अध्ययन से खुलासा: 95% भारत के हिस्से से विलुप्त हुई सियागोश बिल्ली (Caracal)

अध्ययन से खुलासा: 95% भारत के हिस्से से विलुप्त हुई सियागोश बिल्ली (Caracal)

कैरेकल यानि सियागोश, दुनिया में सबसे व्यापकरूप से पाई जाने वाली एक छोटे आकार की बिल्ली प्रजाति है। जो विश्व के 60 देशों में मिलती है। हालाँकि, एशियाई देशों में इसके संरक्षण की स्थिति और पारिस्थितिकी के बारी में जानकारी बहुत ही कम और पुरानी है। परन्तु फिर भी अगर देखा जाए तो भारत, इज़राइल और ईरान से लगातार इसकी उपस्थिति की सूचनाएं मिलती रहती हैं। भारत में तीन शताब्दियों से भी अधिक समय से कैरेकल को दुर्लभ माना जाता रहा है। वर्ष 1671 में, ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के अधिकारी जेराल्ड औंगियर (Gerald Aungier), जो बॉम्बे के द्वितीय गवर्नर भी थे, को मुगल जनरल दलेर खान द्वारा शिकारी कुत्तों (English greyhounds) की एक जोड़ी के बदले में एक कैरेकल भेंट किया गया था। उस समय, भारत में कैरेकल की दुर्लभता के बारे में भी औंगियर को अवगत करवाया गया था। तब से लेकर आज तक प्रकृतिवादियों ने भारत में कैरेकल की दुर्लभता पर टिप्पणियां करना जारी रखा हुआ है, और कुछ ने तो यह भी कहा है कि यह विलुप्त होने के कगार पर है। जबकि, हम ध्यान से देखे तो आज तक भारत में कैरकल की स्थिति के बारे में बहुत कम जानकारी ही रही है।

रणथम्भौर स्थित वन्यजीव संरक्षण संस्था टाइगर वॉच के शोधार्थी डॉ धर्मेंद्र खांडल, श्री ईशान धर एवं हाल ही में सेवानिवृत्त हुए राजस्थान के हेड ऑफ़ फारेस्ट फोर्सेज डॉ जी.वी. रेड्डी, ने भारत में कैरेकल की ऐतिहासिक और वर्तमान वितरण सीमा पर एक अध्ययन किया है, जो की “Journal of Threatened Taxa” में प्रकाशित हुआ है, इसमें यह देखा गया है, की भारत देश में कैरकल की क्या स्थिति है? यह दो साल के लंबे अध्ययन से लिखा गया शोध पत्र है, जिसमें कई पुस्तकों और जर्नल की समीक्षा के साथ-साथ विषय के विशेषज्ञ और विभिन्न लोगों के साथ वार्ता की गयी है, जो इस जीव की स्थिति पर प्रकाश डालती है।

“Journal of Threatened Taxa” के दिसम्बर माह संस्करण का कवर फोटो

कैरेकल के दुर्लभ होने के बावजूद, भारत में इसका मनुष्यों के साथ एक बहुत ही समृद्ध इतिहास रहा है। हमेशा से ही कैरेकल, कलाबाजी करते हुए उड़ते हुए पक्षियों का शिकार करने की अदभुत क्षमता के कारण जाना जाता रहा है। इसका “कैरेकल” नाम एक तुर्की भाषा के शब्द “कराकुलक” से निकला है, जिसका अर्थ, काले कान (Black ears) वाला प्राणी होता है, जो सीधे-सीधे इसके लंबे काले कानों के बारे में बताता है। भारत में, कैरेकल को इसके फ़ारसी भाषा के नाम “सियागोश” से जाना जाता है, और यह भी सीधे इसके लम्बे काले कानों की ओर इशारा करता है।

संस्कृत ग्रंथ “हितोपदेश” की एक कहानी, एक छोटी जंगली बिल्ली जिसका नाम “दीर्घ-करण या लम्बे कान वाली बिल्ली” की ओर ध्यान केंद्रित करती है तथा यह बिल्ली अक्सर पक्षियों का शिकार करती है, लगता है मानों यह कैरकल के लिए सबसे उपयुक्त नाम है। यद्धपि वर्ष 1953 में, जीवों के वैज्ञानिक नाम जो लिनियस (Linnaeus) की द्विपद नामकरण पद्धति पर आधारित है, उनको जब भारत में संस्कृत रूपांतरित किया गया तो कैरकल के लिए एक संस्कृत नाम “शश-कर्ण” या “खरगोश जैसे कान” प्रस्तावित किया गया था।

कैरेकल एक छोटी बिल्ली प्रजाति है जिसके काले लम्बे कान उसकी मुख्य पहचान है (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

इतिहास पढ़ने पर पता लगता है की दिल्ली सल्तनतम काल के दौरान सियागोश को पहली बार भारत में एक शिकार में प्रयोग होने वाले प्राणी के रूप में इस्तेमाल किया गया था। सुल्तान फिरोज शाह तुगलक के पास सियागोश का एक विशाल संग्रह था तथा 14 वीं शताब्दी में, सुल्तान ने संग्रह के रखरखाव के लिए एक “सियाह-गोशदार खाना” की स्थापना की। तीसरे मुगल बादशाह अकबर ने भी शिकार करने के लिए सियागोश का एक बड़े पैमाने पर इस्तेमाल किया करते थे तथा अकबर के शासनकाल के दौरान, सियागोश को संस्कृत, अरबी और तुर्क ग्रंथों के साहित्य जैसे कि अनवर-ए-सुहाइली, तूतिनामा, साथ ही फारसी क्लासिक्स जैसे खम्सा-ए-निज़ामी में चित्रित किया जाने लगा। ऐतिहासिक रूप से सियागोश का एक अच्छे शिकारी के रूप में व्यापक उपयोग और संस्कृत नाम की कमी के कारण कुछ प्रश्न सामने खड़े होते हैं की क्या यह प्रजाति भारत की स्वदेशी है भी? या नहीं? हालांकि, 1982 में, ZSI के एक वैज्ञानिक, मृण्मय घोष ने एक कपाल के हिस्से की जांच की, जो भारत में एक सियागोश का सबसे पुराना जीवाश्म था। यह टुकड़ा 1930 में हड़प्पा से एकत्रित किया गया था और गलती से घरेलू बिल्ली के रूप में पहचाना गया था। घोष ने खोपड़ी की अच्छी तरह समीक्षा की और पाया कि यह वास्तव में एक सीतेगोश का है। यह जीवाश्म भारत के सबसे पुराने सियागोश की खोज थी, जो 3000-2000 ईसा पूर्व की थी और यह जीवाश्म सिद्ध करता है की सियागोश सिंधु घाटी सभ्यता के दौरान भारतीय उपमहाद्वीप में मौजूद था।
भारत में बढ़ती जनसंख्या के कारण हुए लैंडस्केप में परिवर्तनों के कारण सियागोश की स्थिति शायद अत्यंत प्रभावित हुई है। इसी प्रयास में, इसअध्ययन के लेखकों ने इतिहास की शुरुआत से अप्रैल 2020 तक भारत में सियागोश की उपस्थिति की सभी सूचनाएं एकत्रित करने का प्रयास किया, तथा इन सभी सूचनाओं को नक़्शे पर दर्शाया और साथ ही ऐतिहासिक वितरण सीमा व् वर्तमान सीमा में बदलावों का मूल्यांकन भी किया गया। इस शोध को शिकार में प्रयोग होने वाले पालतू सियागोश और जंगली सियागोश ने अधिक चुनौतीपूर्ण बना दिया।

इस अध्ययन के लेखकों ने इतिहास की शुरुआत से लेकर 2020 के उपलब्ध साहित्य की व्यापक समीक्षा की। इसमें प्रकृतिवादियों, जीव विशेषज्ञों, प्राकृतिक इतिहासकारों, इतिहासकारों, वन अधिकारियों, राजपत्रकारों, तत्कालीन राजपरिवारो और सेना के अधिकारियों के लेखन शामिल थे। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS), जूलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ZSI), लंदन नेचुरल हिस्ट्री म्यूजियम, भारत में निजी ट्रॉफी संग्रह और अन्य संग्रहालयों में जमा किए गए सियागोश के नमूनों के रिकॉर्ड भी एकत्रित किये गए, साथ ही वन अधिकारी और जीव-वैज्ञानिक जिन्होंने साक्षात सियागोश का अवलोकन किया है और जिन लोगों ने तस्वीरें ली हैं सभी से वार्ता कर जानकारी हासिल की गयी। लेखकों ने अपनी विश्वसनीयता के अनुसार निम्नलिखित तरीकों से सूचनाओं को एकत्रित और वर्गीकृत किया: A) वर्तमान में उपलब्ध तस्वीरों, शरीर के अंगों सहित नमूनों के ठोस सबूतों के आधार पर पुष्टि की गई हैं; B) जीवित या मृत सियागोश के प्रत्यक्ष दर्शन पर आधारित स्पष्ट सूचनाएं, संग्रहालयों को प्रस्तुत किए गए नमूने परन्तु जो अब उपलब्ध नहीं या गायब हैं, फोटोग्राफिक रिपोर्ट जो अब उपलब्ध नहीं, नष्ट या गायब हैं; C) पक्की सूचनाएं जो सियागोश की विशिष्ट जानकारी के माध्यम से उपस्थिति की सुचना देती हैं, जिसमें इसका विवरण और अलग-अलग मौखिक नामों का प्रावधान भी शामिल है; D) बिना किसी विवरण, फोटो या गलत विवरण वाली अपुष्ट या संदिग्ध सूचनाएं।

इस अध्ययन के दौरान 33 रिपोर्टों को ‘अस्पष्ट’ माना गया क्योंकि वे संदिग्ध या गलत थीं। अक्सर लोग जंगल कैट (Jungle cat) को सियागोश समझ लेते हैं और यह हमेशा एक चुनौती रही है। इस प्रकार की गलत खबरें आज भी जारी हैं, और यह गलत सूचनाएं प्रकाशित भी होती रही है। इस अध्ययन के लेखकों ने सख्ती से पालतू सियागोश (coursing Caracals) की सुचना को अध्ययन में शामिल नहीं किया, जिनके मूल स्थान अज्ञात थे। इसके अलावा, 2015 के बाद से रणथंभौर टाइगर रिजर्व और उसके आसपास के क्षेत्र में टाइगर वॉच के Village Wildlife Volunteers द्वारा लगाए गए कैमरा ट्रैप की तस्वीरें भी शामिल की गयी। यह कैमरा ट्रैपिंग पूर्णरूप से प्रशिक्षित ग्रामीण चरवाहों द्वारा की जाती है जो टाइगर रिज़र्व से बाहर निकलने वाले बाघों की निगरानी करते हैं। तथा इस खोज से निकली सभी रिपोर्टे ऐतिहासिक और वर्तमान सीमा को निर्धारित करने के लिए नक्शे पर दर्शाई गई।

भारत में सियागोश कि केवल दो संभावित आबादियां हैं एक राजस्थान स्थित रणथंभौर टाइगर रिज़र्व में और दूसरी गुजरात के कच्छ जिले में। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

लेखकों ने वर्ष 1616 से शुरू होकर अप्रैल 2020 तक कुल 134 रिपोर्टों को एकत्रित किया। सियागोश ऐतिहासिक रूप से 13 भारतीय राज्यों में और 26 में से 9 बायोटिक प्रांतों में मौजूद पाया गया। वर्ष 2001 से, सियागोश की उपस्थिति केवल तीन राज्यों राजस्थान, गुजरात और मध्य प्रदेश तथा चार बायोटिक प्रांतों में बताई गई है, और उसमे भी केवल दो संभावित आबादियां हैं एक राजस्थान स्थित रणथंभौर टाइगर रिज़र्व में और दूसरी गुजरात के कच्छ जिले में। 1947 से पहले, सियागोश 793,927 वर्ग किमी के क्षेत्र से रिपोर्ट किया गया था। वर्ष 1948 से 2000 के बीच, सियागोश की भारत में उपस्थिति का विस्तार 47.99% घट गया। 2001 से 2020 तक, उपस्थिति का विस्तार 95.95% कम हो गया तथा वर्तमान में इसका विस्तार 16,709 वर्ग किमी तक सीमित है। 1948 से 2000 में सियागोश की सूचनाएं 5% से कम हो गयी तथा इनका विस्तार 1947 से पहले की अवधि का सिर्फ 2.17% ही रह गया था।

राजस्थान में वर्ष 2001 से अब तक सियागोश की कुल 24 सूचनाएं आ चुकी हैं। इनमें से 17 सूचनाओं की फोटोग्राफिक प्रमाण द्वारा पुष्टी हुई हैं। जिनमें से 15 रणथंभौर से हैं, 2004 में सरिस्का से ली गई एक तस्वीर और 2017 में भरतपुर में केवलादेव घाना राष्ट्रीय उद्यान से एक कैमरा ट्रैप तस्वीर शामिल है। हालांकि 2015 से अप्रैल 2020 तक, विलेज वाइल्ड वॉलंटियर्स ने सियागोश की 176 कैमरा ट्रैप तस्वीरें प्राप्त की। जो की रणथंभौर टाइगर रिजर्व में और उसके आसपास 6 स्थानों से थी। उनके कैमरा ट्रैपिंग प्रयासों ने राजस्थान के धौलपुर जिले में सियागोश की उपस्थिति को निर्णायक रूप से स्थापित व् प्रमाणित किया है। यह भारत में और संभवतः सियागोश की पूरी एशियाई सीमा में सियागोश की तस्वीरों का सबसे बड़ा संग्रह है। रणथम्भौर के, भारत में दो संभावित आबादी में से एक होने के साथ, विलेज वाइल्ड वॉलंटियर्स की टीम भारत में सियागोश के संबंध में किसी भी आगामी संरक्षण योजना के लिए अतिआवश्यक होंगे। 2001 के बाद से, कच्छ से केवल 9 फोटोग्राफिक रिकॉर्ड हैं और मध्य प्रदेश से कोई फोटोग्राफिक रिकॉर्ड नहीं है।

विलेज वाइल्ड वॉलंटियर्स द्वारा ली गयी सियागोश कि कैमरा ट्रैप फोटो (फोटो: टाइगर वॉच)

यह भी संभव है कि भारत के अन्य हिस्सों में सियागोश अभी भी मौजूद हो, एवं महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और भारत के पूर्वी राज्यों में इसे कम आंका गया हो और उचित रूप से अध्ययन नहीं किया गया हो। इस अध्ययन द्वारा स्थापित सीमा में कमी को और अधिक सत्यापित करने और और अधिक सर्वेक्षण की आवश्यकता होगी। आज 21 वीं सदी में, मुट्ठी भर अध्ययनों के अपवाद से भारत में सियागोश की पारिस्थितिकी के ज्ञान में लगभग कोई योगदान नहीं रहा है। सियागोश की संख्या, प्रजनन, मृत्यु दर, होम रेंज के आकार और शिकार की गतिशीलता के सर्वेक्षण समय की आवश्यकता है। हमे इस बारे में पढ़ने व् समझने की तत्काल आवश्यकता है की कैसे बंजर भूमि के रूप में भूमि का वर्गीकरण किया जाता है, तथा यह सियागोश को किस प्रकार से प्रभावित करता है क्योंकि यह छोटी झाड़ियों वाले खुले प्रदेशों में आवास करते हैं। वन्यजीव कॉरिडोर को निर्धारित करने और स्थापित करने के लिए सियागोश की गतिविधियों के स्वरूप पर ध्यान केंद्रित करने वाले दीर्घकालिक अध्ययन भी समान रूप से आवश्यक हैं क्यूंकि ये कॉरिडोर खंडित आबादी इकाइयों को आपस में जोड़ने के लिए उपयुक्त रहेंगे। अध्ययन के लेखक यह आशा करते है की संरक्षणवादी भारत में सियागोश को विलुप्त होने से बचाने के लिए इस लड़ाई में शामिल होने के लिए प्रेरित होंगे।

लेखक:

Mr. Ishan Dhar (L) is a researcher of political science in a think tank. He has been associated with Tiger Watch’s conservation interventions in his capacity as a member of the board of directors.

Dr. Dharmendra Khandal (R) has worked as a conservation biologist with Tiger Watch – a non-profit organisation based in Ranthambhore, for the last 16 years. He spearheads all anti-poaching, community-based conservation and exploration interventions for the organisation.

 

काँटेदार झाऊ-चूहा

काँटेदार झाऊ-चूहा

शरीर के बालों को सुरक्षा के लिए कांटों में विकसित कर लेना उद्विकास की कहानी का एक बहुत ही रुचिपूर्ण पहलू है। हालाँकि इनकी काँटेदार ऊपरी त्वचा इन्हें अधिकांश परभक्षियों से बचा लेती है फिर भी परिवेश में लोमड़ी व नेवले जैसे कुछ चालक शिकारी इन्हें अपने भोजन का मुख्य हिस्सा बनाने से नहीं चूकते।

प्रकृति में उद्विकास की प्रक्रिया के दौरान अनेक जीवों ने बदलते पर्यावास में अपनी प्रजाति का अस्तित्व बनाए रखने के लिए विभिन्न सुरक्षा प्रणालियों को विकसित किया है। कुछ जीवों ने सुरक्षा के लिए झुंड में रहना सीखा, तो बिना हाथ-पैर भी सफल शिकार करने के लिए सांपो ने जहर व जकड़ने के लिए मजबूत मांसपेशियाँ विकसित की। वही कुछ जीवों ने छलावरण विकसित कर अपने आप को आस-पास के परिदृश्य में अदृश्य कर लिया। शरीर के बालों को सुरक्षा के लिए कांटों में विकसित कर लेना इस उद्विकास की कहानी का बहुत ही रुचिपूर्ण पहलू है।

हड्डियों के समान बाल अवशेषी रूप में अच्छे से संरक्षित नहीं हो पाते इसी कारण यह बताना मुश्किल है की धरती पर पहला काँटेदार त्वचा वाला जीव कब अस्तित्व में आया होगा। फिर भी उपलब्ध पुरातात्विक अवशेषों के अनुसार फोलिडोसीरूस (Pholidocerus) नामक एक स्तनधारी जीव आधुनिक झाऊ-चूहों व अन्य काँटेदार त्वचा वाले जीवों (एकिड्ना व प्रोकुपाइन (Porcupine) जिसे हिन्दी में सहेली भी कहते है) का वंशज माना जाता है, जिसका लगभग चार करोड़ वर्ष पूर्व अस्तित्व में आना ज्ञात होता है। झाऊ-चूहे वास्तव में चूहे नहीं होते अपितु छोटे स्तनधारी जीवों के अलग समूह जिन्हे ‘Erinaceomorpha कहते है से संबंध रखते है। जबकि चूहे वर्ग Rodentia से संबंध रखते है जो अपने दो जोड़ी आजीवन बढ़ने वाले आगे के incisor दाँतो के लिए जाने जाते है ।

झाऊ-चूहों में त्वचा की मांसपेशियां स्तनधारी जीवों में सबसे अधिक विकसित व सक्रिय होती है जो की खतरा होने पर काँटेदार त्वचा को फैलाकर लगभग पूरे शरीर को कांटों से ढक देती है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

झाऊ-चूहे के शरीर पर पाये जाने वाले कांटे वास्तव में किरेटिन नामक एक प्रोटीन से बने रूपांतरित बाल ही होते है। यह वही प्रोटीन है जिससे जीवों के शरीर में अन्य हिस्से जैसे बाल, नाखून, सींग व खुर बनते है। किसी भी परभक्षी खतरे की भनक लगते ही ये जीव अपने मुंह को पिछले पैरो में दबाकर शरीर को “गेंद जैसी संरचना” में ढाल लेते है। इनकी त्वचा की मांसपेशियों में कुछ अनेच्छिक पेशियों की उपस्थिति यह दर्शाती है की खतरे की भनक तक लगते ही तुरंत काँटेदार गेंद में ढल जाना कुछ हद तक झाऊ-चूहों की एक उद्विकासीय प्रवृति है। यह ठीक उसी तरह है जैसे काँटा चुभने पर हमारे द्वारा तुरंत हाथ छिटक लेना। सुरक्षा की इस स्थिति में झाऊ-चूहे कई बार परभक्षी को डराने हेतु त्वचा की इन्हीं मांसपेशियों को फुलाकर शरीर का आकार बढ़ा भी लेते है व नाक से तेजी से हवा छोड़ सांप की फुफकार जैसी आवाज निकालते है।

विश्व भर में झाऊ चूहों की कुल 17 प्रजातियाँ पायी जाती है जो की यूरोप, मध्य-पूर्व, अफ्रीका व मध्य एशिया के शीतोष्ण व उष्णकटिबंधीय घास के मैदान, काँटेदार झाड़ी युक्त, व पर्णपाती वनों में वितरित है। आवास के मुताबिक शीतोष्ण क्षेत्र की प्रजातियाँ केवल बसंत व गर्मी में ही सक्रिय रहती है एवं सर्दी के महीनों में शीत निंद्रा (Hibernation) में चली जाती है। भारत में भी झाऊ चूहों की तीन प्रजातियों का वितरण ज्ञात होता है जो की पश्चिम के सूखे इलाकों से दक्षिण में तमिलनाडु व केरल तक वितरित है ।

भारतीय लंबे कानों वाला झाऊ चूहा (Indian long-eared Hedgehog) जिसे मरुस्थलीय झाऊ चूहा भी कहते है का वैज्ञानिक नाम Hemiechinus collaris है। यह प्रजाति सबसे पहले औपनिवेशिक भारत के ब्रिटिश जीव विज्ञानी थॉमस एडवर्ड ग्रे द्वारा 1830 में गंगा व यमुना नदी के बीच के क्षेत्र से पहचानी गयी थी। इसी क्षेत्र से इसका ‘टाइप स्पेसिमेन’ एकत्रित किया गया था जिसका चित्रण सर्वप्रथम ब्रिटिश मेजर जनरल थॉमस हार्डविकी ने “इल्लुस्ट्रेसन ऑफ इंडियन ज़ूलोजी” में किया था।

भारतीय लंबे कानों वाला झाऊ चूहे का सबसे पहला चित्र ब्रिटिश मेजर जनरल थॉमस हार्डविकी द्वारा बनाया गया तथा वर्ष 1832 में उनकी पुस्तक “Illustrations of Indian Zoology” में प्रकाशित किया था। जनरल थॉमस हार्डविक (1756- 3 Mar 1835) एक अंग्रेजी सैनिक और प्रकृतिवादी थे, जो 1777 से 1823 तक भारत में थे। भारत में अपने समय के दौरान, उन्होंने कई स्थानीय जीवों का सर्वेक्षण करने और नमूनों के विशाल संग्रह बनाया। वह एक प्रतिभाशाली कलाकार भी थे और उन्होंने भारतीय जीवों पर कई चित्रों को संकलित किया तथा इन चित्रों से कई नई प्रजातियों का वर्णन किया गया था। इन सभी चित्रों को जॉन एडवर्ड ग्रे ने अपनी पुस्तक “Illustrations of Indian Zoology” (1830-35) में प्रकाशित किया था। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

यह प्रजाति मुख्यतः राजस्थान व गुजरात के शुष्क व अर्द्ध शुष्क क्षेत्रों के साथ- साथ उत्तर में जम्मू , पूर्व में आगरा, पश्चिम में सिंधु नदी, व दक्षिण में पूणे तक पायी जाती है। गहरे भूरे व काले रंग के कांटों वाली यह प्रजाति अन्य दो प्रजातियों की तुलना में आकार में बड़ी होती है। इसके कानों का आकार पिछले पैरों के आकार के बराबर होता है जिस कारण इनके कान कांटों की लंबाई से भी ऊपर दिखाई पड़ते है। झाऊ-चूहे की ये प्रजाति पूर्ण रूप से मरुस्थलीय जलवायु के अनुकूल है जो सर्दियों में अकसर शीत निंद्रा में चले जाती है। हालांकि इनका शीत निंद्रा में जाना इनके वितरण के स्थानों पर निर्भर होता है क्योंकि सर्दी का प्रभाव वितरण के सभी इलाकों पर समान नहीं होता है। मरुस्थलीय झाऊ-चूहे मुख्यतः सर्वाहारी होते है जो की कीड़ों, छिपकलियों, चूहों, पक्षियों व छोटे सांपो पर भोजन के लिए निर्भर होता है। ये पके हुए फल व सब्जियाँ बिलकुल पसंद नहीं करते है ।

भारतीय लंबे कानों वाला झाऊ चूहा जिसे मरुस्थलीय झाऊ चूहा भी कहते है तथा ये प्रजाति पूर्ण रूप से मरुस्थलीय जलवायु के अनुकूल है जो सर्दियों में अकसर शीत निंद्रा में चले जाती है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

मरुस्थलीय झाऊ चूहे के विपरीत भारतीय पेल झाऊ-चूहा Paraechinus mircopus आकार में थोड़ा छोटा व पीले-भूरे कांटों वाला होता है। इसके सर व आंखो के ऊपर चमकदार सफ़ेद बालों की पट्टी गर्दन तक फैली होती है जो इसे मरुस्थलीय झाऊ-चूहे से अलग पहचान देती है। यह प्रजाति शीत निंद्रा में नहीं जाती परंतु भोजन व पानी की कमी होने पर अकसर टोर्पोर अवस्था में चली जाती है। टोर्पोर अवस्था में कोई जीव संसाधनों के अभाव की परिस्थिति में जीवित रहने के लिए अल्पावधि निंद्रा में चले जाते है एवं संसाधनों की बाहुल्यता पर पुनः सक्रिय हो जाते है। अपरिचित पर्यावास में आने पर ये प्रजाति अपने शरीर व कांटो को अपनी लार से भर लेती है। ऐसा शायद अपने इलाके को गंध द्वारा चिह्नित करने या नर द्वारा किसी मादा को आकर्षित करने के लिया हो सकता है परंतु इस व्यवहार का सटीक कारण एक शोध का विषय है। भारतीय पेल झाऊ-चूहे, मरुस्थलीय झाऊ-चूहे की तुलना में बहुत दुर्लभ ही दिखाई देते है व इनका वितरण भी सीमित इलाकों तक ही है।

भारतीय पेल झाऊ-चूहे का सबसे पहला विवरण ब्रिटिश जीव विज्ञानी एडवर्ड ब्लेथ ने 1846 में दिया जब उन्होने इसका ‘टाइप स्पेसिमेन’ वर्तमान पाकिस्तान के पंजाब प्रांत के भावलपुर क्षेत्र से एकत्रित किया था। इस प्रजाति का भौगोलिक वितरण मरुस्थलीय झाऊ-चूहे के वितरण के अलावा थोड़ा ओर अधिक दक्षिण तक फैला हुआ है जहां यह तमिलनाडु व केरल में पाये जाने वाले मद्रासी झाऊ-चूहे या दक्षिण भारतीय झाऊ-चूहे Paraechinus nudiventris से मिलता है। मद्रासी झाऊ-चूहा भारत में झाऊ चूहे की सबसे नवीनतम पहचानी गयी प्रजाति है जो पहले भारतीय पेल झाऊ-चूहे की उप-प्रजाति के रूप में जानी जाती थी। इसका सबसे पहला ‘टाइप स्पेसिमेन’ जैसा की इसके नाम से ज्ञात होता है मद्रास से ही एक ब्रिटिश जीव विज्ञानी होर्सेफील्ड ने 1851 में किया था। हालांकि ये दोनों प्रजातियाँ दिखने में काफी समान होती है परंतु मद्रासी झाऊ-चूहा अपने अधिक छोटे कानों व हल्के भूरा रंग के कारण अलग पहचाना जा सकता है। मद्रासी झाऊ-चूहे का वितरण केवल तमिलनाडु व केरल के कुछ पृथक हिस्सों से ही ज्ञात है जिससे इसे यहाँ की स्थानिक प्रजाति का दर्जा प्राप्त है। ये दोनों प्रजातियाँ मुख्यतः सर्वाहारी होती है जो की अवसर मिलने पर कीड़ो व छोटे जीवों के साथ पके हुए फल व सब्जियाँ भी चाव से खाती है।

भारतीय पेल झाऊ-चूहा (Indian pale Hedgehog), प्रजाति शीत निंद्रा में नहीं जाती परंतु भोजन व पानी की कमी होने पर अकसर टोर्पोर अवस्था में चली जाती है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

झाऊ–चूहे की ये तीनों प्रजातियाँ मुख्य रूप से निशाचर होती है तथा दिन का समय अपनी संकरी माँद में आराम करते ही बिताती है। इनकी माँद एक सामान्य पतली व छोटी सुरंग के समान होती है जिसे एक चूहा दूसरों के साथ साझा नहीं करता। साल के अधिकांश समय अकेले रहने वाले ये जीव केवल प्रजनन काल में ही साथ आते है जिसमें एक नर एक से अधिक मादाओं के साथ मिलन का प्रयास करता है। नर बच्चों  के पालन-पोषण में कोई भागीदारी नहीं निभाते है। कुछ लेखों के अनुसार भारतीय पेल झाऊ-चूहो में स्वजाति-भक्षिता भी पायी जाती है, जिसमें नर व मादा दोनों ही भोजन की कमी में अपने ही बच्चों को खाते देखे गए है।

भारतीय पेल झाऊ-चूहा, व्यवहार की दृष्टि से ये प्रजाति अधिक स्थानों तक प्रवास नहीं करती एवं आवास सुरक्षित होने पर कई साल तक एक ही माँद का प्रयोग कर उसके आस-पास के इलाकों में ही विचरण करती है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

हालाँकि इनकी काँटेदार ऊपरी त्वचा इन्हें अधिकांश परभक्षियों से बचा लेती है फिर भी परिवेश में लोमड़ी व नेवले जैसे कुछ चालक शिकारी इन्हें अपने भोजन का मुख्य हिस्सा बनाने से नहीं चूकते। सांपो के शिकार के लिए कुख्यात नेवले इन छोटे काँटेदार जीवों को भी आसानी से शिकार बना लेते है। फ़ौना ऑफ ब्रिटिश इंडिया के एक लेख में जीव विशेषज्ञ ई -ऑ ब्रायन अपने एक अवलोकन के बारे में बताते है जिसमें एक भारतीय नेवला गेंद बने झाऊ-चूहे को पलट कर उसके बन्द मुंह के हिस्से पर तब तक वार करता है जब तक उसे शरीर का कोई हिस्सा पकड़ में नहीं आता। काफी लंबे चलते इस संघर्ष के अंत में उसे झाऊ चूहे का मुंह पकड़ में आ ही जाता है व उसे पास के झाड़ी में ले जाकर खाने लगता है।

मरुस्थलीय परिवेश में लोमड़ी द्वारा झाऊ-चूहे के शिकार की प्रक्रिया संबंधी एक किंवदंती बहुत प्रचलित है। इसके अनुसार चालक लोमड़ी गेंद बने झाऊ-चूहे को पलट उसके बन्द मुंह के हिस्से पर पेशाब कर देती है। मूत्र की गंदी महक से निजात पाने झाऊ-चूहा जैसे ही अपनी नाक को हल्का सा बाहर निकलता है, लोमड़ी झट से उसे पकड़ लेते है व खींच कर उसे काँटेदार चमड़ी से अलग कर देती है। हालांकि इस किंवदंती सटीकता पर चर्चा की जा सकती है लेकिन लोमड़ियों की मांदों के आस-पास अकसर दिखने वाले काँटेदार चमड़ी के ढेर सारे अवशेष लोमड़ी के भोजन में झाऊ चूहो की प्रचुरता को स्पष्ट जरूर करते है। झाऊ चूहो की इन भारतीय प्रजातियों की पारिस्थितिकी व व्यवहार संबंधित जानकारी बहुत ही सीमित है इसी कारण संरक्षण हेतु इनके वितरण व व्यवहार पर अधिक शोध की आवश्यकता है।

 

रसेल्स वाइपर में नर संग्राम

रसेल्स वाइपर में नर संग्राम

रसेल्स वाईपर, भारत के सबसे खतरनाक 4 साँपों में से एक। दो नर सांप संग्राम नृत्य का प्रदर्शन करते हैं जिसमें वह एक दूसरे के चारों ओर लिपटकर एक दूसरे को वश में करने के लिए अपने ऊपरी शरीर को उठाते हैं, जिसे देखकर यह प्रतीत होता है की वह ‘नृत्य’ कर रहे हैं।

दिनांक: 30. 10 .2020

समय: 4.13 बजे

तापमान: 29 से 30 डिग्री सें

स्थान: कुतलपुरा गाँव के पास, शेरबाग कैंप सवाई माधोपुर रणथंभौर बाघ रिजर्व के बाहर

निवास स्थान.. झाड़ियों के साथ घास का मैदान

सांप की लंबाई: न्यूनतम 4.5 से 5 फीट

शेरबाग कैंप के कुछ कर्मचारियों ने लम्बी घासों के बीच दो साँपों को एक-दूसरे से साथ लहराते हुए देखा, मानों जैसे वो आपस में लड़ रहे हो और उन्होंने तुरंत कैंप के प्रकृतिवादी को बुलाया। जैसा की सांप लम्बी-लम्बी घास के बीच में थे, प्रकृतिवादी उन्हें अजगर समझ कर उनकी ओर बढ़ा। रसेल्स वाइपर को आमतौर पर गलती से अजगर समझ लिया जाता है।

क्योंकि, संजना कपूर, हमीर थापर और प्रकृतिवादी पियूष चौहान भी साँपों को देख रहे थे, मैंने एक किनारे से देखा की … दोनों सांप धीरे-धीरे लहराते, नाचते हुए लगभग 5 फीट तक ऊपर उठ रहे थे परन्तु उनका निचला भाग मानों एकदूसरे के साथ बंधा हुआ हो। उनका शरीर या पूँछ आपस में उलझा या लिपटा हुआ नहीं था और जैसे शरीर का ऊपरी भाग लहराता निचला भाग बंधा सा रहता। दोनों सापों में किसी भी प्रकार की आक्रामकता और एक दूसरे के छूने से धक्का-मुक्की नहीं थी। मेरा मानना है की वह एक संभोग आलिंगन में लहरा रहे थे। शाम 4:44 बजे वे बंधी स्थिति में ही एक झाड़ी में गायब हो गए। एक सांप की पूंछ लगभग 4 इंच लंबी होती है तथा किसी भी स्तर पर दोनों सापों का निचला भाग और पूंछ अलग नहीं हुई।

मुझे उन पूंछों को देखकर आधे रास्ते में एहसास हुआ कि ये अजगर नहीं बल्कि घातक रसेल्स वाइपर थे। बाद में क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ चर्चा करने पर हमने महसूस किया कि यह दो नरों के बीच का मुकाबला था तथा मादा शायद कहीं पास से देख रही थी। परन्तु यह हमारे लिए बहुत ही उल्लेखनीय अवलोकन था।

रसेल्स वाईपर, भारत के सबसे खतरनाक 4 साँपों में से एक है तथा यह बहुत ही विषैला होता है और यह सीधे बच्चों को जन्म देता हैं।

 

लेखक: श्री वाल्मीक थापर

समीक्षक: श्री वाल्मीक थापर, श्री हमीर थापर, श्रीमती संजना कपूर, श्री पीयूष चौहान

फोटो: श्रीमती संजना कपूर

श्री हमीर थापर और श्री पीयूष चौहान द्वारा फिल्माया गया

 

रसेल्स वाइपर में नर संग्राम

Russell’s Viper Male Combat Dance

Russell’s viper, one among the four venomous snake species of India, shows a mesmerizing combat dance in two male snakes perform the ‘dance’ by wrapping around each other and raising their upper bodies in an attempt to subdue each other.

Date  30. 10 .2020

Time 4.13pm

Temperatures  29 to 30 degree c

Location..Near Kutalpura village,  Sherbagh camp  Sawai Madhopur  outside Ranthambhore tiger reserve

Habitat..thick grassland with bushes

Length of snakes…4.5 to 5ft minimum

Staff workers noticed two snakes swaying as if fighting and call the camp naturalist…As the snakes were in high grass he mistakes them for pythons and approaches snakes( Russell’s Vipers are commonly mistaken for Pythons)….I observe from the edge as Sanjna Kapoor, Hamir  Thapar and Piyush watch snakes that are gently swaying and dancing…they move 5ft on human approach but lower sections seem locked. Tails or bodies not entangled or coiled together and as upper section sways lower section remains locked..there is no aggression and no pushing of bodies to touch each other. I believe it is swaying in a mating embrace. At 4.44 pm they vanish into a bush in the locked position. One snake tail is 4 inches longer.

At no stage did the tails of the snake and lower section seperate.  I realised halfway through looking at the tails that these were deadly Russell’s Vipers and not pythons.

Later on discussions with experts in the field we realised that this was combat between two males..the female was probably nearby watching. A remarkable encounter.

 

Author: Mr. Valmik Thapar

Seen by:

Mr. Valmik Thapar, Mr. Hamir Thapar, Mrs. Sanjna Kapoor and Mr. Piyush Chauhan

Photographed By: Mrs. Sanjna Kapoor

Filmed By: Mr. Hamir Thapar and Mr. Piyush Chauhan

 

 

राजस्थान में मिलने वाले कछुओं की प्रजातियां

राजस्थान में मिलने वाले कछुओं की प्रजातियां

राजस्थान के भूभाग पर  विशाल प्राकृतिक आवास जैसे थार का रेगिस्तान, अरावली एवं विंध्यन की शुष्क पर्वतमाला, शुष्क और अर्ध-शुष्क पतझड़ी वन, अलवणीय एवं लवणीय झीलें तथा आर्द्र भूमि आदि मौजूद हैं | राजस्थान के इन पारिस्थितिकी तंत्रों में अत्यंत विकसित जैव विविधता भी उपलब्ध है |

क्या शुष्क राजस्थान में जलीय प्राणी वर्ग में भी विविधता होगी ? राजस्थान राज्य में 26 बड़ी नदियाँ बहती हैं एवं यहाँ पर बड़ी संख्या में झीलें एवं तालाब हैं |  राजस्थान में जलीय कछुओं की 10 प्रजातियाँ पाई जाती हैं और 01 प्रजाति जमीन पर रहने वाली पाई जाती है | जैव विविधता के एक अनोखे वर्ग – कछुओं के प्रति हम सदैव अनभिज्ञ रहे है। कछुए माँसाहारी और शाकाहारी दोनों ही तरह के होते हैं, ये मरे हुए जानवरों के सड़े-गले अवशेषों को खा जाते हैं, इससे नदी, नालों को साफ रखने में बहुत सहायता मिलती है | कछुए भोज्य शृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा होते है।

राजस्थान में पाए जाने वाले कछुओं में सबसे ज्यादा जलीय कछुओं की निम्न प्रजातियाँ पाई जाती हैं:

  1. निल्सोनिया गेंजेटिका (इंडियन सॉफ्ट शेल टर्टल) Nilssonia gangetica (Indian softshell turtle): यह नदियों एवं तालाबों में पाए जाने वाली नरम खोल की एक प्रजाति है| यह प्रजाति लगभग 94 से.मी तक बड़ी होती है | यह प्रजाति सड़े गले मांस एवं पानी में पाए जाने वाले पौधों के साथ में जलीय वनस्पती, मछलियों, अन्य कछुओं की हैचलिंग एवं जल पक्षियों पर शिकार करते है| गंगा स्वछता अभियान के अंतर्गत इस प्रजाति को नदी साफ करने के लिए छोड़ा गया हैं| यह एक बार में 13-35 अंडे देते हैं और अपने अंडे अगस्त से दिसंबर मास तक देते है जिनमें से बच्चे निकलने में तकरीबन 9 महीने लगते है | रणथंभोर टाइगर रिजर्व में कुछ साल पहले एक बाघ को इन्डियन सॉफ्टशेल टर्टल का शिकार करते हुए भी देखा गया है | इनके मांस और अंडो के लिए इनका इंसानों द्वारा अवैध तरीके से शिकार किया जाता है |

इंडियन सॉफ्ट शेल टर्टल (निल्सोनिया गेंजेटिका), IUCN status : V, WLPA Sch.- I. (फोटो: अरुणिमा सिंह/ TSA- India)

 

2. निल्सोनिया हुरम (इंडियन पीकॉक सॉफ्ट शेल टर्टल) Nilssonia hurum (Indian peacock softshell turtle): यह नदियों एवं तालाबों में पाए जाने वाली नरम खोल की एक और प्रजाति है| यह प्रजाति लगभग 60 से.मी तक बड़ी होती है और मछली एवं घोंघे खाते है | इनके खोल पर 4 से 5 गोल  निशान देखे जा सकते हैं | यह एक बार में 20-38 अंडे देते हैं और अपने अंडे अगस्त से दिसंबर मास में देते हैं| यह प्रजाति राजस्थान में केवलादेव राष्ट्रीय वन्य जीव अभ्यारण्य एवं चम्बल नदी के कुछ हिस्सों में पाई जाती हैं| इस प्रजाति का शिकार मांस और अंडो के लिए किया जाता है।

इंडियन पीकॉक सॉफ्ट शेल टर्टल (निल्सोनिया हुरम), IUCN status : V, WLPA Sch.- I (फोटो: शैलेन्द्र सिंह/ TSA- India)

 

3. लिसेमिस पंक्टाटा (इंडियन फ्लेपशेल टर्टल) Lissemys punctata (Indian flapshell turtle): नदी, झीलों और तालाबों में पाए जाने वाली नरम खोल की एक छोटी प्रजाति है| यह प्रजाति लगभग 37 से.मी की होती है और टैडपोल, मछली और जल कुम्भी आदि खाते हैं।  यह प्रजाति सितंबर से  नवंबर मास में अंडे देते हैं और एक बार में 8- 14 अंडे देते हैं जिनमें से बच्चे तकरीबन 9 महीने में निकलते हैं । यह कछुआ पालने और इसके मांस के लिए अधिक मांग में हैं|  माना जाता है की इस प्रजाति की राजस्थान में 2 उप-प्रजातियां पायी जाती है ( लिसेमिस पंक्टाटा आंडर्सनी- Lissemys punctata andersonii और लिसेमिस पंक्टाटा पंक्टाटा – Lissemys punctata punctata) राजस्थान की लिसेमिस पंक्टाटा पंक्टाटा उप -प्रजाति इंडिया में पाए जाने वाली वाकी लिसेमिस पंक्टाटा पंक्टाटा से कुछ अलग बताई जाती है। इसलिए इस उप-प्रजाति पर आनुवंशिक अनुसंधान चल रहा जिससे इसके बारे में कुछ विशेष बातें पता लग सकती है।

 

इंडियन फ्लेपशेल टर्टल (लिसेमिस पंक्टाटा आंडर्सनी), IUCN status : LC, WLPA Sch: I, (फोटो: शैलेन्द्र सिंह/ TSA- India)

इंडियन फ्लेपशेल टर्टल (लिसेमिस पंक्टाटा पंक्टाटा ), IUCN status : LC, WLPA Sch: I, (फोटो: मेहुल सिंह तोमर)

 

4. चित्रा इंडिका (नेरो हेडेड सॉफ्ट शेल टर्टल) Chitra indica (Narrow headed softshell turtle): यह रेतीले किनारों वाली नदियों में पाए जाने वाले एक नरम खोल की बड़ी प्रजातियों में से एक है | वे नदी के तल पर मौजूद रेत में खुद को दफनाते हैं और मछलियां, मोलस्क, आदि का शिकार करते हैं | इस प्रजाति के कछु-ए 150 से.मी तक बढ़ सकते हैं और अगस्त-सितंबर मास में अंडे देते हैं। एक बार में यह प्रजाति 65 से 193 अंडे दे सकते हैं| वे अपने अंडे रेत में देते हैं और उनमें से बच्चे 40-70 दिनों में बाहर आते हैं। इनके मांस और अंडो के लिए इनका इंसानों द्वारा अवैध तरीके से शिकार किया जाता है |

नेरो हेडेड सॉफ्ट शेल टर्टल (चित्रा इंडिका), IUCN Status: EN, WLPA Sch.- II (फोटो: शैलेन्द्र सिंह/ TSA- India)

 

5. जियोक्लेमिस हैमिल्टोनी (स्पोटेड पोंड टर्टल) Geoclemys hamiltonii (Spotted pond turtle): झीलों और तालाबों में पाए जाने वाली सख्त खोल की एक छोटी प्रजाति है| इसका रंग काला होता है और इसके ऊपर पीले डॉट्स भी होते है। यह प्रजाति लगभग 41 से.मी तक बड़ी होती है और मछली,घोंघे, घास, फल एवं जलकुम्भी खाते है | भारत में यह प्रजाति अप्रैल-मई मास में लगभग 12-36 अंडे देते है और उनमें से बच्चे 50-60 दिनों में बाहर आते हैं। यह कछुआ इसके आकर्षक चित्तीदार पैटर्न के कारण पालने के लिए अधिक मांग में हैं|

स्पोटेड पोंड टर्टल (जियोक्लेमिस हैमिल्टोनी), IUCN status: EN, WLPA Sch. – I (फोटो: शैलेन्द्र सिंह/ TSA- India)

 

6. हार्देला थुरजी (क्राउंड रिवर टर्टल) Hardella thurjii (Crowned river turtle): यह नदी व उनकी छोटी और स्थिर शाखाओं में पाए जाने वाली सख्त खोल की एक बड़ी प्रजाति है। इसका रंग काला होता है और इसके मुँह पर 4 पीली-नारंगी रंग की धारियां देखी जा सकती है। इस प्रजाति की मादा कछुआ लगभग 61 से.मी तक बड़ी हो सकती है और नर लगभग 18 से.मी के हो सकते है। मुख्य तौर पर शाकाहारी होती है, इसलिए सब्ज़ी, फल, आदि खाते है। यह प्रजाति सितम्बर से जनवरी मास में अंडे देते है और एक बार में 30-100 अंडे दे सकते है। जिनमें से बच्चे निकलने में तकरीबन 9 महीने लगते है। इसके मांस की खपत और मछली पकड़ने के जाल में फसना उनके लिए सबसे बड़ा खतरा बनकर उभर के आया है।

क्राउंड रिवर टर्टल (हार्देला थुरजी), IUCN status: V, WLPA Sch: not listed (फोटो: शैलेन्द्र सिंह/ TSA- India)

 

7. बटागुर कछुगा (पेंटेड रूफ टर्टल) Batagur kachuga (Painted roofed turtle): यह रेतीले किनारों वाली नदियों में पाए जाने वाले एक सख्त खोल की बड़ी प्रजाति है। भारत में यह प्रजाति मुख्य तौर पे गंगा व उसकी सहायक नदियों में पायी जाती है। राजस्थान में यह प्रजाति चम्बल में देखी जा सकती है। इस प्रजाति में भी नर मादा से छोटे होते है, प्रजनन काल में वयस्क नर का मुँह चटक लाल, नीला और पीला रंग अपना लेता है। यह लगभग 56 से.मी तक बढ़ सकते है और शाखाहारी होते है, मुख्या तौर पर यह प्रजाति जलीय वनस्पती खाते है।  यह साल में दो बार अंडे देते है मार्च से अप्रैल और दिसंबर माह में, एक बार में करीब 11-30 अंडे देते है। इसके ऊपर मंडराता खतरा इसके मांस के सेवन और प्राकृतिक वास का नुकसान बने हुए है।

पेंटेड रूफ टर्टल (बटागुर कछुगा), IUCN status: CR, WLPA sch: I (फोटो: शैलेन्द्र सिंह/ TSA- India)

 

8. बटागुर ढोंगोका (थ्री-स्ट्राइपड रूफ टर्टल ) Batagur dhongoka (Three-striped roofed turtle)  : यह रेतीले किनारों वाली नदियों में पाए जाने वाले एक सख्त खोल की बड़ी प्रजातियों में से एक है | इस प्रजाति को इसके कवछ पे मौजूद 3 काली धारियों और आँखों के पार जाती पीली धारी से पहचाना जा सकता हैं।   भारत में यह प्रजाति मुख्य तौर पे गंगा व उसकी सहायक नदियों एवं चम्बल में पायी जाती है। इस प्रजाति की मादा कछुआ लगभग 48 से.मी तक बड़ी हो सकती है और नर लगभग 25.5 से.मी तक बढ़ सकते है। मुख्या तौर पर यह शाखाहारी होते है मगर इस प्रजाति के नर अवसरवादी मांसाहारी होते है।  यह मार्च से अप्रैल माह में अंडे देते है , एक बार में यह 21-35 अंडे तक दे सकते है जिनसे बचे निकलने में 56-89 दिन लगते है।  इसके ऊपर मंडराता खतरा भी इसके मांस के सेवन और प्राकृतिक वास का नुकसान बने हुए है।

थ्री-स्ट्रीप रूफ टर्टल (बटागुर ढोंगोका), IUCN status: CR, WLPA Sch: not listed (फोटो: भास्कर दिक्षित/ TSA- India)

 

9. पेंग्शुरा टेक्टा( इंडियन रूफड टर्टल) Pangshura tecta (Indian roofed turtle): ये कछुए ठहरे पानी वाली नदियों व नालों में पाए जाती है। इस प्रजाति के कई कछुए एक साथ धूप सेकते देखे जा सकते है। ये एक सख्त खोल की छोटी प्रजाति का कछुआ है। यह कछुआ लगभग 18 से.मी बड़े हो सकते है, यह किशोर अवस्था में मासाहारी होते है लेकिन व्ययस्क होते-होते शाकाहार अपना लेते है।  यह सितम्बर से नवंबर मास में एक कछुआ 5 से 10 अंडे  दे सकता है। यह उत्तर भारत और मध्य भारत में पाए जानी वाली प्रजाति है। इस प्रजाति का इस्तेमाल चीनी दवाइयों में और इसके आकर्षक रंगो के कारण पालने के लिए किया जाता है।

इंडियन रूफड टर्टल (पेंग्शुरा टेक्टा), IUCN status: LC, WLPA sch: I (फोटो: शैलेन्द्र सिंह/ TSA- India)

 

10. पेंग्शुरा टेंटोरिया (इंडियन टेंट टर्टल) Pangshura tentoria (Indian tent turtle): यह छोटी एवं बड़ी नदियों में पाए जाने वाली सख्त खोल की छोटी प्रजाति है। इसके ऊपर खोल के किनारो पर मौजूद गुलाबी धारी इसे वाकी पेंग्शुरा प्रजाति के कछुओं से अलग करती है। यह कछुआ लगभग 27 से.मी बड़े हो सकते है । इस प्रजाति के  किशोर एवं व्ययस्क नर मांसाहारी होते है, लेकिन इस प्रजाति के मादाएं पूरी तरह से शाकाहारी होती है। ये एक बार में 3-6 अंडे देते है जिनमे से बच्चे निकलने में 125-144 दिन लग सकते है। इस प्रजाति के नर और किशोर पालने के लिए पकडे जाते है।

इंडियन टेंट टर्टल (पेंग्शुरा टेंटोरिया), IUCN status: LC, WLPA sch.: Not listed (फोटो: रिषिका दुबला / TSA- India)

 

11. जियोचिलोन एलिगेंस (इंडियन स्टार टोरटोइस) Geochelone elegans (Indian star tortoise): स्टार टोरटोइस एक ज़मीनी कछुए की प्रजाति है जो खेतों के आस-पास अथवा वन में पाए जाते है। इनका खोल सख्त होता है और उसके ऊपर स्टार जैसा पैटर्न होता है। यह लगभग 38 से.मी जितना बड़ा हो जाता है  | पुरानी स्टडीज से पता चलता है कि स्टार टोरटोइस शाकाहारी है परन्तु इसे मृत जानवरों के अवशेषों को खाते हुए देखा गया है, स्टार टोरटोइस को मृत जीवो को खाते हुए भी देखा गया है | यह मार्च- जून एवं नवंबर माह में 2-10 अंडे देते है, जिनमे से बच्चे निकलने में 100-130 दिन लग सकते है।इन कछुओं की मांग पालने एवं काले जादू के लिए इस्तेमाल में लिए जाने की वजह से बढ़ती जा रही है। प्राकृतिक वास के नुकसान से भी इनके लिए खतरा बना हुआ है।

इंडियन स्टार टोरटोइस (जियोचिलोन एलिगेंस), IUCN status: V, WLPA sch.: IV (फोटो: अरुणिमा सिंह/ TSA- India)

 

भारतीय पौराणिक कथाओं के अनुसार ये कहा जाता है कि एक विशाल कछुए ने समुद्र मंथन के समय मंदराचल पर्वत के मंथन में बहुत बड़ी भूमिका का निर्वाह किया था , यही मुख्य कारण है कि इनकी तस्करी की जाती है | आज भी माना  जाता है कि  एक और मिथ  हैं कि कछुए के माँस से ट्यूबरक्लोसिस का उपचार होता है जिसके कारण इसका बहुत अधिक मात्रा में शिकार होता हैं | इनको माँस के लिए भी मारा जाता हैं | स्टार टोरटोइस को पालने के लिए अधिकांशत: अरावली की तलहटी एवं राजस्थान के अन्य वनों में से पकड़कर बेचा जाता है, इनकी मांग दीवाली के त्यौहार के दौरान सर्राफा व्यवसायियों के बीच बढ़ जाती है | संरक्षित क्षेत्रों में से होकर बाँध, उच्च मार्गों का निर्माण, बालू का खनन इनके लिए मुख्य खतरे हैं, टर्टल संरक्षण के लिए राजस्थान में भी जागरूकता पैदा किए जाने की अत्यधिक आवश्यकता है, अन्यथा हम देखेंगे कि राज्य से बहुत सारी प्रजातियाँ विलुप्त हो जाएँगी | 11 में से 07 प्रजातियों को वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 में (वन्यजीव संरक्षण अधिनियम स्थिति) अनुसूची-I एवं अनुसूची-IV में 1 के अंतर्गत अनुसुचिबद्ध किया गया है |

 

राजस्थान में कछुओं की बहुरूपता का बहुत अधिक अध्ययन नहीं हुआ है, इस बारे में अधिकांश जो अध्ययन हुआ है, वो चंबल एवं केवलादेव राष्ट्रीय पक्षी अभ्यारण्य में हुआ है, इसलिए यह अनुशंसा है कि कछुओं के संरक्षण हेतु विभिन्न कार्यक्रमों  के माध्यम से इनके निवास को संरक्षित एवं कछुओं पर गहन अध्ययन  किये जाने चाहिए।  |

 

बैनर चित्र : डॉ धर्मेंद्र खांडल  

ग्रेटर हूपु लार्क: तपते मरुस्थल का शोमैन

ग्रेटर हूपु लार्क: तपते मरुस्थल का शोमैन

ग्रेटर हूपु लार्क, रेगिस्तान में मिलने वाली एक बड़े आकार की लार्क, जो उड़ते समय बांसुरी सी मधुर आवाज व् खूबसूरत काले-सफ़ेद पंखों के पैटर्न, भोजन खोजते समय प्लोवर जैसी दौड़ और खतरा महसूस होने पर घायल होने के नाटक का प्रदर्शन करती है। इस के व्यवहार को देखने पर लगेगा जैसे आप कोई शानदार नाटक देख रहे हो।

ग्रेटर हूपु लार्क, एक छोटा पेसेराइन पक्षी जिसे राजस्थान की तेज गर्मी में झुलसते रेगिस्तान में रहना पसंद आता है तथा वर्षा ऋतू के आगमन के साथ ही इसका प्रजनन काल शुरू हो जाता है, जिसमें नरों द्वारा एक ख़ास प्रकार की उड़ान का प्रदर्शन किया जाता है नर बांसुरी व् सीटी जैसी आवाज करते हुए धीमी गति में उड़ते हैं और इसी आवाज के कारण इसे “हूपु लार्क” कहा जाता है। इस पक्षी को “लार्ज डेजर्ट लार्क” के नाम से भी जाना जाता है, परन्तु यह एक बेहद चतुर पक्षी होता है जो शिकारी को देखते ही उसे भर्मित करने के लिए घायल होने का नाटक कर ज़मीन पर गिर जाता है। रेगिस्तानी पर्यावास में जब यह ज़मीन पर होता है तो इसे देख पाना मुश्किल है क्योंकि इसके शरीर का रेतीला-भूरा रंग इसे परिवेश में छलावरण करने में मदद करता है, परन्तु जब यह उड़ान भरता है तो इसके पंखों के काले-सफ़ेद रंग के पैटर्न से इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। इसके पंखो का यह पैटर्न किसी भी अन्य लार्क प्रजाति से अद्वितीय है। अपनी लम्बी टांगों से तेजी से एक प्लोवर की तरह भागते हुए अपनी छोटी, पतली व् तीखी चोंच से यह मिटटी को खोद कर तो कभी खुरच कर छोटे कीटों को ढूंढ अपना शिकार बनाते हैं।

निरूपण (Description):

ग्रेटर हूपु लार्क, “Alaudidae” परिवार का सदस्य है, इसका वैज्ञानिक नाम Alaemon alaudipes है जो एक ग्रीक भाषा के शब्द alēmōn से लिया गया है तथा इसका अर्थ “घुमक्कड़” होता है। पहले इसे Upupa और Certhilauda जीनस में रखा गया था परन्तु वर्ष 1840 में बाल्टिक जर्मन भूवैज्ञानिक व् जीवाश्म वैज्ञानिक “Alexander Keyserling” और जर्मन जीव वैज्ञानिक “Johann Heinrich Blasius” द्वारा Alaemon जीनस बनाया गया तथा इसे इसमें रखा गया।

ग्रेटर हूपु लार्क का चित्र (Nicolas, H. 1838)

ग्रेटर हूपु लार्क को शुष्क व् अर्ध-शुष्क मरुस्थलीय परिवेश में रहना पसंद होता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

यह लार्क आकार में बाकि लार्क प्रजातियों से अपेक्षाकृत बड़ी होती है। शरीर का ऊपरी भाग रेतीला-भूरा और अंदरूनी भाग सफ़ेद-क्रीम होता है। इसके पैर लम्बे व् इसकी चोंच पतली-लम्बी और हल्की सी नीचे की ओर घुमावदार होती है। इसके चेहरे पर चोंच के आधार से होते हुए आँखों के पास से एक काली रेखा निकलती है तथा आँखों पर सफ़ेद भौंहें होती है। छाती के पास कुछ काले धब्बे होते हैं। उड़ते समय इसके सफ़ेद किनारों वाले काले पंखों का पैटर्न और बाहरी काले पंख वाली सफ़ेद पूँछ स्पष्ट दिखाई देता है। नर व् मादा दोनों दिखने में लगभग समान होते हैं, हालांकि मादा, नर की तुलना में छोटी होती हैं और छाती पर काले धब्बे कम होते हैं।

उड़ते समय इसके पंखो पर काले-सफ़ेद रंग का पैटर्न स्पष्ट दिखाई देते है जिसके कारण इसको तुरंत पहचाना जा सकता है। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

वितरण व आवास (Distribution & Habitat):

बहुत ही व्यापक वितरण होने के कारण इसकी कई आबादी पायी जाती हैं जिन्हें चार उप-प्रजाति के रूप में नामित किया गया है, तथा भारत में Eastern greater hoopoe-lark (A. a. doriae) उप-प्रजाति पायी जाती है जो राजस्थान व् गुजरात में ही पायी जाती है। राजस्थान में यह थार रेगिस्तान के रेट के टीलों, शुष्क व् अर्ध-शुष्क छोटी झाड़ियों वाले खुले इलाकों में पायी जाती है। ग्रेटर हूपु लार्क रेगिस्तानी, अत्यंत गर्म व् शुष्क वातावरण में पाया जाता है, और यह 50 डिग्री सेल्सियस तक के तापमान में जीवित रहने में सक्षम है। क्योंकि प्रकृति ने इसे इस वातावरण में रहने के लिए अनुकूलन प्रदान किया है। इसकी लम्बी टाँगे इसके शरीर को गर्म ज़मीन से ऊपर रखती हैं और अधर भाग का सफ़ेद रंग जमीन की गर्मी को वापस प्रतिबिंबित करता है। चीते की तरह इसकी आँखों के पास लम्बी काली रेखा होती है। गर्मियों में कभी-कभी जब सतह का तापमान असहनीय हो जाता है, तो ऐसे में ग्रेटर हूपु लार्क खुद को पानी की कमी होने से बचाने के लिए सांडा छिपकली के बिल में छुप जाती है। छिपकली शाकाहारी होती है इसलिए इसे किसी भी प्रकार का खतरा नहीं होता है।

व्यवहार एवं पारिस्थितिकी (Behaviour and ecology):

राजस्थान के थार रेगिस्तान में ग्रेटर हूपु लार्क को अकेले या जोडों में भोजन की तलाश करते हुए देखा जा सकता है, जहाँ ये टहलते, दौड़ते व् उछलते-कूदते हुए जमीन को अपनी छोटी चोंच से खोदते हुए विचरण करते हैं। यह छोटे कीटों, छिपकलियों और विभिन्न प्रकार के बीजों को खाते हैं तथा इन्हें कवक (Fungi) को खाते हुए देखा गया है। घोंघों का खोल तोड़ने के लिए, कई बार इसे घोंघों को ऊपर से किसी सख्त सतह पर गिराते या फिर उन्हें लगातार किसी पत्थर पर पीटते हुए भी देखा गया है। जीव विशेषज्ञ डॉ धर्मेंद्र खांडल ने अपने एक आलेख में इसके द्वारा “डेजर्ट मैंटिस (Eremiaphila rotundipennis)” के शिकार किये जाने के एक की घटना की व्याख्या की है।

यह जमीन को खोद कर छोटे कीटों को अपना शिकार बनाते हैं।(फोटो: श्री नीरव भट्ट)

इनका प्रजनन काल मुख्यरूप से पहली बारिश के बाद लगभग मार्च से जुलाई माह तक रहता हैं। कई बार देर से बारिश आने पर अगस्त में भी इनका प्रजनन देखा गया है। प्रजनन काल में नर मादा को आकर्षित करने के लिए एक बहुत सुन्दर उड़ान का प्रदर्शन करते हैं, जिसमें वह धीरे-धीरे पंखों को फड़फड़ाते हुए ऊपर की ओर उड़ान भरते हैं और फिर पंखो को बंद किये नीचे की ओर आते हैं। नर लगभग 15 – 20 फीट तक ऊपर जाते हैं, और फिर बांसुरी व् सीटी जैसी आवाज की एक श्रृंखला के साथ धीरे-धीरे नीचे की ओर आते हैं तथा एक छोटी झाडी पर बैठ जाता है। धीमी गति में उड़ते समय जो बांसुरी व् सीटी जैसी आवाज करने के कारण ही इसे “हूपु लार्क” कहा जाता है।

प्रजनन काल में नर मादा को आकर्षित करने के लिए एक बहुत सुन्दर उड़ान का प्रदर्शन करते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

इस ख़ास उड़ान में नर धीरे-धीरे पंखों को फड़फड़ाते हुए ऊपर की ओर उड़ान भरते हैं और फिर पंखो को बंद किये नीचे की ओर आते हैं। (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)

छोटी टहनियों से बना हुआ इसका घोंसला एक कप के आकार का होता है जो छोटी झाड़ी के नीचे व् कभी-कभी ज़मीन पर ही रखा होता है। इसके चूज़े बहुत ही तेजी से बड़े होते हैं तथा उड़ना सीखने से पहले ही इनको इधर-उधर भागते हुए देखा जा सकता है। ज़मीन पर घोंसला व् चूज़ों का चंचल स्वभाव होने के कारण इनको कई प्रकार के शिकारी जीवों जैसे की छिपकली, गीदड़, लोमड़ी, चूहे और सांप का सामना करना पड़ता है। जब भी हूपु लार्क किसी प्रकार के शिकारी को अपने घोंसले की ओर बढ़ते देखती है, तो वह शिकारी को विचलित करने के लिए घायल या चोट का नाटक करती है। घोंसले से थोड़ी दूर पर ये ऐसे फड़फड़ाती है जैसे वह उड़ नहीं सकती, इस परिस्थिति में शिकारी को यह एक आसान शिकार महसूस होती है और शिकारी घोसले को छोड़ इसकी और बढ़ता है। शिकारी को पास आता देख यह कुछ दूर उड़ कर फिर से नीचे गिर जाती है और शिकारी इसको पकड़ पाने के विश्वास में उसकी और बढ़ता रहता है। ऐसा कई बार होता है और जब लार्क शिकारी को घोसले से दूर ले जानें सफल हो जाती है तो तुरंत उड़ कर वापिस घोंसले के पास आ जाती है।

ग्रेटर हूपु लार्क में नर व् मादा दोनों ही चूजों की देख-रेख में बराबर भूमिका निभाते हैं।(फोटो: श्री नीरव भट्ट)

संरक्षण स्थिति (Conservation status):

ग्रेटर हूपु लार्क की वैश्विक आबादी निर्धारित नहीं की गई है परन्तु इसकी आबादी का चलन कम होता दिखाई दे रहा है क्योंकि इसकी पूरी वितरण सीमा में इसके सामान्य से असामान्य होने की सूचनाएं मिली हैं। इसका विस्तार बहुत ही व्यापक है तथा अन्य मापदंडों के अनुसार अभी यह संकटग्रस्त होने की सीमा रेखा से कोसों दूर है। इसीलिए इसे IUCN द्वारा Least Concern श्रेणी में रखा गया है।

तो इस बार वर्षा ऋतू में राजस्थान आइये और इसकी मधुर आवाज व् उड़ान की खूबसूरती को देख पाने की कोशिश कीजिये।

सन्दर्भ:
  • Nicolas, H. 1838. Nouveau recueil de planches coloriées d’oiseaux. Vol III
  • Oates, EW (1890). Fauna of British India. Birds. Volume 2. Taylor and Francis, London. pp. 316–318.