टाइगर वॉच के एक पर्यावरण शिक्षक धर्मसिंह गुर्जर कैलादेवी वन्यजीव अभयारण्य के पास बसे एक गाँव से गुजर रहे थे। रास्ते में उन्हें एक घर से महिला के रोने और लोगों के शोरगुल की आवाजें सुनाई दीं। घर के बाहर छोटी-सी दीवार थी, इसलिए भीतर का पूरा दृश्य दिखाई दे रहा था। उन्होंने देखा कि एक महिला बच्चे को गोद में लेकर बैठी थी और कुछ लोग उसे चारों ओर से घेरकर खड़े थे। शिक्षक को लगा कि कुछ ठीक नहीं है।

साँप के काटने के बाद माँ की गोद में बैठा बच्चा, पास में बैठा ओझा बाबा झाड़-फूँक से इलाज शुरू कर चुका था, जबकि उस मासूम को ज़्यादा ज़रूरत जिला अस्पताल पहुँचने की थी।
शिक्षक ने अंदर जाकर पूछा, “क्या हुआ?”
लोगों ने बताया, “इसे करीब 30–40 मिनट पहले साँप ने काट लिया है।”
शिक्षक ने देखा कि एक व्यक्ति बच्चे के शरीर पर भभूती या राख लगा रहा था और उसे नीम की पत्तियों से ढकने की कोशिश कर रहा था। शिक्षक ने तुरंत सभी से कहा, “बच्चे को यहाँ रखना खतरनाक हो सकता है। इसे जितनी जल्दी हो सके जिला अस्पताल ले जाना चाहिए।”
लेकिन शिक्षक की बात को पूरी तरह अनसुना कर दिया गया।

सर्पदंश के बाद अस्पताल ले जाने के बजाय झाड़-फूंक के लिए बाबा के पास लाया गया बच्चा — नीम की पत्तियों से ढककर किए जा रहे ‘उपचार’ के दौरान सहमा हुआ चेहरा इस बात की गवाही देता है कि समय पर सही इलाज मिलता तो यह आज ज़िंदा होता।
शिक्षक से रहा नहीं गया। उन्होंने बच्चे की माँ से दृढ़ता से कहा, “अगर बच्चे को बचाना है तो इसे तुरंत अस्पताल ले जाना होगा। अगर झाड़-फूँक से कुछ होता, तो अब तक बच्चे की हालत बेहतर हो चुकी होती। लेकिन इसकी हालत लगातार बिगड़ रही है।”
वहाँ खड़े एक लड़के ने भी कहा, “भैया, मैं कब से कह रहा हूँ, लेकिन ये लोग मेरी बात भी नहीं मान रहे हैं।”
शायद माँ को लगा कि यह व्यक्ति समझदारी की बात कर रहा है। अंततः वह बच्चे को अस्पताल ले जाने के लिए तैयार हो गई। ग्रामीणों ने तुरंत बच्चे को मोटरसाइकिल पर बैठाया और अस्पताल की ओर निकल पड़े।

गाँव की कच्ची सड़क से कस्बे की ओर जाते परिजन, ये ऊबड़-खाबड़ रास्ते और मोटरसाइकिल ही सर्पदंश जैसे आपातकाल में गाँवों से अस्पताल तक पहुँचने का पहला सहारा होते हैं।
इधर, शिक्षक ने एक समझदार व्यक्ति से कहा, “आप जिला अस्पताल में फोन करके बता दीजिए कि साँप के काटने का मामला है और बच्चा रास्ते में है, ताकि अस्पताल में उसके इलाज की तैयारी पहले से हो सके।”
ग्रामीणों ने पास के कस्बे के अस्पताल में फोन किया, क्योंकि उनका परिचित वहाँ ड्यूटी करता है, उन्होंने बताया कि एक बच्चे को साँप ने काट लिया है और वे उसे लेकर अस्पताल आ रहे हैं।
वहाँ से उन्हें एम्बुलेंस की व्यवस्था कर दी गई।
योजना बनाई गई कि बच्चे को पहले मोटरसाइकिल से कस्बे के अस्पताल तक ले जाया जाएगा और वहाँ से एम्बुलेंस द्वारा करौली जिला अस्पताल पहुँचाया जाएगा।
कस्बा अस्पताल रास्ते में ही है।
बच्चे को लेकर लोग मोटरसाइकिल पर बिठाकर कस्बे के अस्पताल पहुँचे। वहाँ से बच्चे को एम्बुलेंस द्वारा करौली जिला अस्पताल ले जाया जा रहा था।
लेकिन इसी बीच बच्चे का मामा वहाँ पहुँच गया, और अस्पताल ले जाने की बजाय मंदिर ले जाने के लिए कहने लगा, बच्चे की माँ और मामा ने बच्चे को मंदिर ले जाने का मन बना लिया।
दोनों ने वहाँ मौजूद लोगों की बात मानने के बजाय,
बच्चे को अस्पताल में इलाज के लिए रखने के बजाय,
सीधे जीवली गाँव में काले बाबा के पास ले जाने का फैसला किया।
बच्चे को एम्बुलेंस से करौली जिला अस्पताल ले जाने के बजाय वे उसे एम्बुलेंस से उतारकर सीधे काले बाबा मंदिर ले गए।
काले बाबा तक पहुँचने और वहाँ झाड़-फूँक शुरू होने तक बच्चे की हालत कितनी बिगड़ चुकी होगी, इसका अंदाजा लगाना भी मुश्किल है। कुछ समय बाद खबर आई कि बच्चे को बचाया नहीं जा सका।

दैनिक भास्कर, धौलपुर संस्करण (10 अगस्त 2026) — कंचनपुर थाना क्षेत्र के हांसई धनौरा गांव में सर्पदंश के बाद 16 वर्षीय सेवक जाटव को झाड़-फूंक में 16 घंटे गंवाने के बाद अस्पताल ले जाया गया, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया।
दुर्भाग्य से, यह कोई अकेली घटना नहीं है।
लगभग इसी तरह की एक घटना धौलपुर में भी हुई। दिल्ली में काम करने वाले एक व्यक्ति का 16 वर्षीय बेटा धौलपुर के सरमथुरा कस्बे के पास एक गाँव में रहता था। उसे भी साँप ने काट लिया। लेकिन अस्पताल ले जाने और चिकित्सा उपचार कराने के बजाय उसे झाड़-फूँक के लिए ले जाया गया और अंततः उसकी भी मृत्यु हो गई।
मैंने पिछले कई वर्षों में ऐसी घटनाएँ अनेक बार देखी हैं। चौबीस साल पहले भी स्थिति ऐसी ही थी और आज भी हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में हम यह बुनियादी बात स्थापित नहीं कर पाए हैं कि साँप के काटने का इलाज झाड़-फूँक नहीं, बल्कि समय पर चिकित्सा उपचार और एंटी-स्नेक वेनम (ASV) है।
हर साल साँप के काटने से बच्चे, महिलाएँ और पुरुष अपनी जान गंवाते हैं। भारत में साँप के काटने से होने वाली मौतों के बहुत बड़े आँकड़े सामने आते हैं। यदि हम इसकी तुलना उन देशों से करें जहाँ ऐसी मौतें बहुत कम हैं, तो हमें समझ में आता है कि समस्या केवल साँपों की नहीं है। समस्या इलाज तक पहुँचने में देरी, अंधविश्वास और वैज्ञानिक चिकित्सा को न अपनाने की भी है।
यह कितना विचित्र है कि ग्रामीण क्षेत्रों में लोग सर्दी-जुकाम या दूसरी सामान्य बीमारियों के लिए दवाइयाँ लेने में हिचकिचाते नहीं हैं, लेकिन साँप के काटने के मामले में आज भी झाड़-फूँक, तंत्र-मंत्र और तथाकथित “साँप के देवता” से जुड़ी मान्यताओं के कारण वैज्ञानिक उपचार में देरी कर देते हैं।
सवाल यह है कि हम इस स्थिति को कैसे बदलें?
क्या प्रशासन ऐसे मामलों में, जहाँ किसी व्यक्ति को समय पर चिकित्सा उपचार से दूर रखा गया हो और उसकी मृत्यु हो गई हो, कानूनी कार्रवाई पर विचार कर सकता है? क्या ऐसे झाड़-फूँक करने वाले तथाकथित उपचार केंद्रों पर किसी प्रकार का नियमन या नियंत्रण होना चाहिए? गाँव-गाँव में ऐसे अनेक केंद्र खुले हुए हैं, जहाँ लोगों का इलाज किया जाता है, लेकिन आज तक इनके खिलाफ प्रभावी नियंत्रण या कार्रवाई बहुत कम दिखाई देती है।
यह केवल अंधविश्वास का विषय नहीं है। यह जीवन और मृत्यु का प्रश्न है।
साँप के काटने के बाद हर मिनट महत्वपूर्ण हो सकता है। झाड़-फूँक के नाम पर बीतने वाला समय किसी व्यक्ति की जान ले सकता है।
यह बेहद चिंताजनक स्थिति है। हमें इस पर गंभीरता से विचार करना होगा कि विज्ञान और चिकित्सा पर भरोसा रखने वाली व्यवस्था ग्रामीण समाज तक कैसे पहुँचे और अंधविश्वास के कारण होने वाली इन मौतों को कैसे रोका जाए।

बाघ मेले के दौरान टाइगर वॉच के पर्यावरण शिक्षक धर्मसिंह गुर्जर स्कूली विद्यार्थियों के साथ फोटो प्रदर्शनी के माध्यम से बातचीत करते हुए। टाइगर वॉच पिछले चार वर्षों से पेट्रोनेट एलएनजी के सहयोग से पश्चिमी राजस्थान के बाघ लैंडस्केप में ‘बाघ मित्र कार्यक्रम’ चला रहा है, जिसके तहत बच्चों को वन्यजीव संरक्षण से जोड़ा जा रहा है।










