Of Quails and Controversies

Of Quails and Controversies

The Rajasthan rock bush quail is believed to be endemic to the state. It was discovered by a British Army officer in Nasirabad near Ajmer. The quail is actually a subspecies of the rock bush quail (Perdicula argoondah (Sykes 1832). The officer in question was Colonel Richard Meinertzhagen (3rd March 1878 – 17th June 1967),  who was a British army and intelligence officer, as well as a budding ornithologist. Col. Meinertzhagen procured a specimen in 1926, and passed it on to another English ornithologist, Hugh Whistler, a specialist in quails and francolins.

A Rajasthan rock bush quail (Perdicula argoondah meinertzhageni) (Photo: Dr. Dharmendra Khandal)

While Col. Meinertzhagen, the discoverer of the rock bush quail in Rajasthan, was indeed a decorated military officer, his name has also been sullied as a result of a much darker history. Perhaps never have so many research papers been written on the accusations against any one individual, let alone an ornithologist. His actions continue to haunt us to this day, many decades after his death. Historically, Col. Meitnertzhagen may not have been the only colonial officer to have oppressed the common people of India and Africa for his own sadistic pleasure, perhaps he was not the only one to have murdered his own wife to cover up his crimes , but he was probably one of the few naturalists to steal multiple specimens from natural history museums (many from the Natural History Museum in London!), and then have them recorded as his own discoveries. Alan Knox, Pamela Rasmussen, Robert P. Prys-Jones and John Critchley researched these allegations. Their hard earned evidence was based on a vast collection of 20 thousand bird specimens presented to the Natural History Museum by Col. Meinertzhagen, on which he also published several research papers.

A covey of rock bush quails. (Photo: Dr. Dharmendra Khandal)

However, no question of any kind has been raised regarding this particular quail discovered by Col. Meinertzhagen in Rajasthan so far. That being said, not nearly enough research has been done on this subspecies. We hope that the new generation of ornithologists sheds some more light on this subspecies. It is often asked just how many species of birds are endemic to Rajasthan.That is, birds that only occur within the boundaries of the state of Rajasthan. Ornithologists say that in reality there is not even one. Nevertheless, the principal distribution area for 6-7 subspecies is Rajasthan, but they are also distributed in neighbouring states. It is an altogether different matter that some experts outright deny classification of these as subspecies, they believe that some diversity in  species occurs on a geographical basis.

Col. Richard Meinertzhagen

When Hugh Whistler received the specimen from Nasirabad in 1937, he found it to be a different variety from the rock bush quail found in the Deccan region, and wrote in a mere two line description, that its colour is much lighter than the quail found in the Deccan,  and that in the male, the ‘ black bars’ found on the lower part of its body were far narrower, ‘making the lower plumage less heavy in appearance’.

Col. Richard Meinertzhagen with a kori bustard shot in Kenya in 1915.

Whistler further elaborated that it was found in Southeastern Punjab, the United Provinces (now Uttar Pradesh), around Jabalpur( Madhya Pradesh), Central India, Rajputana (now Rajasthan) and Kutch (Gujarat). It is unclear how this distribution area was established, since the short description is based on only one specimen. Today, no new subspecies can be established based on just a short two-line description. Hugh Whistler also successfully proposed the Mysore rock bush quail as a new subspecies, on the basis of a specimen sent by the famous Indian ornithologist Salim Ali in 1940. Times have changed and perhaps more light can be shed on these conundrums through DNA analysis.

A drawing of a pair of rock bush quails (Perdicula argoondah) ( male and female ) by Col. William Henry Sykes, who first described the species in 1832.

And let’s not forget that true to form, Col. Meinertzhagen is the same individual who stole a specimen of forest owl from another scientist’s collection, and fraudulently reported it to be his own find from Gujarat, leaving many ornithologists confused for days. Perhaps there is more to the story of the Rajasthan rock bush quail. We have raised enough questions, it is now your turn to unearth the truth.

Reference:

Authors:

Dr. Dharmendra Khandal (L) has worked as a conservation biologist with Tiger Watch – a non-profit organisation based in Ranthambhore, for the last 16 years. He spearheads all anti-poaching, community-based conservation and exploration interventions for the organisation.

Mr. Ishan Dhar (R) is a researcher of political science in a think tank. He has been associated with Tiger Watch’s conservation interventions in his capacity as a member of the board of directors.

 

Cover Photo: Col. Richard Meinertzhagen in 1922, and rock bush quails drawn by Col. William Henry Sykes.

हिंदी में पढ़िए
Of Quails and Controversies

राजस्थान का एक खास बटेर और एक विवादित ब्रिटिश खोजकर्ता 

राजस्थान में बटेर की खास उप प्रजाति मिलती है और कहा जाता है यह राजस्थान की एक स्थानिक या एंडेमिक उप प्रजाति है। जिसे राजस्थान रॉक बुश क्वेल के नाम से जाना जाता है । यह अजमेर के पास नसीराबाद से एक अंग्रेज अफसर द्वारा खोजी गयी थी,  जो असल में रॉक बुश क्वेल  (Perdicula argoondah (Sykes 1832)) की ही एक उप-प्रजाति है। इस अंग्रेज अफसर का नाम था – कर्नल रिचर्ड मैनेरतज़हेगेन (3 March 1878 – 17 June 1967) जो एक ब्रिटिश सेना के अफसर, ख़ुफ़िया विभाग के अधिकारी एवं पक्षीविद थे।

इन्होने 1926  में इसे पकड़ा और इंग्लैण्ड के एक अन्य पक्षीविद हुग व्हिस्टलर को पहचानने के लिए दिया,  जो एक बटेर एवं फ्रैंकोलिन जैसे पक्षियों के विशेषज्ञ थे।

राजस्थान के रॉक बुश क्वेल (Perdicula argoondah meinertzhageni) (Photo: Dr. Dharmendra Khandal)

राजस्थान के रॉक बुश क्वेल के खोजकर्ता कर्नल मैनेरतज़हेगेन एक ऐसा नाम था जिसके सीने पर पदको की क्षृंखलाए थी, परन्तु चेहरे पर बेईमानियों के काले धब्बे। किसी एक इंसान पर लगे इल्जामो पर कभी शायद इतने शोध पत्र नहीं लिखे होंगे जितने इन महाशय पर लिखे गये है और इनके कृत्य आज भी इनकी मृत्यु के कई दशकों बाद भी सामने आते रहते है। हालाँकि यह अपने आनंद के लिए भारत और अफ्रीका की आम जनता पर जुल्म करने वाले वह इतिहास के अकेले फौजी अफसर नहीं थे, अपनी पत्नी की हत्या कर उस मामले को दबा देने वाले  दुनिया के एक मात्र हत्यारे पति भी नहीं थे, परन्तु विश्व के अनेको नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम से प्राणियों के नमूने चुराकर अपने नाम से दर्ज करवाने वाले शायद वह गिने चुने प्रकृतिविद में से एक थे। किसी मृत व्यक्ति पर इतने लांछन शायद सभ्य समाज की परम्परा के विरुद्ध है परन्तु एलन क्नॉक्स (Alan Knox), पामेला रासमुसेन (Pamela Rasmussen),  जॉन क्रीटचलै (John Critchley) जैसे लोगो ने यह सब इल्जाम उन के द्वारा ब्रिटिश म्यूजियम में जमा करवाए गए २० हजार से अधिक पक्षी नमूनों पर कड़ी मेहनत कर एकत्रित किये गए प्रमाण पर आधारित है जिन पर इन्होने विश्लेषणात्मक शोध पत्र भी प्रकाशित किये है। यह शोध पत्र हमें ताकीद कराते  है की जीवन में सत्य से बढ़ कर कुछ नहीं।

रॉक बुश क्वेल का समूह (Photo: Dr. Dharmendra Khandal)

यदपि इनके द्वारा राजस्थान से खोजे गए इस विशेष बटेर पर अभी तक किसी भी प्रकार का कोई प्रश्न नहीं उठा है। परन्तु इस उपप्रजाति पर किसी ने पर्याप्त शोध भी नहीं की है।  आशा है  नव पक्षी वैज्ञानिक इस पर नए सिरे से प्रकाश डालेंगे। अक्सर यह प्रश्न पूछा जाता है की राजस्थान में कितने प्रकार के स्थानिक (एंडेमिक) पक्षी है? यानी जो मात्र राजस्थान राज्य की सीमा में ही मिलते हो।  पक्षी विशेषज्ञ कहते है की असल में एक भी नहीं है। परन्तु फिर भी 6 -7  उप-प्रजातियों का मुख्य क्षेत्र राजस्थान है, परन्तु आस पास के राज्य में भी इनका वितरण है। यह अलग बात है की इन उपप्रजातियों को ही कुछ विशेषज्ञ सिरे से नकारते है, उनका का मानना है की प्रजातियों में थोड़ी विविधता भौगोलिक आधार पर आ ही जाती है।

कर्नल रिचर्ड मैनेरतज़हेगेन

हुग व्हिस्टलर को जब नसीराबाद से बटेर का नमूना मिला तो उन्होंने 1937 में इसे डेक्कन क्षेत्र में मिलने वाले रॉक बुश क्वेल से इसे अलग किस्म का पाया और मात्र दो लाइन के विवरण में लिखा की इसका रंग डेक्कन क्षेत्र में मिलने वाले बटेर से काफी हल्का है और निचले भाग में मिलने वाली धारिया भी हलके रंग की है एवं नजदीक है। यह विवरण मात्र एक नर पक्षी के नमूने के आधार पर ही लिखा गया था।

1915 में केन्या में कोरी बस्टर्ड के शिकार के साथ कर्नल रिचर्ड मैनेरतज़हेगेन

उन्होंने इसके वितरण के बारे में लिखा है की यह पंजाब, यूनाइटेड प्रोविंस (उस समय का उत्तेर प्रदेश का नाम), मध्य भारत का उत्तरी हिस्सा, राजपुताना एवं कच्छ में मिलता है।  यह स्पष्ट नहीं है की उन्होंने इसके वितरण किस प्रकार जुटाया क्योंकि विवरण तो मात्र एक ही नमूने पर आधारित है। खैर आज इस तरह के छोटे से दो लाइनों के विवरण के आधार पर कोई अलग उपप्रजाति स्थापित नहीं की जासकती है। हुग व्हिस्टलर ने 1940  में भारत के पक्षीविद  सलीम अली के द्वारा भेजे गए एक और रॉक बुश क्वेल को मैसूर रॉक बुश क्वेल का नाम देकर उस भी एक नयी उप-प्रजाति के रूप में स्थापित किया था। खैर अब जमाना बदल गया है और डीएनए जैसी तकनीक से इन सवालो पर शायद और अधिक प्रकाश डाला जा सकता है।

कर्नल विलियम हेनरी साइक्स द्वारा रॉक बुश बटेर (पेर्डिकुला अर्गूंडा) (नर और मादा) की एक जोड़ी का एक चित्र, जिन्होंने पहली बार 1832 में इस प्रजाति का वर्णन किया था।

खैर DNA न सही आप भी इंटरनेट पर उपलब्ध फोटोज के आधार तीनो उप प्रजातियों में अंतर ढूंढे का प्रयास तो कर ही सकते है।

और ध्यान रहे मैनेरतज़हेगेन वही व्यक्ति है जिन्होंने फारेस्ट आउलट के एक नमूने को किसी और वैज्ञानिक के संग्रह से चुरा कर गुजरात का बता दिया था और कई पक्षीविद काफी दिनों तक भृमित रहे थे। होसकता है राजस्थान के बटेर में भी कोई और ही कहानी छुपी हो। प्रश्न आपके सामने है उत्तर खिजिये।

सन्दर्भ:
लेखक:

Dr. Dharmendra Khandal (L) has worked as a conservation biologist with Tiger Watch – a non-profit organisation based in Ranthambhore, for the last 16 years. He spearheads all anti-poaching, community-based conservation and exploration interventions for the organisation.

Mr. Ishan Dhar (R) is a researcher of political science in a think tank. He has been associated with Tiger Watch’s conservation interventions in his capacity as a member of the board of directors.

 

Cover photo caption: 1922 में कर्नल रिचर्ड मैनेरतज़हेगेन, और कर्नल विलियम हेनरी साइक्स द्वारा बनाया गया रॉक बुश बटेर का चित्र।