एशिया के सबसे छोटे बोविड्स में से एक फोर हॉर्नड ऐन्टीलोप अपनी असामान्य चार सींगो के कारण जहाँ एक ओर लोकप्रिय रहे तो वहीं दूसरी ओर ये इनके संकटग्रस्त होने के कारण भी बने।

चौसिंगाया Four-horned Antelope (Tetracerus quadricornis), वर्तमान में, वनों में पाए जाने वाला एकमात्र चार सींगो वाला स्तनपायी जीव है जो मूल रूप से भारतीय प्रायद्वीप का स्थानिक जीव (endemic) के रूप में पाया जाता है। इसको राजस्थान कि स्थानीय भाषा में भेडल या गुटेर भी कहा जाता है। वर्ष 2016 में किए गए चौसिंगा के वैश्विक मूल्यांकन के अनुसार वनों में इसकी आबादी लगातार घटने और संकटग्रस्त होने कि वजह से IUCN ने इसे असुरक्षित (Vulnerable या VU) श्रेणी में वर्गीकृत किया हुआ है। चौसिंगा को अगर राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो येअत्यंत ही दुर्लभ जीव है जो यहाँ विलुप्त होने कि कगार पर है। मुख्यतः यह राजस्थान के पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में पाया जाता है। इसकी दुर्लभता कि पुष्टि इस बात से कि जा सकती है कि यहाँ ये अपने मौजूदा पर्यावास में भी वर्षों तक नजर नहीं आता, हाल ही में भैंसरोडगढ़ के वन्यजीव अभयारण्य बनने के 37 साल बाद पहली बार नजर आया।

IUCN ने वर्ष 2001 में मृगों (Antelopes) कि स्थिति और कार्य योजना बनाने के लिए एक वैश्विक सर्वेक्षण करवाया जिसके अंतर्गत भारतीय प्रायद्वीप पर चौसिंगा सर्वेक्षण डॉ असद आर रहमानी कि अगवाई में हुआ। इस सर्वेक्षण के अनुसार राजस्थान के 8 संरक्षित क्षेत्रों (राओली टोडगढ़, रणथंभोर, सरिस्का, दरा, जयसमंद, कुम्भलगढ़, फुलवारी, और सीतामाता) में चौसिंगा कि मौजूदगी दर्ज कि गई है। हालांकि डॉ रहमानी द्वारा सर्वेक्षण से रणथंभोर में चौसिंगा कि उपस्थिति दर्ज करने कि घटना को त्रुटिपूर्ण मानते हुए यहाँ वर्षों से बाघ संरक्षण के लिए काम कर रहे डॉ धर्मेन्द्र खांडल बताते हैं कि वर्तमान समय में चौसिंगा यहाँ कभी नहीं देखा गया है। राजस्थान कि जैव-विविधता के विशेषज्ञ डॉ सतीश शर्माके अनुसार चौसिंगा कि उपस्थिति जालोर, पाली, उदयपुर, अजमेर, धौलपुर, और चित्तौड़गढ़ में भी है। कोटा, झालावाड़ में भी इनकी उपस्थिति के संकेत अक्सर मिलते रहते हैं। कुछ वर्षों पहले वन्यजीव गणना के दौरान कोलीपूरा से गिरधरपूरा के जंगल में ये देखे गए थे। वर्षों से वन्यजीवों कि फोटोग्राफी कर रहे अब्दुल हानिफ जैदीसाब बताते हैं कि 5-7 वर्ष पूर्व (2013-14) दरा के पास एक मादा चौसिंगा को सड़क दुर्घटना में मृत पाया गया था।

The Book of Antelopes (1894) में प्रकाशित चौसिंगा का चित्रण

चौसिंगा भारतीय प्रायद्वीप पर व्यापक रूप से वितरित है, विश्व कि 95% आबादी भारत और शेष 5% नेपाल में पाई जाती है। भारत में हिमालय की तलहटी से लेकर दक्कन के पठार तक विस्तृत हैं। इनका वितरण ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में खुले, सूखे, पर्णपाती जंगलों में होता है। ये मृग घास आवरण या झाड़-झंखाड़ वाले जंगलों और निकटवर्ती जलाशयों में निवास करते हैं और मानवीय आबादी वाले क्षेत्रों से दूर रहने की कोशिश करते हैं।

चौसिंगा टेट्रिसस जीनस का एकमात्र सदस्य है। इसका का वर्णन पहली बार 1816 में फ्रांसीसी प्राणी शास्त्री हेनरी मैरी डुक्रोटेडेब्लेनविले ने किया था। चौसिंगा को ट्राइब बोसलाफिनी (Boselaphini) में रखा गया है, जिसमें चौसिंगा के अलावा मात्र नीलगाय (Boselaphus tragocamelus) को रखा गया है। वैसे तो ट्राइब बोसलाफिनी के सदस्यों में सामने की तरफ एक कील के साथ सींग होते हैं और अन्य मृग समूहों में पाए जाने वाले छल्ले की कमी है, लेकिन डॉ सतीश शर्मा के अनुसार चौसिंगा में हल्के छल्ले पाए जाते है। कॉलिन ग्रॉवस (2003) ने चौसिंगा को उनके खाल के रंग और विस्तार के अनुसार 3 उप-प्रजातियों में विभाजित किया है:

  • T. q. iodes (Hodgson, 1847): गंगा के उत्तर से नेपाल तक वितरित।
  • T. q. quadricornis (de Blainville, 1816): मुख्यतः भारतीय प्रायद्वीप पर वितरित।
  • T. q. subquadricornutus (Elliot, 1839) पश्चिमी घाट और दक्षिणी भारत में वितरित।

चौसिंगा, बोविडा परिवार (Bovidae) का एक जुगाली करने वाला (ruminant) एक छोटा और पतला गोकुलीय प्राणी (ungulate) है जिसके शरीर की लंबाई 1 मीटर और पूंछ की लंबाई 10-15 सेमी तक होती है। इसका वजन 15-25 किलो होता है। इनके चार सींग होते हैं जो इन्हें अन्य Bovids, जिनके दो सींग होते हैं, से अलग करते हैं। सींग दो के जोड़ों में केवल नर पर ही पाए जाते हैं, मादा सींग रहित होती हैं। सींगों का एक जोड़ा सीधा और कानों के बीच 2.5-4 सेंटीमीटर तक लंबा होता है। दूसरे थोड़े घुमावदार पीछे माथे पर स्थित होते हैं जिनकी माप 8-10 सेंटीमीटर कि होती है। इनका कोट पीले-भूरे से लाल रंग का होता है। शरीर का निचला हिस्सा और पैरो के अंदरूनी हिस्से सफेद होते हैं। चेहरे की विशेषताओं में थूथन पर और कान के पीछे काले निशान शामिल हैं। पैरो कि बाहरी सतह पर एक काली धारी होती है।

चौसिंगा नर (फोटो: श्री ऋषिराज देवल)

यह एक शर्मीला और दिनचर जीव है जो दिन के दौरान सक्रिय रहते हैं और स्वयं को मनुष्य से दूर रखकर छुपे रहते है। सामान्यतः स्वभाव से यह एकांत वासी होते हैं लेकिन 3 से 5 जानवरों के ढीले समूह भी बना सकते हैं। इन समूहों में कभी-कभी किशोरियों (calves) के साथ एक या अधिक वयस्क होते हैं। नर (buck) और मादा (doe)  केवल मिलन के मौसम में बातचीत करते हैं। भयभीत होने पर, वे स्तब्ध हो जाते हैं और घबराहट में छलांग लगा कर या पूरे वेग से दौड़कर खतरे से दूर चले जाते हैं। शिकारी जीवों से बचने के लिए वे अक्सर ऊंची घास में छिप जाते हैं। आम तौर पर दूसरों को सचेत करने के लिए अलार्म कॉल का उपयोग नहीं करते हैं क्योंकि वे शिकारियों के ध्यान से बचने की कोशिश करते हैं। हालांकि, चरम मामलों में, इन कॉल का उपयोग शिकारियों को यह चेतावनी देने के लिए उपयोग करते हैं कि इन्होंने शिकारी को देख लिया है और वे इनके पीछे न आयें। वयस्क चौसिंगा द्वारा अपने क्षेत्र चिह्नित करने लिए ग्रंथियों के स्राव के साथ कई जगहों पर मल त्याग करते है।वे कई निश्चित स्थानों पर नियमित रूप से मल त्याग कर ढेर बनते हैं। अक्सर इनके मल का ढेर और पेलेट ड्रॉपिंगबार किंग डीयर से भ्रमित किया जा सकता है, लेकिन चौसिंगा के पेलेट लंबे और बड़े होते हैं। ये जानवर विनम्र प्रदर्शन जैसे कि शरीर सिकुडाना, सर झुकना, कान पीछे खींचना आदि की मदद से भी संवाद करते हैं। यह मुख्य रूप से घास, शाक, छोटी झाड़ियाँ, पत्ते, फूल और फल खाते हैं और बार-बार पानी पीते है।

चौसिंगा बारिश के मौसम, जुलाई से सितंबर के बीच संभोग करते हैं। मादाएँ 8 महीने कि गर्भधारण अवधि के बाद एक या दो बछड़ों को जन्म देती है। बछड़े पूरी तरह से विकसित पैदा होते हैं जिनका वजन 0.7 से 1.1 किलोग्राम तक होता है। बछड़ों को जन्म के पहले कुछ हफ्तों के तक छुपा कर रखा जाता है, ये लगभग एक साल तक अपनी मां के साथ रहते हैं।

बाघ, तेंदुए और जंगली कुत्ते इसके प्रमुख प्राकृतिक शिकारी है। इनकी संख्या काम होने के मुख्य कारण हैं गैर-कानूनी शिकार, फैलते हुए खेत और सिमटते हुए प्राकृतिक आवास। वन क्षेत्र घटने और घास के मैदानों के बदलते स्वरूप के कारण चौसिंगा हिरनों के लिए प्राकृतिक आवास का संकट पैदा हो रहा है। इस कारण चौसिंगा जब जंगल के बाहर निकलते हैं तो शिकारियों के हत्थे चढ़ जाते हैं। शिकार के कारण इनकी आबादी लगातार घट रहीहै। इसके अलावा, इन मृगों की असामान्य चार सींग वाली खोपड़ी और सींग ट्रॉफी हंटर्स के लोकप्रिय लक्ष्य रहते हैं। वर्ष 2001 में इनकी तादाद दस हजार के आस-पास गिनी गयी थी, जो कालान्तर में ओर गिरी है और वर्तमान में 6000 से भी कम अनुमानित है।

संरक्षण के प्रयास:

राजस्थान सरकार ने चौसिंगा को चित्तौडगढ़ जिले का वन्यजीव पशु घोषित करने के साथ ही इसके प्रजनन संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए सीतामाता सेंचुरी के 225 हैक्टेयर क्षेत्र को इस प्रजाति के लिए रिजर्व कर प्रोजेक्ट शुरू किया। चित्तौडगढ़ जिले की पहचान को चौसिंगा से जोड़ कर सरकारी दस्तावेज में मस्कर यानी शुभंकर या प्रतीक चिन्ह के रूप में चौसिंगा की तस्वीर के उपयोग के निर्देश दिए। जिले कावन्य पशु घोषित होने से लोग इसके बारे में अधिक जानने लगे जिससे इनके संरक्षण में जागरूकता बढ़ने कि उम्मीद है।

वर्ष 2011 में सीतामाता अभयारण्य में चौसिंगा कि संख्या मात्र 100 तक सिमटने के कारण और लगातार संरक्षण प्रयासों के बावजूद इनकी संख्या में वृद्धि नहीं होने से चिंतित राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता परियोजना के अंतर्गत सीतामाता में प्लान बनाया गया जो 2014 से क्रियान्वित किया गया। योजना के तहत अभयारण्य में 125-135 हेक्टेयर के दो क्लोजर रानीगढ़ और आंबारेड़ी में बनाए गए और चारा-पानी कि व्यवस्था कि गई। अभयारण्य के आरामपुरा वन नाके के आसपास 25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस प्रोजेक्ट में वाटरहोल, ग्रास लैंड बनाए गए। वहीं इन वाटरहोल को भरने के लिए पानी की टंकियां बनाई गई। इन प्रोजेक्ट के पूरे होने से वन्यजीवों के लिए आने वाली गर्मी के दिनों के पैदा होने वाले पानी और शाकाहारी जीवों के लिए घास के संकट से निजात मिली।

इसके अलावा राजस्थान अन्य हिस्सों में भी लुप्त हो रहे चौसिंगा के संरक्षण व संवर्धन के लिए वन विभाग ने साल 2015 में चौसिंगा संरक्षण प्रोजेक्ट के तहत काम किया, जिसमें कुम्भलगढ़ अभयारण्य क्षेत्र में करीब 200 हेक्टेयर भूमि आरक्षित करना शामिल है। यहाँ बचे हुए चौसिंगा को एक साथ रखकर उनके लिए भोजन-पानी सहित उनके बेहतर जीवन के लिए जरूरी सुविधाएँ करवाई गई। 1.30 करोड़ के इस प्रोजेक्ट का मकसद लुप्त हो रही प्रजाति को बचाने का था, लेकिन दुर्भाग्यवश इसके विपरीत नतीजे सामने आने लगे। चौसिंगा क्लोजर के तारबंदी में अक्सर फसकर घायल हो जाते और कई ऐसी भी घटनाएँ सामने आई जिसमें आवारा कुत्ते क्लोजर में प्रवेश कर चौसिंगा का शिकार करते पाए गए।

वनों से इन शाकाहारी जीवों का विलुप्त होना हमारे विविध पारिस्थितिक तंत्रों में एक ‘खाली परिदृश्य’ को बढ़ा रहा है। जिसका समाधान स्थानीय लोगों को संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधनमें शामिल करने और उनको लाभान्वित करने में है। राज्य सरकार द्वारा चौसिंगा संरक्षण के लिए कई प्रयास किए जाने के बावजूद इनकी संख्या और स्थिति जस की तस ही नजर आ रही है। कारण है अनियोजित कार्य प्रणाली और कुछ मूर्खतापूर्ण बेतुके कदम। चौसिंगा जैसे दौड़ने और छलांग लगाने वाले जीव को चैनल वायर फेन्सिंग से क्लोजर बना कर रखना स्वयं में ही इनको क्षति पहुँचाने के सिवा कुछ नहीं है और इन फेन्सेस को जल्द से जल्द हटाने कि जरूरत है। जरूरत है इनके पर्यावास विकसित करने कि, संरक्षित क्षेत्रों में हो रहे वनों कि कमी और घास के मैदानों के बदलते स्वरूप को रोकने कि, स्थानीय समुदाय की संरक्षित क्षेत्रों में भागीदारी बढ़ाने कि अन्यथा विश्व के एकमात्र चार सिंगोवाले मृगको राजस्थान के परिदृश्य से लुप्त होने से नहीं रोका जा सकेगा।

 

सन्दर्भ:
  1. IUCN SSC Antelope Specialist Group. 2017. Tetracerus quadricornis. The IUCN Red List of Threatened Species 2017: e.T21661A50195368.http://dx.doi.org/10.2305/IUCN.UK.2017-2.RLTS.T21661A50195368.en
  2. Mallon, D.P. and Kingswood, S.C. (compilers). (2001). Part 4: North Africa, the Middle East, and Asia.Global Survey and Regional Action Plans. SSC Antelope Specialist Group.IUCN, Gland, Switzerland andCambridge, UK.viii + 260pp.
  3. Leslie,David M., Jr. and Sharma, Koustubh. (2009). Tetracerus quadricornis (Artiodactyla:Bovidae) Mammalian Species, Issue 843, 25 September 2009, Pages 1-11. https://doi.org/10.1644/843.1
  4. Cover image courtesy: Mr. Rishiraj Deval

Praveen holds a degree in Life Sciences and is currently working as Assistant Conservation Biologist with Tiger Watch. He has worked for Rajasthan & Haryana State Biodiversity Boards as Scientific Consultant and contributed in documentation of the biological diversity of these States. He has documented wetlands of Rajasthan and aided WII team in conservation breeding program of Lesser Florican.