क्या राजस्थान में भी ऑर्किड होते हैं?

क्या राजस्थान में भी ऑर्किड होते हैं?

ऑर्किड़ वानस्पतिक कुल ऑर्किडेसी के सदस्य होते हैं। वानस्पतिक जगत में कैक्टस एवं ऑर्किड अपने खूबसूरत फूलों के लिये जाने व पसंद किये जाते हैं। कैक्टस जहाँ सूखी व गर्म जलवायु पसंद करते हैं वहीं आर्किड नम एवं ठंडी जलवायु चाहते हैं। राजस्थान के बारे में सामान्य जानकारी रखने वाला सुदूर रहने वाला गैर-राजस्थानी प्रायः यही धारणा रखता है कि राजस्थान एक सूखा, रेगिस्तानी, तपता हुआ राज्य होगा। लेकिन यह सत्य नहीं है। जैसे ही ऐसी धारणा वाले लोगों को पता चलता है कि राजस्थान में खूबसूरत फूल देने वाले ऑर्किड भी अच्छी खासी संख्या में उगते हैं तो उनका चौंकना लाजिमी है। आइये आपको मिलाते है राजस्थान के सुन्दर ऑर्किडों से जो जगह-जगह जंगलों को आबाद किये हुऐ हैं।

राजस्थान में 10 वंश के 19 प्रजातियों के आर्किड अभी तक ज्ञात हो चुके हैं। इनमे थलीय आर्किडों की 13 तथा उपरिरोही आर्किडों की 6 प्रजातियाँ ज्ञात हैं। हैबेनेरिया वंश के ऑर्किड राजस्थान में सर्वाधिक ज्ञात हैं। इस वंश की 5 प्रजातियों को अभी तक राजस्थान  से ढूँढा जा चुका है।

नीचे प्रस्तुत सारणी मे राजस्थान के ऑर्किडों की एक झलक मिलती है:

क्र.सं.  आवास प्रजातियाँ  मिलने के कुछ ज्ञात स्थान
1.उपरिरोहीएकैम्पे प्रेमोर्सा (Acampe praemorsa) सीतामाता अभ्यारण्य, फुलवारी की नाल अभ्यारण्य, फलासिया क्षेत्र अन्तर्गत नला गाँव के वन क्षैत्र आदि
2.उपरिरोहीएरीडीज क्रिस्पम (Aerides crispum) बाँसवाडा वन क्षेत्र, फुलवारी की नाल अभ्यारण्य, उदयपुर जिले के वन क्षेत्र, माउन्ट आबू, डुँगरपुर वन क्षेत्र, सीतामाता अभ्यारण्यआदि
3.उपरिरोहीएरीडीज मैक्यूलोसम
(Aerides maculosum)
सिरोही, फुलवारी की नाल, नला गाँव के क्षेत्र (फलासिया रेंज) आदि
4.उपरिरोहीएरीडीज मल्टीफ्लोरम (Aerides multiflorum) माउन्ट आबू
5.उपरिरोहीवैन्डा टैसीलाटा(Vanda tessellata) सांगबारी भूतखोरा, पीपल खूँट, पूना पठार (सभी बाँसवाडा जिले के वन क्षेत्र), फुलवारी की नाल, सीतामाता माउन्ट आबू, शेरगढ अभ्यारण्य बाँरा जिला में सीताबाडी, मुँडियार नाका के जंगल, कुण्डाखोहय  प्रतापगढ वन मंडल के वन क्षेत्र आदि
6.उपरिरोहीवैन्डा टैस्टेशिया(Vanda testacea)   माउन्ट आबू
7.थलीय ऑर्किडएपीपैक्टिस (Epipactis veratrifolia) मेनाल क्षेत्र
8.थलीय ऑर्किडनर्वीलिया  ऑरैगुआना(Nervilia aragoana)सीतामाता अभयारण्य, फुलवारी की नाल अभयारण्य, नला गाँव के आस पास के वन क्षेत्र (रेंज फलासिया एवं उदयपुर) आदि
9.थलीय ऑर्किडजुक्जाइन स्ट्रेटूमैटिका (Zeuxine strateumatica) मांगरोल, अटरू (बाँरा), कुम्भलगढ अभयारण्य, निवाई, दुर्गापुरा (जयपुर), मेजा बाँध (भीजवाडा), झोला (बाँसवाडा), दौसा, टॉडगढ (अजमेर), खाजूवाला (बीकानेर), 34 जी.बी. (श्रीगंगानगर) आदि
10.थलीय ऑर्किडयूलोफिया ऑक्रीएटा (Eulophia ochreataघाटोल रेंज के वनक्षेत्र, माउन्ट आबू, सीतामाता अभयारण्यय पट्टामाता (तोरणा प्), तोरणा प्प् (रेंज ओगणा, उदयपुर), फुलवारी की नाल अभयारण्य, कुम्भलगढ अभयारण्य, गौरमघाट (टॉडगढ-रावली अभयारण्य) आदि
11.थलीय ऑर्किडयूलोफिया हर्बेशिया(Eulophia herbacea)  गामडी की नाल एवं खाँचन की नाल (फुलवारी अभयारण्य)
12.थलीय ऑर्किडहैबेनेरिया डिजिटाटा(Habenaria digitata)   सीतामाता अभयारण्य, शाहबाद रेंज वन क्षैत्र, माउन्ट आबू आदि
13.थलीय ऑर्किडहै. मार्जिनाटा(H. marginata) माउन्ट आबू अभयारण्य
14.थलीय ऑर्किडहै.फर्सीफेरा(H. furcifera) फुलवारी की नाल अभयारण्य, कुम्भलगढ अभयारण्य,  गोगुन्दा तहसील के वन क्षेत्र एवं घास के बीडे, सीतामाता अभयारण्य आदि
15.थलीय ऑर्किडहै.प्लैन्टीजीनिया(H. plantaginea) उभेश्वर वन क्षेत्र (उदयपुर)
16.थलीय ऑर्किडहै.लॉन्गीकार्नीकुलेटा(H. longicorniculata)माउन्ट आबू अभयारण्य, गोगुन्दा व झाडोल रेंज के वन क्षेत्र (उदयपुर), कुम्भलगढ अभयारण्य
17.थलीय ऑर्किडपैटीस्टालिस स्टोक्सी ( Peristylus stocksy)माउन्ट आबू
18.थलीय ऑर्किडपैरीस्टाइलिस कॉन्सट्रिक्ट्स (Peristylus constrictus)सीतामाता एवं फुलवारी की नाल अभयारण्य
19.थलीय ऑर्किडजीयोडोरम रीकर्वम(Geodorum recurvum)  सीतामाता अभयारण्य

ऑर्किडों की दृष्टी से राजस्थान में माउन्ट आबू, फुलवारी की नाल (फुलवाडी की नाल) एवं सीतामाता अभयारण्य सबसे समृद्ध हैं। इन तीनों अभ्यारण्यों में जलीय एवं उपरिरोही दोनों स्वभावों वाले ऑर्किड पाये जाते हैं। शेरगढ अभयारण्य मे भी दोनों स्वभावो वाले ऑर्किड पाये जाते हैं। कुम्भलगढ एवं टॉडगढ रावली अभ्यारण्यों में केवल थलीय आर्किडों की उपस्थिती दर्ज है। इस तरह अभी तक राजस्थान के निम्न तरह कुल 6 अभयारण्यों में आर्किडों की निश्चायत्मक उपस्थिती दर्ज हुई है:

क्रमांक संरक्षित क्षेत्र का नाम ऑर्किडों का प्रकार
1.          माउन्ट आबू अभयारण्यवृक्षिय (उपरिरोही) एवं थलीय
2.      फुलवारी की नाल अभयारण्य वृक्षिय (उपरिरोही) एवं थलीय
3.       सीतामाता अभयारण्य  वृक्षिय (उपरिरोही) एवं थलीय
4. शेरगढ अभयारण्यवृक्षिय (उपरिरोही) एवं थलीय
5.        कुम्भलगढ अभयारण्य  थलीय
6.        टॉडगढ रॉवलीअभयारण्य थलीय

राजस्थान में ऑर्किडों का सबसे सघन जमावडा गुजरात सीमा पर स्थित उदयपुर जिले की कोटडा एवं झाडोल तहसीलों में फैली फुलवारी की नाल अभयारण्य में पाया जाता है। यहाँ कटावली जेर नामक स्थान मे अम्बावी से लेकर डैया व कवेल तक महुआ कुंजों मे उपरिरोही ऑर्किडों की विद्यमानता से बना प्राकृतिक ’’ ऑर्किडेरियम’’ देखने लायक है। मध्य जून से मध्य अगस्त तक यहाँ ऑर्किडों के फुलों को देखने का आनन्द लिया जा सकता है। मानसून के जल्दी या विलम्ब से आने एवं हवा की नमी की स्थानीय अवस्थायें पुष्पन को थोडा आगे-पीछे कर देती हैं। इसी अभयारण्य में अम्बावी से अम्बासा तक की यात्रा में भी उपरिरोही  ऑर्किडों को पुष्पन काल में देखने का आनन्द लिया जा सकता है। फुलवारी की नाल में गामडी की नाल एवं खाँचन की नाल में जगह – जगह स्थलीय ऑर्किडों को जून से सितम्बर तक देखा जा सकता है।

सीतामाता एवं माउन्ट आबू अभयारण्य भी अपने आर्किडों हेतु जाने जाते हैं। सीतामाता अभयारण्य में आम, चिरौंजी एवं महुओं पर उपरिरोही ऑर्किडों की अच्छी उपस्थिती दर्ज है। वाल्मिक आश्रम से सीतामाता मंदिर के रास्ते के दोनों तरफ, आरामपुरा एवं जाखम डैम रोड के आस- पास के क्षेत्र उपरिरोही ऑर्किडों के सुन्दर आश्रय स्थल हैं। वाल्मिकी आश्रम के आसपास का क्षेत्र थलीय ऑर्किडों को देखने का अद्भुत स्थान है। यहाँ वर्षा ऋतु में थलीय ऑर्किडों की मनोहारी झाँकी अद्भुत होती है। खास कर नर्वीलिया ऑरैगुआना का जून माह में पुष्पन तथा वर्षा का दौर प्रारंभ होते ही पत्तियों की फुटान का दृश्य अतुलनीय नजारा पेश करते हैं।

माउन्ट आबू में उपरीरोही ऑर्किड खजूरों, एरीथ्रीना, आम, जामुन आदि पर मिलने हैं। यहाँ ऑर्किडों के पनपने की सबसे अनुकूल प्राकृतिक दशायें विद्यमान हैं। विभिन्न ट्रेलों पर भ्रमण के दौरान लैन्टाना की झाड़ियों मेें छुपे एवं घासों में स्थित थलिय ऑर्किड वर्षाकालीन भ्रमण का आनंद बढा देते हैं।

शेरगढ अभयारण्य में महुओं पर उपरिरोही ऑर्किड जगह – जगह मिलते हैं। बाराँ जिले की शाहबाद तहसील में जायें तो वैन्डा, टैसीलाटा ऑर्किड महुओं व चिरौंजी के बडे आकार व पुराने वृक्षों पर आसानी से देखे जा सकते हैं।

वन विभाग, राजस्थान ने अपनी आर्किड संपदा को परिस्थितिकी पर्यटन से जोडने का गंभीर प्रयास किया है। वन मण्डल उदयपुर (वन्यजीव) अन्तर्गत फुलवारी की नाल अभयारण्य में पानरवा रेंज अन्तर्गत वन विश्राम गृह के पास एक छोटा ऑर्किडेरियम (आर्किड उद्यान) स्थापित किया है जहाँ राजस्थान के ऑर्किडों का संग्रह किया गया है। इस उद्यान का उद्घाटन तत्कालीन वन मंत्री श्री गजेन्द्र सिंह खींवसर ने 18 अगस्त, 2017 को किया था। इस उद्यान को जून से सितम्बर तक देखना आनन्ददायक होता है क्योंकि उस समय यहाँ आर्किडों में सुन्दर रंग – बिरंगे फूल आ जाते हैं।

ऑर्किडों के प्रति जन – जागृति लाने एवं राजस्थान के ऑर्किडों की जानकारी जन सामान्य को देने हेतु 27 से 29 जुलाई, 2018 के उदयपुर में सज्जनगढ अभयारण्य के मुख्य द्वार के सामने ’’आर्किड प्रदर्शनी’’ भी वन विभाग द्वारा लगाई गई जिसमें राजस्थान के ऑर्किडों का आम जनों को दिग्दर्शन कराया गया।

सार  रूप में हम कह सकते हैं राजस्थान की जलवायु भले ही सूखी और गर्म हो लेकिन यहाँ 19 प्रजातियों के ऑर्किड पाये जाते हैं जिनका सार निम्न हैः

क्र.सं.आवास वंशजातियाँ
1.उपरिरोहीअकम्पे मोरसा1
2.उपरिरोहीएरीडीज3
3.उपरिरोहीवैन्डा 2
4.थलीयऐपीपैक्टिस 1
5.थलीयनर्वीलिया1
6.थलीयजुक्जाइन1
7.थलीययूलोफिया2
8.थलीयहैबेनेरिया  5
9.थलीयपैरीस्टाइलिस2
10.थलीयजीयोडोरम  1

राजस्थान के वनों में और ऑर्किड प्रजातियाँ मिलने की प्रबल संभावना है। फुलवारी, सीतामाता, कुम्भलगढ, माउन्ट आबू एवं शेरगढ अभयारण्यों एवं उनके आस- पास (खास कर झाडोल, कोटडा, गोगुन्दा एवं शाहबाद तहसीलो के वन क्षेत्र) के वनों में गहन अध्ययन एवं सर्वेक्षण की जरूरत है क्योंकि यहाँ की सूक्ष्म जलवायु जगह-जगह आर्किडों हेतु बहुत उपयुक्त है। आशा है आने वाले वर्षों में हमें राजस्थान मे नए आर्किडों का और पता चल सकेगा।

संदर्भ: इस लेख की अधिकांश सूचनाऐ लेखक की प्रकाशित निम्न पुस्तक पर आधारित हैं:

Sharma, S.K. (2011): Orchids of Desert and Semi – arid Biogeographic Zones of India

राजस्थान में फैलने वाली नयी विदेशी वनस्पतियां

राजस्थान में फैलने वाली नयी विदेशी वनस्पतियां

वैसे तो खरपतवार की परिभाषा कोई आसान नहीं है परन्तु फिर भी खरपतवार वे अवांछित पौधे होते हैं जो किसी स्थान पर बिना बोए उगते हैं। ये खरपतवार मुख्यरूप से विदेशी मूल की वनस्पत्तियाँ होती है तथा इसीलिए पारिस्थितिक तंत्र में इनके विस्तार को सिमित रखने वाले पौधे व् जानवर नहीं होते हैं। ये पौधे स्थानीय मनुष्य समुदाय के कोई खास उपयोग में नहीं आते, तथा मनुष्यों, खेती, वनों व पयार्वरण पर बुरा प्रभाव डालते है। खरपतवार मुख्यतः दो प्रकार के होते हैं – एक वे जो स्थानीय पौधों के प्रति आक्रामक रूख अपनाते हैं जैसे ममरी (जंगली तुलसी), लैन्टाना कमारा (बेशर्म), प्रोसोपिस जूलीफ्लोरा (विलायती बबूल) आदि। दूसरी श्रेणी के खरपतवार वे हैं जो स्थानीय पौधों के साथ प्रतियोगिता कर उनके विकास को रोकते है लेकिन आक्रामक रूख प्रदर्शित नहीं करते हैं।  

आज राजस्थान में कई विदेशी वनस्पतियां फैल रहीं हैं जिनके बारे में अभी शोध किया जाना बाकी है जैसे जंगली तुलसी (Hyptis suaveolens) और छोटी फली का पुँवाड (Cassia absus/Senna uniflora)।

जंगली तुलसी (Hyptis suaveolens) वत Mesosphaerum suaveolens

जंगली तुलसी (ममरी), तुलसी यानी लेमियेशी (Lamiaceae) कुल की वनस्पति है तथा इसका वैज्ञानिक नाम हिप्टिस सुवियोलेन्स (Hyptis suaveolens) हैं। यह अमेरिका के गर्म प्रदेशों की वनस्पति है परन्तु आज यह तेजी से हमारे देश के वनों, खेतों, शहरों, गाँवों, सडक व रेल मार्गों के किनारे तथा पडत भूमि में फैलता जा रहा है। इसे राजस्थान सहित कर्नाटक, आन्ध्रप्रदेश, तेलंगाना, महाराष्ट्र, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ, गुजरात आदि राज्यों में दूर-दूर तक फैले हुए देखा जा सकता है। भारतीय पारिस्थितिक तंत्र में यह तेजी से प्राकृतिक (Naturalized) होती जा रही है। घने जंगलों से होकर जैसे ही नई सडकें बनाई जाती है तब वृक्ष छत्रों के हटने से प्रकाश भूमि तक पहुँचता है और यदि ऐसे में कहीं से भी इसके बीज प्रकीर्णन कर वहां पहुँच जायें तो यह तेजी से सडक के दोनों तरफ उग जाती है। यह सुंगधित, वार्षिक तथा शाकीय वनस्पति है जो 2 मीटर तक ऊँची होती है एवं पास-पास उग कर सघन झाड-झंखाड (Thickets) का रूप ले लेती है। इसका तना चौकोर, दृढ एवं रोमों से ढका हुआ होता है। इसके फूल 2 से 5 के गुच्छों में शाखाओं पर लगते हैं तथा यह सालभर फूल व फल देता है लेकिन विशेष रूप वर्षा ऋतु से लेकर गर्मी आने तक हरा भरा रहता है। इसके बीज पानी में डालने पर सफेदी लेते हुये फूल जाते हैं।

जंगली तुलसी “Hyptis suaveolens” (फोटो: प्रवीण कुमार)

चराई रोधक प्रजाति

तीव्र गंध के कारण पालतू या वन्य पशु इसे नहीं खाते अतः जहाँ भी यह वनस्पति भी उगी होती है चराई से सुरक्षित रहती है।

वानिकी गुण

यह अधिक प्रकाश में उगने वाली, चराई प्रतिरोधी वनस्पति है जो अपेक्षाकृत अधिक नमी वाले स्थानों पर उगती है। इस वनस्पति का प्रत्येक पौधा बडी संख्या में फूल, फल व बीज पैदा करता है। एक हैक्टयर में उगे पौधे लाखों बीज पैदा करने की क्षमता रखते हैं। चराई से बचे रहने के कारण इस प्रजाति का हर पौधा बीज पैदा करता है। इस तरह प्रतिवर्ष इस प्रजाति के पौधों की संख्या व विस्तार क्षेत्र बढता ही जाता है।

हानिकारक प्रभाव

जंगली तुलसी के पौधे पास-पास उगने एवं 2.0 मी तक लम्बे होने के कारण, घास व अन्य कम ऊँचाई के स्थानीय पौधों तक प्रकाश नहीं पहुँचने देते है। पानी एवं स्थान की प्रतियोगिता कर यह स्थानीय प्रजातियों के विकास को रोकते है फलतः घास एवं स्थानीय पौधे सामाप्त होने लगते हैं। जिसके कारण चारे की कमी होने लगती है एवं आवास बर्बाद हो जाता है। इन सबसे न केवल पालतु बल्कि वन्यजीवों पर भी बुरा प्रभाव पडता है। इस प्रजाति की वजह से जैव विविधता घटने लगती है। यह वन्यजीवों के आवासों व चारागाहों को भी बर्बाद कर देता है।

छोटी फली का पुँवाड (Senna uniflora/Cassia absus)

राजस्थान में फैलने वाली यह सबसे नयी खरपतवार है जो दक्षिणी एवं मध्य भारत में दूर-दूर तक फैल गयी है। संभवतः मध्यप्रदेश एवं गुजरात के क्षेत्रों से चरकर आने वाली भेडों द्वारा यह खरपतवार राजस्थान में आयी है। अभी तक यह हाडोती क्षेत्र में फैलती हुई मेवाड एवं वागड क्षेत्र (डूंगरपुर एवं बांसवाडा) में दस्तक दे चुकी है। उदयपुर जिले में वर्ष 2019 तक यह मंगलवाड से डबोक के बीच राष्ट्रीय उच्च मार्ग के दोनों तरफ जगह-जगह नजर आने लगी है। संभवतः राष्ट्रीय उच्च मार्ग के निर्माण कार्य हेतु कई जगहों से लाई गई मिट्टी व भारी उपकरणों के साथ इसके बीज उदयपुर जिले में प्रवेश कर गए हैं। इसके फैलाव को देखते हुए यह प्रतीत होता है की अगले कुछ ही वर्षाे में यह खरपतवार उदयपुर शहर तक पहुँच जाएगी। यह वनस्पति भी आसपास के क्षेत्र में स्थानीय घासों एवं छोटे कद के शाकीय पौधों को नहीं पनपने देती है।

छोटी फली का पुँवाड “Senna uniflora” (फोटो: प्रवीण कुमार)

नियन्त्रण:

  • वर्षा ऋतु में जब पौधों में फूल आने लगे तब ही (बीज बनने से पहले) उखाड कर ढेर में संग्रह किये जाने चाहियें। छोटे-छोटे क्षेत्रों से हटाने की बजाय खेतों, वनों, आबादियों से पूरे परिदृश्य में नियन्त्रण प्रांरभ करना चाहिये।
  • इनको काट कर ढालू क्षेत्रों में ऊपर की तरफ नहीं बल्कि सबसे निचले क्षेत्रों में पटकना चाहिये ताकी बीजों का पानी से प्रकीर्णन न हो। इनका उन्मूलन पहाडी क्षेत्रों में ऊपर से नीचे की तरफ तथा समतल क्षेत्रों में केन्द्र से परिधि की तरफ बढना चाहिये। नदियों के किनारे जल ग्रहण के ऊपरी क्षेत्रों से नीचे की तरफ उन्मूलन संपादित करना चाहिये।
  • इनको काट कर या जलाकर नहीं बल्कि जड सहित उखाड कर नष्ट किया जाना चाहिये।
  • वनों की निरन्तरता में जहाँ खेत हैं वहाँ वन व खेत की सीमा मिलन स्थल पर गहरी खाई बना देनी चाहिये ताकि वन क्षेत्र के पानी के साथ बह कर आये बीज खेत में नही बल्कि खाई में गिर जावें एवं खेत में प्रसार न करें।
  • एक बार हटाने के बाद हर साल वर्षा में अनुसरण करें तथा नये उगने वाले पौधों को उसी साल उखाड कर नष्ट कर दें। यह सब फूल व बीज बनने से पूर्व किया जावे।

 

यूँ तो विदेशी पौधों की लंबी सूची है लेकिन राजस्थान में पाए जाने वाली कुछ दुर्दान्त विदेशी मूल के खरपतवार निम्न हैं

क्र.सं

आवास

नाम 

फैलाव के मुख्य क्षेत्र

1

थलीय

विलायती बबूल (Prosopis juliflora)

लगभग संपूर्ण राजस्थान

2

थलीय

गाजर घास (Parthenium hysterophorus)

अतिशुष्क क्षेत्रों को छोडकर लगभग संपूर्ण राजस्थान

3

थलीय

बेशर्म (Lantana camara

नमी युक्त वन क्षेत्र, घाटियाँ, पहाडियों के निचले ढाल, नदी-नालों के नमी युक्त तट, जलाशयों के आसपास एवं आबादी क्षेत्र

4

थलीय  

सफेद बेशर्म (Lantana wightiana

अरावली पर्वतमाला के ढाल व तलहटी क्षेत्रों में

5

थलीय 

पुँवाड (Cassia tora)

अति शुष्क क्षेत्रों को छोडकर लगभग संपूर्ण राजस्थान

6

थलीय

जंगली तुलसी,ममरी (Hyptis suaveolens)

हाड़ौती क्षेत्र, बांसवाडा, डूंगरपुर, प्रतापगढ, भीलवाडा, चित्तौडगढ एवं राजसमन्द जिलों के क्षेत्र

7

थलीय

छोटी फली का पुँवाड (Cassia uniflora)

हाड़ौती क्षेत्र, बांसवाडा, डूंगरपुर, प्रतापगढ, भीलवाडा, उदयपुर, चित्तौडगढ

8

जलीय

जल कुंभी (Eichhornia crassipes )

हाड़ौती के जलाशय, उदयपुर के जलाशय, सिलीसेढ (अलवर), भरतपुर के जलाशय

 

 

आकल जीवाश्म उद्यान, जैसलमेर

आकल जीवाश्म उद्यान, जैसलमेर

आकल जीवाश्म उद्यान (Akal Fossil Park or Akal Wood Fossil Park)  राजस्थान का एक दर्शनीय स्थान है। यह उद्यान जैसलमेर-बाडमेर रोड पर जैसलमेर से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित है तथा 21 हैक्टेयर क्षेत्र में फैला हुआ है। यहाँ जुरैसिक काल के प्रारंभिक चरण में कोई 180 मिलियन यानी 18 करोड वर्ष पूर्व डायनासोरों के युग में समुद्र में बने जीवाश्म इधर -उधर छितरी  अवस्था में देखे जा सकते हैं। वन विभाग, राजस्थान इस पार्क की देखभाल करता है। वैसे तो यहाँ भूमि की सतह पर वृक्षों के तने, फल, बीज, घोंघों आदि के जीवाश्म बिखरे पडे हैं लेकिन यहाँ 25 वृक्षों की तने की लकडी के जीवाश्म विशेष रूप से दर्शनीय हैं जिनमे 10 बहुत स्पष्टता से नजर आते हैं। उनमे एक तो 7.0 मी लंबा व 1.5 मी चौडा है।

कुछ जीवाश्मों को जो अधिक अच्छी स्थिति में हैं तथा आकार में बडे हैं, इनको सुरक्षा देने हेतु उन्हें चारो तरफ व ऊपर जाली से ढक कर अतिरिक्त सुरक्षा प्रदान की गई है। कुछ जीवाश्म खुले भी रखे गये हैं। यहाँ बडे जीवाश्मों को यथास्थिती (मूल स्थिती) में प्रदर्शित किया गया है लेकिन छोटे जीवाश्मों व बडे जीवाश्मों के टुकडों को एक ‘‘जीवाश्म म्यूजियम’’ में प्रदर्शित किया गया है। बडे वृक्षों के तने के जीवाश्म भूमि पर लेटी अवस्था में विद्यमान हैं। ऐसा माना जाता है कि राजस्थान के पश्चिमी भाग में प्राचीन समय मे टैथिस महासागर था जिसमें अनेक नदियां गिरती थी। नदियों के तटों तथा जलग्रहण क्षेत्र में सघन वन थे जिनमें चीड, देवदारू आदि के रिश्तेदार जिम्नोस्पर्म वर्ग के ऊँचे – ऊँचे वृक्षों की काफी बहुतायतता थी। इसी वर्ग का एक पौधा ऑरोकैरियोक्सीलोन बीकानेरेन्स बीकानेर जिले में मिला है। तेज वर्षा के समय भूमि कटाव व बाढ की स्थिति में खडे वृक्ष उखड जाते थे तथा क्षैतिज पडी अवस्था में बहते-बहते समुद्र में पहुँच जाते थे। उनके नर्म भाग जैसे पत्ते आदि शीघ्र सड जाते थे लेकिन लकडी, फल-बीज आदि दृढकोत्तकों से बने कठोर भाग धीरे- धीरे सडते थे। ऊपर से बहकर आयी गाद में दबे, धीरे -धीरे सडते अनेक वृक्षों के कठोर भाग ’’पैट्रीफिकेशन’’ प्रक्रिया के दौरान अपने शरीर के मूल तत्वों को सिलिका व अन्य लवणों से विस्थापित होने की प्रक्रिया से गुजरे। पर्त-दर-पर्त गाद के नीचे दबने से भारी दबाव के कारण उनके सडने से बचे रह गऐ भाग पत्थरों में बदल गये जो आज जीवाश्मों के रूप में मिलते हैं। इन जीवाश्मों की आन्तरिक सूक्ष्म रचना इनकी मूल संरचना सेे हूबहू मिलती है। जीवाश्मों के अलावा राजस्थान के रेगिस्तान व गुजरात के कच्छ में डीजल-पैट्रोल, गैस एवं कोयला जगह-जगह मिलते हैं जो यहाँ प्राचीन काल में जीवन होने के स्पष्ठ संकेत हैं। ये सब चीजें जीव-जन्तु व पेड-पौधों के समुद्र में गाद की पर्तो के नीचे बहुत गहराई में दबने से बनती हैं। वास्तव में राजस्थान का रेगिस्तान व गुजरात का कच्छ क्षेत्र प्राचीन जीवन के प्रमाणों से भरे पडे हैं।

जीवाश्मों के बनने में समुद्रों की भूमिका बहुत अहम होती है। ऐसा जगह – जगह देखने को मिलता है। टैथिस सागर की तरह ही आज के अरब सागर की एक शाखा गुजरात के दक्षिणी भाग से होती हुई आज के मध्य प्रदेश में नर्मदा नदी की घाटी में दूर तक फैली हुई थी। सागर की इस शाखा में भी गिरने वाली नदियों में बह कर आये पेड – पौधों व जीव जन्तुओं के जीवाश्म, उसी तरह बने जैसे राजस्थान में बने। यहाँ के जीवाश्मों की एक झलक मध्य प्रदेश के डिन्डोरी जिले में स्थित फॉसिल नेशनल पार्क, घुघुवा में ली जा सकती है। इस उद्यान की देखभाल मध्यप्रदेश वन विभाग द्वारा की जाती है। यहाँ 65 मिलियन वर्षों पूर्व के जीवाश्म देखे जा सकते हैं। लेकिन आकल जीवाश्म उद्यान के जीवाश्म कहीं अधिक प्राचीन हैं, अतः उनका अपना अलग ही महत्व है।

राजस्थान का राज्य पुष्प रोहिड़ा एवं उसकी अद्भुत परागण प्रक्रिया

राजस्थान का राज्य पुष्प रोहिड़ा एवं उसकी अद्भुत परागण प्रक्रिया

कभी फूलों के चटकीले रंग तो कभी उनकी मधुर सुगंध मधुमक्खियों, भँवरों, तितलियों और पक्षियों को अपनी ओर आकर्षित करती है जो फूलों का मकरंद पीते है,और परागण की महत्वपूर्ण प्रक्रिया में सहायता करते हैं। परागण एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें पुष्प के नर भाग-पुंकेसर से परागकण, किसी माध्यम (हवा, पानी , पक्षी, कीट आदि ) से फूल के मादा भाग स्त्रीकेसर तक पहुँचते हैं और अंडाशय में बीजो को निषेचित करता है।

राजस्थान के मरुस्थल में जब रोहिड़े के पेड़ पीले, नारंगी और लाल रंग के फूलों से भर जाते हैं तो इस दौरान इन फूलों पर मंडरा रहे रेड-वेंटेड बुलबुल (Pycnonotus cafer) और पर्पल सनबर्ड (Cinnyris asiaticus) के बीच एक दिलचस्प व्यवहार देखने को मिलता है, यह व्यवहार परागण की प्रक्रिया के कई दिलचस्प पहलुओं पर प्रकाश डालता है।

रोहिड़ा का वृक्ष ( फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल )

मुख्यतया राजस्थान में पाए जाने वाला वृक्ष “रोहिड़ा”(Tecomella undulata) जिसे राज्य पुष्प का दर्जा भी हासिल है, विशेष रूप से राजस्थान के मरू क्षेत्रों में पाया जाता है। यह बिग्नोनियासी (Bignoniaceae) परिवार का एक पतझड़ी पेड़ है, जिस पर वसंत ऋतु में पलाश के पेड़ के समान, एक साथ बड़े पैमाने पर फूल खिलते हैं। रोहिड़ा, राजस्थान के लिए पारिस्थितिक और आर्थिक महत्व का पेड़ है, विशेष रूप से रेगिस्तानी क्षेत्रों में जहां यह रेत के टीलों पर पनपता है। यह अत्यधिक निम्न तापमान (लगभग -2°C) और उच्च तापमान (लगभग 50°C) दोनों को सहन कर सकता है, और शायद यही कारण है कि इसे ‘डेजर्ट टीक’ या ‘मारवाड़ टीक’ भी कहा जाता है। यह अपनी मजबूत और टिकाऊ लकड़ी की गुणवत्ता के लिए जाना जाता है । मानव द्वारा उच्च मांग और धीमी गति से बढ़ने के कारण आज यह पेड़ IUCN रेड सूची में शामिल किया जा चुका है और वर्तमान में रोहिड़ा विलुप्त होने की ओर है तथा इसका भविष्य आज अनिश्चित बना हुआ है।

इसके फूल एक तुरही के आकार के होते हैं- जिससे पक्षी दो प्रकार से मकरंद निकालते है- या तो फूलों के भीतर अपना सिर डालकर या फिर परागण में सहायता किये बिना सीधा फूलों के आधार पर अपनी चोंच द्वारा छिद्र बनाकर। इस व्यवहार को ‘मकरंद चोरी’ भी कहा जाता है – यह एक ऐसी विधि है जिसके द्वारा जानवर फूलों के पराग के संपर्क में आए बिना मकरंद निकालते हैं।


पक्षियों द्वारा गिराए गए फूलों को खाते हुए चीतल हिरन (फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल )

बुलबुल अपना सिर फूल के अंदर डाल कर मकरंद पीती है जबकि सनबर्ड फूल के आधार पर एक छोटा छिद्र करके मकरंद की चोरी करती है I बुलबुल द्वारा मकरंद पीते समय परागकण उसके सिर पर चिपक जाते हैं, परन्तु सनबर्ड परागण में सहायता किये बिना मकरंद निकालती है। यही प्रक्रिया मकरंद की चोरी (Nectar robbing) कहलाती है I इस प्रक्रिया के दौरान बुलबुल के सिर पर परागकण चिपक जाते हैं ,और उसका काला सिर पराग कणों से पीले रंग में रंग जाता है।
सनबर्ड के मकरंद चोरी करने का कारण है की वह आसानी से फूल के आधार पर संग्रहित मकरंद तक नहीं पहंचती है, क्योंकि फूल का आकार सनबर्ड की तुलना में बड़ा होता है कभी कभार यदि वह अपना सिर फूलों में डालती भी है तो परागकण से भरे परागकोश उसे छू नहीं पाते हैं I जिस कारण वह परागण की प्रक्रिया में भागीदारी नहीं निभाती है।

एक सफल परागण के लिए, फूल के आकार व संरचना और पक्षी की चोंच व सिर के आकार के बीच एक प्रकार की समरूपता होनी बहुत जरूरी है। अर्थात बुलबुल अपने बड़े सिर और छोटी चोंच के कारण रोहिड़ा के फूलों के साथ समरूप है क्योंकि छोटी चोंच के कारण उनको अपने सिर को पूरी तरह से फूल के भीतर ले जाना पड़ता है और ऐसा करते समय, उनके सिर परागकोष के सीधे संपर्क में आते है। वहीं दूसरी ओर सनबर्ड्स अपने छोटे सिर और लम्बी चोंच के कारण फूलों के परागकोष के संपर्क में आये बिना मकरंद निकाल ले जाती है।


रोहिड़े के फूल (फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल)


इस प्रक्रिया में सनबर्ड तो मानो पूरी तरह से एक परजीव के रूप में स्थापित हो गयी परन्तु गहराई से देखें तो भले ही सनबर्ड फूलों से मकरंद की चोरी करती है परन्तु फिर भी अप्रत्यक्ष रूप से परागण में सहायता भी करती है। क्योंकि मकरंद चोरी के दौरान सनबर्ड ज्यादा से ज्यादा फूलों पर जाती है, जिससे वह बुलबुल के लिए मकरंद संघर्ष को बढाकर, उसे आसपास के कई फूलों और पेड़ों पर जाने के लिए मजबूर करती है। सनबर्ड और बुलबुल के बीच का यह संघर्ष, अप्रत्यक्ष रूप से रोहिड़े के पेड़ों को परपरागण (cross pollination) में मदद करता है।

वास्तव में सनबर्ड और बुलबुल दोनों ही परागण में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन इस मामले में बुलबुल को “सच्चा परागणक” (true pollinators) और सनबर्ड्स को “प्रेरक” कहा जा सकता है। इसी प्रकार की टिप्पणियों को एक शोध पत्र में भी दिया गया है, जिसका शीर्षक है, “नेक्टर रॉबिंग पॉजिटिव इन्फ्लुएंस द रिप्रोडक्टिव सक्सेस ऑफ टेकोमेला अंडुलाटा” जहां पर्पल सनबर्ड रोहिड़ा में परपरागण को सकारात्मक रूप से प्रभावित करते हैं।


फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल

सनबर्ड की भांति बुलबुल भी फूलों के आधार पर छिद्र बनाती है एवं पेड़ो से गिरे फूलों पर अक्सर दो अलग-अलग प्रकार के चिह्न देखने को मिलते हैं । जैसे कुछ फूलों के आधार पर छोटे-छोटे छिद्र, तो कुछ में बड़े अंडाकार छिद्र। पक्षियों के आकार को देख कर यह स्पष्ट समझ आता है कि छोटे छिद्र सनबर्ड द्वारा तथा बड़े छिद्र बुलबुल द्वारा किये जाते हैं। इसके अलावा, यह भी देखा जाता है की बुलबुल के संपर्क में आने से कई बार कोमल फूल टूट कर गिर भी जाते है। हो सकता है की बुलबुल का उद्देश्य फूलों से मकरंद निकालना नहीं बल्कि सिर्फ उन्हें तोडना है। यदि पेड़ों से नीचे गिरे हुए फूलों को देखा जाये तो यह पाया जाता है की, अधिकांश फूल प्राकृतिक रूप से मुरझा कर नहीं बल्कि पक्षियों (विशेषरूप से बुलबुल) द्वारा तोड़े हुए हैं , अथवा उनकी लापरवाही से टूटे हुए हैं। दिनेश भट्ट और अनिल कुमार (Fortkail 17, 2001) द्वारा भारत में रेड-वेंटेड बुलबुल के खाने की पारिस्थितिकी पर किये गए अध्ययन के अनुसार यह बुलबुल द्वारा फूलों की पंखुड़ियों को खाने के प्रयासों के संकेत हो सकते हैं। वहीं दूसरी ओर पेड़ों से गिरे हुए इन फूलों को चिंकारा (Gazella bennettii) एवं नीलगाय (Boselaphus tragocamelus) आदि खाते हैं तथा यह रेड-वेंटेड बुलबुल और एंटीलोप के बीच सहभोजिता (commensalism) की प्रक्रिया को दर्शाता है।


फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल

तो इस बार जब फरवरी- मार्च माह में जब रोहिड़ा पर फूल आये तो प्रयास करना की आप विभिन्न पक्षियों के साथ रोहिड़ा के मध्य होने वाले इस व्यवहार को देख सकें।