ग्रीन मुनिया: भारत की संकटग्रस्त एवं स्थानिक पक्षी

ग्रीन मुनिया लाल चोंच वाली, पृष्ठ भाग पर हरे रंग की भिन्न-भिन्न आभा लिये, छोटे आकार की ‘‘फिंच‘‘ परिवार की अत्यंत आकर्षक पक्षी है जिसका अधर भाग पीले रंग की कांति के साथ, पार्श्व भाग श्वेत-श्याम धारियां युक्त होता है। इसकेअंग्रेजी नाम के उद्भव के पीछे एक रोचक बिन्दु है। यूरोपीय ने इन फिंच पक्षियों को अहमदाबाद (गुजरात) के निकट देखकर इन्हें ‘‘अहमदाबाद‘‘ पक्षी का नाम दिया जिसका समयोपरांत अपभ्रंश स्वरुप वर्तमान नाम ‘‘एवाडेवट‘‘ हो गया। पारम्परिक नाम ‘‘मुनिया‘‘ भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में बालिका को परिभाषित करता है।राज कपूर की फिल्म ‘‘तीसरी कसम‘‘ के पारम्परिक गीत आधारित गाने, ‘‘चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजरे वाली मुनिया…..‘‘ में इसकी सुन्दरता का विवरण प्रस्तुत किया गया है।

प्रथमतः सन 1790 में लेथम द्वारा इसे फ्रिन्जिला फोरमोसा के रूप में वर्णन किया गया। सन 1926 में बेकर(1926) ने पुनः इसे स्टिक्टोस्पिजा फोरमोसा तथा रिप्ले (1961) व अली-रिप्ले (1974) ने एस्ट्रिलडा फोरमोसा के रूप में वर्णित किया। तत्पश्चात पक्षीविदों (इंस्किप et al 1996, ग्रीमिट et al. 1999, काजरमिर्कजेक व वेन पर्लो 2000, रेसमुसन व एंडर्टन 2005) द्वारा इसे इसके वर्तमान वैज्ञानिक नाम अमंडावा फोरमोसा के रूप में ही उल्लेखित किया गया।

गोरैया के समतुल्य लगभग 10 से.मी. लम्बाई के पंछी जिसमें नर का रंग अधिक चमक लिए होता है। ग्रीन मुनिया सामान्यतः भिन्न-भिन्न संख्या के समूह में दिखाई देती हैं। अक्सर भोजन लेते समय बड़े समूह छोटे-छोटे समूहों में बिखर जाते हैं। मुनिया प्रजाति में प्राकृतिक खुले हुए व पुनःउत्पादित वृहद् स्तर की आवासीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूलन की असीम क्षमता है। परन्तु पसंदीदा आवासीय संरचना में मुख्यतः लम्बी घास जैसे गन्ने, मूँज युक्त कृषि क्षेत्र व घनी झाड़ियों (जिसमें लेन्टाना भी सम्मिलित) वाले क्षेत्रआते हैं। ग्रीन मुनिया के भोजन में सामान्यतः छोटे कोमल शाक व बीज तथा पौधों के अन्य मुलायम भाग होते हैं। ग्रीन मुनिया का स्वर दुर्बल, उच्च-कोटि की चहचहाट होती है तथा उड़ान अथवा साथियों से दूर होने पर पायजेब की झंकार जैसी ‘‘स्वी, स्वी‘‘ एवं भोजन लेते समय ‘‘चर्र,चर्र‘‘ की ध्वनि सुनाई देती है। प्रजनन ग्रीष्म व शीत दोनों ऋतुओं में देखा गया है परन्तु प्रजनन काल व नीड़न काल के विस्तृत अध्ययन की नितान्त आवश्यकता है। मुनिया के घोंसले प्याले समान लम्बी घास या गन्नों या घनी झाड़ियों के मध्य होते हैं। एक समय में यह 5-6 अंडे देती हैं। ग्रीन मुनिया में लम्बी दूरी का अथवा तुंगता प्रवसन नहीं होता है।शीतकाल में घनी झाड़ियों केआवास झाड़ियों के अधिक पसंद किया जाता है।

पेड़ों पर बैठी हुई ग्रीन मुनिया फोटो श्री सत्यप्रकाश एवं श्रीमती सरिता मेहरा

ग्रीन मुनिया विश्वस्तर पर संकटग्रस्त भारत की स्थानिक प्रजाति है। वर्तमान में अन्य राज्यों की अपेक्षा राजस्थान में इसकी स्थिति अच्छी है। इस प्रजाति के अस्तित्व पर संकट को भांपते हुए उन्नीस सौ अस्सी के दशक के अन्तिम वर्षों में इसे आई.यू.सी.एन.की लाल सूची में रखा गया एवं उन्नीस सौ नब्बे के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में इसे संकटापन्न (Vulnerable) स्तर में सम्मिलित किया। सुरक्षा हेतु इस प्रजाति को भारत के वन्यजीव(सुरक्षा) अधिनियम 1972 की अनुसूची IV तथा अन्तर्राष्ट्रीय संकटग्रस्त प्रजाति व्यापार समझौता (CITES) के परिशिष्ट II में रखा गया है। शोधकार्यों से यह विदित है कि भारतीय उपमहाद्वीप में इसकी अनुमानित सँख्या 10,000 से भी कम है।

सन 2000 पूर्व अली व रिप्ले (1974) के अनुसार बीसवीं शताब्दी में हरी मुनिया का वितरण मध्य भारत में एक पट्टे के रूप में प्रदर्शित भूभाग में हुआ करता था जिसकी पश्चिमी सीमा राजस्थान के दक्षिणी अरावली, पूर्वी सीमा तटीय ओडिशा, उत्तरी सीमा दिल्ली व तराई (उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार) क्षेत्र तथा दक्षिणी सीमा उत्तरी महाराष्ट्र व उत्तरी आन्ध्र प्रदेश तक फैली हुई थी। जहाँ उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में ब्रिटिश प्रकृति खोजियों के अनुसार इस प्रजाति के वितरण उपरोक्त समूचे क्षेत्र में था वहीं दूसरी और बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में भारतीय पक्षिविदों द्वारा अनेक क्षेत्रों से इसके स्थानीय विलोपन का उल्लेख मिलता है।

अपने आवास में ग्रीन मुनिया फोटो श्री सत्यप्रकाश एवं श्रीमती सरिता मेहरा

सन 2000 पश्चातसन 2000 पश्चात वितरण क्षेत्र में अनेक ऋणात्मक परिवर्तन हुए।अनेेक पक्षीअवलोककों द्वारा उनके स्थानों से इस प्रजाति का स्थानीय विलोपन अथवा अपुष्ट उपस्थिति को उल्लेखित किया गया।लेखकों द्वारा आबू में लिए गए प्रेक्षणों में पाया गया है कि ग्रीन मुनिया ने प्राकृतिक आवासीय परिस्थितियों में बाहरी वनस्पति के आगमन एवं स्थापन से हुए परिवर्तन में भी अनुकूलन कर लिया है (विशेषकर लेन्टाना के सन्दर्भ में) ।अतःआवासीय परिस्थितियों में मानवीय हस्तक्षेप विशेषकर शहरी विस्तारण जो हरे क्षेत्रों को समाप्त कर रहा है अथवा मुनिया के आवासों का विखण्डन कर रहा है तथा पक्षी व्यापार मुख्य चिंतन के विषय हैं ।

वैश्विक स्तर के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति हेतु ऐसे स्थानिक-विशेष संरक्षण कार्यक्रम तथा नीतियों का समावेश होना चाहिये जो आमजन को उनके पारम्परिक संरक्षण व्यवहार से जोड़ सके। भारतीय संस्कृति के ‘‘प्रकृति-पुरूष’’ के सिद्धान्त में निहित प्रकृति और मानव के सह-सम्बन्धों को परम्परागत रीति-रिवाजों में देखा जा सकता है। इसी सिद्धान्त को ध्यान में रखकर लेखकों द्वारा आबू की वादियों में जन-सहभागिता के माध्यम से ग्रीन मुनिया के संरक्षण कार्याें को सन 2004 में प्रारम्भ किया गया। इसके तहत उन स्थानीय युवाओं व शिकारियों को प्रकृति मार्गदर्शक कार्यक्रम से जोड़ा जो स्वयं की इच्छा से संरक्षण में भागीदार बनना चाहते थे। तत्पश्चात उनका पारम्पारिक ज्ञान व आधुनिक विज्ञान को जोड़कर उन्हें प्रशिक्षित किया गया। इनके माध्यम से आमजन जो शहरी क्षेत्र व मुनिया के आवासीय स्थानों के समीप निवास कर रहे हैं, उनको इस प्रजाति के महत्व एवं स्थिति के विषय में संवेदनशील किया गया। परिणामतः सन 2004 में जब यह कार्य आरम्भ किया तब आबू पर्वत के चिन्हित स्थलों पर ग्रीन मुनिया की सँख्या चार सौ से भी कम थी जो सन 2019 के अन्त में पाँच गुना अधिक हो चुकी है। इस प्रकार यह स्थानीय कार्य अन्तर्राष्ट्रीय सोच के साथ सतत विकास लक्ष्यों (SDGs 1,8,11व 13) को चरितार्थ करने में एक सूक्ष्म कदम है जिसके तहत मुनिया एवं उसकेआवासों की सुरक्षा व संरक्षण तथा स्थानीय युवाओं को प्रकृति अवलोकन के द्वारा जीविकोपार्जन उपलब्ध हो रहा है।

आभार

लेखक आभारी है आबू में ग्रीन मुनिया के आवासीय स्थानों के समीप निवास कर रहे सभी आमजन जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मुनिया एवं उसके आवासों की सुरक्षा व संरक्षण में भागीदार हैं। विशेष धन्यवाद के पात्र जो टीम के सदस्यों के रूप में अपनी भूमिका निभा रहे हैं – श्री अजय मेहता, श्री प्रदीप दवे, श्री सलिल कालमा, श्री सन्दीप, श्री प्रेमाराम, श्री राजु, श्री हेमन्त सिंह आदि।

Discussion

10 comments

  1. Nidhi Panwar

    Wow amazing ……great .very few people can do like this work ……..

    1. Dr Satya Prakash Mehra

      Thanks, Nidhi Mam…. the beauty of music could also be traced out for this little bird

  2. Kamlesh sharma

    Waah….. Nicely written…Perfect sir.

    1. Dr Satya Prakash Mehra

      Thanks Kamlesh Sir, the beauty of the literature is well described in the song of Teesri Kasam…. Chalat musafir moh liyo re….

  3. DINESH KUMAR PANDEY

    वाह बहुत-बहुत सुन्दर प्रस्तुति।

    1. Dr Satya Prakash Mehra

      Thanks Pandey Sb.

  4. Dr Ravindra kuntal

    डॉ सर।आपसे मिलकर अच्छा लगा।अपने बहुत अच्छे तरीके से और संक्षेप में इस तकनिम का वर्णन किया।
    आपके सानिध्य में मैं अपना अगला मकान और वातावरणीय तकनीक को अपने जीवन मे लेकर आऊंगा।
    आपका बहुत बहुत आभार।
    डॉ रविन्द्र कुन्तल

    1. Satya Prakash Mehra

      Sure Dr Kuntal ji

  5. Facebook Marketing

    I am really impressed with your writing talents and also with the format on your blog. Is that this a paid theme or did you customize it yourself? Anyway keep up the excellent quality writing, it’s uncommon to see a great blog like this one today.

  6. Satya Prakash Mehra

    Thanks a lot, apologies for delayed response

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