पिम्पा: थार मरुस्थल में उगने वाला सलाद पौधा

पिम्पा: थार मरुस्थल में उगने वाला सलाद पौधा

पिम्पा, राजस्थान के अत्यंत शुष्क वातावरण में उगने वाला सलाद पौधा जो भू उपयोग में आये बदलाव के कारण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

राजस्थान के थार मरुस्थल में उगने वाला एक पौधा, जिसके बारे में राजस्थान के लोगो को भी अधिक पता नहीं होगा, बहुत कम स्थानीय लोग ही इसे जानते है परन्तु थार मरुस्थल के कुछ लोग इसे सलाद की भांति खाने के उपयोग में लेते है I यह है Caralluma edulis, जिसे स्थानीय भाषा में लोग “पिम्पा” के नाम से जानते है इसका इस्तेमाल भोजन एवं दवा दोनों प्रकार से किया जाता है I यह राजस्थान के अत्यंत शुष्क क्षेत्र का एक मरुस्थलीय पौधा है I यह मुरैठ (Panicum turgidum) घास के साथ उगता हुआ देखा गया I  यह जल को संगृहीत कर गर्म एवं अत्यंत शुष्क वातावरण में उगने के लिए अनुकूल होता है I अक्सर इसे कच्चा ही सलाद की भांति खाया जाता है I  खाने में यह थोड़ा नमकीन होता है I अत्यंत चराई एवं भू उपयोग में आये बदलाव ने इसके अस्तित्व को संकटग्रस्त स्थिति में ला दिया है I

Caralluma edulis, भारत और पाकिस्तान का स्थानिक है तथा यह वनस्पतिक जगत के Asclepiadaceae परिवार का सदस्य है। (फोटो: डॉ. अमित कोटिया एवं डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

Caralluma edulis एक बहुशाखित पौधा है जिसकी शाखाये सिरे से नुकीली होती है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

Caralluma edulis, जल को संगृहीत कर थार मरुस्थल के चरम शुष्क इलाको में उगने के सक्षम है। (फोटो: डॉ. अमित कोटिया एवं डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

एक सर्वे में इसे जैसलमेर के खुईयाला, बहरमसर धाम, देवा -II और चान्दन गाँवो के आस पास उगता हुआ देखा गया है I  पिम्पा एक बहु शाखा वाला २०-३० सेंटीमीटर तक जमीन से ऊपर उगने वाला पौधा है जो Asclepiadaceae परिवार से सम्बन्ध रखता है I यह स्थानीय बाजार में कभी कभी बिकता भी है I कभी कभार कुछ लोग इसे एक सुंदरता बढ़ाने के लिए भी लगते है I  राजस्थान के थार मरुस्थल  से जुड़े वनस्पति वैज्ञानिको को इसे एक बार जरूर देखना चाहिए I

इसका तना स्वाद में नमकीन तथा बहुत ही रसीला होता है इसीलिए इस पौधे को सब्जी की तरह उगाया भी जाता है है। (फोटो: डॉ. अमित कोटिया)

 

विश्व का प्रथम बाघ पुनःस्थापन : डूंगरपुर राज्य के बाघ संरक्षण की कहानी

विश्व का प्रथम बाघ पुनःस्थापन : डूंगरपुर राज्य के बाघ संरक्षण की कहानी

बोखा बाघ अब इतिहास का एक किस्सा भर लगता है, पर यह वह बाघ था जिसने डूंगरपुर राज्य में किये गए हजारो शिकारों को भुला दिया और राज्य को संरक्षण की मिशाल का अग्रणी बना दिया। 

हम में से अधिकांश लोग भलीभांति परिचित है, की किस प्रकार सरिस्का में 2001 -04 तक शिकारियों द्वारा तेजी से सारे बाघों का सफाया कर दिया गया था, परन्तु तत्कालीन सरकार द्वारा सरिस्का में पुनः बाघ स्थापन किये गए, यहाँ रणथम्भौर से लेकर बाघों को छोड़ा गया I यद्पि सरिस्का के पर्यावास में अधिक सुधार नहीं हो पाया एवं यहाँ बाघों की स्थिति में अभी भी कोई बड़ा बदलाव नहीं आ पाया ।

यद्पि इसे बाघों के पुनः स्थापित करने की प्रक्रिया को विश्व की पहली बाघ स्थानांतरण  प्रक्रिया के रूप में देखा गया परन्तु इतिहास के पन्नो को देखे तो पता लगेगा की यह कार्य वर्षो पूर्व डूंगरपुर स्वतंत्र राज्य ने 1928 में ही कर दिखाया था ।

डूंगरपुर राज्य शिकार के साथ वन्यजीव संरक्षण में सदैव अग्रणी भी रहा है, पर जब वर्ष 1918  में राज प्रमुख महारावल बिजय सिंह की अचानक मृत्यु हो गयी तो, वहां ब्रिटिश राज्य द्वारा स्थापित अंग्रेज अधिकारी डोनाल्ड फील्ड ने अपनी मर्जी से 2-3 वर्षो में सारे बाघों का शिकार कर दिया। नव स्थापित महारवाल लक्ष्मण सिंह अपनी बाल्यावस्था में थे। जब महारवाल लक्ष्मण सिंह जब बड़े हुए तो, उन्होंने तय किया की राज्य में पुनः बाघों को स्थापित किया जाये ।

डूंगरपुर के जूना महल की दीवारों पर बने बाघ शिकार के भित्तिचित्र (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

वर्ष 1928, में दो बाघों को ग्वालियर से पकड़ कर रेल मार्ग से गुजरात लाया गया एवं तदुपरांत उन्हें सड़क मार्ग से डूंगरपुर लाया गया। इन दो बाघों में एक नर बाघ था जिसे ‘बोखा’ कहा गया एवं मादा को ‘बोखी’।

बोखा बाघ: जिसे ग्वालियर से डूंगरपुर लाया गया एवं प्रथम विस्थापित बाघ हो कर नए क्षेत्र में कुनबा बढ़ने का गौरव प्राप्त हुआ (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

शायद इन बाघों को दूर तक पिंजरे में लाने के दौरान उन्होंने अपनी मुख्य कैनाइन दांत पिंजरे को तोड़ने में गिरा दिए होंगे, तथा बाद में यह बाघ बोखा एवं बोखी कहलाये यद्पि इसका विवरण नहीं मिलता है। इन दोनों को सफलतापूर्वक डूंगरपुर के समृद्ध वनों में छोड़ा गया साथ ही बाद में इसी क्रम में और बाघों को भी राज्य में लाया  गया ।

प्रमाण मिलते है की, केवल बाघ ही नहीं लाये गए बल्कि डूंगरपुर राज्य ने उनके संरक्षण के लिए समुचित प्रयास भी किये, जिनमें उनकी निरंतर मॉनिटरिंग, उनके जल आपूर्ति के लिए जल कुंड (वाटर होल) का निर्माण एवं बाघों द्वारा पालतू पशु मरने पर मुआवजा देने का प्रावधान भी किया गया ।

इन सभी प्रयासों का परिणाम भी सुखद निकला एवं राज्य में 7 वर्ष में यह बाघो की संख्या 20  तक पहुँच गए। कहते है बोखी बाघिन ने 3 बार बच्चे दिए जिनमें कुल मिलाकर 10 शावकों पैदा हुए। सन्दर्भ बताते है की यह प्रयोग अत्यंत सफल हुआ एवं 1930 से 1937 के मध्य वहां लगभग 3 दर्जन बाघ शवको का जन्म हुआ। इसी प्रकार राज्य ने 1948 तक 25 बाघों की संख्या को बनाये रखा ।

बोखा बाघ की समाधी (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

यद्पि आज डूंगरपुर में कोई बाघ नहीं है परन्तु सिखने ले लिए वहां बहुत कुछ है। प्रयास करे हम हमारे इतिहास से सीखे एवं उसका सम्मान करे ।

सन्दर्भ:

  • Singh, P, Reddy, G.V. (2016) Lost Tigers Plundered Forests: A report tracing the decline of the tiger across the state of Rajasthan (1900 to present). WWF-India, New Delhi.
  • Divyabhanusinh, 2018  pers comm.
  • Mahesh Purohit 2019 pers  Comm.
थार मरुस्थल का कंकरनुमा मेंटिस

थार मरुस्थल का कंकरनुमा मेंटिस

मार्च महीने की एक सुबह थार के मरुस्थल में मैंने एक शानदार मरुस्थलीय पक्षी ग्रेटर हूपु लार्क (Alaemon alaudipes) देखा जो कभी शिकार की तलाश में ‘मगरे’ पर इधर उधर उड़ रहा था, तो कभी अपनी लम्बी टांगो से दौड़ रहा था ।चारों ओर से रेत के टीलों से घिरे,कंक्रीट की कठोर सतह वाले स्थान को स्थानीय भाषा में ‘मगरा’ कहा जाता है।

काफी कोशिश करने के बाद लार्क को एक मकड़ीनुमा शिकार मिला जिसे उसने अपनी लम्बी चोंच में पकड़ रखा था । मैंने उस समय इस पक्षी के व्यवहार के कुछ फोटो लिए, जिनमें शिकार की मात्र टांगे ही दिखाई दे रही थी, उसके शरीर का कुछ हिस्सा पक्षी के मुंह में था। मुझे लगा शायद यह एक बड़ी मकड़ी है या फिर केमल स्पाइडर (solifuge) है, परन्तु ये दोनों अक्सर रात को ही  सक्रीय होते हैं।  

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ग्रेटर हूपु लार्क द्वारा पकड़ा गया डेजर्ट मेंटिस फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल

अगली सुबह उसी ‘मगरे’ पर मुझे कुछ फिसलता हुआ दिखाई दिया, लगा मानो कोई कंकर का टुकड़ा हो। उस समय बहुत तेज हवा चल रही थी। पत्थर की तरह दिखने वाला यह जीव हवा के विपरीत दिशा में तेजी से चल रहा था। मैंने उसे नजदीक जाकर देखा देखा तो प्रकृति का एक अद्भुत छलावरण (camouflage) नजर आया। यह था एक मरुस्थल में मिलने वाला प्रेइंग मैंटिस (Praying  mantis), जो पत्थर या कंकर के सामान लगता है। मुझे नजदीक पाकर वह बचाव की मुद्रा में आ गया।  इसी मुद्रा में यह मैंटिस परिवार का सदस्य लगता है, जिसमें वह अपने आगे की दोनों टांगे हाथ जोड़ने की मुद्रा में ले आता है।

यह वही जीव था जिसे ग्रेटर हूपु लार्क ने पिछले दिन पकड़ रखा था। यह थार डेजर्ट मैंटिस (Eremiaphila rotundipennis) था। यह मेंटिस छलावरण (कैमोफ्लाज) में इतना माहिर होता है की इसको आंखों के सामने आने पर भी पहचानना लगभग असंभव होता है।

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मानव जैसे दिखने वाले चहरे को ऊपर उठाते हुए डेजर्ट मेंटिस फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल

इसका शरीर त्रिभुजाकार, आगे के पैर अच्छी पकड़ वाले, एवं पेट के पास का हिस्सा रंगीन होता है । यह एक आक्रामक शिकारी मेंटिस है। अन्य अधिकांश मेन्टिसों के विपरीत डेजर्ट मेंटिस उड़ नहीं सकते हैं क्योंकि इनके उड़ने वाले पंख अवशेषी रह गए हैं । जब ये मेंटिस आगे के पैरों को बंद करके बैठते हैं तो लगता है जैसे पूजा में हाथ जोड़कर बैठे हुए हों। यह देखना बहुत ही रोचक लगता है।

डेजर्ट मेंटिड इरेमियाफिला (Eremiaphila) जीनस का सदस्य है जिसकी पूरी दुनिया में 68  प्रजातियां हैं एवं उनमें से केवल एक ही यह प्रजाति थार डेजर्ट मेंटिस (Eremiaphila rotundipennis) भारत में पायी जाती है।

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डेजर्ट मेंटिस के पेट के नीचे का हिस्सा रंगीन एवं पंख अवशेषी रह गए हैं फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल

डेजर्ट मेंटिस मरुस्थलीय पर्यावरण के प्रति पूरी तरह से अनुकूलित होते हैं। ये जमीन पर रहते हैं जहाँ इनके लम्बे पैरों के कारण आसानी से तेजी से चल सकते हैं। ये कीड़ों एवं मकड़ियों को खाकर जीवित रहते हैं । रेगिस्तान में भीषण गर्मी,पानी की कमी,धूल भरी आंधियां सामान्य हैं जिसमे जीवों एवं पेड़ों को प्रतिकूल जलवायु का सामना करना पड़ता है।डेजर्ट मेंटिस इन सब परिस्थितियों को सहन करता है यही कारण है की उड़ने वाला यह जीव जमीन पर पाया जाता है। मुझे लगता है की थार मरुस्थल में डेजर्ट मेंटिस एवं  ग्रेटर हूपु लार्क का कोई गहरा सम्बन्ध है, तो जब भी आपको रेगिस्तान के मगरे में यह पक्षी दिखाई दे तो आप डेजर्ट मेंटिस को भी तलाशने की कोशिश करें।

तूतिया-राजस्थान का एक अद्भुत स्थानिक सांप

तूतिया-राजस्थान का एक अद्भुत स्थानिक सांप

राजस्थान सरीसृपों के लिए स्वर्ग के सामान है। कई प्रकार के विषैले और अविषैले सांप यहाँ विचरण करते हैं। मेरे अनुसार लगभग 40 प्रकार की विभिन्न प्रजातियां अथवा उपप्रजातियाँ यहाँ पाई जाती हैं। इन सबमें तूतिया सांप Lytorhynchus paradoxus (GÜNTHER, 1875), इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राजस्थान के थार मरुस्थल की एक स्थानिक (Endemic) प्रजाति है, यानि यह थार के अलावा और कहीं नहीं मिलती है। जीनस Lytorhynchus में 6 प्रजातियों के सर्प मिलते हैं जिनमे भारत में केवल  Paradoxus ही मिला है।

अल्बर्ट कार्ल गुंथर नामक एक जर्मन ब्रिटिश सर्प वैज्ञानिक ने सर्वप्रथम 1875 में तूतिया सर्प की खोज सिंध क्षेत्र में की, जो वर्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा है। गुंथर एक अत्यंत मेधावी सरीसृप वैज्ञानिक थे, जिन्होंने 340 सरीसृपों को नाम दिया एवं उनकी खोज की। उनसे अधिक सरीसृपों की खोज जॉर्ज अल्बर्ट बोलेन्गेर नामक वैज्ञानिक ने की है जिन्होंने 587 प्रजातियों का विश्लेषण किया एवं उन्हें नाम दिया था। खैर हम बात कर रहे हैं तूतिया सांप की जो थार मरुस्थल के रेतीले हिस्से में मिलते हैं।थार मरुस्थल में कई प्रकार के पर्यावास (habitat) मिलते हैं जैसे की  कठोर सतह वाला सपाट मैदान, बलुई टीले अथवा पथरीले ऊबड़खाबड़ स्थल I बलुई टीले भी दो प्रकार के होते है एक वह जो अपना स्थान तेज हवाओ और आँधियो में बदलते रहते है दूसरे वह जो एक जगह ठोस जमे रहते हैं I  तूतिया सांप,अधिकांशतया स्थान बदलने वाले मुलायम बालू वाले रेत के टीलों में विचरण करता है I रोचक बात यह है की यह सांप मिट्टी की सतह के  नीचे ऐसे चलता है मानो तैर रहा हो। पाकिस्तान के प्रसिद्ध सरीसृप वैज्ञानिक डॉ शर्मन मिंटो ने Lytorhynchus paradoxus के सन्दर्भ में लिखा की यह बलुई रेत केअस्थाई टीलों में जो की हवा से अपना स्थल बदलते रहते हैं, पाए जाते हैं, यह स्थान समुद्रतल से 500 मीटर की ऊंचाई तक हो सकते हैं।

खतरा महसूस होने पर यह सांप ‘8’ का आकर ले लेता है फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल

यह सांप अक्सर 8-14 इंच लम्बा एवं पतले मुंह एवं सिर वाला होता है। यह सर्प पूर्णतया रात्रिचर सर्प है। जब यह खतरा महसूस करता है तो कभी ‘8’ का कभी ‘S’ का आकार बनाकर तो कभी एक स्प्रिंग के सामान अपने शरीर को ऊपर उठाकर एक विशेष तरह का कम्पन्न पैदा करते हुए हल्की हिसिंग की ध्वनि पैदा करता है। इस दौरान यह अपना सिर अकसर नीचे रखते हुए छिपाता रहता है। यह इसके बचाव करने एवं आक्रामक दिखने की मुद्रा है। चूंकि यह अविषैला सर्प है,अतः इसे अपने बचाव के लिए कई प्रकार के अन्य तरीके निकालने पड़ते हैं।

आठ का आकार बनाये हुए तूतिया सांप फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल

राजस्थान में यह सर्प सर्वप्रथम अगस्त 2004 में मेरे द्वारा गोगा देव के मेले में चूरू जिले में देखा गया जो पास के ही एक गाँव गाजसर से लाया गया था।गोगा देव मेले में ग्रामीण कई प्रकार के सांपों को अपने गाँवों से चूरू शहर में लेकर आते हैं। तत्पश्चात उसी दिन मुझे यह सीकर जिले के रामगढ़ शेखावाटी कस्बे के पास धोरों में भी दिखा, यह क़स्बा मेरा पैतृक स्थान भी है तूतिया सर्प की खोज इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसके पूर्व में यह सर्प केवल मात्र पाकिस्तान से ही रिपोर्ट किया गया था । पाकिस्तान में यह जंगीपुर, जंगशाही,फतेहपुर,बारां,नाइ,जमराओ,बुर्रा,उमरकोट,थार एवं पारकर क्षेत्र से रिपोर्ट किया गया था। यह थार मरुस्थल के पश्चिमी छोर के हिस्से हैं,जो वर्तमान में पाकिस्तान के हिस्से हैं। मैंने इन्ही सांपों को राजगढ़-चूरू के राजमार्ग पर अधिक संख्या में उस दिन देखा जब अत्यधिक गर्मी वाले अप्रैल महीने में एक चक्रवाती वर्षा हुई।उस दिन रात्रिचर माने जाने वाले ये सांप शाम के 4 बजे उस राजमार्ग पर निकले और लगभग 8-9 की संख्या में वाहनों से कुचलने से मरे हुए मिले। यद्यपि कुछ वर्षों में यह सर्प राजस्थान के कुछ और इलाके जैसे जैसलमेर, बीकानेर एवं बाड़मेर जिलों में भी देखा गया है।यह सर्प टीलों पर रेंगने वाली छोटी छिपकली को अपना शिकार बनाता है। इस छिपकली का रंग रूप भी इस सर्प के समान दिखता है। इसका शिकार एवं खुद यह प्रजाति मुलायम सूखी बलुई रेत में ही रहने के लिए विकसित हुई है,यदि इस पर्यावास में निरंतर अधिक मात्रा में पानी से सिंचाई आदि की जाये तो, यह उस स्थान से विलुप्त हो जायेगा।

References

Bhide K, Captain A, Khandal D. 2004. “First record of Lytorhynchus paradoxus (Günther, 1875) from the Republic of India, with notes on its distribution”. Hamadryad 28 (1&2): 123-127.

Boulenger GA. 1890. The Fauna of British India, Including Ceylon and Burma. Reptilia and Batrachia. London: Secretary of State for India in Council. (Taylor and Francis, printers). xviii + 541 pp. (Lytorhynchus paradoxus, new combination, p. 323 + Figure 98 on p. 322).

Günther A. 1875. “Second Report on Collections of Indian Reptiles obtained by the British Museum”. Proc. Zool. Soc. London 1875: 224-234. (Acontiophis paradoxa, new species, pp. 232–233, Figure 5).

Ishan Agarwal1 and Achyuthan N. Srikantha 2011, FURTHER RECORDS OF THE SINDH AWL-HEADED SNAKE, Lytorhynchus paradoxus (GÜNTHER, 1875), FROM INDIA WITH NOTES ON ITS HABITAT AND NATURAL HISTORY, Russian Journal of Herpetology, Vol. 20, No. 3, 2013, pp. 165 – 170. 

Murray JA. 1884. “Additions to the Reptilian Fauna of Sind”. Ann. Mag. Nat. Hist., Fifth Series 14: 106-111.