फतेह सिंह राठौड़: टाइगरमैन

फतेह सिंह राठौड़: टाइगरमैन

मजबूत इरादों के धनी, प्रकृति प्रेमी, दूरदर्शी सोच रखने वाले इस इंसान ने रणथम्भौर के लिए हर चुनौती का सामना किया और अपने नाम के अनुसार उसमें फतेह हासिल की थी।

फतेह सिंह राठौड़ एक राजपूत परिवार से थे। उनका परिवार जोधपुर के पास स्थित चोरडियां नामक गाँव से निकला हुआ है। कई अन्य कामों में असफल होने के बाद उनका वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में आना महज एक संयोग था। उनके एक रिश्तेदार के कहने पर उनको सरिस्का में वन विभाग में रेंजर के रूप में नौकरी मिल गई। धीरे धीरे उन्हें इस काम में मजा आने लगा। यह वह समय था जब फतेह जंगल की बारीकियों को सीख रहे थे। थ्योरी से ज्यादा उनका मन ज़मीनी काम करने में लगता था। जंगल में उनके बढ़ते प्रभाव के कारण उनके कई विरोधी भी बन गए थे। उनका मानना था की जमीनी स्तर पर काम करके ही ज्यादा अनुभव हो सकते हैं जो डिग्रियों एवं थ्योरी से नहीं मिलते।

बीसवीं सदी में बाघों की संख्या 40000 थी जो सत्तर के दशक तक आते-आते मात्र 1800  रह गई थी। इसके चलते 1970 में इंदिरा गाँधी के प्रधानमंत्री बनने पर वन्यजीवों के शिकार को पूर्ण रूप से प्रतिबंधित कर दिया गया। प्रोजेक्ट टाइगर की शुरुआत 1973 में हुई जिसमें रणथम्भौर के साथ आठ अन्य अभ्यारण्य भी शामिल थे। अलग अलग तरह के विभिन्न पर्यावासों में बाघ संरक्षण को प्रोत्साहित करना इस परियोजना का लक्ष्य था। रणथम्भौर एक उष्ण पर्णपाती वन है। फतेह को इस नए पार्क का विकास करने की जिमेदारी सौंपी गई थी। उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपने के पीछे एस. आर. चौधरी एवं प्रोजेक्ट टाइगर के पहले निदेशक कैलाश सांखला का बहुत योगदान था। एस. आर. चौधरी ने फतेह को देहरादून के भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) में पढ़ाया था।

कुल मिलाकर इन दोनों ने फतेह की काबिलियत को समझा और भविष्य में फतेह भी उनकी उम्मीदों पर खरे उतरे। फतेह ने पार्क में ऐसी रोड बनाने का काम किया जो सीधी न होकर घुमावदार हों एवं  पानी के स्त्रोत तक पहुंचती हों। जब फतेह ने काम संभाला तब पार्क की हालत बहुत खराब थी। पार्क से लगते हुए 16  गांवो के लोग मवेशियों को पार्क में चराने ले आया करते थे। जलाने के लिए पुराने पेड़ काटे जा रहे थे। मवेशियों की बेरोकटोक आवाजाही ने पार्क की बड़ी घास एवं पेड़ पौधों को खत्म कर दिया था। वन्यजीवों के नाम पर कभी कभार बाघ के पगमार्क दिखाई दे जाया करते थे।

फतेह जानते थे की अगर पार्क को जिन्दा रखना है तो ग्रामीणों को पार्क से बाहर विस्थापित करना बहुत जरूरी है। इस काम को फतेह ने बड़ी सूझबूझ के साथ किया, विस्थापित ग्रामीणों को इसके लिए समझाया और उचित मुआवजा दिलवाने का प्रबंध करवाया। मुआवजे में 18 वर्ष से ऊपर के सभी ग्रामीणों को पैसों के अलावा पांच बीघा अतिरिक्त जमीन भी दी गई। इसके साथ ही घर बनवाने के लिए, कुए खोदने के लिए आर्थिक मदद की गई साथ ही ग्रामीणों के लिए स्कूल और स्वास्थ्य सेवाओं की भी उचित व्यवस्था की गई। कैलाश सांखला के सम्मान में नए गांव का नाम कैलाशपुरी रखा गया। विस्थापन के साथ ही धीरे-धीरे पार्क वापस हरा-भरा होने लगा।

1976  में पहली बार फतेह ने पार्क में एक बाघिन को देखा जिसका नाम उन्होंने अपनी बड़ी बेटी के ऊपर रखा; पद्मिनी। फतेह ने इस बाघिन एवं उसके चार शावकों ( पांचवा शावक जल्द ही मर गया था ) की गतिविधियों पर नजर रखनी शुरू की । फतेह के जमीनी स्तर पर किये गए प्रयासों से यह पार्क बाघ देखने के दुनिया में सबसे उपयुक्त पार्कों में से एक माना जाने लगा।

उन दिनों रणथम्भौर जयपुर महाराज के शिकारगाहों में शामिल था। जनवरी 1961 में रणथम्भौर राष्ट्रीय पार्क के बनने से पहले उन्हें इस पार्क में ब्रिटेन की महारानी एलिजाबेथ II के लिए शिकार आयोजन की व्यवस्था करना था। उन दिनों वन्यजीव पर्यटन का मतलब ही शिकार करना होता था और कई महाराजा विदेशी सैलानियों से आय के लिए शिकार का आयोजन करते थे।

बाघों के साथ  छोटे-छोटे अनुभवों को उनके एवं वाल्मीकि थापर (वाल्मीकि भारत में बाघों के प्रसिद्ध विशेषज्ञ हैं) द्वारा कई किताबों में लिखा गया है। उनके द्वारा खींचे गए एक फोटो में एक नर बाघ, शावकों के साथ खेल रहा था। अभी तक माना जाता रहा था की केवल मादा बाघ ही शावकों का पालन करती है। इसके विपरीत उनके द्वारा खींचे गए फोटो में एक नर बाघ, एक मादा बाघ एवं दो शावक पानी में अठखेलियां कर रहे थे। यहाँ तक की एक बार नर बाघ शावकों के साथ शिकार भी साझा कर रहा था। 1980 के आस-पास एक बाघ जिसका नाम चंगेज था, एक नए तरीके से शिकार करता था। जब भी कोई सांभर पानी में जाता तो वह उसका शिकार किया करता था। बाघ पर कई भाषाओं में बनी फिल्मों में फतेह के बारे में बताया गया है। कई देशी विदेशी पत्र-पत्रिकाओं में भी लिखा गया।

फतेह को उनके कामों के लिए कई अंतराष्ट्रीय सम्मानों से नवाजा गया । फतेह बहुत ही उदार दिल के इंसान थे जो हर किसी को अपना दोस्त बना लिया करते थे। वन्यजीवों को नुकसान पहुँचाने वालों के प्रति उनका व्यवहार बहुत सख्त हुआ करता था। यही कारण था की वह वन्यजीवों एवं पर्यावरण  को नुकसान पहुँचाने वालों के दुश्मन के रूप में जाने जाते थे। उनका केवल एक ही उद्देश्य हुआ करता था बाघों को बचाना और अगर उन्हें लगता की इस काम में कुछ गलत हो रहा है  तो वह उसके खिलाफ आवाज उठाने में कोई कसर नहीं छोड़ते थे। जब भी वे पार्क से किसी बाघ के गायब होने का मुद्दा उठाते तो वन विभाग इसके विपरीत उनकी बात को गलत साबित करने का प्रयास करते जिसके लिए वन विभाग द्वारा उन्हें कई बार प्रताड़ित भी किया गया। हालाँकि बाद में फतेह का दावा ही सही निकलता था।

फतेह अपने दृढ निश्चय एवं ईमानदारी के लिए जाने जाते थे। यही  कारण था की उनके विरोधियों ने उन्हें कई प्रकार के झूठे आरोपों में फसाने की कई बार कोशिश की जिन्हें बाद में सभी आरोपों को कोर्ट ने भी झूठा ही माना। फतेह को खुद के द्वारा विकसित किये पार्क में प्रवेश से प्रतिबंधित  किया जाना उनके जीवन का सबसे कठिन दौर था। उन्हें अपने पसंदीदा जंगल से दूर जयपुर में तकनीकी सलाहकार के तौर पर पदस्थापित किया जाना और लगातार उनकी सलाहों को वरिष्ठ अधिकारीयों द्वारा नजरअंदाज करना भी उनके लिए बहुत दुखद था।

फतेह सिंह राठौड़
रणथम्भौर के आस पास रहने वाले लोग फतेह से अपना दुःख दर्द साझा किया करते थे

1983 में मेरे द्वारा सवाई माधोपुर की यात्रा के बाद आज यह शहर बहुत बदल गया है। पार्क के द्वारा रोजगार के कई अवसर पैदा हुए हैं जिसने इस शहर की अर्थव्यवस्था में बड़ा सुधार किया है। आज रणथम्भौर बाघ देखने के लिए दुनिया की बेहतरीन जगहों में से एक है।  बाघों को देखना पर्यटकों के लिए एक शानदार अनुभव होता है। दुनिया में देखी जाने वाली बाघों की अधिकतर तस्वीरें रणथम्भौर में ली गयीं हैं। हालाँकि इस प्रसिद्धि की पार्क को कीमत भी चुकानी पड़ी है। समय-समय पर शिकारी यहाँ अपनी गतिविधियों को अंजाम देते रहते हैं। शिकारियों द्वारा बाघों की खाल एवं शरीर की चीन में तस्करी की जाती है।

शिकारियों के लिए फतेह का नजरिया बिलकुल अलग था। उनका मानना था की बाघ का शिकार करने वाले इसका फायदा नहीं उठाते हैं। अधिकतर मोग्या जाती के लोग घुमन्तु और शिकार करने में माहिर होते हैं। ये लोग जेल में सजा काटने के बाद फिर शिकार शुरू कर देते थे इसलिए फतेह मोग्याओं के पुनर्वास एवं रोजगार, शिक्षा दिलाने पर जोर दिया करते थे। उन्होनें टाइगर वॉच के माध्यम से मोग्या बच्चों के लिए एक छात्रावास स्थापित किया जिसमें उनके रहने, भोजन एवं पढ़ने का प्रबंध किया गया । बच्चों के जीवन स्तर को सुधारना एवं उन्हें रोजगार के अवसर उपलब्ध कराना भी उनका मकसद था। कई छात्रों को रोजगारपरक शिक्षा दी जाने लगी। महिलाओं को विभिन्न हस्तकलाओं के बारे में जानकारी दी जाने लगी। सबके पीछे यही उद्देश्य था की ये लोग शिकार छोड़कर समाज की मुख्यधारा से जुड़ सके और आने वाली पीढ़ियों को समर्थ बना सकें।

फतेह एक जिंदादिल इंसान थे जो अपनी बुलंद आवाज और बात करने के तरीके से सबका दिल जीत लेते थे। फतेह अपने दोस्तों के साथ मस्ती करने का मौका कभी नहीं छोड़ते थे और रात को आग के चारों और बैठकर  पार्क के किस्से सुनाना, गाने गाना बहुत पसंद था। लोगों से मिलना और उन्हें पार्क घुमाना फतेह को बहुत पसंद था। यह उन्हीं के प्रयासों का नतीजा था की कई लोग बाघ बचाने की मुहीम में जुड़ते गये। फतेह एक सच्चे इंसान होने के साथ-साथ दोस्ती निभाने में बहुत आगे थे। उनके पुत्र श्री गोवर्धन सिंह राठौड़ ने रणथम्भौर में फतेह पब्लिक स्कूल प्राम्भ किया था जिसमें गरीब बच्चों को कम फीस पर एडमिशन दिया जाता था, । इस विद्यालय के बच्चों की ओर फतेह का हमेशा विशेष जुड़ाव रहता था, उनका मानना था कि बच्चे किताबी ज्ञान के आलावा भी पर्यावरण के प्रति जागरूक रहें।

कई बातों में फतेह बच्चों जैसे थे। एक तरफ उन्हें गजल सुनना पसंद था तो दूसरी और वो ज़ेज भी सुना करते थे। एक बार मैं उन्हें काला घोड़ा के पास स्थित एक म्यूज़िक स्टोर में ले गयी जहाँ उन्होंने कई सीडी खरीदीं। लेकिन सबसे ज्यादा उन्हें जंगल में जानवरों के बीच रहना, उन्हें देखना पसंद था। उन्हें बाघ की साइटिंग की जगह के बारे में हमेशा पता रहता था और इसका अनुभव उन्हें बाघ के व्यवहार पर लम्बे समय तक नजर रखने से हुआ। रणथम्भौर के बाघों के साथ तालमेल को देखते हुए फतेह के दोस्त कभी-कभी उन्हें ह्यूमन टाइगर कह दिया करते थे। उनकी दमदार शख़्सियत एवं सफेद घुमावदार मूछों के कारण वह सच में वैसे ही लगते थे।

फतेह के  साथ जंगल में घुमावदार रास्तों पर घूमना अलग ही अनुभव हुआ करता था। पेड़ पर बैठे कौवों और गिद्धों को देखकर फतेह गाड़ी को उसी दिशा में घुमा देते और वहीं बाघ शिकार के साथ दिख जाया करता था। बाघ को देखकर फतेह झूम उठते थे। अपने जंगल के तकरीबन हर पक्षी, पशु, पौधों को वो जानते थे और ये सब देखकर बहुत खुश होते थे।

अंतिम समय में फतेह को देखना बहुत कठिन समय था। उनका स्वास्थ्य निरंतर गिरता जा रहा था। उन दिनों उन्हें बोलने में भी परेशानी रहने लगी थी। जरा सा भी पानी लेने पर बहुत दर्द होता था। फिर भी फतेह अपने परिवार जनों एवं दोस्तों के साथ उसी जिंदादिली से रहते थे। एक मार्च की सुबह उन्हें इस पीड़ा से मुक्ति मिली, फतेह अब नहीं थे।अंतिम संस्कार अगले दिन हुआ, पहले उनकी पार्थिव देह रणथम्भौर में पहाड़ियों के किनारे बने उनके घर में रखा गया जहाँ कई गणमान्य हस्तियों ने उन्हें श्रद्धांजलि दी उसी दिन लगभग चार बजे उनके निवास से महज 50  मीटर की दूरी पर एक बाघ तीन बार दहाड़ा साथ ही दुसरे पशु पक्षियों की कॉल  सुनाई दी। ऐसा लग रहा था मानों ये सब अपने पिता यानि फतेह को श्रद्धांजलि देने आये थे!

 

राजस्थान में साकेर फाल्कन

राजस्थान में साकेर फाल्कन

साकेर फाल्कन, भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाने वाला सबसे बड़ा फाल्कन है। एक शिकारी के रूप में यह अपनी ताकत, शिकार करने के तरीके एवं तेज गति के कारण, सदियों से जाना जाता रहा है ।

नवीनतम विश्लेषण के आधार पर इसे IUCN की रेड सूची में लुप्तप्राय प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है जो इसकी संख्या में तेजी से गिरावट का संकेत देता है। आईयूसीएन के अनुसार  यह मानवीय गतिविधियों जैसे बिजली लाइनों से करंट लगने, व्यापार के लिए पकड़ने, लगातार घटते पर्यावास और रासायनिक कीटनाशकों के कारण कम हो रहे हैं, यह गिरावट विशेष रूप से मध्य एशियाई प्रजनन मैदानों में अधिक देखी गयी है।

शिकार के साथ साकेर फाल्कन फोटो:नीरव भट्ट

साकेर फाल्कन, बड़े आकार व भूरे रंग का फाल्कन होता हैं। हालांकि भारत में साकेर फाल्कन की कई उप-प्रजातियां हैं, परन्तु हमें 2 ही प्रकार देखने को मिलती  हैं। लद्दाख में पायी जाने वाली आबादी को अक्सर अल्ताई साकेर के नाम से जाना जाता है, जिसका रंग गहरा भूरा व ऊपरी पंखो पर दामी रंग की पट्टियां होती हैं। वहीं थार रेगिस्तान में पाए जाने वाला साकेर, नाममात्र प्रवासी उप-प्रजातियां हैं और जो अल्ताई साकेर की तुलना में अधिक भूरे रंग की होती हैं।इस फाल्कन को गहरे रंग के ऊपरी भाग और हल्के रंग के अंदरूनी भाग से आसानी से पहचाना जा सकता है। वहीं बच्चो में अंदरूनी भाग पर भूरे रंग की धारिया तथा वयस्कों में भूरे रंग की बूंदों के निशान होते है। कई बार यह समान दिखने वाली अन्य प्रजातियों जैसे लगर फाल्कन और पेरेग्रीन फाल्कन के बच्चे जैसा प्रतीत होता है। परन्तु निम्नलिखित बातों का ध्यान रख कर इसकी पहचान की जा सकती है।

  • इसमें लगर और जुवेनाइल पेरेग्रीन फाल्कन की तुलना में कम moustachial stripe होती है।
  • लगर और जुवेनाइल पेरेग्रीन फाल्कन की तुलना में इसका शरीर अधिक भारी और पंख चौड़े होते हैं
  • जुवेनाइल पेरेग्रीन में सिर गहरे रंग, अंदरूनी भाग पर समान रूप से खड़ी धारियाँ, मलेर पट्टी और नुकीले व गहरे रंग के पंख होते हैं जबकि साकेर फाल्कन के सिर हल्का पीला व पेरेग्राइन की तुलना में थोड़ा भारी होता है तथा सिर पर गोल व मटमैले रंग के पंख होते हैं।
  • लगर फाल्कन समान रूप से गहरे भूरे रंग के होते हैं जिसमें पूंछ और ऊपरी पंखो में किसी भी प्रकार की धारियां नहीं होती है जबकि साकेर फाल्कन में पूंछ और ऊपरी पंखो पर धारियां होती हैं ।
मरू राष्ट्रीय उद्यान में साकेर फोटो हेमंत दांडेकर

भारत में, यह एक दुर्लभ पक्षी माना जाता है, जिसमें एक छोटी सी आबादी लद्दाख क्षेत्र तक सीमित है और कुछ प्रवासी पक्षी कभी-कभी हिमालय के आसपास भी देखने को मिलते हैं तथा गुजरात और राजस्थान के थार रेगिस्तान व इसके आसपास के क्षेत्रों में नियमित रूप से देखे जाते हैं।पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान में दिखे जाने की सूचनाएं

  1. जोड़बीड़ – वयस्क मादा – श्री नीरव भट्ट (श्री हीरा पंजाबी द्वारा लगातार 3 सीजन 2014-15 तक देखा गया, 15-16 में श्री नीरव भट्ट द्वारा, 16-17 में श्री नीरव भट्ट द्वारा )
  2. डेजर्ट नेशनल पार्क – वयस्क पक्षी – श्री हेमंत दांडेकर (नवंबर 2014 में केवल एक बार देखा गया)
  3. जोड़बीड़ – जुवेनाइल पक्षी – श्री जे शाह को केवल एक बार जनवरी 2016 में दिखा।
  4. सांभर झील – वयस्क नर को पीले पैर वाले हरे कबूतर के शिकार के साथ – श्री नीरव भट्ट (2019-20 में देखा गया)

साकेर फाल्कन शारीरिक रूप से खुले इलाके में जमीन के करीब शिकार करने के लिए अनुकूलित होते हैं, यह तेज गति व फूर्ति के साथ डेजर्ट जर्ड और बैंडिकूट जैसे मध्य-आकार के स्थलीय चूहों का शिकार करते हैं । हालाँकि वे लार्क से लेकर कबूतर जैसे छोटे से मध्यम आकार के पक्षियों का भी शिकार करते हैं।

साकेर फाल्कन शुष्क आवासों में जीवित रहने के लिए अनुकूलित है और किसी क्षेत्र में साकेर फाल्कन का मौजूद होना एक स्वस्थ रेगिस्तान पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत होता है। जहां तक पक्षीविज्ञान का संबंध है, राज्य में ऐसी दुर्लभ प्रजाति के फाल्कन का बहुत महत्व है। थार रेगिस्तान के व्यापक अध्ययन से साकेर फाल्कन के दिखने की और सूचनाएं भी मिल सकती हैं।

राजस्थान का राज्य पुष्प रोहिड़ा एवं उसकी अद्भुत परागण प्रक्रिया

राजस्थान का राज्य पुष्प रोहिड़ा एवं उसकी अद्भुत परागण प्रक्रिया

कभी फूलों के चटकीले रंग तो कभी उनकी मधुर सुगंध मधुमक्खियों, भँवरों, तितलियों और पक्षियों को अपनी ओर आकर्षित करती है जो फूलों का मकरंद पीते है,और परागण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया में सहायता करते हैं। परागण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पुष्प के नर भाग-पुंकेसर से परागकण, किसी माध्यम (हवा, पानी , पक्षी, कीट आदि ) से फूल के मादा भाग स्त्रीकेसर तक पहुँचते हैं और अंडाशय में बीजो को निषेचित करता है।

राजस्थान के मरुस्थल में जब रोहिड़े के पेड़ पीले, नारंगी और लाल रंग के फूलों से भर जाते हैं तो इस दौरान इन फूलों पर मंडरा रहे रेड-वेंटेड बुलबुल (Pycnonotus cafer) और पर्पल सनबर्ड (Cinnyris asiaticus) के बीच एक दिलचस्प व्यवहार देखने को मिलता है, यह व्यवहार परागण की प्रक्रिया के कई दिलचस्प पहलुओं पर प्रकाश डालता है।

रोहिड़ा का वृक्ष ( फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल )

मुख्यतया राजस्थान में पाए जाने वाला वृक्ष “रोहिड़ा”(Tecomella undulata) जिसे राज्य पुष्प का दर्जा भी हासिल है, विशेष रूप से राजस्थान के मरू क्षेत्रों में पाया जाता है। यह बिग्नोनियासी (Bignoniaceae) परिवार का एक पतझड़ी पेड़ है, जिस पर वसंत ऋतु में पलाश के पेड़ के समान, एक साथ बड़े पैमाने पर फूल खिलते हैं। रोहिड़ा, राजस्थान के लिए पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व का पेड़ है, विशेष रूप से रेगिस्तानी क्षेत्रों में जहां यह रेत के टीलों पर पनपता है। यह अत्यधिक निम्न तापमान (लगभग -2°C) और उच्च तापमान (लगभग 50°C) दोनों को सहन कर सकता है, और शायद यही कारण है कि इसे ‘डेजर्ट टीक’ या ‘मारवाड़ टीक’ भी कहा जाता है। यह अपनी मजबूत और टिकाऊ लकड़ी की गुणवत्ता के लिए जाना जाता है । मानव द्वारा उच्च मांग और धीमी गति से बढ़ने के कारण आज यह पेड़ IUCN रेड सूची में शामिल किया जा चुका है और वर्तमान में रोहिड़ा विलुप्त होने की ओर है तथा इसका भविष्य आज अनिश्चित बना हुआ है।

इसके फूल एक तुरही के आकार के होते हैं- जिससे पक्षी दो प्रकार से मकरंद निकालते है- या तो फूलों के भीतर अपना सिर डालकर या फिर परागण में सहायता किये बिना सीधा फूलों के आधार पर अपनी चोंच द्वारा छिद्र बनाकर। इस व्यवहार को ‘मकरंद चोरी’ भी कहा जाता है – यह एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा जानवर फूलों के पराग के संपर्क में आए बिना मकरंद निकालते हैं।


पक्षियों द्वारा गिराए गए फूलों को खाते हुए चीतल हिरन (फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल )

बुलबुल अपना सिर फूल के अंदर डाल कर मकरंद पीती है जबकि सनबर्ड फूल के आधार पर एक छोटा छिद्र करके मकरंद की चोरी करती है I बुलबुल द्वारा मकरंद पीते समय परागकण उसके सिर पर चिपक जाते हैं, परन्तु सनबर्ड परागण में सहायता किये बिना मकरंद निकालती है। यही प्रक्रिया मकरंद की चोरी (Nectar robbing) कहलाती है I इस प्रक्रिया के दौरान बुलबुल के सिर पर परागकण चिपक जाते हैं ,और उसका काला सिर पराग कणों से पीले रंग में रंग जाता है।
सनबर्ड के मकरंद चोरी करने का कारण है की वह आसानी से फूल के आधार पर संग्रहित मकरंद तक नहीं पहंचती है, क्योंकि फूल का आकार सनबर्ड की तुलना में बड़ा होता है कभी कभार यदि वह अपना सिर फूलों में डालती भी है तो परागकण से भरे परागकोश उसे छू नहीं पाते हैं I जिस कारण वह परागण की प्रक्रिया में भागीदारी नहीं निभाती है।

एक सफल परागण के लिए, फूल के आकार व संरचना और पक्षी की चोंच व सिर के आकार के बीच एक प्रकार की समरूपता होनी बहुत जरूरी है। अर्थात बुलबुल अपने बड़े सिर और छोटी चोंच के कारण रोहिड़ा के फूलों के साथ समरूप है क्योंकि छोटी चोंच के कारण उनको अपने सिर को पूरी तरह से फूल के भीतर ले जाना पड़ता है और ऐसा करते समय, उनके सिर परागकोष के सीधे संपर्क में आते है। वहीं दूसरी ओर सनबर्ड्स अपने छोटे सिर और लम्बी चोंच के कारण फूलों के परागकोष के संपर्क में आये बिना मकरंद निकाल ले जाती है।


रोहिड़े के फूल (फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल)


इस प्रक्रिया में सनबर्ड तो मानो पूरी तरह से एक परजीव के रूप में स्थापित हो गयी परन्तु गहराई से देखें तो भले ही सनबर्ड फूलों से मकरंद की चोरी करती है परन्तु फिर भी अप्रत्यक्ष रूप से परागण में सहायता भी करती है। क्योंकि मकरंद चोरी के दौरान सनबर्ड ज्यादा से ज्यादा फूलों पर जाती है, जिससे वह बुलबुल के लिए मकरंद संघर्ष को बढाकर, उसे आसपास के कई फूलों और पेड़ों पर जाने के लिए मजबूर करती है। सनबर्ड और बुलबुल के बीच का यह संघर्ष, अप्रत्यक्ष रूप से रोहिड़े के पेड़ों को परपरागण (cross pollination) में मदद करता है।

वास्तव में सनबर्ड और बुलबुल दोनों ही परागण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन इस मामले में बुलबुल को “सच्चा परागणक” (true pollinators) और सनबर्ड्स को “प्रेरक” कहा जा सकता है। इसी प्रकार की टिप्पणियों को एक शोध पत्र में भी दिया गया है, जिसका शीर्षक है, “नेक्टर रॉबिंग पॉजिटिव इन्फ्लुएंस द रिप्रोडक्टिव सक्सेस ऑफ टेकोमेला अंडुलाटा” जहां पर्पल सनबर्ड रोहिड़ा में परपरागण को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।


फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल

सनबर्ड की भांति बुलबुल भी फूलों के आधार पर छिद्र बनाती है एवं पेड़ो से गिरे फूलों पर अक्सर दो अलग-अलग प्रकार के चिह्न देखने को मिलते हैं । जैसे कुछ फूलों के आधार पर छोटे-छोटे छिद्र, तो कुछ में बड़े अंडाकार छिद्र। पक्षियों के आकार को देख कर यह स्पष्ट समझ आता है कि छोटे छिद्र सनबर्ड द्वारा तथा बड़े छिद्र बुलबुल द्वारा किये जाते हैं। इसके अलावा, यह भी देखा जाता है की बुलबुल के संपर्क में आने से कई बार कोमल फूल टूट कर गिर भी जाते है। हो सकता है की बुलबुल का उद्देश्य फूलों से मकरंद निकालना नहीं बल्कि सिर्फ उन्हें तोडना है। यदि पेड़ों से नीचे गिरे हुए फूलों को देखा जाये तो यह पाया जाता है की, अधिकांश फूल प्राकृतिक रूप से मुरझा कर नहीं बल्कि पक्षियों (विशेषरूप से बुलबुल) द्वारा तोड़े हुए हैं , अथवा उनकी लापरवाही से टूटे हुए हैं। दिनेश भट्ट और अनिल कुमार (Fortkail 17, 2001) द्वारा भारत में रेड-वेंटेड बुलबुल के खाने की पारिस्थितिकी पर किये गए अध्ययन के अनुसार यह बुलबुल द्वारा फूलों की पंखुड़ियों को खाने के प्रयासों के संकेत हो सकते हैं। वहीं दूसरी ओर पेड़ों से गिरे हुए इन फूलों को चिंकारा (Gazella bennettii) एवं नीलगाय (Boselaphus tragocamelus) आदि खाते हैं तथा यह रेड-वेंटेड बुलबुल और एंटीलोप के बीच सहभोजिता (commensalism) की प्रक्रिया को दर्शाता है।


फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल

तो इस बार जब फरवरी- मार्च माह में जब रोहिड़ा पर फूल आये तो प्रयास करना की आप विभिन्न पक्षियों के साथ रोहिड़ा के मध्य होने वाले इस व्यवहार को देख सकें।