शिकार के अलग अलग तरीके है और इनमें छुपे ज्ञान से, हम बाघों को बचाने के अद्धभूत तरीके ढूंढ सकते हैं, एक वाक्या राजस्थान के विख्यात शिकारी केसरी सिंह जी द्वारा दर्ज किया गया है, जो नरभक्षी और घुमन्तु बाघों को पकड़ने में सहायक हो सकता है।

कर्नल केसरी सिंह राजस्थान के एक माहिर शिकारी थे, जिन्होंने ग्वालियर और जयपुर रियासतों के शिकार खानो के लिए वर्षो तक कार्य किया। उस समय की परिस्थितियाँ अलग हुआ करती थी, बाघ – बघेरों के शिकार को राज्यों के कानून एवं समाज द्वारा मान्यता प्राप्त थी। अतः शिकार की घटनाओं आज के परिपेक्ष्य में भी हेय नजर से देखना ठीक नहीं होगा। केसरी सिंह जी ने कई पुस्तके लिखी है, जिनमें बाघ शिकार के साथ उसके व्यवहार की अनेक बारीकियों का सूक्ष्मता से वर्णन किया है। आज के समय भी उनके द्वारा दर्ज की गयी घटनाये, बाघ संरक्षण में उपयोगी हो सकता है।

उनकी एक पुस्तक – “हिंट्स ऑन टाइगर शूटिंग” 1965 में एक वर्तान्त बांध बरेठा (भरतपुर) से शामिल है, की किस प्रकार वहां उनके एक मित्र ने घबराये हुए दौड़ते बाघ को कुछ क्षण एक स्थान पर रोके रखा, ताकि वह उसका आसानी से शिकार कर सके।

भरतपुर महाराज किशन सिंह जी

केसरी सिंह जी लिखते है कि, भरतपुर महाराज किशन सिंह जी, उनके मेयो कॉलेज, अजमेर के ज़माने से मित्र हुआ करते थे। किशन सिंह जी किसी भी समस्या के लिए हर समय त्वरित रूप से नए हल ईजाद कर लिया करते थे। केसरी सिंह जी लिखते है यदि बरेठा का वह शिकार का वाक्या खुद उन्होंने ने नहीं देखा होता तो शायद वह इस तरह के शिकार के तरीके पर भरोसा ही नहीं करते। किशन सिंह जी राजस्थान के प्रसिद्ध राजनेता श्री विश्वेन्द्र सिंह के दादा एवं नव जवान राजनेता श्री अनिरुद्ध सिंह के परदादा थे। किशन सिंह जी अपने ज़माने के समाज सुधारक के रूप में जाने जाते है। बरेठा को वर्तमान में एक वन्य जीव अभ्यारण्य का दर्जा प्राप्त है जिसे बांध बरेठा नाम से जाना जाता है, एवं इन दिनों में इसलिए चर्चा में रहा था क्योंकि राम मंदिर निर्माण के लिए इस्तेमाल होने वाले पत्थरो के लिए इसके एक बड़े हिस्से को राजस्थान सरकार ने अभ्यारण्य से अलग किया था।

बांध बरेठा वन्यजीव अभयारण्य (फोटो: डॉ सत्य प्रकाश मेहरा)

उस ज़माने में शिकार का एक सबसे अधिक प्रचलित तरीका था – हांका लगाना। हांके में अनेको लोग बाघ के पीछे तेज शोर और हल्ला करते हुए U आकर में उसे घेरते हुए चलते है, और डरा हुआ बाघ एक निश्चित स्थान से दौड़ते हुए गुजरता है, जहाँ पहले से मचान पर तैयार बैठा शिकारी, उसका शिकार कर लेता है। मचान हालाँकि छुपे हुए स्थान पर होता है और उसके सामने एक खुला मैदान रखा जाता है। परन्तु कई बार बाघ इतना तेजी से निकलता है की यदि उस क्षण में शिकारी गोली नहीं चला पाए तो पुनः उतनी ही तैयारी फिर से करनी पड़ती है, जो एक लम्बी प्रक्रिया है।

बांध बरेठा वन्यजीव अभयारण्य (फोटो: डॉ सत्य प्रकाश मेहरा)

वे लिखते है कि, बरेठा में जैसे ही बाघ हांका लगने के बाद खुले मैदान में मचान के पास आया वह अपने पांव से कुछ निकलने की कोशिश कर रहा था। यह क्षण मचान पर बैठे लोगो के लिए आसानी से शिकार के लिए समय दे गया और उन्होंने ने बन्दुक से एक सधा हुआ निशाना मार उसे ख़तम कर दिया।

मक्खी एवं कीट आदि पकड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाला फ्लाईपेपर

किशन सिंह जी जानकारी लेने पर उन्होंने बताया की किस प्रकार उन्होंने फ्लाईपेपर – मक्खी एवं कीट आदि पकड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाले एक तरफ से चिपकने वाले पदार्थ से सने कागज को रास्ते पर बिखेर दिया था, ताकि जब बाघ उसपर से चले तो उसके पांव में वे कागज के टुकड़े चिपक जाये। और जैसे ही वह इनसे अपना पीछ छुड़ाने के लिए रुके, फिर आसान शिकार बना सकते है।

यह तरीका खास परिस्थिति में घुमन्तु एवं मानव भक्षीबाघ को पकड़ने में लिया जा सकता है, एवं गोली की जगह बेहोश करने वाली दवा का इस्तेमाल किया जा सकता है। क्योंकि गोली की बजाय दवा वाला इंजेक्शन धीमी गति से चलती हां एवं सही निशाना भी अत्यंत आवश्यक है।

लेखक:

Dr. Dharmendra Khandal (L) has worked as a conservation biologist with Tiger Watch – a non-profit organisation based in Ranthambhore, for the last 16 years. He spearheads all anti-poaching, community-based conservation and exploration interventions for the organisation.

Mr. Ishan Dhar (R) is a researcher of political science in a think tank. He has been associated with Tiger Watch’s conservation interventions in his capacity as a member of the board of directors.

 

कवर फ़ोटो क्रेडिट: सिटी पैलेस संग्रहालय, जयपुर

Dr. Dharmendra Khandal has worked as a conservation biologist with Tiger Watch - a non-profit organisation based in Ranthambhore, for the last 16 years. He spearheads all anti-poaching, community-based conservation and exploration interventions for the organisation.