधि भिन्न होती है। उपयुक्त स्थिति में वयस्क 3 सप्ताह में परिपक्व हो सकता है और ठंढे और / या सूखे कि स्थिति में 8 महीने का समय लग सकता है। इस चरण के दौरान वयस्क अनुकूल प्रजनन स्थिति की खोज के लिए उड़ान भरते हैं और हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर सकते हैं। इस दौरान अगर किसी भी समय अनुकूल परिस्थितियाँ मिले तो वे ग्रेगेरीअस हो सकते हैं।

युवा अवयस्क टिड्डे हैचिंग के समय एकान्तवासी होते है और अपने परिवेश के साथ फिट होने के लिए हरे और भूरे रंग के होते हैं। जब भोजन बहुतायत में होता है तो डेसर्ट लोकस्ट प्रजनन कर संख्या बढ़ाते हैं और “ग्रेगेरीअस अवस्था” प्राप्त करते हैं। युवा अपरिपक्व वयस्क रंग में गुलाबी होते हैं जबकि पुराने वयस्क ठंड की स्थिति में गहरे लाल या भूरे रंग के हो जाते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

जैसे-जैसे वे बड़े और सघन होते जाते हैं वे एक समूह के रूप में कार्य करते हुए व्यावहारिक बदलाव के साथ उड़ने वाला झुंड बनाते हैं जिसे स्वॉर्म कहते हैं। टिड्डे के झुंड के रूप में परिवर्तन चार घंटे की अवधि में प्रति मिनट कई संपर्कों से प्रेरित होता है। हजारों वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले एक बड़े झुंड में अरबों टिड्डे हो सकते हैं, जिनकी आबादी लगभग 80 मिलियन प्रति वर्ग किलोमीटर होती है। इस बिंदु पर टिड्डे पूरी तरह से परिपक्व और वयस्क होते हैं। परिपक्वता पर वयस्क चमकीले पीले हो जाते हैं। नर मादा से पहले परिपक्व होते हैं। टिड्डों के व्यवहार और शारीरिक लक्षणों में परिवर्तन प्रतिवर्ती होते हैं जिससे अंत में अपने मूल रूप में बदल सकते हैं या अपनी संतानों को पारित कर सकते हैं।

लगभग तीन महीने के प्रजनन चक्र के बाद टिड्डे एक अंडे से वयस्क होते हैं और संख्या में 20 गुना वृद्धि ला सकते हैं। यह छह महीने के बाद 400 गुना और नौ महीने के बाद 8,000 तक बढ़ सकता है। ये हजारों लाखों के झुण्ड में आकर पेड़ों, पौधों या फसलों के पत्ते, फूल, फल, बीज, छाल और फुनगियाँ सभी खा जाते हैं। ये इतनी संख्या में पेड़ों पर बैठते हैं कि उनके भार से पेड़ टूट तक सकता है। एक टिड्डा अपने वज़न के बराबर भोजन चट करता है यानी कम से कम दो ग्राम। उड़ते बैंड के टिड्डे भोजन कि कमी के दौरान एक-दूसरों को काटते हुए नरभक्षी क्रिया को भी दर्शाते हैं। रेगिस्तानी टिड्डियों में माइग्रैशन उनकी इस नरभक्षी क्रिया से प्रभावित होता है। सेपीदेह बज़ाज़ी  द्वारा किये शोध से पता चलता है कि टिड्डे के झुंड इसलिए बनते हैं क्योंकि वे अपने नरभक्षी पड़ोसी से खुद को बचाने के लिए एक कदम आगे रहना पसंद करते हैं।

टिड्डियों के स्वॉर्म के रूप में आगमन के लिए पूरी तरह से किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। इनके आगमन के पीछे एक प्राकृतिक क्रम है जिसका ये पालन करते हैं। हां, लैंड यूज पैटर्न में बदलाव, बढ़ते तापमान और हरियाली आदि महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन इसी प्राकृतिक क्रम में एक निश्चित काल पर। जैसे कि अंडे हैच होने के लिए उपयुक्त तापमान और नमी कि जरूरत, निम्फ्स को वयस्क होने के लिए भोजन के तौर पर हरियाली आदि कि जरूरत। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

टिड्डी दल के आगमन का जैविक सिद्धांत डॉ एस प्रधान द्वारा वर्ष 1967 में दिया गया था, जो उस समय भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली में एंटोमोलॉजी के प्रमुख थे। सिद्धांत के अनुसार टिड्डे अर्ध रेगिस्तानी इलाकों में प्रजनन करते हैं जहाँ 15 सेंटीमीटर की गहराई तक अंडे देने के लिए रेतीली मिट्टी उपयुक्त होती है। टिड्डे इन क्षेत्रों के भीषण वातावरण को सहने में सक्षम होते है, जबकि उनके शिकारी, जैसे कि छिपकली, सांप, पक्षी, छछूंदर, हेजहॉग, मोल्स आदि को रेगिस्तान और अर्ध रेगिस्तान की भीषण स्थितियों का सामना करने में मुश्किल आती है और इसलिए वे धीरे-धीरे भीषण क्षेत्रों कि परिधि पर अधिक सहिष्णु क्षेत्र कि ओर चले जाते हैं।

लेकिन रेगिस्तानी इलाकों में एक या दो दशक में एक बार पर्याप्त वर्षा होती है, जिससे सेज (sedge) घास और अन्य खरपतवारों का विकास होता है और टिड्डों को अपनी पूर्ण जैविक क्षमता के बराबर भोजन मिलता है। शिकारी जीव जो भीषण परिस्थितियों के कारण इनके प्रजनन क्षेत्र से बाहर परिधि कि तरफ चले गए थे, स्थिति सामान्य होने पर टिड्डियों कि आबादी को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त तेजी लौट नहीं पाते। इनकी आबादी शिकारियों की अनुपस्थिति में बहुत तेजी से बढ़ती है। प्राकृतिक दुश्मनों द्वारा अनियंत्रित, टिड्डी एकान्त चरण से प्रवासी चरण की ओर बढ़ती है और बड़े स्वॉर्म में विकसित होती है और अंत में प्रजनन के क्षेत्रों से बाहर निकलती है, जिससे भारी विनाश होता है। लोकस्ट स्वॉर्म के मरुस्थलीय क्षेत्रों से बाहर निकलने के बाद कुछ वयस्क और निम्फ की बिखरी हुई आबादी जो पीछे रह जाती है, सहिष्णु पर्यावरणीय परिस्थितियों के दूसरे चरण के आगमन तक एकान्तवासी चरण के रूप में मॉरिटानिया और भारत के बीच रेगिस्तान में हमेशा मौजूद रहते हैं।

ग्रासहॉपर दुनिया भर के चरागाह पारिस्थितिक तंत्र के प्रमुख घटक हैं और ट्रॉफिक गतिशीलता और पोषक तत्वों के साइक्लिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन जब अच्छी बारिश के कारण हरे-भरे घास के मैदान विकसित होते हैं तो ये रेगिस्तानी टिड्डे एक या दो महीने के भीतर तेजी से संख्या बढ़ा इकट्ठे होते हैं और एक भयानक झुंड का रूप ले लेते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

समय पर नियंत्रित नहीं किये जाने पर पंखहीन हॉपरों के छोटे समूह या बैंड पंखों वाले वयस्क टिड्डे के छोटे समूह या स्वॉर्म का निर्माण कर सकते हैं जिसे एक विस्फोट (OUTBREAK) कहा जाता है और यह आमतौर पर किसी देश के एक हिस्से में लगभग 5,000 वर्ग किमी तक होता है। यदि एक विस्फोट या समसामयिक कई विस्फोटों को नियंत्रित नहीं किया जाता है और आसपास के क्षेत्रों में व्यापक या असामान्य रूप से भारी बारिश होती है, तो प्रजनन के कई सिलसिलेवार मौसम बन सकते हैं जो आगे चलकर हॉपर बैंड और वयस्क झुंड के गठन का कारण बनते हैं। इसे अभ्युत्थान (UPSURGE) कहा जाता है और आम तौर पर पूरे क्षेत्र को प्रभावित करता है।

यदि एक अभ्युत्थान को नियंत्रित नहीं किया जाता है और पारिस्थितिक स्थिति प्रजनन के लिए अनुकूल रहती है तो टिड्डे की आबादी संख्या और आकार में वृद्धि जारी रखती है जो एक महामारी (PLAGUE) के रूप में विकसित हो सकता है। महामारी के समय अधिकांश संक्रमण बैंड और स्वार्म्स के रूप में होते हैं। जब दो या दो से अधिक क्षेत्र एक साथ प्रभावित होते हैं तो एक बड़ी महामारी होती है।

टिड्डी विस्फोट सामान्य है और आमतौर पर होते रहते हैं, इनमें से कुछ ही विस्फोट ऐसे हैं जो अभ्युत्थान का रूप लेते हैं और इसी तरह कुछ अभ्युत्थान महामारी का रूप। आखिरी महामारी को 1987-89 में तथा आखिरी बड़ा अभ्युत्थान 2003-05 में देखा गया था। अभ्युत्थान और महामारी किसी एक रात में नहीं उभरते, इन्हे विकसित होने में कई महीनों से लेकर एक या दो वर्ष का समय भी लग सकता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

वैश्विक स्तर पर लोकस्ट कि निगरानी संयुक्त राष्ट्र के फूड एण्ड ऐग्रिकल्चर ऑर्गेनाइजेसन (FAO) का लोकस्ट वॉच विभाग करता है जिसके मुताबिक वर्तमान टिड्डियों के आतंक की कहानी साल 2018 में अरबी प्रायद्वीप पर आए चक्रवाती तूफानों और भारी बारिश के साथ शुरू हुई थी। मई के तूफान से ही इतना पानी हो गया कि अगले छह महीनों के लिए रेगिस्तान में हरियाली उपजी जिस पर टिड्डियों की दो पीढ़ियां जीवन गुज़ार सकती थीं। इसके बाद अक्टूबर के तूफान के कारण टिड्डियों को प्रजनन और पनपने के लिए और कुछ महीनों का आधार मिल गया जहां इनकी तीन पीढ़ियाँ पली। यहां से ये खतरनाक हुईं और साल 2019 से अफ्रीका को निशाना बनाया। चक्रवातों के चलते ओमान और यमन जैसे दूरदराज के एकदम अविकसित इलाकों में टिड्डियों ने अपनी आबादी बढ़ाई।

एफएओ के लोकस्ट विशेषज्ञ कीथ क्रेसमैन के मुताबिक मानव संसाधन और उपग्रहों के माध्यम से संस्था टिड्डियों के दलों के संकट को लेकर निगरानी रखती है, लेकिन इस मामले में नाकाम साबित हुई। मॉनिटरिंग नेटवर्क ध्वस्त हो गया। क्रेसमैन के मुताबिक किसी को नहीं पता था कि धरती के इस दूरस्थ इलाके में तब क्या हो रहा था। इस इलाके में कुछ नहीं है, सड़कें नहीं हैं, कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है, फेसबुक नहीं, कुछ भी नहीं है। कुछ है तो रेत के बड़े बड़े टीले हैं, जो स्काईस्क्रेपरों से कम नहीं हैं।

जब टिड्डियों के दल झुंड में रहने की प्रवृत्ति विकसित कर लेते हैं, तब ये मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट वाले भोजन पर निर्भर करने लगते हैं। जिस मिट्टी से लगातार फसलें ली जा चुकी हैं और जो ज़रूरत से ज़्यादा चराई जा चुकी है, उसमें से नाइट्रोजन गायब हो चुकी है। इसकी वजह से प्रोटीन तो मिट्टी में है नहीं इसलिए कार्बोहाइड्रेट बहुलता वाली घासें पैदा होती हैं। विशेषज्ञों ने दक्षिण अमेरिकी टिड्डियों पर किए अध्ययन में यह पाया है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

साल 2018 के आखिर में जब ओमान में लोगों ने टिड्डियों के दलों को देखा तब कहीं जाकर क्रेसमैन की संस्था तक खबर पहुंची और अलर्ट कि स्थिति बनी। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। यहां से टिड्डियों के दल यमन और ईरान तक पहुंच चुके थे और ओमान से लगातार निकलते हुए सामने आ रहे थे। युद्धग्रस्त रहे यमन के पास टिड्डियों के हमले से लड़ने के लिए फोर्स न होने का संकट था। यमन में इन स्थितियों के दौरान भारी बारिश हुई और टिड्डियों के दलों को प्रजनन के साथ ही और पनपने का अनुकूल वातावरण मिल गया। पिछले (2019) के बसंत और गर्मियों के मौसम में टिड्डियों की आपदा यहां से सोमालिया पहुंची और उसके बाद इथोपिया और केन्या में कहर टूटा। बीते मार्च अप्रैल में पूर्वी अफ्रीका में भारी बारिश हुई, जो फिर टिड्डियों के लिए वरदान साबित हुई। पिछले चालीस वर्षों में, रेगिस्तानी टिड्डे का निवारक रणनीति (preventive strategy) से नियंत्रण प्रभावी साबित हुआ है लेकिन टिड्डियों के विनाशकारी आवृत्ति और अवधि में कमी आने से लापरवाही और संगठनात्मक समस्याओं के कारण टिड्डियों का झुंड एक बार फिर गंभीर समस्या बनकर उभरा है।

हमले के समय टिड्डियों का सामना करना बहुत मुश्किल है क्योंकि ये बहुत बड़े इलाके में फैली होती हैं। टिड्डियों से निपटने में प्रारंभिक हस्तक्षेप ही स्वॉर्म को रोकने का एकमात्र सफल उपाय है। दुनिया भर के कई संगठन टिड्डियों से खतरे की निगरानी करते हैं। वे निकट भविष्य में टिड्डियों से पीड़ित होने की संभावना वाले क्षेत्रों का पूर्वानुमान प्रदान करते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

एफएओ की डेजर्ट लोकस्ट इनफार्मेशन सर्विस (DLIS) रोम, इटली से मौसम, पारिस्थितिक स्थितियों और टिड्डियों की स्थिति की दैनिक निगरानी करती है। DLIS प्रभावित देशों में राष्ट्रीय टीमों द्वारा किए गए सर्वेक्षण और नियंत्रण कार्यों के परिणाम प्राप्त करता है और इस जानकारी को उपग्रह डेटा, जैसे कि MODIS, वर्षा के अनुमान और मौसमी तापमान और वर्षा की भविष्यवाणी आदि के साथ जोड़कर वर्तमान स्थिति का आकलन कर अगले छह सप्ताह में होने वाले प्रजनन और प्रवास कि सूचनाओं का अनुमान लगता है।

भारत में वनस्‍पति संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय (DPPQ&S) द्वारा गठित टिड्डी चेतावनी संगठन (Locust Warning Organisation) विभाग को अनुसूचित रेगिस्तानी क्षेत्रों (Scheduled Desert Area) विशेष रूप से राजस्थाान और गुजरात राज्यों में रेगिस्तानी टिड्डी पर निगरानी, सर्वेक्षण और नियंत्रण का उत्तरदायित्व सौंपा गया है। LWO, DLIS द्वारा जारी मासिक टिड्डी बुलेटिन के माध्यम से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मौजूदा टिड्डी की स्थिति की अद्यतन जानकारी रखता है। कृषि कार्यकर्ताओं द्वारा खेतों से टिड्डियों कि स्थिति के सर्वेक्षण कर आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं। फिर उन्हें LWO के मंडल कार्यालयों, क्षेत्रीय मुख्यालय, जोधपुर और केन्द्रींय मुख्यालय, फरीदाबाद भेजा जाता है जहां पर उनका परस्पर मिलान करके संकलित किया जाता है और टिड्डी के प्रकोप और आक्रमण की संभावना के अनुसार पूर्व चेतावनी के लिए विश्लेषण किया जाता है। टिड्डी की स्थिति से राजस्थान और गुजरात की राज्य सरकारों को अवगत कराया जाता है और उन्हें परामर्श दिया जाता है कि वे अपने कार्यकर्ताओं को तैयार रखें। टिड्डी सर्वेक्षण के आंकड़ों को शीघ्रता से भेजने, उनका विश्लेषण करने के लिए e-locust2 / e-locust3 और RAMSES जैसे नवीन साफ्टवेयर का उपयोग किया जाता है।

ऐतिहासिक तौर पर लोग फसलों को टिड्डियों से बचाने अक्षम थे, हालांकि, आज हमारे पास पूर्वजों की तुलना में टिड्डियों से लड़ने के लिए गहन ज्ञान और प्रौद्योगिकी का फायदा है लेकिन फिर भी प्रभावित क्षेत्रों के अधिक फैलाव (16-30 मिलियन किमी), सीमित संसाधन, अविकसित बुनियादी ढाँचा और उन क्षेत्रों की पारगम्यता, आदि के कारण टिड्डियों को नियंत्रित या रोक पाना मुश्किल हो जाता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

वर्तमान में, रेगिस्तानी टिड्डी के संक्रमण को नियंत्रित करने की प्राथमिक विधि ऑर्गनोफॉस्फेट केमिकल्स (हर्बिसाइड और कीटनाशक में प्रमुख घटक) कि छोटी-छोटी गाढ़ी खुराकें हैं। जिनको वाहन पर लगे या फिर हवाई स्प्रेयरस से अति कम मात्रा में (ULV) छिड़क कर किया जाता है। कीटनाशक को टिड्डे सीधे या परोक्ष रूप से पौधे पर चलने से अथवा उनके अवशेषों को खाने पर अधिग्रहित कर लेते हैं। ये नियंत्रण पूरी तरह सरकारी एजेंसियों द्वारा किया जाता है। भारत के अनुसूचित रेगिस्तानी क्षेत्रों में प्रयोग के लिए DPPQ&S ने 4 कीटनाशक कि मंजूरी दी है। फसलों, बबूल, खैर और अन्य पेड़ों पर रेगिस्तानी टिड्डे के नियंत्रण के लिए 11 कीटनाशकों को मंजूरी दी है।

टिड्डियों के रोकथाम के लिए फन्जाइ, बैक्टीरीया, और नीम के रस से बने जैविक कीटनाशकों का उपयोग भी किया जाता है। कई जैविक कीटनाशकों की प्रभावशीलता पारंपरिक रासायनिक कीटनाशकों के बराबर है लेकिन सामान्य रूप से इनके इस्तेमाल से कीटों को मारने में अधिक समय लगता है। इनके रोकथाम के लिए प्रभावित क्षेत्रों में किसानों ने ऐसी फसलों को उगाना शुरू कर दिया है जिन्हें लोकस्ट स्वॉर्म के मौसम से पहले काटा जा सके। इसके अतिरिक्त, सेरोटोनिन के निषेध से लोकस्ट कि संख्या को प्रयोगशालाओं में नियंत्रित करने में सफलता मिली है, लेकिन इस तकनीक का फील्ड टेस्ट अभी बाकी है।

रेगिस्तानी टिड्डियों के शिकारी ततैया और मक्खियाँ (wasp and flies), परजीवी ततैया (parasitoid wasps), शिकारी बीटल लार्वा, पक्षी और सरीसृप आदि प्राकृतिक दुश्मन होते हैं। हाल ही में डॉ धर्मेन्द्र खांडल ने सवाई माधोपुर में जकोबीन कुक्कू, मोरनी को इनका शिकार करते देखा है। लेकिन इन शिकारियों कि सिमा है कि ये एकान्त आबादी को नियंत्रण में रखने में प्रभावी हो सकते हैं। स्वॉर्म और हॉपर बैंड में टिड्डों की भारी संख्या होने के कारण उनके खिलाफ इनका प्रभाव सीमित है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल) 

हालांकि टिड्डे के हमले को समाप्त करना लगभग असंभव है, लेकिन स्वॉर्मस पर आक्रमण करके, अंडे कि एक बड़ी संख्या को नष्ट कर इनकी गंभीरता को कम किया जा सकता है। वर्तमान ‘प्लेग’ को नियंत्रित करने के लिए प्रभावित देशों में कड़े प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन आखिरकार ये कैसे समाप्त होंगे यह कह पान मुश्किल है। फिलहाल मानसून ही इनके स्वॉर्म को कुछ हद तक नियंत्रित कर पाएगा।

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