एलो ट्राईनर्विस: राजस्थान की एक नई एलो प्रजाति

एलो ट्राईनर्विस: राजस्थान की एक नई एलो प्रजाति

“राजस्थान के बीकानेर जिले में पायी गई एक नई वनस्पति प्रजाति… “  

केन्द्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI), जोधपुर और बोटैनिकल सर्वे ऑफ़ इंडिया के कुछ शोधकर्ताओं द्वारा राजस्थान के बीकानेर जिले से एलो ट्राईनर्विस (Aloe trinervis) नामक एक नई वनस्पति की प्रजाति की खोज की गई है।  इस प्रजाति में फूलों के ब्रैट्स में तीन तंत्रिकाएं (nerve) मौजूद होने के कारण इस प्रजाति का नाम ट्राईनर्विस रखा गया हैं क्योंकि यह लक्षण इस प्रजाति के लिए विशेष और अद्वितीय हैं तथा इस प्रजाति में जून-अगस्त माह में फूल तथा सितम्बर-अक्टूबर माह में फल आते हैं।

Aloe trinervis के फूल (फोटो: Kulloli et. al.)

वनस्पतिक जगत के परिवार Asphodelaceae के जीनस “Aloe” में लगभग 600 प्रजातियां शामिल हैं जो ओल्ड वर्ल्ड (अफ्रीका, एशिया और यूरोप) सहित, दक्षिणी अफ्रीका, इथियोपिया और इरिट्रिया में वितरित हैं। इस जीनस की प्रजातियां शुष्क परिस्थितियों में फलने-फूलने के लिए अनुकूलित होती हैं तथा इनकी मोटी गुद्देदार पत्तियों में पानी संचित करने के टिश्यू होने के साथ-साथ एक मोटी छल्ली (cuticle) होती है। हालांकि भारत में इन सभी प्रजातियों में से केवल एक ही प्रजाति “अलो वेरा (Aloe vera)” सबसे अधिक व्यापकरूप से वितरित है। शोधकर्ताओं; सी.एस. पुरोहित, आर.एन. कुल्लोली और सुरेश कुमार की कड़ी मेहनत द्वारा इस नई प्रजाति की रिपोर्ट के साथ ही अब भारत में इस जीनस की दो प्रजातियां हो गई हैं। डॉ चंदन सिंह पुरोहित बोटैनिकल सर्वे ऑफ इंडिया में वैज्ञानिक के रूप में कार्यरत हैं। यह घासों के विशेषज्ञ हैं जिन्होंने 100 से अधिक शोध पत्र, 2 पुस्तकें प्रकाशित की हैं। डॉ रविकिरन निंगप्पा कुल्लोली, पिछले 12 वर्षों से रेगिस्तान की जैव विविधता पर शोध कर रहे है। इन्होने प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पत्रिकाओं में 30 शोध पत्र प्रकाशित किए हैं तथा वर्तमान में यह राजस्थान और गुजरात राज्यों के वन क्षेत्रों के आनुवंशिक संसाधनों के दस्तावेजीकरण और मानचित्रण पर कार्य कर रहे है। डॉ सुरेश कुमार, सेवानिवृत्त प्रधान वैज्ञानिक (आर्थिक वनस्पति विज्ञान) और केंद्रीय शुष्क क्षेत्र अनुसंधान संस्थान (CAZRI) जोधपुर के विभागाध्यक्ष थे। इन्होने डेजर्ट इकोलॉजी पर विशेषज्ञता हासिल की है और अंतरराष्ट्रीय और राष्ट्रीय पत्रिकाओं 250 से अधिक शोधपत्र और 10 पुस्तके प्रकाशित की हैं। साथ ही इन्होने चट्टानी, चूना पत्थर और जिप्सम वाले परियावासो को पुनः स्थापित करने तकनीक विकसित की है।

आखिर एलो ट्राईनर्विस और एलो वेरा में अंतर क्या है: एलो ट्राईनर्विस में पत्तियों के सिरों पर हल्के घुमावदार छोटे कांटे होते हैं, 3-नर्व्ड ब्रैक्ट्स, शाखित पुष्पक्रम (inflorescence), हल्के पीले-हरे रंग के फूल मध्य से भूरे व् 31-34 मिमी तक लम्बे होते हैं तथा इनके पुंकेसर की लम्बाई 29–33 मिमी तक होती हैं। जबकि एलो वेरा में पत्तियों के सिरों पर त्रिकोणाकार छोटे कांटे होते हैं, 5-नर्व्ड ब्रैक्ट्स, अशाखित पुष्पक्रम (inflorescence), संतरी-पीले रंग के फूल 29-30 मिमी तक लम्बे होते हैं तथा इनके पुंकेसर की लम्बाई 24–26 मिमी तक होती हैं। वर्तमान में इस नई प्रजाति एलो ट्राईनर्विस को शिवबाड़ी-जोरबीर संरक्षित क्षेत्र, बीकानेर, राजस्थान से एकत्रित किया गया हैं।

Aloe trinervis: A, inflorescence; B, leaf upper surface and margin; C, leaf lower surface and margin; D, white spots in young leaves; E, teeth; F, bract; G, bud; H, flower; I, perianth outer side; J, perianth inner side; K, stamens; L, pistil (Photo: C.S. Purohit & R.N. Kulloli).

Comparative plant parts of Aloe trinervis and Aloe vera (A & B) with respect to (1) inflorescence, (2) corolla ventral view, (3) corolla dorsal view, (4) teeth arrangement, (5) bud, (6) floral bract, (7) teeth shape (Photo: C.S. Purohit & R.N. Kulloli).

दोनों प्रजातियों एलो वेरा और एलो ट्राईनर्विस को CAZRI, जोधपुर में डेजर्ट बॉटनिकल गार्डन में लगाया गया है, तथा इसके नमूने BSI, AZRC, जोधपुर में संगृहीत हैं। स्थानीय लोग इसकी पत्तियों को सब्जी और अचार बनाने के लिए इकट्ठा करते हैं। इसकी पत्तियों का उपयोग त्वचा उपचार के लिए औषधीय रूप के रूप में भी किया जाता है। और जानकारी के लिए सन्दर्भ में दिए शोधपत्र को देखें।

संदर्भ:
  • Cover picture Kulloli et. al.
  • Kumar S., Purohit C.S., and Kulloli R. N. 2020. Aloe trinervis sp. nov.: A new succulent species of family Asphodelaceae from Indian Desert. Journal of Asia-Pacific Biodiversity. 13:325-330.
शोधकर्ता:

Dr. Chandan Singh Purohit (1)(L&R): Dr. C.S. Purohit is working as Scientist at Botanical Survey of India. He is grass expert and published more than 100 research papers, 2 books on taxonomy, conservation biology, new taxa. He has also worked on vegetation of Shingba Rhododendron Sanctuary, Sikkim.

Dr. Kulloli Ravikiran Ningappa (2): He is working on desert biodiversity since last  12 years. He has published 30 research papers in reputed international and national journals. He has hands on GIS mapping, Species Distribution Modelling. Currently he is working on documentation and mapping of Forest Genetic Resources of Rajasthan and Gujarat states.

Dr. Suresh Kumar (3): He is retired Principal Scientist (Economic Botany) & Head of Division of Central Arid Zone Research Institute (CAZRI) Jodhpur. He has expertise on Desert Ecology and published more than 250 research papers in international and national journals and 10 books. He has developed technology to rehabilitate rocky habitats, limestone, gypsum and lignite mine spoils.

 

 

 

 

पिम्पा: थार मरुस्थल में उगने वाला सलाद पौधा

पिम्पा: थार मरुस्थल में उगने वाला सलाद पौधा

पिम्पा, राजस्थान के अत्यंत शुष्क वातावरण में उगने वाला सलाद पौधा जो भू उपयोग में आये बदलाव के कारण अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहा है।

राजस्थान के थार मरुस्थल में उगने वाला एक पौधा, जिसके बारे में राजस्थान के लोगो को भी अधिक पता नहीं होगा, बहुत कम स्थानीय लोग ही इसे जानते है परन्तु थार मरुस्थल के कुछ लोग इसे सलाद की भांति खाने के उपयोग में लेते है I यह है Caralluma edulis, जिसे स्थानीय भाषा में लोग “पिम्पा” के नाम से जानते है इसका इस्तेमाल भोजन एवं दवा दोनों प्रकार से किया जाता है I यह राजस्थान के अत्यंत शुष्क क्षेत्र का एक मरुस्थलीय पौधा है I यह मुरैठ (Panicum turgidum) घास के साथ उगता हुआ देखा गया I  यह जल को संगृहीत कर गर्म एवं अत्यंत शुष्क वातावरण में उगने के लिए अनुकूल होता है I अक्सर इसे कच्चा ही सलाद की भांति खाया जाता है I  खाने में यह थोड़ा नमकीन होता है I अत्यंत चराई एवं भू उपयोग में आये बदलाव ने इसके अस्तित्व को संकटग्रस्त स्थिति में ला दिया है I

Caralluma edulis, भारत और पाकिस्तान का स्थानिक है तथा यह वनस्पतिक जगत के Asclepiadaceae परिवार का सदस्य है। (फोटो: डॉ. अमित कोटिया एवं डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

Caralluma edulis एक बहुशाखित पौधा है जिसकी शाखाये सिरे से नुकीली होती है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

Caralluma edulis, जल को संगृहीत कर थार मरुस्थल के चरम शुष्क इलाको में उगने के सक्षम है। (फोटो: डॉ. अमित कोटिया एवं डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

एक सर्वे में इसे जैसलमेर के खुईयाला, बहरमसर धाम, देवा -II और चान्दन गाँवो के आस पास उगता हुआ देखा गया है I  पिम्पा एक बहु शाखा वाला २०-३० सेंटीमीटर तक जमीन से ऊपर उगने वाला पौधा है जो Asclepiadaceae परिवार से सम्बन्ध रखता है I यह स्थानीय बाजार में कभी कभी बिकता भी है I कभी कभार कुछ लोग इसे एक सुंदरता बढ़ाने के लिए भी लगते है I  राजस्थान के थार मरुस्थल  से जुड़े वनस्पति वैज्ञानिको को इसे एक बार जरूर देखना चाहिए I

इसका तना स्वाद में नमकीन तथा बहुत ही रसीला होता है इसीलिए इस पौधे को सब्जी की तरह उगाया भी जाता है है। (फोटो: डॉ. अमित कोटिया)

 

राजस्थान में पीले पुष्प वाले पलाश

राजस्थान में पीले पुष्प वाले पलाश

फूलों से लदे पलाश के पेड़, यह आभास देते हैं मानो वन में अग्नि दहक रही है I इनके लाल केसरी रंगों के फूलों से हम सब वाकिफ हैं, परन्तु क्या आप जानते है पीले फूलों वाले पलाश के बारे में ?

पलाश (Butea monosperma) राजस्थान की बहुत महत्वपूर्ण प्रजातियों में से एक है जो मुख्यतः दक्षिणी अरावली एवं दक्षिणी-पूर्वी अरावली के आसपास दिखाई देती है। यह प्रजाति 5 उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वनों का महत्वपूर्ण अंश है तथा भारत में E5 – पलाश वन बनाती है। E5 – पलाश वन मुख्यरूप से चित्तौड़गढ़, अजमेर, पाली, जालोर, टोंक, भीलवाड़ा, बूंदी, झालावाड़, धौलपुर, जयपुर, उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, अलवर और राजसमंद जिलों तक सीमित है।

पीले पलाश (Butea monosperma var. lutea) का वृक्ष (फोटो: डॉ. सतीश शर्मा)

राजस्थान में पलाश की तीन प्रजातियां पायी जाती हैं तथा उनकी विविधताएँ नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत की गई हैं:

क्र. सं.वैज्ञानिक नामप्रकृति स्थानीय नाममुख्य वितरण क्षेत्रफूलों का रंग
1Butea monospermaमध्यम आकार का वृक्षपलाश, छीला, छोला, खांखरा, ढाकमुख्य रूप से अरावली और अरावली के पूर्व मेंलाल
2Butea monosperma var. luteaमध्यम आकार का वृक्षपीला खांखरा, ढोल खाखराविवरण इस लेख में दिया गया हैपीला
3Butea superba काष्ठबेलपलाश बेल, छोला की बेलकेवल अजमेर से दर्ज (संभवतः वर्तमान में राज्य के किसी भी हिस्से में मौजूद  नहीं)लाल

लाल पलाश (Butea monosperma) का वृक्ष (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

लाल पलाश के पुष्प (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

Butea monosperma var. lutea राजस्थान में पलाश की दुर्लभ किस्म है जो केवल गिनती योग्य संख्या में मौजूद है। राज्य में इस किस्म के कुछ ज्ञात रिकॉर्ड निम्न हैं:

क्र. सं.तहसील/जिलास्थानवृक्षों की संख्याभूमि की स्थिति
1गिरवा (उदयपुर)पाई गाँव झाड़ोल रोड1राजस्व भूमि
2गिरवा (उदयपुर)पीपलवास गाँव के पास, (सड़क के पूर्व के फसल क्षेत्र में)2राजस्व भूमि
3झाड़ोल (उदयपुर)पारगीया गाँव के पास (पलियाखेड़ा-मादरी रोड पर)1राजस्व भूमि
4झाड़ोल (उदयपुर)मोहम्मद फलासिया गाँव2राजस्व भूमि
5कोटड़ा (उदयपुर)फुलवारी वन्यजीव अभयारण्य के पथरापडी नाका के पास1राजस्व भूमि
6कोटड़ा (उदयपुर)बोरडी गांव के पास फुलवारी वन्यजीव अभयारण्य के वन ब्लॉक में4आरक्षित वन
7कोटड़ा (उदयपुर)पथरापडी नाका के पूर्व की ओर से आधा किलोमीटर दूर सड़क के पास एक नाले में श्री ननिया के खेत में (फुलवारी वन्यजीव अभयारण्य का बाहरी इलाका)2राजस्व भूमि
8झाड़ोल (उदयपुर)डोलीगढ़ फला, सेलाना1राजस्व भूमि
9झाड़ोल (उदयपुर)गोत्रिया फला, सेलाना1राजस्व भूमि
10झाड़ोल (उदयपुर)चामुंडा माता मंदिर के पास, सेलाना1राजस्व भूमि
11झाड़ोल (उदयपुर)खोड़ा दर्रा, पलियाखेड़ा1आरक्षित वन
12प्रतापगढ़ (चित्तौड़गढ़)जोलर2झार वन ब्लॉक
13प्रतापगढ़ (चित्तौड़गढ़)धरनी2वन ब्लॉक
14प्रतापगढ़ (चित्तौड़गढ़)चिरवा2वन ब्लॉक
15प्रतापगढ़ (चित्तौड़गढ़)ग्यासपुर1मल्हाड वन खंड
16आबू रोडगुजरात-राजस्थान की सीमा, आबू रोड के पास1वन भूमि
17कोटड़ा (उदयपुर)चक कड़ुवा महुड़ा (फुलवारी वन्यजीव अभयारण्य)1देवली वन  ब्लॉक
18कोटड़ा (उदयपुर)बदली (फुलवारी वन्यजीव अभयारण्य)1उमरिया वन ब्लॉक
19कोटड़ा (उदयपुर)सामोली (समोली नाका के उत्तर में)1राजस्व भूमि
20बांसवाड़ा जिलाखांडू1राजस्व भूमि
21डूंगरपुर जिलारेलड़ा1राजस्व भूमि
22डूंगरपुर जिलामहुडी1राजस्व भूमि
23डूंगरपुर जिलापुरवाड़ा1राजस्व भूमि
24डूंगरपुर जिलाआंतरी रोड सरकन खोपसा गांव, शंकर घाटी1सड़क किनारे
25कोटड़ा (उदयपुर)अर्जुनपुरा (श्री हुरता का कृषि क्षेत्र)2राजस्व भूमि
26गिरवा (उदयपुर)गहलोत-का-वास (उबेश्वर रोड)6राजस्व भूमि
27उदयपुर जिलाटीडी -नैनबरा के बीच1राजस्व भूमि
28अलवर जिलासरिस्का टाइगर रिजर्व1वन भूमि

चूंकि पीला पलाश राज्य में दुर्लभ है, इसलिए इसे संरक्षित किया जाना चाहिए। राज्य के कई इलाकों में स्थानीय लोगों द्वारा इसकी छाल पूजा और पारंपरिक चिकित्सा के लिए प्रयोग ली जाती है जो पेड़ों के लिए हानिकारक है। वन विभाग को इसकी रोपाई कर वन क्षेत्रों में इसका रोपण तथा स्थानीय लोगों के बीच इनका वितरण करना चाहिए।

 

खर्चिया गेंहू: पाली- मारवाड़ की खारी मिट्टी में उगने वाले लाल गेंहू

खर्चिया गेंहू: पाली- मारवाड़ की खारी मिट्टी में उगने वाले लाल गेंहू

खर्चिया, पाली जिले की खारी मिट्टी में उगने वाला लाल गेंहू जिसने राजस्थान के एक छोटे से गाँव “खारची” को पुरे विश्व में प्रसिद्धि दिलवाई।

राजस्थान के पाली जिले में किसानों के साथ काम करने के दौरान मैंने गेहूं की एक स्थानीय प्रजाति देखी, जिसे पूरे जिले में खर्चिया गेहूं के नाम से जाना जाता है। परन्तु यह जानना बेहद दिलचस्प है कि इस किस्म को यह नाम कैसे मिला। दरअसल इस गेहूं की उत्पत्ति खारची नामक गाँव से हुई है और यहाँ की मिट्टी और पानी में नमक की मात्रा अधिक होने के कारण इस गाँव का नाम खारची पड़ा है। स्थानीय भाषा में खार्च का मतलब नमक होता है। खर्चिया गेहूं को पुरे विश्व में अत्यधिक नमक की मात्रा में उगने वाले गेहूं जीनोटाइप के रूप में जाना जाता है। मिट्टी में नमक की ज्यादा मात्रा के कारण फसलों में रस प्रक्रिया (metabolism) और खनिज का अपवाह (uptake of mineral) प्रभावित होता है। परन्तु, खर्चिया गेंहू की ऐसी किस्म है जो नमक के प्रभावों का अधिक कुशलता से सामना करती है । इसी कारण से ये स्थानीय गेंहू प्रजाति को व्यापक रूप से उच्च उपज वाली नमक प्रतिरोधी किस्म खर्चिया 65, KRL 1-4, KRL 39 और KRL 19 के उत्पादन के लिए उपयोग किया जाता है। भविष्य के फसल सुधार कार्यक्रम के लिए इसके महत्त्व को ध्यान में रखते हुए, इसे गेहूं अनुसंधान निदेशालय, करनाल के पंजीकरण संख्या INGR 99020 द्वारा NBPGR, नई दिल्ली में पंजीकृत किया गया है। खर्चिया गेहूं को पीढ़ियों से खारची गाँव में उगाया जा रहा है। गेहूँ की अन्य हाइब्रिड किस्मों की तुलना में खर्चिया गेहूँ के लिए बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है और ऐसी जगहों पर जहाँ पानी उपलब्ध नहीं होता है, यह बारिश के मौसम में उगाया जाता है। इस किस्म की एक अन्य विशेषता यह है कि पौधे की लम्बाई भी अधिक होती है जिससे किसानो को अनाज के साथ-साथ पशुओं को खिलाने के लिए चारा भी मिल जाता है। जानवरो को भी अन्य गेहूं के भूसे की तुलना में खर्चिया गेहूँ का चारा अधिक पसंद आता हैं।

इस स्थानीय प्रजाति के महत्त्व को समझते हुए, हमने पीपीवी और एफआर प्राधिकरण, नई दिल्ली द्वारा दिए जाने वाले Plant Genome Saviour Community (PGSC) अवार्ड के लिए खार्ची गांव समुदाय के लिए आवेदन किया। प्रत्येक वर्ष यह पुरस्कार किसानो, विशेषरूप से आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के लोगो को कृषि जैव विविधता के संरक्षण व् सुधार के लिए प्रदान किया जाता है। पीपीवी और एफआर प्राधिकरण दवारा सभी प्रकार की जांच करने के बाद खारची गाँव के किसानो को यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला, जिसमे एक प्रशस्ति पत्र, एक स्मृति चिन्ह और दस लाख रुपयों की राशि थी तथा यह पुरस्कार माननीय कृषि मंत्री द्वारा NASC कॉम्प्लेक्स, नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष समारोह में दिया जाता है।

खर्चिया गेहूं से तैयार किये गए कुछ व्यंजनों के साथ एक किसान दम्पति

खारची गाँव का विवरण:

खारची गाँव, जिला मुख्यालय पाली से पूर्व की ओर 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह एक ग्राम पंचायत है, जिसका खर्चिया गेहूं की खेती में बड़ा योगदान है। जोग माया मंदिर के समय से खारची गाँव की अपनी एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। उस समय, खारची गाँव आसपास के तीन गाँवों और पंचायत समिति मारवाड़ जंक्शन का मुख्य व्यवसाय केंद्र और बिक्री स्थल हुआ करता था। यह गाँव और इसके आस-पास की भूमि नमक से इतनी अधिक प्रभावित है कि ऐसा लगता है मानो किसी ने मिट्टी पर नमक की परत चढ़ा दी हो। नमक के जमने के कारण भूमि ऊपर से सफेद हो जाती है जिसे स्थानीय रूप से खारच कहा जाता है और इसलिए इस गांव को खारची नाम मिला। इस पंचायत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 12,224 वर्ग किमी है। जिसमें से 85 प्रतिशत भूमि क्षेत्र का उपयोग कृषि के लिए किया जाता है और केवल चार प्रतिशत ही सिंचित क्षेत्र है। गाँव के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है क्लस्टर बीन, मूंग, तिल खरीफ में उगाए जाते हैं और रबी में मिर्ची, चीकू, जीरा और जौ प्रमुख कृषि फसलें हैं। बेर, आमला और लहसोरा मुख्य बागवानी फ़सलें हैं। इस जिले में कृषि आधारित औद्योगिक क्षेत्रों में मुख्य रूप से मेंहदी उद्योग, दाल उद्योग और दूध प्रसंस्करण संयंत्र शामिल हैं। कृषि के साथ पशुधन भी आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण भाग है।  गाँव में डेयरी क्षेत्र भी तेजी से बढ़ रहा है और वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 2500 लीटर दूध का उत्पादन है तथा पशु, भैंस, भेड़ और बकरी यहाँ मुख्य पशु हैं।

जलवायु की स्थितिशुष्क से अर्ध-शुष्क, 20-25˚C  
मृदा प्रकारदोमट से रेतीले दोमट, नमक की मात्रा अधिक है।
खरचिया गेहूं की बीज दर100-120 Kg/Ha (मिट्टी के प्रकार पर निर्भर करता है)।  
बुवाई की विधि:  संरक्षित नमी की स्थिति में तथा सिंचित अवस्था में: 4-5 सिंचाई
उपज16-32 qt / Ha (न्यूनतम और उच्चतम उपज मिट्टी में नमक की मात्रा और पानी की उपलब्धि पर निर्भर करती है)
प्रमुख कीटदीमक
रोगYellow rust, Black smut

QUALITY PARAMETERS OF KHARCHIA WHEAT:

S. No.CharacteristicsKharchia wheatNormal Wheat
1.                   Grain colourRedGenerally amber
2.                   Grain TextureSemi-hardSemi-hard to Hard
3.                   ChapatiSoft (soft for eating and can be used for two days)Soft-semi-soft (can be used up to 4-5 hours on the same day only)
  Chapati prepared in morning is used with butter milk in the after noon gives more taste. Normal taste
4.                   DaliaAbsorbs plenty of water for cooking and gives more quantity after cookingAbsorbs less water
  Gives more taste due to absorption of more waterLess tasty as compared to kharchia wheat
5.                   Bran More branLess bran
6.                   Khichdi (Dalia+dal +ghee)Given to the pregnant ladies,  being light, there is less pressure on other body parts. It is light for stomach, increases blood and gives energy.Normal
7.                   Salt affected waterHigh productionLow production 
 Yield16-32 qt/ha10-15 q/ha
8.                   Straw yieldMore due to  tallnessLess due to short height
9.                   Marketing approach·    Used by local peopleWell established market channels.
  ·    Migrants from this region prefer to purchase bulk stock for the entire year from villagers/growers directly. 
पुरस्कार प्राप्त करते हुए खारची गाँव के किसान

चूंकि, गाँव की भूमि ज्यादातर खारी है, इसलिए, राजस्थान के पाली जिले के खारची और आस-पास के क्षेत्र में खर्चिया गेंहू की खेती की जाती है। खारची गांव में 1200 बीघा में खर्चिया गेहूं उगाया जाता है। खर्चिया गेहूं की औसत उपज लगभग 16-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। लवणीय मिट्टी में खेती करने पर उपज की क्षमता कम होती है और यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो और भूमि सामान्य हो तो उपज बढ़ जाती है। किसान खेतों में केवल फार्म यार्ड खाद (FYM) का उपयोग करते हैं। परन्तु खर्चिया गेहूं की खेती प्रायः नमी और रासायनिक उर्वरकों के बिना की जाती है। चेन्नई, पुणे, बैंगलोर, हैदराबाद जैसे अन्य स्थानों के किसानों द्वारा भी खारची गाँव का दौरा किया जाता है जो इस गेंहू की गुणवत्ता के बारे में अच्छी तरह से जानते है और बुवाई के उद्देश्य से खारचिया गेहूँ खरीदने के लिए आते हैं। गाँव की महिलाओ से बातचीत के दौरान, यह पता लगा गया कि खर्चिया गेहूँ बहुत ही पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होता है इसके आटे से लड्डू और बर्फी बनायीं जाती है। इन लड्डूओं को एक सप्ताह या दस दिनों के प्रसव के बाद शिशु की माँ को एक पौष्टिक व्यंजन के रूप में दिया जाता है। इस से बने दलिया और लापसी का उपयोग आमतौर पर नाश्ते में किया जाता है। महिलाओं द्वारा यह भी बताया गया कि इस गेहूं का आटा गूंधने में अधिक मात्रा में पानी सोखता है और इसकी रोटी का स्वाद मीठा होता है तथा 24 घंटे तक  ताजा रहती है और कभी भी अन्य गेहूं की किस्मों की तरह सूखती नहीं है। भंडारण में किसी प्रकार के कीट-पतंगे अनाज पर आकर्षित नहीं होते हैं, इसलिए इसे लंबे समय तक भंडारघर में रखा जा सकता है।

राजस्थान की मुख्य दुर्लभ वृक्ष प्रजातियां

राजस्थान की मुख्य दुर्लभ वृक्ष प्रजातियां

दुर्लभ वृक्ष का अर्थ है वह वृक्ष प्रजाति जिसके सदस्यों की संख्या काफी कम हो एवं पर्याप्त समय तक छान-बीन करने पर भी वे बहुत कम दिखाई पड़ते हों उन्हें दुर्लभ वृक्ष की श्रेणी में रखा जा सकता है। किसी प्रजाति का दुर्लभ के रूप में मानना व जानना एक कठिन कार्य है।यह तभी संभव है जब हमें उस प्रजाति के सदस्यों की सही सही संख्या का ज्ञान हो। वैसे शाब्दिक अर्थ में कोई प्रजाति एक जिले या राज्य या देश में दुर्लभ हो सकती है लेकिन दूसरे जिले या राज्य या देश में हो सकता है उसकी अच्छी संख्या हो एवं वह दुर्लभ नहीं हो।किसी क्षेत्र में किसी प्रजाति के दुर्लभ होने के निम्न कारण हो सकते हैं:

1.प्रजाति संख्या में काफी कम हो एवं वितरण क्षेत्र काफी छोटा हो,
2.प्रजाति एंडेमिक हो,
3.प्रजाति अतिउपयोगी हो एवं निरंतर व अधिक दोहन से उसकी संख्या में तेज गिरावट आ गई हो,
4.प्रजाति की अंतिम वितरण सीमा उस जिले या राज्य या देश से गुजर रही हो,
5.प्रजाति का उद्भव काफी नया हो एवं उसे फैलने हेतु पर्याप्त समय नहीं मिला हो,
6.प्रजाति के बारे में पर्याप्त सूचनाएं उपलब्ध नहीं हो आदि-आदि।

इस लेख में राजस्थान राज्य के दुर्लभ वृक्षों में भी जो दुर्लभतम हैं तथा जिनकी संख्या राज्य में काफी कम है, उनकी जानकारी प्रस्तुत की गयी है।इन दुर्लभ वृक्ष प्रजातियों की संख्या का भी अनुमान प्रस्तुत किया गया है जो वर्ष 1980 से 2019 तक के प्रत्यक्ष वन भ्रमण,प्रेक्षण,उपलब्ध वैज्ञानिक साहित्य अवलोकन एवं वृक्ष अवलोककों(Tree Spotters), की सूचनाओं पर आधारित हैं।

Antidesma ghaesembilla

अब तक उपलब्ध सूचनाओं के आधार पर राजस्थान की अति दुर्लभ वृक्ष प्रजातियां निम्न हैं:

क्र. सं.नाम प्रजातिप्रकृतिकुलफ्लोरा ऑफ राजस्थान (भारतीय वनस्पति सर्वेक्षण अनुसार स्टेटस)राज्य में संख्या अनुमान*मुख्य वितरण क्षेत्रवि. वि.
1.Borassus flabellifer, Asian Palmyra palm,ताड़ वृक्षArecaceaeदर्ज नहींAबांसी (चित्तौड़गढ़), सलूम्बर, ऋषभदेववन्य एवं रोपित अवस्था में विद्यमान
2.Commiphora agallocha, (बड़ी गूगल)छोटा वृक्षBurseraceaeदर्ज नहींBभींडर (उदयपुर), कुंडाखोह (बारां), विजयपुर (चित्तौड़गढ़)वन्य अवस्था में विद्यमान
3.Washingtonia robusta, Mexican Fan Palm वृक्ष Arecaceaeदर्ज नहींAनागफणी (डूंगरपुर) वन भवन एवं गुलाबबाग,(उदयपुर)वन्य एवं रोपित अवस्था में विद्यमान
4.Protium serratumमध्यम आकार का वृक्षBurseraceaeदर्ज नहींAकमलनाथ नाला (कमलनाथ वन खंड,उदयपुर) गौमुख के रास्ते पर(मा.आबू) वन्य अवस्था में विद्यमान
5.Butea monosperma leutea पीला पलाशमध्यम आकार का वृक्षFabaceaeदर्ज नहींBमुख्यतः दक्षिणी राजस्थान, बाघ परियोजना सरिस्कावन्य अवस्था में विद्यमान
6.Celtis tetrandraमध्यम आकार का वृक्षUlmaceaeदुर्लभ के रूप में दर्जAमाउन्ट आबू (सिरोही), जरगा पर्वत (उदयपुर)वन्य अवस्था में विद्यमान
7.Cochlospermum religisoum गिरनार, धोबी का कबाड़ाछोटा वृक्षLochlospermaceae‘अतिदुर्लभ’ के रूप में दर्जBसीतामाता अभ्यारण्य, शाहबाद तहसील के वन क्षेत्र (बारां)वन्य अवस्था में विद्यमान
8.Cordia crenata ,(एक प्रकार का गैंदा)छोटा वृक्षBoraginaceae‘अतिदुर्लभ’ के रूप में दर्जपुख़्ता जानकारी उपलब्ध नहींमेरवाड़ा के पुराने जंगल, फुलवारी की नाल अभ्यारण्यवन्य अवस्था में विद्यमान
9.Ehretia serrata सीला, छल्लामध्यम आकार का वृक्षEhretiaceaeदुर्लभ के रूप में दर्जAमाउन्ट आबू (सिरोही), कुम्भलगढ़ अभयारण्य,जरगा पर्वत,गोगुन्दा, झाड़ोल,कोटड़ा तहसीलों के वन एवं कृषि
क्षेत्र
वन्य एवं रोपित अवस्था में विद्यमान
10.Semecarpus anacardium, भिलावाबड़ा वृक्षAnacardiaceaeफ्लोरा में शामिल लेकिन स्टेटस की पुख़्ता जानकारी नहींहाल के वर्षों में उपस्थित होने की कोई सूचना नहीं हैमाउन्ट आबू (सिरोही)वन्य अवस्था में ज्ञात था
11.Spondias pinnata, काटूक,आमण्डाबड़ा वृक्षAnacardiaceaeदर्ज नहींसंख्या संबधी पुख़्ता जानकारी नहींसिरोही जिले का गुजरात के
बड़ा अम्बाजी क्षेत्र से सटा
राजस्थान का वनक्षेत्र, शाहबाद तहसील के वन क्षेत्र (बारां)
वन्य अवस्था में विद्यमान
12.Antidesma ghaesembillaमध्यम आकार का वृक्षPhyllanthaceaeदर्ज नहींAरणथम्भौर बाघ परियोजना (सवाई माधोपुर)वन्य अवस्था में विद्यमान
13.Erythrinasuberosasublobataछोटा वृक्षFabaceaeदर्ज नहींAशाहबाद तहसील के वन क्षेत्र (बारां)वन्य अवस्था में विद्यमान
14.Litsea glutinosaमैदा लकड़ीLauraceaeदर्ज नहींAरणथम्भौर बाघ परियोजना (सवाई माधोपुर)वन्य अवस्था में विद्यमान

(*गिनती पूर्ण विकसित वृक्षों पर आधारित है A=50 से कम,B=50 से 100)

उपरोक्त सारणी में दर्ज सभी वृक्ष प्रजातियां राज्य के भौगोलिक क्षेत्र में अति दुर्लभ तो हैं ही,बहुत कम जानी पहचानी भी हैं।यदि इनके बारे में और विश्वसनीय जानकारियां मिलें तो इनके स्टेटस का और भी सटीक मूल्यांकन किया जा सकता है।चूंकि इन प्रजातियों की संख्या काफी कम है अतः ये स्थानीय रूप से विलुप्त भी हो सकती हैं। वन विभाग को अपनी पौधशाला में इनके पौधे तैयार कर इनको इनके प्राकृतिक वितरण क्षेत्र में ही रोपण करना चाहिए ताकि इनका संरक्षण हो सके।

राजस्थान की एंडेमिक वनस्पति प्रजातियां

राजस्थान की एंडेमिक वनस्पति प्रजातियां

राजस्थान वनस्पतिक विविधता से समृद्ध राज्य है। जहाँ रेगिस्तान,आर्द्रभूमि,घास के मैदान, कृषि क्षेत्र, पहाड़, नमक फ्लैट जैसे कई प्रकार के प्राकृतिक आवास विद्यमान हैं। जिनमे विभिन्न प्रकार के पेड़-पौधों की प्रजातियां भी पायी जाती हैं। यहाँ मुख्य रूप से तीन प्रकार के वन पाए जाते हैं जो उष्ण कटिबंधीय पर्णपाती वन उष्ण कटिबंधीय कांटेदार वन एवं उपोष्ण कटिबंधीय चौड़ी पत्ती वाले पर्वतीय प्रकार के वन हैं । राज्य के अधिकतर जंगल पहले दो वन प्रकार के ही हैं और उपोष्ण कटिबंधीय चौड़ी पत्ती वाले पर्वतीय वन सबसे कम जो केवल सिरोही जिले के माउंट आबू के ऊपरी इलाकों तक ही सीमित हैं। इन सभी वनों में कई प्रकार की स्थानिक (endemic) वनस्पतिक प्रजातियां पायी जाती हैं ।

स्थानिक वनस्पतियों के विभिन्न पहलुओं की अच्छी जानकारी अवस्थी (1995), भंडारी (1978), शेट्टी और सिंह (1987,1991और1993) एवं शर्मा (2014, 2015) के कार्य द्वारा भी हुई है।

कई वनस्पतिक प्रजातियाँ राजस्थान के थार रेगिस्तान गुजरात और पाकिस्तान  के लिए स्थानिक हैं तो वहीं कई प्रजातियां राजस्थान के अन्य हिस्सों और आसपास के राज्यों के कुछ हिस्सों के लिए स्थानिक हैं। जो प्रजातियां उप-प्रजातियां एवं किस्में मुख्य रूप से राजस्थान राज्य की भौगोलिक सीमाओं के लिए विशेष रूप से स्थानिक हैं उनकी जानकारी नीचे सारणी में प्रस्तुत है:

S.No.SpeciesMain Taxa
1.Rivularia globiceps abuensisAlga
2.Gloeotrichia raciborskii kaylanaensisAlga
3.Physica abuensisLichen
4.Serratia sambharianaBacterium
5.Riccia abuensisBryophyte
6.R. jodhpurensisBryophyte
7.R. reticulatulaBryophyte
8.Asplenium pumilum hymenophylloidesFern
9.Seleginella rajasthanensisFern
10.Isoetus tuburculataFern
11.I reticulataFern
12.I rajasthanensisFern
13.Marselia condensataFern
14.M. rajasthanensisFern
15.M. rajasthensis ballardiiFern
16.M. minuta indicaFern
17.Cheilanthes aravallensisFern
18.Farsetia macranthaDicot plant
19.Cleome gynandra nanaDicot plant
20.Abutilon fruticosum chrisocarpaDicot plant
21.A . bidentatus majorDicot plant
22.Pavonia arabica glatinosaDicot plant
23.P. arabica massuriensisDicot plant
24.Melhania magnifloliaDicot plant
25.Ziziphus truncataDicot plant
26.Alysicarpus monilifer venosaDicot plant
27.Ipomoea cairica semine-glabraDicot plant
28.Anogeissus seriea nummulariaDicot plant
29.Pulicaria rajputanaeDicot plant
30.Convolvulus auricomus ferrugenosusDicot plant
31.C. blatteriDicot plant
32.Merremia rajasthanensisDicot plant
33.Barleria prionitis subsp. prionitis var. dicanthaDicot plant
34.Cordia crenataDicot plant
35.Dicliptera abuensisDicot plant
36.Strobilanthes helbergiiDicot plant
37.Euphorbia jodhpurensisDicot plant
38.Phyllanthus ajmerianusDicot plant
39.Anticharis glandulosa caeruleaDicot plant
40.Lindernia bracteoidesDicot plant
41.L. micranthaDicot plant
42.Oldenlandia clausaDicot plant
43.Veronica anagallis – aquatica bracteosaDicot plant
44.Veronica beccabunga attenuataDicot plant
45.Apluda blatteriMonocot plant (grass)
46Aristida royleana Monocot plant (grass)
47Cenchrus prieuri scabraMonocot plant (grass)
48C. rajasthanensisMonocot plant (grass)
49Digitaria pennata settyanaMonocot plant (grass)
50Ischaernum kingiiMonocot plant (grass)

विभिन्न स्थानिक वर्गों का विश्लेषण

S.No.Taxa/GroupNumber of Species,sub-species and verities
1.Algae2
2.Lichen1
3.Bacteriya1
4.Bryophyta3
5.Petridothyta (fern)10
6.Dicot plants27
7.Monocot plants6
Total50

कई लेखक कॉर्डिया क्रेनाटा को राजस्थान की एक स्थानिक प्रजाति के रूप में मानते हैं लेकिन भारत के बाहर यह मिस्र में खेतों में भी उगाया जाता है। हालाँकि राजस्थान में अरावली एवं थार रेगिस्तानी जैसी प्राकृतिक संरचनाएं विद्यमान हैं लेकिन वे प्रभावी अवरोध नहीं बना पाते हैं। इसलिए राज्य में अधिक स्थानिकवाद विकसित नहीं हुआ है। कोई भी वनस्पति वंश यहाँ स्थानिक नहीं पाया गया है। कभी-कभी कुछ प्रजातियों एवं उप प्रजातियों की स्थिति को स्थानिक नहीं माना जाता है क्योंकि उनकी उपस्थिति अन्य भारतीय राज्यों और पाकिस्तान के कुछ हिस्सों में समान प्रकार के निवास स्थानों की निरंतरता के कारण संभव है। हमें राज्य की स्थानिक प्रजातियों की  स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए अधिक सटीक सर्वेक्षण और शोध की आवश्यकता है।

References

  1. Awasthi, A. (1995): Plant geography and flora of Rajasthan.
  2. Bhandari, M.M. (1978): Flora of the Indian desert.
  3. Sharma, S.K. (2014): Faunal and Floral endemism in Rajasthan.
  4. Sharma, S.K. (2015): Faunal and floral in Rajasthan. Souvenir, 18th Birding fair, 30-31 January 2015, Man Sagar, Jaipur
  5. Shetty, B.V. & V. Singh (1987, 1991, 1993): Flora of Rajasthan. Vol. I, II, III