माउंट आबू पर लिखे गए दो अनोखे शोध पत्र एवं उनका मेधावी लेखक चार्ल्स मेकैन
वर्ष 1941 में माउंट आबू में छुट्टी मनाने आया एक बायोलॉजिस्ट वहां की जैव- विविधता पर शोध पत्र…
इतिहास के पन्ने उन लेखों के लिए है जो पुराने दस्तावेज़ों, यात्रा-वृत्तांतों और लोगों की स्मृति से राजस्थान के वन्यजीव का बीता हुआ हाल निकालते हैं — कौन सी प्रजाति कहाँ थी, किसने उसे दर्ज किया, और संरक्षण के आज के तौर-तरीके कहाँ से आए।
इनमें डूंगरपुर राज्य में हुआ बाघों का पुनःस्थापन है, फतेह सिंह राठौड़ जैसे लोग, रुडयार्ड किपलिंग और बूंदी में मानव-वन्यजीव संघर्ष, राजस्थान से खो चुके तीन चमगादड़ों की पहेली, एक खास बटेर और एक विवादित ब्रिटिश खोजकर्ता, और रणथम्भौर के नामों का सफ़र। कुल 53 लेख, हिन्दी और अंग्रेज़ी दोनों में।
वर्ष 1941 में माउंट आबू में छुट्टी मनाने आया एक बायोलॉजिस्ट वहां की जैव- विविधता पर शोध पत्र…
A widely held belief is that scavengers do not feed on the carcass of a dead tiger because…
अक्सर लोग मानते हैं कि, बाघ के मरने के बाद उसके मृत शरीर को खाने कोई भी प्राणी…
We can decipher some truly ingenious ways of saving tigers from the archaic world of antiquated hunting methods.…
शिकार के अलग अलग तरीके है और इनमें छुपे ज्ञान से, हम बाघों को बचाने के अद्धभूत तरीके…
प्रोफेसर ईश्वर प्रकाश थार रेगिस्तान के अत्यंत महत्वपूर्ण जीव वैज्ञानिक रहे है। इनके द्वारा किये गए अनुसन्धान ने…
हमेशा से बाघों के अनुकूल रहा, राजस्थान का एक ऐसा क्षेत्र जो बाघ पर्यावास बनने को तैयार है…
बोखा बाघ अब इतिहास का एक किस्सा भर लगता है, पर यह वह बाघ था जिसने डूंगरपुर राज्य…
क्या आपने कभी सोचा है आजादी से पूर्व में राजस्थान में कैमरा ट्रैप फोटो लिया गया था ?…
ये कहानी है राजस्थान के मरुस्थल क्षेत्र में स्थित एक जिले - बीकानेर की जो कभी एक स्वतंत्र…