राजस्थान में पीले पुष्प वाले पलाश

राजस्थान में पीले पुष्प वाले पलाश

फूलों से लदे पलाश के पेड़, यह आभास देते हैं मानो वन में अग्नि दहक रही है I इनके लाल केसरी रंगों के फूलों से हम सब वाकिफ हैं, परन्तु क्या आप जानते है पीले फूलों वाले पलाश के बारे में ?

पलाश (Butea monosperma) राजस्थान की बहुत महत्वपूर्ण प्रजातियों में से एक है जो मुख्यतः दक्षिणी अरावली एवं दक्षिणी-पूर्वी अरावली के आसपास दिखाई देती है। यह प्रजाति 5 उष्ण कटिबंधीय शुष्क पर्णपाती वनों का महत्वपूर्ण अंश है तथा भारत में E5 – पलाश वन बनाती है। E5 – पलाश वन मुख्यरूप से चित्तौड़गढ़, अजमेर, पाली, जालोर, टोंक, भीलवाड़ा, बूंदी, झालावाड़, धौलपुर, जयपुर, उदयपुर, बांसवाड़ा, डूंगरपुर, अलवर और राजसमंद जिलों तक सीमित है।

पीले पलाश (Butea monosperma var. lutea) का वृक्ष (फोटो: डॉ. सतीश शर्मा)

राजस्थान में पलाश की तीन प्रजातियां पायी जाती हैं तथा उनकी विविधताएँ नीचे दी गई तालिका में प्रस्तुत की गई हैं:

क्र. सं.वैज्ञानिक नामप्रकृति स्थानीय नाममुख्य वितरण क्षेत्रफूलों का रंग
1Butea monospermaमध्यम आकार का वृक्षपलाश, छीला, छोला, खांखरा, ढाकमुख्य रूप से अरावली और अरावली के पूर्व मेंलाल
2Butea monosperma var. luteaमध्यम आकार का वृक्षपीला खांखरा, ढोल खाखराविवरण इस लेख में दिया गया हैपीला
3Butea superba काष्ठबेलपलाश बेल, छोला की बेलकेवल अजमेर से दर्ज (संभवतः वर्तमान में राज्य के किसी भी हिस्से में मौजूद  नहीं)लाल

लाल पलाश (Butea monosperma) का वृक्ष (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

लाल पलाश के पुष्प (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

Butea monosperma var. lutea राजस्थान में पलाश की दुर्लभ किस्म है जो केवल गिनती योग्य संख्या में मौजूद है। राज्य में इस किस्म के कुछ ज्ञात रिकॉर्ड निम्न हैं:

क्र. सं.तहसील/जिलास्थानवृक्षों की संख्याभूमि की स्थिति
1गिरवा (उदयपुर)पाई गाँव झाड़ोल रोड1राजस्व भूमि
2गिरवा (उदयपुर)पीपलवास गाँव के पास, (सड़क के पूर्व के फसल क्षेत्र में)2राजस्व भूमि
3झाड़ोल (उदयपुर)पारगीया गाँव के पास (पलियाखेड़ा-मादरी रोड पर)1राजस्व भूमि
4झाड़ोल (उदयपुर)मोहम्मद फलासिया गाँव2राजस्व भूमि
5कोटड़ा (उदयपुर)फुलवारी वन्यजीव अभयारण्य के पथरापडी नाका के पास1राजस्व भूमि
6कोटड़ा (उदयपुर)बोरडी गांव के पास फुलवारी वन्यजीव अभयारण्य के वन ब्लॉक में4आरक्षित वन
7कोटड़ा (उदयपुर)पथरापडी नाका के पूर्व की ओर से आधा किलोमीटर दूर सड़क के पास एक नाले में श्री ननिया के खेत में (फुलवारी वन्यजीव अभयारण्य का बाहरी इलाका)2राजस्व भूमि
8झाड़ोल (उदयपुर)डोलीगढ़ फला, सेलाना1राजस्व भूमि
9झाड़ोल (उदयपुर)गोत्रिया फला, सेलाना1राजस्व भूमि
10झाड़ोल (उदयपुर)चामुंडा माता मंदिर के पास, सेलाना1राजस्व भूमि
11झाड़ोल (उदयपुर)खोड़ा दर्रा, पलियाखेड़ा1आरक्षित वन
12प्रतापगढ़ (चित्तौड़गढ़)जोलर2झार वन ब्लॉक
13प्रतापगढ़ (चित्तौड़गढ़)धरनी2वन ब्लॉक
14प्रतापगढ़ (चित्तौड़गढ़)चिरवा2वन ब्लॉक
15प्रतापगढ़ (चित्तौड़गढ़)ग्यासपुर1मल्हाड वन खंड
16आबू रोडगुजरात-राजस्थान की सीमा, आबू रोड के पास1वन भूमि
17कोटड़ा (उदयपुर)चक कड़ुवा महुड़ा (फुलवारी वन्यजीव अभयारण्य)1देवली वन  ब्लॉक
18कोटड़ा (उदयपुर)बदली (फुलवारी वन्यजीव अभयारण्य)1उमरिया वन ब्लॉक
19कोटड़ा (उदयपुर)सामोली (समोली नाका के उत्तर में)1राजस्व भूमि
20बांसवाड़ा जिलाखांडू1राजस्व भूमि
21डूंगरपुर जिलारेलड़ा1राजस्व भूमि
22डूंगरपुर जिलामहुडी1राजस्व भूमि
23डूंगरपुर जिलापुरवाड़ा1राजस्व भूमि
24डूंगरपुर जिलाआंतरी रोड सरकन खोपसा गांव, शंकर घाटी1सड़क किनारे
25कोटड़ा (उदयपुर)अर्जुनपुरा (श्री हुरता का कृषि क्षेत्र)2राजस्व भूमि
26गिरवा (उदयपुर)गहलोत-का-वास (उबेश्वर रोड)6राजस्व भूमि
27उदयपुर जिलाटीडी -नैनबरा के बीच1राजस्व भूमि
28अलवर जिलासरिस्का टाइगर रिजर्व1वन भूमि

चूंकि पीला पलाश राज्य में दुर्लभ है, इसलिए इसे संरक्षित किया जाना चाहिए। राज्य के कई इलाकों में स्थानीय लोगों द्वारा इसकी छाल पूजा और पारंपरिक चिकित्सा के लिए प्रयोग ली जाती है जो पेड़ों के लिए हानिकारक है। वन विभाग को इसकी रोपाई कर वन क्षेत्रों में इसका रोपण तथा स्थानीय लोगों के बीच इनका वितरण करना चाहिए।

 

साँड़ा: मरुस्थलीय भोज्य श्रृंखला का आधार

साँड़ा: मरुस्थलीय भोज्य श्रृंखला का आधार

साँड़ा, पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान में पायी जाने वाली छिपकली, जो मरुस्थलीय खाद्य श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है परन्तु आज अंधविश्वास और अवैध शिकार के चलते इसकी आबादी घोर संकट का सामना कर रही हैं।

साँड़े का तेल, भारत के विभन्न हिस्सो मे यौनशक्ति वर्धक एवं शारीरिक दर्द के उपचार के लिए अत्यधिक प्रचलित औषधि हैं परन्तु इस तेल का तथाकथित बिमारियों मे कारगर होना एक अंधविश्वास मात्र हैं एवं इस तेल के रासायनिक गुण किसी भी अन्य जीव की चरबी के तेल के समान ही पाये गये हैं। आज इस अंधविश्वास के कारण इस जीव का बहुतायत में अवैध शिकार किया जाता हैं, जिसके परिणाम स्वरूप सांडो की आबादी तेजी से घटती जा रही हैं।

साँड़े के नाम से जाने जाने वाला ये सरीसृप वास्तव में भारतीय उपमहाद्वीप के शुष्क प्रदेशों में पाए जाने वाली एक छिपकली हैं। यह मरुस्थलीय छिपकली Agamidae वर्ग की एक सदस्य है तथा अपने मजबूत एवं बड़े पिछले पैरों के लिए जानी जाती हैं। साँड़ा का अँग्रेजी नाम, Spiny-tailed lizard होता है जो इसे इसकी पूंछ पर पाये जाने वाले काँटेदार स्केल्स के अनेकों छल्लो (Rings) की शृंखला के कारण मिला हैं।

विश्वभर में साँड़े की 20 प्रजातियाँ पायी जाती हैं जो की उत्तरी अफ्रीका से लेकर मध्य-पूर्व के देशों एवं उत्तरी-पश्चिमी भारत के शुष्क तथा अर्धशुष्क प्रदेशों के घास के मैदानों में वितरित हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में पायी जाने वाली इस प्रजाति का वैज्ञानिक नाम “Saara hardiwickii” हैं, जो की मुख्यतः अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा भारत में उत्तरी-पश्चिमी राजस्थान, हरियाणा, एवं गुजरात के कच्छ जिले के शुष्क घास के मैदानों में पायी जाती है। कुछ शोधपत्रों के अनुसार साँड़े की कुछ छोटी आबादियाँ उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों, उत्तरी कर्नाटक, तथा पूर्वी राजस्थान के अलवर एवं सवाई माधोपुर जिलों में भी पायी जाती हैं, जो की इनके शुष्क आवास के अलावा अन्य आवासों में वितरण को दर्शाती हैं। वहीँ दूसरी ओर वन्यजीव विशेषज्ञो के अनुसार साँड़े का मरुस्थलीय आवास से बाहर वितरण मानवीय गतिविधियों, मुख्यत: अवैध शिकार का परिणाम हो सकता हैं क्योंकि वन्यजीव व्यापार में अनेकों जीवो को उनकी स्थानीय सीमाओं से बाहर ले जाया जाता हैं।

साँड़े की भारतीय प्रजाती में नर (40 से 49 सेमी) सामन्यत: आकार में मादा (34 से 40 सेमी) से बड़े होते हैं तथा अपनी लंबी पूंछ के कारण आसानी से पहचाने जा सकते हें। नर की पूंछ उसके शरीर की लंबाई के बराबर या अधिक एवं छोर से नुकीली होती हें जबकि मादा की पूंछ शरीर की लंबाई से छोटी तथा सिरे से भोंटी होती हैं।

भारतीय साँड़ा छिपकली (Indian Spiny tailed lizard “Saara hardiwickii”)

पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान एवं कच्छ के नमक के मैदानों में पायी जाने वाली साँड़े की आबादी में, त्वचा के रंग में एक अंतर देखने को मिलता हैं। अक्सर पश्चिमी राजस्थान की आबादी में पूंछ के दोनों तरफ के स्केल्स में तथा पिछले पैरों की जांघों के दोनों ओर हल्का चमकीला नीला रंग देखा जाता है, परन्तु कच्छ के नमक मैदानों की आबादी में इस तरह का कोई भी रंग नहीं पाया जाता है। दोनों राज्यों में पायी जाने वाली आबादी में रंग के इस अंतर का कारण जानने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता हैं। परन्तु रंगों में यह अंतर आहार में भिन्नता तथा दोनों आवास में पायी जाने वाली वनस्पतियों में अंतर होने के कारण भी हो सकता है।

भारतीय साँड़े को भारत मे पाये जाने वाली एकमात्र शाकाहारी छिपकली माना जाता है। इनके मल के नमूनो की जांच के अनुसार वयस्क का आहार मुख्यत वनस्पति, घास, एवं पत्तियों तक सीमित रहता हैं लेकिन शिशु साँड़ा प्रायतः वनस्पति के साथ विभ्न्न कीटो मुख्यत: भृंग, चींटिया, दीमक, एवं टिड्डे का सेवन करते भी जाने जाते हैं।बारिश मे एकत्रित किए गए कुछ वयस्क साँड़ो के मल में भी कीटो की बहुतायत मिलना इनकी आहार के प्रति अवसरवादिता को दर्शाता हैं।

साँड़ा, मुख्यरूप से शाकाहारी भोजन पर ही निर्भर रहती है

मरुस्थल में भीषण गर्मी के प्रभाव से बचने के लिए साँड़े भी अन्य मरुस्थलीय जीवो के समान भूमिगत माँद में रहते हैं। साँड़े की माँद का प्रवेश द्वार बढ़ते चंद्रमा के आकार समान होता है तथा इसी कारण से यह अन्य सस्थलीय जीवों की माँद से अलग दिखाई पड़ती हैं। ये मांदे अक्सर टेड़ी-मेढी, सर्पाकर तथा 2 से 3 मीटर गहरी होती हैं। माँद का आंतरिक तापमान बाह्य तापमान की तुलना में बहुत ही प्रभावी रूप से कम होता हैं, जिससे साँड़े को रेगिस्तान की भीषण गर्मी में सुरक्षा मिलती हैं। ये छिपकली दिनचर होती हैं तथा माँद में आराम करते समय अपनी काँटेदार पूंछ से प्रवेशद्वार को बंद रखती हैं। रात के समय में अन्य जानवरों विशेषकर परभक्षी जीवो को रोकने के लिए प्रवेश द्वार को अपनी पूंछ द्वारा मिट्टी से सील भी कर देती हैं।

माँद बनाना, रेगिस्तान की कठोर जलवायु में जीवित रहने के लिए एक आवश्यक कौशल है तथा इसी कारण पैदा होने के कुछ ही समय बाद ही साँड़े के शिशु मादा के साथ भोजन की तलाश के साथ-साथ माँद की खुदाई सीखना भी शुरू कर देते हैं। अन्य सरीसृपों के समान साँड़े भी अत्यात्धिक सर्दी के समय दीर्घकाल के लिए शीतनिंद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान ये अपनी शरीर की रस प्रक्रिया (metabolism) दर को धीमी कर शरीर में संचित वसा (stored fats) पर ही जीवित रहते हैं। हालांकि कच्छ के घास के मैदानों में शिशु साँड़ों को अक्सर दिसम्बर एवं जनवरी माह में भी सक्रिय देखा गया हैं। इसका मुख्य कारण कच्छ में सर्दियों के समय तापमान की गिरावट में अनियमितता हो सकता हैं।

साँड़ों का प्रजनन काल फरवरी माह से शुरू होता है और उनके छोटे शिशुओं को जून व् जुलाई के महीने तक घास के मैदानों में इधर-उधर दौड़ते हुए देखा जा सकता है। वर्ष के सबसे गर्म समय के दौरान भी ये छिपकलियां प्रकृति में सख्ती से दिनचर बनी रहती हैं तथा इनकी गतिविधियां सूर्योदय के साथ शुरू होती हैं एवं सूर्य क्षितिज से नीचे पहुंचते ही समाप्त हो जाती हैं। गर्मी के दिनों में तेज धूप खिलने पर यह भरी दोपहर तक सक्रिय रहते हैं। यदि किसी दिन बादल छाए रहे तो इनकी शाम तक भी रहती है।

साँड़ा मरुस्थलीय खाद्य श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है तथा यह खाद्य पिरमिड के सबसे निचले स्तर पर आता हैं। शरीर में ग्लाइकोजन और वसा की अधिक मात्रा, इसे रेगिस्तान में अनेकों परभक्षी जीवो के लिए प्रमुख भोजन बनाते हैं। साँड़े को दोनों, भूमि तथा हवा से परभक्षी खतरों का सामना करना पड़ता है। मरुस्थल मे पाये जाने वाले परभक्षी जीवो की विविधता एवं बहुतायता जिनमे स्तनधारी, सरीसृप, स्थानीय एवं प्रवासी शिकारी पक्षी शामिल हैं, सांडो की बड़ी आबादी का ही परिणाम हैं। हैरियर और फाल्कन जैसे कई अन्य शिकारी पक्षियो को अक्सर इन छिपकलियों का शिकार करते हुए देखा जा सकता है। केवल बड़े शिकारी पक्षी ही नहीं परंतु किंगफिशर जैसे छोटे पक्षी भी नवजात साँड़ों का शिकार करने का अवसर नहीं गवाते।

पक्षियों के अलावा अनेकों सरीसृप भी रेगिस्तान में इन उच्च ऊर्जावान खाद्य स्रोत साँड़ों को प्राप्त करने का एक अवसर भी नही गवातें। थार रेगिस्तान में विषहीन सांप की एक आम प्रजाति जिसे आम बोली में दो मूहीया धुंभी (Red sand-boa) कहते हैं, अक्सर साँड़े को माँद से बाहर खदेड़कर कहते हुए देखी जा सकती हैं। दो मूही द्वारा माँद में हमला करने पर साँड़े के पास अपने पंजो से जमीन पर मजबूत पकड़ बनाने एवं माँद की संकीर्न्ता के अलावा अन्य कोई सुरक्षा उपाय नहीं होता हैं। हालांकि दोमूही के लिए भी ये कार्य अत्यधिक ऊर्जा व समय की खपत करने वाला होता है क्योंकि साँड़े को माँद से बाहर निकालना बिना हाथ पैर वाले जीव के लिए आसान काम नहीं होता। लेकिन ये प्रयास व्यर्थ नहीं हैं क्योंकि एक सफल शिकार की कीमत ऊर्जा युक्त भोजन होती है। प्रायतः संध्या काल में सक्रिय होने वाली भारतीय मरु-लोमड़ी भी अपनी वितरण सीमा में अक्सर साँड़े को माँद से खोदकर शिकार करती देखी जा सकती हैं।

खाद्य पिरामिड के विभिन्न ऊर्जा स्तरो से परभक्षी जीवो की ऐसी विविधता के कारण साँड़े ने भी जीवित रहने के लिए सुरक्षा के कई तरीके विकसित किये है। हालांकि इस छिपकली के पास किसी भी प्रकार की आक्रामक सुरक्षा प्रणाली से नहीं हैं परंतु इसका छलावरण, फुर्ती एवं सतर्कता इसका प्रमुख सुरक्षा उपाय हैं। इसकी त्वचा का रंग रेत एवं सुखी घास के समान होता हैं, जो इसके आसपास के पर्यावास में अच्छी से घुलकर एक छलावरण का कार्य करता हैं एवं इसे शिकारियों की नजर से बचाता हैं।

यदि छलावरण शिकारियों के खिलाफ काम नहीं करता, तो यह शिकारियों से बचने के लिए अपनी गति पर निर्भर रहती हैं। साँड़ा छिपकली के पीछे के टांगे मजबूत तथा उंगलिया लम्बी होती हैं जो इसे किसी भी शिकारी  से बचने के लिए उच्च गति प्राप्त करने में मदद करती है। गति के साथ-साथ, यह छिपकली भोजन की तलाश के दौरान बेहद सतर्क रहती है। विशेष रूप से, जब शिशुओं के साथ हो, वयस्क छिपकली आगे के पैरो पर सर को ऊपर उठाकर, धनुषाकार पूंछ के साथ आसपास की हलचल पे नजर रखती हैं। साँड़ा अक्सर अपने बिल के निकट ही खाना ढूंढ़ती हैं और आसपास में एक मामूली हलचल मात्र से ही खतरा भांप कर निकट की माँद मे भाग जाती हैं। साँड़े अक्सर समूहो में रहते है तथा अपनी माँद एक दूसरे से निश्चित दूरी पर ही बनाते हैं। प्रजनन काल में अक्सर नरो को मादाओ से मिलन के लिए मुक़ाबला करते देखा जा सकता हैं। नर अपने इलाके को लेकर सक्त क्षेत्रीयत्ता प्रदर्शित करते हैं तथा अन्य नर के प्रवेश पर आक्रामक व्यवहार दिखाते हैं।

अवैध शिकार एवं खतरे

आज मनुष्यों से, साँड़ा छिपकली को बचाने के लिए न तो छलावरण, न ही गति और न ही सतर्कता पर्याप्त प्रतीत होती हैं। साँड़े की वितरण सीमाओं में इनके अंधाधुन शिकार की घटनाएँ अक्सर सामने आती रहती हैं। माँद में रहने वाली इस छिपकली को पकड़ने के लिए शिकारीयो को भी अनेकों तरीके इस्तेमाल करते देखा गया हैं।सबसे सामन्या तरीके में साँड़े की माँद को गरम पानी से भर के या माँद खोदकर उसे बाहर आने के लिए मजबूर किया जाता हैं। एक अन्य तरीके में शिकारी, साँड़े की माँद ढूंढने के बाद उसके प्रवेश द्वार पर एक छोटी रस्सी का फंदा लगा देते हैं तथा उसके दूसरे छोर को छोटी लकड़ी के सहारे जमीन में गाड़ देते हैं। जब साँड़ा अपनी माँद से बाहर निकलता है तो उस समय ये फंदा उसके सर से निकलते हुए पैरों तक आ जाता हैं तथा जैसे ही साँड़ा वापस माँद में जाने की कोशिश करता हैं वैसे ही फंदा उसके शरीर पे कस जाता हैं, परिणाम स्वरूप साँड़ा वापस माँद में पूरी तरह नहीं जा पता हैं। तभी फिर साँड़े को पकड़ के उंसकी रीड की हड्डी तोड़ दी जाती हैं ताकि वो भाग न सके। तत्पश्चात उसके शरीर से मांस एवं पूंछ के वसा से तेल निकाला जाता हैं।

साँड़े को भारतीय संविधान के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत अनुसूची 2 में रखा गया हैं, जो इसके शिकार पर पूर्णत: प्रतिबंद लगता हैं। हालांकि, भारतीय साँड़े का आईयूसीएन (IUCN) की रेड डाटा लिस्ट के लिए मूल्यांकन नहीं किया गया है, लेकिन यह जंगली वनस्पतियों और जीवों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES) के परिशिष्ट द्वितीय में शामिल हैं। TRAFFIC की एक रिपोर्ट के अनुसार अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारतीय साँड़े का हिस्सा 1997 से 2001 के बीच सांडो की सभी प्रजातियों के कुल व्यापार का केवल दो प्रतिशत ही पाया गया, लेकिन इस प्रजाति को क्षेत्रीय पैमाने पर शिकार के गंभीर खतरों का सामना करना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारतीय साँड़े का छोटा हिस्सा इसके कम शिकार का पर्यायवाची नहीं हैं, अपितु इसकी अधिक मात्र में स्थानीय खपत एवं व्यापार स्थानीय बाजार की स्थिति को दर्शाता हैं।

हाल ही में बेंगलुरु के कोरमंगला क्षेत्र से पकड़े गए कुछ शिकारियों के अनुसार साँड़े के मांस एवं रक्त की स्थानीय स्तर पर यौनशक्ति वर्धक के रूप में अत्यधिक मांग हैं। पकड़े गए गिरोह का सम्बन्ध राजस्थान के जैसलमर जिले से पाया गया, जहां पर साँड़े अभी भी बुहतायत में पाये जाते हैं। समय समय पर चर्चा में आने वाले इस तरह के गिरोह का नेटवर्क कितना गहरा पसरा हुआ हैं कोई नहीं जानता। आम जन में जागरूकता की कमी एवं अंधविश्वास के कारण सांडो को अक्सर कई स्थानीय बाजार में खुले बिकते भी देखा जाता हैं। प्रशासन की सख्ती के साथ साथ आम जनता में जागरूकता सांडो एक सुरक्षित भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। अन्यथा भारतीय चीते के समान ये अनोखा प्राणी भी जल्द ही किताबों व डोक्य्मेंटेरी में समा के रहा जाएगा।

सवाल यह है कि क्या भारतीय साँड़ा अपनी गति और सतर्कता के साथ आज की दुनिया में विलुप्ति की कगार से वापस आ सकता है जहां प्राकृतिक आवास शहरी विकास की कीमत चुका रहे हैं और जैवविविधता संरक्षण के नियमों की अनदेखी की जा रही है।

विकास के साथ प्रकृति संरक्षण: बीकानेर राज्य

विकास के साथ प्रकृति संरक्षण: बीकानेर राज्य

ये कहानी है राजस्थान के मरुस्थल क्षेत्र में स्थित एक जिले – बीकानेर की जो कभी एक स्वतंत्र राज्य था, जिसके विकासोन्मुखी शासक ने वर्षो पहले पर्यावरण संरक्षण के प्रति जिम्मेदारी की एक अनूठी मिसाल पेश की …

बीकानेर के महाराजा श्री गंगा सिंह जी को आधुनिक युग के “भागीरथ” के रूप में भी जाना जाता है। सन 1890 के उत्तरार्ध में जब महाराजा ने अपने राज्य का कार्यभार संभाला, तब बीकानेर रेलवे की कुल लंबाई केवल 87 मील ही थी। परन्तु 1936 में उनके प्रयासों से यह लम्बाई बढ़ा कर 568 मील कर दी गई, जो की बड़ौदा को छोड़कर किसी भी अन्य भारतीय राज्य से बड़ी थी। साथ ही यह किसी भी भारतीय राज्य की तुलना में सबसे अधिक आर्थिक रूप से निपुण और कुशलता से चलने वाली प्रणाली थी। उस समय जब बीकानेर रेलवे तेजी से विकसित हो रही थी तब बागसेऊ के ठाकुर सर सादुल सिंह जी रेल मंत्री थे।

    महाराजा श्री गंगा सिंह जी

शुरुआत में बीकानेर और जोधपुर रेलवे एक संयुक्त कार्य प्रणाली हुआ करती थी, समय के साथ बीकानेर रेलवे मैत्रीपूर्ण तरीके से अलग हो गया। इसके पश्चात बीकानेर रेलवे ने शहर के पास एक लोकोमोटिव और रेल मरम्मत कार्यशाला भी खोल ली, जिससे बीकानेर रेलवे की विकास के प्रति दूरदर्शिता दिखाई देती है।

वहीँ दूसरी ओर जब बीकानेर को जोधपुर रेलवे के साथ जोड़ने के लिए रेलवे लाइन बिछाई जा रही थी, तब देशनोक को भी एक स्टेशन के रूप में शामिल करने का निर्णय लिया गया, ताकि यात्री रेल सेवा का लाभ उठा कर करणी माता मंदिर के दर्शन कर सके। परन्तु इस विकास की एक कीमत भी थी और वो थी शुष्क रेगिस्तान में वर्षों से विकसित किये गए “ओरण” (Sacred groves) के हज़ारों पेड़। क्यूंकि ट्रैन की पटरियों को बिछाने से पहले मंदिर के “ओरण” से लगभग 8,000 पेड़ों को काटने की आवश्यकता थी, अतः कार्य को शुरू करने से पूर्व, एक पूजा की गई तथा करनी माता से पेड़ काटने की अनुमति भी ली गई थी।

देशनोक “ओरण” से गुजरता हुआ रेलमार्ग

मेरी माता श्रीमती देव कुमारी जी इस बात की प्रत्यक्ष साक्षी है और वह आज भी यह बताती है की जब देशनोक में ओरन से 8,000 पेड़ काटे गए थे तब मुआवजे के रूप में 100 रुपये प्रति पेड़ दिए गए और इन 8000 पेड़ों को दूसरे क्षेत्र में लगाने के लिए बराबर जमीन भी दी गई। यह घटना आज से लगभग 80 वर्ष पुरानी है परन्तु आज के समय में भी संरक्षण की एक मिसाल हैI

जबकि उस समय में बीकानेर राज्य बड़े पैमाने पर अकाल से उभर रहा था, ऐसे विकट समय में भी पर्यावरण के संरक्षण को पूर्ण महत्व दिया गया था।

सन्दर्भ : के एम, पणिक्कर 1937,  महामहिम बीकानेर के महाराजा का चित्रण पुस्तक

सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य – राजस्थान के विशिष्ट वन्यजीवों का पवित्र उपवन

सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य – राजस्थान के विशिष्ट वन्यजीवों का पवित्र उपवन

कांठल प्रदेश में सागवान वनों से आच्छादित, तीन विभिन्न भूमि संरचनाओं (अरावली, विंध्यन और मालवा) के संगम पर भव्य हरी-भरी घाटियों, नदियों और विशिष्ट वन्यजीवों को संरक्षित करता सीतामाता शुष्क राजस्थान का एक अन्वेषित अभयारण्य है…

वागड़, मेवाड और मालवा की प्राकृतिक सुंदरता और जीवन शैली से आच्छादित कांठलप्रदेश आज प्रतापगढ़ के नाम से जाना जाता है। अरावली और विंध्यन पर्वतमालाओं के मध्य मालवा के पठार पर सागवान वनों की उत्तर पश्चिमी सीमा बनाता यह जैव विविधताओं से समृद्ध एक विशिष्ट स्थान है। राजस्थान सरकार ने यहाँ 422.95 वर्ग किलोमीटर के वन क्षेत्र कि जैव विविधता एवं भू संरचना के महत्व को ध्यान में रखते हुए 2 जनवरी 1979 को सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया। इस अभयारण्य में रियासत कालीन “भेनवा शिकारागह” शामिल है, यहाँ प्रतापगढ़ के महाराज शिकार के लिए आया करते थे। इसी तरह अभयारण्य का आरामपुरा-कुंठारिया इलाका धरियावद के जागीरदारों के लिए और रानिगढ़-धार वनक्षेत्र, बांसी के जागीरदारों के लिए शिकारगाह था। यह क्षेत्र उन दिनों वन्यजीवों से समृद्ध था और बाघ, सांभर और चीतल के लिए प्रसिद्ध था, लेकिन बाद में इनकी संख्या में भारी कमी आई और बाघ विलुप्त हो गए लेकिन आज भी यह अभयारण्य असाधारण विविधता और आवासों के प्रतिच्छेदन के लिए जाना जाता है, जिसमें सागवान के वन, आर्द्र भूमि, बारहमासी जल धाराएं, सौम्य अविरल पहाड़, प्राकृतिक गहरे घाटियां और सागवान के मिश्रित वन शामिल हैं।

सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य मानचित्र (फोटो: श्री प्रवीण कुमार)

सीतामाता कहलाने का कारण

लोगों का मानना है कि रामायण काल के दौरान जब राम ने सीता को वनवास दिया तो देवी सीता ने अपने वनवास के दिनों को इस जंगल में स्थित ऋषि वाल्मीकि के आश्रम में व्यतीत किया। इस वनवास के दौरान माता सीता ने लव और कुश को जन्म दिया। आज भी वाल्मीकि आश्रम के बाहर विशाल बरगद के अवशेष साक्ष्य के रूप में देखे जा सकते हैं, जो कभी 12 बीघा के क्षेत्र फैला हुआ था। राज-पुरोहित बताते हैं कि इसी स्थान पर लव और कुश ने अश्वमेध के घोड़ों को पकड़ा था और राम को युद्ध के लिए ललकारा था। ये अवधारणा है कि वह पेड़ जिस पर हनुमान जी को बांधा गया था, आज भी यहां पर मौजूद हैं। यहां पहाड़ी पर स्थित सीता मंदिर उस प्राचीन मान्यता का द्योतक है जिस समय माता सीता धरती में समाई तब यह पहाड़ दो हिस्सों में फट गया। लोग इस स्थान को युगों से पवित्र मानते आ रहे हैं और यहाँ मंदिर परिसर (सीता बाड़ी) में प्रतिवर्ष ‘ज्येष्ठ माह की अमावस्या’ को मेला आयोजित होता है। यहां पर स्थित वाल्मीकि आश्रम में आज भी लोग लव-कुश पालने को झूला झुलाते हुए देखे जा सकते हैं। सीता बाड़ी दुनिया का एकमात्र मंदिर है जिसमें हिंदू देवी सीता माता की एकल प्रतिमा है। इतने सारे पौराणिक स्थानों के होने के कारण इस इलाके का नाम सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य रखा गया है।

सीतामाता के जंगल में स्थित एक शैल आरेख (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

अभयारण्य के वन

सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य के वन को पांच प्रमुख वन प्रकारों, सघन शुष्क पर्णपाती वन (dense dry deciduous), छितराए हुए शुष्क पर्णपाती वन (sparse dry deciduous forest), नम पर्णपाती वन (moist deciduous forest), बांस के मिश्रित वन (Bamboo Mixed Forest) और घास के मैदान (grasslands) में वर्गीकृत किया गया है। तटवर्ती वनस्पतियों के साथ बारहमासी नदियों ने अभयारण्य में कई सूक्ष्म और समष्टि पर्यावास बनाए हैं। इस अभयारण्य की मुख्य विशेषता सागवान (Tectona grandis) और बांस (Dendrocalamus strictus) के वनों के बेहतरीन हिस्से हैं। सागवान वनों की नायाब संपदा से धनी इस अभयारण्य में ऐसे स्थान भी है जहां सूरज की किरण आज तक जमीन पर नहीं पड़ी।

सागवान और बांस के अलावा यहाँ आम (Mangifera indica), महुआ (Madhuca indica), सफेद धोंक (Anogeissus latifolia) और चिरौंजी (Buchanania lanzan) के वृक्ष यहाँ घने वन बनाते हैं। इस वन की विशेषता यह है इसको देवता का निवास स्थान माना जाता है और इसकी पवित्रता को गाँव के लोगों द्वारा संरक्षित किया जाता है।

राजस्थान कि जैव विविधता के विशेषज्ञ डॉ सतीश शर्मा बताते है कि,दक्षिण भारत मूल कि कई वनस्पतियाँ सीतामाता अभयारण्य में पाई जाती हैं। राजस्थान में बीज धारी केलों कि दो वन्य प्रजातियों में सेएकजंगली केला (Musa rosacea) यहाँ पाया जाता है। यहाँ मरुआदोना (Carvia callosal) भी अच्छी संख्या में पाया जाता है जो कि मूलतः दक्षिण भारत के नीलगिरी पहाड़ियों पर पाया जाता है, राजस्थान में यह माउंटआबू और फुलवारी कि नाल अभयारण्य में ही अभी तक देखा गया है। यहाँ जंगली काली मिर्च (peperomia pellucida) भी अच्छी संख्या में पाई जाती है जिसकी राजस्थान में अन्यत्र उपस्थिति केवल झुंझुनू जिले के लोहार्गल धाम पर ज्ञात है। डॉ शर्मा के अनुसार लीया (Leea macrophylla) नामक एक कंदीये पौधा, जो उपेक्षाकृत बहुत कम ही देखने को मिलता है, सीतामाता के जंगलों में नमी एवं गहरी मिट्टी वाली घाटियों में वर्ष में आसानी से जगह-जगह देखा जा सकता है। इसको यहाँ सामान्य भाषा में हस्तिकर्ण (हाथी के कानों जैसा) नाम से जाना जाता है। अपने नाम को चरितार्थ करती इसकी बड़ी पत्तियों का फैलाव 45 सेमीx60 सेमी तक पहुच जाता है।

सीतामाता औषधीय पौधों के लिए भी जाना जाता है। मुख्य औषधीय पौधों में चिरौंजी (Buchanania lanzan), अर्जुन (Terminalia arjuna), बहेड़ा (Terminalia bellirica), जामुन (Syzygium cumini), ज्योतिष्मति (Celastrus paniculate), इन्द्रजौ/दूधी (Wrightia tinctorial), मूसली (Chlorophytum tuberosum), कड़ाया (Sterculia urens), और झारवाद (Lagascea mollis) यहाँ पाए जाते हैं। राजस्थान सरकार ने चिरौंजी के पेड़ों को बचाने के लिए अभयारण्य को मेडीसिनल प्लांट्स कान्सर्वैशन एरिया (MPCA) घोषित किया हुआ है।

अभयारण्य के अन्य पेड़ों में (Anogeissus pendulla), खैर (Acacia catechu), सालर (Boswellia serrata), असान (Terminalia tomentosa), तेंदू (Diospyros melanoxylon), गुर्जन (Lanneacoro mandelica), गूलर (Ficus glomerata), बरगद (Ficus benghalensis), कदम (Mitragyna parvifolia), बिल (Aegle marmelos), आंवला (Emblica officinalis), लसोड़ा (Cordia dichotoma), बीजपत्ता (Pterocarpus marsupium), खिरनी (Wrightia tinctoria), इमली (Tamarindus indica), बैर (Zizyphus spp.), आदि शामिल हैं।

अभयारण्य में उपरारोही (epiphytes) भी अच्छी संख्या में पाए जाते हैं जिनमें कई सारे फर्नस और ऑरकिड्स शामिल हैं। यहाँ सिलेजिनेला (Selaginella) कि 3 प्रजातियाँ पाई जाती है,आद्रता के कारण कई ब्रायोफाइट्स भी यहाँ पाए जाते हैं।

अभयारण्य के वन्यजीव

सीतामाता वन्यजीवों के दृष्टिकोण से एक महत्त्वपूर्ण अभयारण्यों में से एक है, यहाँ स्तनधारियों की लगभग 50 प्रजातियाँ, पक्षियों की 325 से अधिक प्रजातियाँ, सरीसृपों (reptiles) की 40 प्रजातियाँ, उभयचरों (amphibians) की 9 प्रजातियाँ, और मछलियों की 30 प्रजातियाँ को सूचीबद्ध किया गया है। यहाँ खाद्य श्रृंखला में तेंदुआ सबसे ऊपर है, अन्य जीवों में यहाँ रैटल, लोमड़ी, पंगोलीन आदि मौजूद हैं।

यह अभयारण्य उड़न गिलहरी (Petaurista philippensis) और चौसिंघा (Tetracerus quadricornis) के लिए जाना जाता है। उड़न गिलहरियों को स्थानीय भाषा में “आशोवा” नाम से जाना जाता है जिसको आरामपुरा के जंगल में सूर्यास्त के आसपास महुआ के एक पेड़ से दूसरे पर जाते हुए देखा जा सकता है। दिन के समय यह पेड़ों के खोखले हिस्सों के अंदर अपने स्थायी घरों में आराम करता है। इनको देखने का सबसे अच्छा समय फरवरी और मार्च के बीच का होता है जब अधिकांश पेड़ों के पत्ते झड़ चुके होते हैं जिससे इनका शाखाओं में छिपना आसान नहीं होता।

पेड़ के कोटर से बाहर झांकती हुई भारतीय विशालकाय उड़न गिलहरी (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)
महुआ के पेड़ पर भारतीय विशालकाय उड़न गिलहरी (फोटो: श्री संग्राम सिंह कटियार)

चौसिंघा, जिसे स्थानीय भाषा में “भेडल” भी कहा जाता है, सीतामाता के पंचगुड़ा, अद्यघाटा, अंबारेठी, और पाल वन खंडों में देखने को मिलता है। इन वन खंडों में बांस के घने समूह अच्छी संख्या में हैं जो चौसिंगा के पक्षधर हैं। चौसिंगा खतरे में होने पर बांस की मोटी झाड़ियों के पीछे छिप सकता है।

अभयारण्य में उड़न गिलहरी के अलावा और दो प्रकार कि गिलहरियाँ पाई जाती हैं, इंडियन पाल्म स्क्वरल / तीन-धारीदार पाल्म गिलहरी (Funambulus palmarum) और पाँच-धारीदार गिलहरी। इंडियन पाल्म स्क्वरल अभयारण्य के घने जंगल में पाई जाती है।

सरीसृपों में मगर, वृक्षारोही मेंढक (tree frog), पैनटेड फ्राग (painted frog), बिल खोदने वाले मेंढक (Burrowing frog), वृक्षारोही सर्प (tree snake) और ग्रीन कीलबैक का मिलना उल्लेखनीय है।

गिरी हुई पत्तियों व् नम चट्टानों के नीचे पाए जाने वाला एक मेढक- Sphaerotheca breviceps (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल )

जंगल आउलेट, क्रेस्टेड हॉक ईगल, हरियल, गागरोनी तोता, स्टॉर्क-बिल किंगफिशर, पिट्टा, ब्लैक हेडेड ओरियोल, इंडियन पैराडाइज फ्लाईकैचर, ब्लैक लोरड टिट,पर्पल सनबर्ड, मोनार्क, सारस हंस,अल्ट्रा-मरीन वर्डाइटर फ्लाईकैचर आदि जैसे पक्षी सीतामाता के जंगलों में देखे जा सकते हैं। लेसर फ्लोरिकंस अभयारण्य के पूर्वी इलाके में मानसून के दौरान देखने लायक हैं। यहाँ तीन प्रकार के फेयसेन्ट पाए जाते हैं, ग्रे जंगल फाउल, अरावली रेड स्पर फाउल,पैनटेड स्पर फाउल। जाखम बांध के पास गिद्धा मगरा नाम कि पहाड़ी पर लॉंग बिल्ड वल्चर के घोंसले पाए जाते हैं।

सीतामाता के हरेभरे जंगल में मिलने वाला एक जंगली मुर्गा (Grey  Jungle  Fowl ) (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

सदावाही नदियों और झरनों का अभयारण्य

अभयारण्य कि तीन प्रमुख नदियां हैं कर्ममोई, जाखम और सीतामाता। कर्ममोई (कर्म मोचनी) नदी का उद्गम सीता बाड़ी से होता है जो कि अभयारण्य का कोर क्षेत्र है। कर्ममोई नदी धारियावाद में जाखम नदी से मिलती है। जाखम नदी छोटी सादड़ी के जखामिया गाँव की पहाड़ियों के दक्षिण-पश्चिम में निकलती है। जाखम सीतामाता अभयारण्य कि जीवनरेखा है। अभयारण्य के अंदर जाखम, लव और कुश नाम के नालों में विभाजित होकर अपना पानी वितरित करता है और अभयारण्य से गुजरने के बाद फिर से मिलकर जाखम नदी में परिवर्तित हो जाता है। यह नदी अभयारण्य के अंदर तेरह मोड़ बनाती है। पूरे वर्ष इन नालों के प्रवाह से अभयारण्य के मैदानी क्षेत्रों में जंगल हरे-भरे रहते हैं। इस नदी पर जाखम परियोजना के अंतर्गत बांध निर्माण किया गया जो कि एक बड़े वन क्षेत्र के जलमग्न होने का कारण बना। जलमग्न क्षेत्र में शामिल उधरी माता के आसपास घने जंगल मीणाओं के लिए पवित्र उपवन थे। भेनवाएक अन्य स्थान था, जो अपने वनों के लिए जाना जाता था, हालाँकि जब ये बाँध का निर्माण हुआ तो ये जंगल जाखम बांध के पानी में डूब गए।

जाखम बांध के बाद 12 किलोमीटर आगे नदी पर नांगलिया बांध बनाया गया है जहाँ से नहर प्रणाली की उत्पत्ति होती है। नांगलिया बांध अभयारण्य कि परिधि पर बना हुआ अप्रवासी पक्षियों, धूप सेकते मगर और कछुओ को देखने के लिए उत्तम जगह है। सीतामाता अभयारण्य में टांकिया भूदो, सुखली तथा नालेश्वर नामक नदियां भी बहती है। नदियों के अलावा यहाँ जगह जगह कई झरने देखने को मिलते हैं।

अभयारण्य के अन्य आकर्षण

आरामपुरा अतिथि गृह – बंसी और धरियावद कस्बों के मध्य में स्थित वन विभाग द्वारा संचालित यह स्थान अभयारण्य के प्रवेश द्वारों में से एक है, यह उड़न गिलहरी को देखने के लिए राजस्थान के सबसे अच्छे स्थानों में से एक है। यह विशाल महुआ, सागवान और विभिन्न प्रकार के बड़े वृक्षों से ढाका हुआ क्षेत्र है जहां उड़न गिलहरी का एक सुनिश्चित दृश्य शाम 7 बजे से सुबह 5:30 बजे के दौरान हो सकता है।

कुन्थरिया हिल साइड–यह एक पहाड़ी क्षेत्र का नाम जहां कर्मोचिनी नदी ऊंचाई से गिरते हुए एक झरने का एहसास देती है। अभयारण्य में विभिन्न रैप्टर और पक्षियों को देखने के लिए बहुत अच्छे स्थानों में से एक है।

भौगोलिक स्थिति

सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य समुद्र तल से औसतन 280 से 600 मीटर कि ऊँचाई पर स्थित है। इस क्षेत्र में औसत वार्षिक वर्षा 756 मिमी होती है। सर्दियों के दौरान तापमान 6 से 14 डिग्री सेल्सियस और गर्मियों में 32 से 45 डिग्री के बीच होती है। सीतामाता वन्यजीव अभयारण्य राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश के प्रमुख शहरों से सड़क मार्ग से जुड़ा हुआ है। यह अभयारण्य उदयपुर-प्रतापगढ़ राज्य राजमार्ग पर उदयपुर और चित्तौड़गढ़ से क्रमशः 100 और 60 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन चित्तौड़गढ़ है, जबकि निकटतम हवाई अड्डा 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित महाराणा प्रताप (डबोक) हवाई अड्डा उदयपुर है। इन सभी स्थानों से अभयारण्य तक सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।

मातासीता से जुड़ी आस्था, उड़न गिलहरी और चौसिंघा जैसे विशिष्ट वन्य जीवों के पर्यावास होने के कारण सीतामाता अभयारण्य को राजस्थान के विशिष्ट वन्यजीवों का पवित्र उपवन कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी I

खर्चिया गेंहू: पाली- मारवाड़ की खारी मिट्टी में उगने वाले लाल गेंहू

खर्चिया गेंहू: पाली- मारवाड़ की खारी मिट्टी में उगने वाले लाल गेंहू

खर्चिया, पाली जिले की खारी मिट्टी में उगने वाला लाल गेंहू जिसने राजस्थान के एक छोटे से गाँव “खारची” को पुरे विश्व में प्रसिद्धि दिलवाई।

राजस्थान के पाली जिले में किसानों के साथ काम करने के दौरान मैंने गेहूं की एक स्थानीय प्रजाति देखी, जिसे पूरे जिले में खर्चिया गेहूं के नाम से जाना जाता है। परन्तु यह जानना बेहद दिलचस्प है कि इस किस्म को यह नाम कैसे मिला। दरअसल इस गेहूं की उत्पत्ति खारची नामक गाँव से हुई है और यहाँ की मिट्टी और पानी में नमक की मात्रा अधिक होने के कारण इस गाँव का नाम खारची पड़ा है। स्थानीय भाषा में खार्च का मतलब नमक होता है। खर्चिया गेहूं को पुरे विश्व में अत्यधिक नमक की मात्रा में उगने वाले गेहूं जीनोटाइप के रूप में जाना जाता है। मिट्टी में नमक की ज्यादा मात्रा के कारण फसलों में रस प्रक्रिया (metabolism) और खनिज का अपवाह (uptake of mineral) प्रभावित होता है। परन्तु, खर्चिया गेंहू की ऐसी किस्म है जो नमक के प्रभावों का अधिक कुशलता से सामना करती है । इसी कारण से ये स्थानीय गेंहू प्रजाति को व्यापक रूप से उच्च उपज वाली नमक प्रतिरोधी किस्म खर्चिया 65, KRL 1-4, KRL 39 और KRL 19 के उत्पादन के लिए उपयोग किया जाता है। भविष्य के फसल सुधार कार्यक्रम के लिए इसके महत्त्व को ध्यान में रखते हुए, इसे गेहूं अनुसंधान निदेशालय, करनाल के पंजीकरण संख्या INGR 99020 द्वारा NBPGR, नई दिल्ली में पंजीकृत किया गया है। खर्चिया गेहूं को पीढ़ियों से खारची गाँव में उगाया जा रहा है। गेहूँ की अन्य हाइब्रिड किस्मों की तुलना में खर्चिया गेहूँ के लिए बहुत कम पानी की आवश्यकता होती है और ऐसी जगहों पर जहाँ पानी उपलब्ध नहीं होता है, यह बारिश के मौसम में उगाया जाता है। इस किस्म की एक अन्य विशेषता यह है कि पौधे की लम्बाई भी अधिक होती है जिससे किसानो को अनाज के साथ-साथ पशुओं को खिलाने के लिए चारा भी मिल जाता है। जानवरो को भी अन्य गेहूं के भूसे की तुलना में खर्चिया गेहूँ का चारा अधिक पसंद आता हैं।

इस स्थानीय प्रजाति के महत्त्व को समझते हुए, हमने पीपीवी और एफआर प्राधिकरण, नई दिल्ली द्वारा दिए जाने वाले Plant Genome Saviour Community (PGSC) अवार्ड के लिए खार्ची गांव समुदाय के लिए आवेदन किया। प्रत्येक वर्ष यह पुरस्कार किसानो, विशेषरूप से आदिवासी और ग्रामीण समुदायों के लोगो को कृषि जैव विविधता के संरक्षण व् सुधार के लिए प्रदान किया जाता है। पीपीवी और एफआर प्राधिकरण दवारा सभी प्रकार की जांच करने के बाद खारची गाँव के किसानो को यह प्रतिष्ठित पुरस्कार मिला, जिसमे एक प्रशस्ति पत्र, एक स्मृति चिन्ह और दस लाख रुपयों की राशि थी तथा यह पुरस्कार माननीय कृषि मंत्री द्वारा NASC कॉम्प्लेक्स, नई दिल्ली में आयोजित एक विशेष समारोह में दिया जाता है।

खर्चिया गेहूं से तैयार किये गए कुछ व्यंजनों के साथ एक किसान दम्पति

खारची गाँव का विवरण:

खारची गाँव, जिला मुख्यालय पाली से पूर्व की ओर 32 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। यह एक ग्राम पंचायत है, जिसका खर्चिया गेहूं की खेती में बड़ा योगदान है। जोग माया मंदिर के समय से खारची गाँव की अपनी एक ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है। उस समय, खारची गाँव आसपास के तीन गाँवों और पंचायत समिति मारवाड़ जंक्शन का मुख्य व्यवसाय केंद्र और बिक्री स्थल हुआ करता था। यह गाँव और इसके आस-पास की भूमि नमक से इतनी अधिक प्रभावित है कि ऐसा लगता है मानो किसी ने मिट्टी पर नमक की परत चढ़ा दी हो। नमक के जमने के कारण भूमि ऊपर से सफेद हो जाती है जिसे स्थानीय रूप से खारच कहा जाता है और इसलिए इस गांव को खारची नाम मिला। इस पंचायत का कुल भौगोलिक क्षेत्रफल लगभग 12,224 वर्ग किमी है। जिसमें से 85 प्रतिशत भूमि क्षेत्र का उपयोग कृषि के लिए किया जाता है और केवल चार प्रतिशत ही सिंचित क्षेत्र है। गाँव के लोगों का मुख्य व्यवसाय कृषि है क्लस्टर बीन, मूंग, तिल खरीफ में उगाए जाते हैं और रबी में मिर्ची, चीकू, जीरा और जौ प्रमुख कृषि फसलें हैं। बेर, आमला और लहसोरा मुख्य बागवानी फ़सलें हैं। इस जिले में कृषि आधारित औद्योगिक क्षेत्रों में मुख्य रूप से मेंहदी उद्योग, दाल उद्योग और दूध प्रसंस्करण संयंत्र शामिल हैं। कृषि के साथ पशुधन भी आर्थिक रूप से महत्वपूर्ण भाग है।  गाँव में डेयरी क्षेत्र भी तेजी से बढ़ रहा है और वर्तमान में प्रतिदिन लगभग 2500 लीटर दूध का उत्पादन है तथा पशु, भैंस, भेड़ और बकरी यहाँ मुख्य पशु हैं।

जलवायु की स्थितिशुष्क से अर्ध-शुष्क, 20-25˚C  
मृदा प्रकारदोमट से रेतीले दोमट, नमक की मात्रा अधिक है।
खरचिया गेहूं की बीज दर100-120 Kg/Ha (मिट्टी के प्रकार पर निर्भर करता है)।  
बुवाई की विधि:  संरक्षित नमी की स्थिति में तथा सिंचित अवस्था में: 4-5 सिंचाई
उपज16-32 qt / Ha (न्यूनतम और उच्चतम उपज मिट्टी में नमक की मात्रा और पानी की उपलब्धि पर निर्भर करती है)
प्रमुख कीटदीमक
रोगYellow rust, Black smut

QUALITY PARAMETERS OF KHARCHIA WHEAT:

S. No.CharacteristicsKharchia wheatNormal Wheat
1.                   Grain colourRedGenerally amber
2.                   Grain TextureSemi-hardSemi-hard to Hard
3.                   ChapatiSoft (soft for eating and can be used for two days)Soft-semi-soft (can be used up to 4-5 hours on the same day only)
  Chapati prepared in morning is used with butter milk in the after noon gives more taste. Normal taste
4.                   DaliaAbsorbs plenty of water for cooking and gives more quantity after cookingAbsorbs less water
  Gives more taste due to absorption of more waterLess tasty as compared to kharchia wheat
5.                   Bran More branLess bran
6.                   Khichdi (Dalia+dal +ghee)Given to the pregnant ladies,  being light, there is less pressure on other body parts. It is light for stomach, increases blood and gives energy.Normal
7.                   Salt affected waterHigh productionLow production 
 Yield16-32 qt/ha10-15 q/ha
8.                   Straw yieldMore due to  tallnessLess due to short height
9.                   Marketing approach·    Used by local peopleWell established market channels.
  ·    Migrants from this region prefer to purchase bulk stock for the entire year from villagers/growers directly. 
पुरस्कार प्राप्त करते हुए खारची गाँव के किसान

चूंकि, गाँव की भूमि ज्यादातर खारी है, इसलिए, राजस्थान के पाली जिले के खारची और आस-पास के क्षेत्र में खर्चिया गेंहू की खेती की जाती है। खारची गांव में 1200 बीघा में खर्चिया गेहूं उगाया जाता है। खर्चिया गेहूं की औसत उपज लगभग 16-30 क्विंटल प्रति हेक्टेयर होती है। लवणीय मिट्टी में खेती करने पर उपज की क्षमता कम होती है और यदि सिंचाई की सुविधा उपलब्ध हो और भूमि सामान्य हो तो उपज बढ़ जाती है। किसान खेतों में केवल फार्म यार्ड खाद (FYM) का उपयोग करते हैं। परन्तु खर्चिया गेहूं की खेती प्रायः नमी और रासायनिक उर्वरकों के बिना की जाती है। चेन्नई, पुणे, बैंगलोर, हैदराबाद जैसे अन्य स्थानों के किसानों द्वारा भी खारची गाँव का दौरा किया जाता है जो इस गेंहू की गुणवत्ता के बारे में अच्छी तरह से जानते है और बुवाई के उद्देश्य से खारचिया गेहूँ खरीदने के लिए आते हैं। गाँव की महिलाओ से बातचीत के दौरान, यह पता लगा गया कि खर्चिया गेहूँ बहुत ही पौष्टिक और स्वास्थ्यवर्धक होता है इसके आटे से लड्डू और बर्फी बनायीं जाती है। इन लड्डूओं को एक सप्ताह या दस दिनों के प्रसव के बाद शिशु की माँ को एक पौष्टिक व्यंजन के रूप में दिया जाता है। इस से बने दलिया और लापसी का उपयोग आमतौर पर नाश्ते में किया जाता है। महिलाओं द्वारा यह भी बताया गया कि इस गेहूं का आटा गूंधने में अधिक मात्रा में पानी सोखता है और इसकी रोटी का स्वाद मीठा होता है तथा 24 घंटे तक  ताजा रहती है और कभी भी अन्य गेहूं की किस्मों की तरह सूखती नहीं है। भंडारण में किसी प्रकार के कीट-पतंगे अनाज पर आकर्षित नहीं होते हैं, इसलिए इसे लंबे समय तक भंडारघर में रखा जा सकता है।

संकटापन्न प्रजातियों की शरणस्थली: भैंसरोडगढ़ अभयारण्य

संकटापन्न प्रजातियों की शरणस्थली: भैंसरोडगढ़ अभयारण्य

राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने भैंसरोडगढ़ को “राजस्थान के स्वर्ग” की संज्ञा दी और कहा की “अगर मुझे राजस्थान में कोई जागीर दी जाये और उसे चुनने का विकल्प दिया जाये तो वह जगह भैंसरोड़गढ़ होगी”, तो क्या है ऐसा भैंसरोडगढ़ में?

राजस्थान के चित्तौडग़ढ़ जिले में चम्बल किनारे एक अभयारण्य है, जिसे भैंसरोड़गढ़ के नाम से जाना जाता है, 193 वर्ग किलोमीटर में फैला हुआ यह एक अत्यंत खूबसूरत अभयारण्य है जिसे राजस्थान सरकार ने 5 फरवरी 1983 को वन्यजीव अभयारण्य घोषित किया किंतु आज भी बहुत कम लोग ही इसके बारे में जानते है Iरावतभाटा के पास स्थित विशाल भैंसरोड़गढ़ दुर्ग महान महाराणा प्रताप के अनुज शक्ति सिंह की सैन्य चौकी हुआ करता था। ब्राह्मिनी एवं चम्बल नदियों के संगम पर भैंसरोड़गढ़ के किले का निर्माण 1741  में रावत लाल सिंह द्वारा किया गया था जो कि एक जल दुर्ग है । यह दुर्ग चारों ओर पानी से घिरा हुआ है जिससे इस तक पहुंचना मुश्किल था । आज भी इस दुर्ग के परकोटे में भैंसरोडगढ़ गाँव बसा हुआ है जिसकी आबादी लगभग 5000 है ।

भैंसरोड़गढ़ वन्यजीव अभयारण्य मानचित्र फोटो: श्री प्रवीण कुमार

भैंसरोडगढ़ बंजारों द्वारा बसाया गया एक गाँव था जो कि “चर्मण्यवती नगरी” के नाम से प्रसिद्ध था जिसके अवशेष आज भी खुदाई में प्राप्त होते रहते है। चर्मण्यवती नगरी का नाम भैंसा और रोड़ा नामक दो भाइयों के नाम पर भैंसरोडगढ़ पड़ा । भैंसा और रोड़ा गाँव में मुसीबत के समय मसीहा माने जाते थे । एक किंवदंती के अनुसार एक बार गाँव में तेल की कमी हो गई तब ये दोनों भाई उदयपुर गए । वहाँ इन्होंने अपनी मूंछ का एक बाल एक लाख रुपये में गिरवी रखकर गाँव के लिए तेल कि व्यवस्था की । बाद में गाँव लौटकर उन्होंने एक व्यक्ति को एक लाख रुपये देकर अपनी मूंछ का बाल वापस मँगवाया । इसीलिए यहाँ के लोग मूंछ को आन-बान का प्रतीक मानते है ।

अभयारण्य के वन

यहाँ के बुजुर्गों का कहना है कि एक ज़माने में भैंसरोडगढ़ के जंगल इतने सघन थे की सूरज की रोशनी ज़मीन तक भी नहीं पहुँच पाती थी। दक्षिण एवं पूर्व दिशा में राणाप्रताप सागर बांध, उत्तर दिशा में ब्राह्मिनी नदी एवं पश्चिमी दिशा में हाड़ौती  का पठार इस अभयारण्य की सीमा निर्धारित करते हैं। उष्ण कटिबंधीय  जलवायु  वाले इस अभयारण्य में चम्बल के गहरे घुमाव और प्रपात हैं जिनमें मगर एवं अन्य जलीय जीव पाए जाते हैं और इसी कारण से इसे घाटियों एवं प्रपातों का अभयारण्य भी कहा जाता है।धोक यहाँ मिलने वाला मुख्य वृक्ष है साथ ही यहाँ सालार, कदम्ब, गुर्जन, पलाश, तेन्दु, सिरस, आमला, खैर, बेर सेमल आदि के वृक्ष मिलते हैं। नम स्थानों पर अमलतास, इमली, आम, जामुन, चुरेल, अर्जुन, बहेड़ा, कलम और बरगद प्रजाति के पेड़ मिलते हैं।

अभयारण्य के वन्यजीव

अन्य बड़ी बिल्लियों की अनुपस्थिति में तेंदुए  खाद्य शृंखला में शीर्ष पर हैं। मांसाहारियों में धारीदार हायना,सियार,कबर बिज्जू,जंगलीबिल्ली, सिवेट, और लोमड़ियाँ मिलती हैं। शाकाहारियों में चीतल, सांभर, नीलगाय, चिंकारा, लंगूर, खरगोश, जंगली सूअर देखे जा सकते हैं। यह क्षेत्र स्लोथ बियर के रहने के लिए भी अनुकूल है।अभयारण्य में सरीसृपों की भी अच्छी आबादी है जिनमें मगरमच्छ, कछुआ, कोबरा, करैत, रैट स्नेक,इंडियन रॉक पाइथन,और मॉनिटर लिजार्ड शामिल हैं। अभयारण्य के चम्बल नदी क्षेत्र में मछलियों की भी कई प्रजातियां पायीं जाती हैं ।मछलियों की एक विदेशी प्रजाति तिलापिया भैंसरोड़गढ़ के आस पास के गॉंवों में पालने के उद्देश्य से लायी गई थी जो संयोगवश स्थानीय नदी तंत्र में शामिल हो गयीं । जहाँ एक ओर तिलापिया के कारण मछलियों की स्थानीय प्रजातियां संकट में है वही दूसरी ओर यह अभयारण्य में मिलने वाले ऊदबिलाव का प्रमुख  आहार हैं

संकटापन्न पक्षियों का आशियाना

अभयारण्य में लगभग 250 तरह के स्थानीय एवं प्रवासी पक्षियों की प्रजातियां पायी जाती है; जिनमें क्रैन, स्टोर्क, स्नाइप, वैगटेल, रूडी शेलडक और गीज़ प्रमुख हैं। यहाँ स्थित सेडल डैम और ब्रिजसाइड क्षेत्र में यूकेलिप्टस के पेड़ों पर अलेक्जेंड्राइन पैराकीट(Psittacula eupatria) के घोंसले अच्छी संख्या में देखे जा सकते हैं।अभयारण्य का एक अन्य आकर्षण,काला खेत प्लांटेशन-2 में अर्जुन के पेड़ों  पर रहने वाले संकटग्रस्त व्हाइट रम्प्ड वल्चर (Gyps bengalensis) की कॉलोनियां हैं । चम्बल नदी के किनारे स्थित अर्जुन के पेड़ों पर लगभग तीस की संख्या में ये वल्चर मौजूद हैं। संभवतः हाड़ौती में व्हाइट रम्प्ड वल्चर (Gyps bengalensis) की यह एक मात्र कॉलोनी है।

व्हाइट रम्प्ड वल्चर समूह, फोटो: डॉ. एन.कृष्णेन्द्र सिंह

पुनर्वास केंद्र(RC) – अभयारण्य का सूक्ष्म स्वरूप

नदी किनारे धूप सेकते हुए मगर एवं नदी में अठखेलियां करते हुए ऊदबिलाव अभयारण्य की शान माने जाते हैं । यहाँ स्थित पुनर्वास केंद्र (रिलोकेशन सेंटर) के क्रॉकोडिल पॉइंट में दुर्घटनावश मानव बस्तियों में पहुंचने वाले मगर को सुरक्षित निकालकर लाया जाता है एवं नदी में छोड़ा जाता है। यहाँ कई घंटों तक मगर को बिना हिले डुले घूप सेकते हुए, पानी में तैरते हुए देखना और मछली पर झपटना बहुत ही रोमांचक लगता है। 300  हेक्टेयर में बना पुनर्वास केंद्र देखने लायक है जो की सम्पूर्ण अभयारण्य का एक सूक्ष्म स्वरूप माना जा सकता है। यहाँ स्टील से बने इंदिरा गाँधी वाच टावर से पूरे अभयारण्य के विहंगम दृश्य को देखा जा सकता है।

इंदिरा गाँधी वाच टावर से अभ्यारण्य का विहंगम दृश्य, फोटो: डॉ. एन.कृष्णेन्द्र सिंह

ऊदबिलाव एवं उनकी कलाबाजियां

ब्रिज साइड एवं इसके आसपास के क्षेत्र में चिकने फर वाले उदबिलावों को देखा जा सकता है। ये सुबह से शाम के समय बहुत सक्रिय रहते हैं। इनके झुण्ड को जिसे रोम्प (romp) कहा जाता है नदी में बार बार कूदते हुए देखना रोचक लगता है। ये कूदते समय शरीर को इस तरह से घुमाते हैं मानो डॉल्फिन नदी में कूद रही हो। कुछ समय बाद वापस ये नदी में से मछली मुंह में पकड़ कर निकल कर आते हैं ।मछली को ये बिलकुल उसी तरह से खाते हैं जैसे छोटा बच्चा बिस्किट खाता है। बहुत ही हिल मिलकर रहने वाला यह जीव एक आवाज निकाल कर एक दूसरे से संवाद करता  है । जब ये किसी मानव को देख लेते हैं तो इनकी आवाज लम्बी होने लगती है। नदी की किनारे रेत पर या चट्टान पर इन्हें अपने परिवार के साथ मस्ती करता हुआ देखा जा सकता है, इनका पानी में जाना, वापस आना, एक दूसरे पर चढ़ना, रेत पर फिसलते हुए देखना बहुत ही अलग अनुभव होता है ।

खोह और जल प्रपातों का अभयारण्य

वैसे तो अभयारण्य की प्राकृतिक छटा स्वयं में अद्वितीय है, लेकिन विशेष रूप से यहाँ की रेवाझर खोह,सांकल खोह, रीछा खोह किसी को भी दक्षिणी भारत जैसा अनुभव कराती है ! यहाँ के अन्य आकर्षण राणाप्रताप सागर बांध, सेडल डेम, पाड़ाझर महादेव, चूलिया जल प्रपात, मंडेसरा जल प्रपात ओर  कलसिया महादेव हैं।ब्राह्मिनी एवं चम्बल के किनारे लगभग 150 फुट की ऊंचाई पर भैंसरोड़गढ़ का दुर्ग बहुत ही भव्य दिखाई देता है। भैंसरोड़गढ़ की अद्भुत वास्तुकारी एवं भव्यता देखकर राजस्थान का इतिहास लिखने वाले ब्रिटिश इतिहासकार कर्नल जेम्स टॉड ने कहा था की अगर उन्हें राजस्थान में कोई जागीर दी जाये और उसे चुनने का विकल्प दिया जाये  तो वह जगह भैंसरोड़गढ़ होगी ।दक्षिण राजस्थान का सबसे ऊँचाई से गिरने वाला चूलिया प्रपात कई चूड़ी के आकार की घुमावदार घाटियों से बहने वाली जलधाराओं से बना है इस कारण पहले इसका नाम चूड़ियाँ पड़ा ओर बाद में धीरे-धीरे अपभ्रंश होता हुआ चूलिया के नाम से जाना जाने लगा। इस प्रपात के निचले हिस्से में कई मगर देखे जा सकते हैं।

पाड़ाझर महादेव में देखने लायक तीन मुख्य जगह हैं, महादेव मंदिर, गुफाएं,एवं प्रपात। लगभग 100 मीटर लम्बी प्राकृतिक गुफा के अंतिम बिंदु पर शिवलिंग स्थित है। इस गुफा में सैकड़ों चमगादडो की विशाल कॉलोनी भी हैं।

रेवाझर, भैंसरोड़गढ़ पठार के निचले हिस्से में है जहाँ दुर्लभ वनस्पतियां विद्यमान हैं। यह घाटी  संकटग्रस्त लम्बी चोंच वाले गिद्धों (Gyps indicus)की प्रजनन स्थली है। हालाँकि इनकी संख्या काफी कम है लेकिन फिर भी इन्हें सुबह व शाम के समय आसमान में उड़ान भरते हुए देखा जा सकता है। प्रपात की पूर्वी दिशा में स्थित सीधी चोटी पर इनके घोंसले हैं।इन जंगलों में धारीदार लकड़बग्घा, सियार, लोमड़ी, जंगली बिल्लियां भी हैं लेकिन मवेशियों एवं मानवीय गतिविधियों के कारण इनकी संख्या कम है। भैंसरोड़गढ़ में सड़क के किनारे एवं वनस्पतियों से समृद्ध रीछा खोह प्रमुख चार घाटियों में से एक है। यहाँ किसी ज़माने में रीछ हुआ करते थे ।

कलसिया महादेव जल प्रपात, फोटो: डॉ. एन.कृष्णेन्द्र सिंह

सांकल घाटी/प्रपात भी भैंसरोड़गढ़ की चार घाटियों में से एक है जो रेवाझर के ही जैसी है। कलसिया महादेव सड़क के किनारे भैंसरोड़गढ़ पठार की अंतिम घाटी है।महादेव की गुफा यहाँ से बहुत ही सुन्दर दिखाई देती है।

ऊदबिलाव एवं व्हाइट रम्प्ड वल्चर की कॉलोनी मिलने के कारण भैंसरोडगढ़ अभयारण्य को संकटापन्न प्रजातियों की शरणस्थली कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी I