There is a persistent demand for converting Protected Areas (sanctuaries/ national park) into tiger reserves in India is a new trend. The area may not be suitable for tigers or habitat is degraded but NGOs, local environmental activists and politicians take the conversion issue as an achievement. Elevating conservation status just into papers is not enough but to sustain tiger’s in any areas, in this over crowded country is a big responsibility.
Rajasthan has a lone, but healthy tiger population in Ranthambhore. Each demand for tigers from other parts of Rajasthan raises eyebrows in Ranthambhore (including people who may not necessarily live in Ranthambhore, since some Ranthambhore tigers popular with tourists have fan followings across the globe). There is a common belief among the Ranthambhore ‘supporters’, that we should not give tigers to other protected areas like Sariska, MHTR etc. because they are not safe and therefore not good habitats for tigers. In their words, besides Ranthambhore, all other areas in the state are hell for tigers. On the other hand, there are also many people who believe that there are lobbyists in Ranthambhore resisting the introduction of tigers to other areas in the state, only so that they can maintain their monopoly on tiger tourism in Rajasthan. I think both beliefs are misinformed and wrong. In my opinion, we should develop all possible and suitable areas in Rajasthan for tigers. This is essential to the long-term safety of Ranthambhore tigers. It is not difficult to imagine, especially in the pandemic era, just how vulnerable a lone population is to disease and how it can be wiped out within a few days if things go wrong. Keeping multiple bank accounts is a safe strategy against loot and I think the timeless warning of ‘not putting all your eggs in one basket’ is perfectly apt in this context.
There are many historical examples of when even the large size of an animal population hasn’t prevented it from diminishing in a few weeks. Check here (http://end-times-prophecy.org/animal-deaths-birds-fish-end-times.html) someone has meticulously gathered lots of information. While most of us agree on this, we still harbour doubts that the areas are not safe homes for introduced tigers and that if we do take a risk to introduce tigers to MHTR, Sariska, RBS- Bundi, Kumbhalgarh etc. their chances of perishing increase manyfold.
This line of thought is not entirely unreasonable, because the authorities are not making a fool proof strategy for a couple of reasons- 1. All such programs need high fund investment, and we are not ready to accept that there should be a clear-cut money recovery plan, so that governments do not consider the introduction of tigers a burden on their funds. 2. Usually tiger introductions are hasty political decisions and when the government changes programs, all goes cold.
In the case of MHTR, 4 tigers have been introduced, but only 2 tigers were actually relocated. Two tigers reached on their own. MT3 (T98) arrived on his own bang on the exact spot where Valmik Thapar and Dr. GV Reddy’s team decided to introduce tigers in MHTR. He took a month to reach there from Ranthambhore. Similarly, MT1 (T91) left Ranthambhore and moved towards the Ramgarh Bishdhari Wildlife Sanctuary and even crossed RBS and reached Bhilwara district and he was trying to reach MHTR, but remained only a few kilometres away from the place. You may not be aware that he turned back because we were luring him to localize him in a particular spot in RBS, so he could be captured and introduced in MHTR. Ranthambhore definitely relocated T83 and T106. T83 was continuously going out and causing problems for the Sherpur/ Khawa villagers, they were demanding that she should be shifted to a safe area and similarly T106 was also squeezed among her mother and two other sisters in Sultanpur. What I am trying to prove here is that this introduction was partly a natural phenomenon and partly a stress buster for Ranthambhore too.
The selection of these tigers was technically very correct and was not at all like the haphazard Sariska introduction, where a time crunched WII biologist and over pressurized forest officials selected the wrong tigers for introduction- such as siblings, resident tigers or tigers from the centre of the park. Erroneous tiger selection not only disrupted sightings etc in Ranthambhore, but also damaged tiger families. The selection of T12 proves this. They always selected easily accessible tigers in Ranthambhore and this definitely scared those involved in tourism in Ranthambhore among others.
Politically motivated or irrational demands for tigers are also harmful. There is no point in introducing tigers to Kumbhalgarh before RBS- Bundi. The forests of Bundi are not only suitable, but are also very close to the bulk population of RTR and a more or less safe corridor also exists between them. Kumbhalgarh is good habitat, but it is comparatively far from the source population in RTR, but after prioritizing the development of RBS & MHTR, Kumbhalgarh can also be developed for tigers.
So, introducing tigers to other areas is necessary because it is always good to keep your eggs in many baskets. Second it is essential to introduce tigers to other areas so we can keep Ranthambhore pressure free. Selection of the right tiger is essential and the most important thing is to secure the areas of introduction and make a long term conservation strategy that is fool proof. It is always very painful to see tigers die due to unnatural reasons.
विभिन्न वनस्पत्तियों के लिए स्थानीय समूदायों का पारम्परिक ज्ञान हमेशा से ही एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक विरासत है, परन्तु इन समुदायों की कई परम्परायें ऐसी भी हैं जो प्रकृति के संरक्षण की मुहिम की खिलाफत भी करती हैं।
स्थानीय समूदायों का पारम्परिक ज्ञान एक महत्त्वपूर्ण सामाजिक विरासत है। यह ज्ञान समस्त स्थानीय समुदायों के स्वास्थ्य, खाद्य सुरक्षा, साँस्कृतिक, धार्मिक, व्यापारिक, भौतिक विकास एवं कृषि उत्पत्ति का माध्यम तो है साथ ही उनके स्थानीय पर्यावरण की सुरक्षा भी करता है तथा उनकी विशिष्ठ पहचान को भी बनाये रखने में मदद करता है।
परम्परागत चिकित्सकीय ज्ञान प्रथायें समाज के स्वास्थ्य देखभाल में बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन का अनुमान है कि दुनिया की आबादी का 80 प्रतिशत भाग परम्परागत चिकित्सा पद्धतियों का लाभ लेता है तथा इस कार्य में हर्बल दवायें बहुत महत्त्वपूर्ण भूमिका अदा करती हैं। रासायनिक क्रांति के बाद अनेक परम्परागत आदिम दवाओं के रासायनिक संघटन को समझने में मदद मिली एवं उन दवाओं की प्रभाविता को आधुनिक विज्ञान ने भी पहचान व मान्यता प्रदान की। निश्चय ही यह हमारे परम्परागत समुदायों के लिए गर्व का विषय है। प्राचीन समय से ही इफेड्रा का उपयोग दमा व कम रक्तचाप उपचार के साथ-साथ हृदय रोगों के निवारण में होता रहा है। सर्पगंधा (Rauwolfia serpentina) उच्च रक्तचाप को कम करने की अग्रणी दवा रही है; तो अफीम ने दर्द निवारक दवायें प्रदान की हैं। सदाबहार (Catharanthus roseus) ने रक्त केंसर के ईलाज का मार्ग खोला है तो मधुमेह से निजात पाने की दवायें भी दी हैं। सैलिक्स प्रजाति से “सालिकिन” मिला है जिसके संश्लेषित विकल्प एसिटाइल सेलिसाइलिक अम्ल (एस्प्रिन) ने गठिया से बचने का मार्ग प्रशस्त किया है। अनेक मनोरोगों के ईलाज हेतु धार्मिक कार्यक्रमों के आयोजनों में अनेक पौधों के अर्क के उपयोग का विवरण आदिम जातियों के सन्दर्भ में कटेवा एवं जैन (2006) ने प्रस्तुत किया है। औषधियों से सम्बन्धित पौधें विरासत है जिस पर समय के साथ आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की इमारत खड़ी हुई है। चिकित्सा का परम्परागत ज्ञान आदिवासियों द्वारा संजोई बड़ी विरासत है जिस पर समय के साथ चिकित्सा और वनस्पतियों का विविध तरह से उपयोग कुछ ऐसे ज्ञान क्षेत्र हैं जिसमें आदिवासी समुदायों के योगदान को मानवता भूल नहीं सकती (सुलीवस, 2016; यादव 2019; वेद एवं साथी, 2007; कटेवा एवं जैन 2006; जोशी, 1975; शर्मा एवं जैन, 2009)।
एक कटोरी हथियार का इस्तेमाल कर के लंगूरों को पकड़ा जाता है तथा उनके शरीर के विभिन्न अंगों को निकाल लिया जाता है।(डॉ. अनिता जैन)
राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है जो देश के उत्तर-पश्चिमी दिशा में स्थित है। राज्य की कुल जनसंख्या में 13.47 प्रतिशत आदिवासी समुदायों का प्रतिनिधित्व हैं। यह प्रतिशत देश की औसत आदिवासी आबादी से लगभग दुगना है। राजस्थान में भील, मीणा, गरासिया, डामोर एवं सहरिया प्रमुख जनजातियाँ हैं। राजस्थान की जनजातियाँ अपने परम्परागत ज्ञान में बहुत घनी हैं। इन जातियों ने सदियों से जल, जंगल, पहाड़ों एवं प्राकृतिक स्त्रोतों का किफायती उपयोग के साथ-साथ उनकों संरक्षित भी किया है। वन सुरक्षा एवं संरक्षण का सिलसिला उनकी परम्पराओं, सांस्कृतिक व धार्मिक आयोजनों में ना-ना तरह से रचा-बसा आ रहा है। वे जंगल व पहाड़ को देवता का रूप मानते हैं। दक्षिण राजस्थान में आदिवासी जंगल एवं पहाड़ को बड़े आदर के साथ सदियों से “मगरा बावसी” यानी “पर्वत देव” मानते चले आ रहे हैं।
लेकिन एक दूसरा पहलू भी महत्त्वपूर्ण है। जनजातियों में अनेक परम्परायें ऐसी भी हैं जो प्रकृति के संरक्षण की मुहिम की खिलाफत भी करती हैं। इन परम्पराओं से जैविक विरासत/प्राकृतिक विरासत को नुकसान भी पहुँचता है। यहाँ ऐसी ही कुछ परम्पराओं की जानकारी दी जा रही है।
“मगरा स्नान” पर्वत देव यानी मगरा बावसी की एक विशेष पूजा की एक परम्परा है। जिसमे भील समुदाय के लोग अपने आराध्य देव मगरा बावसी से अपनी मनोकामना पूर्ण करने की प्रार्थना करते हैं। जब उनका मनोरथ पूर्ण हो जाता है तो वे कृतज्ञता व्यक्त करने हेतु पर्वत देव को “अग्नि स्नान” या “मगरी स्नान” कराते हैं। यह आयोजन गर्मी के मौसम में किया जाता है तथा पूजा के रूप में पहाड़ के जंगल में आग लगाई जाती है। जंगल की आग आगे और आगे फैलती जाती है तथा सूखी घास-पत्तों के साथ हरी-भरी वनस्पत्तियाँ, नये उगे नन्हें पौधे, कीट-पतंगे व धीरे चलने वाले जीव-जन्तु सभी मारे जाते हैं। भूमि की नमी को काफी नुकसान पहुँचता है तथा भूमि में रहने वाले उपयोगी जीवाणु व कनक भी मारे जाते हैं। कई बार आग इतनी विषम जगह पहुँच जाती है जहाँ न तो आग बुझाने के लिये वाहन से पानी पहुँचाया जा सकता है न ही सहजता से मनुष्य पहुँच पाता है। फलतः कई दिनों तक जंगल जलता रहता है। लकड़ी के रूप में जमा कार्बन इस समय वाजिक कार्बन डाई ऑक्साइड बनकर वातावरण में पहुँच जाता है। हवा में पहुँचा यह कार्बन जलवायु के परिवर्तन हेतु उत्तरदायी है। हम सहज ही अनुमान लगा सकते है गर्मी की अनियंत्रित विनाशकारी आग में कितनी जैव विविधता का नाश होता होगा (जोशी,1995)।
मगरा पूजा के दौरान पहाड़ के जंगल में लगाईं जाने वाली आग का भीष्म रूप। (डॉ. अनिता जैन)
मधुमक्खियों का शहद परम्परागत विधि से ही संग्रह करने की परिहारी है। जब शहद जोड़ना होता है, छत्ता तोड़ने में माहिर व्यक्ति, जिसे “मामा” कहा जाता है, अपने हाल में घास-फूस का एक बत्ता सा सुलगा कर मधुमक्खियों को धुँआ कर उड़ाता है। कई बार हवा के प्रावह से छत्ता जल उठता है तथा मधुमक्खियों के झिल्लीनुमा नाजुक पंख जल जाते हैं। अब उनके लिये उड़ना संभव नहीं हो पाता एवं वे असहाय छत्ते के नीचे गिर जाती है। कई बार रात्रि को ठंडा पानी छत्ते पर उड़ेल कर मधुमक्खियों को छत्ते से हटाया जाता है। दिनचारी मधुमक्खियाँ रात में उड़ नहीं पाती है, तथा इधर-उधर गिर जाती हैं। इन सभी तरीकों से कितनी बड़ी संख्या में मधुमक्खियाँ मारी जाती हैं, हम सहज अनुमान लगा सकते हैं। यह भी सर्व विदित है यह नुकसान मानवता के लिए बड़ा नुकसान है क्योंकि मधुमक्खियाँ परागण द्वारा फल, सब्जियाँ, बीज उत्पादन करती हैं। वनों में उनकी संख्या में गिरावट आने से प्राकृतिक रूप से बीज बनने की प्रक्रिया पर बुरा प्रभाव पड़ता है। इससे वनों का प्राकृतिक पुनरूद्भाव भी बाधित होता है।
महुआ वृक्ष, आदिवासी समाज में एक सम्मानित वृक्ष हैं। गर्मी के मौसम में एक लघु वन उपज के रूप में महुआ-फूल संग्रह किया जाता हैं। जब महुआ वृक्ष फूलों से लड़ जाता है, तो फूलों को आसानी से इकठ्ठा करने हेतु, वृक्ष की छाँया में पड़ी सूखी पत्तियों में आग लगा दी जाती हैं। कई जगह महुआ वृक्ष बहुत पास-पास होते हैं तथा सूखी पत्तियों की निरन्तरता वन क्षेत्र तक रहती हैं। ऐसी स्थिति में आग बढ़ती हुई जंगल तक पहुँच जाती है। प्रायः देखा जाता है, लोग महुये की पत्तियों की आग को फैलाने से नहीं रोकते। किसी पगदंडी पर यदि कौंच की फली लटकी है तो वहाँ आग लगा कर फली के रौंये से झुलसाये जाते हैं ताकि मार्ग सुरक्षित हो जाये। इस कार्य से भी जंगल में जब-तब आग फैल जाती हैं।
जंगली पक्षियों को पकड़ने का उपकरण। (डॉ. अनिता जैन)
मकर संक्रान्ति पर आदिवासी समाज की लड़कियाँ सुबह विदारी कंद (Pueraria tuberosa) की तलाश में निकल जाती है। वनों से सामूहिक रूप से एक ही दिन में बड़ी संख्या में विदारी कंदों का दोहन हो जाता है। घर लाकर इसको खाने की प्रथा है। जून माह में किसान हल्दी, अदरक, सूरण, रतालू आदि कंदीय फसलों को खेत में उगाने का कार्य करते है। इन फसलों को बीज से नहीं, कन्दों से ही उगाया जाता है। खेत में कन्द मिट्ठी में दबा कर उन पर पलाश (Butea monosperma) की पत्तियाँ तोड़ कर ढकाई का कार्य किया जाता है। इस समय फूल एवं पातड़ी पैदा कर पलाश में आई सभी नई पत्तियाँ तोड़ कर खेत में कन्द रोपाई के काम में “पत्ति मल्य” (Leaf mulch) लगाने के काम में प्रयुक्त हो जाती हैं। पलाश वृक्षों को बड़ी मात्रा में अपने पत्तियाँ खोनी पड़ती हैं। दक्षिण राजस्थान में होली का “डाँडा” रोपने हेतु सेमल की लकड़ी काम में ली जाती हैं। होली पर्व पर जंगलों से बड़ी संख्या में हरे सेमल काट कर शहरों एवं कस्बों में पहुँचाये जाते हैं। इस तरह चयनात्मक कटाई (Selective Felling) से दक्षिणी राजस्थान में सेमल वृक्ष अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है (जैन, 2009)।
Eulophia ochreata के कंद का बाजार।(डॉ. अनिता जैन)
वनों में अतिक्रमण एक बड़ी समस्या है। यह धीमी प्रक्रिया से किया जाता हैं। पहले वृक्षों के आधार पर घेरे में छाल उतारी (Girdling) जाती हैं। जब ये सूख जाते हैं, इन्हें काट कर आग के हवाले कर दिया जाता है। नदियों के तट पर यह कार्य बढ़-चढ़ कर किया जाता है क्योंकि नदि के तट पर यदि खेत बनता है तो नदि का पानी सिंचाई में प्रयोग करने की सुविधा रहती हैं। इससे नदियों के तट के “राइपेरियन वन” बर्बाद हो जाते हैं तथा नम क्षेत्र की जैव विविधताएं नष्ट हो जाती है।
कई जगह खजूर का रस निकाला जाता हैं एवं उससे ताड़ी भी बनाई जाती है। बार-बार रस निकाले जाने से खजूर की सेहत काफी खराब हो जाती है। खजूर के संग्रहित रस को पानीे बड़ी संख्या में मधुमक्खियाँ आती हैं तथा रस के घड़ों में गिर कर मर जाती हैं। कई बार इन घड़ों का रस पीने एवं मधुमक्खियों को खाने भालू भी आने लगते हैं। इस तरह भालूओं के व्यवहार में परिवर्तन होने लागता है जिससे उनका मानव से संघर्ष बढ़ने लगता हैं।
केरिया, बहते पानी में आदिवासियों द्वारा मछली पकड़ने का उपकरण। (डॉ. अनिता जैन)
आदिवासी मछलियाँ पकड़ने हेतु कई मीन विषों का उपयोग करते हैं। ये मीन विष पेड़-पौधों से प्राप्त कर ठहरे पानी में फैंके जाते हैं जिससे मछलियाँ मर कर तैरने लगती हैं। कई बार आदिवासी पानी में विस्फोटक फैंक कर मछली मारते हैं। इस प्रयास में मेंठक, पानी के साँप, कछुये एवं कई बार मगर जैसे प्राणी भी मारे जाते हैं। इन सभी विधियों से न केवल बड़ी बल्कि नन्ही-नन्ही मछलियाँ भी मारी जाती हैं एवं आने वाले वर्षों में प्रजनन लायक मछलियाँ भी नहीं बचने से उनकी संख्या में भारी गिरावट आ जाती है। इससे जलीय पक्षियों एवं मछलियों पर निर्भर करने वाले दूसरे जीवों को भी भोजन संकट से जूझना पड़ता है।
हम यदि अपने आदिवासी समुदायों को जागरूक करें तो निसंदेह उसके सकारात्मक परिणाम आयेंगे इससे उनका सदियों से प्रकृति के साथ का रिशता अटूट रहेगा।
सन्दर्भ:
Sullivan, A.M. (2016). Cultural heritage and new media: A future for the past. 15:604 (www.repository.jmls.edu).
Yadava, R.N. (2019). Significance of Medicinal plants as antiviral agents. Everyman’s Science LIV(4): 215-16.
Ved, D.K., G.A. Kinhol, R. Kumar, S.K. Jain, R.V. Sankar, & R.O. Sumathi (2007). Conservation Assessment & management Prioritization for the medicinal, plants of Rajasthan. Forestry Training institute, Jaipur, Rajasthan & FRLHT Banglore, India.1-14.
Katewa, S.S. & A. Jain (2006). “Traditional folk Herbal Medicines” Apex Publishing House, Jaipur Rajasthan.
Joshi, P. (1995). Ethnobotany of primitive tribes in Rajasthan. Printwell, Jaipur
Sharma, S. (2009). Study of Biodiversity and Ethnobiology of Phulwari wildlife Sanctuary Udaipur, (Rajasthan). Ph. D. thesis, Department of Botany, M.L.S.U, Udaipur.
Jain, V. (2009). Myths, traditions and fate of multipurpose Bombax ceiba L. – An appraisal. IJTK 8(4):638-44.
लेखक:
Dr. Anita Jain (L): Dr. Anita Jain, is currently FES Head, Department of Botany, Vidya Bhawan Rural Institute, Udaipur. She has published several research papers in National & international journals and authored reference books.
Dr. Satish Sharma (R): An expert on Rajasthan Biodiversity, he retired as Assistant Conservator of Forests, with a Doctorate in the ecology of the Baya (weaver bird) and the diversity of Phulwari ki Nal Sanctuary. He has authored 600 research papers & popular articles and 10 books on nature.
कुत्तों से फैला कैनाइन मोर्बिली वायरस या कैनाइन डिस्टेंपर वायरस शेर और बाघ के लिए खतरा बना गया है। यह वायरस कभी भी उनपर कहर बरपा सकता है। अभी तक इसके संक्रमण से जूझ रहे शेर-बाघों को बचाने वाली कोई वैक्सीन तक नहीं है।
अखिल भारतीय बाघ सर्वेक्षण में उपयोग किए गए कैमरा-ट्रैप ने 17 बाघ अभयारण्यों में बाघों की तुलना से ज्यादा आवारा कुत्तों को कैप्चर किया। कुत्तों और पशुधन दोनों की उपस्थिति महत्वपूर्ण संख्या में कम से कम 30 टाइगर रिजर्व में दर्ज की गई थी। विशेषज्ञों का कहना है कि पहले से ही अवैध शिकार और पर्यावास कि कमी आदि चुनौतियों से जूझ रहे बाघ, शेर और अन्य जंगली मांसाहारी, इन जंगली और परित्यक्त कुत्तों और पशुओं (कैटल), के प्रसार से विभिन्न रोगों का संचरण और संक्रमण जल्द ही इनकी विलुप्त हो रही आबादी को लुप्तप्राय कर सकता है।(Jay Mazumdar, 2020)
यहाँ आप वन्यजीवों में खतरे के रूप में उभरे वायरस के बारे में पढ़ने जा रहे हैं। वर्ष 2018 में गुजरात के 23 शेरों कि मौत का कारण बना कैनाइन डिस्टेम्पर वायरस (सीडीवी) एक संक्रामक वायरस है। मूलतः कुत्तों में फैलने वाले इस वायरस से ग्रसित जानवरों का बचना बेहद मुश्किल होता है। सीडीवी पॅरामीक्सोविरइडे (Paramyxoviridae) परिवार के मोर्बिली वायरस जीनस का सदस्य है। सीडीवी एक एनवेलप्ड़पले ओमॉरफीक आरएनए वायरस है, जिसका बाहरी एन्वेलपहेमगलुटिनीन और फ्यूज़न प्रोटीन का बना होता है। ये प्रोटीन, वायरस को नॉर्मल सेल से जुडने और अंदर प्रवेश कर संक्रमित करने में मदद करते हैं। मोर्बिलीवायरस, मध्यम-से-गंभीर श्वसन, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, इम्युनोसुप्रेशन और न्यूरोलॉजिकल रोगों को भिन्न प्रकार के जीवों जैसे की मनुष्य (खसरा वायरस), मांसाहारी (कैनाइनडिस्टेंपर वायरस), मवेशी (रिन्डरपेस्ट वायरस) डॉल्फ़िन और अन्य लुप्तप्राय वन्यजीव प्रजातियों को संक्रमित करने के कारण जाना जाता है। कुत्तों में इसके संक्रमण से गंभीर, बहु-तंत्रीय रोग हो सकते है जो मुख्य रूप से गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल, श्वसन और न्यूरोलॉजिकलसिस्टम को प्रभावित करते हैं। (Appel M. J.1987)
कुत्ते वन्यजीवों के शिकार का उपभोग करते हुए उसे CDV से संक्रमित कर देते हैं और जब वन्यजीव अपने शिकार को खत्म करने के लिये वापस लौटता तो इस घातक बीमारी की चपेट में आ जाता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)
अपने नाम के बावजूद, कैनाइन डिस्टेम्पर वायरस को ऑर्डर कार्निवोरा में विभिन्न प्रकार की प्रजातियों को संक्रमित करने के लिए जाना जाता है। यहां तक कि वर्ष 2013 में गैर-मानवीय प्राइमेट भी सीडीवी से संक्रमित हो गए हैं, जिससे संभावित मानव संक्रमण कि भी संभावनाएँ बढ़ गई है। फेलिड्स को सीडीवी के लिए ज्यादातर प्रतिरोधी माना जाता था लेकिन अमेरिकी जूलॉजिकल पार्कों में रहने वाले बंदी बाघों, शेरों, तेंदुओं और जगुआर में घातक संक्रमणों की एक श्रृंखलाने इस धारणा को गलत साबित किया। फिर, 1994 में, तंजानिया के सेरेनगेटी नेशनल पार्क में कुल शेरों की आबादी के लगभग एक तिहाई शेरों का संक्रमण से मौत होना साबित करता था कि बड़ी बिल्लियाँ इससे बची ना थी। उनकी मौतों के साथ ही सेरेनगेटी इकोसिस्टम के भीतर विभिन्न प्रकार के मांसाहारियों में होने वाली मौतों के लिए सीडीवी को जिम्मेदार ठहराया गया था। उसके बाद फिर ऐसे कई मामले सामने आए जिनमे अन्य फेलिड्स की आबादीजैसे कि बॉबकैट, कनाडा लिनक्स, यूरेशियन लिनक्स, गंभीर रूप से लुप्तप्राय इबेरियन लिनक्स, और अमूर बाघ भी शामिल थे। (Terio, KA. 2013)
इसके अलावा भारत में देखें तो, थ्रेटेड टैक्स (Threatened Taxa) में प्रकाशित एक अध्ययन में कहा गया है कि राजस्थान के रणथंभौर नेशनल उद्यान (Ranthambhore National Park) के समीप 86% कुत्तों का परीक्षण किये जाने के बाद इनके रक्तप्रवाह में CDV एंटीबॉडीज़ के होने की पुष्टि की गई है। इसका अर्थ है कि ये कुत्ते या तो वर्तमान में CDV से संक्रमित हैं या अपने जीवन में कभी-न-कभी संक्रमित हुए हैं और उन्होंने इस बीमारी पर काबू पा लिया है। इस अध्ययन में यह इंगित किया गया है कि उद्यान में रहने वाले बाघों और तेंदुओं में कुत्तों से इस बीमारी के हस्तांतरण का खतरा बढ़ रहा है। अक्सर ऐसा होता है कि शेर/ बाघ एक बार में पूरे शिकार को नहीं खाते हैं। कुत्ते उस शिकार का उपभोग करते हुए उसे CDV से संक्रमित कर देते हैं। शेर/बाघ अपने शिकार को खत्म करने के लिये वापस लौटता है और इस घातक बीमारी की चपेट में आ जाता है।(Sidhu et al, 2019)
वाइल्डलाइफ कंज़र्वेशन सोसाइटी, कॉर्नेल और ग्लासगो विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक वायरस के लिए नियंत्रण उपायों (जैसे कि एक टीका देना, आदि जो इन जानवरों के लिए सुरक्षित हो) को विकसित करके इसके संकट को दूर करने के लिए तेजी से कार्रवाई करने का आग्रह कर रहे हैं। उन्होंने कैनाइन डिस्टेंपर वायरस का नाम बदलकर कार्निवॉर डिस्टेम्पर वायरस रखने का भी सुझाव दिया है ताकि जानवरों की विस्तृत श्रृंखला को दिखाया जा सके जो वायरस का संचरण करते हैं और बीमारी से पीड़ित हो सकते हैं।
कैनाइन डिस्टेंपर कैसे फैलता है?
कुत्ते में सीडीवी के संक्रमण के तीन मुख्य तरीके हैं – एक संक्रमित जानवर या वस्तु के साथ सीधे संपर्क के माध्यम से, एयरबोर्न एक्सपोज़र के माध्यम से, और प्लसेन्टा के माध्यम से। कैनाइन डिस्टेंपर वायरस शरीर कि लगभग सभी प्रणालियों को प्रभावित करता है। 3-6 महीने की उम्र के पिल्ले विशेष रूप से अतिसंवेदनशील होते हैं। सीडीवी एरोसोल की बूंदों के माध्यम से और संक्रमित शारीरिक तरल पदार्थों के संपर्क के 6 से 22 दिन बाद से फैलता है, जिसमें नाक और नेत्र संबंधी स्राव, मल और मूत्र शामिल हैं। यह इन तरल पदार्थों से दूषित भोजन और पानी से भी फैल सकता है। जब संक्रमित कुत्ते या जंगली जानवर खाँसते, छींकते या भौंकते हैं, तो एयरोसोल की बूंदों को पर्यावरण में छोड़ते हैं जो कि आस-पास के जानवरों और सतहों को संक्रमित करते है। संक्रमण और बीमारी के बीच का समय 14 से 18 दिनों का होता है, हालाँकि संक्रमण के 3 से 6 दिन बाद बुखार आ सकता है।डिस्टेम्पर वायरस पर्यावरण में लंबे समय तक नहीं रहता है और अधिकांश कीटाणुनाशकों द्वारा नष्ट किया जा सकता है। जबकि डिस्टेम्पर-संक्रमित कुत्ते कई महीनों तक वायरस का प्रवाह कर सकते हैं और अपने आसपास के कुत्तों को जोखिम में डालते हैं।
कैनाइन डिस्टेम्पर वाइरस संरचना (Source – veteriankey.com)
सीडीवी संक्रमण द्वारा प्रभावित एनाटॉमिक साइट्स (Source – veteriankey.com)
कैनाइन डिस्टेम्पर के लक्षण:
कैनाइन डिस्टेम्पर के प्रारम्भिक लक्षणों के दौरान आँखों से पानी के साथ मवाद जैसा पदार्थ निकलता है। इसके बाद बुखार, भूख ना लगना, और नाक बहने जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं। अन्य लक्षणों में उलटी, दस्त, अत्यधिक लार, खांसी, और सांस लेने में तकलीफ शामिल है। यदि तंत्रिका संबंधी लक्षण विकसित होते हैं, तो असंयम हो सकता है। केंद्रीय तंत्रिका तंत्र के संकेतों में मांसपेशियों या मांसपेशियों के समूहों की एक स्थानीय अनैच्छिक ट्विचिंग शामिल है। जबड़ों में ऐंठन, जिसे आमतौर पर “च्यूइंग-गम फिट”, या अधिक उपयुक्त रूप से “डिस्टेंपर मायोक्लोनस” के रूप में वर्णित किया जाता है, भी लक्षण में शामिल है। जैसे-जैसे संक्रमण बढ़ता है जानवर प्रकाश के प्रति संवेदनशीलता, असंयम, चक्कर, दर्द या स्पर्श के प्रति संवेदनशीलता में वृद्धि, और मोटर क्षमताओं के बिगड़ने के लक्षण दिखा सकता है। कुछ मामलों में संक्रमण अंधापन और पक्षाघात का कारण बन सकते हैं।
कैनाइन डिस्टेम्पर के प्रारम्भिक लक्षणों के दौरान आँखों से पानी के साथ मवाद जैसा पदार्थ निकलता है। इसके बाद बुखार, भूख ना लगना, और नाक बहने जैसे लक्षण देखे जा सकते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)
कैनाइन डिस्टेम्पर का निवारण:
दुर्भाग्य से इस बीमारी का कोई इलाज नहीं है, लेकिन उपचार के तौर पर लक्षणों को नियंत्रित करना शामिल है। हालांकि कैनाइन डिस्टेंपर का इलाज इस बात पर भी निर्भर है कि जानवर की प्रतिरक्षा प्रणाली कितनी मजबूत है और वायरस का असर कितना है। इसके अलावा यदि इस बीमारी का निदान व इलाज शुरुआती चरणों में शुरू कर दिया जाए तो इसे आसाानी से नियंत्रित किया जा सकता है।
कुत्तों के लिए कैनाइन डिस्टेंपर के खिलाफ कई टीके मौजूद हैं। कीटाणुनाशक, डिटर्जेंट के साथ नियमित सफाई से वातावरण से डिस्टेम्पर वायरस नष्ट हो जाता है। यह कमरे के तापमान (20-25 डिग्री सेल्सियस) पर कुछ घंटों से अधिक समय तक पर्यावरण में नहीं रहता है, लेकिन ठंड से थोड़े ऊपर तापमान पर छायादार वातावरण में कुछ हफ्तों तक जीवित रह सकता है। यह अन्य लेबिल वायरस के साथ, सीरम और ऊतक के मलबे में भी लंबे समय तक बना रह सकता है। कई क्षेत्रों में व्यापक टीकाकरण के बावजूद, यह कुत्तों की एक बड़ी बीमारी है।
आरक्षित वनों से डिस्टेम्पर के रोकथाम के लिए सर्वप्रथम राष्ट्रीय उद्यानों के आसपास के क्षेत्र में मुक्त घुमने वाले और घरेलू कुत्तों का टीकाकरण किया जाना चाहिये। इस बीमारी को पहचानने तथा इसके संबंध में आवश्यक अध्ययन किये जाने की आवश्यकता है। जहाँ कहीं भी मांसाहारी वन्यजीवों में CDV के लक्षणों का पता चलता है वहाँ संबंधित जानकारियों का एक आधारभूत डेटा तैयार किया जाना चाहिये ताकि भविष्य में ज़रूरत पड़ने पर इसका इस्तेमाल किया जा सकें। नियंत्रण उपायों पर विचार करने के क्रम में स्थानीय CDV अभयारण्यों में घरेलू पशुओं की भूमिका को विशेष महत्तव दिया जाना चाहिये तथा इस संबंध में उपयोगी अध्ययन किये जाने चाहिये।
इस समस्या का सबसे आसान तरीका है- इस रोग की रोकथाम। वन्यजीवों की आबादी में किसी भी बीमारी का प्रबंधन करना बेहद मुश्किल होता है। सरकार को देश में वन्यजीव अभयारण्यों के समीप कुत्तों के टीकाकरण के लिये पहल शुरू करनी चाहिये।
सन्दर्भ :
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“कुत्ते निःसंदेह अपने जंगली रिश्तेदारों (भेड़िये एवं जंगली कुत्ते) के समान कुशल शिकारी नहीं होते परंतु फिर भी शिकार के प्रयास में वन्य जीवों को गंभीर रूप से घायल जरूर कर देते हैं , जो अंततः अपने गंभीर चोटों के कारण मारे जाते हैं। चूंकि कुत्ते जीवित रहने के लिए हमेशा किसी न किसी रूप से मनुष्य पर ही निर्भर होते हैं इसीलिए इन्हें पारिस्थितिकी तंत्र में प्राकृतिक परभक्षी के तौर पर नहीं देखा जा सकता है।”
प्रकृति में पाये जाने वाले अन्य सभी जीवों की तुलना में कुत्तों को इंसानों का सबसे भरोसेमंद साथी माना जाता है। कुत्तों की उत्पत्ति को मानव उद्विकास की कुछ अत्यंत महत्वपूर्ण घटनाओं की श्रृंखला में एक प्रमुख कड़ी कहा जा सकता है। आनुवंशिक शोध के अनुसार कुत्तों की उत्पत्ति आज से लगभग 15000 से 40000 वर्ष पूर्व यूरोप, मध्य-पूर्व, व पूर्वी एशिया में भेड़ियों की एक से अधिक वंशावलियों से हुई मानी जाती हैं। कुत्ते एवं मानव के इस समानान्तर उद्विकास को सहजीविता का उत्तम उदाहरण कहा जा सकता है। आधुनिक मानव (Homo sapiens) ने अपनी शिकार एवं सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु भेड़ियों को पालतू बनाया जिसके बदले भेड़ियों को भी सुरक्षा, आवास, एवं भोजन की लगातार आपूर्ति सुनिश्चित हुई। तब से लेकर अब तक कुत्तों का इस्तेमाल व्यापक रूप से कई क्षेत्रों में होता आ रहा है , जैसे की शिकार में सहायता से लेकर पशु धन, सम्पदा, व खेतों की सुरक्षा, विस्फोटकों और रसायनों को सूंघने से लेकर बर्फीले स्थानों में परिवहन एवं सबसे महत्वपूर्ण, इंसान का सबसे वफादार दोस्त। कुत्तों व मानव के इस गहरे रिश्ते को अनको कहाँनियों, व फिल्मों के माध्यम से बड़े ही रोमांचित तरीके से दर्शाया गया है । इसी रोमांचित छवि से परे इसी रिश्ते का एक और महत्वपूर्ण पहलू भी है, जिसे सदैव नजरंदाज किया जाता है ।
कुत्तों की अनियंत्रित रूप से बढ़ती संख्या सम्पूर्ण विश्व में जन-स्वास्थ्य की दृष्टि के साथ-साथ वन्य जीवन के लिए भी एक बहुत बड़ा खतरा है । सिडनी विश्व विध्यालय के डॉ टिम एस. डोहरती के एक शोध के अनुसार दुनिया में अब तक कशेरुकी जीवों की 11 प्रजातियों जिसमें पंछी, स्तनधारी, व सरीसृप शामिल है के सम्पूर्ण विलुप्ति करण में कुत्तों का मुख्य योगदान रहा है। इसी के साथ 188 और संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए कुत्तों को सबसे बड़े संभावित खतरे के रूप में देखा जाता है। भारत में डॉ चंद्रिमा होम द्वारा किए गए एक शोध के अनुसार कुल 80 वन्यजीवों की प्रजातियाँ कुत्तों के हमलों से प्रभावित पायी गयी जिनमें से 30 प्रजातियाँ IUCN की संकटग्रस्त प्रजातियों की लाल सूची में शामिल है। इसी शोध में कुत्तों द्वारा वन्य जीवों पर दर्ज कुल हमलों के 45% मामलों में पीड़ित प्राणी अंततः मृत्यु को प्राप्त हुआ है। इसी प्रकार राजस्थान में भी डॉ गोबिन्द सागर भारद्वाज व साथियों द्वारा Indian Forester में प्रकाशित एक अन्वेषण के अनुसार सन 2009 से 2016 के बीच थार रेगिस्तान में 3624 चिंकारा, 607 नील गाय, व 645 काले हिरण के विभिन्न कारणों से घायल होने के मामले दर्ज किए गए थे। इन कुल मामलों में 74.28% चिंकारा, 55.68% नील गाय, व 68.68% काले हिरण के घायल होने का कारण कुत्तों द्वारा हमला पाया गया था। दर्ज मामलों के आधार पर इन जीवों की मृत्यु दर बहुत ज्यादा 96.7% पायी गयी।
कैलादेवी वन्यजीव अभ्यारण्य की एक तस्वीर जिसमे आवारा कुत्तों और भेड़ियों के बीच भोजन को लेकर संघर्ष को देख सकते है। (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)
बढ़ती आबादी के कारण:
एक पारिस्थितिकी तंत्र में किसी भी जीवों की संख्या भोजन की उपलब्धता, परभक्षियों से खतरा, एवं संक्रामक रोगोंके प्रकोप पर निर्भर करती है। कुत्ते मुख्यतः सर्वाहारी होते हैं, एवं भोजन हेतु सीधे तौर पर इंसान द्वारा उपलब्ध खाने, कचरे के ढेर,और मृत जीवों पर आश्रित रहते हैं। इसी कारण कचरा एवं मृत जीवों के प्रबंधन व निस्तारण की कुशल प्रणालियों का अभाव कुत्तों के लिए लंबे समय तक भोजन की उपलब्धता सुनिश्चित करता है, परिणामस्वरूप कुत्तों की संख्या में तेजी से वृद्धि होती है।
पिछले कुछ दशकों में कुत्तों की बढ़ती संख्या को एक खास पारिस्थितिकी बदलाव से भी जोड़ के देखा गया है। 1990 के दशक में सर्वप्रथम कैवलादेवी राष्ट्रीय उद्यान, भरतपुर में गिद्धों की आबादी में अचानक से गिरावट दर्ज की गयी थी। गिद्ध प्रकृति के सबसे महत्वपूर्ण एवं अनिवार्य रूप से मुर्दा खोर (Obligatory scavenger) जीव हैं, जो पर्यावरण में मृत जीवों को खाकर उनके निष्कासन में अहम भूमिका निभाते है। भारत में गिद्धों की तीन मुख्य प्रजातियों (Gyps indicus, Gyps bengalensis, and Gyps tenuirostris) की संख्या में ये गिरावट 95% से भी अधिक देखी गयी थी, जो की सबसे बहुतायत में पाये जाने वाले गिद्ध थे। गिद्धों की संख्या में इतनी भारी गिरावट के कारण मृत जीवों के निष्कासन की दर धीमी हो गयी, परिणाम स्वरूप मृत जीवों की उपलब्धता में एकाएक वृद्धि पायी गयी।
वैकल्पिक मुर्दा खोर (Facultative scavenger) होने के कारण मृत जीवों की इस उपलब्धता का लाभ कुत्तों को हुआ एवं उनकी आबादी में जबरदस्त बढ़त देखी गई। वैकल्पिक मुर्दाखोर वह जीव होते हैं जो मुख्य रूप से भोजन के लिए अन्य चीजों पर निर्भर होते हैं परंतु अवसर मिलने पर मृत जीवों का भी प्रमुखता से सेवन करते हैं। कुत्तों की यही बढ़ती संख्या अब संकटग्रस्त गिद्धों के संरक्षणव आबादी के पुनःस्थापन में सबसे बड़ी चुनौती है क्योंकि कुत्ते अपने उग्र व्यवहार व अधिक संख्या में होने के कारण गिद्धों को मृत जीवों से दूर रखते हैं। दूसरी और भारत के शुष्क एवं अर्द्ध-शुष्क घास के मैदानों में बड़े शिकारी वन्य जीवों की अनुपस्थिति के कारण कुत्ते सर्वोच्च शिकारी बन चुके हैं जिस कारण इनसे किसी जीव द्वारा परभक्षण का खतरा नहीं है। । मनुष्य द्वारा प्रदत्त भोजन की उपलब्धता, बड़े शिकारी वन्य जीवों का अभाव, एवं प्रबंधन की खामियों के कारण कुत्तों की संख्या दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है।
वन्य-जीवन पर विपरीत प्रभाव:
कुत्ते दुनिया भर में सबसे व्यापक व बहुतायत में पाये जाने वाले carnivore हैं, जिनकी वैश्विक आबादी लगभग 1 अरब है। इस आबादी में भारत का हिस्सा लगभग 6 करोड़ का माना जाता है। कुत्तों द्वारा वन्य जीवों पर हो रहे हानिकारक प्रभाव को उनके घुमन्तू व्यवहार एवं मानव पर उनकी निर्भरता के आधार पर समझा जा सकता है। इस आधार पर कुत्तों को निम्न भागों में बांटा गया है।
पालतू कुत्ते, जिनकी गतिविधियाँ मुख्यतः उनके मालिक द्वारा तय परिसीमन के अन्दर ही होती हैएवं ये भोजन व आवास के लिए पूर्णतः अपने मालिक पर ही निर्भर होते है। सीमित गतिविधियों के कारण ये कुत्ते वन्यजीवों के सबसे कम संपर्क में आते हैं।
शहरी आवारा कुत्ते, जिनकी गतिविधियाँ मोहल्लों एवं गलियों तक सीमित रहती है। ये कुत्ते वन्यजीवों के लिए मुख्य खतरा नहीं है परंतु जन-स्वास्थ्य की दृष्टि से जीव-जनित बीमारियों का सबसे बड़ा स्रोत हैं।
ग्रामीण आवारा कुत्तों,जो की गाँवों व उनके आस-पास के इलाकों में पाये जाते हैं। इसी श्रेणी के कुत्तों की एक बहुत बड़ी आबादी गाँवों व मानव बस्तियों से बहुत दूर तक स्वछंद विचरण करती है एवं वन्य जीवों को बहुत बड़े स्तर पर प्रभावित करती है। विश्व में पायी जाने वाली कुल कुत्तों की आबादी का 60 प्रतिशत हिस्सा इसी श्रेणी में आता है।
स्वछंद विचरण करने वाले कुत्तों की यही आबादी वन्यजीवों के सबसे अधिक संपर्क में आती है, परिणामस्वरूप वन्यजीवों के लिए बहुत बड़ा खतरा प्रस्तुत करती है। अपने क्षेत्रीय व्यवहार से प्रेरित कुत्ते अकसर अपने इलाकों के विस्तारण हेतु इंसानी बस्तियों से दूर संरक्षित और असंरक्षित वन्यजीव क्षेत्रों में घूमते वन्य जीवों को विभिन्न स्तरों पर प्रभावित करते हैं।
आवारा कुत्ते न सिर्फ वन्य-जीवों को सताते है बल्कि गुट में उनपर हमला कर घायल और कई बार जान से मार भी देते हैं (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)
कुत्ते मुख्य परभक्षी:
कुत्ते निःसंदेह अपने जंगली रिश्तेदारों (भेड़िये एवं जंगली कुत्ते) के समान कुशल शिकारी नहीं होते परंतु फिर भी शिकार के प्रयास में वन्य जीवों को गंभीर रूप से घायल जरूर कर देते जो अंततः अपने गंभीर चोटों के कारण मारे जाते हैं। कुत्तों का ये हानिकारक प्रभाव लगभग सभी छोटी व बड़ी सिम्पेट्रिक प्रजातियों पर देखा जा सकता है। सिम्पेट्रिक प्रजातीयाँ वह प्रजातीयाँ होती हैं जो एक ही आवास में रहकर समान संसाधनों का समान रूप से प्रयोग करती है। उदाहरण के लिए भारतीय-लोमड़ी, मरु-लोमड़ी, सियार, एवं कुत्ते सिम्पेट्रिक प्रजाति है। उसी प्रकार बाघ एवं तेंदुआ भी सिम्पेट्रिक प्रजाति है। सिम्पेट्रिक प्रजातियों से इस संघर्ष का परिणाम अकसर वन्य जीवों की मृत्यु ही होता है। चूंकि कुत्ते जीवित रहने के लिए हमेशा किसी न किसी रूप से मनुष्य पर ही निर्भर होते हैं इसीलिए इन्हें पारिस्थितिकी तंत्र में प्राकृतिक परभक्षी के तौर पर नहीं देखा जा सकता है।
कुत्ते वन्य जीवों का भोजन:
सामान्यतः परभक्षी की भूमिका निभाने वाले कुत्ते कई स्थानों पर बड़े परभक्षियों के भोजन का मुख्य हिस्सा भी हैं। देश के कई स्थानों में मानव बस्तियों के आस-पास पाये जाने वाले तेंदुओं को कुत्तों का बहुतायत में शिकार करते पाया गया हैं। कुत्तों का शिकार करते हुए तेंदुए जैसे बड़े परभक्षी अक्सर मानव बस्तियों में घुस आते हैं जो की बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को जन्म देते हैं। इस संघर्ष का परिणाम मानव व वन्य जीवों दोनों के लिए हानिकारक होता हैं।
वन्य जीवों के व्यवहार में परिवर्तन एवं उसका प्रभाव:
कुत्तों न केवल प्रत्यक्ष रूप से शिकार कर वन्यजीवों की संख्या घटाते है परंतु परोक्ष रूप से उनके व्यवहार को भी बदलते है। संसाधन परिपूर्ण आवासों में कुत्तों की बढ़ती संख्या वन्य जीवों के संसाधन उपयोग को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। पारिस्थितिकी तंत्र में संसाधनों से तात्पर्य भोजन, पानी, व आश्रय स्थल की उपलब्धता से होता है। ऐसे आवासों में कुत्तों की बढ़ती संख्यावन्य जीवों को निम्न गुणवत्ता वाले संसाधन क्षेत्रों में विचरण करने को मजबूर करती है। इसका परोक्ष रूप से प्रभाव उनके स्वास्थ्य व प्रजनन क्षमता पर पड़ता है जो की अंततः वन्य जीवों की घटती आबादी का कारण बनता है।
कुत्ते संक्रामक बीमारियों के वाहक:
वन्य जीवों व कुत्तों के बीच किसी भी प्रकार का संपर्क, चाहे वह शिकार के तौर पर हो या शिकारी के तौर पर, कुत्तों द्वारा फैलने वाली संक्रामक बीमारियों का खतरा वन्यजीवों के लिए बढ़ाता ही है। अधिकांश मामलों में बीमारियों का यह संक्रमण किसी भी वन्यजीव की सम्पूर्ण आबादी मिटाने के लिए पर्याप्त होता है। कुत्तों में 358 प्रकार के रोग-जनक बैक्टीरिया, कवक, एवं वायरस के रूप में पाये जाते हैं। इनमें से तीन मुख्य वायरस विश्व में कई स्थानोंपर वन्यजीवों की संख्या में गिरावट के उत्तरदायी पाये गए हैं। यह है, रेबीज़ वायरस (RABV), Canine distemper virus (CDV) एवं Canine parvo virus (CPV)। सन 1989 में अफ्रीका के सेरंगेटी के घास के मैदानों में पाये जाने वाले अत्यंत संकटग्रस्त जंगली कुत्तों की कई स्थानीय आबादियों की विलुप्ति का कारण RABV के संक्रमण को पाया गया है। कुछ इसी तरह का प्रभाव 1994 में ईथोपीयन भेड़ियों पर भी देखा गया था। इसी साल सेरंगेटी में ही CDV के प्रकोप से एक हजार से अधिक शेर मारे गए थे जो की वहाँ की कुल शेरों की आबादी का एक तिहाई हिस्सा था।
भारत में कुत्तों द्वारा वन्यजीवों में बीमारियों के संक्रमण से संबन्धित शोध का अत्यधिक अभाव एवं कुत्तों की आबादी के सटीक आंकड़ों की कमी के कारण इन संक्रामक बीमारियों का वन्य जीवों पर प्रभाव कम ही ज्ञात है। डॉ वानक द्वारा महाराष्ट्र के नानज में किए गए एक शोध में टेस्ट किए गए 93.3% कुत्तों में CPV तथा 90.7% कुत्तों में CDV से संबंधित एंटिबोडीज़ पाये गए। नानज में पायी गई कुछ मृत भारतीय लोमड़ियों में भी CDV का संक्रमण पाया गया था। तत्पश्चात भारतीय लोमड़ी पर की गई रेडियो टेलीमेट्री विधि से किए गए शोध में लोमड़ियों व कुत्तों में बढ़ते संपर्क के आधार पर लोमड़ियों की आबादी में बड़े स्तर पर CDV की संभावना व्यक्त की गई है।
Tiger Watch संस्था के वन्यजीव विशेषज्ञ डॉ धर्मेंद्र खांडल की एक जांच के अनुसार रणथम्भोर राष्ट्रीय उध्यान की सीमा के नजदीक भारतीय लोमड़ी का एक परिवार जिसमें नर व मादा के साथ उनके पाँच बच्चे थे की मृत्यु CDV के कारण पायी गयी। डॉ खांडल ने बताया की लोमड़ी के परिवार में मृत्यु से पहले CDV के लक्षण जैसे की आंखों में सूजन, तंत्रिका तंत्र (Nervous system)के ठप्प पड़ जाने के कारण चाल डगमगाना व डर की अनुभूति नहीं होना देखे गए थे।
राजस्थान में कुत्तों का गंभीर प्रभाव:
राजस्थान के परिपेक्ष्य में कुत्तों की समस्या वन्यजीवों के संरक्षण के लिए सबसे बड़ी चुनौती है। इसका प्रमुख कारण राज्य में वन्य जीव संरक्षण क्षेत्रों की कम संख्या एवं अधिकांश वन्य जीवों का इन संरक्षित क्षेत्रों से बाहर गौचर, ओरण एवं कृषि भूमि में पाया जाना हैं। डॉ भट्टाचार्जी के एक शोध के अनुसार पश्चिम राजस्थान के इन्हीं असंरक्षित क्षेत्रों में संकटग्रस्त जीव जैसे चिंकारा व काले हिरणों का जनसंख्या घनत्व भारत के कई बड़े-बड़े वन्यजीव संरक्षित क्षेत्रों के बराबर हैं। इन क्षेत्रों में प्रबल मानवीय गतिविधियों के कारण कुत्तों की संख्या बहुत अधिक है जो की इन संकटग्रस्त प्रजातियों के लिए निरंतर बढ़ता खतरा है। राजस्थान के इन शुष्क क्षेत्रों में किसी भी प्रकार के प्राकृतिक रूप से पाये जाने वाले बड़े परभक्षी जीवों के अभाव में कुत्ते खाद्य श्रृंखला में सर्वोच्च परभक्षी की भूमिका निभाते हैं।
राज्य के कई कस्बों व शहरों के बाह्य क्षेत्रों में मृत मवेशियों को डालने वाले स्थल भी आवारा कुत्तों की बहुत बड़ी संख्या को भोजन उपलब्ध कराते हैं। ये स्थान वन्यजीव क्षेत्रों के आस-पास ही होते हैं जो की कई प्रवासी व स्थानीय गिद्धों की बड़ी संख्या का भी बसेरा है, परंतु कुत्तों की बढ़ती तादाद अक्सर इन गिद्धो को उपलब्ध भोजन से वंचित रखती हैं। कई किसान इन क्षेत्रों में अपने खेतों की सुरक्षा हेतु बाड़ बनाने में महीन जाली का उपयोग करते हैं जो की कई वन्यजीवों के लिए लगभग अदृश्य होती है। परिणामस्वरूप चिंकारा एवं काले हिरण जैसे सींगो वाले जीव खेत पार करते समय इन जालियों में फंस आवारा कुत्तों का आसान शिकार बन जाते हैं। केवल स्थानीय स्तनधारी ही नहीं अपितु प्रति वर्ष हिमालय पार कर सर्दियों में आने वाली प्रवासी कुर जाएँ भी बड़ी संख्या में कुत्तों का शिकार बनी देखी जा सकती हैं । राजस्थान में कुत्तों का ये भयावह प्रकोप खरगोश जैसी छोटी प्रजाति से लेकर सियार व भेड़ियों जैसे मध्यम व बड़े आकार के शिकारियों पर भी बहुत प्रभावी रूप से देखा जा सकता हैं।
हालांकि तेंदुए जैसे बड़े परभक्षी कुत्तों का भोजन के रूप में शिकार करते हैं परंतु इन बड़े परभक्षियों के शावक संरक्षित वन्य क्षेत्रों में घूमने वाले कुत्तों से सुरक्षित नहीं होते तथा मारे जाते हैं।
वर्ष 2017 में कैलादेवी वन्यजीव अभ्यारण्य के पास कुत्तो के एक गुट ने लेपर्ड के दो छोटे शावकों को मौत के घाट उतार दिया था।(फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)
आबादी नियंत्रण व प्रबंधन संबंधी नीतियाँ:
वास्तव में हमारे देश में कुत्तों के प्रबंधन संबंधी नीतियाँ उनकी संख्या कम करने के उद्देश्य से नहीं अपितु उनपर हो रही क्रूरता के निवारण तथा जीव अधिकारों की रक्षा को मद्दे नजर रखते हुए बनाई गयी है। पशु क्रूरता निवारण अधिनियम 1960 के अंतर्गत पशु जन्म नियंत्रण (कुत्ते) नियम 2001 का उल्लेख किया गया है। इस नियम के अंतर्गत कुत्तों की आबादी नियंत्रण के उपायों को चार चरणों में बताया गया है। ये चरण हैं,उन्हें पकड़ना, नसबंदी करना, टिकाकरण, एवं पुन: उसी आवास में छोड़ देना है। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस नियम में कुत्तों को पुन: उसी आवास में छोड़ने की बात पर ज़ोर दिया गया है अर्थात यह नीति गली मोहल्लों से कुत्तों की आबादी हटाने के लिए नहीं परंतु वास्तव में ये आबादी बनाए रखने को प्रेरित करती है। उपरोक्त नियमों में कुत्तों द्वारा वन्यजीवों पर पड़ रहे खतरनाक प्रभावों से निपटने के लिए किसी प्रकार के उपायों का ना तो उल्लेख है ना ही ये नियम इन प्रभावों को ध्यान में रखते हुए बनाये गये हैं।
कुत्तों की नसबंदी द्वारा जन्म दर नियंत्रण कर इनकी संख्या को कम करने का तरीका लंबे समय से अप्रभावी रहा है। बंध्यकरण द्वारा कुत्तों की आबादी के प्रभावी नियंत्रण के लिए किसी भी स्थान में कुत्तों की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा एक निश्चित समय के अंदर (नए प्रजनन काल के शुरू होने से पहले ही) बंध्य करना आवश्यक है। ये तब ही संभव हो सकता हैं जब हमारे पास कुत्तों की आबादी के सटीक आंकड़े, उनके आवासों एवं आबादी को बढ़ाने वाले कारकों के संबंध में अधिक वैज्ञानिक शोध व जानकारी हो जिसका वास्तविकता में बहुत अभाव हैं। बंध्यकरण द्वारा कुत्तों का प्रभावी नियंत्रण भारत जैसी बड़ी आबादी वाले एक विकासशील देश के लिए बहुत खर्चीला विकल्प है।
कुत्तों की संख्या के नियंत्रण में विफलता के लिए न केवल प्रभावी नीतियों का अभाव बल्कि लोगों का गैर-जिम्मेदाराना रवैया भी एक मुख्य कारण है। हमारा संविधानबेशक आमजन को जीव-मात्र के प्रति करुणा दिखनेव भोजन उपलब्ध करवाने के लिए प्रेरित करता है परंतु इसी के साथ उन्हें उन जानवरों की ज़िम्मेदारी के लिए प्रतिबद्ध भी किया गया है। लोग अकसर कुत्तों को गली मोहल्ले में खाना देते वक़्त भूल जाते है की उन कुत्तों की टिकाकरण व उनके उग्र व्यवहार के कारण हुई जन-हानि की जिम्मेदारी भी उन्हीं की है।
कुत्तों द्वारा वन्य जीवों व जन-स्वास्थ्य के खतरों कम करने के लिए इनकी संख्या को नियंत्रण करना अति-आवश्यक है। इसके लिए सर्वप्रथम कचरे का प्रभावी निस्तारण प्रमुख है जिससे उनकी भोजन की उपलब्धता में कमी आएगी जिसका प्रभाव इनकी संख्या पर पड़ेगा। इसके साथ आम-जन को गली मोहल्लों में कुत्तों को भोजन देना भी बंद करना होगा। आवारा कुत्तों की संख्या कम करने के लिए लोगों व पशु प्रेमियों द्वारा स्वस्थ कुत्तों को अपनाने के लिए जागरूक करना होगा। प्रबंधन की ऐसी नीतियाँ बनानी होगी जिसमें कुत्तों के जीवन स्तर के साथ-साथ उनके जन-स्वास्थ्य एवं वन्य-जीवन पर पड़ने वाले हानिकारक प्रभावों के निवारण की समीक्षा भी हो।
चमगादड़ द्वारा COVID-19 को फैलाने के डर से, राजस्थान के दो स्थानों पर अज्ञानता के कारण लोगों द्वारा भारतीय चमगादड़ों को मारते हुए देखा गया है। हाल ही में चूरू जिले के सादुलपुर में 45 चमगादड़ को इस वजह से मार दिया गया, झुंझुनू जिले के लोहरगर्ल क्षेत्र में 150 से अधिक चमगादड़ों को मारा गया।
रोजाना स्थानीय टीवी मे प्रसारित समाचारों के द्वारा चमगादड़ों को कोरोना का मुख्य कारण बताये जाने के कारण भारत में लोगो में यह अवधारणा बन रही है की यह एक अत्यंत घातक प्राणी है, और इसी के चलते चमगादड़ो को अपने आसपास से समाप्त किया जा रहा है I यह पूर्णतया आधारहीन, गैर-वैज्ञानिक एवं भ्रामक है बल्कि यह हमारे पर्यावरण के लिए अत्यंत खतरनाक स्थिति है I
वर्तमान में चमगादड़ो का प्रजनन समय चल रहा है, मादा से प्रजनन के पश्चात नर समूह के रूप मे अलग हो जाते है जिससे चमगादड़ो का वितरण और अधिक दिखाई देने लगता है। यह विशाल समहू लोगो द्वारा COVID-19 के चमगादड़ से जुड़े समाचारो के मध्य भयावह स्थिति पैदा करते हैI इस समय कोरोना के डर से इन नर समूह से स्थानीय लोग डर गए, जिस से 45 नर चमगादड़ (Greater Mouse-tailed Bat) मारे गए। इसी के समान झुंझुनू जिले के लोहार्गल क्षेत्र में भी 150 से अधिक चमगादड़ों (Greater Mouse-tailed Bat) को मारा दिया गया।
अज्ञानता के कारण चमगादड़ों को मार दिया गया (फोटो: डॉ दाऊ लाल बोहरा)
भारत में पाए जाने वाले चमगादड़ फल और कीट खाने वाले हैं जो कृषि और पर्यावरण संतुलन के लिए अच्छे हैं। लोगों को अपने अंधविश्वास को छोड़ देना चाहिए और चमगादड़ को मारना बंद कर देना चाहिए क्योंकि वे भारत में मानव जाति के लिए SARS CoV-2 के वेक्टर नहीं हैं। यदि उनके चल रहे प्रजनन के मौसम में गड़बड़ी होती है, तो राजस्थान के उत्तर-पश्चिम में फलों के चमगादड़ विलुप्त होने का सामना करेंगे, क्योंकि ज्यादातर नर चमगादड़ों को लोगों द्वारा कथित रूप से मारा गया है। चीन में SARS-CoV-2 को जोड़ते हुए राइनोफिडे परिवार के हॉर्सशू चमगादड़ द्वारा ले जाया गया था। यहां तक कि दक्षिण एशियाई चमगादड़ों की दो प्रजातियों में कोरोना वाइरस की खोज पर ICMR की हालिया रिपोर्ट में कोई ज्ञात स्वास्थ्य खतरा नहीं है। अध्ययन में पाए गए वायरस SARS-CoV-2 से अलग हैं और COVID-19 का कारण नहीं बन सकते हैं। लोगों ने चमगादड़ों पर ICMR की अन्य रिपोर्ट का गलत मतलब निकाला है।
रिवर्स ट्रांसमिशन: IUCN व BCI के अनुसार, संक्रमित मानव से घरेलू जानवरों और यहां तक कि चमगादड़ तक रिवर्स ट्रांसमिशन हो सकता है। महाराष्ट्र और गुजरात की तरह COVID-19 की गंभीर सामुदायिक प्रसार स्थितियों में, रिवर्स ट्रांसमिशन की संभावना हो सकती है अमरीका, नीदरलैंड और स्वीडन मे सीवेज जाँच मे कोरोना वायरस पाए गए है न्यूवेजीन, नीदरलैंड के KWR Research Institute के अनुसार सीवेज से संक्रमण फलने की मनुष्य मे कम है परन्तु मवेशियो व चमगादड़ों मे यह संक्रमित जा सकता है। यदि यह घातक वायरस सीवेज, तालाबों, जल निकाय और किसी अन्य अपशिष्ट पदार्थ में मिल जाता है। यह देश के हॉटस्पॉट शहरों में तालाबंदी के बाद ज्यादा विनाशकारी हो सकता है।
COVID-19 महामारी के दौरान चमगादड़ को बचाने के लिए, पहले कर्नाटक सरकार और अब राजस्थान सरकार के अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक अरिन्दम तोमर ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं और चेतावनी दी है कि चमगादड़ किसी भी तरह से चोट या मारे नहीं जाने चाहिए क्योंकि चमगादड़ भारतीय वन्यजीव अधिनियम की अनुसूची-वी 1972के तहत आते हैं। आज तक, उन्हें मारने के लिए सजा का कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन अब चमगादड़ नुकसान पहुंचाने वाले चमगादड़ राजस्थान में अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे।
दुनिया भर में चमगादड़ों की 1411 से अधिक प्रजातियां पारिस्थितिक भूमिका निभा रही हैं जो प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रणालियों और मानव अर्थव्यवस्थाओं के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। चमगादड़ हमारे मूल वन्यजीवों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो भारत में लगभग एक तिहाई स्तनपायी प्रजातियों को नियमित रखते हैं और इस तरह के वेटलैंड्स, वुडलैंड्स, साथ ही शहरी क्षेत्रों में निवास की एक विस्तृत श्रृंखला पर कब्जा करते हैं। वे हमें पर्यावरण की स्थिति के बारे में बहुत कुछ बता सकते हैं, क्योंकि वे सामान्य निशाचर कीटों के शीर्ष शिकारी हैं। चमगादड़ वास्तव में कीट नियंत्रक होते हैं जो हर रात हजारों कीड़े खाते हैं। भारत के चमगादड़ आपको नहीं काटेंगे या आपका खून नहीं चूसेंगे – लेकिन वे मच्छरों के खून को साफ़ करने में मदद करेंगे। चमगादड़ तिलचट्टे, मेढ़क, मक्खियों और मुख्य रूप से मच्छरों को खाते हैं. एक चमगादड़, एक घंटे में 1,200 से 1,400 मछरों को खाता है। इन मच्छरों की वजह से मलेरिया, टायफायड, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी बीमारियां फैलती हैं। चमगादड परागण तथा छोटे कीट-पतंगों का शिकार करते हैं, जिन कीट-पतंगों की वजह से मनुष्य और फसलों को तरह-तरफ़ का रोग होता है। चमगादड उनको खाकर फसलों के लिए जैविक कीटनाशक का काम करते हैं। वर्तमान में कोरोना वायरस महामारी की वजह से चमगादड़ बताई जा रही हैं। ऐसा माना जा रहा है कि यह वायरस चमगादड़ से ही मनुष्य के शरीर में आया है। जिससे चमगादड़ की एक नकारात्मक छवि बनी है। ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि इस महामारी के बाद की चमगादड़ को लेकर नकरात्मकता बढ़ सकती है, जिससे इस जीव के अस्तित्व पर ख़तरा भी उत्पन्न हो सकता है। पर वर्तमान वैज्ञानिक युग में यह सोचना जरूरी होगा जो मनुष्य के उदभव से मानव उपयोगी रहा हो वो केसे इस महामारी फेला सकता है। वैसे 60 प्रकार के वायरस चमगादड़ में पाए जाते हैं परन्तु ये किसी मनुष्य में नहीं फैलते। यदि वर्तमान में प्रकाशित कोरोना संबंधी अनुसंधान पत्रो को देखे तो कहीं पर कोरोना के लिए चमगादड़ ज़िमेदार नहीं है। COVID-19 चमगादड़ से नहीं फैलता।
चमगादड़ों में पाए जाने वाले वायरस मनुष्यों में नहीं फैलते परन्तु आज इन्ही को सबसे बड़ा खतरा समझा जा रहा है (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)
भारत में वे चमगादड़ जो कीटभक्षी हैं – वे केवल कीड़े खाते हैं। कीड़े-मकोड़े खाने वाले चमगादड़ों को फसलों से दूर रखने के साथ-साथ चमगादड़ के काटने के स्थानों के लिए बहुत अच्छा है। कपास की खेती में मुक्त पूंछ वाले चमगादड़ को एक महत्वपूर्ण “कीट प्रबंधन सेवा” के रूप में मान्यता दी गई है। क्योंकि चमगादड़ कुछ क्षेत्रों में बहुत सारे कीड़े खाते हैं, वे कीटनाशक स्प्रे की आवश्यकता को भी कम कर सकते हैं। पक्षियों की तरह, कुछ चमगादड़ पेड़ों और अन्य पौधों के बीजों को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ उष्णकटिबंधीय फल चमगादड़ अपने अंदर बीज ले जाते हैं क्योंकि वे फल को पचा लेते हैं, फिर मूल पेड़ से दूर बीज को निकालते हैं। ये बीज अपने स्वयं के तैयार उर्वरक में जमीन पर गिरते हैं, जो उन्हें अंकुरित होने और बढ़ने में मदद करते हैं। क्योंकि चमगादड़ परागण और बीज को फैलाने में मदद करते हैं, वे वन निकासी के बाद पुनर्वृष्टि में मदद करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। 1411 से अधिक चमगादड़ प्रजातियों में से कई कीटों की विशाल मात्रा का उपभोग करते हैं, जिनमें से कुछ सबसे हानिकारक कृषि कीट हैं। बैट ड्रॉपिंग (जिसे गानो कहा जाता है) एक समृद्ध प्राकृतिक उर्वरक के रूप में मूल्यवान हैं। गुआनो दुनिया भर में एक प्रमुख प्राकृतिक संसाधन है, और, जब चमगादड़ को ध्यान में रखते हुए जिम्मेदारी से उपयोग किया जाता है, तो यह भूस्वामियों और स्थानीय समुदायों के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ प्रदान कर सकता है। चमगादड़ों को अक्सर “कीस्टोन प्रजाति” माना जाता है जो रेगिस्तानी पारिस्थितिक तंत्र के लिए आवश्यक हैं। चमगादड़ के परागण और बीज-प्रसार सेवाओं के बिना, स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र धीरे-धीरे ढह सकते हैं क्योंकि खाद्य श्रृंखला के आधार के पास पौधे वन्यजीव प्रजातियों के लिए भोजन और आवरण प्रदान करने में विफल होते हैं। चमगादड़ जंगल में बीजों को फैलाने में चमगादड़ इतने प्रभावी होते हैं कि उन्हें “उष्णकटिबंधीय के किसान” कहा जाता है। जंगलों को पुनर्जीवित करना एक जटिल प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें पक्षियों, प्राइमेट्स और अन्य जानवरों के साथ-साथ चमगादड़ों द्वारा बीज-प्रकीर्णन की आवश्यकता होती है। लेकिन पक्षी बड़े, खुले स्थानों को पार करने से सावधान रहते हैं, जहां उड़ने वाले शिकारी हमला कर सकते हैं, इसलिए वे आम तौर पर सीधे अपने पर्चों के नीचे बीज गिराते हैं। दूसरी ओर, रात-रात के खाने वाले फलों के चमगादड़, अक्सर हर रात बड़ी दूरी तय करते हैं, और वे काफी हद तक पार करने के लिए तैयार होते हैं और आमतौर पर उड़ान में शौच करते हैं, साफ किए गए क्षेत्रों में पक्षियों की तुलना में कहीं अधिक बीज बिखेरते हैं। रात्रिचर स्वभाव होने के कारण ये रात में फलने और फूलने वाले लगभग सवा पांच सौ प्रजातियों के पेड़ों के परागकण और बीज़ को अलग-अलग प्राकृतिक वास में फैलाते हैं, जिससे जंगल को प्राकृतिक रूप से स्थापित होने में मदद मिलती है। इसलिए इनको ‘प्राकृतिक जंगल को स्थापित’ करने वाले के साथ-साथ, ‘जंगल का रक्षक’ भी कहा जाता है। चमगादड परागण के साथ ही विभिन्न प्रकार के कीट-पतंगों का शिकार करते हैं, जिन कीट-पतंगों की वजह से मनुष्य और फसलों को तरह-तरफ़ का रोग होता है। चमगादड उनको खाकर फसलों के लिए जैविक कीटनाशक का काम करते हैं। एक अध्ययन से यह भी पता चला है कि एक मादा चमगादड़, गर्भावस्था के दौरान अपने शरीर के तीन गुना ज़्यादा वजन तक कीटों का भक्षण कर सकती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक चमगादड़, अपने जीवन काल (लगभग 30 वर्ष) में कितने कीट खाता होगा? इन सबके अलावा चमगादड़ की सुनने की क्षमता बहुत ज़्यादा होती है, जिसकी वजह से ये प्राकृतिक आपदा जैसे तूफान, भूकंप आदि के आने पर अपने व्यवहार में परिवर्तन करते हैं, जिससे मनुष्य को भी इन ख़तरों की कई बार समय से पहले जानकारी हो जाती है।
Greater Mouse-tailed Bat (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)
राजस्थान चमगादड़ की विविधता के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।राजस्थान का रेगिस्तानी क्षेत्र 1980 के दशक तक चमगादड़ों की दो प्रजातियों का घर था, और इंदिरा गांधी नहर के निर्माण के साथ, श्री गंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर, चूरू और कुछ हिस्सों चमगादड़ों की प्रजाति तेजी फेलती गयी। राजस्थान में 25 प्रकार की प्रजातियां पाई जाती है। जिसमें 3 फल चमगादड़ व 22 कीट खाने वाली प्रजाति पाई जाती है। तीन प्रकार की फल चमगादड़, जिसमें टैरोपस ग्रागेटस, रुस्टस प्रजाति, सिनोपटेरस प्रजाति पाई जाती है। यह सामन्यत बड़े पेड़ो पर लटकी हुई अवस्था में पाई जाती है। यह प्रजाति पीपल बरगद पर लटकी हुई देखी जा सकती है। जो पानी के स्त्रोत के पास रहना पसंद करती है। पुरे राजस्थान मे Lesser Mouse-tailed Bat सर्वाधिक संख्या मे पाई जाती है जो समाज के साथ मनुष्यों के घरो मे, पुरानी हवलियो, मंदिरों मे रहना पसंद करती है। रेगिस्तानी क्षेत्र से 15 प्रजातियों, गैर-रेगिस्तानी क्षेत्र से 17 प्रजातियों और अरावली पहाड़ियों से 16 प्रजातियों पाई जाती है। 7 प्रजातिया Indian Flying Fox, Naked-rumped Tomb Bat, Greater Mouse-tailed Bat, Greater False Vampire Bat, Egyptian Free-tailed bat, Greater Asiatic Yellow House Bat and Least Pipistrelle, राजस्थान के सभी भोगोलिक क्षेत्र मे पाई जाती है सात प्रजातिया Greater Short-nosed Fruit Bat, Egyptian Tomb Bat, Lesser Mouse-tailed Bat, Blyth’s Horseshoe Bat, Fulvous Leaf-nosed Bat, Lesser Asiatic Yellow House Bat and Dormer’s Pipistrelle राजस्थान के रेगिस्तानी व पर्वती दोनों क्षेत्र मे पाई जाती है दो प्रजातिया Leschenault’s Rousette व Long-winged Tomb Bat केवल असुष्क और अरावली पर्वत माला मे ही पाई जाती है I अतःआवश्यकता है इन्हे बचाने की न की इन्हे समाप्त करने की।
Novel Corona virus may not be so noble for us, but the way it has changed us is certainly noble. It has united humans by dividing them physically, never have we all freaked together, got anxious for our lives together, and felt together that we were wrong that this planet endured for ages.
Our world lies torn and shattered and all because of an invisible virus that probably was let loose by a horseshoe bat. In our understanding of the Corona virus one critical factor stands out. The destruction of wildlife and wildlife habitats led to its creation. It could be from Wuhan’s horrific wet wildlife markets or fiddling with bats in a Wuhan laboratory or just destroying bat habitats that led to a crisis where millions are infected and hundreds of thousands are dead. Intermediary species like the Pangolin might have helped in mutating this virus and over the last decade we humans have left no stone unturned to decimate pangolins and smuggle them live into wildlife markets. They could very easily have been the intermediary species. China is hugely responsible for the demand and needs to be shamed across the world. My finger is pointed at it. I watched closely its enormous role in the tiger crisis that enveloped India from the 1990’s for two decades. I have watched its increasing presence in Africa and the resultant decline in African wildlife. At so many international meetings for the last 30 years it was warned to end its illegal wildlife trafficking and markets. It never paid heed. Endless wildlife WARRIORS fought to prevent China from this highly destructive role. But China as a global economic power cared little and stomped on in its craze for wild animal parts and associated medicine. As far as I am concerned this virus is a result of this. This virus is also a result of all those political and business leaders who did not care. All those who scoffed and mocked at Nature’s Warriors, hurled abuse on those who served both wildlife and nature.
Wildlife trade and wet markets are viruses mixing bowls (PC: Dr. Dharmendra Khandal).
Pangolin might have helped in mutating Corona virus and we humans have smuggle them live into wildlife markets (PC: Dr. Dharmendra Khandal).
The disrespect that so many who have suffered who served nature is shocking. Many of us are now angry and unforgiving. Our warnings for the last 50 years have come true. We have tirelessly strived to prioritized the protection of our natural world. Few who made policy or took decisions listened. Today they should be covered in guilt. Big business failed nature. Few provided grants to protect it. The leaders of business preferred to remain ignorant of nature’s ways. Now they have been hit where it hurts. Trillions of dollars lost and economies at a standstill. If we wake up from this nightmare will they learn? Will they shed their arrogance? The less said about our politicians and their bureaucrats the better. I remember how hard I tried to get Prime Minister Manmohan Singh to create a department of forests and wildlife (which did not exist in our Ministry of Environment and Forests) so that this essential sector was properly governed. The idea was to make a separate ministry over time and allow a Ministry of Environment and Climate Change to be independent of it. He agreed with my logic, (10 years ago) and instructed that it should be done. But a bunch of secretaries vetoed him. Prime Minister Narendra Modi has not held one meeting of the National Board of Wildlife in 7 years. Nobody cares. They still do not realize that the virus they deal with finds its origin in wildlife and gets released because of bad governance. They do not realize that our country is in dire straits, the economy a mess and life disrupted because of how we deal with the natural world and its myriad species. Prime Ministers, Ministers, political leaders, bureaucrats, business leaders, and society at large…. get educated fast as nature’s time bomb is ticking. This Corona virus is a warning. The next time Nature will let loose a virus that will be much worse.
This global pandemic could have come much earlier. It did not because of the tireless service of both Nature Warriors and Wildlife Warriors. These people come from all walks of life in village, town and city and spend their time passionately defending nature. Without them we would have no world to live in. They provide the most essential service to our nation but are least recognized or respected. More often than not they are relegated to oblivion. We need to remember all of them today and salute them. Who are these people? 150000 are forest officers and forest guards. Another 100000 are scientists, wildlife watchers, wildlife travel promoters, wildlife hotel creators, wildlife photographers, wildlife filmmakers, writers, conservationists, naturalists, village volunteers and NGO’S. We need to celebrate them and when we are out of this crisis the Prime Minister must do some brainstorming with them. You cannot run an economy without a healthy natural world. This virus reveals how easily economic collapse comes. Prime Ministers of the world will have to put forests, wildlife and the environment on the top of the agenda if you do not want to be plagued with more disease and death. Economic recoveries must be green in nature. No longer can we harm the natural wealth of our country or of any country. This virus has proven that a virus from Wuhan has swept the world. That is the interdependence of the world today. Heal nature must be our call sign. Our leadership across this planet must wake up to a new era where life, the economics of it, the design of it arenon-wasteful and non-exploitative, and led with a great respect for nature. To prevent global warming and climate change must be immediate priorities. This virus has revealed how our planet is vulnerable and without healing nature we as a human race can die. Let’s learn our lessons and act hand in hand with the natural world. We need urgent global meetings of world leaders on forests and wildlife. We need global decisions to close wet markets and wildlife trade. We need to find noninvasive solutions to our future. Enough of diplomacy. It is time to call a spade a spade. Enough of G7 and G20 meets. They need to be re-strategized in the light of what has happened. Our mission today must be to create key strategies to protect natural eco -systems, our wilderness and all the life that abounds in it. If we do not achieve this mission, there is no hope of a future for our planet.