राजपूताना मरुभूमि का स्वर्ग: माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य

राजपूताना मरुभूमि का स्वर्ग: माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य

माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य देश की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में से एक, अरावली पर गुरु शिखर चोटी सहित एक बड़े पठार को आच्छादित करता हुआ रेगिस्तानी राज्य राजस्थान के सबसे अधिक देखे जाने वाले हिल स्टेशनों में से एक है…

राजस्थान के सिरोही जिले में स्थित “आबू क्षेत्र” की जैव विविधता की विश्व एवं राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग ही पहचान है। सन् 1960 में आबू क्षेत्र के लगभग 114 वर्ग कि.मी. क्षेत्र को अभयारण्य के रूप में चिह्नित् किया गया था। आबू के नगरीय क्षेत्र की बढ़ती हुई मानव आबादी तथा पर्यटक संख्या की चुनौती से निपटने के लिए सन् 2008 में नये क्षेत्रों को भी आधिकारिक रूप से अभयारण्य में शामिल किया गया तथा ईको-सेन्सिटिव जोन (पर्यावरण संवेदनशील क्षेत्र) की अधिसूचना जारी की गई। वर्तमान में माउण्ट आबू वन्यजीव अभयारण्य का कुल क्षेत्रफल 326 वर्ग कि.मी. के लगभग है। आगामी कुछ वर्षों में मुख्य अभयारण्य क्षेत्र को सुरक्षित करने की दृष्टि से आबू पर्वत के चारों ओर के तलहटी क्षेत्र के कुछ भाग को हरित पट्टिका के रूप में विकसित किया जाने का लक्ष्य भी है।

आबू पर्वत की स्थलाकृति

आबू पर्वत 24°31″-24°43″ उत्तरी अक्षांश व 72°38″-72°53″ पूर्वी देशांतर के मध्य, अरावली के दक्षिण-पश्चिमी भाग में मध्य भारत के उच्चतम शिखर (गुरु शिखर, 1,722 मी.) युक्त पृथक पहाड़ी के रूप में स्थित है। आबू की व्युत्पत्ति संस्कृत व वैदिक नीत अर्बुद अर्थात् उबाल शब्द से हुई है। इसका  उल्लेख बुद्धि प्रदाता पर्वत के रूप में भी किया गया है। समुद्र तल से 1219 मी. पर स्थित यह पर्वत लगभग 19 कि.मी. लम्बाई व 5-8 कि.मी. चौड़ाई वाला मनोरम पठारी विस्तार है।

माउंट आबू वन्यजीव अभयारण्य मानचित्र

आबू पर्वत का इतिहास

विष्णु पुराण में मरुभूमि के रुप में वर्णित अर्बुद प्रदेश अर्थात् अर्बुदांचल या आबू पर्वत (माउण्ट आबू), राजस्थान के हृदय-हार अरावली के दक्षिण-पश्चिम में मुख्य पर्वतमाला से पृथक, मरूधरा में स्वर्ग का आभास देता भू-भाग है। यह देवी-देवताओं एवं ऋषि-मुनियों के पावन व दिव्य चरित्रों से सुवासित, तथा देवासुर संग्राम व् साधु-संतों के कई चमत्कारों के किस्से-कहानियों से भरपूर दिव्य क्षेत्र है। इसे कर्नल जेम्स टॉड ने ‘‘भारत का ओलम्पस” कह कर भी सम्बोधित किया। अनेक सन्दर्भ लेखों में अर्बुदांचल क्षेत्र की पौराणिक व वैज्ञानिक महत्ता का विवरण भी मिलता है। अपनी प्राकृतिक व ऐतिहासिक समृद्धि के लिए विख्यात यह स्थान सभी प्रकृति प्रेमी व जिज्ञासु जनमानस के लिए आकर्षण का केन्द्र है।

सन् 1940 बॉम्बे से छुट्टियां बिताने आए तत्कालीन अंग्रेज अधिकारी प्रकृतिविद् चार्ल्स मेक्कान ने अपने लेख में अर्बुदांचल का ‘‘मरुभूमि का शाद्वल प्रदेश” के रूप में उल्लेख करते हुए इसकी महत्वता का विवरण इस प्रकार किया “प्रकृतिविद् हेतु यह भूमि अनेक प्रकार के पेङ-पौधों व जीव-जंतुओं से समृद्ध है, पुरातत्ववेत्ताओं के लिए यह क्षेत्र अनेक शोध विषयों का स्रोत है, फोटोग्राफर व कलाकारों के लिए मनोरम स्थल है, बाहर से आने वाले पर्वतारोहियों हेतु अनेक सपाट चट्टानें तथा चट्टानों की कन्दराऐं है।

सिरोही राज्य के गजट (1906) में मेजर के. डी. इरस्कीन ने आबू पर्वत की प्राकृतिक स्वरूप एवं भौगोलिक विशेषताओं का वर्णन करते हुए यहाँ लिखा की “इसकी पश्चिम व उत्तर दिशाएं अत्यन्त ढलाव युक्त है तथा पूर्वी व दक्षिण दिशाओं के बाहरी छोर में गहरी घाटियों युक्त पर्वत-स्कंध को देखा जा सकता है। कोई भी यात्री ऊपर की और चढते हुए इसकी मनमोहक छँटाओ से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता, विशेषकर आबू पर्वत की चोटियों का निर्माण करती हुई सायनिटिक पत्थरों के विशालकाय शिलाखण्ड”

टोल्मी के भारतीय मानचित्र (सन् 150) me इस क्षेत्र को ‘‘एपोकोपी माउण्ट”अर्थात् पृथक पहाङी के रूप में दर्शाया। मेगस्थनीज ने भी 300 ई.पू. आबू पर्वत का उल्लेख किया जिसका उद्धरण प्लीनी (सन् 23-79) के प्राकृतिक इतिहास में ‘‘मोन्स केपिटेलिया” अर्थात् मृत्यु दंड का पर्वत के रूप में किया गया।

आबू पर्वत का मनोरम दृश्य

आबू पर्वत की जलवायु

आबू पर्वत पर तुलनात्मक रूप से तलहटी की अपेक्षा ऊँचाई वाले क्षेत्र में मौसम ठण्डा व मनभावन रहता है। यहाँ औसत वार्षिक तापमान 20℃ तथा सबसे शुष्क माह का औसत तापमान 26℃ रहता है। ग्रीष्म ऋतु में तापमान 24℃ से 34℃ के मध्य रहता है, मई माह में औसतन 31℃ तापमान देखा गया हैं जब कि शीत ऋतु में तापमान 18℃ से -2℃ रहता है, जनवरी माह में न्यूनतम तापमान 9℃ रहता है। वर्षाकाल जून के तीसरे सप्ताह से सितम्बर माह के अन्त तक रहता है। सामान्यतः अक्तूबर से मई माह तक मौसम सूखा रहता है। आबू पर्वत पर औसत वर्षा 1,639 मि.मी. होती है। यहाँ सबसे अधिकतम वर्षा सन् 1944 में 4,017 मि.मी तथा सबसे न्यूनतम वर्षा सन् 1939 में मात्र 502 मि.मी. रिकार्ड की गयी। वर्ष 1898, 1900-02 व 1938-39 में इस पर्वतीय क्षेत्र को गम्भीर अकाल का भी सामना करना पड़ा। यहाँ में औसतन 8.6 कि.मी. प्रति घण्टे की गति से हवाएँ चलती है जिसकी अधिकतम गति जून-जुलाई माह में 12.8 कि.मी. प्रति घण्टा हो जाती है। शीत ऋतु में हवाएँ सामान्यतः शांत रहती है।

आबू पर्वत का पठारी क्षेत्र

आबू पर्वत के वन

आबू पर्वत अपनी प्राकृतिक, भौगोलिक स्थलाकृति एवं जलवायु विशिष्टताओं के कारण राजस्थान में वनस्पतिक विविधता से समृद्ध क्षेत्र है। आबू  पर्वत के वनों को सन 1936 में एच जी  चैम्पियन द्वारा दक्षिण उप-उष्णकटीबन्धीय नम पहाड़ी वन समूह (7 अ ) में बॉम्बे उप-उष्णकटिबंधीय सदाबहार वन (C 3) में वर्गीकृत किया गया। तत्पश्चात अनेक विशेषज्ञों द्वारा इसके वनों  का विस्तृत अध्ययन किया गया। आई. यू. सी. एन. के आवासीय वर्गीकरण (संस्करण 3.1) के अनुसार आबू पर्वत पर मुख्यतः आठ प्रकार के आवासों को देखा जा सकता है। इनमें काष्ठ वन, झाड़ वन, नम भूमि/जलीय, पथरीली भूमि, कंदराएं व भूमिगत आवास, कृत्रिम स्थलीय, कृत्रिम जलीय, पुरःस्थापित वनस्पति सम्मिलित है।

आबू क्षेत्र में पाए जाने वाला सिल्वर फ़र्न

यहाँ गहरी घाटियों तथा सघन वनस्पति युक्त ठंडे क्षेत्रों में अर्द्ध सदाबहार वन के खण्ड भी दिखाई देते हैं। शुष्क तथा पूर्णतः वनस्पति रहित व उजड़े क्षेत्रों में कटीले झाड़ वन दिखाई देते हैं। सड़क किनारे छायादार क्षेत्र, नम घास के मैदान, खेत व पोखरों के आस-पास झाड़ियों की अधिकता है। आबू पर्वत क्षेत्र में लगभग एक हजार वनस्पति प्रजातियां पाई जाती हैं जिनकी 40 प्रतिशत समानता पश्चिमी हिमालयी और 30 प्रतिशत समानता पश्चिमी घाट की वनस्पति प्रजातियों से मिलती है। कुछ मुख्य वनस्पति प्रजातियां जो ध्यानाकर्षण करती है – आर्किड, बकाइन, बिच्छु बूटी, सफेद और गुलाबी गुलाब, करौंदा, चम्पा, चमेली की प्रजातियाँ और सात वर्ष में खिलने वाले नीले फूलों से युक्त कारा बहुतायत में पाये जाते हैं। आम, जामुन, कचनार, ऑक, विलोज और यूकेलिप्ट यहाँ स्थापित प्रजातियों में शामिल है।

यूफोर्बिआ (Euphorbia) की झाड़ियां

आबू पर्वत की जन्तु विविधता

आबू पर्वत के सन्दर्भ में कई लेख संकेत करते हैं कि यहाँ कभी शेर (सन् 1872) और बाघ (1970 के दशक) की उपस्थिति हुआ करती थी। वर्तमान में आबू क्षेत्र में 35 स्तनधारी से अधिक प्रजातियां मिलती है जिनमें तेंदुआ, भालू खाद्य श्रृंखला की उच्चतम प्रजातियां है। सम्पूर्ण आबू पर्वत क्षेत्र में लगभग 290 पक्षी प्रजातियां है जिनमें हरी मुनिया, सिलेटी मुर्गा, लाल चौखरी, भारतीय हंसियाचोंच-चरखी, सिपाही बुलबुल, ललछौंह-पेट चरखी आदि आकर्षण की  केन्द्र हैं। आबू क्षेत्र में लगभग 40 हर्पेटोफोना की प्रजातियां तथा 50 से अधिक तितली प्रजातियों की उपस्थिति देखी गई है।

ग्रीन मुनिया (Green Avadavat)

आबू पर्वत क्षेत्र की जैवविविधता के संरक्षण में स्थानीय भागीदारी

पर्यटन मानचित्र पर आबू पर्वत की पहचान इसके ऐतिहासिक तथा धार्मिक धरोहर की महत्ता के कारण है। मुख्यतः आबू के पठारी भाग तक सिमित पर्यटन अनेक मायनों में उचित भी है क्योंकी हरे-भरे वन में मानवीय हस्तक्षेप न्यूनतम है। प्राकृतिक पर्यटन की असीमित क्षमताओं से युक्त इस वन्यजीव अभयारण्य का स्थानीय  रोज़गार की सम्भावना व अर्थव्यवस्था में अनुपातिक योगदान यहां की जनता के सहयोग से बढ़ाई जा सकती है। इस हेतु स्थानीय जनता का प्रकृति से जुड़ाव एवं संवर्धन के ज्ञान अत्यावश्यक है। वर्तमान में अनेक जागृत जन समूह वन विभाग के सहयोग में तत्पर रहते हैं, परन्तु संरक्षण के अल्पज्ञान के कारण वे अपना पूर्ण योगदान नहीं दे पाते है। कुछ व्यक्ति स्थानीय वानस्पतिक धरोहर का ज्ञान रखतें हैं परन्तु वन विभाग के अतिरिक्त उनके ज्ञान का लाभ सामान्य जन को नहीं मिल पाता है। अन्तर्राष्ट्रीय मत्वपूर्ण पक्षी प्रजाति हरी मुनिया के संरक्षण तथा इसके आवासों की सुरक्षा स्थानीय लोगों के कारण से ही संभव हो पायी। लेखकों द्वारा चयनित स्थलों के वैज्ञानिक अधययन के अनुसार सन 2004 में संख्या चार सौ से भी कम थी जो सन 2020 में दो हज़ार से अधिक हो गयी है। इस पक्षी की महत्वता व स्थानीय जनता में इसके प्रति बढती लोकप्रियता के कारण ज़िला प्रशासन ने इसे सन 2019 के लोकसभा चुनाव में ज़िले का शुभंकर भी बनाया था। अब समय है कि प्रशासन व वन विभाग एक सुनियोजित प्रकार से प्राकृतिक पर्यटन की दिशा में कार्य कर क्षेत्र की सतत विकास की कल्पना को मूर्तरूप दे। इस विकास को पूर्णतः नियंत्रित रूप से विकसित किया जाये जिससे की भारत के प्रकृति पुरुष के सिद्धांत को चरितार्थ कर स्थानीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों में अपना योगदान दिया जा सके।

लेखक:

Dr. Sarita Mehra & Dr. Satya Prakash Mehra (1 & 3) (L to R): Drs. Mehra Couple is the Conservation Biologist involved in the conservation programs in Rajasthan. Both Drs. Mehra restarted their activities at Abu in 2002 which continued with their extensive explorations from 2003-2007 to produce a document on behalf of WWF-India.

Mr. Balaji Kari (2): He is IFS and the present DCF of Mount Abu WLS. He has undertaken several conservation and management measures to overcome the challenges of the Mt Abu WLS. He is actively engaged in the conservation planning of the flagship species along with revising the biodiversity documentation of the Abu Hills.

Mrs. Preeti Sharma (4): Academician by profession, she is involved in the writing of the popular articles on the aspects of eco-cultural aspects and the conservation issues for the common mass. She is compiling the references from the epics and mythological documents which directly deal with the conservation of biodiversity and environmental protection in Indian, in general, and Rajasthan, in specific. Presently, she is Assoc. Professor (Sanskrit) at Shree Vardhman Girls College, Beawar.

विश्व का प्रथम बाघ पुनःस्थापन : डूंगरपुर राज्य के बाघ संरक्षण की कहानी

विश्व का प्रथम बाघ पुनःस्थापन : डूंगरपुर राज्य के बाघ संरक्षण की कहानी

बोखा बाघ अब इतिहास का एक किस्सा भर लगता है, पर यह वह बाघ था जिसने डूंगरपुर राज्य में किये गए हजारो शिकारों को भुला दिया और राज्य को संरक्षण की मिशाल का अग्रणी बना दिया। 

हम में से अधिकांश लोग भलीभांति परिचित है, की किस प्रकार सरिस्का में 2001 -04 तक शिकारियों द्वारा तेजी से सारे बाघों का सफाया कर दिया गया था, परन्तु तत्कालीन सरकार द्वारा सरिस्का में पुनः बाघ स्थापन किये गए, यहाँ रणथम्भौर से लेकर बाघों को छोड़ा गया I यद्पि सरिस्का के पर्यावास में अधिक सुधार नहीं हो पाया एवं यहाँ बाघों की स्थिति में अभी भी कोई बड़ा बदलाव नहीं आ पाया ।

यद्पि इसे बाघों के पुनः स्थापित करने की प्रक्रिया को विश्व की पहली बाघ स्थानांतरण  प्रक्रिया के रूप में देखा गया परन्तु इतिहास के पन्नो को देखे तो पता लगेगा की यह कार्य वर्षो पूर्व डूंगरपुर स्वतंत्र राज्य ने 1928 में ही कर दिखाया था ।

डूंगरपुर राज्य शिकार के साथ वन्यजीव संरक्षण में सदैव अग्रणी भी रहा है, पर जब वर्ष 1918  में राज प्रमुख महारावल बिजय सिंह की अचानक मृत्यु हो गयी तो, वहां ब्रिटिश राज्य द्वारा स्थापित अंग्रेज अधिकारी डोनाल्ड फील्ड ने अपनी मर्जी से 2-3 वर्षो में सारे बाघों का शिकार कर दिया। नव स्थापित महारवाल लक्ष्मण सिंह अपनी बाल्यावस्था में थे। जब महारवाल लक्ष्मण सिंह जब बड़े हुए तो, उन्होंने तय किया की राज्य में पुनः बाघों को स्थापित किया जाये ।

डूंगरपुर के जूना महल की दीवारों पर बने बाघ शिकार के भित्तिचित्र (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

वर्ष 1928, में दो बाघों को ग्वालियर से पकड़ कर रेल मार्ग से गुजरात लाया गया एवं तदुपरांत उन्हें सड़क मार्ग से डूंगरपुर लाया गया। इन दो बाघों में एक नर बाघ था जिसे ‘बोखा’ कहा गया एवं मादा को ‘बोखी’।

बोखा बाघ: जिसे ग्वालियर से डूंगरपुर लाया गया एवं प्रथम विस्थापित बाघ हो कर नए क्षेत्र में कुनबा बढ़ने का गौरव प्राप्त हुआ (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

शायद इन बाघों को दूर तक पिंजरे में लाने के दौरान उन्होंने अपनी मुख्य कैनाइन दांत पिंजरे को तोड़ने में गिरा दिए होंगे, तथा बाद में यह बाघ बोखा एवं बोखी कहलाये यद्पि इसका विवरण नहीं मिलता है। इन दोनों को सफलतापूर्वक डूंगरपुर के समृद्ध वनों में छोड़ा गया साथ ही बाद में इसी क्रम में और बाघों को भी राज्य में लाया  गया ।

प्रमाण मिलते है की, केवल बाघ ही नहीं लाये गए बल्कि डूंगरपुर राज्य ने उनके संरक्षण के लिए समुचित प्रयास भी किये, जिनमें उनकी निरंतर मॉनिटरिंग, उनके जल आपूर्ति के लिए जल कुंड (वाटर होल) का निर्माण एवं बाघों द्वारा पालतू पशु मरने पर मुआवजा देने का प्रावधान भी किया गया ।

इन सभी प्रयासों का परिणाम भी सुखद निकला एवं राज्य में 7 वर्ष में यह बाघो की संख्या 20  तक पहुँच गए। कहते है बोखी बाघिन ने 3 बार बच्चे दिए जिनमें कुल मिलाकर 10 शावकों पैदा हुए। सन्दर्भ बताते है की यह प्रयोग अत्यंत सफल हुआ एवं 1930 से 1937 के मध्य वहां लगभग 3 दर्जन बाघ शवको का जन्म हुआ। इसी प्रकार राज्य ने 1948 तक 25 बाघों की संख्या को बनाये रखा ।

बोखा बाघ की समाधी (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

यद्पि आज डूंगरपुर में कोई बाघ नहीं है परन्तु सिखने ले लिए वहां बहुत कुछ है। प्रयास करे हम हमारे इतिहास से सीखे एवं उसका सम्मान करे ।

सन्दर्भ:

  • Singh, P, Reddy, G.V. (2016) Lost Tigers Plundered Forests: A report tracing the decline of the tiger across the state of Rajasthan (1900 to present). WWF-India, New Delhi.
  • Divyabhanusinh, 2018  pers comm.
  • Mahesh Purohit 2019 pers  Comm.
सांभरझील और उसके संरक्षण से जुड़े कुछ पहलु

सांभरझील और उसके संरक्षण से जुड़े कुछ पहलु

रेतीले धोरो, सुखी पहाड़ियों एवं कंटीली झाड़ियों से घिरी सांभर झील कई मौसमी नदियों और नालों से आये खारे जल से समृद्ध आर्द्र भूमि होने के साथ सर्दियों में विभिन्न प्रकार के प्रवासी पक्षियों का आशियाना भी है, जो भारत का एक अनूठा पारिस्थितिक तंत्र है…

राजस्थान में स्थित सांभर झील भारत की सबसे बड़ी “लवण जल” अर्थात “खारेपानी” की झील है। इस का प्राचीन नाम, हर्ष शिलालेख 961 ई. में वर्णित, शंकरनक (शंकराणक) था। इसी नाम की देवी के बाद इस का प्राचीन नाम शाकंभरी (शाकंभरी) भी था। सांभर को साल्ट लेक, देवयानी और शाकंभरी मंदिर के तीर्थ के लिए भी जाना जाता है। प्रत्येक वर्ष उत्तरी एशिया एवं यूरोप से सर्दियों के दौरान हजारों की संख्या में विभिन्न प्रजातियों के प्रवासी पक्षी यहाँ आते हैं। इस झील के अंतरराष्ट्रीय महत्व को समझते हुए इसे वर्ष 1990 में एक रामसर स्थल के रूप में नामांकित किया गया। इस झील का किनारा अद्वितीय है i  क्योंकि इस में पोटेशियम की मात्रा कम व सोडियम की मात्रा अधिक है, जिसके चलते इस झील से एक बड़े पैमाने पर नमक का उत्पादन भी किया जाता है परन्तु धीरे-धीरे ये नमक उद्योग, झील तथा यहाँ आने वाले पक्षियों के लिए मुश्किलों का सबब बनता जा रहा है।

सांभर झील मुख्यरूप से नागौर और जयपुर जिले में स्थित है तथा इसकी सीमा का कुछ भाग अजमेर जिले को भी छूता है। यह एक अण्डाकार झील है जिसकी लंबाई 3.5 किमी तथा चौड़ाई 3 से11 किमी है। इसकी परिधि 96 किमी है जो चारों तरफ से अरावली पहाड़ियों से घिरी हुई है। इस झील का कुल जल ग्रहण क्षेत्र 5700 वर्ग किमी का है। मानसून के बाद शुष्क मौसम के दौरान इस झील के पानी का स्तर 3 मीटर से घटकर 60 सेमी तक रह जाता है, वहीं दूसरी ओर इस जल क्षेत्र का क्षेत्रफल190 से 230 वर्ग किलोमीटर तक बदलता है। चार मुख्य नदियां (मेंढा, रूपनगढ़, खारी, खंडेला), कई नाले और सतह से अपवाहित जल इस झील के मुख्य जलस्रोत हैं।

सांभर झील कि जैव विविधता

इस आर्द्रभूमि का अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्व है क्योंकि प्रत्येक वर्ष सर्दियों के दौरान हजारों की संख्या में प्रवासी पक्षी यहाँ आते हैं। सर्दियों में यह झील, कच्छ के रण के बाद फुलेरा और डीडवाना के साथ, भारत में फ्लेमिंगो (Phoenicopterus roseus & Phoniconaias minor) के लिए सबसे महत्वपूर्ण क्षेत्र है। इस झील में पेलिकन, कॉमन शेल्डक, रेड शैंक, ब्लैक विंगड स्टिल्ट, केंटिश प्लोवर, रिंग्ड प्लोवर, रफ और रिवर लैपिंग भी पाए जाते हैं। शर्मा एवं चौमाल 2018, के अनुसार अब तक इस झील से एल्गी की 40 से अधिक प्रजातियां दर्ज की गयी हैं। झील में उगने वाले विशेष प्रकार के एल्गी एवं बैक्टीरिया इसके पारिस्थितिक तंत्र का आधार है, जो जल पक्षियों का भोजन बन उनका समर्थन करते है।

सांभर झील में विचरण करते फ्लेमिंगो (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

सांभर झील के पास Peregrine falcon (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

नमक उत्पादन – इतिहास कि नजर से

जैव विविधता की दृष्टि से महत्वपूर्ण होने के साथ-साथ सांभर झील पुरातत्व दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण एवं मुगलकालिक नमक उदपादक क्षेत्र भी है। जोधा बाई (जयपुर राज्य के भारमल की बेटी) या मरियम-उज़-ज़मानी की शादी अकबर से 20 जनवरी, 1562 को सांभर लेक टाउन में हुई थी। झील से नमक आपूर्ति मुगल वंश (1526-1857) द्वारा आरम्भ किया गया, जो बाद में जयपुर और जोधपुर रियासतों के संयुक्त रूप से स्वामित्व में था। 1884 में, सांभर झील में किए गए छोटे पैमाने पर उत्खनन कार्य के हिस्से के रूप में क्षेत्र में प्राचीन मूर्तिकला की खोज की गई थी। पुरातत्व विभाग ने नलसर नामक स्थान पर सांभर में खुदाई की थी जिसने इसकी प्राचीनता का संकेत दिया था। उस खुदाई के दौरान, मिट्टी के स्तूप के साथ कुछ टेराकोटा संरचनाएं, सिक्के और मुहरें मिलीं। सांभर मूर्तिकला बौद्ध धर्म से प्रभावित प्रतीत होती है। बाद में, 1934 के आसपास, एक बड़े पैमाने पर व्यवस्थित और वैज्ञानिक उत्खनन किया गया था जिस में बड़ी संख्या में टेराकोटा मूर्तियाँ, पत्थर के पात्र और सजे हुए डिस्क पाए गए थे। सांभर की कई मूर्तियां अल्बर्ट हॉल संग्रहालय में मौजूद हैं।

वर्तमान में नमक-वाष्पीकरण पैन और शोधन कार्य झील के पूर्वी किनारे पर स्थित हैं। सांभर झील के किनारे तीन गाँव बसे हुए हैं, पूर्वी तट पर सांभर, उत्तर-पश्चिमी तट पर नवा और इनके बीच में गुढ़ा। इन गाँवों के लोग नमक उद्योग पर निर्भर हैं। प्रतिवर्ष इस झील से लगभग 2,10,000 टन नमक का उत्पादन किया जाता है। परन्तु कुछ स्थानीय लोग बोरवेल द्वारा पानी की निकासी कर सालाना 15-20 लाख मैट्रिक टन से भी अधिक नमक का उत्पादन करते है जिसके फलस्वरूप आज राजस्थान भारत के शीर्ष तीन नमक उत्पादक राज्यों में से एक है। लगभग 30 -35 वर्ष पूर्व यहाँ मत्स्य व्यापार भी किया जाता था क्योंकि वर्ष 1985 में, सांभर में बाढ़ की स्थिति उत्पन्न हो गई थी तथा यह स्थिति एक वर्ष तक बनी रहने के कारण यहाँ मत्स्य संसाधनों में वृद्धि कर व्यापार शुरू किया गया। वर्ष 1992 में, फिर से झील में भारी वर्षा के कारण मत्स्य संसाधनों में दुबारा वृद्धि हुई परन्तु पहले चरण में जीवित रहने के बाद जब पानी की लवणता 1से1.20 हो गई तो मत्स्य पालन के लिए खतरा पैदा हो गया, अंततः उनकी मृत्यु हो गई और इसका कोई व्यावसायिक मूल्य नहीं रहा।

सांभर झील के किनारों पर बने नमक वाष्पीकरण की इकाइयां दर्शाता मानचित्र

नमक उत्पादन–वर्तमान स्थिति

वर्तमान में सांभर झील पर 5.1 किमी लंबा बलुआ पत्थर का बांध भी बना हुआ है जो इस झील को दो भागों में विभाजित करता है। खारे पानी की सांद्रता एक निश्चित सीमा तक पहुंचने के बाद, बांध के फाटकों को खोल पानी को पश्चिम से पूर्व की ओर छोड़ दिया जाता हैं। इस बांध के पूर्व में ही नमक के वाष्पीकरण वाले तालाब हैं जहाँ पिछले हजार से भी अधिक सालों से नमक की खेती की जाती है। नमक उत्पादन का नियंत्रण स्थानीय समुदायों से राजपूतों, मुगलों, अंग्रेजों और अंत में आज यह सांभर साल्ट्स लिमिटेड, जो हिंदुस्तान साल्ट्स लिमिटेड (भारत सरकार) जयपुर विभाग और अजमेर व् नागौर  खनन विभाग (राजस्थान सरकार) के बीच एक संयुक्त उद्योग है। इनके अलावा कुछ निजी ठेकेदार जिनकी भूमि झील के पास स्थित है नमक का उत्पादन करते है।

वहीँ दूसरी ओर देखे तो आज नमक निष्कर्षण की पारंपरिक प्रक्रिया जो मानसून पर निर्भर हुआ करती थी लगभग समाप्त हो गई है। अब ठेकेदार छोटी अवधि में अधिक से अधिक नमक निकालने की कोशिश करते हैं। सांभर झील में नदियों और नालों पानी झील के तलछट के साथ प्रतिक्रिया कर नमक बनाता है, जिसे क्रिस्टलीकृत नमक को पीछे छोड़ते हुए वाष्पित होने में लगभग 50 – 60 दिन लगते हैं। परन्तु आज अधिकांश ठेकेदार इस प्रक्रिया अवधि को 15 – 20 दिनों की करने के लिए भूजल का उपयोग करते हैं तथा इसके लिए गहरे अवैध बोरवेल लगाए गए हैं। भूजल के अत्यधिक इस्तेमाल ने क्षेत्र में भूजल का स्तर लगभग 40 फीट तक कम कर दिया है तथा इस से आस-पास के गांवों में पानी की कमी होने लगी है।

आज ठेकेदारों द्वारा झील से ज्यादा से ज्यादा नमक निकला जाता है (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

मानवीय हस्तक्षेप

सांभर झील के पारिस्थितिक तंत्र पर खतरे के लिए विभिन्न कारक जिम्मेदार है जैसे की झील के जल ग्रहण क्षेत्र के लैंडयूज पैटर्न में भी बदलाव हो रहा है। नमक उत्पादक इकाइयाँ झील के किनारों के ऊपर आ गई हैं और मेंढा व् रूपनगढ़  से आने वाले पानी को रोक रहीं हैं। हालांकि झील का जल ग्रहण क्षेत्र बहुत विशाल है, परन्तु फिर भी इसे मानवीय हस्तक्षेप के कारण बहुत कम अपवाह प्राप्त हो रहा है। जल ग्रहण क्षेत्र में अनियोजित निर्माण ने वर्षा जल के प्रवाह को भी रोक दिया है। सूखे की वजह से, सरकार ने कृषि के लिए चेक डैम और एनीकट बनाकर पानी की कटाई व् भूजल  के स्तर को सुधारने की एक पहल की। परन्तु इस से, झील का जल प्रवाह पूरी तरह से जल ग्रहण क्षेत्र से बंद हो गया है। पानी में लवणता बढ़ने के परिणाम स्वरूप कुछ प्रमुख नमक निर्माता संसाधनों का दोहन कर रहे हैं तो कुछ कम और सीमांत नमक निर्माता झील की परिधि में उप-मिट्टी से नमक निर्माण कर रहे हैं।

मानवीय हस्तक्षेपों के चलते झील में लवणता बढ़ गयी है जिसके परिणाम स्वरूप आज जीवों की विविधता कम हो रही है जैसे की ग्रीन एल्गी जो शुरू में ताजे पानी में ज्यादा पायी जाती थी, आज पूरी तरह से गायब हो गई है। कभी वर्ष 1982-83 में, 5 लाख से अधिक फ्लमिंगोस को इस झील में गिना गया, तो बड़ी संख्या में पेलिकन भी सर्दियों के दौरान इस झील में एकत्रित हुआ करते थे। परन्तु वर्ष 2008 में फ्लमिंगोस की संख्या घटकर 20,000 हो गई।

विडम्बना

स्थिति की विडम्बना यह है कि विभिन्न प्रकार के प्रवासी पक्षियों के लिए इसके महत्त्व को समझते हुए भी सांभर को आज एक नमक के स्रोत के रूप में ही जाना जाता है। ऐसा नहीं है की भारत सरकार ने इसके संवर्धन के लिए कोई योजना नहीं बनायीं हैं क्योंकि, यदि वर्ष 2015 की लोकसभा की एक पत्रावली को देखे तो 7.19 करोड़ रुपये राशि सांभर झील के विकास के लिए दिए गये थे; परन्तु जिम्मेदारी पूर्ण नीति के अभाव में सांभर कि आर्द्रभूमि आज संकटग्रस्त है, सरकार को सर्वप्रथम इस स्थान को संरक्षित करना चाहिए तथा इसकी जैव-विविधता को संरक्षित करने के लिए निति बनानी चाहिए।

  

राजस्थान की प्रथम कैमरा ट्रैप फोटो

राजस्थान की प्रथम कैमरा ट्रैप फोटो

क्या आपने कभी सोचा है आजादी से पूर्व में राजस्थान में कैमरा ट्रैप फोटो लिया गया था ? आइये जानिए कैमरा ट्रैप के इतिहास एवं उससे जुड़े कुछ रोचक तथ्यो के बारे में…

वन्यजींवों के संरक्षण में वन्यजींवों की संख्या का अनुमान लगाना एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। भारत में वर्ष 2006 के बाद से बाघ अभयारण्य में बाघों की संख्या का अनुमान लगाने के लिए कैमरा ट्रैप का उपयोग होने लगा।  आज कैमरा ट्रैप के उपयोग से संख्या का अनुमान अधिक सटीक और बिना इंसानी दखल के होने लगा है। कैमरा ट्रैप के इस्तेमाल से न केवल वन्यजींवों की संख्या का अनुमान बल्कि इससे उनके संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण जानकारियां जैसे जंगल में शिकारियों व् अवैध कटाई के परिणाम भी प्राप्त किये जाते है।

वर्तमान में प्रयोग में लिया जाने वाला कैमरा ट्रैप दूर से काम करने वाली मोशन सेंसर बीम तकनीक पर आधारित है, इन अत्याधुनिक उपकरण में से निकलने वाली इंफ़्रारेड बीम के सामने यदि कोई भी गतिविधि होती है तो तस्वीर कैद हो जाती है। परन्तु पहली बार जब कैमरा ट्रैप के अविष्कार कर्ता जॉर्ज शिरस-III  ने सन 1890 में इसका उपयोग किया तब वह एक ट्रिप वायर और एक फ़्लैश लाइट का इस्तेमाल करके बनाया गया था।  इनसे लिए गए फोटो 1906 में नेशनल जियोग्राफिक मैगज़ीन में प्रकाशित हुए थे। भारत में ऍफ़ डब्लू  चैंपियन ने 1926 में राजाजी नेशनल पार्क में टाइगर की कैमरा ट्रैप से पहली पिक्चर लेने में सफलता प्राप्त की। ऍफ़ डब्लू चैंपियन, प्रसिद्ध शिकारी जिम कॉर्बेट के दोस्त एवं संरक्षक थे और उन्होने ही जिम कॉर्बेट को बन्दुक की जगह कैमरा पकड़ने की सलाह दी थी। जिसके बाद जिम कॉर्बेट एक वन्यजीव प्रेमी के रूप में प्रसिद्ध हुए।

आधुनिक कैमरा ट्रैप लगाते हुए एक स्वयंसेवक

परन्तु क्या आप जानते है?  राजस्थान में संयोजित तरह से आधुनिक कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल डॉ जी वी रेड्डी के दिशा निर्देशन में  रणथम्भोरे रास्ट्रीय उद्यान  में सन 1999 में किया गया था। उन्होने पहली बार डॉ उल्हास कारंथ के सहयोग से बाघों की संख्या का अनुमान लगाने का प्रयास किया। परन्तु इतिहास के अनछुए पन्नो में प्रमाण मिलते है की राजस्थान में सबसे पहले कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल चितोड़गढ़ में किया गया था। आज़ादी से पहले देश में ब्रिटिश लोगो को खुश रखने के लिए यहाँ के राजा-महाराजा, वन्यजीवों के शिकार के लिए विशेष आयोजन किया करते थे। परन्तु इन्ही दिनों की एक विशेष फोटो अनायाश ध्यान आकर्षित करती है। वर्ष 1944 में चित्तोड़ में एक तालाब पर आने वाले बाघ की फोटो लेने में जब सफलता हासिल नहीं हुई तो यहाँ सबसे पहले कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल करके टाइगर का चित्र लिया गया। जिसका साक्षी  बीकानेर का लक्ष्मी  विल्लास होटल हे, जहाँ यह फोटो आज भी लगी हुई है और यदि ध्यान से देखा जाये तो टाइगर के पीछे के पैर के पास एक खींची हुई रस्सी या तार देखी जा सकती है जो दाये और बाये दोनों हिस्सों में दिखाई देती है।

यह वह दुर्लभ फोटो है जिसे राजस्थान की प्रथम कैमरा ट्रैप फोटो माना जा सकता है

कैमरा ट्रैप फोटो के निचे लिखा विवरण

आजकल कैमरा ट्रैप अत्याधुनिक डिजीटल कार्ड तथा बैटरी द्वारा संचालित फोटो एवं वीडियो दोनों बनाने में सक्षम होते  हैI उस दौर में  कैमरा ट्रैप में प्लेट एवं कालांतर में रील का उपयोग किया जाता था और फोटो को लैब में प्रोसेस होने के बाद ही देखा जा सकता था।

आज डिजिटल कार्ड की बदौलत पलभर में जंगल के अंदर ही मोबाइल में फोटो देखी व् तुरंत साझा की जा सकती है।

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इंडियन स्किमर्स: पानी की सतह को चीरता पनचीरा

इंडियन स्किमर्स: पानी की सतह को चीरता पनचीरा

पनचीरा कलाबाजी खाते हुए और करीने से  पानी को चीरते हुए मछली का शिकार कर यह सिद्ध कर देता है की वह एक अचूक और माहिर शिकारी है और हर समय अद्वितीयरूप से विजित ही रहेगा, पर मानवीय हस्तक्षेप के चलते यह अपने  एकमात्र प्रजनन स्थल या फिर यों कहे अपने अंतिम गढ़ चंबल नदी पर भी अस्तित्व की लड़ाई में पराजीत होता प्रतीत हो रहा है…

इंडियन स्कीमर (Indian skimmer) जिसे हिंदी में पनचीरा व राजस्थानी स्थानीय भाषा में पंछीडा भी कहते है। अपनी काली टोपी और चटक नारंगी रंग की चोंच, जिसका निचला भाग ऊपरी भाग की अपेक्षा लम्बा होने, के कारण इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। इसका नाम, इसके भोजन को पकड़ने के तरीके से एक पल में ही स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि यह अपनी चोंच से पानी की ऊपरी सतह को चीरते हुए, जैसे दूध से मलाई निकालते हो, मछली को पकड़ता है। इसका वैज्ञानिक नाम “Rynchops albicollis” है तथा यह Laridae परिवार का सदस्य है। यह कुछ हद तक टर्न (Tern) जैसे लगते है। राजस्थान में यह चम्बल व उसकी सहायक नदियों के पास मिलता है, परन्तु मानवीय हस्तक्षेपों और घटते आवास के कारण आज यह एक संकटग्रस्त प्रजाति है।

इंडियन स्कीमर का चित्रण/निरूपण (Description):

इंडियन स्कीमर की चोंच उसके शरीर का सबसे आकर्षक भाग होती है क्योंकि इसकी चोंच लम्बी, मोटी, गहरी नारंगी तथा सिरे से हल्के पीले रंग की होती है। चोंच का निचला भाग ऊपरी भाग की अपेक्षा लम्बा होता है तथा यह सिरे से चाकू की तरह चपटा व धारदार होता है। इसके सिर का ऊपरी भाग काला होता है मानो सिर पर काली टोपी रखी हो। शरीर के ऊपरी भाग काले तथा निचले भाग सफ़ेद रंग के होते हैं। अपने लम्बे और नुकीले पंखों के कारण यह टर्न जैसा दिखता है परन्तु इसके पंखों के किनारे सफ़ेद होते है तथा इसके पंखों का विस्तार लगभग 108 सेमी होता है। इसकी पूँछ काली, छोटी, सिरे से कांटे जैसी तथा इसके बीच के पंख सफ़ेद होते है। टंगे तथा पैर लाल होते है। नर और मादा दिखने में एक से ही होते हैं, हालांकि, नर आकार में थोड़े बड़े होते हैं।

युवा पक्षियों के शरीर के ऊपरी भाग भूरे तथा सिर वयस्कों से ज्यादा सफ़ेद होता है। इनकी चोंच नारंगी-भूरी तथा सिरे से गहरे रंग की होती है। चोंच सामान्य ही होती है परन्तु उम्र के साथ निचला भाग बढ़ जाता है। एक नज़र में किसी उड़ान भरते या स्थिर बैठे स्कीमर को देखने पर उनकी क्षैतिज रूप से विस्तारित (horizontally extended) आँखें एक पतली पट्टी या धारी (slits) कि तरह दिखती हैं जो कि इनके समुद्र की सतह पर घूमते समय पानी के संभावित बौछार से आँखों को सुरक्षित रखता है।

इंडियन स्कीमर “Rynchops albicollis” (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

इतिहास के पन्नो में इंडियन स्कीमर

इंडियन स्कीमर का जिक्र सबसे पहले एडवर्ड बक्ले (1602-1709) द्वारा बनाए गए उनके चित्र में किया गया। एडवर्ड बक्ले मद्रास में तैनात ईस्ट इंडिया कंपनी के सर्जन और एक अग्रणी प्रकृतिवादी थे। ये पहले इंसान थे जिन्होंने भारतीय पक्षियों की प्रजातियों के चित्र बनाकर दस्तावेजीकरण किया था। इन्होंने मद्रास स्थित फोर्ट सेंट जॉर्ज (Fort St. George) के आसपास के इलाके से कुल 22 पक्षियों के चित्र व विवरण तैयार किए थे। सन 1713 में यह सभी विवरण और चित्र एक अंग्रेजी प्रकृतिवादी जॉन रे की किताब Synopsis Methodica Avium & Piscium: Opus Posthumum में छपे जो कि भारतीय पक्षियों पर छपने वाला पहला दस्तावेज था। एडवर्ड बक्ले ने ही स्कीमर का सबसे पहला चित्र बनाया जिसे उस समय मद्रास सी क्रो (Madras Sea Crow) का नाम दिया था।

अल्फ्रेड हेनरी माइल्स ने An Encyclopedia of Natural History में जिक्र किया है कि सन 1731 किसी अमेरिकी लेखक ने समुद्र के ऊपर पानी को चीरते हुए उड़ने वाले पक्षी को “cut water” नाम से संबोधित किया था जो कि बाद में Scissors Bill नाम से जाना जाने लगा।

विलियम जॉन स्वेन्सन (William John Swainson) ने सन 1838 में इंडियन स्कीमर को द्विपदनाम पद्धति के अनुसार “Rynchops albicollis” नाम दिया। स्वेन्सन एक अंग्रेजी पक्षी विशेषज्ञ,मैलाकोलॉजिस्ट, किट विशेषज्ञ और कलाकार थे जो प्रकृति के सुंदर रंगीन चित्रों, विशेष रूप से फूलों और पक्षियों के लिए जाने जाते थे।

एडवर्ड बक्ले द्वारा बनाया गया मद्रास सी क्रो (Madras Sea Crow) का चित्र

इंडियन स्कीमर का वितरण

पक्षी विशेषज्ञ TC Jerdon द्वारा 1864 में भारतीय पक्षियों पर लिखी पुस्तक के एक विवरण कि कल्पना करें तो ये अनुमानित किया जा सकता है कि पनचिरा कभी हजारों कि तादाद में पाया जाता था। जेरडोन कि पुस्तक का विवरण कुछ इस प्रकार है श्री ब्रुक्स लिखते है की उन्होंने मिर्ज़ापुर में सैकड़ों की तादाद में स्किमर्स के चूजे को देखा तो वो दृश्य आश्चर्यचकित कर देने वाला था, मानो बहुत सारे छोटे कछुए की सेना नदी की तरफ दौड़ रही हो।

इंडियन स्कीमर मुख्य रूप से नदियों, झीलों और नमभूमियों में पाया जाता है। सुन्दर (2004) के अनुसार, पहले यह म्यांमार की प्रमुख नदियों, भारत-चीन में मेकांग के आसपास तथा भारतीय उप-महाद्वीप में व्यापक रूप से मिलते थे। परन्तु इसकी सीमाएं हाल के दशकों में तेजी से खंडित हुई है जिसके परिणामस्वरूप आज पाकिस्तान और म्यांमार में इनकी बहुत छोटी सी आबादी जीवित बची है तथा मेकांग डेल्टा में यह पूर्णरूप से लुप्त हो चुकी है। मोहसिन (2014) के अनुसार, वर्तमान में भारत, और बांग्लादेश इंडियन स्कीमर के अंतिम गढ़ हैं तथा भारत इस प्रजाति के लिए एकमात्र शेष प्रजनन आवास है। भारत में, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, बिहार और ओडिशा से इसकी सूचना है।

Distribution of Indian Skimmer (Source: birdlife.org)

आज भारत में राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य भारतीय स्किमर की एक बड़ी आबादी (लगभग 80 प्रतिशत) का प्रजनन स्थान है। अभी तक राजस्थान में यह केवल चम्बल व उसकी सहायक नदियों जैसे रामेश्वरम घाट, बनास नदी व इसके पास के कुछ तालाबों जैसे “सूरवाल” में देखा जाता है। इनको आसानी से चम्बल नदी के किनारे पर देखा जा सकता है।

राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में इंडियन स्किमर (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

आहार व्यवहार

इंडियन स्कीमर का नाम इसके भोजन के शिकार करने की विधि के आधार पर रखा गया है। यह अपनी चोंच को खोल कर पानी की सतह को निचली चोंच से चीरते हुए, सीधी उड़ान भरते है और जैसे ही कोई मछली सामने आती है तो तुरंत अपनी चोंच से उसे पकड़ लेते है। यह एक उल्लेखनीय एरोबैटिक कौशल दिखाते हैं जिसमें यह अपनी चोंच को पानी की सतह पर स्थिर एक सीधे पथ पर बनाये रखते है। यह देखा गया है की इंडियन स्कीमर मुख्यरूप से सतह पर उपलब्ध छोटी मछलियों की प्रजातियों को खाते है तथा छोटे झुंडों में खाना खोजते है। इसके आहार में मुख्य रूप से 04-14 सेमी लंबाई की छोटी मछलियाँ होती हैं तथा जो मछली 2 सेमी से छोटी होती है, उन्हें युवा पक्षियों को खिलाया जाता है। राजगुरु (2017) के अनुसार यह Salmophasia bacaila, Salmophasia sardinella, Systomous sarana, Pethiaticto, Dermogenys pusilla आदि प्रजातियों की मछलियां खाते है।

अपनी चोंच से पानी की सतह को चीरते हुए मछली पकड़ते इंडियन स्कीमर (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

प्रजनन

इंडियन स्कीमर का प्रजनन काल भीषण गर्मी के दिनों में (मार्च से मई) होता है तथा यह मुख्य रूप से खुले रेत तट पर अपना घोंसला बनाते है। अंडे भूरे धब्बों और लकीरों के साथ सफेद व भूरे रंग के होते हैं। राजगुरु (2017) ने यह सूचित किया है की तेजी गर्मियों में यह अपने अंडों को गर्मी के प्रभाव से बचाने के लिए बार-बार पानी में जाकर अपने अग्र भाग को भिगो कर अंडों पर बैठ उन्हें ठंडा करते है। देबाता (2018) ने यह सूचित किया है की इंडियन स्कीमर, टर्न के घोंसलों में अपने अंडे रख कर Brood Parasitism का उद्धरण देते है, परन्तु इस व्यवहार के अन्य संदर्भ नहीं आये है। इनका प्रजनन काल नदियों के जल स्तर पर भी निर्भर करता है।

इंडियन स्कीमर पर खतरे

पहले यह पक्षी भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से मिलता था परन्तु आज मानवीय हस्तक्षेपों के चलते यह बहुत कम हो गए तथा IUCN के अनुसार एक संकटग्रस्त प्रजाति है। वर्तमान में इसकी वैश्विक आबादी केवल 6,000-10,000 पक्षी हैं। यह मनुष्यों द्वारा निवास स्थान के खत्म होने, मछली पकड़ने, परिवहन, घरेलू उपयोग, सिंचाई योजनाओं और कृषि व औद्योगिक रसायनों से नदियां व झीलें प्रदूषित हो रही है तथा इन्हीं कारणों से इंडियन स्कीमर की आबादी में गिरावट आ रही है क्योंकि इन कारकों ने इसके प्रजनन और खाना ढूंढने की सफलता को कम कर दिया है। सुंदर (2004) के अनुसार राजस्थान में चम्बल नदी के ऊपर बांध बनने से, भी इसकी आबादी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, क्योंकि बाँध से पानी छोड़ने के कारण जलस्तर में निरंतरता नहीं रहती है। प्रजनन काल में यह नदी किनारे रेत पर घोंसला बनाते है परन्तु ऐसे में यदि बाँध से पानी छोड़ा जाता है तो नदी किनारों पर जलस्तर बढ़ने के कारण इनके घोंसले बह जाते है। और यदि किनारों पर पानी बहुत काम रहे तो आवारा कुत्ते व मवेशी, इनके घोंसलों को नष्ट कर देते है।

इसकी अधिकांश आबादी असुरक्षित हैं लेकिन कुछ संरक्षित क्षेत्रों जैसे राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में सुरक्षित हो रही है। परन्तु सरकार को इस पक्षी के संरक्षण के लिए और कदम भी उठाने चाहिए, क्योंकि यह जल-पक्षी नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र का एक अभिन्न अंग हैं तथा ये पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

References:

  • Debata, S., T. Kar, K.K. Swain & H.S. Palei (2017). The Vulnerable Indian Skimmer Rynchops albicollis Swainson, 1838 (Aves: Charadriiformes: Laridae) breeding in Odisha, eastern India. Journal of Threatened Taxa 9(11): 10961–10963
  • Debata, S., T. Kar, K.K. Swain & H.S. Palei(2018): Occurrenceof Indian Skimmer Rynchops albicollis eggs in River Tern Sterna aurantia nests, Bird Study
  • https://books.google.co.in/books?id=DWtCw6-AxA8C&pg=PA262&lpg=PA262&dq=Indian+scissors-bill+name+given+by&source=bl&ots=gUvUYj5lrJ&sig=ACfU3U1FPmQ5xerPWDd8fDQwWPqpYK92DQ&hl=en&sa=X&ved=2ahUKEwjvsoz4m_joAhWKzDgGHQ8ZB4YQ6AEwCXoECAoQAQ#v=onepage&q=Indian%20scissors-bill%20name%20given%20by&f=false
  • Jerdon, TC (1864). Birds of India. Vol 3. George Wyman & Co. p. 847.
  • John Ray & Edward Buckley. 1713. Synopsis methodica avium & piscium : opus posthumum, quod vivusrecensuit & perfecit ipse insignissimus author: in quo multas species, in ipsiusornithologiâ &ichthyologiadesideratas, adjecit: methodum quesuampiscium naturæ magìsconvenientemreddidit. Cum appendice, &ico. P.203
  • Rajguru, S. K., (2017). Breeding biology of Indian Skimmer Rynchops albicollis at Mahanadi River, Odisha, India. Indian BIRDS 13 (1): 1–7.
  • Sundar, K.S.G. (2004). Observations on breeding Indian Skimmers Rynchops albicollis in the National Chambal Sanctuary, Uttar Pradesh, India. Forktail 20: 89–90.
  • Swainson,1838. Animals in menageries. Part III. Two centenaries and a quarter of birds, either new or hitherto imperfectly described. p. 360.
शेरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य: ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक धरोहर

शेरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य: ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक धरोहर

राजस्थान में विंध्यन पर्वतमाला कि वन पट्टिका के अंतिम वन खंड के रूप में स्थित शेरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य ऐतिहासिक घटनाओं और प्राकृतिक सौन्दर्य को संजोये बारां जिले  का एक मात्र और राजस्थान का एक अनन्वेषित अभयारण्य है।

शेरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य “वराह नगरी” अर्थात् बारां जिले की अटरू तहसील के शेरगढ़ क़स्बे कि परिधि पर स्थित 98.8 वर्ग किमी. का वन क्षेत्र है; जो राजस्थान की वन पट्टिका का अंतिम विशालतम वन खंड है तथा यह पारिस्थिकीय दृष्टि से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। इस वन भूमि की भौगोलिक स्थिति, सदावाही परवन नदी, बरसाती नाले और जैव विविधता अनायास ही आकर्षित करते है। इस क्षेत्र की जैव विविधता को देखते हुए 30 जुलाई 1983 को इसे अभयारण्य घोषित किया गया। इसी सन्दर्भ में 25 मई 1992 को राज्य सरकार द्वारा पुन: संशोधित अधिसूचना जारी की गयी जिसमें इसके वन क्षेत्र का विस्तार किया गया। शेरगढ़ गाँव के ऐतिहासिक महत्तव के मद्देनज़र अभयारण्य का नाम भी शेरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य रखा गया।

शेरगढ़ वन्यजीव अभयारण्य विंध्यन पर्वतमाला और उसकी एक अद्भुत घाटी पर स्थित है जिसकी भौगोलिक संरचना घोड़े की नाल के समान दिखाई देती है। इसकी सीमा उत्तरी सिरे से प्रारंभ होकर अभयारण्य के मध्य भाग में समाप्त होती है; जबकि दक्षिण में परवन का ढाल दिखाई देता है। इस प्रकार बनी हुई घाटी के दो भाग है। प्रथम आधा भाग मिट्टी के बने अन्चोली बांध में डूबा हुआ है और दूसरे आधे भाग में सुरपा गाँव के लोगों के खेत है। खास बात है कि इस अभयारण्य की परिधि के अन्दर एक भी गाँव का निवास नहीं है। जिसके चलते जंगल में वन्य जीव बेखौफ होकर विचरण करते है।

अभयारण्य का मानचित्र (फोटो: श्री प्रवीण कुमार)

अभयारण्य का मानचित्र (फोटो: श्री प्रवीण कुमार)

शेरगढ़ किला

हाड़ौती प्रान्त में स्थित बारां जिला सुरमय पहाड़ियों और घाटियों की भूमि है जहाँ के पुराने खंडहर ऐतिहासिक घटनाओं के साक्षी रहे हैं। बारां का इतिहास 14वीं शताब्दी के उस समय का बोध कराता है जब इस क्षेत्र पर सोलंकी राजपूतों का शासन था। 1949 में राजस्थान का पुनर्गठन होने पर बारां, कोटा का प्रमुख मंडल बन गया। और 1991 में राजस्थान राज्य का स्थापित जिला घोषित हुआ। यह जिला अपनी स्थापत्य कला के बेजोड़ नमूनों, राम-सीता मंदिरों, जीवंत आदिवासी मेलों, त्योहारों और शक्तिशाली किलों की प्राकृतिक सुन्दरता के लिए विख्यात है।

बारां से लगभग 65 किमी. दूर शेरगढ़ गाँव परवन नदी के किनारे स्थित है, जिसे शासकों के लिए रणनीति का महत्वपूर्ण एवं केन्द्रीय स्थान माना जाता था। वर्षों तक विभिन्न राजवंशों द्वारा शासित शेरगढ़ किले के एक बुर्ज के आलय की नई तिबारी में संस्कृत भाषा व नागरी लिपि में लिखे हुए एक शिलालेख द्वारा प्रमाणित होता है कि 790 ईस्वी में यहाँ सामंत देवदत्त का शासन रहा, जिन्होंने इस स्थान पर कई जैन व ब्राह्मण मंदिरों तथा बौद्ध मंदिर एवं मठ का निर्माण करवाया। 8वीं शताब्दी में यह स्थान कृषि, व्यापारिक, आर्थिकदृष्टि से संपन्न एवं सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण था अतःराजा कोषवर्धन ने इसका नाम “कोषवर्धनपुर” रखा, जिसका तात्पर्य है: “निरंतर धन में वृद्धि करने वाला”।

बाद में 15वीं शताब्दी में सूरी वंश के मुग़ल शासक शेरशाह ने आक्रमण कर दुर्ग पर आधिपत्य कर लिया तब से इसका नाम शेरगढ़ रखा गया। इतिहास में इसे शेरपुर एवं शेरकोट इत्यादि नाम से भी उच्चारित किया गया है। उसने यहाँ पूर्व-निर्मित मंदिरों, भवनों और इमारतों को ध्वस्त करके नए सिरे से निर्माण करवाया। यहाँ स्थित खंडहरों में आज भी बेगम व नवाब की मेहराबदार झरोखे युक्त हवेलियाँ है, जो मुस्लिम शैली की परिचायक है। शेरशाह ने पूर्व स्थापित गढ़ के बाहर एक ओर किले का निर्माण भी करवाया। वर्तमान में इस किले और आसपास के वन क्षेत्र में रख-रखाव कि कमी के कारण सत्यानाशी (lantana) का लंघन बढ़ता जा रहा है। किले के ऊपर से देखने पर दूर-दूर तक सत्यानाशी कि सदाबहार पुष्पजनक झाड़ियों का आक्रामक फैलाव अन्य वनस्पतियों को पनपने नहीं देता। कुछ वर्ष पूर्व यहाँ पांच हज़ार पुराने प्राचीन सभ्यता के अवशेष मिले है, जो मनुष्य के प्रारंभिक पाषाण युग के माने गए है। पुरातत्ववेत्ताओं द्वारा इस क्षेत्र में सिन्धु घाटी सभ्यता की उपस्थिति व्यक्त की गई है। (Source: Jain,K.C (1972). Ancient cities and Towns of Rajasthan: A study of Culture and Civilization. Motilal Banarsidass,Delhi)

परवन नदी से शेरगढ़ किले का दृश्य (फोटो: डॉ कृष्णेंद्र सिंह नामा)

अभयारण्य के अरण्य

प्रशासनिक रूप से यह अभयारण्य बारापाती ‘A’, छोटा डूंगर, बड़ा डूंगर, नहारिया और टीकली नामक वनों के 5 ब्लॉक्स में बंटा हुआ है। इस जंगल में खैर (Acacia catechu), धौंक (Anogeissus pendula), करौंदा (Carrisa congesta) एवं बांस (Dendrocalamus strictus) के घने वितानधारी वृक्ष है। शैवाल, कवक, ब्रायोफाइट्स, टेरिडोफाइट्स और आवर्तबीजीय पादपों की विभिन्न प्रजातियाँ यहाँ की विविधता का आभास कराती है। यही नहीं यह अभयारण्य कंदील पौधों व लताओं का भंडार है। इस जंगल की सुरपा घाटी एवं आर्द्र नालों को औषधीय महत्व के पौधों का अजायबघर कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी।

शेरगढ़ के जंगल उत्तरी ऊष्ण कटिबंधीय शुष्क मिश्रित पर्णपाती वनों की श्रेणी में आते है यहाँ की मुख्य वृक्ष प्रजातियाँ खैर (Acacia catechu), महुआ (Madhuca indica), आंवला (Emblica officinalis), गुरजन (Lannea coromandelica), धावड़ा (Anogeissus latifolia), सालर (Boswellia serrata), खिरनी (Manilkara hexandra), करंज (Pongamia pinnata), बहेड़ा (Terminalia bellirica), अर्जुन (Terminalia arjuna), आम (Mangifera indica), बरगद (Ficus religiosa) व बांस(Dendrocalamus strictus) है। चिरौंजी (Buchanania lanzan) के दुर्लभ वृक्ष भी यहाँ पाए जाते है। पीले फूलों वाली पलाश की किस्म (Butea monosperma var. lutea), गम्हड़ (Gmelina arborea) और गधा पलाश (Erythrina suberosa) यहाँ के विशिष्ट आकर्षण है।

वन्यजीवों का जल श्रोत सूरपा माला (फोटो: डॉ कृष्णेंद्र सिंह नामा)

अभयारण्य के वन्यजीव

शेरगढ़ अभयारण्य हमेशा से अपने वन्यजीवों के लिए जाना जाता रहा है। तात्कालिक शेरगढ़, कोटा रियासत के महारावों द्वारा बाघों का शिकार करने के लिए पसंदीदा आखेट स्थल रहा, जिसके प्रमाण यहाँ स्थित शिकार माले है। 19 अप्रैल 1920 को महाराज गंगा सिंह द्वारा हस्तलिखित डायरी में शेरगढ़ के आस-पास के क्षेत्रों से 11 बाघों के शिकार से सम्बन्धित वृतांत का उल्लेख किया गया है जो संभवतः कोटा रियासत के किसी भी अन्य मेहमान की तुलना में सर्वाधिक है। 70 के दशक के अंत तक शेरगढ़में बाघ पाए जाते थे, किन्तु अवैध शिकार के चलते प्रारंभिक 80 के दशक में ये यहाँ से विलुप्त हो गए। इसके बाद पैंथर यहाँ की खाद्य श्रृंखला के शीर्ष पर रहे जो लगभग एक दशक पूर्व तक खासी तादाद में यहाँ पाए जाते थे, परन्तु किन्ही अज्ञात कारणों से विलुप्त हो गए। यह जंगल पैंथर के लिए एक मुफ़ीद प्राकृतवास है। अतः यह क्षेत्र पैंथर पुनर्वास के लिए पूर्णतः उपयुक्त है। हाल ही में इस क्षेत्र में भेड़िये की उपस्थिति दर्ज की गयी, जिसे भी यहाँ से विलुप्त मान लिया गया था।

आज यह विभिन्न वन्य प्राणियों की संरक्षण एवं आश्रय स्थली है। हायना, जैकाल, जंगली बिल्ली, स्माल इंडियन सीवेट, लोमड़ी, वाइल्ड बोर, चिंकारा और चीतल, नेवला, सेही व खरहा इत्यादि शेरगढ़ के मुख्य वनचर है।

अभयारण्य को दो असमान भागों में विभाजित करती परवन नदी की कन्दराएँ मगरमच्छों एवं अन्य जलीय जीवों के लिए आदर्श पर्यावास उपलब्ध करती कराती है जबकि नदी में मिलने वाले नालों के रेतीले किनारे इन मगरों के उत्तम प्रजनन स्थान है।

शेरगढ़ अभयारण्य में विचरण करता भेड़िया (फोटो: श्री बनवारी यदुवांशी)

शेरगढ़ अभयारण्य में पक्षियों की 200 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती है। जिनमें से कुछ आइ.यू.सी.एन. की लाल आंकड़ों की किताब (Red data book) की विशिष्ट श्रेणियों में रखा गया है। जैसे- व्हाइट-बेलीड मिनिवेट, इंडियन ब्लैक आइबीस Near Threatened श्रेणी में; पेंटेड स्टोर्क, व्हाइट-विंगड ब्लेक टिट, एशियन ओपन-बिल्ड स्टोर्क, व्हाइट-वल्चर, किंग वल्चर, रेड-नेक्ड फाल्कन Vulnerable श्रेणी में; स्पूनबिल, ओस्प्रे, इंडियन पीफाउल Threatened श्रेणी में रखे गए है। साथ ही नदी की ओर अभिमुख शेरगढ़ दुर्ग की पहाड़ी की कराइयों में संकटग्रस्त लॉन्ग-बिल्ड वल्चर की कॉलोनी है। मानसून ऋतु में नवरंग पक्षी (Indian Pitta) एवं शाह बुलबुल (Paradise Flycatcher) को देखने के लिए शेरगढ़ संभवतः हाड़ौती का सबसे अच्छा स्थान है।

विभिन्न सरीसृप प्रजातियाँ शेरगढ़ की विशेषता मानी जाती है, जिनके रहते यहाँ स्नेक पार्क के निर्माण का प्रस्ताव पारित किया गया है। विशाल अज़गर से लेकर अत्यंत विषैले कोबरा व करैत जैसे सांप यहाँ सरलता से देखे जा सकते है।

अभयारण्य के अन्य आकर्षण

परि-पर्यटन की दृष्टि से शेरगढ़ को हाड़ौती का सर्वोत्तम स्थान माना जा सकता है। राजस्थान में परि-पर्यटन (eco-tourism) के उत्थान के लिए सरकार ने कई महत्त्वपूर्ण कार्य किए। जिसमें शेरगढ़ किले का जीर्णोद्धार भी शामिल है। शेरगढ़ किले के साथ यहाँ स्थित पाड़ा खोह, पांच तलाई अन्चोली डैम, नहारिया, अमलावाड़ा, टीकली जैसे वाच टावर व व्यू पॉइंट दर्शनीय है। इको-ट्रेल्स जंगल का निकट व सहज अनुभव प्रदान करती है।

कुंडा खोह जल प्रपात (फोटो: डॉ कृष्णेंद्र सिंह नामा)

इनके साथ-2 तपस्वियों की बगिची,भंड-देवरा मंदिर, काकूनी मंदिर श्रृंखला, सूरज कुण्ड, सोरसन संरक्षित क्षेत्र, नाहरगढ़ किला, कन्या देह– बिलास गढ़, कपिल धारा व गूगोर का किला भी ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक धरोहरों के रूप में प्रमुख आकषर्ण के केंद्र है, जो शेरगढ़ की खूबसूरती में चार चाँद लगाते है।