स्वस्थ नदी तंत्र के सूचक ऊदबिलाव जलीय खाद्य श्रृंखला में अहम भूमिका निभाते हैं जिसको पहचानते हुए इनके प्रति जागरूकता और संरक्षण को प्रोत्साहित करने के लिए भारतीय डाक सेवा ने अपने नियत डाक टिकट के नौवें संस्करण में 20 जुलाई 2002 को एक डाक टिकट जारी किया था।

स्मूद कोटेड ओटर, एशिया में पाए जाने वाला सबसे बड़ा ऊदबिलाव है जो इराक में एक सीमित क्षेत्र के साथ भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण-पूर्व एशिया के अधिकांश हिस्सों में पाए जाते हैं। इन देशों में ये व्यापक रूप से वितरित तो है लेकिन दुर्भाग्यवश किसी भी क्षेत्र में बहुल तादाद में नहीं पाए जाते। ये प्रायः नदी के स्वच्छ जल में निवास करते हैं, झीलें,आर्द्रभूमि और मौसमी दलदल इनके अन्य पर्यावास में शामिल हैं। चंबल नदी भारत की सबसे साफ बारहमासी नदियों में से एक जो मध्य प्रदेश और राजस्थान कि सीमा बनती है, ऊदबिलाव कि एक सीमित आबादी कि शरणस्थली है। राजस्थान में स्मूद कोटेड ओटर कि उपस्थिति रावतभाटा, केशोराय पाटन, धौलपुर और सवाई माधोपुर के पाली घाट क्षेत्र में दर्ज कि गई है। अस्थाई तौर पर रणथंभौर नेशनल पार्क में 2019 में पहली बार ओटर पूरे परिवार के साथ झालरामें छोटी छतरी के पीछे वन विभाग के अधिकारियों द्वारा देखे गए थे जो कि संभवतः चम्बल नदी में बाढ़ कि वजह से नदी के ऊपरी क्षेत्र में आ गए थे। अक्सर ये किसी भी उपयुक्त आवास में रहने में सक्षम हैं, लेकिन अन्य ऊदबिलाव प्रजातियों कि मौजूदगी में ये छोटी नदियों और नहरों कि अपेक्षा बड़ी नदियों के बीच में रहना पसंद करते हैं। ये भूमि पर खुले क्षेत्रों में बहुत कम समय बिताते हैं और अधिकतर समय पानी में ही व्यतीत करना पसंद करते हैं।कुछ वर्ष पहले तक ये केवलादेव नेशनल पार्क, भरतपुर और प्रतापगढ़ में भी पाए जाते थे लेकिन अन्य संरक्षित प्रजातियों कि तरह इनके संरक्षण को प्राथमिकता या उचित महत्तव न मिलने के कारण ये आज कुछ सीमित पर्यावासों में अपने अस्तित्व पर खतरा लिए जूझ रहे हैं।

स्मूद कोटेड ओटर एक मांसाहारी अर्द्ध जलीय स्तनपायी प्राणी है जो नदी के एक लंबे खंड को कवर करते हैं और अक्सर नदी के किनारों के उन हिस्सों में अपनी छोटी सी मांद (den, holt या couch भी कहते हैं) बनाकर रहते हैं जो पूरी तरह से अन्य जीवों कि पहुँच से दूर हो। इनके बड़े सुगठित तरीके से निर्मित छोटे मख़मली फर होने के कारण इन्हें स्मूद कोटेड ओटर कहा जाता है। इनको स्थानीय भाषा में जलमानुष, पानी का कुत्ता, उदबिलाव, आदि नामों से जाना जाता है। चम्बल क्षेत्र मेंअक्सर इन्हें जल मानस्या नाम से संबोधित किया जाता है। इनका वैज्ञानिक नाम एक फ्रांसीसी प्रकृतिवादी ए टि एन जियोफ़रॉय सेंट-हिलैरे द्वारा सन 1826 में सुमात्रा सेएकत्र एक भूरे रंग के ओटर के लिए Lutra perspicillata दिया गया था। 1865 में जॉन एडवर्ड ग्रे ने इन्हें Lutrogale जीनस में रखा। लुटरोगेल जीनस में तीन प्रजातियाँ पहचानी गई थी लेकिन वर्तमान में इस जीनस में सिर्फ स्मूद कोटेड ओटर (Lutrogale perspicillata) ही एकमात्र जीवित प्रजाति है। स्मूद कोटेड ओटर कि तीन उप-प्रजातियाँ भी पाई जाती हैं। पहली भारतीय प्रायद्वीप से दक्षिण-पूर्वी एशिया में पाए जाने वाले हल्के भूरे फ़र के ऊदबिलाव (Lutrogale perspicillata), दूसरे पाकिस्तान के सिंध और पंजाब क्षेत्र में पाए जाने वाले हल्की पीली खाल वाले ऊदबिलाव (Lutrogale perspicillata sindica), और तीसरे इराक के टिग्रिस नदी के क्षेत्र में पाए जाने वाले गहरे भूरे रंग कि खाल वाले ऊदबिलाव (Lutrogale perspicillata maxwelli)

ऊदबिलाव का आकार तीन से पांच फुट तक होता है और यह लम्बे और पतले शरीर वाले होते हैं। इनके सिर गोल, रोम रहित नाक, पूँछ चपटी होती है। इनकी आँखें छोटी, मूँछें घनी और कान छोटे तथा गोलाकार होते हैं। इनकी टांगे छोटी व मजबूत होती है जिनमें मजबूत पंजे और जालीदार अंगुलियाँ होती है। इनके पैर छोटे होने के कारण ये अधिक ऊंचे नहीं होते है। इनका वजन दस से तीस किलोग्राम तक हो सकता है, फिर भी ये बहुत फुर्तीले होते हैं। अक्सर अपने शिकार के पीछे पानी में बहुत तेजी से तैरते हुए तली तक पहुंच जाते हैं। ये पानी में इस प्रकार तैरते हैं, जैसे कोई रिवर राफ्टिंग कर रहा हो। इनके असामान्य रूप से छोटे और चिकने फर इन्हें ऊष्मा प्रदान कर ठंड से बचाव करते हैं; इनका फर पीछे की ओर गहरे लाल-भूरे रंग का हो सकता है, जबकि नीचे का भाग हल्के भूरे रंग का होता है।

परिवार समूह (romp) मे विचरण करते ऊदबिलाव (फोटो: डॉ. कृष्णेन्द्र सिंह नामा)

स्मूद कोटेड ओटर समूह में रहने वाले जीव हैं जो तीन-चार संतानों के साथ एक जोड़े का छोटा परिवार समूह (romp) बनाकर रहते हैं। इनके एक समूह में 4 से 11 ऊदबिलाव हो सकते हैं। समूह के नर ऊदबिलाव को dogs / boars कहा जाता है, मादा को bitches या sows कहा जाता है, और उनकी संतानों को pups कहा जाता है। ऊदबिलाव का संचय (copulation) पानी में होता है जो एक मिनट से भी कम समय तक रहता है।जिन क्षेत्रों में खाद्य आपूर्ति पर्याप्त है, वे पूरे वर्ष प्रजनन करते हैं; लेकिन जहां ऊदबिलाव पर्याप्त जल के लिए मानसून पर निर्भर हैं वहाँ प्रजनन अक्टूबर और फरवरी के बीच होता है। मादा ऊदबिलाव (bitches) कि गर्भावधि 60-63 दिनों कि होती है जिसके बाद ये एक बार में 4-5 पिल्ले पैदा करते हैं। मादाएँ अपने बच्चे को पानी के पास एक बिल में जन्म देती हैं और उनकी परवरिश करती हैं। जन्म के समय पिल्ले अंधे और असहाय होते हैं और इनकी आँखें 10 दिनों के बाद खुलती हैं। पिल्लों को लगभग तीन से पांच महीने तक भोजन समूह के वयस्कों द्वारा उपलब्ध करवाया जाता है। वे लगभग एक वर्ष की उम्र में वयस्क आकार तक पहुंचते हैंऔर दो या तीन साल में यौन परिपक्वता प्राप्त करते हैं।

ऊदबिलाव एक मछली के शिकार के साथ (फोटो: श्री बनवारी यदुवंशी)

ऊदबिलाव, मगरमच्छ और फिशईगल के साथ जलीय खाद्य श्रृंखला में सबसे ऊपर हैं। ऊदबिलाव के लिए नदी में पाई जाने वाली बड़ी मछलियाँ, कैट्फिश, आदि पसंदीदा भोजन है। रावतभाटा के आस-पास के गांवों में मछली पालन के उद्देश्य से लायी गई मछलियों की एक विदेशी प्रजाति तिलापिया (Tilapia) संयोगवश चम्बल के नदी तंत्र में शामिल हो गयी और यहाँ की स्थानीय प्रजातियां के लिए संकट बन गई। जहाँ एक ओर तिलापिया के कारण मछलियों कि स्थानीय प्रजातियाँ संकट में है वही दूसरी ओर इस क्षेत्र में यह ऊदबिलाव का प्रमुख आहार भी है। मछलियों के अलावा ये चूहे, सांप, उभयचर और कीड़े आदि का शिकार भी करते हैं जो कि इनके आहार का एक छोटा सा हिस्सा बनाते हैं। ये अकेले या समूह में घेरा डालकर मछलियों का शिकार करते हैं।

चट्टानों और वनस्पतियों पर अपने पूरे समूह के साथ पेशाब और मल (spraint) करके अपने क्षेत्र को चिह्नित करते ऊदबिलाव (फोटो: श्री बनवारी यदुवंशी)

ऊदबिलाव रेतीले रिवर बैंक पर आराम करते हैं और पेड़ों की जड़ों के नीचे या बोल्डर के बीच एक छोटी सी मांद बनाकर रहते हैं जिनमें अनेक निकास होते हैं। कोटा से रावतभाटा के बीच चम्बल नदी में ऊदबिलावों की स्वस्थ प्रजनन आबादी सुबह और शाम के घंटों में सक्रिय रूप से देखी जा सकती है। आमतौर पर ये दिन के दौरान, दोपहर में थोड़े आराम के साथ, सक्रिय रहते हैं। समूह में जब ये नदी में बार-बार गोता लगा बाहर निकलते हैं तो अक्सर उनके मुंह में एक मछली होती है इस दौरान उनकी धनुषाकार पीठ एक छोटी डॉल्फ़िन जैसा प्रभाव पैदा करती है जिसे देखना एक अलग रोमांच पैदा करता है। ऊदबिलाव चट्टानों और वनस्पतियों पर अपने पूरे समूह के साथ पेशाब और मल (spraint) करके अपने क्षेत्र को चिह्नित कर घुसपैठियों को दूर रखते हैं। झुण्ड में मस्ती करने वाले जानवर होने के नाते, वे लगातार एक-दूसरे के साथ ऊँची-ऊँची चीखो के माध्यम से संवाद करते रहते हैं। समूह में कई बार इन्हें अन्य जीवों को चंचलता पूर्वक पीछा करते देखा गया है। कोटा के वन्यजीव फोटोग्राफर बनवारी यदुवंशी बताते हैं कि रावतभाटा में ऊदबिलावों द्वारा कुत्तों के समूह का पीछा और इसके प्रतिकूल कुत्तों द्वारा ऊदबिलाव का चंचलता पूर्वक पीछा करना अक्सर देखा जा सकता है। कई बार इन्हें मगरमच्छों को परेशान करते भी देखा गया है।

रावतभाटा मे अक्सर कुत्तों के साथ चंचलतापूर्वक संघर्ष करते देखे जाते ऊदबिलाव (फोटो: श्री बनवारी यदुवंशी)

ऊदबिलाव मानवीय हस्तक्षेप पसंद नहीं करते, अक्सर मनुष्यों से शर्माते हैं और मानवीय गतिविधि होने पर दूर चले जाते हैं। लेकिन ऊदबिलाव द्वारा समझदारी दिखाने के बावजूद मनुष्य उनके जीवन में वर्षों से हस्तक्षेप कर उनके आशियाने उजाड़ रहा है। मानवीय हस्तक्षेप के कारण ही आज दुनिया भर से ऊदबिलाव के 13 प्रजातियों में से 7 संकटग्रस्त हैं, जिनमें से तीन भारत में पाए जाते हैं। स्मूद कोटेड ओटर के अलावा दो और प्रजातियां, यूरेशियन ओटर, एशियन स्मॉल क्लाव्ड ओटर, हमारे देश में मौजूद है।

भारत में पाए जाने वाले ऊदबिलाव की तीनों प्रजातियाँ वन्यजीव संरक्षण अधिनियम से सुरक्षित हैं। स्मूथ कोटेड ओटर को इंटरनेशनल यूनियन फॉर कंजर्वेशन ऑफ नेचर (IUCN) द्वारा ‘Vulnerable’के रूप में वर्गीकृत किया गया है और यह वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 की अनुसूची-II के तहत संरक्षित है। लेकिन फिर भी ये अपनी घरेलू सीमा – दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया – में सुरक्षित नहीं हैं, और इनकी संख्या उन मुद्दों के कारण कम हो रही है जिनसे सभी लोग परिचित हैं, शिकार। इनका शिकार भी उन्हीं लोगों द्वारा किया जाता है जो बाघों और तेंदुओं को फँसाते हैं, मारते हैं, और विदेशों में बेचते हैं।

2014 में IOSF (International Otter Survival Fund) द्वारा ऊदबिलाव के गैर-कानूनी व्यापार पर जारी एक रिपोर्ट के अनुसार उत्तर भारत से जब्त किए गए जंगली जानवरों के खाल में से लगभग 20-30% खाल ऊदबिलाव के होते हैं। ऊदबिलाव के खाल (pelts) कि तस्करी तिब्बत और चीन के अवैध फर बाजारों के लिए कि जाती है। ओटरफर को इसकी शानदार मोटाई (650,000 बाल प्रति वर्ग इंच) की वजह से उच्च गुणवत्ता का माना जाता है और इसका उपयोग कोट, जैकेट, स्कार्फ और हैंडबैग बनाने के लिए किया जाता है। यह अनुमान है दुनिया की 50% ओटर स्किन भारत में उत्पन्न होती हैं, जो पूरी तरह से अवैध है। वास्तव में चीन ने आखिरी बार 1993 वैध तरीके से ऊदबिलावों के खाल का आयात किया था। हालांकि, पाकिस्तान, तुर्की और अफगानिस्तान से प्राप्त खाल भी बहुत मूल्यवान हैं लेकिन यह कहा जाता है कि सबसे अच्छा जल रोधक ओटर खाल भारत और पाकिस्तान से प्राप्त होता है। वर्तमान के व्यापक ऑनलाइन व्यापार ने स्थिति को और अधिक खराब कर दिया है।

मछली के जाल मे फंसा ऊदबिलाव(फोटो: श्री बनवारी यदुवंशी)

खाल के अलावा ऊदबिलाव के शरीर के अंगों के “पारंपरिक” चिकित्सा में इस्तेमाल होने की भी खबरें हैं, ओटर जननांगों, खोपड़ी और अन्य शरीर के अंगों को पीसकर पारंपरिक दवाओं के घटक के रूप में उपयोग किया जाता है। ओटर के वसा से निकाले गए ऑटर ऑयल भी परंपरिक दवाओं के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

ऊदबिलाव के आवास की हानि भी एक गंभीर समस्या है, इनके आवास को मनुष्य अपने तरीके से उपयोग, बस्तियां बसाने, कृषि और जल-विधयुत परियोजनाओं के लिए परिवर्तित कर नुकसान पहुँचा चुका है। भूमि उपयोग परिवर्तन के साथ ही नदी तंत्र को क्लोरीन युक्त हाइड्रोकार्बन और ऑर्गनो फॉस्फेट जैसे कीटनाशकों द्वारा प्रदूषित किया जा रहा जिससे कि ऊदबिलाव के आधार शिकार कम होते जा रहे हैं। इसके अलावा बंगाल, बांग्लादेश और पाकिस्तान के कई क्षेत्रों में ऊदबिलाव का उपयोग मछलियों को पकड़ने के लिए भी किया जाता है। मछुवारे ऊदबिलावों को रस्सी से बांध कर नाव के दोनों किनारों से नदी में नीचे तक भेजते है जिसकी वजह से मछलियाँ ऊपर कि तरफ उनके द्वारा बिछाए गए जाल में आकार फंस जाती है।

राजस्थान में चंबल किनारे, सर्दियों में जब ऊदबिलाव बच्चे पालने के दौरान सबसे ज्यादा असहाय होते हैं। इस मौसम के दौरान, वे मनुष्यों द्वारा फसलों की कटाई और नदी के चट्टानी हिस्सों के साथ लकड़ी हटाने से परेशान रहते हैं और विशेष रूप से जलीय कृषि स्थलों पर ऊदबिलाव अंधाधुंध मारे जाते हैं।

नियत डाक टिकट के नौवें संस्करण मे जारी डाक टिकट

ऊदबिलाव नदी तंत्र के अच्छे पारिस्थितिक स्वास्थ्य के संकेतक हैं जिनके लुप्त होने के पर्यावरण पर गंभीर परिणाम हो सकते हैं और पारिस्थितिकी तंत्र असंतुलित हो सकता है। हाल ही में (2018) कर्नाटक सरकार ने तुंगभद्रा नदी के 34 किमी. क्षेत्र को देश का पहला ओटर रिजर्व घोषित कर देश में ओटर संरक्षण की शुरुआत की है। दुर्भाग्यवश, विडंबना यह है कि ऊदबिलाव के लुप्तप्राय और अत्यधिक संरक्षित होने के वावजूद इनके वास्तविक सुरक्षा के लिए ना ही कोई नीति है और ना ही कोई कार्यक्रम है।

 

References:

  1. Hussain, Syed Ainul. (1993). Aspects of the ecology of smooth coated Indian otter Lutra perspicillata, in National Chambal Sanctuary.Shodhganga: a reservoir of Indian theses @ INFLIBNET.http://hdl.handle.net/10603/58828
  2. Chackaravarthy, SD, Kamalakannan, B and Lakshminarayanan, N (2019). The Necessity of Monitoring and Conservation of Smooth-Coated Otters (Lutrogale perspicillata) in Non-Perennial Rivers of South India. IUCN Otter Spec. Group Bull. 36 (2):83 – 87. https://www.iucnosgbull.org/Volume36/Chakaravarthy_et_al_2019.html
  3. IOSF, (2014). A Report by The International Otter Survival Fund. https://www.otter.org/Public/AboutOtters_OtterSpecies.aspx?speciesID=11
  4. Nawab, A. (2013). Conservation Prospects of Smooth-coated Otter Lutrogale perspicillata (Geoffroy Saint-Hilaire, 1826) in Rajasthan. Springer Link. https://link.springer.com/chapter/10.1007%2F978-3-319-01345-9_13

Praveen holds a degree in Life Sciences and is currently working as Assistant Conservation Biologist with Tiger Watch. He has worked for Rajasthan & Haryana State Biodiversity Boards as Scientific Consultant and contributed in documentation of the biological diversity of these States. He has documented wetlands of Rajasthan and aided WII team in conservation breeding program of Lesser Florican.