क्या आप जाने है राजस्थान में एक क्रेटर है जो एक विशालकाय उल्कापिंड के पृथ्वी से टकराने से बना है, रामगढ़ क्रेटर के नाम से प्रसिद्ध बाराँ जिले की मंगरोल तहसील से 12 किलोमीटर पूर्व दिशा में रामगढ़ गाँव में स्थित इम्पैक्ट क्रेटर होने के साथ यह एक अद्भुत पुरातत्व महत्व का स्थल भी है।इस वर्ष होने वाले 36वें विश्व भूवैज्ञानिक संगोष्ठी में अर्थ इम्पैक्ट डेटाबेस” (EID) द्वारा इसको विश्व का 191वां इम्पैक्ट क्रेटर होने कि मान्यता दिए जाने कि उम्मीद है।

भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग (GSI) के अनुसार यह क्रेटर विंध्यानचल श्रृंखला क्षेत्र में एक वृत्ताकार गड्डे के समान है जो विंध्यन उपसमूह के भांडेर समूह का एक अंश है। यह अपने चारों ओर लगभग 200 मीटर ऊंची पहाड़ियों से घिरा हुआ पठारी क्षेत्र है जिसकी समुद्र तल से उँचाई 260 मीटर है। इस क्रेटर में चट्टानों व मिट्टी के कटाव से बनी हुई अनेक छोटी नदियां व गड्डे है जो लगभग पूरे वर्ष जल पूरित रहते है। क्रेटर परिक्षेत्र में दो नदियां है। दक्षिण-पश्चिम मे पार्वती नदी तथा दक्षिण–पूर्व मे बारबती नदी है। यह दोनों नदियां दक्षिण से उत्तर की ओर बहती हुई चंबल नदी मे मिलती है।

रामगढ क्रेटर मानचित्र

रामगढ क्रेटर का दृश्य

कैसे हुआ रामगढ़ क्रेटर का निर्माण?

भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग के सदस्य प्रोफेसर विनोद अग्रवाल बताते है कि रामगढ़ क्रेटर का निर्माण कुछ अरब वर्ष पूर्व उस समय हुआ जब लगभग 3 किमी. व्यास का एक विशाल उल्का पिंड यहां गिरा, जिससे यहाँ करीब 3.2 किलोमीटर व्यास का एक विशाल गड्ढा बन गया। इसी प्रकार का क्रेटर भारत मे रामगढ़ के अतिरिक्त महाराष्ट्र के बुलढाना जिले मे लोनार झील के रूप में जिसका व्यास1.8 किलोमीटर है तथा मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में ढाला के नाम से दृष्टिगत है जिसका व्यास 14 किलोमीटर है।

क्रेटर में उल्का पिंड के साक्ष्य:

प्रो. विनोद अग्रवाल (2018) के अनुसार रामगढ़ क्रेटर के केंद्र मे एक उभरा हुआ क्षेत्र है जो उल्कीय प्रभाव का ज्वलंत सैद्धांतिक भौगोलिक प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करता है। इसे समझने के लिए भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभागके भू-वैज्ञानिक ओर समन्वयक प्रो. पुष्पेन्द्र सिंह राणावत (2018) ने बताया की जब किसी सतह पर किसी वस्तु का आपतन होता है तब सतह द्वारा समान किन्तु विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया संपन्न होती है। इसी प्रकार रामगढ़ संरचना के केंद्र में उभरा हुआ भाग इसी उल्कापिंड के प्रति धरातलीय सतह की प्रतिक्रिया का परिणाम है। इस क्रेटर में काँच युक्त पत्थर पाये जाते है जो उल्का पिंड के प्रहार से उत्पन्न होने वाले अति उच्च-तापमान के कारण रेत केद्रवित होकर शीशे में परिवर्तित होने से निर्मित हुए। इसी के साथ इस भाग मे लोह, निकल व कोबाल्ट की साधारण से अधिक मात्रा भी पाई जाती है, जो इस स्थान को विशिष्ट बनाती है।

रामगढ क्रेटर का बाहरी दृश्य

रामगढ़ क्रेटर की खोज का इतिहास:

सर्वप्रथम भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग के सदस्य फ़्रेडरिक रिचर्ड मलेट ने वर्ष 1869 में रामगढ़ क्रेटर को देखा। 1882-83 मे भारतीय खोजकर्ता व नक्शाकार राय बहादुर किशन सिंह राणाने भू-वैज्ञानिक दृष्टि से इसका मानचित्र तैयार किया। 1960 मे जिओलोजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन ने इसे “ क्रेटर ”की संज्ञा दी। भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा वर्तमान मे इस क्रेटर को रामगढ़ संरचना /रामगढ़ मेटेओरिटिक संरचना /रामगढ़ वलय संरचना /रामगढ़ डोम संरचना /रामगढ़ अस्ट्रोब्लेम आदि नामसे संबोधित किया जाता है।

रामगढ़ रिंग संरचना को क्रेटर कि संज्ञा मिलने से पूर्व और इसके खोज के बाद काफी लंबे समय तक विवाद का विषय बना रहा। इसके निर्माण के पीछे कई अपार्थिव (extra-terrestrial) और पार्थिव (intra-terrestrial) बलों के होने के कयास लगाए गए जिनमें किम्बर्लाइट, कार्बोनाइट या डायपिर केइन्ट्रूशन (अधिक गतिशील और विकृत सामग्री भंगुर या नाजुक चट्टानों में बल पूर्वक प्रवेश कर जाती है) और संबंधित अवतलन (subsidence), टेक्टोनिज्म, चीनी मिट्टी से समृद्ध शीस्ट (kaolin-rich shales) का केन्द्रगामी प्रवाह, मैग्माटिज्म और टेक्टोनिज्म का संयोजन, उल्का पिंड का प्रभाव (impact crater), आदि शामिल हैं।

संभवत या क्रॉफर्ड (1972) पहले व्यक्ति थे जिन्होंने को लुवियम के केंद्र में टूटे हुए शंकु जैसी संरचना की उपस्थिति को दर्ज करते हुए रामगढ़ रिंग संरचना के क्रेटर होने का सुझाव दिया। रक्षित (1973) ने इसके उत्पत्ति के लिए कई संभावित सिद्धांतों पर चर्चा की। (i) गहराई पर इन्ट्रूसिव रॉक्स की उपस्थिति, (ii) ज्वालामुखी क्रेटर, (iii) फोल्डिंग / फॉल्टिंग, (iv) सबसिडेंस, (v) गहराई पर डायपरिक इन्ट्रूशन और (vi) उल्कापिंड प्रभाव सिद्धांत। अनुकूल प्रमाणों के अभाव में उन्होंने स्वयं रामगढ़ संरचना की उत्पत्ति के लिए पहले पाँच सिद्धांतों की अवहेलना की; और यह माना कि रामगढ़ संरचना एक उल्कापिंड प्रभाव से बना ‘इम्पैक्ट क्रेटर’ के समान है।

2018 में जीएसआई, इंटक और मोहन लाल सुखाड़िया विश्व विद्यालय कि एक टीम, प्रोफेसर विनोद अग्रवाल और भूगर्भ विज्ञानी पुष्पेन्द्र सिंह राणावत कि अगुवाई में रामगढ़ के इम्पैक्ट क्रेटर होने के साक्ष्य एकत्रित किए हैं। लेकिन फिर भी “द अर्थ इम्पैक्ट डेटाबेस” (EID) से रामगढ़ के इम्पैक्ट क्रेटर होने कि पुष्टि फिलहाल लंबित है जिसको 36वें विश्व भूवैज्ञानिक संगोष्ठी (36th International Geological Congress, 2020) में ईआईडी द्वारा मान्यता दिए जाने कि उम्मीद है। कनाडा के न्यूब्रुंस्विक विश्व-विद्यालय द्वारा अनुरक्षित “द अर्थ इम्पैक्ट डेटाबेस” (EID) का उपयोग दुनिया के क्रेटरों की पुष्टि के लिए आधिकारिक तौर पर किया जाता है।

क्रेटर में स्थित पुरा सम्पदा:

रामगढ़ गाव के बुजुर्गों के अनुसार रामगढ़ क्रेटर की पहाड़ी पर रामगढ़ का प्राचीन किला स्थित है जो वर्तमान में पुरातत्व विभाग के रख रखाओ के अभाव मे यह अपना अस्तित्व लगभग खो चुका है । रामगढ़ किला 10वीं शताब्दी में मालवा के नागवंशी राजा मलय वर्मा ने बनवाया। तथा 13वीं शताब्दी मे इस पर खींचियों, गौड़ वंश का आधिपत्य रहा बाद में इस पर बूंदी के हाड़ाओं का वर्चस्व हुआ। फिर पर गना कोटा के आधिपत्य में चला गया।

रामगढ़ क्रेटर की पहाड़ी पर स्थित एक प्राक्रतिक गुफा मे कृष्णोई माता तथा अन्नपूर्णा देवी का प्राचीन मंदिर है। जिनका निर्माण 16वीं शताब्दी मे कोटा रियासत के झाला जालिम सिंह ने करवाया था। मंदिर तक पहुचने के लिए 750 सिड्डियों है। मंदिर की विशेष बात यह है कि इनमे से कृष्णोई माता को मांस व मदिरा का जबकि अन्नपूर्णा देवी को मिष्ठानों को भोग लगाया जाता है। तथा कार्तिक मास में यहाँ मेले का आयोजन होता है जिसमे हजारों श्रद्धालु आते है।

रामगढ क्रेटर के केंद्र में स्थित प्राचीन मंदिर

क्रेटर के मध्य भाग मे पुष्कर सरोवर, माला की तलाई, बड़ा व नोलखा तालाब स्थित है। जिसका आधिकांश भाग कमल पुष्पो से आच्छादित रहता है। पुष्कर तालाब के किनारे पर भंडदेवरा का प्राचीन शिव मंदिर है, वर्तमान मे इसका अधिकांश भाग क्षतिग्रस्त हो गया है। इस मंदिर के बाहर स्थित शिलापट्ट पर लिखे लेख के अनुसार पूर्व मध्य कालीन वास्तुकला का प्रतीक व नागर शैली में निर्मित यह उत्क्रस्ट व कलात्मक पूर्वा भिमुख पंचायतन मंदिर स्थापत्य व शिल्पकला की अमूल्य धरोवर है यहाँ पर मिले शिला लेखो के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में मालवा के नागवंशी राजा मलय वर्मा ने अपने शत्रु पर विजय प्राप्त करने के पश्चात करवाया था। एवं कालांतर मे मेड वंशीय क्षत्रिय राजा त्रिश वर्मा ने 1162 ई. मे इसका जीर्णोद्धार करवाया । इस देवालय मे स्थित गर्भग्रह, सभामंडप, अंतराल शिखर व जागती है। गर्भगृह में में प्राचीन शिव लिंग तथा सभामंडप मे आठ विशाल कलात्मक स्तम्भ है। इन स्तम्भों पर यक्ष, किन्नर, कीचक, विधाचर, देवी–देवता, अप्सराओं व मिथुन आकृतियाँ उत्कीर्णित है जिनके कारण इन मंदिरो को “भंड देवरा”कहा गया। इसी प्रकार की विशिष्ट आकृतियाँ मध्यप्रदेश के छत्रपुर जिले में स्थित हिन्दू व जैन मंदिरो मे उपस्थित है, जिन्हे “खजुराहो ” कहा जाता है। इस आधार पर भंड देवरा को“ राजस्थान का मिनी खजुराहो ” कहा जाता है। प्राचीन समय मे यहाँ 108 मंदिरो का समूह हुआ करता था किन्तु वर्तमान मे केवल शिव व पार्वती मंदिर ही शेष बचे हुये है जिनके जीर्णोद्धार का कार्य वर्तमान मे पुरातत्व विभाग के अन्तर्गत किया जा रहा है।

रामगढ क्रेटर से दो छोटी नदियां निकलती है

क्रेटर की पहाड़ी पर एक प्राचीन ब्रम्ह मंदिर है। इस मदिर के समीप ही एकब्रम्ह कुंड है कहा जाता है की पहाड़ी के ऊपर होने पर भी इस कुंड का जल कभी नहीं सुकता तथा इस कुंड मे अनेक श्रद्धालु श्रद्धा की डुबकी लगाने आते है।

क्रेटर के मध्य भाग मे स्थित तालाब का आधिकांश भाग कमल पुष्पो से आच्छादित रहता है

रामगढ़ क्रेटर की वन व वन्यजीव सम्पदा:

रामगढ़ क्रेटर,वन विभाग बाराँ की किशनगंज रेंज के रामगढ़ ब्लॉक के अन्तर्गत 14.405 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत संरक्षित क्षेत्र है। यह वन खंड उष्ण-कटिबंधीय शुष्क मिश्रित पर्णपाती वनों (tropical dry mixed deciduous) की श्रेणी में आते हैं। पलाश (Butea monosperma) और बेर (Zizyphus jujuba) इस क्षेत्र प्रमुख वनस्पति प्रजातियाँ हैं जो इस संरचना को घनी बनाती हैं। इस क्षेत्र में खैर (Acacia catechu), महुआ (Madhuca indica), आंवला (Emblica officinalis), गुरजन (Lannea coromandelica),धावड़ा (Anogeissus latifolia),सालर (Boswellia serrata),खिरनी (Manilkara hexandra), करंज (Pongamia pinnata),बहेड़ा (Terminalia bellirica), अर्जुन (Terminalia arjuna), आम (Mangifera indica), बरगद (Ficus religiosa) व बांस (Dendrocalamus strictus) भी अच्छी तादाद में पाए जाते है। इनके अतिरिक्त अनेक औषधीय महत्व के पादप भी यहाँ पाये जाते है।

रामगढ़ क्रेटर में दशकों पूर्व अनेक बड़े शिकारी जीवों जैसे–शेर, बाघ, बघेरा,भेड़िया आदि का अस्तित्व भी था। वर्तमान में अत्यधिक मानवीय हस्तक्षेपों के कारण ये सभी वन्यजीव यहाँ की खाद्य श्रृंखला से लुप्त हो गए। किन्तु आज भी यह स्थान विभिन्न वन्य प्राणियों की आश्रय स्थली है। जिनमें लकड़बग्घा, सियार, जंगली बिल्ली, स्माल इंडियन सीवेट, लोमड़ी, वाइल्ड बोर, चिंकारा और चीतल, नेवला, सेही व खरहा,बंदर इत्यादि मुख्य वनचर है। क्रेटर के समीप उपस्थित पार्वती नदी मगरमच्छों एवं अन्य जलीय जीवों का उपयुक्त प्राकृतवास है।

क्रेटर से लगभग 50-60 किलोमीटर पूर्व दिशा में मध्यप्रदेश की सीमा में कुनो वन्य जीव अभयारण्य है जहाँ के वन्यजीव भी क्रेटर मे विचरण करते हुये देखे जाते है।

पुष्कर सरोवर

क्रेटर के मध्य में स्थित पुष्कर सरोवर तालाब वर्षभर जलपूरित रहता है। इसमे प्रतिवर्ष अनेक प्रवासी पक्षियो को विचरण करते देखा जा सकता है।इस तालाब में पक्षियों की 200 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती है। शीतऋतु मे करीब 80 प्रजाति के पक्षी भोजन, आवास व प्रजनन के लिए प्रवास पर पहुंचते हैं नॉर्थर्न पिनटेल, नॉर्थर्न सावलर, कॉमन पोचार्ड, रेड क्रेस्टेड पोचार्ड, फेरुजिनस पोचार्ड, कॉमन टील,गडवाल, लिटिल ग्रीब, रूडी शेलडक, कॉमन कूट, पेंटेड स्टार्क, जलमुर्गी, ब्लैक टेल्ड गोडविट, रिवर टर्न आदि प्रजातियां देखी जाती हैं। विभिन्न सरीसृप जेसे कोबरा,अजगर,रेट स्नेक,चेकर कील बेक,बोआ आदि यहाँ पाये जाते है।

Mr. Pankaj Khandelwal

Mr. Pankaj Khandelwal, Assistant Professor of Zoology at Career Point University, is active in wildlife research, nature conservation and forest management with the forest department and various Kota based NGOs (Society for Conservation of Historical and Ecological Resources), and also volunteers in many wild animal rescue tasks and conservation activities.