हम जब वन क्षेत्र मे जाते हैं तो उस प्राकृतिक आवास के वन्य प्राणी हमें कहीं न कहीं, किसी न किसी जैविक गतिविधि में लिप्त नजर आते हैं। हर प्राणी, हर जगह एवं हर समय दिखाई नहीं देता। प्रत्येक वन्य प्राणी का अपना विशिष्ठि स्वभाव होता है। सबके अपने जगने, सोने, भोजन प्राप्ति हेतु  क्रियाशाील होने, प्रजनन गतिविधियाँ करने, खेलने, सुस्तानें, धूप सेकने, आदि का एक खास समय होता है। कुछ प्राणी रात्रि में सक्रिय रहते हैं एवं दिन में सोते रहते हैं या आराम करते हैं। इन्हें रात्रिचार (Nocturnal) प्राणी कहते हैं। कुछ सुबह-शाम सक्रिय रहते हैं बाकी रात्रि व दिन में सोते रहते हैं या आराम करते हैं। इन्हें क्रीपसकुलर (Cripuscular) प्राणी कहते हैं।

वन क्षेत्र के पथ पर वन्यजीव के पगचिन्ह (फोटो: डॉ जॉय गार्डनर)

इस तरह सक्रियता के आधार पर प्राणियों के तीन वर्ग होते हैं। इन वर्गों के कुछ उदाहरण निम्न हैं

क्र सं
वर्ग
उदाहरण
1 दिनचारी बन्दर, लंगूर, साँभर*, चीतल*, काला हिरण, चिंकारा, हाथी, गंगा डॉलफिन, नेवले, खरगोश*, जंगली मुर्गे, तीतर, बटेर, तोते आदि।
2 रात्रिचारी साँभर#, चीतल#, खरगोश#, जरख, भारतीय लोमड़ी, सिंह, बाघ$, तेंदुआ, शियागोश, रस्टी-स्पॉटेड कैट, मछुआ बिल्ली, छोटा बिज्जू, काला बिज्जू, पैंगोलिन, छुछुंदर, झाऊ चूहा, सेही, उडन गिलहरी, बागल, चमगादड. उल्लू, नाइटजार आदि।
3 क्रीपसकुलर बाघ, चूहा, हिरण, ऊद बिलाव, पतासी पक्षी आदि।

* रात्रिचर व्यवहार भी करते हैं , # दिनचारी व्यवहार भी करते हैं , $ क्रीपसकुलर व्यवहार भी करते हैं

दिनचारी प्राणी भी पूरे दिन सक्रिय नहीं रहते बल्कि कुछ खास घन्टों में ही अपनी सक्रियता ज्यादा बनाये रखते हैं बाकि समय किसी सुरक्षित जगह व्यतीत करते हैं। यही बात रात्रिचर प्राणियों पर लागू होती है। वे भी कुछ खास घन्टों अधिक सक्रिय रहते है। बाकी समय सुरक्षित जगह पर चले जाते हैं।

वन्यजीवों के चिन्हों का अवलोकन करते हुए वन्यजीव प्रेमी (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

कोई व्यक्ति प्राणी अवलोकन हेतु वन में दिन में निकलता है एवं माना उसे उडन गिलहरी की तलाश है तो चाहे वह वन में कितना ही घूमे, संभावना यह रहेगी कि उसे उडन गिलहरी नहीं मिलेगी। उडन गिलहरी रात्रि में निकलेगी जबकि व्यक्ति उसे दिन में तलाश कर रहा है। यानी प्राणी भौतिक रूप से साक्षात दिन में नज़र नहीं आयेगा, परन्तु रात्रि में जब वह सक्रिय बना रहा था उस समय उसने कई प्रमाण पीछे छोडे़ होंगे जो प्रकृति में मिलने की पूरी संभावना होती है। मसलन किसी महुये या सालर वृक्ष के नीचे टहनियों के छोर पत्तियों के भूमि पर बेतरतीब बिखरे मिलेंगे। यदि इन टहनियों के निचले चोरों का अवलोकन किया जाये तो पायेंगे कि वहाँ इनसाइजर दाँतों से कुतरने के स्पष्ट निशान हैं। यह एक ऐसा पुख्ता प्रमाण है जो दिन में गिलहरी दिखाई न देने के बावजूद रात्रि में उसकी उपस्थिती को निश्चायक रूप से प्रमाणित करता है। यहाँ महुये की कुतरी टहनियां “प्राणी प्रमाण“ कहलायेंगी। प्रकृति में जब भी हम वन पथों, पगंडडियों या आवास के दूसरे भागों में घूमते हैं, हमें तरह-तरह के प्राणी प्रामाण देखने को मिलाते हैं। ये सब किसी न किसी प्रजाति विशेष के चिन्ह या प्रमाण होते हैं जो उसकी उपस्थिति को सिद्व करते हैं। जब भी हम वन में अकेले जायें या एक गाइड के रूप में जायें, प्राणी नजर नहीं भी आ रहे हो तो रास्तों पर व उनके आस-पास, तिराहों व चौराहों पर ध्यान से देखेंगे तो कोई न कोई निशानात अवश्य मिलेंगे।

आजकल वन्यजीवों की गतिविधियों की निगरानी करने के लिए “कैमरा ट्रैपिंग” तकनीक का प्रयोग किया जाता है (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

कुछ प्राणी प्रमाण :

प्रकृति में अनेक प्राणी प्रमाण देखने को मिलते हैं। हमारे क्षेत्र में मिलने वाले कुछ प्राणी प्रमाण निम्न हैः

  • चलने के दौरान बने पैरों के निशान (Pugmark & Hoof Mark)
  • रेंगने के निशान: सरीसृप् वर्गो के प्रार्णीयों के चलने के दौरान पैर,पेट व पूँछ द्वारा बनाये घसीट जैसे निशान
  • घसीट के निशानः माँसाहारी प्राणी कई बार शिकार को घसीट कर सुरक्षित स्थान पर ले जाते हैं। शिकार को घसीटने से जमीन की घास व पौधे मुड़ जाते हैं तथा एक घसीट का स्वच्छ निशान बन जाता है।
  • कंकाल व शव के अवशेषः माँसाहारी प्राणियों द्वारा किसी शाकाहारी का शिकार करने के बाद उसे खाने के उपरान्त हडियों का ढाँचा छोड दिया जाता है। ताजा स्थिति में खाल,बाल,पेट में भरा चारा आदि भी मौके पर मिलते हैं। दुर्गन्ध भी मिलती है। समय के साथ जरख प्राणी कंकाल को भी इधर-उधर कर देते हैं फिर भी कुछ अवशेष कई दिनों तक पड़े मिल जाते हैं।

बाघ और जंगल कैट के पगचिन्ह (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

  • किलः माँसाहारी प्राणी द्वारा बडा शाकाहारी मारने पर वह एक से अधिक दिन खाया जाता है। मरा हुआ प्राणी किल के रूप मेें जाना जाता है। कई बार किल पर दूर से देखने पर गिद्व व कौवे भी मँडराते देखे जाते हैं। किल दो प्रजातियों की उपस्थिती सिद्व करता है। एक शाकाहारी प्रजाति व दूसरी माँसहारी प्रजाति की।
  • पंखः पक्षी मॉल्टिग द्वारा अपने पंख स्वयं भी गिराते हैं एवं किसी शिकारी प्राणी द्वारा मारे जाने पर भी बेतरतीब पंख बिखरे मिल सकते हैं। पंखों को पहचान कर पक्षी की प्रजाति पहचानी जा सकती है।

आंकड़ों का संग्लन करते समय हमेशा पगचिन्ह के साथ एक मापक रखना चाहिए ताकि पगचिन्ह के आकार का अंदाजा लगाया जा सके (फोटो: डॉ जॉय गार्डनर)

  • छाल उतारने व छाल खाने के निशानः नर साँभर व नर चीतल एन्टलरों की वेलवेट सूख जाने पर किसी वृक्ष के तने या टहनी के एण्टलर रगड़-रगड़ कर सूखी खाल उतारते हैं। इस प्रयास में वृक्ष की छाल भी छिल जाती है। साँभर चीतल के मुकाबले अधिक ऊंचाई पर छाल उतारता है। इस तरह वृक्ष की छिली छाल व उसकी ऊंचाई को देख कर साँभर व चीतल की उपस्थिति जानी जा सकती है। सेही व लंगूर भी हरे वृक्षों व झाडियों की छाल को खाते हैं। सेेही छाल उतारने में ऊपरी व निचले जबडे के 2-2 इनसाइजर दाँतों का उपयोग करती है अतः छीलने के स्थान पर दो-दो इनसाइजरों के स्पष्ट निशान मिलते हैं। लंगूर केनाइन का उपयोग करता है अतः पौधे के तने पर अकेले केनाइन का लकीरनुमा निशान मिलता है।
  • नखर चिन्हः तेदुआ जब वृक्ष पर चढता है तो अपने नाखून छाल में गडा कर चढता व उतरता है। इस प्रयास में तने की छाल में खरौंचनुमा निशान उभर आते हैं। भालू चढता है तब भी वृक्ष की छाल में नाखून गड़ाने से खरौंच का निशान बनता है। लेकिन तेदुऐ के नाखून पैने होने से छाल में सँकरी व गहरी खरौंच बनती है।
  • घौंसलेः हर पक्षी के घौंसले की बनावट, रखने का स्थान,बनाने में प्रयोग की गई सामग्री के बहुत अंतर होता है। घौंसले के प्रकार को देख कर पक्षी की प्रजाति को पहचाना जा सकता है। घौंसलों के पास टूटे अण्डों के खोल, बीटों के प्रकार आदि का मुल्यांकन कर भी पक्षीयों की प्रजाति को पहचाना जा सकता है। घौंसले किसी प्रजाति के वहाँ होने के अच्छे प्रमाण होते हैं।
  • अवाजेंः जंगल में तरह-तरह की आवाज़ें सुनने को मिलती हैं। बाघ या तेंदुऐ की उपस्थिति में शाकाहारी प्राणी जैसे साँभर, चीतल, नीलगाय आदि डर के मारे अलार्म काल निकलते हैं। इन आवाजों को पहचान कर शाकाहारी प्रजाति की उपस्थिति व प्रजाति का निर्धारण किया जा सकता है। माँसाहारी के वहाँ होने का भी प्रमाणीकरण हो जाता है। ऐसे ही डिस्ट्रेसकॉल भी बिल्ली या साँप पास होने पर पक्षी करते हैं। पक्षियों के बच्चे भोजन माँगने हेतु बैगिंगकाल करते है। प्रजनन में प्राणी प्रणय आवाजें निकालते हैं। आवाजों को समझने का एक पृथक विज्ञान है जिसे “आवाज विज्ञान“ कहते हैं।

अन्य प्रमाणः कुतरे फल व बीज, केंचुली,मल, मैंगणी, बिल, मल की ढेरी, मुड़ी हुई घास, चरे हुये पौधे, वृक्षों के तनों पर रगड़ के निशान या कींचड़ रगडने के निशान, बीटिंग पाथ(बार-बार चलने से बने रास्ते) आदि प्रकृति में अनेक प्राणियों की उपस्थिति का संकेत देते हैं।

सेही का मल (फोटो: श्री महेंद्र दन)

निम्न स्थानों पर प्राणियों के अप्रत्यक्ष प्रमाण मिलने की संभावना अधिक रहती हैः
  1. कच्चे वन पथ
  2. पगंडडिया व गेम टेªल
  3. तिराहे व चौराहे
  4. जल स्त्रोतों के पास
  5. दो आवासों के मिलन स्थल पर

सेही के पैर, इस से आप अंदाज लगा सकते हैं की इसका पगचिन्ह कैसा दिखेगा (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

प्राणी प्रमाणों का महत्वः

हम हर बार उस समय जंगल में नहीं जा सकते जब कोई प्राणी सक्रिय रूप से घूम रहा हो। हम नियमों एवं प्रबन्ध व्यवस्था का पालन करते हुये किसी खास घन्टों में ही जंगल में जा सकते हैं। हो सकता है उन घन्टों में प्राणी अपनी दैनिक क्रियाएं पूर्ण कर सोने व आराम करने चला गया हो। इन विषम घन्टों में यदि हम प्राणी प्रमाणों को ढूंढें तो हमारी यात्रा का उद्देश्य व आनन्द किसी हद तक पूर्ण हो जाते हैं। अतः प्राणी प्रमाणों को ढूढने की काबलियत व उनको समझने की क्षमता विकसित करनी चाहिये।

An expert on Rajasthan Biodiversity, he retired as Assistant Conservator of Forests, with a Doctorate in the Biology of the Baya (weaver bird) and the diversity of Phulwari ki Nal Sanctuary. He has authored 600 research papers & popular articles and 10 books on nature.