कीडी नगरा

कीडी नगरा

क्या आपने कभी सुना है गाँवों में बने ‘कीडी नगरा’ के बारे में, जहाँ इंसान चींटियों के लिए बाड़ा बनाते हैं और खाना परोसते हैं? यह अनोखी परंपरा राजस्थान की संस्कृति और प्रकृति के रिश्ते की दिलचस्प कहानी है।

चींटियाँ, मधुमक्खियाँ, एवं ततैये हाईमिनोप्टेरा गण के सदस्य कीट हैं इनके झिल्ली जैसे पंखो के आर-पार देखा जा सकता है। तितलियों की तरह इनके पंखों पर स्केल नहीं होते। इनके अग्र जोडी पंख बडे एवं पश्च जोडी पंख आकार में छोटे होते हैं। इस वर्ग के कीटों के जबडे कुछ बडे व अच्छी तरह विकसित होते हैं। इस गण के कीट अकेले न रहकर एक बडे परिवार के रूप में सामाजिक जीवन यापन करते हैं।

मधुमक्खियों व ततैयों में हर समय शरीर पर पंख पाये जाते हैं जबकि लैंगिक रूप से प्रौढ, परिपक्व एवं प्रजनन क्षमता युक्त चींटियों में प्रजनन काल में ही पंख आते हैं। नर – मादा के मिलन के बाद दीमकों की तरह पंख झड कर गिर जाते हैं। चींटियों के एक ही परिवार में कई तरह के विशिष्ट सदस्य पाये जाते हैं जो काॅलोनी में अलग – अलग तरह का कार्य संपादित करते हैं। चींटियों की यह बहुरूपता अद्भुत होती है। कुछ प्रजातियों में तो बहुरूपों की संख्या 29 तक पहुँच जाती है। फिर भी 4 बहुरूप श्रमिक, सैनिक, उर्वर मादा एवं उर्वर नर सबसे आम व जाने पहचाने होते रूप होते हैं। चींटियों का अध्ययन एक विशेष विज्ञान में किया जाता है जिसे चींटी विज्ञान (Myrmecology) कहते हैं।

राजस्थान में वन्यजीवों के संरक्षण की परंपरा कीडी यानी चींटी जैसे छोटे से प्राणी से प्रारंभ होती है और बाघ जैसे बडे प्राणी तक पहुँच जाती है। ऐसी संरक्षण की विविधता राजस्थान की लोक संस्कृति में सदियों से चली आ रही है। हमारे राज्य में चींटी तक को मारना पाप समझा जाता है।

राजस्थान के गाँवों में चींटी को कीडी नाम से जाना जाता है। चींटी लोक कहावतों में भी स्थान रखती है। कोई सामान्य सा व्यक्ति अपने बूते से कुछ बडा करने की बात कहे या बडी-बडी डींगें हाँके या दुःसाहस करे तो उसे “चींटी के भी पर निकलने लगे हैं” जैसे मुहावरे से वर्णित-मंडित किया जाता है।

राजस्थान में ऐसा कोई क्षेत्र नहीं जहाँ चीटियाँ नहीं हों। हर गाँव में चींटियाँ मिल ही जाती हैं। कुछ जगह तो चीटियों के प्राचीन बिल मिलते हैं जिनमें लाखों चींटियाँ निवास करती हैं। ये बिल वहाँ कब से हैं कोई नहीं जानता। स्थानीय बुजुर्गों से पूछो तो बतायेंगे – साब मैं तो इनके इस बिल को मेरे जन्म से यहीं देख रहा हूँ। चींटियों के बिल, उनमें निवास करने वाली चीटियाँ और उनके आने-जाने से बने रास्ते सब मिला कर चीटियों का एक नगर जैसा होता है। चींटियों की छोटी, मध्ययम और बडी बस्तियाँ प्रकृति में जगह-जगह देखने को मिलती हैं। चींटियों की छोटी एवं मध्ययम बस्तियाँ तब तक ध्यान आकर्षित नहीं करती जब तक की वे बडी न हो जायें। बडी होने पर उनके चलने के पथ एक सँकरी सी, साफ-सुथरी सडक जैसी दूर से ही नजर आने लगती हैं। आते-जाते लोग चींटी पथ पर पैर नहीं रखते तथा लाँघ कर ही अपना आगे का रास्ता चलते जाते हैं। ये चींटी पथ सीधे, दूर तक अशाखित, एक समान चैडाई वाले या कई बार कुछ दूर जाकर घुमावदार व सँकरे भी हो जाते हैं यानी ये कई आकार के एवं अलग-अलग चैडाई के हो सकते हैं। आने एवं जाने, दोनों दिशाओं का ’’ट्रैफिक’’ उसी एक रास्ते पर चलता है। हमारी तरह चींटियों को दायें एवं बायें का ज्ञान नहीं होता है वे रास्ते की चौडाई के अन्दर रहते हुऐ कहीं से भी अपना रास्ता बना सकती हैं। चींटी पथ पर वे अपना भोजन मुँह में दबाये, बिल की तरफ आती हुई नजर आती हैं तथा भोजन के दानें व दूसरी वस्तुऐं बिल के भण्डार गृह में जमा कर वे बिना सुस्ताए फिर से अगले फेरे के लिये फिर निकल पडती हैं। यह सारा कार्य श्रमिक वर्ग की चींटियों को करना पडता है। चींटी पथ पर ’’चींटियों का ट्राफिक’’ ऐसा लेगता है मानों सडक पर कुछ ट्रक लोड लेकर भरे हुये आ रहें तो कुछ लोड भरने के लिए खाली जा रहे हैं। जो काम हमारे लिये हमारे हाथ करते हैं वही काम चीटियों के जबडे उनके लिये करते हैं। वे भार को जबडों से पकड कर ’’चीटीं पथ’’ पर चलती हैं। यदि वस्तु भारी है तो कई चींटियाँ मिल कर भार को खींचती हैं। कहा जाता है, चींटी अपने शरीर के वजन से भारी वजन खींचने की क्षमता रखती हैं। श्रमिक चींटियों का एक दल वहीं बिल में खुदाई-सफाई के कार्य में मशगूल नजर आता है।

एक ही परिवार की चींटियों का यह विशाल कुनबा हर किसी का ध्यान आकर्षित करता है। बिल, चींटी परिवार तथा दूर-दूर तक ’’चींटी पथों’’ का यह जाल राजस्थान में ’’कीडी नगरा’’ या ’’कीडीनारा’’ के नाम से जाना जाता है। कीडी नगरा चींटियों का एक ऐसा नगर है जैसा हम मनुष्यों का नगर होता है। हमारे नगरों में भी भवन, बाशिंदे, सडके और न जाने क्या – क्या चीजें विद्यमान होती हैं। यही नही, एक पूरी कानून व्यवस्था एवं नियम पालन सदाचार भी हमारे नगरों की व्यवस्था का एक हिस्सा होती हैं। ऐसे ही नियम कायदे एवं उनका पालन किसी भी कीडी नगरा का अहम हिस्सा होते हैं।

चींटियों को मोटे तौर पर 3 वर्गो में बाँट सकते हैंः

  1. भूमि पर रहने वाली चीटियाँ
  2. वृक्ष के तनो पर रहने वाले चींटियाँ
  3. वृक्षों की पत्तियों में घौंसला बना कर रहने वाली चींटियाँं।

वृक्षों के तनो पर रहने वाली चीटियों के अनेक प्रकार हैं। कुछ तने पर रहती हैं तथा आकार में बडी व मोटी होती हैं तथा काले रंग की होती हैं जिनको राजस्थान में जगह-जगह ’’मकोडा’’ नाम से जाना जाता है। कुछ चीटियाँ वृक्ष के तने के ऊपरी भागो में गोलाकार गुम्बद जैसी रचना बना कर उसमें निवास करती हैं जो क्रीमेटोगास्टर वंश (Crematogaster Genus) में वर्गीकृत की गयी है। लाल चीटिंयाँ (Oecophylla smaragdina) पत्तों को आपस में जोड व सिलाई कर उनमें घौंसला बना ऊपर वृक्षों पर निवास करती हैं। हाँलाकि वे वृक्षों से नीचे भी उतरती हैं लेकिन अपना कार्य पूर्ण कर वापिस ऊपर घौंसले में चली जाती हैं। वृक्ष के तने व पत्तों में रहने वाली चीटिंयाँ ’’कीडी नगरा या कीडी नारा’’ बस्ती नहीं बनाती।

भूमि पर अनेक प्रजातियों की चींटियों का निवास है लेकिन जो चींटियाँ बडा कुनबा बना कर अनाज के दानों को भी बिलों में ले जाकर भण्डारित करने व खाने की शौकीन होती हैं वे चींटियाँ कीडी नगरा के रूप में जानी – पहचानी जाती हैं। राजस्थान में जगह- जगह कीडी नगरा मिल जायेंगे। कई जगह तो बाकायदा बोर्ड लगाया जाता हैं। कई जगह बोर्ड नहीं भी होते। कई जगह बाकायदा काँटेदार तारों या दूसरी तरह की बाड लगाई जाती है ताकी पालतू व जंगली प्राणी कीडी नगरा को रौंदे नहीं। पश्चिमी राजस्थान में कीडी नगरा जगह-जगह ग्रामीण अँचल में देखने को मिल जाते हैं।

राजस्थान के लोग जिस तरह जगह-जगह पक्षियों को दाना-पानी व अन्य जीवों हेतु भोजन, पानी व शरण देने के स्थान बनाते हैं, उसी तरह चीटीयों को भी अनाज, अनाज का दलिया, चीनी, गुड के छोटे-छोटे टुकडे आदि खाद्य पदार्थ प्रातःकाल में बिल के आस-पास फैलाते हुये बिखेरे जाते हैं। कई जगह मोटा पिसा आटा भी चुग्गे के रूप में चींटियों के बिल के आस – पास शृद्धापूर्वक डाला जाता है। लोग स्वयं व अपने परिवार जनों के साथ चींटियों के बिलों के पास चुग्गा डालने आते हैं। यदि अधिक मात्रा में भोजन देना है तो एक दिन में डालकर उसे खराब नहीं किया जाता बल्कि कीडी नगरा के संचालक-प्रबंधक की भूमिका निभाने वाले व्यक्ति को कीडियों का भोजन या भोजन की कीमत जमा करा दी जाती है। प्रबंधक का फोन नम्बर बोर्ड पर अंकित रहता है। शृद्धालु बोर्ड पर अंकित नम्बर पर फोन कर प्रबंधक तक पहुँच जाता है तथा चींटियों को भोजन आपूर्ती का जिम्मा प्रबन्धक को लेकर स्वयं निवृत हो जाता है। 

चित्र 1: कीडी नगरा प्रबंधक द्वारा लगाया गया बोर्ड

चित्र 2: कई जगह कीडी नगरा काॅलोनी को पशु रौंद कर नुकसान पहुँचाते हैं अतः सुरक्षा हेतु फैंसिंग तक की जाती है।

लोगों का मत है यदि चींटियों को उनके आवास के आस-पास ही भोजन मिल जायेगा तो वे घरों, खेतों, खलिहान व गोदामों की तरफ रूख नहीं करेंगी जिससे उनमें दूर जाकर कहीं भोजन की तलाश में किसी एक परिवार या जगह को नुकसान पहुँचाने की संभावना नहीं रहेगी। साथ ही वे जगह-जगह मार्गों पर कुचल कर मरने से भी बचेंगी। चींटियाँ बीज व फल प्रकीर्णन, परागण, छोटे कीटों का नियंत्रण के साथ-साथ अपने बिलों द्वारा भूमी की गहराईयों में वायु संचार करती हैं। भूमि में संचारित वायु वृक्षों, झाडियों जैसी वनस्पतियों की जडों को, जो गहराई तक पहुँच जाती हैं, उन्हें स्वश्न हेतु ऑक्सीजन उपलब्ध कराती हैं। इसी का कमाल है कि पेड पौधे हरे – भरे रहकर हमें ऑक्सीजन, फल-फूल, बीज, चारा, लकडी और न जाने क्या – क्या उत्पाद उपलब्ध कराते हैं।

यों तो राजस्थान में अनगिनत कीडी नगरा हैं लेकिन पाली जिले में गढवाडा, सिणगारी, दुदली आदि गाँवों में जाकर कीडी नगरा व उनके प्रबंधन को देखा व समझा जा सकता है। कुछ जगह जैसे तालछापर अभयारण्य के कीडीनगरा तो और भी दर्शनीय हैं। तालछापर के कीडी नगरा के चीटीं मार्ग बिल को केन्द्र मानते हुये एक तरफ 200-300 मीटर लम्बे व कहीं- कहीं तो इससे भी अधिक दूर तक पहुँच जाते हैं जिन पर हजारों चीटियाँ एक साथ आना-जाना करती हैं। कुछ कीडी नगरा तो तालछापर में इतनें विशाल हैं कि एक कीडी नगर में हजारों नहीं लाखों चींटियाँ होती हैं। इस अभयारण्य में आने वाले पर्यटकों को वन कर्मी सावधानी से इस तरह घुमाते हैं कि कीडी नगरा की चींटियों को कुचलने से बचाया जा सके।

चित्र 3: सूखे मौसम में तालछापर अभयारण्य में एक अशाखित चींटी पथ पर गतिमान चींटियों का ट्राफिक 

चित्र 4: तालछापर अभयारण्य में एक शाखित चींटी पथ

वन्यजीवों को मानवीय या मानवों द्वारा भोजन दिया जावे या नहीं इस पर बहस होती रहती है। लोगों के पक्ष और विपक्ष में विचार सुनने – पढने को मिल जाते हैं। यदि कुछ देर इस बहस से अलग होकर देखें तो यह स्पष्ट महसूस होता है कि राजस्थानी लोग बडे- बडे वन्य प्राणी ही नहीं, चींटी जैसे छोटे प्राणी को भी संरक्षित -सुरक्षित करते रहे हैं और इतनी आधुनिकता आ जाने के बाद भी समाज के ये मूल्य आज भी अक्षुण हैं जो वन्यजीव संरक्षण की आस जगाये हुये हैं।

चित्र 5: तालछापर अभयारण्य में एक चींटी पथ कर क्लोज अप

सतीश कुमार शर्मा

राजस्थान वन सेवा (सेवा निवृत)

14-15, चकरिया आम्बा, रामपुरा चैराहा, झाडोल रोड़

पोस्ट – नाई, उदयपुर – 313031, राजस्थान, भारत

sksharma56@gmail.com

अनोखा आशियाना बनाने वाली क्रिमेटोगैस्टर चींटियाँ

अनोखा आशियाना बनाने वाली क्रिमेटोगैस्टर चींटियाँ

राजस्थान के प्रतापगढ़ जिले के सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य में चींटियों की एक प्रजाति मिलती है जो घोंसले बनाती है जो पैगोडा मंदिरों के आकर का होता है। यह चींटियां देखने में  सामान्य काली चिंटी लगती है, लेकिन इन चींटियों का घोंसला अनुपम है। पैगोडा भारत के हिमालय क्षेत्र में या दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में मिलने वाले बौद्ध मंदिर है जो एक बुर्ज तथा अनेक तलों वाली इमारत है, जिसकी प्रत्येक तल की अपनी छत होती है। वैज्ञानिक इन चींटियों को क्रिमेटोगैस्टर वंश में रखते हैं। राजस्थान के जैव-विविधता के विशेषज्ञ डॉ सतीश शर्मा के अनुसार राजस्थान में क्रिमेटोगैस्टर चींटियों की तीन प्रजाति पाई जाती है Crematogaster (Acrocoelia) brunnea var. contemta, C. (A.) rothneyi and C. (A.) walshi.

क्रिमेटोगैस्टर

इनका पेट दिल के आकार का होता है जिसकी वजह से इनका नाम क्रिमेटोगैस्टर है (चित्र: मंगल मेहता)

प्रतापगढ़ जिले के जंगल अपनी जैव-विविधता के लिए जाने जाते हैं। यहाँ अरावली, विंध्याचल पर्वतमालाओं और  मालवा के पठार का अनूठा संगम है और साथ ही इस क्षेत्र की समुद्र तल ऊंचाई 282 – 600 मीटर के बीच है। यही कारण है की यहाँ राजस्थान के अन्य हिस्से की बजाय अधिक जैव-विविधता पाई जाती है।

पगोडा मंदिर का एक चित्रण (स्रोत: इंटरनेट)

पगोडा मंदिर का एक चित्रण (स्रोत: इंटरनेट)

यह चींटियाँ उष्ण/उपऊष्ण कटिबंधीय वनों के नम स्थलों के पेड़ों पर पाई जाती है। सीतामाता के जंगल में इनके घोंसले पेड़ों पर 20 फिट ऊँचाई तक देखे गए हैं। यह अपना घोंसला मिट्टी रेशों और अपनी लार को मिला कर बनाती है। इनके पेट दिल के आकार का होता है जिसकी वजह से इनका नाम क्रिमेटोगैस्टर – (गेस्टर) है। इनका आकर २ से ३ मिली मीटर तक होता है। राजस्थान के दक्षिण में स्थित अन्य जिलों जैसे उदयपुर, बांसवाड़ा आदि में भी कहीं कहीं इनके घोंसले देखे गये है। इनका घोंसला ५ से १० वर्षों या इससे भी अधिक पुराना हो सकता है- अगर पारिस्तिथिकी अनुकूल हो, और घोंसले वाले पेड़ों को छेड़ा नहीं जाए और जंगल की आग में भी यह सुरक्षित रह सकते है, यह कॉलोनी लम्बे समय तक स्थाई रहती है।

क्रिमेटोगैस्टर चींटियाँ अपना घोंसला मिट्टी के रेशों और अपनी लार को मिला कर बनाती है (चित्र: मंगल मेहता)

भारत में यह उत्तराखंड के जंगलों, मध्य भारत और दक्षिणी भारत के जंगलों में पाई जाती है। राजस्थान में इन घोंसलों की संख्या कम है। इसके घोंसले बहेडा और पलाश के पेड़ों पर देखे गए हैं। इन घोंसलों को नुकसान नहीं पहुंचाएं और न ही कौतूहल वश इसे छेड़ें। जिस पेड़ पर इसके घोंसले हो उन्हें नहीं काटना चाहिए। देखा गया है की इन घोंसलों में रुफस वुडपेकर अपना घोंसला बनाकर रहता है। परन्तु चींटियों के साथ यह कैसे रह पता है जानना अत्यंत रोमांचक होगा। अभी तक इस तरह की प्रक्रिया राजस्थान में भली प्रकार से किसी शोध पत्र में प्रकाशित नहीं हुई है। अथवा राजस्थान से कोई छायाचित्र भी प्रकाशित नहीं हुआ है।