अरावली की आभा: मामेर से आमेर तक

अरावली की आभा: मामेर से आमेर तक

अरावली, थार रेगिस्तान को उत्तरी राजस्थान तक सीमित रखे और विशाल जैव-विविधता को सँजोती पर्वत श्रृंखला हिमालय से भी पुरानी मानी जाती है। इसके 800 किलोमीटर के विस्तार क्षेत्र में 20 वन्यजीव अभयारण्य समाये हुए हैं, आइए इसकी विविधता कि एक छोटी यात्रा पर चलते है…

संसार की सबसे प्राचीनतम पर्वत श्रखलाओ में से एक अरावली, भारत के चार राज्यों गुजरात, राजस्थान, हरियाणा एवं  दिल्ली तक प्रसारित है। अरावली का अधिकतम विस्तार राजस्थान में ही है। तो इसके प्राकृतिक वैभव को जानने के लिए, आइये चलते है दक्षिणी राजस्थान के मामेर से उत्तर दिशा के आमेर तक।

मामेर, गुजरात राज्य की उत्तरी सीमा के पास बसे धार्मिक नगरों खेड़ब्रम्हा एवं अम्बाजी के पास स्थित है। यहाँ अरावली की वन सम्पदा देखते ही बनती है। प्रसिद्ध फुलवारी वन्यजीव अभयारण्य यहाँ से शुरू होकर उत्तर दिशा तक विस्तारित है। तो वहीँ मामेर की पश्चिमी दिशा की ओर से माउन्ट आबू अभयारण्य पहुंचा जा सकता है, जो राजस्थान का एकमात्र “हिल स्टेशन” है। फुलवारी, अरावली का एक मात्र ऐसा अभयारण्य है जहाँ धोकडा यानि एनोजीसस पेंडुला (Anogeissus pendula)  प्राकृतिक रूप से नहीं पाया जाता। अभयारण्यों में यही अकेला ऐसा अभयारण्य है जहाँ राजस्थान के सुन्दर बांस वन पाए जाते हैं।

अरावली पर्वत श्रृंखला के ऊँचे पहाड़ (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

इस क्षेत्र में आगे चलते है तो रास्ते में वाकल नदी आती है, यह नदी कोटड़ा के बाद गुजरात में प्रवेश कर साबरमती से मिल जाती है। वाकल नदी को पार कर डेढ़मारिया व लादन वनखंडो के सघन वनों को देखते हुए रामकुंडा पंहुचा जा सकता है। यहाँ एक सूंदर मंदिर एवं एक झरना भी है जो वर्षा ऋतु में दर्शनीय हो जाता है। यहीं एक कुंड में संरक्षित बड़ी-बड़ी मछलिया भी देखने को मिलती है।

इसी क्षेत्र में पानरवा नामक स्थान के पास सोमघाटा स्थित है जिस से होकर किसी समय में अंग्रेज़ रेजीडेंट, खैरवाड़ा, बावलवाड़ा होकर पानरवा के विश्राम स्थल में ठहरकर कोटड़ा छावनी पहुंचते थे। पानरवा से मानपुर होकर कोल्यारी के रास्ते कमलनाथ के पास से झाड़ोल पंहुचा जा सकता है। यह क्षेत्र “भोमट” के नाम से जाना जाता है। झाड़ोल के बहुत पास का क्षेत्र ” झालावाड़ ” कहलाता है। अरावली के इस क्षेत्र में चट्टानों पर केले की वन्य प्रजाति (Ensete superbum) उगती है। झाड़ोल के पास स्थित मादडी नामक गांव में राज्य का सबसे विशाल बरगद का पेड़ स्थित है तथा यहीं मादडी वनखंड में राज्य का सबसे बड़ा ” बॉहिनिया  वेहलाई ” (Bauhinia vahlii) कुञ्ज भी विध्यमान है।

उत्तर की तरफ बढ़ने पर जूड़ा, देवला, गोगुंदा आदि गांव आते हैं। फुलवारी की तरह, यहां भी मिश्रित सघन वन पाए जाते हैं तथा इस क्षेत्र में अरावली की पहाड़ियों पर मिट्टी की परत उपस्थित होने के कारण उत्तर व मध्य अरावली के मुकाबले यहाँ अधिक सघनता व जैव विविधता वाले वन पाए जाते हैं। इस क्षेत्र के “नाल वन” जो दो सामानांतर पर्वत श्रंखला के बीच नमी वाले क्षेत्र में बनते हैं दर्शनीय होते हैं। नाल सांडोल, केवड़ा की नाल, खोखरिया की नाल, फुलवारी की नाल, सरली की नाल, गुजरी की नाल आदि इस क्षेत्र की प्रसिद्ध नाल हैं। जिनके “रिपेरियन वन” (नदी या नालों के किनारे के वन) सदाबहार प्रजातियों जैसे आम, Syzygium heyneanum (जंगली जामुन), चमेली, मोगरा, लता शीशम, Toona ciliata, salix, Ficus racemosa, Ficus hispida, Hiptage benghalensis (अमेती), कंदीय पौधे, ऑर्किड, फर्न, ब्रयोफिट्स आदि से भरे रहते हैं।

अरावली, विशाल जैव-विविधता को सँजोती पर्वत श्रृंखला (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

अरावली के दक्षिणी भाग में Flying squirrel, Three-striped palm squirrel, Green whip snake, Laudankia vine snake, Forsten’s cat snake, Black headed snake, Slender racer, Red spurfowl, Grey jungle fowl (जंगली मुर्गा), Red whiskered bubul, Scimitar babbler (माऊंट आबू), White throated babbler आदि जैसे विशिष्ट प्राणी निवास करते है। राज्य की सबसे बड़ी मकड़ी “जायन्ट वुड स्पाइडर” यहाँ फुलवारी, कमलनाथ, कुम्भलगढ़ व सीतामाता में देखने को मिलती है तथा राज्य का सबसे बड़ा शलभ “मून मॉथ ” वर्षा में यहाँ जगह-जगह देखने को मिलता है। कभी बार्किंग डीयर भी यहाँ पाए जाते थे। सज्जनगढ़ व इसके आसपास भारत की सबसे छोटी बिल्ली “रस्टी स्पॉटेड कैट” भी देखने को मिलती है।

देवला के बहुत पास पिंडवाडा रोड पर सेई नामक बाँध पड़ता है, जिसे “इम्पोटेंड बर्ड एरिया” होने का गौरव प्राप्त है। राजस्थान के 31 मान्य आई.बी.ए में से 12 स्थान; जयसमंद झील व अभयारण्य, कुंभलगढ़, माऊंट आबू, फुलवारी, सरेसी बाँध, सेई बाँध, उदयपुर झील संकुल एवं बाघदड़ा आदि, दक्षिण राजस्थान में अरावली क्षेत्र व उसके आसपास विध्यमान हैं।

आइये देश के सागवान वनों की उत्तर व पश्चिम की अंतिम सीमा, सागेटी, चित्रवास व रीछवाडा की ओर बढ़ते हैं। इस क्षेत्र से पश्चिम में जाने पर पाली जिले की सीमा आ जाती है। यहाँ सुमेरपुर से होकर सादडी, घाणेराव आदि जगह का भू – भाग “गोडवाड़” के नाम से जाना जाता है। गोडवाड़  में अरावली व थार का मिलन होने से एक मेगा इकोटोन बनता है जो अरावली के पश्चिम ढाल से समान्तर आगे बढ़ता चलता है।

कुंभलगढ़ अभयारण्य, सागवान वितरण क्षेत्र के अंतिम बिंदु से प्रारम्भ होता है जो देसूरी की नाल को लांघते ही रावली-टॉडगढ़ अभयारण्य के जंगलों से मिल जाता है। इस क्षेत्र में जरगा व कुम्भलगढ़ के ऊंचे पर्वत शिखर देखने को मिलते हैं। जरगा, माउंट आबू के बाद सबसे ऊंचा स्थल है। इस क्षेत्र की आबोहवा गर्मी में सुहानी बनी रहती है। गोगुन्दा व आसपास के क्षेत्र में गर्मी की रातें काफी शीतल व सुहावनी रहती है। इस क्षेत्र में दीवारों, चट्टानों व वृक्षों पर लाइकेन मिलती हैं। जरगा में नया जरगा नामक स्थान पश्चिमी ढाल पर व जूना जरगा पूर्वी ढाल पर दर्शनीय मंदिर है एवं पवित्र वृक्ष कुज भी है। कुंभलगढ़ व जरगा में ऊंचाई के कारण अनेकों विशिष्ट पौधे पाए जाते हैं। यहाँ Toona ciliate, Salix, Salix tetrandra, Trema orientalis, Trema politoria, Ceasalpinia decapetala, Sauromatum pedatum आदि देखने को मिलते हैं। जरगा पहाड़ियों को पूर्वी बनास का उद्गम स्थल माना जाता है। जरगा के आसपास बनास के किनारे विशिष्ट फर्नो का अच्छा जमाव देखा जाता है। वेरो का मठ के आस पास मार्केंशिआ नामक ब्रायोफाइट देखा गया है। कुंभलगढ़ में ऐतिहासिक व धार्मिक महत्त्व के अनेकों स्थान है तथा कुछ स्थान जैसे कुंभलगढ़ किला, रणकपुर मंदिर , मुछाला महावीर, पशुराम महादेव आदि मुख्य दर्शनीय स्थान है।

आगे चलते है रावली-टॉडगढ़ अभयारण्य की ओर। इतिहासकार कर्नल टॉड के नाम से जुडी रावली-टॉडगढ़ अभयारण्य वन्यजीवों से भरपूर है। यहाँ आते-आते वन शुष्क पर्णपाती हो जाते है तथा पहाड़ पथरीले नजर आते है। यहाँ धोकड़ की क्लाइमैक्स आबादी को देखा जा सकता है। यह अभयारण्य ग्रे जंगल फ़ाउल की उतरी वितरण सीमा का अंतिम छोर है।

उतर दिशा में आगे बढ़ने पर राजसमन्द एवं अजमेर के बीच पहाड़ियां शुष्क होने लगती है। धोकड़े के जंगलो में डांसर व थूर का मिश्रण साफ़ दीखता है और सघनता विरलता में बदल जाती है। इसी भाग में सौखालिया क्षेत्र विद्यमान है जो गोडवान (Great Indian bustard) के लिए विख्यात है। कभी – कभार खड़मोर (Lesser florican) भी यहाँ देखने को मिलता है। यहाँ छितरे हुए गूगल के पेड़ मिलते हैं जो एक रेड डेटा प्रजाति है। इस भाग में आगे बढ़ने पर नाग पहाड़ आता है जो की काफी ऊँचा है, जहाँ कभी सघन वन एवं अच्छी जैव विविधता पायी जाती थी।

हमारी यात्रा के अंतिम पड़ाव में जयपुर के पहाड़ आते हैं और यहीं पर स्थित है, आमेर।  झालाना व नाहरगढ़ अभयारण्य में अधिक सघनता व जैव विविधता वाले वन हैं। कभी यहाँ बाघ तथा अन्य खूंखार प्राणियों की बहुतायत हुआ करती थी। यहाँ White-naped tit और Northern goshawk जैसे विशिष्ट पक्षियों को आसानी से देखा जा सकता है। यहाँ से पास ही में स्थित है सांभर झील। सांभर झील, घना के बाद दूसरा रामसर स्थल है तथा हर वर्ष बहुत प्रजातियों के प्रवासी पक्षी यहाँ आते हैं । रामसागर और मानसागर इस क्षेत्र के प्रसिद्ध जलाशय हैं जो जलीय जीव सम्पदा के खजाने हैं। कभी रामगढ भी यहाँ का प्रसिद्ध जलाशय हुआ करता था परन्तु मानवीय हस्तक्षेपों के चलते वह सूख गया।

हम रुकते हैं, अभी आमेर में लेकिन अरावली को तो और आगे जाना है, आगे दिल्ली तक!!

चौसिंगा – विश्व का एकमात्र चार सींगो वाला ऐन्टीलोप

चौसिंगा – विश्व का एकमात्र चार सींगो वाला ऐन्टीलोप

एशिया के सबसे छोटे बोविड्स में से एक फोर हॉर्नड ऐन्टीलोप अपनी असामान्य चार सींगो के कारण जहाँ एक ओर लोकप्रिय रहे तो वहीं दूसरी ओर ये इनके संकटग्रस्त होने के कारण भी बने।

चौसिंगाया Four-horned Antelope (Tetracerus quadricornis), वर्तमान में, वनों में पाए जाने वाला एकमात्र चार सींगो वाला स्तनपायी जीव है जो मूल रूप से भारतीय प्रायद्वीप का स्थानिक जीव (endemic) के रूप में पाया जाता है। इसको राजस्थान कि स्थानीय भाषा में भेडल या गुटेर भी कहा जाता है। वर्ष 2016 में किए गए चौसिंगा के वैश्विक मूल्यांकन के अनुसार वनों में इसकी आबादी लगातार घटने और संकटग्रस्त होने कि वजह से IUCN ने इसे असुरक्षित (Vulnerable या VU) श्रेणी में वर्गीकृत किया हुआ है। चौसिंगा को अगर राजस्थान के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए तो येअत्यंत ही दुर्लभ जीव है जो यहाँ विलुप्त होने कि कगार पर है। मुख्यतः यह राजस्थान के पूर्वी और दक्षिण-पूर्वी क्षेत्रों में पाया जाता है। इसकी दुर्लभता कि पुष्टि इस बात से कि जा सकती है कि यहाँ ये अपने मौजूदा पर्यावास में भी वर्षों तक नजर नहीं आता, हाल ही में भैंसरोडगढ़ के वन्यजीव अभयारण्य बनने के 37 साल बाद पहली बार नजर आया।

IUCN ने वर्ष 2001 में मृगों (Antelopes) कि स्थिति और कार्य योजना बनाने के लिए एक वैश्विक सर्वेक्षण करवाया जिसके अंतर्गत भारतीय प्रायद्वीप पर चौसिंगा सर्वेक्षण डॉ असद आर रहमानी कि अगवाई में हुआ। इस सर्वेक्षण के अनुसार राजस्थान के 8 संरक्षित क्षेत्रों (राओली टोडगढ़, रणथंभोर, सरिस्का, दरा, जयसमंद, कुम्भलगढ़, फुलवारी, और सीतामाता) में चौसिंगा कि मौजूदगी दर्ज कि गई है। हालांकि डॉ रहमानी द्वारा सर्वेक्षण से रणथंभोर में चौसिंगा कि उपस्थिति दर्ज करने कि घटना को त्रुटिपूर्ण मानते हुए यहाँ वर्षों से बाघ संरक्षण के लिए काम कर रहे डॉ धर्मेन्द्र खांडल बताते हैं कि वर्तमान समय में चौसिंगा यहाँ कभी नहीं देखा गया है। राजस्थान कि जैव-विविधता के विशेषज्ञ डॉ सतीश शर्माके अनुसार चौसिंगा कि उपस्थिति जालोर, पाली, उदयपुर, अजमेर, धौलपुर, और चित्तौड़गढ़ में भी है। कोटा, झालावाड़ में भी इनकी उपस्थिति के संकेत अक्सर मिलते रहते हैं। कुछ वर्षों पहले वन्यजीव गणना के दौरान कोलीपूरा से गिरधरपूरा के जंगल में ये देखे गए थे। वर्षों से वन्यजीवों कि फोटोग्राफी कर रहे अब्दुल हानिफ जैदीसाब बताते हैं कि 5-7 वर्ष पूर्व (2013-14) दरा के पास एक मादा चौसिंगा को सड़क दुर्घटना में मृत पाया गया था।

The Book of Antelopes (1894) में प्रकाशित चौसिंगा का चित्रण

चौसिंगा भारतीय प्रायद्वीप पर व्यापक रूप से वितरित है, विश्व कि 95% आबादी भारत और शेष 5% नेपाल में पाई जाती है। भारत में हिमालय की तलहटी से लेकर दक्कन के पठार तक विस्तृत हैं। इनका वितरण ज्यादातर पहाड़ी इलाकों में खुले, सूखे, पर्णपाती जंगलों में होता है। ये मृग घास आवरण या झाड़-झंखाड़ वाले जंगलों और निकटवर्ती जलाशयों में निवास करते हैं और मानवीय आबादी वाले क्षेत्रों से दूर रहने की कोशिश करते हैं।

चौसिंगा टेट्रिसस जीनस का एकमात्र सदस्य है। इसका का वर्णन पहली बार 1816 में फ्रांसीसी प्राणी शास्त्री हेनरी मैरी डुक्रोटेडेब्लेनविले ने किया था। चौसिंगा को ट्राइब बोसलाफिनी (Boselaphini) में रखा गया है, जिसमें चौसिंगा के अलावा मात्र नीलगाय (Boselaphus tragocamelus) को रखा गया है। वैसे तो ट्राइब बोसलाफिनी के सदस्यों में सामने की तरफ एक कील के साथ सींग होते हैं और अन्य मृग समूहों में पाए जाने वाले छल्ले की कमी है, लेकिन डॉ सतीश शर्मा के अनुसार चौसिंगा में हल्के छल्ले पाए जाते है। कॉलिन ग्रॉवस (2003) ने चौसिंगा को उनके खाल के रंग और विस्तार के अनुसार 3 उप-प्रजातियों में विभाजित किया है:

  • T. q. iodes (Hodgson, 1847): गंगा के उत्तर से नेपाल तक वितरित।
  • T. q. quadricornis (de Blainville, 1816): मुख्यतः भारतीय प्रायद्वीप पर वितरित।
  • T. q. subquadricornutus (Elliot, 1839) पश्चिमी घाट और दक्षिणी भारत में वितरित।

चौसिंगा, बोविडा परिवार (Bovidae) का एक जुगाली करने वाला (ruminant) एक छोटा और पतला गोकुलीय प्राणी (ungulate) है जिसके शरीर की लंबाई 1 मीटर और पूंछ की लंबाई 10-15 सेमी तक होती है। इसका वजन 15-25 किलो होता है। इनके चार सींग होते हैं जो इन्हें अन्य Bovids, जिनके दो सींग होते हैं, से अलग करते हैं। सींग दो के जोड़ों में केवल नर पर ही पाए जाते हैं, मादा सींग रहित होती हैं। सींगों का एक जोड़ा सीधा और कानों के बीच 2.5-4 सेंटीमीटर तक लंबा होता है। दूसरे थोड़े घुमावदार पीछे माथे पर स्थित होते हैं जिनकी माप 8-10 सेंटीमीटर कि होती है। इनका कोट पीले-भूरे से लाल रंग का होता है। शरीर का निचला हिस्सा और पैरो के अंदरूनी हिस्से सफेद होते हैं। चेहरे की विशेषताओं में थूथन पर और कान के पीछे काले निशान शामिल हैं। पैरो कि बाहरी सतह पर एक काली धारी होती है।

चौसिंगा नर (फोटो: श्री ऋषिराज देवल)

यह एक शर्मीला और दिनचर जीव है जो दिन के दौरान सक्रिय रहते हैं और स्वयं को मनुष्य से दूर रखकर छुपे रहते है। सामान्यतः स्वभाव से यह एकांत वासी होते हैं लेकिन 3 से 5 जानवरों के ढीले समूह भी बना सकते हैं। इन समूहों में कभी-कभी किशोरियों (calves) के साथ एक या अधिक वयस्क होते हैं। नर (buck) और मादा (doe)  केवल मिलन के मौसम में बातचीत करते हैं। भयभीत होने पर, वे स्तब्ध हो जाते हैं और घबराहट में छलांग लगा कर या पूरे वेग से दौड़कर खतरे से दूर चले जाते हैं। शिकारी जीवों से बचने के लिए वे अक्सर ऊंची घास में छिप जाते हैं। आम तौर पर दूसरों को सचेत करने के लिए अलार्म कॉल का उपयोग नहीं करते हैं क्योंकि वे शिकारियों के ध्यान से बचने की कोशिश करते हैं। हालांकि, चरम मामलों में, इन कॉल का उपयोग शिकारियों को यह चेतावनी देने के लिए उपयोग करते हैं कि इन्होंने शिकारी को देख लिया है और वे इनके पीछे न आयें। वयस्क चौसिंगा द्वारा अपने क्षेत्र चिह्नित करने लिए ग्रंथियों के स्राव के साथ कई जगहों पर मल त्याग करते है।वे कई निश्चित स्थानों पर नियमित रूप से मल त्याग कर ढेर बनते हैं। अक्सर इनके मल का ढेर और पेलेट ड्रॉपिंगबार किंग डीयर से भ्रमित किया जा सकता है, लेकिन चौसिंगा के पेलेट लंबे और बड़े होते हैं। ये जानवर विनम्र प्रदर्शन जैसे कि शरीर सिकुडाना, सर झुकना, कान पीछे खींचना आदि की मदद से भी संवाद करते हैं। यह मुख्य रूप से घास, शाक, छोटी झाड़ियाँ, पत्ते, फूल और फल खाते हैं और बार-बार पानी पीते है।

चौसिंगा बारिश के मौसम, जुलाई से सितंबर के बीच संभोग करते हैं। मादाएँ 8 महीने कि गर्भधारण अवधि के बाद एक या दो बछड़ों को जन्म देती है। बछड़े पूरी तरह से विकसित पैदा होते हैं जिनका वजन 0.7 से 1.1 किलोग्राम तक होता है। बछड़ों को जन्म के पहले कुछ हफ्तों के तक छुपा कर रखा जाता है, ये लगभग एक साल तक अपनी मां के साथ रहते हैं।

बाघ, तेंदुए और जंगली कुत्ते इसके प्रमुख प्राकृतिक शिकारी है। इनकी संख्या काम होने के मुख्य कारण हैं गैर-कानूनी शिकार, फैलते हुए खेत और सिमटते हुए प्राकृतिक आवास। वन क्षेत्र घटने और घास के मैदानों के बदलते स्वरूप के कारण चौसिंगा हिरनों के लिए प्राकृतिक आवास का संकट पैदा हो रहा है। इस कारण चौसिंगा जब जंगल के बाहर निकलते हैं तो शिकारियों के हत्थे चढ़ जाते हैं। शिकार के कारण इनकी आबादी लगातार घट रहीहै। इसके अलावा, इन मृगों की असामान्य चार सींग वाली खोपड़ी और सींग ट्रॉफी हंटर्स के लोकप्रिय लक्ष्य रहते हैं। वर्ष 2001 में इनकी तादाद दस हजार के आस-पास गिनी गयी थी, जो कालान्तर में ओर गिरी है और वर्तमान में 6000 से भी कम अनुमानित है।

संरक्षण के प्रयास:

राजस्थान सरकार ने चौसिंगा को चित्तौडगढ़ जिले का वन्यजीव पशु घोषित करने के साथ ही इसके प्रजनन संरक्षण को बढ़ावा देने के लिए सीतामाता सेंचुरी के 225 हैक्टेयर क्षेत्र को इस प्रजाति के लिए रिजर्व कर प्रोजेक्ट शुरू किया। चित्तौडगढ़ जिले की पहचान को चौसिंगा से जोड़ कर सरकारी दस्तावेज में मस्कर यानी शुभंकर या प्रतीक चिन्ह के रूप में चौसिंगा की तस्वीर के उपयोग के निर्देश दिए। जिले कावन्य पशु घोषित होने से लोग इसके बारे में अधिक जानने लगे जिससे इनके संरक्षण में जागरूकता बढ़ने कि उम्मीद है।

वर्ष 2011 में सीतामाता अभयारण्य में चौसिंगा कि संख्या मात्र 100 तक सिमटने के कारण और लगातार संरक्षण प्रयासों के बावजूद इनकी संख्या में वृद्धि नहीं होने से चिंतित राजस्थान वानिकी एवं जैव विविधता परियोजना के अंतर्गत सीतामाता में प्लान बनाया गया जो 2014 से क्रियान्वित किया गया। योजना के तहत अभयारण्य में 125-135 हेक्टेयर के दो क्लोजर रानीगढ़ और आंबारेड़ी में बनाए गए और चारा-पानी कि व्यवस्था कि गई। अभयारण्य के आरामपुरा वन नाके के आसपास 25 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैले इस प्रोजेक्ट में वाटरहोल, ग्रास लैंड बनाए गए। वहीं इन वाटरहोल को भरने के लिए पानी की टंकियां बनाई गई। इन प्रोजेक्ट के पूरे होने से वन्यजीवों के लिए आने वाली गर्मी के दिनों के पैदा होने वाले पानी और शाकाहारी जीवों के लिए घास के संकट से निजात मिली।

इसके अलावा राजस्थान अन्य हिस्सों में भी लुप्त हो रहे चौसिंगा के संरक्षण व संवर्धन के लिए वन विभाग ने साल 2015 में चौसिंगा संरक्षण प्रोजेक्ट के तहत काम किया, जिसमें कुम्भलगढ़ अभयारण्य क्षेत्र में करीब 200 हेक्टेयर भूमि आरक्षित करना शामिल है। यहाँ बचे हुए चौसिंगा को एक साथ रखकर उनके लिए भोजन-पानी सहित उनके बेहतर जीवन के लिए जरूरी सुविधाएँ करवाई गई। 1.30 करोड़ के इस प्रोजेक्ट का मकसद लुप्त हो रही प्रजाति को बचाने का था, लेकिन दुर्भाग्यवश इसके विपरीत नतीजे सामने आने लगे। चौसिंगा क्लोजर के तारबंदी में अक्सर फसकर घायल हो जाते और कई ऐसी भी घटनाएँ सामने आई जिसमें आवारा कुत्ते क्लोजर में प्रवेश कर चौसिंगा का शिकार करते पाए गए।

वनों से इन शाकाहारी जीवों का विलुप्त होना हमारे विविध पारिस्थितिक तंत्रों में एक ‘खाली परिदृश्य’ को बढ़ा रहा है। जिसका समाधान स्थानीय लोगों को संरक्षित क्षेत्रों के प्रबंधनमें शामिल करने और उनको लाभान्वित करने में है। राज्य सरकार द्वारा चौसिंगा संरक्षण के लिए कई प्रयास किए जाने के बावजूद इनकी संख्या और स्थिति जस की तस ही नजर आ रही है। कारण है अनियोजित कार्य प्रणाली और कुछ मूर्खतापूर्ण बेतुके कदम। चौसिंगा जैसे दौड़ने और छलांग लगाने वाले जीव को चैनल वायर फेन्सिंग से क्लोजर बना कर रखना स्वयं में ही इनको क्षति पहुँचाने के सिवा कुछ नहीं है और इन फेन्सेस को जल्द से जल्द हटाने कि जरूरत है। जरूरत है इनके पर्यावास विकसित करने कि, संरक्षित क्षेत्रों में हो रहे वनों कि कमी और घास के मैदानों के बदलते स्वरूप को रोकने कि, स्थानीय समुदाय की संरक्षित क्षेत्रों में भागीदारी बढ़ाने कि अन्यथा विश्व के एकमात्र चार सिंगोवाले मृगको राजस्थान के परिदृश्य से लुप्त होने से नहीं रोका जा सकेगा।

 

सन्दर्भ:
  1. IUCN SSC Antelope Specialist Group. 2017. Tetracerus quadricornis. The IUCN Red List of Threatened Species 2017: e.T21661A50195368.http://dx.doi.org/10.2305/IUCN.UK.2017-2.RLTS.T21661A50195368.en
  2. Mallon, D.P. and Kingswood, S.C. (compilers). (2001). Part 4: North Africa, the Middle East, and Asia.Global Survey and Regional Action Plans. SSC Antelope Specialist Group.IUCN, Gland, Switzerland andCambridge, UK.viii + 260pp.
  3. Leslie,David M., Jr. and Sharma, Koustubh. (2009). Tetracerus quadricornis (Artiodactyla:Bovidae) Mammalian Species, Issue 843, 25 September 2009, Pages 1-11. https://doi.org/10.1644/843.1
  4. Cover image courtesy: Mr. Rishiraj Deval
इंडियन स्पॉटेड-क्रीपर

इंडियन स्पॉटेड-क्रीपर

भारत का स्थानिक, इंडियन स्पॉटेड-क्रीपर एक दुर्लभ वृक्षीय पक्षी जो राजस्थान के शुष्क व् खुले जंगलों में खेजड़ी के पेड़ों पर गिलहरी की तरह फुदकते हुए पेड़ के तने से कीटों का सफाया करता है।

इंडियन स्पॉटेड-क्रीपर, एक छोटा पेसेराइन पक्षी जो राजस्थान के शुष्क खुले जंगलों में खेजड़ी व् रोहिड़े के पेड़ों पर नियमित रूप से  देखा जाता है। यह एक वृक्षीय पक्षी है जिसका रंग भूरे, काले व् सफेद रंग की धारियों और धब्बों का जटिल मिश्रण होता है जिसके कारण इसको एक सरसरी नज़र में देख पाना एक जटिल कार्य है। इसका वैज्ञानिक नाम “Salpornis spilonota” है। इसे पक्षी जगत के Certhiidae परिवार में ट्रिक्रीपर्स के साथ रखा गया है तथा यह सबफॅमिली सेलपोरनिथिनी (Salpornithinae) का सदस्य है। यह मुख्यरूप से उत्तरी और मध्य प्रायद्वीपीय भारत के शुष्क झाड़ियों और खुले पर्णपाती जंगलों में पाया जाता है और यह कहीं भी प्रवास नहीं करते है। इनका ट्रिक्रीपर्स के साथ समावेश निश्चित नहीं है तथा कुछ अध्ययन इन्हे नटहेचर से अधिक निकट पाते हैं। इनके पास ट्रिक्रीपर्स की तरह पूँछ में एक कड़ा पंख नहीं होता है तथा पेड़ पर लंबवत चढ़ने में यह अपनी पूँछ का इस्तेमाल नहीं करते हैं।

विवरण- इंडियन स्पॉटेड-क्रीपर, एक पेसेराइन पक्षी है और कभी-कभी इन्हे पर्चिंग बर्ड या सॉन्गबर्ड के रूप में जाना जाता है। यह चित्तीदार काले-सफ़ेद रंग का होता है, जो इसे पेड़ के तने पर छलावरण में मदद करता है। इसका वजन 16 ग्राम तक होता है, जो समान लंबाई (15 सेमी तक) के ट्रेक्रीपर्स से लगभग दोगुना होता है। अन्य पेसेराइन पक्षियों की तरह इनके पैर की उंगलियों (तीन आगे की तरफ और एक पीछे की तरफ) की व्यवस्था अन्य पक्षियों से अलग होती है, जो इसको पेड़ पर बैठने में मदद करती है। इसके पैरों का आकार भी कुछ अलग होता है जिसमे टार्सस छोटा तथा पीछे वाला पंजा पीछे की ऊँगली से काफी छोटा होता है। इसकी चोंच सिर की तुलना में थोड़ी सी लम्बी तथा पतली, नुकीली व् निचे की ओर झुकी हुई होती है, जिसका उपयोग यह छाल से कीड़े निकालने के लिए करता है। इसके पास ट्रिक्रीपर्स की तरह पूँछ में एक कड़ा पंख नहीं होता है जिसका प्रयोग ट्रिक्रीपर्स पेड़ पर लंबवत चढ़ने के दौरान करते हैं। इसकी आँखों के ऊपर सफ़ेद रंग की भौहें और नीचे गहरे रंग की पट्टी होती है। गाला सफ़ेद रंग का होता है। इसके पंख लम्बे व् सिरे से नुकीले होते है तथा प्राथमिक पंख कम विकसित होते है। पूंछ में बारह पंख होते हैं औरआकार में चौकोर होती है। इसमें नर व् मादा एक से ही दिखते है तथा जुवेनाइल रंग-रूप में वयस्क जैसे ही होते है।

इंडियन स्पॉटेड-क्रीपर पेड़ों की छाल से कीटों का सफाया करते है (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

वितरण- यह कोई आम प्रजाति नहीं है, परन्तु फिर भी यह राजस्थान, गुजरात, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्य भारत, उड़ीसा, उत्तरी आंध्र प्रदेश के कुछ हिस्सों में पृथक रूप से देखने को मिलती है। राजस्थान में इसे ताल छापर वन्यजीव अभ्यारण्य में देखा जाता है जहाँ यह मुख्यरूप से खेजड़ी और रोहिड़े के पेड़ों पर पायी जाती है।

राजस्थान में यह मुख्यरूप से खेजड़ी और रोहिड़े के पेड़ों पर पायी जाती है (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

प्रजनन – ब्रिटिश पक्षी विशेषज्ञ Edward Charles Stuart Baker अपनी पुस्तक The Fauna of British India में लिखते हैं की इसका प्रजनन काल फरवरी से मई तक होता है जिसमे यह एक क्षैतिज शाखा और ऊर्ध्वाधर तने के कोने पर छोटी जड़ों और डंठलों से एक कटोरे के आकार का घोंसला बनाते हैं। यह अपने घोंसले की सतह को पत्तियों, लाइकन और मकड़ी के जाले से कोमल बनाते है तथा घोंसले की बाहरी सतह को लाइकन, मकड़ी के अंडे के खोल और कैटरपिलर मलमूत्र से सजाते हैं। घोंसले की सतह भले ही कोमल व् नरम हो लेकिन मजबूत होती हैं। कई बार इसका घोंसला किसी गाँठ या अन्य उभार के पास भी होता है जिसके कारण उसे देख पाना मुश्किल होता है। ऐ ओ हयूम (A. O. Hume) अपनी पुस्तक “The nests and eggs of Indian birds” में लिखते है की ” मैंने अपने जीवन में ऐसा घोंसला कभी नहीं देखा” जो एक तरफ से जुड़ा हो और बाकि तीन तरफ से बिना किसी सहारे के पेड़ पर स्थायी रहे तथा पूरी तरह से पत्ती-डंठल, पत्तियों के छोटे टुकड़े, छाल, कैटरपिलर के गोबर से बने होने के बावजूद भी बिलकुल मजबूत, नरम व् लचीला हो।

व्यवहार एवं परिस्थितिकी- यह पक्षी अकेले या अन्य प्रजातियों के झुण्ड के साथ पेड़ों की छाल से कीड़े व् मकड़ियों को निकाल कर खाते हुए पाया जाता है। अक्सर यह वृक्ष के आधार से शुरू कर छोटे कीटों को खाते हुए धीरे-धीरे ऊपर बढ़ता है तथा जब यह वृक्ष के ऊपर पहुंच जाता है तो उड़ कर किसी अन्य वृक्ष के आधार से फिर से अपनी खोज शुरू कर देता है। अन्य वृक्ष के आधार के लिए नीचे उड़ान भरते समय यह एक बटेर की तरह प्रतीत होता है। ये जिस तरह से पेड़ के तने पर ऊपर और नीचे काम करते हैं, नटहैचर से मिलते-जुलते लगते हैं परन्तु यह ट्रिक्रीपर्स की तरह तने पर गोल-गोल चक्कर नहीं लगाते हैं। इसकी आवाज बढ़ते हुए टुई-टुई के कर्म में होती है और गीत सीटी की आवाज की तरह सनबर्ड जैसा होता है।

इंडियन स्पॉटेड-क्रीपर छोटे कीट के शिकार के साथ (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

इतिहास –  इंडियन स्पॉटेड-क्रीपर को सबसे पहली बार मेजर जेम्स फ्रैंकलिन (James Franklin) ने सन 1831 में लैटिन भाषा में संक्षिप्त विवरण देते हुए, पूँछ में कठोर पंख की अनुपस्थिति के कारण जीनस Certhia में रखा और द्विपदनाम पद्धति के अनुसार “Certhia spilonota” नाम दिया। फ्रैंकलिन एक ब्रिटिश सैनिक होने के साथ-साथ भूविज्ञान के अधिकारी भी थे। इन्होने केंद्रीय प्रांतों (विंध्य हिल्स) का सर्वेक्षण किया और एशियाई सोसाइटी के लिए पक्षियों को एकत्रित किया और उनके चित्र भी बनाये। ये सभी पक्षियों के नमूने लंदन की जूलॉजिकल सोसायटी में भेजे गए, लेकिन उनके चित्रों को कलकत्ता में एशियाई सोसाइटी में वापस आने के लिए निर्धारित कर दिए गए।

कुछ वर्षों बाद सन 1847 ब्रिटिश संग्रहालय के पक्षीविज्ञान विभाग के प्रमुख जॉर्ज रॉबर्ट ग्रे (George Robert Gray) ने एक नया जीनस Salpornis बनाया और इस प्रजाति को “Salpornis spilonota” के रूप में इस जीनस में रख दिया। जब अफ्रीका में ऐसी ही प्रजाति और पाई गईं, तो उन्हें भारतीय प्रजाति की उप-प्रजाति के रूप में जोड़ दिया गया। फिर सन 1862 में पक्षी विशेषज्ञ TC Jerdon ने भारतीय पक्षियों पर लिखी पुस्तक में इस पक्षी का विस्तार से विवरण दिया। Jerdon अपनी पुस्तक में बताते है की यह पक्षी विवरणकर्ता फ्रेंकलिन और होड्गसन को प्राप्त होने के बाद से कहीं किसी और को कभी नहीं मिला यहाँ तक की पक्षी विशेषज्ञ Blyth और Jerdon को भी नहीं मिला।

कुछ वर्षों बाद सन 1867 में एक अंग्रेजी भूविज्ञानी और प्रकृतिवादी विलियम थॉमस ब्लैनफोर्ड (W. T. Blanford.), The Ibis (ब्रिटिश ऑर्निथोलॉजिस्ट्स यूनियन की वैज्ञानिक पत्रिका) के संपादक को पत्र में लिखते है की उन्होंने लम्बे समय से खो चुके “Salpornis spilonota” की फिर से खोज कर ली है और उनको यह नागपुर और गोदावरी नदी के आसपास के जंगलों में मिला है।

सन 1873 में R. P. LeMesurier, Stray Feathers (भारतीय पक्षी विज्ञान की पत्रिका) के संपादक A. O. Hume को पत्र में लिखते है की उन्होंने जबलपुर, मध्य प्रांतीय क्षेत्र में चाबुक से एक स्पॉटेड क्रीपर “Salpornis spilonota” मारा है। वह पक्षी एक बड़े पीपल के पेड़ के तने पर गिलहरी की तरह फुदक रहा था।

Bulletin of British Ornithologist’s Club के वर्ष 1926 के संकरण में कर्नल और श्रीमती मीनर्ट्ज़घेन ने भारत से कुछ नयी पक्षी प्रजातियों का विवरण भेजा। जिसमे उन्होंने स्पॉटेड-क्रीपर की एक नयी उपप्रजाति Salpornis spilonotus rajputana का विवरण दिया, जिसको उन्होंने अजमेर व् सांभर झील के आसपास देखा था। वे बताते है की इस पक्षी का रंग थोड़ा हल्का और काळा-सफ़ेद निशाँ थोड़े कम होते है। परन्तु आजतक अन्य किसी भी शोध व् अध्यन्न ने ऐसी किसी भी उपप्रजाति का जिक्र नहीं किया है।

राजस्थान के ताल छापर वन्यजीव अभ्यारण्य में अक्सर पक्षिविध्द केवल इसी एक पक्षी को देखने आते है, इस बार आप भी प्रयास करो इसे देख पाओ I  

सन्दर्भ:
  • Baker, E.C.S. (1922). “The Fauna of British India, including Ceylon and Burma. Birds. Volume 1”. v.1 (2nd ed.). London: Taylor and Francis: 439.
  • Franklin, James (1831). “[Catalogue of birds]”. Proceedings of the Committee of Science and Correspondence of the Zoological Society of London. Printed for the Society by Richard Taylor. pt.1-2 (1830-1832): 114–125.
  • Blanford, W.T. (1867). “[Letters]”. Ibis. 2. 3 (4): 461–464. doi:10.1111/j.1474-919x.1867.tb06444.x.
  • Hume, Allan O. (1889). The nests and eggs of Indian birds. Volume 1 (2nd ed.). London: R.H. Porter. pp. 220–221.
  • Jerdon, TC (1862). Birds of India. Vol 1. George Wyman & Co. p. 378.
  • Blanford, William T. (1869). “Ornithological notes, chiefly on some birds of Central, Western and Southern India”. The Journal of the Asiatic Society of Bengal. Bishop’s College Press. v.38 (1869): 164–191.
  • LeMesurier, R.P. (1874). “[Letters to the Editor]”. Stray Feathers. 2: 335.
घास के मैदान और शानदार बस्टर्ड प्रजातियां

घास के मैदान और शानदार बस्टर्ड प्रजातियां

भारत में मूलरूप से तीन स्थानिक (Endemic) बस्टर्ड प्रजातियां; गोडावण, खड़मोर और बंगाल फ्लोरिकन, पायी जाती हैं तथा मैकक्वीनस बस्टर्ड पश्चिमी भारत में सर्दियों का मेहमान है, परन्तु घास के मैदानों के बदलते स्वरुप के कारण यह सभी संकटग्रस्त है। वहीँ इनके आवास को बंजर भूमि समझ कर उनके संरक्षण के लिए राष्ट्रिय स्तर पर कोई ठोस कदम नहीं उठाये जा रहे है। राजस्थान इनमें से तीन बस्टर्ड प्रजातियों के लिए महत्वपूर्ण स्थान है

आज भी मुझे अगस्त 2006 का वह दिन याद है, जब एक उत्सुक पक्षी विशेषज्ञ मेरे दफ्तर में पहुंचा और बड़े ही उत्साह से उसने मुझे प्रतापगढ़ से 15 किलोमीटर दूर एक छोटे से गाँव करियाबाद में “खड़मोर” (लेसर फ्लोरिकन) के आगमन की खबर दी। प्रतापगढ़, राजस्थान के दक्षिणी भाग में स्थित एक छोटा शहर और जिला मुख्यालय है। भूगर्भिक रूप से यह मालवा पठार का हिस्सा है और इसके अवनत परिदृश्य के कारण काफी दर्शनीय है। क्योंकि मैं उस क्षेत्र में प्रभागीय वन अधिकारी के रूप में नियुक्त हुआ था, इसलिए मुझे विशेष रूप से बरसात के दौरान करियाबाद और रत्नीखेरी क्षेत्रों में लेसर फ्लोरिकन के देखे जाने के बारे में बताया जाता था।

मानसून की शुरुआत के बाद से ही, मैं इस खबर का बेसब्री से इंतजार कर रहा था और तुरंत मैं इस रहस्य्मयी बस्टर्ड को देखने के लिए करियाबाद इलाके की सैर के लिए रवाना हो गया। मैं बड़ी ही उत्सुकता से हरे-भरे घास के मैदान की आशा कर रहा था, जो मेरे किताबी ज्ञान के कारण एक सैद्धांतिक फ्लोरिकन निवास स्थान के रूप में मेरी कल्पना में था; इसके बजाय मुझे चरागाह व्फसलों के खेतों के बीच में स्थित घास के मैदानों के खण्डों में प्रवेश कराया गया। बीट ऑफिसर शामू पहले से ही वहां मौजूद था और उसने मुझे बताया कि उसने अभी-अभी फ्लोरिकन की आवाज सुनी थी। हवा में उड़ते हुए पक्षी की आवाज़ को सुनने के लिए हम चुपचाप खड़े हो गए।

बस कुछ ही मिनटों में शामू चिल्लाया, “वहाँ से आ रहा है।” मुझे तब एहसास हुआ कि यह वही आवाज़ थी जिसे मैंने पहले गलती से एक मेंढक की आवाज समझा था और यह पहली बारी थी जब मैंने लेसर फ्लोरिकन की आवाज़ सुनी। एक मिनट बाद शामू फिर चिल्लाया, “हुकुम, वो रहा।” मैंने उस तरफ अपनी दृष्टि डाली और पूछा, “कहाँ?” “हुकुम, अभी कूदेगा”, शामू ने आत्मविश्वास से उत्तर दिया। तभी, अचानक, उसने बड़ी-बड़ी घासों से ऊपर उठते हुए अपनी छलांग लगाने की कला का प्रदर्शन किया- ये देख मेरा दिल मानो उत्साह से एक बार धड़कना ही भूल गया हो। मैं एक घंटे के लिए उसके छलांग लगाने के व्यवहार को देखकर रोमांचित हो गया और अपने कैमरे के साथ एक जगह पर बैठ गया। एक उछलते-कूदते फ्लोरिकन को देखना, मेरे जीवन के सबसे मंत्रमुग्ध कर देने वाले क्षणों में से एक था जो की मेरे लिए, जंगल में एक बाघ को देखने से भी ज्यादा सम्मोहक था।

छलांग लगाते लेसर फ्लोरिकन (फोटो: जी.एस. भरद्वाज)

भारतीय उपमहाद्वीप के स्थानिक, लेसर फ्लोरिकन (Sypheotides indica), एक लुप्तप्राय प्रजाति है जो मुख्यरूप से मानसून के मौसम के दौरान उत्तरी-पश्चिमी भारत में देखी जाती है, जहां यह मानसून के दौरान प्रजनन करती है। स्थानीय रूप से “खड़मोर” कहलाये जाने वाला, लेसर फ्लोरिकन या “लीख”, भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाने वाले बस्टर्ड (Family Otididae, Order Gruiformes) की छह प्रजातियों में से एक है। यह सभी बस्टर्ड में सबसे छोटा होता है तथा इसका वज़न मुश्किल से 510 से 740 ग्राम होता है। घास के मैदान इसका प्राथमिक प्रजनन स्थान है जहाँ इसे प्रजनन के समय में पर्याप्त ढकाव उपलब्ध होता है। जार्डन और शंकरन अपने लेख में लिखते है की लेसर फ्लोरिकन प्रजनन काल के दौरान, पूर्वी राजस्थान, गुजरात और पश्चिमी मध्य प्रदेश के उन क्षेत्रों में इकट्ठा होते है जहाँ अच्छी वर्षा होती है। किसी विशेष क्षेत्र में इसका आगमन और प्रजनन सफलता पूरी तरह से बारिश की मात्रा और वितरण पर निर्भर करता है, जो कि इसके पूरे प्रजनन क्षेत्र में अनिश्चित है।

नर लेसर फ्लोरिकन की छलांग, इस बस्टर्ड की विशिष्ट विशेषता है। नरों द्वारा लगाए जाने वाली छलांग उनके प्रजनन काल के आगमन का संकेत देती है। नर एक चयनित स्थान पर खड़े होकर, चारों ओर देखता है और 1.5 से 2 मीटर की ऊंचाई तक कूदता है। एक नर लेसर फ्लोरिकन एक दिन में कम से कम 600 बार तक छलांग लगा सकता है। नरों द्वारा यह प्रदर्शन अन्य नरों को उसके क्षेत्र में घुसने से रोकने तथा संभोग के लिए मादाओं को बुलाने में मदद करता है। कूदते समय, यह एक मेंढक जैसी क्रॉकिंग कॉल भी करता है, जो 300 से 500 मीटर की दूरी सुनाई देती है और हवा का एक झोंका इस ध्वनि को एक किलोमीटर से भी अधिक दुरी तक लेजा सकता है।

मैंने इस लुप्तप्राय प्रजाति पर नज़र रखने के लिए हर मानसून में करियाबाद के घास के मैदानों और प्रतापगढ़ के हर अन्य क्षेत्रों की अपनी यात्रा जारी रखी। परन्तु हर गुजरते साल के साथ ये घास के मैदान फसल के खेतों के दबाव से सिकुड़ रहे थे, जिसके कारण फ्लोरिकन की उपस्थिति व् उनका दिखना कम हो रहा था। एक ही स्थान पर आबादी की घटती प्रवृत्ति ने मुझे पश्चिमी भारत में इसकी संपूर्ण वितरण रेंज में एक सर्वेक्षण करने के लिए मजबूर किया, जिसके परिणाम स्वरूप 2010 से 2012 तक अगस्त और सितंबर के महीनों में कुल तीन क्षेत्र सर्वेक्षण कि ये गए। वर्तमान में, पक्षियों और वन्यजीव प्रेमियों के लिए बहुत कम ऐसी जगहे है जहाँ मानसून के दौरान इस पक्षी को देखा जा सकता है, हालांकि कभी-कभी कई अन्य क्षेत्रों से भी फ्लोरिकन के देखे जाने की रिपोर्टें मिलती हैं।

किसी समय पर पूरे देश में वितरित होने वाला लेसर फ्लोरिकन, आज केवल कुछ ही क्षेत्रों जैसे राजस्थान के सोनखलिया, शाहपुरा, करियाबाद; पूर्वी मध्य प्रदेश में सैलाना, सरदारपुरा अभ्यारण्य और पेटलाबाद ग्रासलैंड; रामपुरिया ग्रासलैंड, वेलावदार राष्ट्रिय उद्यान, कच्छ के छोटा रण और गुजरात में भुज के नालिया ग्रासलैंड में देखा जाता है। इन घास के मैदानों में सर्वेक्षणों से पश्चिमी भारत में लेसर फ्लोरिकन की उपस्थिति का भी पता चला है। इसके अलावा, महाराष्ट्र के अकोला क्षेत्र से भी फ्लोरिकन की सूचना मिली है।

राजस्थान के अजमेर जिले के नसीराबाद शहर के पास स्थित सोनखलिया क्षेत्र, लेसर फ्लोरिकन की संख्या में वृद्धि और अच्छे से दिखने के कारण, तेजी से पक्षी और वन्यजीव प्रेमियों के लिए एक पसंदीदा स्थान के रूप में उभर रहा है। लगभग 400 वर्गकिमी के क्षेत्र के साथ, सोनखलिया लगभग 300 प्रवासी फ्लोरिकन के लिए एक आकर्षक स्थान बन गया है तथा वर्ष 2014 में, इस क्षेत्र से लगभग 80 नर फ्लोरिकन की उपस्थिति दर्ज की गई थी। इस क्षेत्र में वर्ष प्रतिवर्ष पर्यटकों की संख्या कई गुना बढ़ती जा रही है – 2011 में 20 बर्डर्स से शुरू होकर, यह संख्या 2014 के मानसून के दौरान लगभग 150 बर्डर्स तक बढ़ गई है। कृषि क्षेत्रों से घिरे हुए ये घास के मैदान, दुनिया में लेसर फ्लोरिकन की सबसे बड़ी आबादी का आवास स्थान है। अपने गैर-संरक्षित क्षेत्र की स्थिति के कारण और घना वन क्षेत्र नहीं होने के कारण, इस कूदते –फाँदते सुन्दर पक्षी को देखने के लिए बर्डर्स का मनपसंद गंतव्य हैं। वन विभाग के राजेंद्र सिंह और गोगा कुम्हार इस क्षेत्र के असली नायक हैं जो इस परिवेश में इस पक्षी की निगरानी और सुरक्षा का कार्य कर रहे हैं।

घास के मैदानों में लेसर फ्लोरिकन (फोटो: जी.एस. भरद्वाज)

हालांकि प्रतापगढ़ का करियाबाद-बोरी इलाका भी स्थानीय रूप से लेसर फ्लोरिकन के दर्शन के लिए जाना जाता था, परन्तु घास के मैदानों के कृषि क्षेत्रों में तेजी से रूपांतरण के परिणाम स्वरूप यह पक्षी स्थानीय रूप से विलुप्त हो गया है। मालवा क्षेत्र के सैलाना, सरदारपुरा, पेटलाबाद और पमपुरिया घास के मैदानों से अभी भी फ्लोरिकन की उपस्थिति की खबरें आती रहती हैं। पिछले कुछ वर्षों में तेजी से भूमि रूपांतरण और बदलते कृषि स्वरुप के बाद, नालिया घास के मैदानों में फ्लोरिकन के दिखने में अचानक से कमी आई है। हालांकि वेलावादर में फ्लोरिकन की आबादी ध्यान देने योग्य है क्योंकि कम से कम 100 फ्लोरिकन की आबादी का समर्थन करने वाला यह लेसर फ्लोरिकन के लिए एकमात्र शेष प्राकृतिक परिवेश है।

पश्चिमी भारत, दो अन्य बस्टर्ड, ग्रेट इंडियन बस्टर्ड (GIB) और मैकक्वीनस बस्टर्ड के लिए भी जाना जाता है। स्थानीय रूप से गोडावन, जिसे ग्रेट इंडियन बस्टर्ड कहा जाता है, राजस्थान का राज्य पक्षी भी है। लगभग 50-150 पक्षियों की विश्वव्यापी घटती आबादी के कारण, यह गंभीर रूप से संकटग्रस्त पक्षी है जो थार, नालिया (गुजरात) और नानज (महाराष्ट्र) के घास के मैदान में जीवित रहने के लिए संघर्ष कर रहा है। आज थार मरुस्थल के कुछ छोटे-छोटे भाग गोडावन का एक मात्र निवास स्थान हैं जो वर्तमान में इसकी सबसे बड़ी प्रजनन आबादी का समर्थन करता हैं। इसके वितरण रेंज में तेजी से गिरावट ने दुनिया भर में वन्यजीव विशेषज्ञों, प्रबंधकों, पक्षी विज्ञानियों और पक्षी प्रेमियों को चिंतित कर दिया है, हालांकि स्वस्थानी संरक्षण रणनीतियों (in-situ conservation strategies) को विभिन्न राज्यों ने अपनाया और संरक्षण वादियों की याचनाओं द्वारा कुछ घास के मैदानों को 1980 के दशक की शुरुआत में संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क में भी शामिल किया गया।

दुर्भाग्य से, ये सभी उपाय गोडावण की आनुवंशिक रूप से वर्धनक्षम (Viable) और जनसांख्यिकी (Demography) रूप से स्थिर आबादी को बनाए रखने में विफल हे। अब बची हुई यह छोटी सी आबादी भी आनुवांशिक, पर्यावरणीय और जनसांख्यिकीय कारकों के कारण विलुप्त होने की कगार पर है। शिकार, घास के मैदानों का रूपांतरण, प्रजनन । जैसलमेर से लगभग 55 किमी दूर, डेजर्ट नेशनल पार्क इस खूबसूरत पक्षी के लिए एक प्राकृतिक आवास है जहाँ सुदाश्री व् सम  क्षेत्र में इसको देखा जा सकता है, इसके आलावा यह कभी-कभी राष्ट्रीय उद्यान के बाहर सल्खान और रामदेवरा के पास भी देखा जा सकता है।

एक शीतकालीन प्रवासी; मैकक्वीनस बस्टर्ड, गोडावण के निवास स्थान में पाया जाता है। यह एक सुंदर और बहुत ही शर्मीला पक्षी है इसीलिए इस पक्षी को देखने के लिए धैर्य और तेज दृष्टि की आवश्यकता होती है। अभी भी पाकिस्तान सहित कई देशों में इस का शिकार किया जाता है, यह व्यापक रूप से कई लोगों द्वारा गेम बर्ड के रूप में शिकार किया जाता था, विशेषरूप से अरब के शेखों ने, इसका 1970 के दशक के अंत तक जैसलमेर में लगातार शिकार किया।

शीतकालीन प्रवासी मैकक्वीनस बस्टर्ड (फोटो: जी.एस. भरद्वाज)

इन तीन बस्टर्ड्स के अलावा एक और बस्टर्ड, बंगाल फ्लोरिकन है जो ज्यादातर शुष्क और अर्ध-घास के मैदानों में रहते हैं तथा भारत के तराई क्षेत्रों में पाए जाते है। उत्तर प्रदेश में लग्गा-बग्गा घास के मैदान पीलीभीत और दुधवा टाइगर रिजर्व, असम में मानस टाइगर रिजर्व और काजीरंगा घास के मैदान, इस पक्षी के आवास स्थान हैं। लेसर फ्लोरिकन की तरह, यह भी अपने शानदार प्रदर्शन के लिए जाना जाता है। परन्तु इसमें एक अंतर है, जहाँ लेसर फ्लोरिकन लंबवत छलांग लगता है वहीँ बंगाल फ्लोरिकन संभोग प्रदर्शन में 3-4 मीटर ऊंची उड़ान भरता है फिर थोड़ा नीचे होते हुए दुबारा ऊपर उठता है। निचे उतरते समय इसकी गर्दन पेट के पास तक घूमी रहती है। इसकी यह उड़ान चिक-चिक-चिक की कॉल और पंखों की तेज आवाज के साथ होती है।

विश्व में बस्टर्ड की कुल 24 प्रजातियां है, तथा जिनमे से तीन प्रजातियां मुख्यरूप से भारतीय ग्रासलैंड में पायी जाती हैं – ग्रेट इंडियन बस्टर्ड, लेसर फ्लोरिकन और बंगाल फ्लोरिकन। 30 से अधिक देशों में पाए जाने वाला “मैकक्वीनस बस्टर्ड”, सर्दियों के दौरान पश्चिमी भारत में आते है। भारत से इन बस्टर्ड का गायब होना दुनिया के नक्शे से इनके विलुप्त होने का संकेत देगा। ग्रासलैंड प्रजातियों के रूप में, बस्टर्ड्स की उपस्थिति घास के मैदानों के संतुलित पारिस्थितिक तंत्र का संकेत देती है, जो दुर्भाग्य से, अक्सर नज़र अंदाज किये जाते है और यहां तक इनकों एक बंजर भूमि भी माना जाता है। इसके विपरीत, ये घास के मैदान न केवल कुछ वन्यजीव प्रजातियों के लिए घर हैं, बल्कि वे स्थानीय समुदायों की अर्थव्यवस्था में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। क्योंकि यह ग्रासलैंड्स पशुधन की चराई के लिए चारा उपलब्ध करवाते हैं। विश्व की कुल पशुधन आबादी का लगभग 15-20 प्रतिशत भाग भारत में रहता है और कोई भी घास के मैदानों पर इनकी निर्भरता का अंदाजा लगा सकता है।

वैज्ञानिक तरीकों से ग्रासलैंड प्रबंधन की कमी, निवास स्थान के लगातार घटने, घास के मैदानों पर वृक्षारोपण गतिविधियाँ, बदलते लैंडयुस पैटर्न, कीटनाशक, आवारा कुत्ते- बिल्लियों द्वारा घोंसलों का नष्ट करना, आक्रामक वनस्पतिक प्रजातियाँ, अंधाधुंध विकास गतिविधियाँ, वन्यजीव संरक्षित क्षेत्र में अपर्याप्त कवरेज और लोगो में ज्ञान की कमी, लेसर फ्लोरिकन जैसी प्रजातियों के लिए बड़े खतरे हैं। संभावित घास के मैदानों में चराई और आक्रामक वनस्पतिक प्रजातियों से निपटने के अलावा, बस्टर्ड्स के प्रजनन स्थानों को कुत्तों, बिल्लियों और कौवे जैसे अन्य शिकारियों से बचाने की सख्त जरूरत है। इसके अलावा, बस्टर्ड प्रजातियों पर शोध और निगरानी के साथ-साथ सार्वजनिक जागरूकता और संवेदीकरण जैसे कार्यक्रम भी शुरू किये जाने चाहिए।

वर्तमान में, ग्रासलैंड प्रबंधन की एक राष्ट्रीय नीति की तत्काल आवश्यकता है जो कि ग्रासलैंड पारिस्थितिकी तंत्र द्वारा प्रदान की गई पारिस्थितिक सेवाओं की सराहना करे। मौजूदा संरक्षित क्षेत्र नेटवर्क में और अधिक बस्टर्ड निवास स्थानों को शामिल करना और स्थानीय समुदायों को इसकी निगरानी व् संरक्षण  कार्यों में साथी बनाना इसके संरक्षण में एक बड़ी सफलता हो सकती है। बस्टर्ड को बचाने के लिए किए गए हर प्रयास से हमारे ग्रासलैंड और उससे जुड़े कई अन्य जींवों को बचाया जा सकता है, क्योंकि यदि बाघ वन पारिस्थितिकी तंत्र की नब्ज है, तो बस्टर्ड घास के मैदान के पारिस्थितिकी तंत्र की नब्ज है।

(मूल अंग्रेजी आलेख का हिंदी अनुवाद मीनू धाकड़ द्वारा)

अनोखी भौगोलिक संरचना: रामगढ़ क्रेटर

अनोखी भौगोलिक संरचना: रामगढ़ क्रेटर

क्या आप जाने है राजस्थान में एक क्रेटर है जो एक विशालकाय उल्कापिंड के पृथ्वी से टकराने से बना है, रामगढ़ क्रेटर के नाम से प्रसिद्ध बाराँ जिले की मंगरोल तहसील से 12 किलोमीटर पूर्व दिशा में रामगढ़ गाँव में स्थित इम्पैक्ट क्रेटर होने के साथ यह एक अद्भुत पुरातत्व महत्व का स्थल भी है।इस वर्ष होने वाले 36वें विश्व भूवैज्ञानिक संगोष्ठी में अर्थ इम्पैक्ट डेटाबेस” (EID) द्वारा इसको विश्व का 191वां इम्पैक्ट क्रेटर होने कि मान्यता दिए जाने कि उम्मीद है।

भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग (GSI) के अनुसार यह क्रेटर विंध्यानचल श्रृंखला क्षेत्र में एक वृत्ताकार गड्डे के समान है जो विंध्यन उपसमूह के भांडेर समूह का एक अंश है। यह अपने चारों ओर लगभग 200 मीटर ऊंची पहाड़ियों से घिरा हुआ पठारी क्षेत्र है जिसकी समुद्र तल से उँचाई 260 मीटर है। इस क्रेटर में चट्टानों व मिट्टी के कटाव से बनी हुई अनेक छोटी नदियां व गड्डे है जो लगभग पूरे वर्ष जल पूरित रहते है। क्रेटर परिक्षेत्र में दो नदियां है। दक्षिण-पश्चिम मे पार्वती नदी तथा दक्षिण–पूर्व मे बारबती नदी है। यह दोनों नदियां दक्षिण से उत्तर की ओर बहती हुई चंबल नदी मे मिलती है।

रामगढ क्रेटर मानचित्र

रामगढ क्रेटर का दृश्य

कैसे हुआ रामगढ़ क्रेटर का निर्माण?

भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग के सदस्य प्रोफेसर विनोद अग्रवाल बताते है कि रामगढ़ क्रेटर का निर्माण कुछ अरब वर्ष पूर्व उस समय हुआ जब लगभग 3 किमी. व्यास का एक विशाल उल्का पिंड यहां गिरा, जिससे यहाँ करीब 3.2 किलोमीटर व्यास का एक विशाल गड्ढा बन गया। इसी प्रकार का क्रेटर भारत मे रामगढ़ के अतिरिक्त महाराष्ट्र के बुलढाना जिले मे लोनार झील के रूप में जिसका व्यास1.8 किलोमीटर है तथा मध्यप्रदेश के शिवपुरी जिले में ढाला के नाम से दृष्टिगत है जिसका व्यास 14 किलोमीटर है।

क्रेटर में उल्का पिंड के साक्ष्य:

प्रो. विनोद अग्रवाल (2018) के अनुसार रामगढ़ क्रेटर के केंद्र मे एक उभरा हुआ क्षेत्र है जो उल्कीय प्रभाव का ज्वलंत सैद्धांतिक भौगोलिक प्रत्यक्ष प्रमाण प्रस्तुत करता है। इसे समझने के लिए भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभागके भू-वैज्ञानिक ओर समन्वयक प्रो. पुष्पेन्द्र सिंह राणावत (2018) ने बताया की जब किसी सतह पर किसी वस्तु का आपतन होता है तब सतह द्वारा समान किन्तु विपरीत दिशा में प्रतिक्रिया संपन्न होती है। इसी प्रकार रामगढ़ संरचना के केंद्र में उभरा हुआ भाग इसी उल्कापिंड के प्रति धरातलीय सतह की प्रतिक्रिया का परिणाम है। इस क्रेटर में काँच युक्त पत्थर पाये जाते है जो उल्का पिंड के प्रहार से उत्पन्न होने वाले अति उच्च-तापमान के कारण रेत केद्रवित होकर शीशे में परिवर्तित होने से निर्मित हुए। इसी के साथ इस भाग मे लोह, निकल व कोबाल्ट की साधारण से अधिक मात्रा भी पाई जाती है, जो इस स्थान को विशिष्ट बनाती है।

रामगढ क्रेटर का बाहरी दृश्य

रामगढ़ क्रेटर की खोज का इतिहास:

सर्वप्रथम भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण विभाग के सदस्य फ़्रेडरिक रिचर्ड मलेट ने वर्ष 1869 में रामगढ़ क्रेटर को देखा। 1882-83 मे भारतीय खोजकर्ता व नक्शाकार राय बहादुर किशन सिंह राणाने भू-वैज्ञानिक दृष्टि से इसका मानचित्र तैयार किया। 1960 मे जिओलोजिकल सोसाइटी ऑफ लंदन ने इसे “ क्रेटर ”की संज्ञा दी। भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण द्वारा वर्तमान मे इस क्रेटर को रामगढ़ संरचना /रामगढ़ मेटेओरिटिक संरचना /रामगढ़ वलय संरचना /रामगढ़ डोम संरचना /रामगढ़ अस्ट्रोब्लेम आदि नामसे संबोधित किया जाता है।

रामगढ़ रिंग संरचना को क्रेटर कि संज्ञा मिलने से पूर्व और इसके खोज के बाद काफी लंबे समय तक विवाद का विषय बना रहा। इसके निर्माण के पीछे कई अपार्थिव (extra-terrestrial) और पार्थिव (intra-terrestrial) बलों के होने के कयास लगाए गए जिनमें किम्बर्लाइट, कार्बोनाइट या डायपिर केइन्ट्रूशन (अधिक गतिशील और विकृत सामग्री भंगुर या नाजुक चट्टानों में बल पूर्वक प्रवेश कर जाती है) और संबंधित अवतलन (subsidence), टेक्टोनिज्म, चीनी मिट्टी से समृद्ध शीस्ट (kaolin-rich shales) का केन्द्रगामी प्रवाह, मैग्माटिज्म और टेक्टोनिज्म का संयोजन, उल्का पिंड का प्रभाव (impact crater), आदि शामिल हैं।

संभवत या क्रॉफर्ड (1972) पहले व्यक्ति थे जिन्होंने को लुवियम के केंद्र में टूटे हुए शंकु जैसी संरचना की उपस्थिति को दर्ज करते हुए रामगढ़ रिंग संरचना के क्रेटर होने का सुझाव दिया। रक्षित (1973) ने इसके उत्पत्ति के लिए कई संभावित सिद्धांतों पर चर्चा की। (i) गहराई पर इन्ट्रूसिव रॉक्स की उपस्थिति, (ii) ज्वालामुखी क्रेटर, (iii) फोल्डिंग / फॉल्टिंग, (iv) सबसिडेंस, (v) गहराई पर डायपरिक इन्ट्रूशन और (vi) उल्कापिंड प्रभाव सिद्धांत। अनुकूल प्रमाणों के अभाव में उन्होंने स्वयं रामगढ़ संरचना की उत्पत्ति के लिए पहले पाँच सिद्धांतों की अवहेलना की; और यह माना कि रामगढ़ संरचना एक उल्कापिंड प्रभाव से बना ‘इम्पैक्ट क्रेटर’ के समान है।

2018 में जीएसआई, इंटक और मोहन लाल सुखाड़िया विश्व विद्यालय कि एक टीम, प्रोफेसर विनोद अग्रवाल और भूगर्भ विज्ञानी पुष्पेन्द्र सिंह राणावत कि अगुवाई में रामगढ़ के इम्पैक्ट क्रेटर होने के साक्ष्य एकत्रित किए हैं। लेकिन फिर भी “द अर्थ इम्पैक्ट डेटाबेस” (EID) से रामगढ़ के इम्पैक्ट क्रेटर होने कि पुष्टि फिलहाल लंबित है जिसको 36वें विश्व भूवैज्ञानिक संगोष्ठी (36th International Geological Congress, 2020) में ईआईडी द्वारा मान्यता दिए जाने कि उम्मीद है। कनाडा के न्यूब्रुंस्विक विश्व-विद्यालय द्वारा अनुरक्षित “द अर्थ इम्पैक्ट डेटाबेस” (EID) का उपयोग दुनिया के क्रेटरों की पुष्टि के लिए आधिकारिक तौर पर किया जाता है।

क्रेटर में स्थित पुरा सम्पदा:

रामगढ़ गाव के बुजुर्गों के अनुसार रामगढ़ क्रेटर की पहाड़ी पर रामगढ़ का प्राचीन किला स्थित है जो वर्तमान में पुरातत्व विभाग के रख रखाओ के अभाव मे यह अपना अस्तित्व लगभग खो चुका है । रामगढ़ किला 10वीं शताब्दी में मालवा के नागवंशी राजा मलय वर्मा ने बनवाया। तथा 13वीं शताब्दी मे इस पर खींचियों, गौड़ वंश का आधिपत्य रहा बाद में इस पर बूंदी के हाड़ाओं का वर्चस्व हुआ। फिर पर गना कोटा के आधिपत्य में चला गया।

रामगढ़ क्रेटर की पहाड़ी पर स्थित एक प्राक्रतिक गुफा मे कृष्णोई माता तथा अन्नपूर्णा देवी का प्राचीन मंदिर है। जिनका निर्माण 16वीं शताब्दी मे कोटा रियासत के झाला जालिम सिंह ने करवाया था। मंदिर तक पहुचने के लिए 750 सिड्डियों है। मंदिर की विशेष बात यह है कि इनमे से कृष्णोई माता को मांस व मदिरा का जबकि अन्नपूर्णा देवी को मिष्ठानों को भोग लगाया जाता है। तथा कार्तिक मास में यहाँ मेले का आयोजन होता है जिसमे हजारों श्रद्धालु आते है।

रामगढ क्रेटर के केंद्र में स्थित प्राचीन मंदिर

क्रेटर के मध्य भाग मे पुष्कर सरोवर, माला की तलाई, बड़ा व नोलखा तालाब स्थित है। जिसका आधिकांश भाग कमल पुष्पो से आच्छादित रहता है। पुष्कर तालाब के किनारे पर भंडदेवरा का प्राचीन शिव मंदिर है, वर्तमान मे इसका अधिकांश भाग क्षतिग्रस्त हो गया है। इस मंदिर के बाहर स्थित शिलापट्ट पर लिखे लेख के अनुसार पूर्व मध्य कालीन वास्तुकला का प्रतीक व नागर शैली में निर्मित यह उत्क्रस्ट व कलात्मक पूर्वा भिमुख पंचायतन मंदिर स्थापत्य व शिल्पकला की अमूल्य धरोवर है यहाँ पर मिले शिला लेखो के अनुसार इस मंदिर का निर्माण 10वीं शताब्दी में मालवा के नागवंशी राजा मलय वर्मा ने अपने शत्रु पर विजय प्राप्त करने के पश्चात करवाया था। एवं कालांतर मे मेड वंशीय क्षत्रिय राजा त्रिश वर्मा ने 1162 ई. मे इसका जीर्णोद्धार करवाया । इस देवालय मे स्थित गर्भग्रह, सभामंडप, अंतराल शिखर व जागती है। गर्भगृह में में प्राचीन शिव लिंग तथा सभामंडप मे आठ विशाल कलात्मक स्तम्भ है। इन स्तम्भों पर यक्ष, किन्नर, कीचक, विधाचर, देवी–देवता, अप्सराओं व मिथुन आकृतियाँ उत्कीर्णित है जिनके कारण इन मंदिरो को “भंड देवरा”कहा गया। इसी प्रकार की विशिष्ट आकृतियाँ मध्यप्रदेश के छत्रपुर जिले में स्थित हिन्दू व जैन मंदिरो मे उपस्थित है, जिन्हे “खजुराहो ” कहा जाता है। इस आधार पर भंड देवरा को“ राजस्थान का मिनी खजुराहो ” कहा जाता है। प्राचीन समय मे यहाँ 108 मंदिरो का समूह हुआ करता था किन्तु वर्तमान मे केवल शिव व पार्वती मंदिर ही शेष बचे हुये है जिनके जीर्णोद्धार का कार्य वर्तमान मे पुरातत्व विभाग के अन्तर्गत किया जा रहा है।

रामगढ क्रेटर से दो छोटी नदियां निकलती है

क्रेटर की पहाड़ी पर एक प्राचीन ब्रम्ह मंदिर है। इस मदिर के समीप ही एकब्रम्ह कुंड है कहा जाता है की पहाड़ी के ऊपर होने पर भी इस कुंड का जल कभी नहीं सुकता तथा इस कुंड मे अनेक श्रद्धालु श्रद्धा की डुबकी लगाने आते है।

क्रेटर के मध्य भाग मे स्थित तालाब का आधिकांश भाग कमल पुष्पो से आच्छादित रहता है

रामगढ़ क्रेटर की वन व वन्यजीव सम्पदा:

रामगढ़ क्रेटर,वन विभाग बाराँ की किशनगंज रेंज के रामगढ़ ब्लॉक के अन्तर्गत 14.405 वर्ग किलोमीटर में विस्तृत संरक्षित क्षेत्र है। यह वन खंड उष्ण-कटिबंधीय शुष्क मिश्रित पर्णपाती वनों (tropical dry mixed deciduous) की श्रेणी में आते हैं। पलाश (Butea monosperma) और बेर (Zizyphus jujuba) इस क्षेत्र प्रमुख वनस्पति प्रजातियाँ हैं जो इस संरचना को घनी बनाती हैं। इस क्षेत्र में खैर (Acacia catechu), महुआ (Madhuca indica), आंवला (Emblica officinalis), गुरजन (Lannea coromandelica),धावड़ा (Anogeissus latifolia),सालर (Boswellia serrata),खिरनी (Manilkara hexandra), करंज (Pongamia pinnata),बहेड़ा (Terminalia bellirica), अर्जुन (Terminalia arjuna), आम (Mangifera indica), बरगद (Ficus religiosa) व बांस (Dendrocalamus strictus) भी अच्छी तादाद में पाए जाते है। इनके अतिरिक्त अनेक औषधीय महत्व के पादप भी यहाँ पाये जाते है।

रामगढ़ क्रेटर में दशकों पूर्व अनेक बड़े शिकारी जीवों जैसे–शेर, बाघ, बघेरा,भेड़िया आदि का अस्तित्व भी था। वर्तमान में अत्यधिक मानवीय हस्तक्षेपों के कारण ये सभी वन्यजीव यहाँ की खाद्य श्रृंखला से लुप्त हो गए। किन्तु आज भी यह स्थान विभिन्न वन्य प्राणियों की आश्रय स्थली है। जिनमें लकड़बग्घा, सियार, जंगली बिल्ली, स्माल इंडियन सीवेट, लोमड़ी, वाइल्ड बोर, चिंकारा और चीतल, नेवला, सेही व खरहा,बंदर इत्यादि मुख्य वनचर है। क्रेटर के समीप उपस्थित पार्वती नदी मगरमच्छों एवं अन्य जलीय जीवों का उपयुक्त प्राकृतवास है।

क्रेटर से लगभग 50-60 किलोमीटर पूर्व दिशा में मध्यप्रदेश की सीमा में कुनो वन्य जीव अभयारण्य है जहाँ के वन्यजीव भी क्रेटर मे विचरण करते हुये देखे जाते है।

पुष्कर सरोवर

क्रेटर के मध्य में स्थित पुष्कर सरोवर तालाब वर्षभर जलपूरित रहता है। इसमे प्रतिवर्ष अनेक प्रवासी पक्षियो को विचरण करते देखा जा सकता है।इस तालाब में पक्षियों की 200 से अधिक प्रजातियाँ पाई जाती है। शीतऋतु मे करीब 80 प्रजाति के पक्षी भोजन, आवास व प्रजनन के लिए प्रवास पर पहुंचते हैं नॉर्थर्न पिनटेल, नॉर्थर्न सावलर, कॉमन पोचार्ड, रेड क्रेस्टेड पोचार्ड, फेरुजिनस पोचार्ड, कॉमन टील,गडवाल, लिटिल ग्रीब, रूडी शेलडक, कॉमन कूट, पेंटेड स्टार्क, जलमुर्गी, ब्लैक टेल्ड गोडविट, रिवर टर्न आदि प्रजातियां देखी जाती हैं। विभिन्न सरीसृप जेसे कोबरा,अजगर,रेट स्नेक,चेकर कील बेक,बोआ आदि यहाँ पाये जाते है।

राजस्थान मे चमगादड़ विविधता व उनपर आये आधुनिक खतरे

राजस्थान मे चमगादड़ विविधता व उनपर आये आधुनिक खतरे

चमगादड़ द्वारा COVID-19 को फैलाने के डर से, राजस्थान के दो स्थानों पर अज्ञानता के कारण लोगों द्वारा भारतीय चमगादड़ों को मारते हुए देखा गया है। हाल ही में चूरू जिले के सादुलपुर में 45 चमगादड़ को इस वजह से मार दिया गया, झुंझुनू जिले के लोहरगर्ल क्षेत्र में 150 से अधिक चमगादड़ों को मारा गया।

रोजाना स्थानीय टीवी मे प्रसारित समाचारों के द्वारा चमगादड़ों को कोरोना का मुख्य कारण बताये जाने के कारण भारत में लोगो में यह अवधारणा बन रही है की यह एक अत्यंत घातक प्राणी है, और इसी के चलते  चमगादड़ो को अपने आसपास से समाप्त किया जा रहा है I यह पूर्णतया आधारहीन, गैर-वैज्ञानिक एवं भ्रामक है बल्कि यह हमारे पर्यावरण के लिए अत्यंत खतरनाक स्थिति है I

वर्तमान में चमगादड़ो का प्रजनन समय चल रहा है, मादा से प्रजनन के पश्चात नर समूह के रूप मे अलग हो जाते है जिससे चमगादड़ो का वितरण और अधिक दिखाई देने लगता है। यह विशाल समहू लोगो द्वारा COVID-19 के चमगादड़ से जुड़े समाचारो के मध्य भयावह स्थिति पैदा करते हैI इस समय कोरोना के डर से इन नर समूह से स्थानीय लोग डर गए, जिस से 45 नर चमगादड़ (Greater Mouse-tailed Bat) मारे गए। इसी के समान झुंझुनू जिले के लोहार्गल क्षेत्र में भी 150 से अधिक चमगादड़ों (Greater Mouse-tailed Bat) को मारा दिया गया।

अज्ञानता के कारण चमगादड़ों को मार दिया गया (फोटो: डॉ दाऊ लाल बोहरा)

भारत में पाए जाने वाले चमगादड़ फल और कीट खाने वाले हैं जो कृषि और पर्यावरण संतुलन के लिए अच्छे हैं। लोगों को अपने अंधविश्वास को छोड़ देना चाहिए और चमगादड़ को मारना बंद कर देना चाहिए क्योंकि वे भारत में मानव जाति के लिए SARS CoV-2 के वेक्टर नहीं हैं। यदि उनके चल रहे प्रजनन के मौसम में गड़बड़ी होती है, तो राजस्थान के उत्तर-पश्चिम में फलों के चमगादड़ विलुप्त होने का सामना करेंगे, क्योंकि ज्यादातर नर चमगादड़ों को लोगों द्वारा कथित रूप से मारा गया है। चीन में SARS-CoV-2 को जोड़ते हुए राइनोफिडे परिवार के हॉर्सशू चमगादड़ द्वारा ले जाया गया था। यहां तक कि दक्षिण एशियाई चमगादड़ों की दो प्रजातियों में कोरोना वाइरस की खोज पर ICMR की हालिया रिपोर्ट में कोई ज्ञात स्वास्थ्य खतरा नहीं है। अध्ययन में पाए गए वायरस SARS-CoV-2 से अलग हैं और COVID-19 का कारण नहीं बन सकते हैं। लोगों ने चमगादड़ों पर ICMR की अन्य रिपोर्ट का गलत मतलब निकाला है।

रिवर्स ट्रांसमिशन: IUCN व BCI के अनुसार, संक्रमित मानव से घरेलू जानवरों और यहां तक कि चमगादड़ तक रिवर्स ट्रांसमिशन हो सकता है। महाराष्ट्र और गुजरात की तरह COVID-19 की गंभीर सामुदायिक प्रसार स्थितियों में, रिवर्स ट्रांसमिशन की संभावना हो सकती है अमरीका, नीदरलैंड और स्वीडन मे सीवेज जाँच मे कोरोना वायरस पाए गए है न्यूवेजीन, नीदरलैंड के KWR Research Institute के अनुसार सीवेज से संक्रमण फलने की मनुष्य मे कम है परन्तु मवेशियो व चमगादड़ों मे यह संक्रमित जा सकता है। यदि यह घातक वायरस सीवेज, तालाबों, जल निकाय और किसी अन्य अपशिष्ट पदार्थ में मिल जाता है। यह देश के हॉटस्पॉट शहरों में तालाबंदी के बाद ज्यादा विनाशकारी हो सकता है।

COVID-19 महामारी के दौरान चमगादड़ को बचाने के लिए, पहले कर्नाटक सरकार और अब राजस्थान सरकार के अतिरिक्त प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं मुख्य वन्यजीव प्रतिपालक अरिन्दम तोमर ने दिशा-निर्देश जारी किए हैं और चेतावनी दी है कि चमगादड़ किसी भी तरह से चोट या मारे नहीं जाने चाहिए क्योंकि चमगादड़ भारतीय वन्यजीव अधिनियम की अनुसूची-वी 1972के तहत आते हैं। आज तक, उन्हें मारने के लिए सजा का कोई प्रावधान नहीं था, लेकिन अब चमगादड़ नुकसान पहुंचाने वाले चमगादड़ राजस्थान में अपराधियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करेंगे।

दुनिया भर में चमगादड़ों की 1411 से अधिक प्रजातियां पारिस्थितिक भूमिका निभा रही हैं जो प्राकृतिक पारिस्थितिकी प्रणालियों और मानव अर्थव्यवस्थाओं के स्वास्थ्य के लिए महत्वपूर्ण हैं। चमगादड़ हमारे मूल वन्यजीवों का एक महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, जो भारत में लगभग एक तिहाई स्तनपायी प्रजातियों को नियमित रखते हैं और इस तरह के वेटलैंड्स, वुडलैंड्स, साथ ही शहरी क्षेत्रों में निवास की एक विस्तृत श्रृंखला पर कब्जा करते हैं। वे हमें पर्यावरण की स्थिति के बारे में बहुत कुछ बता सकते हैं, क्योंकि वे सामान्य निशाचर कीटों के शीर्ष शिकारी हैं। चमगादड़ वास्तव में कीट नियंत्रक होते हैं जो हर रात हजारों कीड़े खाते हैं। भारत के चमगादड़ आपको नहीं काटेंगे या आपका खून नहीं चूसेंगे – लेकिन वे मच्छरों के खून को साफ़ करने में मदद करेंगे। चमगादड़ तिलचट्टे, मेढ़क, मक्खियों और मुख्य रूप से मच्छरों को खाते हैं. एक चमगादड़, एक घंटे में 1,200 से 1,400 मछरों को खाता है। इन मच्छरों की वजह से मलेरिया, टायफायड, डेंगू, चिकनगुनिया जैसी बीमारियां फैलती हैं। चमगादड परागण तथा छोटे कीट-पतंगों का शिकार करते हैं, जिन कीट-पतंगों की वजह से मनुष्य और फसलों को तरह-तरफ़ का रोग होता है। चमगादड उनको खाकर फसलों के लिए जैविक कीटनाशक का काम करते हैं। वर्तमान में कोरोना वायरस महामारी की वजह से चमगादड़ बताई जा रही हैं। ऐसा माना जा रहा है कि यह वायरस चमगादड़ से ही मनुष्य के शरीर में आया है। जिससे चमगादड़ की एक नकारात्मक छवि बनी है। ऐसी सम्भावना व्यक्त की जा रही है कि इस महामारी के बाद की चमगादड़ को लेकर नकरात्मकता बढ़ सकती है, जिससे इस जीव के अस्तित्व पर ख़तरा भी उत्पन्न हो सकता है। पर वर्तमान वैज्ञानिक युग में यह सोचना जरूरी होगा जो मनुष्य के उदभव से मानव उपयोगी रहा हो वो केसे इस महामारी फेला सकता है। वैसे 60 प्रकार के वायरस चमगादड़ में पाए जाते हैं परन्तु ये किसी मनुष्य में नहीं फैलते। यदि वर्तमान में प्रकाशित कोरोना संबंधी अनुसंधान पत्रो को देखे तो  कहीं पर कोरोना के लिए चमगादड़ ज़िमेदार नहीं है। COVID-19 चमगादड़ से नहीं फैलता।

चमगादड़ों में पाए जाने वाले वायरस मनुष्यों में नहीं फैलते परन्तु आज इन्ही को सबसे बड़ा खतरा समझा जा रहा है (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

भारत में वे चमगादड़ जो कीटभक्षी हैं – वे केवल कीड़े खाते हैं। कीड़े-मकोड़े खाने वाले चमगादड़ों को फसलों से दूर रखने के साथ-साथ चमगादड़ के काटने के स्थानों के लिए बहुत अच्छा है। कपास की खेती में मुक्त पूंछ वाले चमगादड़ को एक महत्वपूर्ण “कीट प्रबंधन सेवा” के रूप में मान्यता दी गई है। क्योंकि चमगादड़ कुछ क्षेत्रों में बहुत सारे कीड़े खाते हैं, वे कीटनाशक स्प्रे की आवश्यकता को भी कम कर सकते हैं। पक्षियों की तरह, कुछ चमगादड़ पेड़ों और अन्य पौधों के बीजों को फैलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। कुछ उष्णकटिबंधीय फल चमगादड़ अपने अंदर बीज ले जाते हैं क्योंकि वे फल को पचा लेते हैं, फिर मूल पेड़ से दूर बीज को निकालते हैं। ये बीज अपने स्वयं के तैयार उर्वरक में जमीन पर गिरते हैं, जो उन्हें अंकुरित होने और बढ़ने में मदद करते हैं। क्योंकि चमगादड़ परागण और बीज को फैलाने में मदद करते हैं, वे वन निकासी के बाद पुनर्वृष्टि में मदद करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं। 1411 से अधिक चमगादड़ प्रजातियों में से कई कीटों की विशाल मात्रा का उपभोग करते हैं, जिनमें से कुछ सबसे हानिकारक कृषि कीट हैं। बैट ड्रॉपिंग (जिसे गानो कहा जाता है) एक समृद्ध प्राकृतिक उर्वरक के रूप में मूल्यवान हैं। गुआनो दुनिया भर में एक प्रमुख प्राकृतिक संसाधन है, और, जब चमगादड़ को ध्यान में रखते हुए जिम्मेदारी से उपयोग किया जाता है, तो यह भूस्वामियों और स्थानीय समुदायों के लिए महत्वपूर्ण आर्थिक लाभ प्रदान कर सकता है। चमगादड़ों को अक्सर “कीस्टोन प्रजाति” माना जाता है जो रेगिस्तानी पारिस्थितिक तंत्र के लिए आवश्यक हैं। चमगादड़ के परागण और बीज-प्रसार सेवाओं के बिना, स्थानीय पारिस्थितिकी तंत्र धीरे-धीरे ढह सकते हैं क्योंकि खाद्य श्रृंखला के आधार के पास पौधे वन्यजीव प्रजातियों के लिए भोजन और आवरण प्रदान करने में विफल होते हैं। चमगादड़ जंगल में बीजों को फैलाने में चमगादड़ इतने प्रभावी होते हैं कि उन्हें “उष्णकटिबंधीय के किसान” कहा जाता है। जंगलों को पुनर्जीवित करना एक जटिल प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसमें पक्षियों, प्राइमेट्स और अन्य जानवरों के साथ-साथ चमगादड़ों द्वारा बीज-प्रकीर्णन की आवश्यकता होती है। लेकिन पक्षी बड़े, खुले स्थानों को पार करने से सावधान रहते हैं, जहां उड़ने वाले शिकारी हमला कर सकते हैं, इसलिए वे आम तौर पर सीधे अपने पर्चों के नीचे बीज गिराते हैं। दूसरी ओर, रात-रात के खाने वाले फलों के चमगादड़, अक्सर हर रात बड़ी दूरी तय करते हैं, और वे काफी हद तक पार करने के लिए तैयार होते हैं और आमतौर पर उड़ान में शौच करते हैं, साफ किए गए क्षेत्रों में पक्षियों की तुलना में कहीं अधिक बीज बिखेरते हैं। रात्रिचर स्वभाव होने के कारण ये रात में फलने और फूलने वाले लगभग सवा पांच सौ प्रजातियों के पेड़ों के परागकण और बीज़ को अलग-अलग प्राकृतिक वास में फैलाते हैं, जिससे जंगल को प्राकृतिक रूप से स्थापित होने में मदद मिलती है। इसलिए इनको ‘प्राकृतिक जंगल को स्थापित’ करने वाले के साथ-साथ, ‘जंगल का रक्षक’ भी कहा जाता है। चमगादड परागण के साथ ही विभिन्न प्रकार के कीट-पतंगों का शिकार करते हैं, जिन कीट-पतंगों की वजह से मनुष्य और फसलों को तरह-तरफ़ का रोग होता है। चमगादड उनको खाकर फसलों के लिए जैविक कीटनाशक का काम करते हैं। एक अध्ययन से यह भी पता चला है कि एक मादा चमगादड़, गर्भावस्था के दौरान अपने शरीर के तीन गुना ज़्यादा वजन तक कीटों का भक्षण कर सकती है। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि एक चमगादड़, अपने जीवन काल (लगभग 30 वर्ष) में कितने कीट खाता होगा? इन सबके अलावा चमगादड़ की सुनने की क्षमता बहुत ज़्यादा होती है, जिसकी वजह से ये प्राकृतिक आपदा जैसे तूफान, भूकंप आदि के आने पर अपने व्यवहार में परिवर्तन करते हैं, जिससे मनुष्य को भी इन ख़तरों की कई बार समय से पहले जानकारी हो जाती है।

Greater Mouse-tailed Bat (फोटो: डॉ धर्मेंद्र खांडल)

राजस्थान चमगादड़ की विविधता के लिए एक महत्वपूर्ण स्थान रखता है।राजस्थान का रेगिस्तानी क्षेत्र 1980 के दशक तक चमगादड़ों की दो प्रजातियों का घर था, और इंदिरा गांधी नहर के निर्माण के साथ, श्री गंगानगर, हनुमानगढ़, बीकानेर, जोधपुर, जैसलमेर, चूरू और कुछ हिस्सों चमगादड़ों की प्रजाति तेजी फेलती गयी। राजस्थान में 25 प्रकार की प्रजातियां पाई जाती है। जिसमें 3 फल चमगादड़ व 22 कीट खाने वाली प्रजाति पाई जाती है। तीन प्रकार की फल चमगादड़, जिसमें टैरोपस ग्रागेटस, रुस्टस प्रजाति, सिनोपटेरस प्रजाति पाई जाती है। यह सामन्यत बड़े पेड़ो पर लटकी हुई अवस्था में पाई जाती है। यह प्रजाति पीपल बरगद पर लटकी हुई देखी जा सकती है। जो पानी के स्त्रोत के पास रहना पसंद करती है। पुरे राजस्थान मे Lesser Mouse-tailed Bat सर्वाधिक संख्या मे पाई जाती है जो समाज के साथ मनुष्यों के घरो मे, पुरानी हवलियो, मंदिरों मे रहना पसंद करती है।  रेगिस्तानी क्षेत्र से 15 प्रजातियों, गैर-रेगिस्तानी क्षेत्र से 17 प्रजातियों और अरावली पहाड़ियों से 16 प्रजातियों पाई जाती है। 7 प्रजातिया Indian Flying Fox, Naked-rumped Tomb Bat, Greater Mouse-tailed Bat, Greater False Vampire Bat, Egyptian Free-tailed bat, Greater Asiatic Yellow House Bat and Least Pipistrelle, राजस्थान के सभी भोगोलिक क्षेत्र मे पाई जाती है सात प्रजातिया Greater Short-nosed Fruit Bat, Egyptian Tomb Bat, Lesser Mouse-tailed Bat, Blyth’s Horseshoe Bat, Fulvous Leaf-nosed Bat, Lesser Asiatic Yellow House Bat and Dormer’s Pipistrelle राजस्थान के रेगिस्तानी व पर्वती दोनों क्षेत्र मे पाई जाती है दो प्रजातिया Leschenault’s Rousette व Long-winged Tomb Bat केवल असुष्क और अरावली पर्वत माला मे ही पाई जाती है I अतःआवश्यकता है इन्हे बचाने की न की इन्हे समाप्त करने की।