पंजाब रेवेन

पंजाब रेवेन

“रेवेन, कर्ण कर्कश ध्वनि वाला विस्मयकरक पक्षी है, जिसमे इतनी विवधता पायी जाती है कि इस पर एक ‘कागशास्त्र’ कि रचना भी कि गई”

राजस्थान में एक कौआ मिलता है जिसे “पंजाब रेवेन” के नाम से जाना जाता है तथा स्थानीय भाषा में इसे “डोड कौआ” भी कहा जाता है क्योंकि यह आकार में सामान्य कौए से लगभग डेढ़ गुना बड़ा होता है। इस कौए को प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ “ऐ ओ ह्यूम (A O Hume)” ने पंजाब, उत्तरी-पश्चिमी भारत और सिंध से ढूंढा तथा इसका विवरण भी दिया। इस रेवेन की सबसे रोचक बात यह है की इसे देखने पर ये सामान्य कौए जैसा ही लगता है, परन्तु यदि ध्यान से देखा जाये तो आभास होता है की ये कौआ एकदम से इतना काला और बड़ा क्यों लग रहा है। कुछ संस्कृतियों में रेवेन को बुरे समय का संकेत माना जाता है तो कुछ में इसे अच्छा भी समझा जाता है, परन्तु वास्तव में रेवेन एक उल्लेखनीय पक्षी हैं, क्योंकि यह फॉलकन जैसे शिकारी पक्षी के समान एक उत्कृष्ट हवाबाज है। यह प्रजनन काल में अपने हवाई कौशल का प्रदर्शन भी करता है। वहीँ दूसरी ओर यह मृत जानवरों को खाकर हमारे पर्यावरण की सफाई और अन्य पक्षियों की तरह फल खाकर बीज प्रकीर्णन में भी मदद करते हैं।

पंजाब रेवेन आकार में सामान्य कौए से लगभग डेढ़ गुना बड़ा तथा इसके पूरे शरीर का रंग अधिक काला होता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

वर्गिकी एवं व्युत्पत्ति-विषयक (Taxonomy & Etymology):

सामान्य रेवेन (Common Raven) की आठ उप- प्रजातियों में से एक,पंजाब रेवेन एक बड़े आकार का काला पेसेराइन पक्षी है। सामान्य रेवेन, पूरे उत्तरी गोलार्ध में बहुत ही व्यापक रूप से वितरित है तथा रंग-रूप के आधार पर इसकी कुल आठ उप-प्रजातियां पायी जाती है। हालांकि हाल ही में हुए कुछ शोध ने विभिन्न क्षेत्रों से आबादियों के बीच महत्वपूर्ण आनुवंशिक अंतर भी पाए है। सामान्य रेवेन, उन कई प्रजातियों में से एक है जिन्हे मूलरूप से “लिनिअस (Carolus Linnæus)” द्वारा अपने 18 वीं शताब्दी के काम, सिस्टेमा नेचुरे (Systema Naturae) में वर्णित किया गया था, और यह अभी भी अपने मूल नाम करवउस्कोरस से जाना जाता है। इसके जीनस का नाम Corvus “रेवेन” के लिए लैटिन शब्द से लिया गया है और इसकी प्रजाति का नाम corax ग्रीक भाषा के शब्द “κόραξ” का लैटिन रूप है जिसका अर्थ है “रेवेन” या “कौवा”।

पंजाब रेवेन, C. c. subcorax, पक्षी जगत के Corvidae कुल का सदस्य है। पाकिस्तान के सिंध जिले और उत्तर-पश्चिमी भारत के आसपास के क्षेत्रों तक सीमित आबादी को मुख्यरूप से पंजाब रेवेन के रूप में जाना जाता है। कभी-कभी इसे C. c. laurencei नाम से भी जाना जाता है, यह नाम 1873 में “Father of Indian Ornithology” ऐ ओ ह्यूम (A O Hume) द्वारा सिंध में पायी जाने वाली आबादी को दिया गया था। स्थानीय भाषाओ में इसे कई अलग-अलग नामों से जाना जाता है जैसे राजस्थान में “डोड काक”, पंजाब में “डोडव काक” और ऊपरी सिंध में इसे “टाकणी” कहते है, टाकर का अर्थ एक ऊँची चट्टान होता हैं।

निरूपण (Description):

यह रेवेन की सभी अन्य उप-प्रजातियों से आकार में बड़ा होता है, परन्तु इसके गले के पंख (hackles) अपेक्षाकृत थोड़े छोटे होते हैं। इसका पूरा शरीर काले रंग का होता है, जिस पर एक गहरे नीले-बैगनी रंग की चमक प्रतीत होती है परन्तु इसकी गर्दन और छाती गहरे भूरे रंग की होती हैं। इसमें नर व् मादा रंग-रूप में एक से ही होते है परन्तु नर आकार में मादा से बड़ा होता है। 1.5 से 2 किलो वजन होने के कारण यह पक्षी जगत का सबसे भारी पेसेराइन पक्षी है और इसका वजन अधिक होने के बावजूद भी ये, उड़ान के समय फुर्तीले होते हैं। इसके बड़े आकार के अलावा, यह अपने रिश्तेदार “सामान्य कौवे” से कई वजहों से अलग होता हैं, जैसे की इसके शरीर का आकार 55-65 सेमी, पखों का विस्तार 115-150 सेमी तथा चोंच बड़ी, मोटी व काली होती है, गले के आसपास और चोंच के ऊपर झबरे पंख तथा पूंछ एक पत्ती के आकार की होती है। एक उड़ते हुए रेवेन को उसकी पूंछ के आकार, बड़े पंख और अधिक स्थिरता से उड़ने की शैली के कारण कौवे से अलग किया जाता है। वहीँ दूसरी ओर सामान्य कौए के शरीर का रंग ग्रे, आकार 40-45 सेमी, पखों का विस्तार 75-85 सेमी तथा चोंच थोड़ी पतली होती है।

अंग्रेजी प्रकृतिवादी “Eugene W. Oates” द्वारा बनाया गया तथा उनकी पुस्तक “The Fauna of British India” में प्रकाशित चित्र, जो पंजाब रेवेन व् अन्य रेवेन के गले के पंखों में अंदर दर्शाता है।

आकार व् रंग-रूप को देखते हुए, पंजाब रेवेन और सामान्य कौए में आसानी से अंतर कर उन्हें पहचाना जा सकता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

वितरण व आवास (Distribution & Habitat):

भारत में, पंजाब, बीकानेर, जोधपुर, जयपुर के उत्तरी भाग और सांभर झील तक पंजाब रेवेन का वितरण एक आम पक्षी के रूप में है तथा जमुना नदी के पूर्वी इलाको में कम देखने को मिलता है। दक्षिणी और पश्चिमी सिंध के कई हिस्सों की जलवायु व्पर्यावास पंजाब जैसी होने के बावजूद भी रेवेन सिर्फ प्रजनन के लिए ही आते हैं और एक स्थायी निवास बनाने में विफल रहते हैं जबकि निचले पंजाब में यह एक स्थायी निवासी है ।.K.Eates के अनुसार सिंध के ऊपरी इलाको में पाए जाने वाले रेवेन मुख्यतः प्रवासी होते है जो सितंबर और अक्टूबर माह में प्रजनन के लिए यहाँ आते है तथा मई में वापस चले जाते हैं। दक्षिण में इसे सांभर झील तक प्रजनन करते देखा गया है। भारत के अलावा यह बलूचिस्तान, दक्षिणी पर्शिया, मेसोपोटामिया, दक्षिणी एशिया और फिलिस्तीन में भी पाया जाता है। पंजाब रेवेन मुख्यरूप से वन प्रदेशों वाला पक्षी है परन्तु कभी-कभी इसे वनों से सटे मानव रिहाइश इलाकों के पास भी देखा जाता है।

भारत में पंजाब रेवेन का वितरण दर्शाता मानचित्र (Source: Birdlife.org and Grimmett 2014)

प्रजनन (Breeding):

रेवेन किशोर लगभग दो या तीन वर्ष की आयु के बाद अपने साथी जोड़े बना लेते है। युवा अवस्था में ये अक्सर झुण्ड में रहते है परन्तु एक बार जोड़ी बन जाये, तो ये पूरे जीवन साथ रहते व घोंसला बनाते हैं। एक साथी ढूंढने के लिए हवा में कलाबाजियां लगाना, बुद्धिमत्ता और भोजन प्रदान करने की क्षमता का प्रदर्शन करना प्रमुख व्यवहार हैं। एक जोड़ा आमतौर पर एक ही स्थान पर घोंसला बनाता है। इससे पहले कि वे घोंसले का निर्माण और प्रजनन शुरू करें प्रत्येक जोड़ी के पास अपने स्वयं का एक क्षेत्र होना चाहिए, और इस प्रकार यह एक क्षेत्र और उसके खाद्य संसाधनों का बचाव करते है भले ही उसके लिए आक्रामक ही क्यों न होना पड़े। इनके इलाके का क्षेत्रफल खाद्य संसाधनों के घनत्व के अनुसार भिन्न-भिन्न होता हैं। इनका घोंसला पेड़ों की छोटी टहनियों से बना एक गहरा कटोरा होता है, जिसका अंदरूनी हिस्सा पेड़ की छोटी जड़ों, छाल और हिरण के फर से पंक्तिबद्ध होता है। पक्षी विशेषज्ञ “ह्यूम” (A O Hume) अपनी पुस्तक “Nest & Eggs of Indian Birds” में बताते हैं की पंजाब रेवेन अपना घोंसला एक ऊँचे पेड़ पर बनाते हैं और हर दो घोंसलों के बीच लगभग सौ गज की दुरी तो होती ही है। यदि पक्षी घोंसले का निर्माण व मरम्मत जल्दी शुरू कर देते हैं, तो वे अक्सर बहुत धीमी गति से कार्य करते है। लेकिन अगर काम की शुरुआत देर से की जाती है तो लगभग एक हफ्ते में ही ये सारा काम पूरा कर लेते है। कुछ घोंसले उत्तराधिकार में कई वर्षों तक कब्जे में रहते हैं, और तब तक नहीं छोड़े जाते है जब तक वे पूरी तरह से नष्ट न हो जाये। कई बार ये अपना घोंसला ऊँची चट्टानों पर भी बनाते है, श्रीओस्मास्टन (Mr. Osmastan) कहते हैं कि रावल पिंडी के पास पंजाब रेवेन लगभग हमेशा एक चट्टान पर घोंसला बनाते थे। मादा दिसंबर से फरवरी माह के बीच में एक बार में 3 से 7 हल्के पीले नीले-हरे, भूरे धब्बे वाले अंडे देती है।

किशोरावस्था के बाद नर व् मादा पंजाब रेवेन प्रजनन के लिए जोड़ी बनाते हैं तथा प्रत्येक जोड़ी पूरे जीवनभर साथ रहती हैं। सामान्य कौए और पंजाब रेवेन में यह भी एक मुख्य अंतर है, क्योंकि जहाँ कौए अक्सर झुण्ड में देखे जाते हैं वहीँ पंजाब रेवेन हमेशा जोड़ी में दिखाई देते है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

इसके आकार, सतर्कता और रक्षात्मक क्षमताओं के कारण, इसके कुछ प्राकृतिक शिकारी भी हैं। इसके अंडों के शिकारियों में उल्लू, मार्टिन्स और कभी-कभी ईगल शामिल हैं। रेवेन अपने बच्चों का बचाव करने में काफी जिम्मेदार होते हैं और आमतौर पर कथित शिकारियों पर हमलाकर उनको दूर करने में सफल होते हैं। ह्यूम बताते हैं की जब उनको पहली बार इस पक्षी का घोंसला मिला तो वह एक कीकर के पेड़ पर लगभग 20 फ़ीट की ऊंचाई पर था और उसमे पांच अंडे थे। उन अंडो को निकालने पर रेवेन ने बहुत ही आपत्ति जताई और पेड़ पर चढ़ने वाले आदमी के सिर पर हमला भी किया। हमारे द्वारा अंडे गायब कर देने के बाद दोनों पक्षी पेड़ पर बैठ गए और बड़े ही मनोरंजक तरीके से एक दूसरे की तरफ देखते हुए अपना सिर हिलाने लगे। फिर वो आसपास के हर पेड़ व् उनके खोखलों में झांक कर यह सुनिश्चित करने लगे की अंडे वास्तव में चले गए हैं।

आहार व्यवहार (Feeding habits):

पंजाब रेवेन, सर्वाहारी होने के कारण एक प्रजाति के रूप में ये हमेशा से ही सफल रहे है क्यूंकि ये पोषण के स्रोत खोजने में बेहद बहुमुखी और अवसरवादी है, तथा इनका आहार स्थान और मौसम के साथ व्यापक रूप से भिन्न हो सकता है। उदाहरण के लिए, कुछ स्थानों पर ये मुख्यरूप से मरे हुए जानवरों, कीड़ों और बीटल्स को खाते है। खेती-बाड़ी वाले इलाके के पास ये अनाज व फलों पर निर्भर रहते हैं। ये छोटे अकशेरूकीय, उभयचर, सरीसृप, छोटे पक्षियों और उनके अंडो का शिकार भी करते हैं। रेवेन जानवरों के मल, और मानव खाद्य अपशिष्ट के अवांछित भागों का भी भोजन की तरह उपभोग करते हैं। यदि इनके पास अधिक शेष भोजन हो तो ये खाद्य पदार्थों को संग्रहीत भी करते हैं।

बुद्धिमत्ता (Intelligence):

रेवेन को हमेशा से ही सभी पक्षियों से ज्यादा बुद्धिमान माना गया है। ये अन्य पक्षियों की आवाज की नक़ल कर सकते है। शिशु रेवेन का व्यवहार बहुत ही चंचल व् अलग-अलग चीजों से खेलने वाला होता है, जैसे ये हवा में तेज-तेज उड़कर एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश तो कभी कलाबाजियां खाते है और कभी पेड़ की छोटी डंडिया तोड़ कर भी खेलते है। इनमे आगे की योजना बनाने, बुनियादी साधनों को समझने और उन्हें अपनी पसंद का कुछ प्राप्त करने के लिए नियोजित करने की क्षमता भी रखते हैं। कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि वे ग्रह के सबसे चतुर पक्षी हैं; तो वहीँ दूसरों का तर्क है कि इनकी दिमागी क्षमता ऐप (Ape) से भी ज्यादा है।

पुराणशास्र (Mythology):

रेवेन हजारों वर्षों से मनुष्यों के साथ रहे हैं और कुछ क्षेत्रों में इतने अधिक हैं कि लोगों ने उन्हें कीटों के रूप में माना है। सदियों से, यह पौराणिक कथाओं, लोक कथाओं, कला और साहित्य का विषय रहा है। दुनियाभर के कई समुदायों में रेवेन को लेकर कहानियां हैं, लेकिन दुर्भाग्य से इनमे से कई नकारात्मक ही है। हिन्दू पौराणिक कथाओं में, रेवेन लोकप्रिय लेकिन अशुभ देवता शनि का वाहन है। कई समुदायों में रेवेन व् कौए को जीवन और मृत्यु के बीच ‘मध्यस्थ जानवर’ माना जाता हैं। जहाँ कुछ समुदायों में इन्हे अशुभ माना गया है वहीँ कुछ देखो में इसे जीत का प्रतिक मानते हुए इसकी मोहर सैनिको की पोशाक पर बनी रहती थी। पूर्वी एशिया में इनको किस्मत से जोड़ा जाता है तो अपने यहाँ मुंडेर पर बैठकर काँव-काँव करने वाले कौवे को संदेश-वाहक भी माना जाता है।

परन्तु इन सभी पौराणिक कथाओ से अलग हट कर हम रेवेन को देखे तो ये भी अन्य पक्षियों की तरह हमारे पर्यावरण के लिए महत्वपूर्ण है जो मृत जानवरों को खाकर पर्यावरण को साफ़ सुथरा रखते है।

सन्दर्भ:
  • Baker, E.C.S. 1922. The fauna of British India, including Ceylon and Burma. Birds- Vol. 1. 2nd London
  • Cover Image Picture Courtesy Dr. Dharmendra Khandal.
  • Gould, J. 1873. The Birds of Great Britain. Vol. 3. London.
  • Grimmett, R., Inskipp, C. and Inskipp, T. 2014. Birds of Indian Subcontinent. Digital edition.
  • https://round.glass/sustain/wild-vault/ravens-intelligence/
  • Hume, A.O. 1889. The Nests and Eggs of Indian Birds. Vol. 1. 2nd London.
  • Oates, E.W. 1889. The fauna of British India, including Ceylon and Burma. Birds- Vol. 1. London.

 

 

पैंगोलिन: अत्यंत दुर्लभ जीव की बढ़ती समस्याएं

पैंगोलिन: अत्यंत दुर्लभ जीव की बढ़ती समस्याएं

एक नजर में दिखने पर किसी को अचम्भित कर देने वाला शर्मीले स्वभाव का वन्यजीव पैंगोलिन राजस्थान में बहुत ही कम तथा सीमित स्थानों पर पाया जाता है, इसकी दुर्लभता के कारण कभी किसी ने सोचा भी न होगा कि पैंगोलिन कि तस्करी राजस्थान से भी हो सकती है।

जून 2020 में मध्य प्रदेश वन विभाग कि स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) ने एक बड़ी सफलता के साथ वीडियो शेयरिंग साइट यूट्यूब (YouTube) पर पैंगोलिन शल्क बेचने वाले तस्करों के एक गिरोह का भंडाफोड़ किया है। पुलिस ने दो लोगों को गिरफ्तार किया है जिनकी पहचान शेर सिंह धाकड़ और राजस्थान के निवासी वकिल उर्फ पप्पू के रूप में हुई है। एसटीएफ के अधिकारी रितेश सरोठिया के अनुसार, एसटीएफ विंग ने शिवपुरी जिले के निवासी शेर सिंह धाकड़ के कब्जे से 2.7 किलोग्राम पैंगोलिन शल्क जब्त किया है। वैश्विक ग्राहकों को आमंत्रित करने के लिए उसने यू-ट्यूब पर अपना मोबाइल नंबर दिखाया था, एसटीएफ ने इसको पकड़ने के लिए एक ग्राहक भेजा और मौके पर गिरफ्तार किया। पुलिस के अनुसार, 10वीं कक्षा का टॉपर धाकड़, पप्पू से शल्क खरीदता था।

वीडियो शेयरिंग साइट यूट्यूब (YouTube) पर पैंगोलिन शल्क बेचने वाला शेर सिंह “शेरु” जब्त शल्कों के साथ (फ़ोटो: रितेश सरोठिया)

अवैध नेटवर्क के भंडाफोड़ के बाद एसटीएफ की यह 12 राज्यों से 165वीं गिरफ्तारी है। इससे पूर्व रणथंभोर स्थित टाइगर वॉच संस्था द्वारा दी गई एक महत्वपूर्ण सूचना के अंतर्गत कार्यवाही करते हुए एसटीएफ द्वारा 27-28 किलो पैंगोलिन शल्क जब्त किया गया तथा एक तस्कर दम्पत्ति (मुन्नी और हरी सिंह) कि गिरफ़्तारी भी कि गई। कार्यवाही के दौरान पाया गया कि भिंड / मोरेना स्थित मोगया सहित अन्य शिकारी जाति के लोग इनकी तस्करी में मदद करते थे और बाघ, बघेरा और अन्य वन्यजीवों कि भी तस्करी में शामिल थे। विश्व में सबसे ज्यादा पैंगोलिन कि तस्करी की जाती है और हर दिन लगभग तस्कर और शिकारी पैंगोलिन शल्क के साथ पकड़े जाते हैं। इसका अन्धाधुन्ध शिकार, बड़े पैमाने पर तस्करी, तेजी से बढ़ता शहरीकरण व इनके घटते प्राकृतिक आवासों से इनकी संख्या में भारी गिरावट आयी है।

पैंगोलिन एक गैर आक्रामक खूबसूरत लेकिन शर्मीला स्तनधारी जीव है। दूर से देखने पर यह छोटा डायनासोर जैसा प्रतीत होता है। गहर-भूरे, पीले-भूरे अथवा रेतीले रंग के इस शुण्डाकार निशाचर जीव को फोलिडोटा (Pholidota) ऑर्डर में रखा गया है। पैंगोलिन का छोटा शरीर एक चीड़ शंकु (pine cone) के समान होता है जिसकी लम्बाई लगभग दो मीटर तथा वजन लगभग पैंतीस किलो तक का होता है। इसके शरीर पर केराटिन के बने शल्क नुमा (scaly) संरचना होती है जो कि इस मासूम जीव का एकमात्र रक्षा तंत्र है। पैंगोलिन ऐसे शल्कों वाला अकेला ज्ञात स्तनधारी है। हालांकि वर्मी (Armadillo) भी कवच युक्त होते हैं लेकिन उनका कवच चमड़े का बना होता है। खतरा महसूस होने पर ये चेहरे को पूंछ में छुपा कर खुद को लपेटकर अच्छी तरह से संरक्षित एक गेंद का रूप ले लेते हैं। नुकीले शल्क इन्हें शिकारियों से सुरक्षा प्रदान करते हैं। इनकी पूंछ नुकीले काँटों के रूप में विकसित होती है जिन्हें ये हथियार के रूप में इस्तेमाल करते हैं।

पैंगोलिन नाम मलय शब्द पेंगुलिंग से आया है, जिसका अर्थ है “जो लिपटकर गोल हो जाता है” भारत में इसे चींटीखोर, वज्रशल्क या सल्लू साँप भी कहते हैं। इस जिज्ञासु कीटभक्षी की विश्व भर में आठ प्रजातियां हैं जो अफ्रीकी और एशियाई महाद्वीप पर पाए जाते हैं। इन आठों ज्ञात प्रजातियों को मनीडे (Manidae) परिवार में रखा गया है। इस परिवार में इनको तीन जातियों में बांटा गया है, मानिस (Manis), फेटाजीनस (Phataginus) और स्मटसिया (Smutsia)। एशिया में पाई जाने वाली चारों प्रजातियां मनीस में शामिल हैं, जबकि अफ्रीका में रहने वाली चार प्रजातियां फेटाजीनस और स्मट्सिया में शामिल हैं।

 

भारतीय पैंगोलिन एक निशाचर प्राणी है जो दिन के समय अपनी माँद में आराम करते हैं और रात में भोजन कि तलाश में बाहर आते हैं। दिन में नींद व आराम में खलल न हो इस हेतु यह बिल के मुहाने को मिट्टी से हल्का सा बन्द कर देता है। ये लगभग 11 फुट गहरी सुरंग खोदकर अपने रहने के लिए 4 प्रकार के माँद का निर्माण करते हैं। पैंगोलिन मुख्यतः कीटभक्षी होते हैं, उनके आहार में अधिकांश चींटियों और दीमक की विभिन्न प्रजातियां शामिल हैं। इनके अलावा ये अन्य कीड़ों, विशेष रूप से लार्वा का भी उपभोग करते हैं। इन्हे आहार में ज्यादा बदलाव पसंद नहीं है, कीटों कि कई प्रजातियाँ उपलब्ध होने के बावजूद भी केवल एक या दो प्रजातियों का ही उपभोग करते हैं। एक पैंगोलिन प्रति दिन 140 से 200 ग्राम कीटों का उपभोग कर सकता है। (Mahmood et al., 2014)

पैंगोलिन की दृष्टि असामान्य रूप से कमजोर होती है जिसकी कमी अत्यधिक विकसित गंध लेने और सुनने की क्षमता से पूरी करते हैं। पैंगोलिन में दांतों कि भी कमी होती है इसलिए इनमें चींटियों और दीमक को खाने के लिए अन्य भौतिक विशेषताएँ विकसित हुई है। जैसे कि मजबूत कंकाल संरचना, मजबूत नुकीले नाखूनों से लैस पंजे। वे अपने शक्तिशाली पंजों का उपयोग दीमक के टीले खोदने और फाड़ने तथा शिकार को पेड़, जमीन और वनस्पति के बीच खोजने के लिए करते हैं। उनकी जीभ और पेट कि संरचना कीटों को पचाने में सहायता करती है। उनकी चिपचिपी लार चींटियों और दीमकों को जीभ से चिपकाने में सहायक होती है। दांतों कि कमी के कारण वे शिकार खोजते (foraging) समय छोटे पत्थरों को निगलते हैं जो उनके पेट में जमा होकर चींटियों को पीसने में मदद करता है। (Mohapatra et al., 2014)

खतरा महसूस होने पर पैंगोलिन एक स्कंक के स्प्रे के समान गुदा के पास ग्रंथियों से एक विषाक्त-महक वाले रसायन का उत्सर्जन कर सकता है। पैंगोलिन की जीभ विशालकाय चींटीखोर कि तरह बहुत लंबी होती है। बड़े पैंगोलिन 1.5 फुट तक अपनी जीभ का विस्तार कीट सुरंगों के अंदर जांच करने और अपने शिकार को प्राप्त करने के लिए उपयोग करते हैं।

 

पैंगोलिन अपने जीवन का अधिकांश भाग एकांत में व्यतीत करते हैं और वर्ष में केवल एक बार प्रजनन करने के लिए गर्मियों या सर्दियों में मिलते हैं। नर अपने क्षेत्र को मूत्र या मल से चिह्नित करते हैं जिससे कि मादाएँ उनको खोज सके। मादाओं के लिए प्रतिस्पर्धा होने पर नर अपने पूंछ का उपयोग आपसी युद्ध के लिए करते हैं। गर्भधारण की अवधि 65 से 70 दिनों कि होती है। इस दौरान नर व मादा पैंगोलिन जोड़े में रहते हैं। मादा साल में एक ही शिशु (पैंगोपप्स) को जन्म देती है। जन्म के समय वजन 80 से 450 ग्राम और औसत लंबाई 150 मिमी (6 इंच) होता है। जन्म के समय शल्क नरम और सफेद होते हैं जो कि कई दिनों के बाद एक वयस्क पैंगोलिन के समान कठोर और काले हो जाते हैं। थोड़े बड़े होने पर पैंगोपप्स को मादाएँ अपनी पूँछ पर बिठाकर जंगल में विहार कराने के दौरान सुरक्षा तथा भोजन खोजने व खाने का हुनर भी सिखाती है। कुछ महीनों बाद शिशु अपनी माँ से अलग हो जाता है। पैंगोलिन पेड़ों पर चढ़ने व पानी में तैरने में दक्ष होते हैं।

भारतीय पैंगोलिन कि उपस्थिति को विभिन्न प्रकार के वनों से दर्ज किया गया है, जिसमें श्रीलंकाई वर्षावन और मैदानी क्षेत्र से लेकर मध्य पहाड़ी स्तर शामिल हैं। यह घास के मैदानों और माध्यमिक जंगलों में भी पाया जा सकता है, तथा रेगिस्तानी क्षेत्रों के लिए अच्छी तरह से अनुकूलित है लेकिन बंजर और पहाड़ी क्षेत्र इसके पसंदीदा आवासों में शामिल है। कभी – कभी यह पैंगोलिन उच्चतम ऊंचाई वाले स्थान जैसे कि श्रीलंका के 1100 मीटर कि ऊंचाई वाले पहाड़ी क्षेत्रों और भारत में 2300 मीटर कि ऊंचाई वाले नीलगिरि पहाड़ों पर भी देखा गया है। यह नरम और अर्ध-रेतीली मिट्टी पसंद करता है, जो कि इनके बिल खोदने के लिए उपयुक्त होते है। (Mohapatra et al., 2015)

वैसे तो पैंगोलिन अपने पर्यावास में व्यापक रूप से वितरित हैं लेकिन कहीं भी आसानी से नहीं दिखते। वर्ष 2019 में राजस्थान के कुम्भलगढ़ वन्यजीव अभयारण्य में 25 सालों बाद पहली बार नजर आया। कुम्भलगढ़ के अलावा जयपुर, सवाई माधोपुर, बारां, और कोटा में भी इसकी उपस्थिति दर्ज कि गई है।(मानचित्र: समाचार पत्रों में प्रकाशित खबरों पर आधारित)

पैंगोलिन अपने प्राकृतिक आवासों में दीमक और चींटियों की आबादी को नियंत्रित कर प्राकृतिक सन्तुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण योगदान करते हैं। लेकिन ग्रामीण व आदिवासी लोग अपनी बेवकूफी व नासमझी के कारण निहायती भोले इन जीवों का बर्बरता पूर्वक शिकार करते हैं। साथ ही हाल के कुछ वर्षों में, लोगों द्वारा पेड़ों कि कटाई से वन क्षेत्र में व्यापक कमी आई है जिसने कई प्रकार के पर्यायवासों को नष्ट कर दिया है। नए और सुगम यातायात सुविधाओं और अच्छे पैसे मिलने के कारण शिकारियों ने स्थानीय और अंतर्राष्ट्रीय खपत के लिए कई दुर्लभ वन्यजीव प्रजातियों की तलाश और तस्करी तेजी से बढ़ा दी है। (Dr Jeff Salz, 2020)

चींटियों की बांबी के पास रहने वाले इस जानवर की तलाश में शिकारियों को मुश्किल नहीं होती। इसके अलावा इसे मारने के लिए उन्हें खास हथियार भी नहीं ले जाने पड़ते हैं। छूने या खतरे का आभास होने पर पेंगोलिन खुद को शल्कों (खोल) में समेटकर फुटबाल की तरह गोल हो जाता है। इसके बाद वह देख ही नहीं पाता कि उस पर हमला किया जा रहा है। शिकारी आसानी से उसे पीट-पीटकर मार डालते हैं।

इसका मांस लजीज होने से चीन व वियतनाम जैसे कई देशों के होटल व रेस्टोरेंट में खाने की लिए बेधड़क परोसा जाता है। वैश्विक स्तर पर इनके मांस, चमड़ी, शल्क, हड्डियां व अन्य शारीरिक अंगों की अधिक मांग होने से इनका बड़े पैमाने पर शिकार करवाया जाता है तथा राष्ट्रीय एवं अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर इनकी भारी मात्रा में तस्करी की जाती है। दूसरी ओर चीन व थाईलैंड जैसे कई देशों में इसके शल्कों का उपयोग यौनवर्धक औषधि व नपुसंकता दूर करने के लिये भी किया जाता है। जबकि आज तक इसका कोई वैज्ञानिक सबूत उपलब्ध नहीं है। पैंगोलिन से बने काढ़े और संक्रमित तरल पदार्थ से इलाज करवाने हेतु पिछले वर्ष तक चीनी सरकार द्वारा नागरिकों को स्वास्थ्य बीमा के रूप में मदद भी दी जाती थी।

यूएस पार्टी सर्किट में शल्क का बड़े पैमाने पर उपयोग किया जाता है। हाल ही में इंटरपोल की एक रिपोर्ट के अनुसार, पैंगोलिन के 26 प्रतिशत शल्कों को अमेरिका में भेजा जाता है। शल्क का उपयोग क्रिस्टल, मेथामफेटामाइन (methamphetamine ) के निर्माण के लिए किया जाता है, जो पार्टी ड्रग क्रिस्टल मेथ या क्रैंक (crystal meth or crank) का एक महत्त्वपूर्ण घटक है। जानकारी के मुताबिक शल्कों को निकालने की लिये निर्दयतापूर्वक इन्हें जिन्दा ही खौलते गर्म पानी में डाल दिया जाता है। शल्कों का व्यापार गैर कानूनी होने के बावजूद भारत में आज भी इनकी बिक्री बेखौफ होकर धड़ल्ले से होती है।

हालांकि पर्यावरण एवं वन विभाग इन वन्य जीवों की ताजा स्थिति बताने में गुरेज करते हैं। लेकिन फिर भी कुछ राज्यों के विभाग इनके संरक्षण के लिए उतक्रिस्ट कार्य कर रहे हैं। मध्य प्रदेश के अलावा उत्तराखंड वन विभाग ने भी विशेष कार्य बल संगठित किया है जो पंगोलीन को रेडियो टैग करने का कार्य कर रहा है। रेडियो टैग का कार्य अभी शुरुवाती दौर में है और फिलहाल मध्य प्रदेश वन विभाग ने अभी तक दो और उत्तराखंड वन विभाग ने एक पैंगोलिन को टैग किया है। (TOI, 2020)

अन्तरराष्ट्रीय प्रकृति संरक्षण संघ (IUCN) के नवीनतम अपडेट (2019) के अनुसार पैंगोलिन का भविष्य, आबादी में तेजी से कमी आने के कारण निराशाजनक दिखाई देता है। IUCN के अनुसार विश्व कि आठ प्रजातियों में से तीन प्रजातियाँ (चीनी, सुंडा, और फिलीपीन पैंगोलिन) गंभीर रूप से विलुप्तप्राय हैं, तीन विलुप्तप्राय (भारतीय, सफेद पेट वाले और विशाल पैंगोलिन) और बाकी के दो असुरक्षित है।

पहले से ही दुर्लभ और संकटग्रस्त इस जीव कि समस्याएं और बधाई है चीनी शोधकर्ताओं के नए शोध ने। साउथ चाइना एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं का दावा है कि पैंगोलिन, चमगादड़ों और मनुष्यों के बीच कोरोना वायरस का एक मध्यवर्ती मेजबान हो सकता है। इसका अंदाजा पैंगोलिन में पहचाने गए वायरस से लगाया गया जो कि 99% कोरोना वायरस के समान था। हालांकि पैंगोलिन को कोरोना वायरस के कई स्ट्रैनस की मेजबानी के लिए जाना जाता है लेकिन इस प्रेस विज्ञप्ति के पीछे का शोध अभी तक वैज्ञानिक साहित्य में प्रकाशित नहीं हुआ है जिससे इन दावों का मूल्यांकन करना मुश्किल हो जाता है।

वैज्ञानिकों द्वारा वायरस को स्थानांतरित करने का संदेह मात्र पैंगोलिन पर ही नहीं रहा। कोविड-19 के शुरुआती दिनों में चीनी शोधकर्ताओं ने बताया कि मूल रूप से सांप संभावित कैरियर थे लेकिन अब उन्होंने इस विचार का खंडन कर दिया है। 22 मार्च को प्रकाशित एक नए अध्ययन में शोधकर्ताओं ने पाया कि वायरस की प्रोटीन संरचना और जीनोम प्रभावी रूप से सांपों से अलग है।

अभी सर्वसम्मति यह है कि कोरोना वायरस के मूल स्रोत चमगादड़ हैं। चमगादड़ SARS-CoV-2 वायरस के साथ अन्य कई वायरस के एक प्राकृतिक संग्रह केन्द्र के रूप में कार्य करते हैं। 2000 के दशक की शुरुआत में भी चमगादड़ ही SARS वायरस के लिए जिम्मेदार थे। लेकिन एक विचार ये भी है कि किसी अन्य जानवर ने वायरस को चमगादड़ से मनुष्यों में पहुँचाया होगा जो पैंगोलिन हो सकता है। अवैध चीनी व्यापार द्वारा पैंगोलिन का पारंपरिक चीनी चिकित्सा में उपयोग मनुष्यों में संचरण के लिए एक वेक्टर के रूप में सुझाया गया था। पैंगोलिन कोरोवायरस के कई वंशों की खोज और SARS-CoV-2 से उनकी समानता से संकेत मिलता है कि पैंगोलिन SARS-CoV-2 जैसे कोरोनवायरस के होस्ट हो सकते हैं। हालांकि, पूरे जीनोम की तुलना में पाया गया कि पैंगोलिन और मानव कोरोनवायरस अपने RNA का 92% ही साझा करते हैं। (Cyranoski et al., 2020)

अभी तक कोई निर्णायक शोध नहीं होने के बावजूद चीनी वैज्ञानिकों द्वारा पैंगोलिन को वायरस के संभावित ट्रांसमीटर के रूप में सूचीबद्ध करने पर पर्यावरणविदों ने चिंता जताई है। इन शुरुआती अटकलों के कारण पहले से ही संकटग्रस्त इस स्तनपायी के लिए और संकट उत्पन्न हुए हैं। आज बड़े पैमाने पर इनकी हत्या करने का प्रोत्साहन उसी प्रकार मिल है जैसा कि SARS के प्रकोप के दौरान एशियाई पाम सिवेट के साथ हुआ था। (CBS News, 2004) बहरहाल, पंगोलिन के अवैध व्यापार को समाप्त करना वन्यजीवों के उपभोग से जुड़े संभावित स्वास्थ्य जोखिमों को कम करने में योगदान दे सकता है। कोरोना वायरस महामारी के पीछे वन्यजीव व्यापार कि अहम भूमिका को देखते हुए चीन के अधिकारी इसे वन्यजीव बाजारों को खत्म करने वाले एक संकेत के रूप में ले रहे हैं। जो कि आने वाले समय में वन्यजीवों के लिए एक अच्छी खबर हो सकती है।

पंगोलीन संरक्षण के लिए 2016 में, कई देशों ने पैंगोलिन की सभी आठ प्रजातियों को CITES Appendix I श्रेणी में सूचीबद्ध करने के लिए मतदान कर इनके व्यापार पर प्रतिबंध लगाया था। IUCN SSC पैंगोलिन स्पेशलिस्ट ग्रुप ने भी इनके संरक्षण के लिए वर्ष 2014 में “Scaling up Pangolin conservation” नाम से वैश्विक कार्य योजना प्रारंभ कि। (IUCN SSC)

भारत में पाए जाने वाले दोनों प्रजातियों (भारतीय और चीनी पैंगोलिन) को वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की अनुसूची 1 भाग 1 के तहत सूचीबद्ध किया गया है। इसका शिकार करना, इसको सताना, मारना या पीटना, विष देना, तस्करी करना यह सब गैर कानूनी एवं अपराध की श्रेणी में आते हैं। यह प्रजाति विलुप्त न हो इस हेतु लोगों में जागरूकता लाने व इसके संरक्षण के लिये विश्व भर में प्रतिवर्ष फरवरी माह के तीसरे शनिवार को ‘वर्ल्ड पैंगोलिन डे’ (विश्व चींटीखोर दिवस) मनाया जाता है। लेकिन भारत में इसके प्रति लोगों में उत्साह नजर नहीं आता है।

References:

  1. Cyranoski, David. (2020-02-07). Did pangolins spread the China coronavirus to people? Nature. DOI: 1038/d41586-020-00364-2
  2. Mohapatra, R.K., Panda, S. (2014). Behavioural Descriptions of Indian Pangolins (Manis crassicaudata) in Captivity. International Journal of Zoology. Hindawi Publishing Corporation. Vol. 2014, Article ID 795062. http://dx.doi.org/10.1155/2014/795062
  3. IUCN SSC Pangolin specialist group, Red List Update: https://www.pangolinsg.org/2019/12/23/iucn-red-list-update-highlights-need-for-concerted-conservation-action-for-pangolins/
  4. Zhang, Y. (2020). Protein Structure and Sequence Reanalysis of 2019-nCoV. Proteome Res. 2020, 19, 4, 1351–1360 Publication Date: March 22, 2020 https://doi.org/10.1021/acs.jproteome.0c00129
  5. Mohapatra, R.K., Et al. (2015). A note on the illegal trade and use of pangolin body parts in India. TRAFFIC Bulletin Vol. 27 No. 1. https://www.pangolinsg.org/wp-content/uploads/sites/4/2018/06/Mohapatra-et-al_2015_A-note-on-the-illegal-trade-and-use-of-pangolin-body-parts-in-India.pdf
  1. Mahmood; Irshad; Hussain (2014). “Habitat preference and population estimates of Indian pangolin”. Russian Journal of Ecology. 45 (1): 70–75. DOI:10.1134/s1067413614010081
  2. In a first, MP shows way, radio-tags two pangolins: https://timesofindia.indiatimes.com/city/nagpur/in-a-first-mp-shows-way-radio-tags-two-pangolins/articleshow/cms
  3. Scientists radio-tag Indian pangolin (2020): https://www.thehindu.com/sci-tech/energy-and-environment/scientists-radio-tag-indian-pangolin/articleece
  4. MP: Wildlife STF arrests two for selling pangolin scales on YouTube (2020): https://timesofindia.indiatimes.com/city/bhopal/mp-stf-wildlife-arrests-two-for-selling-pangolin-scales-on-youtube/articleshow/76717230.cms
  5. Civet Cat Slaughter To Fight SARS (2004): https://www.cbsnews.com/news/civet-cat-slaughter-to-fight-sars/

 

 

 

लग्गर फॉल्कन: लुप्त होता शाही शिकारी

लग्गर फॉल्कन: लुप्त होता शाही शिकारी

लग्गर फाल्कन पक्षियों की दुनिया के माहिर शिकारी है जो बेहद कुशलता से अपने शिकार को पहचानने, पीछा करने और मारने में सक्षम है, राजस्थान में हम यदि इस शिकारी पक्षी को नहीं जानते तो हमारा रैप्टर्स के बारे में ज्ञान अधूरा है

लग्गर फॉल्कन, एक मध्यम आकार का शिकारी पक्षी जो मुख्य रूप से भारतीय उपमहाद्वीप में पाया जाता है। इसका वैज्ञानिक नाम Falco jugger है तथा यह पक्षी जगत के Falconidae कुल का एक सदस्य है। यह एक फुर्तीला पक्षी है, जो हवा में तेज गति से उड़कर अपनी तेज दृष्टि से शिकार को पकड़ लेता है। तेज उड़ान की गति के कारण ये अक्सर उड़ते हुए पक्षियों को भी अपना शिकार बना लेता है। लग्गर फॉल्कन दुनिया के चार हाइरोफाल्कन (सबजीनस: हायरोफाल्को) में से एक है, तथा यह इस सबजीनस में बड़े बाज़ों में से एक है। ऐसा भी माना जाता है कि हायरोफाल्कन की संपूर्ण जीवित विविधता की उत्पत्ति 130,000 से 115,000 साल पहले, प्लीस्टोसिन के उत्तरार्ध में एमीयन इंटरग्लेशियल में हुई थी। भले ही लग्गर फॉल्कन व्यापक रूप से पूरे भारतीय उपमहाद्वीप में वितरित हो परन्तु यह एक दुर्लभ प्रजाति है। आज IUCN Red Data list के अनुसार यह एक संकट के निकट अर्थात “Near Threatened” प्रजाति है।

निरूपण/ Description:

लग्गर फॉल्कन एक मध्यम आकार का (कौए से लगभग थोड़ा सा बड़ा), क्षीण बाज़ होता है। रंग-रूप में नर व मादा एक जैसे ही दिखते है परन्तु मादा आकार में नर से थोड़ी बड़ी होती है। वयस्क के शरीर के पृष्ठ भाग गहरे भूरे व स्लेटी भूरे रंग तथा अधर भाग सफ़ेद व हल्के बादामी रंग के होते है। इसका गला व छाती का ऊपरी हिस्सा सादा सफ़ेद तथा छाती के बगल व पेट के पास हल्की लकीरे होती है। इसके सिर का रंग गहरा-भूरा और इसकी आँखों के नीचे की तरफ एक गहरे-भूरे रंग की पट्टी तथा हल्के रंग के भौंहें होते है। पूँछ के बीच वाले पंख प्लेन होते है। इसकी चोंच स्लेटी तथा पंजे पीले रंग के होते हैं। एक वयस्क लग्गर फॉल्कन और साकेर फॉल्कन में आसानी से अंतर किया जा सकता है क्योंकि लग्गर फॉल्कन में शरीर के अधर भाग प्लेन व मूंछो के पास एक स्पष्ट दिखने वाली पट्टी होती है जबकि साकेर फॉल्कन में शरीर के निचले भाग पर गोल धब्बे और मूंछों की पट्टी थोड़ी धुंधली व फैली हुई सी होती है।

जुवेनाइल लग्गर फॉल्कन ऊपर से गहरे भूरे रंग के होते हैं, तथा इन के अंडरपार्ट्स, विशेष रूप से जांघ, फ्लैंक और पेट के निचले सिरे गहरे भूरे (चॉकलेट-ब्राउन) रंग के होते है। सिर के ऊपर हल्का भूरा रंग होता हैं। कई बार जुवेनाइल लग्गर फॉल्कन समान दिखने वाली अन्य प्रजातियों जैसे पेरेग्रीन फॉल्कन और साकेर फॉल्कन के जैसा प्रतीत होता है तथा इनकी पहचान और अलगाव करना थोड़ा सा जटिल कार्य है।

भट्ट एट. अल. (2018) ने पृष्ठ भागों पर पाए जाने वाले निशानों के आधार पर लग्गर फॉल्कन को पांच प्रकारों में बांटा है:

  • टाइप 1 -गहरी-भूरे रंग की प्लूमेग: निचले भाग पूरी तरह से गहरे भूरे रंग के होते हैं तथा इनमें किसी भी प्रकार की लकीरे व् अन्य निशान नहीं होते है।
  • टाइप 2 – भारी धब्बेदार: इसमें निचले भागो पर गहरे भूरे रंग के साथ कुछ सफ़ेद रंग के धब्बे होते हैं, तथा यह स्थिति अधिकतर जुवेनाइल लग्गर में देखने को मिलती है।
  • टाइप 3 – कम धब्बेदार: इसमें धब्बे कम और अधर भाग के सफ़ेद रंग पर दूरी पर फैले होते है। यह स्थिति सबसे अधिक जुवेनाइल या जुवेनाइल से वयस्क हो रहे लग्गर में देखने को मिलती है।
  • टाइप 4 – धारीदार (Streaked) वयस्क: इसमें सफ़ेद व हल्के भूरे रंग के अधर भाग पर कुछ लकीरे होती हैं।
  • टाइप 5 – वयस्क लग्गर में सबसे अधिक यही प्रकार पाया जाता है, इसमें गले, छाती और ऊपरी पेट पर बहुत कम या फिर कोई भी लकीर नहीं होती है।

इतिहास/ History:

लग्गर फॉल्कन का सबसे पहला चित्र थॉमस हार्डविक (Thomas Hardwicke) ने बनाया था। मेजर-जनरल थॉमस हार्डविक (1756- 3 Mar 1835) एक अंग्रेजी सैनिक और प्रकृतिवादी थे, जो 1777 से 1823 तक भारत में थे। भारत में अपने समय के दौरान, उन्होंने कई स्थानीय जीवों का सर्वेक्षण करने और नमूनों के विशाल संग्रह बनाया। वह एक प्रतिभाशाली कलाकार भी थे और उन्होंने भारतीय जीवों पर कई चित्रों को संकलित किया तथा इन चित्रों से कई नई प्रजातियों का वर्णन किया गया था। इन सभी चित्रों को जॉन एडवर्ड ग्रे ने अपनी पुस्तक “Illustrations of Indian Zoology” (1830-35) में प्रकाशित किया था।

थॉमस हार्डविक (Thomas Hardwicke) द्वारा बनाया गया लग्गर फॉल्कन का सबसे पहला चित्र

जॉन एडवर्ड ग्रे (John Edward Gray) ने सन 1834 में लग्गर फॉल्कन को द्विपद नाम पद्धति के अनुसार “Falco jugger” नाम दिया। ग्रे एक ब्रिटिश जीव वैज्ञानिक थे जो लंदन में ब्रिटिश म्यूजियम में जूलॉजी संग्रहण का रख रखाव करते थे। लग्गर फॉल्कन को हमेशा से ही छोटे पक्षियों का शिकार करने के लिए इस्तेमाल किया जाता रहा है। पक्षी विशेषज्ञ TC Jerdon  सन 1864 में भारतीय पक्षियों पर लिखी पुस्तक में बताते है की कई बार उन्होंने भी लगगर फॉल्कन द्वारा लैसर फ्लोरिकन (Lesser Florican) का शिकार किया है। वह बताते है की यह अपने शिकार का तेजी से पीछा करते है और पलक झपकते ही उसको दबोच लेते है। A O Hume अपनी पुस्तक The Nests and Eggs of Indian Birds में बताते हैं की यह पक्षी अक्सर पुरानी ऊँची इमारतों की दीवारों के खोखले स्थानों पर भी घोंसला बना लेता है। Hume बताते है की उन्होंने तुगलक शाह के भव्य मकबरे की बाहरी दीवारों तथा फत्तेतेपुर सीकरी के उच्च द्वार की पार्श्व दीवारों में इसके घोंसले देखे है।

वितरण/ Distribution:

लगगर फॉल्कन, भारतीय उपमहाद्वीप में भारत सहित, दक्षिणी-पूर्वी ईरान, दक्षिणी-पूर्वी अफगानिस्तान, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बांग्लादेश और उत्तर-पश्चिमी म्यांमार में पाया जाता है। भारत में यह रेगिस्तानी और अर्ध-शुष्क क्षेत्रों में सामान्य तथा दक्षिणी भारत में दुर्लभ माना जाता है। राजस्थान में इसे ताल छापर वन्यजीव अभयारण्य में अच्छी संख्या में देखा जा सकता है, जहां वे प्रजनन के लिए भी जाने जाते हैं। ये पक्षी मुख्यरूप से खुले घास के मैदानों, झाड़ीनुमा जंगलों व खेतीबाड़ी वाले क्षेत्रों में देखे जाते है।

आहार व्यवहार/ Feeding Behaviour:

लगगर फॉल्कन की शिकार करने की कला अपने आप में ही बहुत अद्भुत व् अद्वितीय है क्यूंकि यह मुख्यतः आपसी समन्वय से जोड़े में तेज गति व् दृढ़ संकल्प के साथ अपने शिकार का पीछा कर उसे बीच आसमान में ही दबोच लेते हैं। इसकी चुस्ती-फुर्ती, तेज गति व् तेज नज़र इसे एक माहिर शिकारी बनाती है। लगगर फॉल्कन के भोजन में छोटे पक्षियों के साथ-साथ जेर्बिल, स्पाईनि-टेल्ड लिज़र्ड्स, अन्य छोटी छिपकलियाँ और कृन्तकों का समावेश है। दीक्षित (2018) ने लगगर फाल्कन के जोड़े को ड्रैगन फ्लाइज़ तथा कॉमन क्वेल को खाते हुए भी देखा है। मोरी (2018) ने एक लार्क का सेवन करते हुए भी देखा है।

स्पाईनि-टेल्ड छिपकली को खाते हुए लगगर फॉल्कन (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

प्रजनन/ Breeding:

लगगर फॉल्कन के प्रजनन का समय जनवरी से मार्च तक होता है और इस समय में इनको आसानी से जोड़े में देखा जा सकता है। यह आमतौर पर अन्य शिकारी पक्षियों जैसे बाज, चील व कौआ आदि के पुराने घोंसलो को प्रयोग में लेते है। कभी-कभी ये अपने घोंसले पेड़ों के खोल व पुरानी इमारतों में भी बनाते है। घोंसला बनाने के लिए ये अकसर ऐसे स्थान का चुनाव करते है जहाँ बहुत सारे छोटे पक्षी और सरीसृप हो ताकि इन्हे आसानी से भोजन प्राप्त हो सके। इसके घोंसलों की स्थिति भिन्न होती है; जैसे कभी-कभी पीपल जैसे बड़े पेड़ों पर, तो कभी चट्टानों की दरारों में, और कभी-कभी प्राचीन इमारतों की दीवारों में जहाँ एक या दो पत्थर गायब हो जाते हैं। A O Hume अपनी पुस्तक The Nests and Eggs of Indian Birds में बताते हैं की इस पक्षी घोंसला जब पेड़ों पर बनाया जाता है, तो आमतौर पर लगभग 2 फीट व्यास का होता है। यह टहनियों और छोटी छड़ियों से बना होता है परन्तु जब यह किसी अन्य पक्षी के घोंसले पर कब्ज़ा कर लेते है तो यह और भी बड़े आकार का हो सकता है।

खतरे/ Threats:

लगगर फॉल्कन, भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाने वाला सबसे आम फॉल्कन हुआ करता था परन्तु पिछले कुछ वर्षों में इसकी संख्या में तेजी से गिरावट आयी है परिणाम स्वरूप आज यह कोई आम प्रजाति नहीं रही। BirdLife International के सर्वेक्षण के अनुसार आज लगगर फॉल्कन की कुल आबादी केवल 10000-19999 है और यह भी वर्ष प्रतिवर्ष घटती ही जा रही है। IUCN Red Data list के अनुसार यह एक सकंट के निकट अर्थात “Near Threatened” प्रजाति है। यह विभिन्न कारणों से है जैसे कि खेती में कीटनाशकों के उपयोग में तीव्रता से वृद्धि, मानव जनसँख्या का विस्तार, अज्ञानता के माध्यम से उत्पीड़न, अवैध व्यापार तथा बड़े फाल्कन्स को पकड़ने के लिए एक चारे के रूप में प्रयोग होने से संकट झेल रहा है।

इसके अलावा इसके कुछ  प्रमुख आहार जीवों की संख्या में गिरावट, जैसे कि स्पाइन टेल्ड लाइज़र्ड्स, लगगर फॉल्कन की प्रजनन सफलता पर भी नकारात्मक प्रभाव डालते है। लगगर फॉल्कन को हमारी मदद की जरूरत है और इसे अभी इसकी जरूरत है।

 

सन्दर्भ :

  • Rao, A., &Adaki, K., 2018. Notes on the breeding of the Laggar Falcon Falco jugger. Indian BIRDS 14 (5): 139–141.
  • Bhatt, N., Dixit, D. & Mori, D. 2018. Notes on distribution and plumages of Laggar Falcon in Gujarat. Flamingo Gujarat-Bulletin of Gujarat Birds 16(3): 1-7.
  • BirdLife International (2020) Species factsheet: Falco jugger. Downloaded from http://www.birdlife.org (http://www.birdlife.org) on 24/04/2020.
  • Grimmett, R., Inskipp, C. and Inskipp, T. 2014. Birds of Indian Subcontinent. Digital edition.
  • Gray, J.E. Illustrations Indian Zoology. Collection of Major general Hardwicke. Vol II
  • Hume, A.O. 1890. The Nest and Eggs of Indian Birds. 2nd Vol III.
  • Jerdon, T.C. 1864. Birds of India: Being the birds known to inhabit continental India. Vol III. George wyman and co., publishers, La, hare street, Calcutta.pp 623.
  • https://www.currentconservation.org/issues/thomas-hardwicke-1756-1835/

 

टिड्डी या लोकस्ट: दुनिया का सबसे पुराना प्रवासी कीट

टिड्डी या लोकस्ट: दुनिया का सबसे पुराना प्रवासी कीट



टिड्डी दल का आगमन आम तो बिल्कुल नहीं है, वे एक क्रम का पालन करते हुए आते हैं। पहले, एक काफी छोटा झुंड मानो उन्हें भूमि का सर्वेक्षण करने के लिए भेजा गया हो। और फिर आती है एक ऐसी लहर जिसका सिर्फ एक उद्देश्य – दुनिया से हरियाली खत्म करने का…

कीट दुनिया में मानव जाति की तुलना में काफी पहले से मौजूद रहे हैं। जमीन के नीचे से लेकर पहाड़ी कि चोटी तक सर्वव्यापी कीट मनुष्य के जीवन से बहुत हद जुड़े हुए हैं। कुछ उपयोगी हैं तो कुछ अत्यधिक हानिकारक हैं। इन्हीं हानिकारक कीटों में शामिल हैं रेगीस्तानी टिड्डे (डेजर्ट लोकस्ट) जो मनुष्य के लिए चुनौतियों कि पराकाष्ठा रचते हैं। एफएओ के अनुसार ये दुनिया की दस फीसदी आबादी की ज़िंदगी को प्रभावित करते हैं जिससे इन्हें दुनिया का सबसे खतरनाक कीट भी कहा जाता है। इनसे उत्पन्न चुनौतियाँ नई भी नहीं है, वे आदि काल से मानव जाति के लिए संकट साबित होते रहे हैं।

औसतन हर छह वर्षों में एक बार जरूर आते हैं, और ऐसे आते हैं मानो जैसे मनुष्यों का अंत करके ही जाएंगे। वे घरों पर पूरी तरह छा जाते हैं, खिड़कियों पर झूलते हैं, गुजरती गाड़ियों से टकराते हैं और ऐसे काम करते हैं जैसे कि उन्हें सिर्फ विनाश के ही लिए भेजा गया है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

ये अत्यधिक गतिशील झुंड में मॉरीतानिया (Mauritania) से भारत और तुर्कमेनिस्तान से तंजानिया तक एक विशाल क्षेत्र को प्रभावित करते हैं जिसके कारण इन देशों में रहने वाले लोग बुरी तरह से फसलों के नुकसान को झेलते हैं। विश्व बैंक सहित कई विकास एजेंसियों ने प्रभावित देशों को इनके नियंत्रण में सहायता की है, पर स्थिति में कुछ बदलाव नहीं आया है, क्योंकि इनके आने का कोई निश्चित समय नहीं है। ये अनियमित अंतराल पर तो कभी-कभी कई वर्षों के अंतराल के बाद दिखाई देते हैं। इस अनियमितता को टिड्डी गतिविधि की आवधिकता (periodicity) कहा जाता है। जिसके 1812 के बाद से भारत में कम से कम 15 चक्र दर्ज किए गए हैं। पिछले साठ वर्षों में रेगिस्तानी टिड्डे कि दो बड़ी लहरें (1968, 1993) देखने को मिली है और ये लगातार आज भी अनियमित अंतराल पर आते हैं और एक महामारी बनकर उभरते हैं।

वर्ष 2020, मानव जाति के लिए अब तक काफी चुनौतीपूर्ण साबित हुआ है। जहां एक ओर पूरी दुनिया नॉवेल कोरोनोवायरस महामारी से लड़ रही है और इसके प्रसार को रोकने के लिए ज़िंदगियाँ समेट अपने घरों में बंद है, तो वही दूसरी ओर कुछ अफ्रीकी और एशियाई देशों में प्रकृति ने टिड्डियों के झुंड (लोकस्ट स्वॉर्म) के रूप में एक नया खतरा पैदा किया है। ये टिड्डियाँ एक बार फिर अपने विकराल रूप में हमारे सामने हैं और फसलों पर कहर बरपा रहे हैं। इस बार इनके आगमन के अलग-अलग कारण बताए जा रहे हैं, कोई बदलते भूमि स्वरूप को कारण बता रहा, तो कोई रेगिस्तानी क्षेत्रों में बढ़ी हरियाली, वही कुछ ऐसे भी हैं जो पृथ्वी के बढ़ते तापमान को कारण बता रहे हैं। इनके आगमन के बारे में जानने से पहले लोकस्ट से संक्षिप्त में परिचित हो लेते हैं।

लोकस्ट एक्रीडिडे (Acrididae) परिवार से छोटी सींग वाले टिड्डे (short-horned grasshopper) की कुछ प्रजातियों के झुंड बनाने कि अवस्था (स्वार्मिंग फेज) है। लोकस्ट और ग्रासहॉपर की प्रजातियों के बीच कोई टैक्सोनोमिक अंतर नहीं है, ये ग्रासहॉपर कि तरह ही दिखते हैं लेकिन व्यवहार में उनसे बिल्कुल अलग होते हैं। ग्रासहॉपर कृषि भूमि पर पाए जाते हैं जबकि लोकस्ट रेगिस्तानी और शुष्क परिस्थितियों में पाए जाते हैं। ग्रासहॉपर में कोई रूपात्मक बदलाव देखने को नहीं मिलता जबकि लोकस्ट के नब्बे दिनों के जीवनकाल में कई बदलाव देखने को मिलते हैं।

लोकस्ट दुनिया का सबसे पुराना एवं अत्यधिक विनाश क्षमता के कारण ध्यानाकर्षी प्रवासी कीट है। लोकस्ट मुख्यतः ग्रासहॉपर ही होते हैं जो सूखे घास के मैदान और रेगिस्तानी इलाकों में अत्यधिक पाए जाते हैं। आमतौर पर लोग ग्रासहॉपर (long-horned grasshopper) को भी लोकस्ट समझ बैठते हैं क्यूँकि ग्रासहॉपर भी गर्मियों कि अनुकूल परिस्थितियों में प्रजनन कर संख्या बढ़ाते हैं और एक सीमित क्षेत्र में फसलें नष्ट करते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

ये टिड्डे आमतौर पर एकान्त वासी होते हैं लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों में फेनोटाइपिक बदलाव (phenotypic shift) के कारण संख्या बढ़ने पर व्यवहार में कुछ बदलाव (phase change) के साथ ये झुण्ड में रहना (ग्रीगेरियस) और प्रवासी व्यवहार (migratory behaviour) का प्रदर्शन करने लगते हैं। बस इसी आधार पर इनको परिभाषित किया गया है। इस परिवर्तन को तकनीकी भाषा में “घनत्व-निर्भर फेनोटाइपिक प्लास्टिसिटी” (density-dependent phenotypic plasticity) कहा जाता है।

पहली बार बोरिस उवरोव (Boris Uvarov) ने अपरिपक्व टिड्डे (immature hopper) के झुंड में रहने वाले हॉपर के रूप में विकसित होने को फेज पॉलीमोरफिसम बताते हुए इनके दो चरणों (phases) कि व्याख्या की, पहला सॉलिटेरिया (solitaria) और दूसरा ग्रेगारिया (gregaria)। इन्हें वैधानिक (statary) और प्रवासी रूप (morphs) के रूप में भी जाना जाता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

एकान्तवासी टिड्डे शुष्क मौसम के दौरान सीमित क्षेत्र में बचे पेड़-पौधों के कारण एक साथ रहने के लिए मजबूर होते हैं। पीछे के पैरो की बढ़ती स्पर्श उत्तेजना से सेरोटोनिन के स्तर में वृद्धि होती है जो कि टिड्डे का रंग बदलने, अधिक खाने, और आसानी से प्रजनन करने का कारण बनता है। टिड्डियों का प्रजनन रेगीस्तानी इलाकों में होता है और अक्सर वनों, कृषि क्षेत्रों और देहाती आजीविका के साथ मेल खाता है। टिड्डियों के लिए कूल तीन प्रजनन के मौसम होते हैं (i) विन्टर ब्रीडिंग [नवंबर से दिसंबर], (ii) स्प्रिंग ब्रीडिंग [जनवरी से जून] और (iii) समर ब्रीडिंग [जुलाई से अक्टूबर]। भारत में टिड्डी प्रजनन का केवल एक मौसम, समर ब्रीडिंग, देखने को मिलता है। पड़ोसी देश पाकिस्तान में स्प्रिंग और समर ब्रीडिंग दोनों हैं।

टिड्डियों का जीवन चक्र तीन अलग-अलग चरण होते हैं, अंडा, हॉपर और वयस्क। टिड्डियाँ नम रेतीली मिट्टी में 10 सेन्टमीटर कि गहराई पर अंडे देती हैं। ग्रेगेरीअस मादाएँ आमतौर पर 2-3 बीजकोष (pods) में अंडे देती हैं जिसके एक पॉड में 60-80 अंडे होते हैं। सॉलिटेरियस मादा ज्यादातर 3-4 बीजकोष में औसतन 150-200 अंडे देती है। अंडों के विकास की दर मिट्टी की नमी और तापमान पर निर्भर करता है। 15°C से नीचे कोई विकास नहीं होता है। ऊष्मायन अवधि (incubation period) इष्टतम तापमान (Optimum temperature) 32-35 डिग्री सेल्सियस के बीच 10-12 दिन का होता है।

दुनिया भर में ग्रासहॉपर कि लगभग 28500 प्रजातियाँ हैं जिनमें से मात्र 500 ऐग्रिकल्चरल पेस्ट के रूप में मौजूद है और केवल 20 ही ऐसे हैं जो लोकस्ट बनने कि क्षमता रखते हैं। भारत में मुख्य तौर से चार प्रजातियां, रेगिस्तानी टिड्डा या डेसर्ट लोकस्ट (Schistocerca gregaria), अफ्रीकी प्रव्राजक टिड्डा या अफ्रीकन माइग्रटोरी लोकस्ट (Locusta migratoria), बम्बई टिड्डा या बॉम्बे लोकस्ट (Patanga succincta) और वृक्षीय टिड्डा या ट्री लोकस्ट (Anacridium spp.) सक्रिय रहती हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

ऊष्मायन पूरा होने के बाद अंडे हैच होते हैं और निम्फ (युवा) बाहर आते हैं जिन्हें “हॉपर” कहा जाता है। ग्रीगेरियस चरण में 5 इंस्टार और सॉलीटेरियस आबादी में 5-6 इंस्टार होते हैं। प्रत्येक इंस्टार में एक अलग वृद्धि और विशेष रंग का परिवर्तन होता है। हॉपर का विकास दर तापमान पर निर्भर करता है। जहां 37°C के औसत तापमान पर 22 दिन लगते हैं तो वही 22°C के औसत तापमान पर 70 दिनों तक कि देरी हो सकती है।

पाँचवी इन्स्टार अवस्था के बाद हॉप्पर वयस्क हो जाते है। इस परिवर्तन को ‘फलेजिन्ग’ कहा जाता है और युवा वयस्क को ‘फलेजलिङ्ग’ या ‘अपरिपक्व वयस्क’ कहा जाता है।  यौन परिपक्वता की अवधि भिन्न होती है। उपयुक्त स्थिति में वयस्क 3 सप्ताह में परिपक्व हो सकता है और ठंढे और / या सूखे कि स्थिति में 8 महीने का समय लग सकता है। इस चरण के दौरान वयस्क अनुकूल प्रजनन स्थिति की खोज के लिए उड़ान भरते हैं और हजारों किलोमीटर की दूरी तय कर सकते हैं। इस दौरान अगर किसी भी समय अनुकूल परिस्थितियाँ मिले तो वे ग्रेगेरीअस हो सकते हैं।

युवा अवयस्क टिड्डे हैचिंग के समय एकान्तवासी होते है और अपने परिवेश के साथ फिट होने के लिए हरे और भूरे रंग के होते हैं। जब भोजन बहुतायत में होता है तो डेसर्ट लोकस्ट प्रजनन कर संख्या बढ़ाते हैं और “ग्रेगेरीअस अवस्था” प्राप्त करते हैं। युवा अपरिपक्व वयस्क रंग में गुलाबी होते हैं जबकि पुराने वयस्क ठंड की स्थिति में गहरे लाल या भूरे रंग के हो जाते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

जैसे-जैसे वे बड़े और सघन होते जाते हैं वे एक समूह के रूप में कार्य करते हुए व्यावहारिक बदलाव के साथ उड़ने वाला झुंड बनाते हैं जिसे स्वॉर्म कहते हैं। टिड्डे के झुंड के रूप में परिवर्तन चार घंटे की अवधि में प्रति मिनट कई संपर्कों से प्रेरित होता है। हजारों वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले एक बड़े झुंड में अरबों टिड्डे हो सकते हैं, जिनकी आबादी लगभग 80 मिलियन प्रति वर्ग किलोमीटर होती है। इस बिंदु पर टिड्डे पूरी तरह से परिपक्व और वयस्क होते हैं। परिपक्वता पर वयस्क चमकीले पीले हो जाते हैं। नर मादा से पहले परिपक्व होते हैं। टिड्डों के व्यवहार और शारीरिक लक्षणों में परिवर्तन प्रतिवर्ती होते हैं जिससे अंत में अपने मूल रूप में बदल सकते हैं या अपनी संतानों को पारित कर सकते हैं।

लगभग तीन महीने के प्रजनन चक्र के बाद टिड्डे एक अंडे से वयस्क होते हैं और संख्या में 20 गुना वृद्धि ला सकते हैं। यह छह महीने के बाद 400 गुना और नौ महीने के बाद 8,000 तक बढ़ सकता है। ये हजारों लाखों के झुण्ड में आकर पेड़ों, पौधों या फसलों के पत्ते, फूल, फल, बीज, छाल और फुनगियाँ सभी खा जाते हैं। ये इतनी संख्या में पेड़ों पर बैठते हैं कि उनके भार से पेड़ टूट तक सकता है। एक टिड्डा अपने वज़न के बराबर भोजन चट करता है यानी कम से कम दो ग्राम। उड़ते बैंड के टिड्डे भोजन कि कमी के दौरान एक-दूसरों को काटते हुए नरभक्षी क्रिया को भी दर्शाते हैं। रेगिस्तानी टिड्डियों में माइग्रैशन उनकी इस नरभक्षी क्रिया से प्रभावित होता है। सेपीदेह बज़ाज़ी  द्वारा किये शोध से पता चलता है कि टिड्डे के झुंड इसलिए बनते हैं क्योंकि वे अपने नरभक्षी पड़ोसी से खुद को बचाने के लिए एक कदम आगे रहना पसंद करते हैं।

टिड्डियों के स्वॉर्म के रूप में आगमन के लिए पूरी तरह से किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। इनके आगमन के पीछे एक प्राकृतिक क्रम है जिसका ये पालन करते हैं। हां, लैंड यूज पैटर्न में बदलाव, बढ़ते तापमान और हरियाली आदि महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, लेकिन इसी प्राकृतिक क्रम में एक निश्चित काल पर। जैसे कि अंडे हैच होने के लिए उपयुक्त तापमान और नमी कि जरूरत, निम्फ्स को वयस्क होने के लिए भोजन के तौर पर हरियाली आदि कि जरूरत। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

टिड्डी दल के आगमन का जैविक सिद्धांत डॉ एस प्रधान द्वारा वर्ष 1967 में दिया गया था, जो उस समय भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, नई दिल्ली में एंटोमोलॉजी के प्रमुख थे। सिद्धांत के अनुसार टिड्डे अर्ध रेगिस्तानी इलाकों में प्रजनन करते हैं जहाँ 15 सेंटीमीटर की गहराई तक अंडे देने के लिए रेतीली मिट्टी उपयुक्त होती है। टिड्डे इन क्षेत्रों के भीषण वातावरण को सहने में सक्षम होते है, जबकि उनके शिकारी, जैसे कि छिपकली, सांप, पक्षी, छछूंदर, हेजहॉग, मोल्स आदि को रेगिस्तान और अर्ध रेगिस्तान की भीषण स्थितियों का सामना करने में मुश्किल आती है और इसलिए वे धीरे-धीरे भीषण क्षेत्रों कि परिधि पर अधिक सहिष्णु क्षेत्र कि ओर चले जाते हैं।

लेकिन रेगिस्तानी इलाकों में एक या दो दशक में एक बार पर्याप्त वर्षा होती है, जिससे सेज (sedge) घास और अन्य खरपतवारों का विकास होता है और टिड्डों को अपनी पूर्ण जैविक क्षमता के बराबर भोजन मिलता है। शिकारी जीव जो भीषण परिस्थितियों के कारण इनके प्रजनन क्षेत्र से बाहर परिधि कि तरफ चले गए थे, स्थिति सामान्य होने पर टिड्डियों कि आबादी को नियंत्रित करने के लिए पर्याप्त तेजी लौट नहीं पाते। इनकी आबादी शिकारियों की अनुपस्थिति में बहुत तेजी से बढ़ती है। प्राकृतिक दुश्मनों द्वारा अनियंत्रित, टिड्डी एकान्त चरण से प्रवासी चरण की ओर बढ़ती है और बड़े स्वॉर्म में विकसित होती है और अंत में प्रजनन के क्षेत्रों से बाहर निकलती है, जिससे भारी विनाश होता है। लोकस्ट स्वॉर्म के मरुस्थलीय क्षेत्रों से बाहर निकलने के बाद कुछ वयस्क और निम्फ की बिखरी हुई आबादी जो पीछे रह जाती है, सहिष्णु पर्यावरणीय परिस्थितियों के दूसरे चरण के आगमन तक एकान्तवासी चरण के रूप में मॉरिटानिया और भारत के बीच रेगिस्तान में हमेशा मौजूद रहते हैं।

ग्रासहॉपर दुनिया भर के चरागाह पारिस्थितिक तंत्र के प्रमुख घटक हैं और ट्रॉफिक गतिशीलता और पोषक तत्वों के साइक्लिंग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन जब अच्छी बारिश के कारण हरे-भरे घास के मैदान विकसित होते हैं तो ये रेगिस्तानी टिड्डे एक या दो महीने के भीतर तेजी से संख्या बढ़ा इकट्ठे होते हैं और एक भयानक झुंड का रूप ले लेते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

समय पर नियंत्रित नहीं किये जाने पर पंखहीन हॉपरों के छोटे समूह या बैंड पंखों वाले वयस्क टिड्डे के छोटे समूह या स्वॉर्म का निर्माण कर सकते हैं जिसे एक विस्फोट (OUTBREAK) कहा जाता है और यह आमतौर पर किसी देश के एक हिस्से में लगभग 5,000 वर्ग किमी तक होता है। यदि एक विस्फोट या समसामयिक कई विस्फोटों को नियंत्रित नहीं किया जाता है और आसपास के क्षेत्रों में व्यापक या असामान्य रूप से भारी बारिश होती है, तो प्रजनन के कई सिलसिलेवार मौसम बन सकते हैं जो आगे चलकर हॉपर बैंड और वयस्क झुंड के गठन का कारण बनते हैं। इसे अभ्युत्थान (UPSURGE) कहा जाता है और आम तौर पर पूरे क्षेत्र को प्रभावित करता है।

यदि एक अभ्युत्थान को नियंत्रित नहीं किया जाता है और पारिस्थितिक स्थिति प्रजनन के लिए अनुकूल रहती है तो टिड्डे की आबादी संख्या और आकार में वृद्धि जारी रखती है जो एक महामारी (PLAGUE) के रूप में विकसित हो सकता है। महामारी के समय अधिकांश संक्रमण बैंड और स्वार्म्स के रूप में होते हैं। जब दो या दो से अधिक क्षेत्र एक साथ प्रभावित होते हैं तो एक बड़ी महामारी होती है।

टिड्डी विस्फोट सामान्य है और आमतौर पर होते रहते हैं, इनमें से कुछ ही विस्फोट ऐसे हैं जो अभ्युत्थान का रूप लेते हैं और इसी तरह कुछ अभ्युत्थान महामारी का रूप। आखिरी महामारी को 1987-89 में तथा आखिरी बड़ा अभ्युत्थान 2003-05 में देखा गया था। अभ्युत्थान और महामारी किसी एक रात में नहीं उभरते, इन्हे विकसित होने में कई महीनों से लेकर एक या दो वर्ष का समय भी लग सकता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

वैश्विक स्तर पर लोकस्ट कि निगरानी संयुक्त राष्ट्र के फूड एण्ड ऐग्रिकल्चर ऑर्गेनाइजेसन (FAO) का लोकस्ट वॉच विभाग करता है जिसके मुताबिक वर्तमान टिड्डियों के आतंक की कहानी साल 2018 में अरबी प्रायद्वीप पर आए चक्रवाती तूफानों और भारी बारिश के साथ शुरू हुई थी। मई के तूफान से ही इतना पानी हो गया कि अगले छह महीनों के लिए रेगिस्तान में हरियाली उपजी जिस पर टिड्डियों की दो पीढ़ियां जीवन गुज़ार सकती थीं। इसके बाद अक्टूबर के तूफान के कारण टिड्डियों को प्रजनन और पनपने के लिए और कुछ महीनों का आधार मिल गया जहां इनकी तीन पीढ़ियाँ पली। यहां से ये खतरनाक हुईं और साल 2019 से अफ्रीका को निशाना बनाया। चक्रवातों के चलते ओमान और यमन जैसे दूरदराज के एकदम अविकसित इलाकों में टिड्डियों ने अपनी आबादी बढ़ाई।

एफएओ के लोकस्ट विशेषज्ञ कीथ क्रेसमैन के मुताबिक मानव संसाधन और उपग्रहों के माध्यम से संस्था टिड्डियों के दलों के संकट को लेकर निगरानी रखती है, लेकिन इस मामले में नाकाम साबित हुई। मॉनिटरिंग नेटवर्क ध्वस्त हो गया। क्रेसमैन के मुताबिक किसी को नहीं पता था कि धरती के इस दूरस्थ इलाके में तब क्या हो रहा था। इस इलाके में कुछ नहीं है, सड़कें नहीं हैं, कोई इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है, फेसबुक नहीं, कुछ भी नहीं है। कुछ है तो रेत के बड़े बड़े टीले हैं, जो स्काईस्क्रेपरों से कम नहीं हैं।

जब टिड्डियों के दल झुंड में रहने की प्रवृत्ति विकसित कर लेते हैं, तब ये मुख्य रूप से कार्बोहाइड्रेट वाले भोजन पर निर्भर करने लगते हैं। जिस मिट्टी से लगातार फसलें ली जा चुकी हैं और जो ज़रूरत से ज़्यादा चराई जा चुकी है, उसमें से नाइट्रोजन गायब हो चुकी है। इसकी वजह से प्रोटीन तो मिट्टी में है नहीं इसलिए कार्बोहाइड्रेट बहुलता वाली घासें पैदा होती हैं। विशेषज्ञों ने दक्षिण अमेरिकी टिड्डियों पर किए अध्ययन में यह पाया है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

साल 2018 के आखिर में जब ओमान में लोगों ने टिड्डियों के दलों को देखा तब कहीं जाकर क्रेसमैन की संस्था तक खबर पहुंची और अलर्ट कि स्थिति बनी। लेकिन तब तक देर हो चुकी थी। यहां से टिड्डियों के दल यमन और ईरान तक पहुंच चुके थे और ओमान से लगातार निकलते हुए सामने आ रहे थे। युद्धग्रस्त रहे यमन के पास टिड्डियों के हमले से लड़ने के लिए फोर्स न होने का संकट था। यमन में इन स्थितियों के दौरान भारी बारिश हुई और टिड्डियों के दलों को प्रजनन के साथ ही और पनपने का अनुकूल वातावरण मिल गया। पिछले (2019) के बसंत और गर्मियों के मौसम में टिड्डियों की आपदा यहां से सोमालिया पहुंची और उसके बाद इथोपिया और केन्या में कहर टूटा। बीते मार्च अप्रैल में पूर्वी अफ्रीका में भारी बारिश हुई, जो फिर टिड्डियों के लिए वरदान साबित हुई। पिछले चालीस वर्षों में, रेगिस्तानी टिड्डे का निवारक रणनीति (preventive strategy) से नियंत्रण प्रभावी साबित हुआ है लेकिन टिड्डियों के विनाशकारी आवृत्ति और अवधि में कमी आने से लापरवाही और संगठनात्मक समस्याओं के कारण टिड्डियों का झुंड एक बार फिर गंभीर समस्या बनकर उभरा है।

हमले के समय टिड्डियों का सामना करना बहुत मुश्किल है क्योंकि ये बहुत बड़े इलाके में फैली होती हैं। टिड्डियों से निपटने में प्रारंभिक हस्तक्षेप ही स्वॉर्म को रोकने का एकमात्र सफल उपाय है। दुनिया भर के कई संगठन टिड्डियों से खतरे की निगरानी करते हैं। वे निकट भविष्य में टिड्डियों से पीड़ित होने की संभावना वाले क्षेत्रों का पूर्वानुमान प्रदान करते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

एफएओ की डेजर्ट लोकस्ट इनफार्मेशन सर्विस (DLIS) रोम, इटली से मौसम, पारिस्थितिक स्थितियों और टिड्डियों की स्थिति की दैनिक निगरानी करती है। DLIS प्रभावित देशों में राष्ट्रीय टीमों द्वारा किए गए सर्वेक्षण और नियंत्रण कार्यों के परिणाम प्राप्त करता है और इस जानकारी को उपग्रह डेटा, जैसे कि MODIS, वर्षा के अनुमान और मौसमी तापमान और वर्षा की भविष्यवाणी आदि के साथ जोड़कर वर्तमान स्थिति का आकलन कर अगले छह सप्ताह में होने वाले प्रजनन और प्रवास कि सूचनाओं का अनुमान लगता है।

भारत में वनस्‍पति संरक्षण, संगरोध एवं संग्रह निदेशालय (DPPQ&S) द्वारा गठित टिड्डी चेतावनी संगठन (Locust Warning Organisation) विभाग को अनुसूचित रेगिस्तानी क्षेत्रों (Scheduled Desert Area) विशेष रूप से राजस्थाान और गुजरात राज्यों में रेगिस्तानी टिड्डी पर निगरानी, सर्वेक्षण और नियंत्रण का उत्तरदायित्व सौंपा गया है। LWO, DLIS द्वारा जारी मासिक टिड्डी बुलेटिन के माध्यम से राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मौजूदा टिड्डी की स्थिति की अद्यतन जानकारी रखता है। कृषि कार्यकर्ताओं द्वारा खेतों से टिड्डियों कि स्थिति के सर्वेक्षण कर आंकड़े एकत्रित किए जाते हैं। फिर उन्हें LWO के मंडल कार्यालयों, क्षेत्रीय मुख्यालय, जोधपुर और केन्द्रींय मुख्यालय, फरीदाबाद भेजा जाता है जहां पर उनका परस्पर मिलान करके संकलित किया जाता है और टिड्डी के प्रकोप और आक्रमण की संभावना के अनुसार पूर्व चेतावनी के लिए विश्लेषण किया जाता है। टिड्डी की स्थिति से राजस्थान और गुजरात की राज्य सरकारों को अवगत कराया जाता है और उन्हें परामर्श दिया जाता है कि वे अपने कार्यकर्ताओं को तैयार रखें। टिड्डी सर्वेक्षण के आंकड़ों को शीघ्रता से भेजने, उनका विश्लेषण करने के लिए e-locust2 / e-locust3 और RAMSES जैसे नवीन साफ्टवेयर का उपयोग किया जाता है।

ऐतिहासिक तौर पर लोग फसलों को टिड्डियों से बचाने अक्षम थे, हालांकि, आज हमारे पास पूर्वजों की तुलना में टिड्डियों से लड़ने के लिए गहन ज्ञान और प्रौद्योगिकी का फायदा है लेकिन फिर भी प्रभावित क्षेत्रों के अधिक फैलाव (16-30 मिलियन किमी), सीमित संसाधन, अविकसित बुनियादी ढाँचा और उन क्षेत्रों की पारगम्यता, आदि के कारण टिड्डियों को नियंत्रित या रोक पाना मुश्किल हो जाता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

वर्तमान में, रेगिस्तानी टिड्डी के संक्रमण को नियंत्रित करने की प्राथमिक विधि ऑर्गनोफॉस्फेट केमिकल्स (हर्बिसाइड और कीटनाशक में प्रमुख घटक) कि छोटी-छोटी गाढ़ी खुराकें हैं। जिनको वाहन पर लगे या फिर हवाई स्प्रेयरस से अति कम मात्रा में (ULV) छिड़क कर किया जाता है। कीटनाशक को टिड्डे सीधे या परोक्ष रूप से पौधे पर चलने से अथवा उनके अवशेषों को खाने पर अधिग्रहित कर लेते हैं। ये नियंत्रण पूरी तरह सरकारी एजेंसियों द्वारा किया जाता है। भारत के अनुसूचित रेगिस्तानी क्षेत्रों में प्रयोग के लिए DPPQ&S ने 4 कीटनाशक कि मंजूरी दी है। फसलों, बबूल, खैर और अन्य पेड़ों पर रेगिस्तानी टिड्डे के नियंत्रण के लिए 11 कीटनाशकों को मंजूरी दी है।

टिड्डियों के रोकथाम के लिए फन्जाइ, बैक्टीरीया, और नीम के रस से बने जैविक कीटनाशकों का उपयोग भी किया जाता है। कई जैविक कीटनाशकों की प्रभावशीलता पारंपरिक रासायनिक कीटनाशकों के बराबर है लेकिन सामान्य रूप से इनके इस्तेमाल से कीटों को मारने में अधिक समय लगता है। इनके रोकथाम के लिए प्रभावित क्षेत्रों में किसानों ने ऐसी फसलों को उगाना शुरू कर दिया है जिन्हें लोकस्ट स्वॉर्म के मौसम से पहले काटा जा सके। इसके अतिरिक्त, सेरोटोनिन के निषेध से लोकस्ट कि संख्या को प्रयोगशालाओं में नियंत्रित करने में सफलता मिली है, लेकिन इस तकनीक का फील्ड टेस्ट अभी बाकी है।

रेगिस्तानी टिड्डियों के शिकारी ततैया और मक्खियाँ (wasp and flies), परजीवी ततैया (parasitoid wasps), शिकारी बीटल लार्वा, पक्षी और सरीसृप आदि प्राकृतिक दुश्मन होते हैं। हाल ही में डॉ धर्मेन्द्र खांडल ने सवाई माधोपुर में जकोबीन कुक्कू, मोरनी को इनका शिकार करते देखा है। लेकिन इन शिकारियों कि सिमा है कि ये एकान्त आबादी को नियंत्रण में रखने में प्रभावी हो सकते हैं। स्वॉर्म और हॉपर बैंड में टिड्डों की भारी संख्या होने के कारण उनके खिलाफ इनका प्रभाव सीमित है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल) 

हालांकि टिड्डे के हमले को समाप्त करना लगभग असंभव है, लेकिन स्वॉर्मस पर आक्रमण करके, अंडे कि एक बड़ी संख्या को नष्ट कर इनकी गंभीरता को कम किया जा सकता है। वर्तमान ‘प्लेग’ को नियंत्रित करने के लिए प्रभावित देशों में कड़े प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन आखिरकार ये कैसे समाप्त होंगे यह कह पान मुश्किल है। फिलहाल मानसून ही इनके स्वॉर्म को कुछ हद तक नियंत्रित कर पाएगा।

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अरावली की आभा: मामेर से आमेर तक

अरावली की आभा: मामेर से आमेर तक

अरावली, थार रेगिस्तान को उत्तरी राजस्थान तक सीमित रखे और विशाल जैव-विविधता को सँजोती पर्वत श्रृंखला हिमालय से भी पुरानी मानी जाती है। इसके 800 किलोमीटर के विस्तार क्षेत्र में 20 वन्यजीव अभयारण्य समाये हुए हैं, आइए इसकी विविधता कि एक छोटी यात्रा पर चलते है…

संसार की सबसे प्राचीनतम पर्वत श्रखलाओ में से एक अरावली, भारत के चार राज्यों गुजरात, राजस्थान, हरियाणा एवं  दिल्ली तक प्रसारित है। अरावली का अधिकतम विस्तार राजस्थान में ही है। तो इसके प्राकृतिक वैभव को जानने के लिए, आइये चलते है दक्षिणी राजस्थान के मामेर से उत्तर दिशा के आमेर तक।

मामेर, गुजरात राज्य की उत्तरी सीमा के पास बसे धार्मिक नगरों खेड़ब्रम्हा एवं अम्बाजी के पास स्थित है। यहाँ अरावली की वन सम्पदा देखते ही बनती है। प्रसिद्ध फुलवारी वन्यजीव अभयारण्य यहाँ से शुरू होकर उत्तर दिशा तक विस्तारित है। तो वहीँ मामेर की पश्चिमी दिशा की ओर से माउन्ट आबू अभयारण्य पहुंचा जा सकता है, जो राजस्थान का एकमात्र “हिल स्टेशन” है। फुलवारी, अरावली का एक मात्र ऐसा अभयारण्य है जहाँ धोकडा यानि एनोजीसस पेंडुला (Anogeissus pendula)  प्राकृतिक रूप से नहीं पाया जाता। अभयारण्यों में यही अकेला ऐसा अभयारण्य है जहाँ राजस्थान के सुन्दर बांस वन पाए जाते हैं।

अरावली पर्वत श्रृंखला के ऊँचे पहाड़ (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

इस क्षेत्र में आगे चलते है तो रास्ते में वाकल नदी आती है, यह नदी कोटड़ा के बाद गुजरात में प्रवेश कर साबरमती से मिल जाती है। वाकल नदी को पार कर डेढ़मारिया व लादन वनखंडो के सघन वनों को देखते हुए रामकुंडा पंहुचा जा सकता है। यहाँ एक सूंदर मंदिर एवं एक झरना भी है जो वर्षा ऋतु में दर्शनीय हो जाता है। यहीं एक कुंड में संरक्षित बड़ी-बड़ी मछलिया भी देखने को मिलती है।

इसी क्षेत्र में पानरवा नामक स्थान के पास सोमघाटा स्थित है जिस से होकर किसी समय में अंग्रेज़ रेजीडेंट, खैरवाड़ा, बावलवाड़ा होकर पानरवा के विश्राम स्थल में ठहरकर कोटड़ा छावनी पहुंचते थे। पानरवा से मानपुर होकर कोल्यारी के रास्ते कमलनाथ के पास से झाड़ोल पंहुचा जा सकता है। यह क्षेत्र “भोमट” के नाम से जाना जाता है। झाड़ोल के बहुत पास का क्षेत्र ” झालावाड़ ” कहलाता है। अरावली के इस क्षेत्र में चट्टानों पर केले की वन्य प्रजाति (Ensete superbum) उगती है। झाड़ोल के पास स्थित मादडी नामक गांव में राज्य का सबसे विशाल बरगद का पेड़ स्थित है तथा यहीं मादडी वनखंड में राज्य का सबसे बड़ा ” बॉहिनिया  वेहलाई ” (Bauhinia vahlii) कुञ्ज भी विध्यमान है।

उत्तर की तरफ बढ़ने पर जूड़ा, देवला, गोगुंदा आदि गांव आते हैं। फुलवारी की तरह, यहां भी मिश्रित सघन वन पाए जाते हैं तथा इस क्षेत्र में अरावली की पहाड़ियों पर मिट्टी की परत उपस्थित होने के कारण उत्तर व मध्य अरावली के मुकाबले यहाँ अधिक सघनता व जैव विविधता वाले वन पाए जाते हैं। इस क्षेत्र के “नाल वन” जो दो सामानांतर पर्वत श्रंखला के बीच नमी वाले क्षेत्र में बनते हैं दर्शनीय होते हैं। नाल सांडोल, केवड़ा की नाल, खोखरिया की नाल, फुलवारी की नाल, सरली की नाल, गुजरी की नाल आदि इस क्षेत्र की प्रसिद्ध नाल हैं। जिनके “रिपेरियन वन” (नदी या नालों के किनारे के वन) सदाबहार प्रजातियों जैसे आम, Syzygium heyneanum (जंगली जामुन), चमेली, मोगरा, लता शीशम, Toona ciliata, salix, Ficus racemosa, Ficus hispida, Hiptage benghalensis (अमेती), कंदीय पौधे, ऑर्किड, फर्न, ब्रयोफिट्स आदि से भरे रहते हैं।

अरावली, विशाल जैव-विविधता को सँजोती पर्वत श्रृंखला (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

अरावली के दक्षिणी भाग में Flying squirrel, Three-striped palm squirrel, Green whip snake, Laudankia vine snake, Forsten’s cat snake, Black headed snake, Slender racer, Red spurfowl, Grey jungle fowl (जंगली मुर्गा), Red whiskered bubul, Scimitar babbler (माऊंट आबू), White throated babbler आदि जैसे विशिष्ट प्राणी निवास करते है। राज्य की सबसे बड़ी मकड़ी “जायन्ट वुड स्पाइडर” यहाँ फुलवारी, कमलनाथ, कुम्भलगढ़ व सीतामाता में देखने को मिलती है तथा राज्य का सबसे बड़ा शलभ “मून मॉथ ” वर्षा में यहाँ जगह-जगह देखने को मिलता है। कभी बार्किंग डीयर भी यहाँ पाए जाते थे। सज्जनगढ़ व इसके आसपास भारत की सबसे छोटी बिल्ली “रस्टी स्पॉटेड कैट” भी देखने को मिलती है।

देवला के बहुत पास पिंडवाडा रोड पर सेई नामक बाँध पड़ता है, जिसे “इम्पोटेंड बर्ड एरिया” होने का गौरव प्राप्त है। राजस्थान के 31 मान्य आई.बी.ए में से 12 स्थान; जयसमंद झील व अभयारण्य, कुंभलगढ़, माऊंट आबू, फुलवारी, सरेसी बाँध, सेई बाँध, उदयपुर झील संकुल एवं बाघदड़ा आदि, दक्षिण राजस्थान में अरावली क्षेत्र व उसके आसपास विध्यमान हैं।

आइये देश के सागवान वनों की उत्तर व पश्चिम की अंतिम सीमा, सागेटी, चित्रवास व रीछवाडा की ओर बढ़ते हैं। इस क्षेत्र से पश्चिम में जाने पर पाली जिले की सीमा आ जाती है। यहाँ सुमेरपुर से होकर सादडी, घाणेराव आदि जगह का भू – भाग “गोडवाड़” के नाम से जाना जाता है। गोडवाड़  में अरावली व थार का मिलन होने से एक मेगा इकोटोन बनता है जो अरावली के पश्चिम ढाल से समान्तर आगे बढ़ता चलता है।

कुंभलगढ़ अभयारण्य, सागवान वितरण क्षेत्र के अंतिम बिंदु से प्रारम्भ होता है जो देसूरी की नाल को लांघते ही रावली-टॉडगढ़ अभयारण्य के जंगलों से मिल जाता है। इस क्षेत्र में जरगा व कुम्भलगढ़ के ऊंचे पर्वत शिखर देखने को मिलते हैं। जरगा, माउंट आबू के बाद सबसे ऊंचा स्थल है। इस क्षेत्र की आबोहवा गर्मी में सुहानी बनी रहती है। गोगुन्दा व आसपास के क्षेत्र में गर्मी की रातें काफी शीतल व सुहावनी रहती है। इस क्षेत्र में दीवारों, चट्टानों व वृक्षों पर लाइकेन मिलती हैं। जरगा में नया जरगा नामक स्थान पश्चिमी ढाल पर व जूना जरगा पूर्वी ढाल पर दर्शनीय मंदिर है एवं पवित्र वृक्ष कुज भी है। कुंभलगढ़ व जरगा में ऊंचाई के कारण अनेकों विशिष्ट पौधे पाए जाते हैं। यहाँ Toona ciliate, Salix, Salix tetrandra, Trema orientalis, Trema politoria, Ceasalpinia decapetala, Sauromatum pedatum आदि देखने को मिलते हैं। जरगा पहाड़ियों को पूर्वी बनास का उद्गम स्थल माना जाता है। जरगा के आसपास बनास के किनारे विशिष्ट फर्नो का अच्छा जमाव देखा जाता है। वेरो का मठ के आस पास मार्केंशिआ नामक ब्रायोफाइट देखा गया है। कुंभलगढ़ में ऐतिहासिक व धार्मिक महत्त्व के अनेकों स्थान है तथा कुछ स्थान जैसे कुंभलगढ़ किला, रणकपुर मंदिर , मुछाला महावीर, पशुराम महादेव आदि मुख्य दर्शनीय स्थान है।

आगे चलते है रावली-टॉडगढ़ अभयारण्य की ओर। इतिहासकार कर्नल टॉड के नाम से जुडी रावली-टॉडगढ़ अभयारण्य वन्यजीवों से भरपूर है। यहाँ आते-आते वन शुष्क पर्णपाती हो जाते है तथा पहाड़ पथरीले नजर आते है। यहाँ धोकड़ की क्लाइमैक्स आबादी को देखा जा सकता है। यह अभयारण्य ग्रे जंगल फ़ाउल की उतरी वितरण सीमा का अंतिम छोर है।

उतर दिशा में आगे बढ़ने पर राजसमन्द एवं अजमेर के बीच पहाड़ियां शुष्क होने लगती है। धोकड़े के जंगलो में डांसर व थूर का मिश्रण साफ़ दीखता है और सघनता विरलता में बदल जाती है। इसी भाग में सौखालिया क्षेत्र विद्यमान है जो गोडवान (Great Indian bustard) के लिए विख्यात है। कभी – कभार खड़मोर (Lesser florican) भी यहाँ देखने को मिलता है। यहाँ छितरे हुए गूगल के पेड़ मिलते हैं जो एक रेड डेटा प्रजाति है। इस भाग में आगे बढ़ने पर नाग पहाड़ आता है जो की काफी ऊँचा है, जहाँ कभी सघन वन एवं अच्छी जैव विविधता पायी जाती थी।

हमारी यात्रा के अंतिम पड़ाव में जयपुर के पहाड़ आते हैं और यहीं पर स्थित है, आमेर।  झालाना व नाहरगढ़ अभयारण्य में अधिक सघनता व जैव विविधता वाले वन हैं। कभी यहाँ बाघ तथा अन्य खूंखार प्राणियों की बहुतायत हुआ करती थी। यहाँ White-naped tit और Northern goshawk जैसे विशिष्ट पक्षियों को आसानी से देखा जा सकता है। यहाँ से पास ही में स्थित है सांभर झील। सांभर झील, घना के बाद दूसरा रामसर स्थल है तथा हर वर्ष बहुत प्रजातियों के प्रवासी पक्षी यहाँ आते हैं । रामसागर और मानसागर इस क्षेत्र के प्रसिद्ध जलाशय हैं जो जलीय जीव सम्पदा के खजाने हैं। कभी रामगढ भी यहाँ का प्रसिद्ध जलाशय हुआ करता था परन्तु मानवीय हस्तक्षेपों के चलते वह सूख गया।

हम रुकते हैं, अभी आमेर में लेकिन अरावली को तो और आगे जाना है, आगे दिल्ली तक!!

चौसिंगा – विश्व का एकमात्र चार सींगो वाला ऐन्टीलोप

चौसिंगा – विश्व का एकमात्र चार सींगो वाला ऐन्टीलोप

एशिया के सबसे छोटे बोविड्स में से एक फोर हॉर्नड ऐन्टीलोप अपनी असामान्य चार सींगो के कारण जहाँ एक ओर लोकप्रिय रहे तो वहीं दूसरी ओर ये इनके संकटग्रस्त होने के कारण भी बने।

चौसिंगाया Four-horned Antelope (Tetracerus quadricornis), वर्तमान में, वनों में पाए जाने वाला एकमात्र चार सींगो वाला स्तनपायी जीव है जो मूल रूप से भारतीय प्रायद्वीप का स्थानिक जीव (endemic) के रूप में पाया जाता है। इसको राजस्थान कि स्थानीय भाषा में भेडल या गुटेर भी कहा जाता है। वर्ष 2016 में किए गए चौसिंगा के वैश्विक मूल्यांकन के अनुसार वनों में इसकी आबादी लगातार घटने और संकटग्रस्त होने कि वजह से IUCN ने इसे असुरक्षित (Vulnerable या VU) श्रेणी में वर्गीकृत किया हुआ है। चौसिंगा को अगर राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो येअत्यंत ही दुर्लभ जीव है जो यहाँ विलुप्त होने कि कगार पर है। मुख्यतः यह राजस्थान के पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में पाया जाता है। इसकी दुर्लभता कि पुष्टि इस बात से कि जा सकती है कि यहाँ ये अपने मौजूदा पर्यावास में भी वर्षों तक नजर नहीं आता, हाल ही में भैंसरोडगढ़ के वन्यजीव अभयारण्य बनने के 37 साल बाद पहली बार नजर आया।

IUCN ने वर्ष 2001 में मृगों (Antelopes) कि स्थिति और कार्य योजना बनाने के लिए एक वैश्विक सर्वेक्षण करवाया जिसके अंतर्गत भारतीय प्रायद्वीप पर चौसिंगा सर्वेक्षण डॉ असद आर रहमानी कि अगवाई में हुआ। इस सर्वेक्षण के अनुसार राजस्थान के 8 संरक्षित क्षेत्रों (राओली टोडगढ़, रणथंभोर, सरिस्का, दरा, जयसमंद, कुम्भलगढ़, फुलवारी, और सीतामाता) में चौसिंगा कि मौजूदगी दर्ज कि गई है। हालांकि डॉ रहमानी द्वारा सर्वेक्षण से रणथंभोर में चौसिंगा कि उपस्थिति दर्ज करने कि घटना को त्रुटिपूर्ण मानते हुए यहाँ वर्षों से बाघ संरक्षण के लिए काम कर रहे डॉ धर्मेन्द्र खांडल बताते हैं कि वर्तमान समय में चौसिंगा यहाँ कभी नहीं देखा गया है। राजस्थान कि जैव-विविधता के विशेषज्ञ डॉ सतीश शर्माके अनुसार चौसिंगा कि उपस्थिति जालोर, पाली, उदयपुर, अजमेर, धौलपुर, और चित्तौड़गढ़ में भी है। कोटा, झालावाड़ में भी इनकी उपस्थिति के संकेत अक्सर मिलते रहते हैं। कुछ वर्षों पहले वन्यजीव गणना के दौरान कोलीपूरा से गिरधरपूरा के जंगल में ये देखे गए थे। वर्षों से वन्यजीवों कि फोटोग्राफी कर रहे अब्दुल हानिफ जैदीसाब बताते हैं कि 5-7 वर्ष पूर्व (2013-14) दरा के पास एक मादा चौसिंगा को सड़क दुर्घटना में मृत पाया गया था।

The Book of Antelopes (1894) में प्रकाशित चौसिंगा का चित्रण

चौसिंगा भारतीय प्रायद्वीप पर व्यापक रूप से वितरित है, विश्व कि 95% आबादी भारत और शेष 5% नेपाल में पाई जाती है। भारत में हिमालय की तलहटी से लेकर दक्कन के पठार तक विस्तृत हैं। इनका वितरण ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में खुले, सूखे, पर्णपाती जंगलों में होता है। ये मृग घास आवरण या झाड़-झंखाड़ वाले जंगलों और निकटवर्ती जलाशयों में निवास करते हैं और मानवीय आबादी वाले क्षेत्रों से दूर रहने की कोशिश करते हैं।

चौसिंगा टेट्रिसस जीनस का एकमात्र सदस्य है। इसका का वर्णन पहली बार 1816 में फ्रांसीसी प्राणी शास्त्री हेनरी मैरी डुक्रोटेडेब्लेनविले ने किया था। चौसिंगा को ट्राइब बोसलाफिनी (Boselaphini) में रखा गया है, जिसमें चौसिंगा के अलावा मात्र नीलगाय (Boselaphus tragocamelus) को रखा गया है। वैसे तो ट्राइब बोसलाफिनी के सदस्यों में सामने की तरफ एक कील के साथ सींग होते हैं और अन्य मृग समूहों में पाए जाने वाले छल्ले की कमी है, लेकिन डॉ सतीश शर्मा के अनुसार चौसिंगा में हल्के छल्ले पाए जाते है। कॉलिन ग्रॉवस (2003) ने चौसिंगा को उनके खाल के रंग और विस्तार के अनुसार 3 उप-प्रजातियों में विभाजित किया है:

  • T. q. iodes (Hodgson, 1847): गंगा के उत्तर से नेपाल तक वितरित।
  • T. q. quadricornis (de Blainville, 1816): मुख्यतः भारतीय प्रायद्वीप पर वितरित।
  • T. q. subquadricornutus (Elliot, 1839) पश्चिमी घाट और दक्षिणी भारत में वितरित।

चौसिंगा, बोविडा परिवार (Bovidae) का एक जुगाली करने वाला (ruminant) एक छोटा और पतला गोकुलीय प्राणी (ungulate) है जिसके शरीर की लंबाई 1 मीटर और पूंछ की लंबाई 10-15 सेमी तक होती है। इसका वजन 15-25 किलो होता है। इनके चार सींग होते हैं जो इन्हें अन्य Bovids, जिनके दो सींग होते हैं, से अलग करते हैं। सींग दो के जोड़ों में केवल नर पर ही पाए जाते हैं, मादा सींग रहित होती हैं। सींगों का एक जोड़ा सीधा और कानों के बीच 2.5-4 सेंटीमीटर तक लंबा होता है। दूसरे थोड़े घुमावदार पीछे माथे पर स्थित होते हैं जिनकी माप 8-10 सेंटीमीटर कि होती है। इनका कोट पीले-भूरे से लाल रंग का होता है। शरीर का निचला हिस्सा और पैरो के अंदरूनी हिस्से सफेद होते हैं। चेहरे की विशेषताओं में थूथन पर और कान के पीछे काले निशान शामिल हैं। पैरो कि बाहरी सतह पर एक काली धारी होती है।

चौसिंगा नर (फोटो: श्री ऋषिराज देवल)

यह एक शर्मीला और दिनचर जीव है जो दिन के दौरान सक्रिय रहते हैं और स्वयं को मनुष्य से दूर रखकर छुपे रहते है। सामान्यतः स्वभाव से यह एकांत वासी होते हैं लेकिन 3 से 5 जानवरों के ढीले समूह भी बना सकते हैं। इन समूहों में कभी-कभी किशोरियों (calves) के साथ एक या अधिक वयस्क होते हैं। नर (buck) और मादा (doe)  केवल मिलन के मौसम में बातचीत करते हैं। भयभीत होने पर, वे स्तब्ध हो जाते हैं और घबराहट में छलांग लगा कर या पूरे वेग से दौड़कर खतरे से दूर चले जाते हैं। शिकारी जीवों से बचने के लिए वे अक्सर ऊंची घास में छिप जाते हैं। आम तौर पर दूसरों को सचेत करने के लिए अलार्म कॉल का उपयोग नहीं करते हैं क्योंकि वे शिकारियों के ध्यान से बचने की कोशिश करते हैं। हालांकि, चरम मामलों में, इन कॉल का उपयोग शिकारियों को यह चेतावनी देने के लिए उपयोग करते हैं कि इन्होंने शिकारी को देख लिया है और वे इनके पीछे न आयें। वयस्क चौसिंगा द्वारा अपने क्षेत्र चिह्नित करने लिए ग्रंथियों के स्राव के साथ कई जगहों पर मल त्याग करते है।वे कई निश्चित स्थानों पर नियमित रूप से मल त्याग कर ढेर बनते हैं। अक्सर इनके मल का ढेर और पेलेट ड्रॉपिंगबार किंग डीयर से भ्रमित किया जा सकता है, लेकिन चौसिंगा के पेलेट लंबे और बड़े होते हैं। ये जानवर विनम्र प्रदर्शन जैसे कि शरीर सिकुडाना, सर झुकना, कान पीछे खींचना आदि की मदद से भी संवाद करते हैं। यह मुख्य रूप से घास, शाक, छोटी झाड़ियाँ, पत्ते, फूल और फल खाते हैं और बार-बार पानी पीते है।

चौसिंगा बारिश के मौसम, जुलाई से सितंबर के बीच संभोग करते हैं। मादाएँ 8 महीने कि गर्भधारण अवधि के बाद एक या दो बछड़ों को जन्म देती है। बछड़े पूरी तरह से विकसित पैदा होते हैं जिनका वजन 0.7 से 1.1 किलोग्राम तक होता है। बछड़ों को जन्म के पहले कुछ हफ्तों के तक छुपा कर रखा जाता है, ये लगभग एक साल तक अपनी मां के साथ रहते हैं।

बाघ, तेंदुए और जंगली कुत्ते इसके प्रमुख प्राकृतिक शिकारी है। इनकी संख्या काम होने के मुख्य कारण हैं गैर-कानूनी शिकार, फैलते हुए खेत और सिमटते हुए प्राकृतिक आवास। वन क्षेत्र घटने और घास के मैदानों के बदलते स्वरूप के कारण चौसिंगा हिरनों के लिए प्राकृतिक आवास का संकट पैदा हो रहा है। इस कारण चौसिंगा जब जंगल के बाहर निकलते हैं तो शिकारियों के हत्थे चढ़ जाते हैं। शिकार के कारण इनकी आबादी लगातार घट रहीहै। इसके अलावा, इन मृगों की असामान्य चार सींग वाली खोपड़ी और सींग ट्रॉफी हंटर्स के लोकप्रिय लक्ष्य रहते हैं। वर्ष 2001 में इनकी तादाद दस हजार के आस-पास गिनी गयी थी, जो कालान्तर में ओर गिरी है और वर्तमान में 6000 से भी कम अनुमानित है।

संरक्षण के प्रयास:

राजस्थान सरकार ने चौसिंगा को चित्तौडगढ़ जिले का वन्यजीव पशु घोषित करने के साथ ही इसके प्रजनन संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए सीतामाता सेंचुरी के 225 हैक्टेयर क्षेत्र को इस प्रजाति के लिए रिजर्व कर प्रोजेक्ट शुरू किया। चित्तौडगढ़ जिले की पहचान को चौसिंगा से जोड़ कर सरकारी दस्तावेज में मस्कर यानी शुभंकर या प्रतीक चिन्ह के रूप में चौसिंगा की तस्वीर के उपयोग के निर्देश दिए। जिले कावन्य पशु घोषित होने से लोग इसके बारे में अधिक जानने लगे जिससे इनके संरक्षण में जागरूकता बढ़ने कि उम्मीद है।

वर्ष 2011 में सीतामाता अभयारण्य में चौसिंगा कि संख्या मात्र 100 तक सिमटने के कारण और लगातार संरक्षण प्रयासों के बावजूद इनकी संख्या में वृद्धि नहीं होने से चिंतित राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता परियोजना के अंतर्गत सीतामाता में प्लान बनाया गया जो 2014 से क्रियान्वित किया गया। योजना के तहत अभयारण्य में 125-135 हेक्टेयर के दो क्लोजर रानीगढ़ और आंबारेड़ी में बनाए गए और चारा-पानी कि व्यवस्था कि गई। अभयारण्य के आरामपुरा वन नाके के आसपास 25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस प्रोजेक्ट में वाटरहोल, ग्रास लैंड बनाए गए। वहीं इन वाटरहोल को भरने के लिए पानी की टंकियां बनाई गई। इन प्रोजेक्ट के पूरे होने से वन्यजीवों के लिए आने वाली गर्मी के दिनों के पैदा होने वाले पानी और शाकाहारी जीवों के लिए घास के संकट से निजात मिली।

इसके अलावा राजस्थान अन्य हिस्सों में भी लुप्त हो रहे चौसिंगा के संरक्षण व संवर्धन के लिए वन विभाग ने साल 2015 में चौसिंगा संरक्षण प्रोजेक्ट के तहत काम किया, जिसमें कुम्भलगढ़ अभयारण्य क्षेत्र में करीब 200 हेक्टेयर भूमि आरक्षित करना शामिल है। यहाँ बचे हुए चौसिंगा को एक साथ रखकर उनके लिए भोजन-पानी सहित उनके बेहतर जीवन के लिए जरूरी सुविधाएँ करवाई गई। 1.30 करोड़ के इस प्रोजेक्ट का मकसद लुप्त हो रही प्रजाति को बचाने का था, लेकिन दुर्भाग्यवश इसके विपरीत नतीजे सामने आने लगे। चौसिंगा क्लोजर के तारबंदी में अक्सर फसकर घायल हो जाते और कई ऐसी भी घटनाएँ सामने आई जिसमें आवारा कुत्ते क्लोजर में प्रवेश कर चौसिंगा का शिकार करते पाए गए।

वनों से इन शाकाहारी जीवों का विलुप्त होना हमारे विविध पारिस्थितिक तंत्रों में एक ‘खाली परिदृश्य’ को बढ़ा रहा है। जिसका समाधान स्थानीय लोगों को संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधनमें शामिल करने और उनको लाभान्वित करने में है। राज्य सरकार द्वारा चौसिंगा संरक्षण के लिए कई प्रयास किए जाने के बावजूद इनकी संख्या और स्थिति जस की तस ही नजर आ रही है। कारण है अनियोजित कार्य प्रणाली और कुछ मूर्खतापूर्ण बेतुके कदम। चौसिंगा जैसे दौड़ने और छलांग लगाने वाले जीव को चैनल वायर फेन्सिंग से क्लोजर बना कर रखना स्वयं में ही इनको क्षति पहुँचाने के सिवा कुछ नहीं है और इन फेन्सेस को जल्द से जल्द हटाने कि जरूरत है। जरूरत है इनके पर्यावास विकसित करने कि, संरक्षित क्षेत्रों में हो रहे वनों कि कमी और घास के मैदानों के बदलते स्वरूप को रोकने कि, स्थानीय समुदाय की संरक्षित क्षेत्रों में भागीदारी बढ़ाने कि अन्यथा विश्व के एकमात्र चार सिंगोवाले मृगको राजस्थान के परिदृश्य से लुप्त होने से नहीं रोका जा सकेगा।

 

सन्दर्भ:
  1. IUCN SSC Antelope Specialist Group. 2017. Tetracerus quadricornis. The IUCN Red List of Threatened Species 2017: e.T21661A50195368.http://dx.doi.org/10.2305/IUCN.UK.2017-2.RLTS.T21661A50195368.en
  2. Mallon, D.P. and Kingswood, S.C. (compilers). (2001). Part 4: North Africa, the Middle East, and Asia.Global Survey and Regional Action Plans. SSC Antelope Specialist Group.IUCN, Gland, Switzerland andCambridge, UK.viii + 260pp.
  3. Leslie,David M., Jr. and Sharma, Koustubh. (2009). Tetracerus quadricornis (Artiodactyla:Bovidae) Mammalian Species, Issue 843, 25 September 2009, Pages 1-11. https://doi.org/10.1644/843.1
  4. Cover image courtesy: Mr. Rishiraj Deval