राजस्थान सरीसृपों के लिए स्वर्ग के सामान है। कई प्रकार के विषैले और अविषैले सांप यहाँ विचरण करते हैं। मेरे अनुसार लगभग 40 प्रकार की विभिन्न प्रजातियां अथवा उपप्रजातियाँ यहाँ पाई जाती हैं। इन सबमें तूतिया सांप Lytorhynchus paradoxus (GÜNTHER, 1875), इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि यह राजस्थान के थार मरुस्थल की एक स्थानिक (Endemic) प्रजाति है, यानि यह थार के अलावा और कहीं नहीं मिलती है। जीनस Lytorhynchus में 6 प्रजातियों के सर्प मिलते हैं जिनमे भारत में केवल Paradoxus ही मिला है।
अल्बर्ट कार्ल गुंथर नामक एक जर्मन ब्रिटिश सर्प वैज्ञानिक ने सर्वप्रथम 1875 में तूतिया सर्प की खोज सिंध क्षेत्र में की, जो वर्तमान में पाकिस्तान का हिस्सा है। गुंथर एक अत्यंत मेधावी सरीसृप वैज्ञानिक थे, जिन्होंने 340 सरीसृपों को नाम दिया एवं उनकी खोज की। उनसे अधिक सरीसृपों की खोज जॉर्ज अल्बर्ट बोलेन्गेर नामक वैज्ञानिक ने की है जिन्होंने 587 प्रजातियों का विश्लेषण किया एवं उन्हें नाम दिया था। खैर हम बात कर रहे हैं तूतिया सांप की जो थार मरुस्थल के रेतीले हिस्से में मिलते हैं।थार मरुस्थल में कई प्रकार के पर्यावास (habitat) मिलते हैं जैसे की कठोर सतह वाला सपाट मैदान, बलुई टीले अथवा पथरीले ऊबड़खाबड़ स्थल I बलुई टीले भी दो प्रकार के होते है एक वह जो अपना स्थान तेज हवाओ और आँधियो में बदलते रहते है दूसरे वह जो एक जगह ठोस जमे रहते हैं I तूतिया सांप,अधिकांशतया स्थान बदलने वाले मुलायम बालू वाले रेत के टीलों में विचरण करता है I रोचक बात यह है की यह सांप मिट्टी की सतह के नीचे ऐसे चलता है मानो तैर रहा हो। पाकिस्तान के प्रसिद्ध सरीसृप वैज्ञानिक डॉ शर्मन मिंटो ने Lytorhynchus paradoxus के सन्दर्भ में लिखा की यह बलुई रेत केअस्थाई टीलों में जो की हवा से अपना स्थल बदलते रहते हैं, पाए जाते हैं, यह स्थान समुद्रतल से 500 मीटर की ऊंचाई तक हो सकते हैं।
खतरा महसूस होने पर यह सांप ‘8’ का आकर ले लेता हैफोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल
यह सांप अक्सर 8-14 इंच लम्बा एवं पतले मुंह एवं सिर वाला होता है। यह सर्प पूर्णतया रात्रिचर सर्प है। जब यह खतरा महसूस करता है तो कभी ‘8’ का कभी ‘S’ का आकार बनाकर तो कभी एक स्प्रिंग के सामान अपने शरीर को ऊपर उठाकर एक विशेष तरह का कम्पन्न पैदा करते हुए हल्की हिसिंग की ध्वनि पैदा करता है। इस दौरान यह अपना सिर अकसर नीचे रखते हुए छिपाता रहता है। यह इसके बचाव करने एवं आक्रामक दिखने की मुद्रा है। चूंकि यह अविषैला सर्प है,अतः इसे अपने बचाव के लिए कई प्रकार के अन्य तरीके निकालने पड़ते हैं।
आठ का आकार बनाये हुए तूतिया सांप फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल
राजस्थान में यह सर्प सर्वप्रथम अगस्त 2004 में मेरे द्वारा गोगा देव के मेले में चूरू जिले में देखा गया जो पास के ही एक गाँव गाजसर से लाया गया था।गोगा देव मेले में ग्रामीण कई प्रकार के सांपों को अपने गाँवों से चूरू शहर में लेकर आते हैं। तत्पश्चात उसी दिन मुझे यह सीकर जिले के रामगढ़ शेखावाटी कस्बे के पास धोरों में भी दिखा, यह क़स्बा मेरा पैतृक स्थान भी है तूतिया सर्प की खोज इसलिए महत्वपूर्ण थी क्योंकि इसके पूर्व में यह सर्प केवल मात्र पाकिस्तान से ही रिपोर्ट किया गया था । पाकिस्तान में यह जंगीपुर, जंगशाही,फतेहपुर,बारां,नाइ,जमराओ,बुर्रा,उमरकोट,थार एवं पारकर क्षेत्र से रिपोर्ट किया गया था। यह थार मरुस्थल के पश्चिमी छोर के हिस्से हैं,जो वर्तमान में पाकिस्तान के हिस्से हैं। मैंने इन्ही सांपों को राजगढ़-चूरू के राजमार्ग पर अधिक संख्या में उस दिन देखा जब अत्यधिक गर्मी वाले अप्रैल महीने में एक चक्रवाती वर्षा हुई।उस दिन रात्रिचर माने जाने वाले ये सांप शाम के 4 बजे उस राजमार्ग पर निकले और लगभग 8-9 की संख्या में वाहनों से कुचलने से मरे हुए मिले। यद्यपि कुछ वर्षों में यह सर्प राजस्थान के कुछ और इलाके जैसे जैसलमेर, बीकानेर एवं बाड़मेर जिलों में भी देखा गया है।यह सर्प टीलों पर रेंगने वाली छोटी छिपकली को अपना शिकार बनाता है। इस छिपकली का रंग रूप भी इस सर्प के समान दिखता है। इसका शिकार एवं खुद यह प्रजाति मुलायम सूखी बलुई रेत में ही रहने के लिए विकसित हुई है,यदि इस पर्यावास में निरंतर अधिक मात्रा में पानी से सिंचाई आदि की जाये तो, यह उस स्थान से विलुप्त हो जायेगा।
References
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Günther A. 1875. “Second Report on Collections of Indian Reptiles obtained by the British Museum”. Proc. Zool. Soc. London 1875: 224-234. (Acontiophis paradoxa, new species, pp. 232–233, Figure 5).
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Murray JA. 1884. “Additions to the Reptilian Fauna of Sind”. Ann. Mag. Nat. Hist., Fifth Series 14: 106-111.
ग्रीन मुनिया लाल चोंच वाली, पृष्ठ भाग पर हरे रंग की भिन्न-भिन्न आभा लिये, छोटे आकार की ‘‘फिंच‘‘ परिवार की अत्यंत आकर्षक पक्षी है जिसका अधर भाग पीले रंग की कांति के साथ, पार्श्व भाग श्वेत-श्याम धारियां युक्त होता है। इसकेअंग्रेजी नाम के उद्भव के पीछे एक रोचक बिन्दु है। यूरोपीय ने इन फिंच पक्षियों को अहमदाबाद (गुजरात) के निकट देखकर इन्हें ‘‘अहमदाबाद‘‘ पक्षी का नाम दिया जिसका समयोपरांत अपभ्रंश स्वरुप वर्तमान नाम ‘‘एवाडेवट‘‘ हो गया। पारम्परिक नाम ‘‘मुनिया‘‘ भी भारतीय परिप्रेक्ष्य में बालिका को परिभाषित करता है।राज कपूर की फिल्म ‘‘तीसरी कसम‘‘ के पारम्परिक गीत आधारित गाने, ‘‘चलत मुसाफिर मोह लियो रे पिंजरे वाली मुनिया…..‘‘ में इसकी सुन्दरता का विवरण प्रस्तुत किया गया है।
प्रथमतः सन 1790 में लेथम द्वारा इसे फ्रिन्जिला फोरमोसा के रूप में वर्णन किया गया। सन 1926 में बेकर(1926) ने पुनः इसे स्टिक्टोस्पिजा फोरमोसा तथा रिप्ले (1961) व अली-रिप्ले (1974) ने एस्ट्रिलडा फोरमोसा के रूप में वर्णित किया। तत्पश्चात पक्षीविदों (इंस्किप et al 1996, ग्रीमिट et al. 1999, काजरमिर्कजेक व वेन पर्लो 2000, रेसमुसन व एंडर्टन 2005) द्वारा इसे इसके वर्तमान वैज्ञानिक नाम अमंडावा फोरमोसा के रूप में ही उल्लेखित किया गया।
गोरैया के समतुल्य लगभग 10 से.मी. लम्बाई के पंछी जिसमें नर का रंग अधिक चमक लिए होता है। ग्रीन मुनिया सामान्यतः भिन्न-भिन्न संख्या के समूह में दिखाई देती हैं। अक्सर भोजन लेते समय बड़े समूह छोटे-छोटे समूहों में बिखर जाते हैं। मुनिया प्रजाति में प्राकृतिक खुले हुए व पुनःउत्पादित वृहद् स्तर की आवासीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूलन की असीम क्षमता है। परन्तु पसंदीदा आवासीय संरचना में मुख्यतः लम्बी घास जैसे गन्ने, मूँज युक्त कृषि क्षेत्र व घनी झाड़ियों (जिसमें लेन्टाना भी सम्मिलित) वाले क्षेत्रआते हैं। ग्रीन मुनिया के भोजन में सामान्यतः छोटे कोमल शाक व बीज तथा पौधों के अन्य मुलायम भाग होते हैं। ग्रीन मुनिया का स्वर दुर्बल, उच्च-कोटि की चहचहाट होती है तथा उड़ान अथवा साथियों से दूर होने पर पायजेब की झंकार जैसी ‘‘स्वी, स्वी‘‘ एवं भोजन लेते समय ‘‘चर्र,चर्र‘‘ की ध्वनि सुनाई देती है। प्रजनन ग्रीष्म व शीत दोनों ऋतुओं में देखा गया है परन्तु प्रजनन काल व नीड़न काल के विस्तृत अध्ययन की नितान्त आवश्यकता है। मुनिया के घोंसले प्याले समान लम्बी घास या गन्नों या घनी झाड़ियों के मध्य होते हैं। एक समय में यह 5-6 अंडे देती हैं। ग्रीन मुनिया में लम्बी दूरी का अथवा तुंगता प्रवसन नहीं होता है।शीतकाल में घनी झाड़ियों केआवास झाड़ियों के अधिक पसंद किया जाता है।
पेड़ों पर बैठी हुई ग्रीन मुनिया फोटो श्री सत्यप्रकाश एवं श्रीमती सरिता मेहरा
ग्रीन मुनिया विश्वस्तर पर संकटग्रस्त भारत की स्थानिक प्रजाति है। वर्तमान में अन्य राज्यों की अपेक्षा राजस्थान में इसकी स्थिति अच्छी है। इस प्रजाति के अस्तित्व पर संकट को भांपते हुए उन्नीस सौ अस्सी के दशक के अन्तिम वर्षों में इसे आई.यू.सी.एन.की लाल सूची में रखा गया एवं उन्नीस सौ नब्बे के दशक के प्रारम्भिक वर्षों में इसे संकटापन्न (Vulnerable) स्तर में सम्मिलित किया। सुरक्षा हेतु इस प्रजाति को भारत के वन्यजीव(सुरक्षा) अधिनियम 1972 की अनुसूची IV तथा अन्तर्राष्ट्रीय संकटग्रस्त प्रजाति व्यापार समझौता (CITES) के परिशिष्ट II में रखा गया है। शोधकार्यों से यह विदित है कि भारतीय उपमहाद्वीप में इसकी अनुमानित सँख्या 10,000 से भी कम है।
सन 2000 पूर्व अली व रिप्ले (1974) के अनुसार बीसवीं शताब्दी में हरी मुनिया का वितरण मध्य भारत में एक पट्टे के रूप में प्रदर्शित भूभाग में हुआ करता था जिसकी पश्चिमी सीमा राजस्थान के दक्षिणी अरावली, पूर्वी सीमा तटीय ओडिशा, उत्तरी सीमा दिल्ली व तराई (उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार) क्षेत्र तथा दक्षिणी सीमा उत्तरी महाराष्ट्र व उत्तरी आन्ध्र प्रदेश तक फैली हुई थी। जहाँ उन्नीसवीं शताब्दी के अन्त में ब्रिटिश प्रकृति खोजियों के अनुसार इस प्रजाति के वितरण उपरोक्त समूचे क्षेत्र में था वहीं दूसरी और बीसवीं शताब्दी के अन्तिम दशक में भारतीय पक्षिविदों द्वारा अनेक क्षेत्रों से इसके स्थानीय विलोपन का उल्लेख मिलता है।
अपने आवास में ग्रीन मुनिया फोटो श्री सत्यप्रकाश एवं श्रीमती सरिता मेहरा
सन 2000 पश्चात–सन 2000 पश्चात वितरण क्षेत्र में अनेक ऋणात्मक परिवर्तन हुए।अनेेक पक्षीअवलोककों द्वारा उनके स्थानों से इस प्रजाति का स्थानीय विलोपन अथवा अपुष्ट उपस्थिति को उल्लेखित किया गया।लेखकों द्वारा आबू में लिए गए प्रेक्षणों में पाया गया है कि ग्रीन मुनिया ने प्राकृतिक आवासीय परिस्थितियों में बाहरी वनस्पति के आगमन एवं स्थापन से हुए परिवर्तन में भी अनुकूलन कर लिया है (विशेषकर लेन्टाना के सन्दर्भ में) ।अतःआवासीय परिस्थितियों में मानवीय हस्तक्षेप विशेषकर शहरी विस्तारण जो हरे क्षेत्रों को समाप्त कर रहा है अथवा मुनिया के आवासों का विखण्डन कर रहा है तथा पक्षी व्यापार मुख्य चिंतन के विषय हैं ।
वैश्विक स्तर के सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) की प्राप्ति हेतु ऐसे स्थानिक-विशेष संरक्षण कार्यक्रम तथा नीतियों का समावेश होना चाहिये जो आमजन को उनके पारम्परिक संरक्षण व्यवहार से जोड़ सके। भारतीय संस्कृति के ‘‘प्रकृति-पुरूष’’ के सिद्धान्त में निहित प्रकृति और मानव के सह-सम्बन्धों को परम्परागत रीति-रिवाजों में देखा जा सकता है। इसी सिद्धान्त को ध्यान में रखकर लेखकों द्वारा आबू की वादियों में जन-सहभागिता के माध्यम से ग्रीन मुनिया के संरक्षण कार्याें को सन 2004 में प्रारम्भ किया गया। इसके तहत उन स्थानीय युवाओं व शिकारियों को प्रकृति मार्गदर्शक कार्यक्रम से जोड़ा जो स्वयं की इच्छा से संरक्षण में भागीदार बनना चाहते थे। तत्पश्चात उनका पारम्पारिक ज्ञान व आधुनिक विज्ञान को जोड़कर उन्हें प्रशिक्षित किया गया। इनके माध्यम से आमजन जो शहरी क्षेत्र व मुनिया के आवासीय स्थानों के समीप निवास कर रहे हैं, उनको इस प्रजाति के महत्व एवं स्थिति के विषय में संवेदनशील किया गया। परिणामतः सन 2004 में जब यह कार्य आरम्भ किया तब आबू पर्वत के चिन्हित स्थलों पर ग्रीन मुनिया की सँख्या चार सौ से भी कम थी जो सन 2019 के अन्त में पाँच गुना अधिक हो चुकी है। इस प्रकार यह स्थानीय कार्य अन्तर्राष्ट्रीय सोच के साथ सतत विकास लक्ष्यों (SDGs 1,8,11व 13) को चरितार्थ करने में एक सूक्ष्म कदम है जिसके तहत मुनिया एवं उसकेआवासों की सुरक्षा व संरक्षण तथा स्थानीय युवाओं को प्रकृति अवलोकन के द्वारा जीविकोपार्जन उपलब्ध हो रहा है।
आभार
लेखक आभारी है आबू में ग्रीन मुनिया के आवासीय स्थानों के समीप निवास कर रहे सभी आमजन जो प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से मुनिया एवं उसके आवासों की सुरक्षा व संरक्षण में भागीदार हैं। विशेष धन्यवाद के पात्र जो टीम के सदस्यों के रूप में अपनी भूमिका निभा रहे हैं – श्री अजय मेहता, श्री प्रदीप दवे, श्री सलिल कालमा, श्री सन्दीप, श्री प्रेमाराम, श्री राजु, श्री हेमन्त सिंह आदि।
एंडेमिक प्राणी वे प्राणी हैं जो एक स्थान विशेष में पाए जाते हैं । राजस्थान भारत का सबसे बड़ा राज्य है। यह राज्य न केवल वनस्पतिक विविधता से समृद्ध है बल्कि विविध प्रकार के प्राणियों से भी समृद्ध है। इस राज्य में विभिन्न प्रकार के आवास, प्रकृति में हैं जो कि जीव-जंतुओं की विविधता एवं स्थानिकता (Endemism) के अस्तित्व को सुनिश्चित करते हैं। साथ ही कई प्रकार के एंडेमिक प्राणी यहाँ मिलते हैं। अपृष्ठवंशी जीवों से लेकर स्तनधारी जीवों तक कई स्थानिक प्रजातियां एवं उप-प्रजातियां राजस्थान की भौगोलिक सीमा के भीतर पायी जाती हैं। जीव-जंतुओं की स्थानिकता की एक अच्छी झलक अली और रिप्ले (1983), घोष एवं साथी (1996), गुप्ता और प्रकाश (1975), प्रकाश (1973) एवं शर्मा (2014,2015) के शोध द्वारा मिलती है।
कई प्रजातियाँ राजस्थान के थार रेगिस्तान, गुजरात और पाकिस्तान के लिए स्थानिक हैं तो वहीं कई प्रजातियां राजस्थान के अन्य हिस्सों और आसपास के राज्यों के कुछ हिस्सों में स्थानिक हैं। जो प्रजातियां, उप-प्रजातियां एवं किस्में मुख्य रूप से राजस्थान राज्य की भौगोलिक सीमाओं के लिए विशेष रूप से स्थानिक हैं उनको नीचे सारणी में प्रस्तुत किया गया है:
S.No.
Species/sub-species
Taxonomic group
1.
Rogerus rajasthanensis
Porifera (Sponge)
2.
Orentodiscus udaipurensis
Platyhelminthes (Trematode)
3.
Thapariella udaipurensis
Platyhelminthes (Trematode)
4.
Neocotylotretus udaipurensis
Platyhelminthes (Trematode)
5.
Indopseudochinostomus rajasthani
Platyhelminthes (Trematode)
6.
Triops (Apus) mavliensis
Platyhelminthes (Trematode)
7.
Artemia salina
Arthropoda (Crustacea)
8.
Branchinella biswasi
Arthropoda (Crustacea)
9.
Leptestheria jaisalmerensis
Arthropoda (Crustacea)
10.
L. longimanus
Arthropoda (Crustacea)
11.
L. biswasi
Arthropoda (Crustacea)
12.
Sevellestheria sambharensis
Arthropoda (Crustacea)
13.
Incistermes dedwanensis
Arthropoda (Termite)
14.
Microcerotermes laxmi
Arthropoda (Termite)
15.
Micorcerotermes raja
Arthropoda (Termite)
16.
Angulitermes jodhpurensis
Arthropoda (Termite)
17.
Microtermes bharatpurensis
Arthropoda (Termite)
18.
Eurytermes mohana
Arthropoda (Termite)
19.
Tentyria rajasthanicus
Arthropoda (Beetle)
20.
Mylabris rajasthanicus
Arthropoda (Beetle)
21.
Buthacus agarwali
Arthropoda (Scorpion)
22.
Octhochius krishnai
Arthropoda (Scorpion)
23.
Androctonus finitimus
Arthropoda (Scorpion)
24.
Baloorthochirus becvari
Arthropoda (Scorpion)
25.
Compsobuthus rogosulus
Arthropoda (Scorpion)
26.
Odontobuthus odonturus
Arthropoda (Scorpion)
27.
Orthochirus fuscipes
Arthropoda (Scorpion)
28.
O. pallidus
Arthropoda (Scorpion)
29.
Vachonus rajasthanicus
Arthropoda (Scorpion)
30.
Apoclea rajasthansis
Arthropoda (Dipetra)
31.
Oxyrhachis geniculata
Arthropoda (Hemipetra)
32.
Diphorina bikanerensis
Arthropoda (Hemipetra)
33.
Ceroplastes ajmeransis
Arthropoda (Coccid)
34.
Kerria chamberlinii
Arthropoda (Coccid)
35.
Labeo rajasthanicus
Chordata (Fish)
36.
Labeo udaipurensis
Chordata (Fish)
37.
Nemacheilus rajasthanicus
Chordata (Fish)
38.
Aphanius dispar
Chordata (Fish)
39.
Bufoniceps laungwalansis
Chordata (Agama)
40.
Saxicola macrorhyncha
Chordata (Bird)
41
Salpornis spilonotus rajputanae
Chordata (Bird)
विभिन्न स्थानिक वर्गों की एक झलक
S.No.
Taxa /group
Number of species
1.
Sponge
1
2.
Trematoda
4
3.
Crustacea
7
4.
Termite
6
5.
Beetle
2
6.
Scorpion
9
7.
Diptera
1
8.
Hemiptera
2
9.
Coccids
2
10.
Fish
4
11.
Agama
1
12.
Birds
2
Total
41
राजस्थान में किसी भी प्रकार की प्रभावी बाधाएं नहीं हैं, इसलिए राज्य में अधिक स्थानिकवाद विकसित नहीं हुआ है। कोई भी प्राणी वंश यहाँ स्थानिक नहीं पाया गया है।पहले कई प्रजातियों को राजस्थान की एंडेमिक प्रजाति माना जाता है लेकिन समान जलवायु एवं आवासीय परिस्थितियों के कारण उनकी उपस्थिति अन्य भारतीय राज्यों एवं पाकिस्तान के कुछ सुदूर हिस्सों में होने की सम्भावना है। हमें राज्य की एंडेमिक प्रजातियों की स्थिति का मूल्यांकन करने के लिए अधिक सटीक सर्वेक्षण और शोध की आवश्यकता है।
References
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Sharma, S.K. (2014): Faunal
and Floral endemism in Rajasthan.
Sharma, S.K. (2015): Faunal
and floral in Rajasthan. Souvenir, 18th Birding fair, 30-31 January
2015, Man Sagar, Jaipur
साकेर फाल्कन, भारतीय उपमहाद्वीप में पाए जाने वाला सबसे बड़ा फाल्कन है। एक शिकारी के रूप में यह अपनी ताकत, शिकार करने के तरीके एवं तेज गति के कारण, सदियों से जाना जाता रहा है ।
नवीनतम विश्लेषण के आधार पर इसे IUCN की रेड सूची में लुप्तप्राय प्रजाति के रूप में सूचीबद्ध किया गया है जो इसकी संख्या में तेजी से गिरावट का संकेत देता है। आईयूसीएन के अनुसार यह मानवीय गतिविधियों जैसे बिजली लाइनों से करंट लगने, व्यापार के लिए पकड़ने, लगातार घटते पर्यावास और रासायनिक कीटनाशकों के कारण कम हो रहे हैं, यह गिरावट विशेष रूप से मध्य एशियाई प्रजनन मैदानों में अधिक देखी गयी है।
शिकार के साथ साकेर फाल्कन फोटो:नीरव भट्ट
साकेर फाल्कन, बड़े आकार व भूरे रंग का फाल्कन होता हैं। हालांकि भारत में साकेर फाल्कन की कई उप-प्रजातियां हैं, परन्तु हमें 2 ही प्रकार देखने को मिलती हैं। लद्दाख में पायी जाने वाली आबादी को अक्सर अल्ताई साकेर के नाम से जाना जाता है, जिसका रंग गहरा भूरा व ऊपरी पंखो पर दामी रंग की पट्टियां होती हैं। वहीं थार रेगिस्तान में पाए जाने वाला साकेर, नाममात्र प्रवासी उप-प्रजातियां हैं और जो अल्ताई साकेर की तुलना में अधिक भूरे रंग की होती हैं।इस फाल्कन को गहरे रंग के ऊपरी भाग और हल्के रंग के अंदरूनी भाग से आसानी से पहचाना जा सकता है। वहीं बच्चो में अंदरूनी भाग पर भूरे रंग की धारिया तथा वयस्कों में भूरे रंग की बूंदों के निशान होते है। कई बार यह समान दिखने वाली अन्य प्रजातियों जैसे लगर फाल्कन और पेरेग्रीन फाल्कन के बच्चे जैसा प्रतीत होता है। परन्तु निम्नलिखित बातों का ध्यान रख कर इसकी पहचान की जा सकती है।
इसमें लगर और जुवेनाइल पेरेग्रीन फाल्कन की तुलना में कम moustachial stripe होती है।
लगर और जुवेनाइल पेरेग्रीन फाल्कन की तुलना में इसका शरीर अधिक भारी और पंख चौड़े होते हैं
जुवेनाइल पेरेग्रीन में सिर गहरे रंग, अंदरूनी भाग पर समान रूप से खड़ी धारियाँ, मलेर पट्टी और नुकीले व गहरे रंग के पंख होते हैं जबकि साकेर फाल्कन के सिर हल्का पीला व पेरेग्राइन की तुलना में थोड़ा भारी होता है तथा सिर पर गोल व मटमैले रंग के पंख होते हैं।
लगर फाल्कन समान रूप से गहरे भूरे रंग के होते हैं जिसमें पूंछ और ऊपरी पंखो में किसी भी प्रकार की धारियां नहीं होती है जबकि साकेर फाल्कन में पूंछ और ऊपरी पंखो पर धारियां होती हैं ।
मरू राष्ट्रीय उद्यान में साकेर फोटो हेमंत दांडेकर
भारत में, यह एक दुर्लभ पक्षी माना जाता है, जिसमें एक छोटी सी आबादी लद्दाख क्षेत्र तक सीमित है और कुछ प्रवासी पक्षी कभी-कभी हिमालय के आसपास भी देखने को मिलते हैं तथा गुजरात और राजस्थान के थार रेगिस्तान व इसके आसपास के क्षेत्रों में नियमित रूप से देखे जाते हैं।पिछले कुछ वर्षों में राजस्थान में दिखे जाने की सूचनाएं
जोड़बीड़ – वयस्क मादा – श्री नीरव भट्ट (श्री हीरा पंजाबी द्वारा लगातार 3 सीजन 2014-15 तक देखा गया, 15-16 में श्री नीरव भट्ट द्वारा, 16-17 में श्री नीरव भट्ट द्वारा )
डेजर्ट नेशनल पार्क – वयस्क पक्षी – श्री हेमंत दांडेकर (नवंबर 2014 में केवल एक बार देखा गया)
जोड़बीड़ – जुवेनाइल पक्षी – श्री जे शाह को केवल एक बार जनवरी 2016 में दिखा।
सांभर झील – वयस्क नर को पीले पैर वाले हरे कबूतर के शिकार के साथ – श्री नीरव भट्ट (2019-20 में देखा गया)
साकेर फाल्कन शारीरिक रूप से खुले इलाके में जमीन के करीब शिकार करने के लिए अनुकूलित होते हैं, यह तेज गति व फूर्ति के साथ डेजर्ट जर्ड और बैंडिकूट जैसे मध्य-आकार के स्थलीय चूहों का शिकार करते हैं । हालाँकि वे लार्क से लेकर कबूतर जैसे छोटे से मध्यम आकार के पक्षियों का भी शिकार करते हैं।
साकेर फाल्कन शुष्क आवासों में जीवित रहने के लिए अनुकूलित है और किसी क्षेत्र में साकेर फाल्कन का मौजूद होना एक स्वस्थ रेगिस्तान पारिस्थितिकी तंत्र का संकेत होता है। जहां तक पक्षीविज्ञान का संबंध है, राज्य में ऐसी दुर्लभ प्रजाति के फाल्कन का बहुत महत्व है। थार रेगिस्तान के व्यापक अध्ययन से साकेर फाल्कन के दिखने की और सूचनाएं भी मिल सकती हैं।
Saker falcon is the largest falcon seen in the Indian Subcontinent. Due to its prowess as a hunter, it has been prized by humans for centuries, particularly by falconers.
Status
It has been uplisted in the IUCN Red List as Endangered because of the latest analysis which indicates rapid decline in the population. IUCN states “This negative trend is a result of a range of anthropogenic factors including electrocution on power lines, unsustainable capture for the falconry trade, as well as habitat degradation and the impacts of agrochemicals, and the rate of decline appears to be particularly severe in the species’s central Asian breeding grounds”
Identification
Saker Falcons are large brown coloured falcons. There are many subspecies of the Saker falcons however in India, we get to see 2 type of birds. The Ladakh population is often referred to as Altai Saker while which are dark brown coloured bird with rufous barring on the upperwings and the ones which we get to see in the Thar Desert are usually the nominate migratory subspecies which are relatively paler brown than the Altai Saker.
Saker falcon can be identified Dark upperparts and pale underparts with brown streaking in juvenile and tear drop markings in adults. It can be confused with similar looking species like Laggar Falcon and Juvenile Peregrine falcon. However by keen observation, following pointers can help in confirmation of the identification of saker.
It has relatively less prominent moustachial stripe in comparison to Laggar& juvenile Peregrine
It is more bulky and has broader body and wings in comparison to laggar and juvenile Peregrine
Juvenile Peregrine has dark head, uniform vertical streaking on the underparts, prominent malar strip and longer more pointed dark wings while the Saker has pale head, more heavier and slightly rounded paler wings in comparison to the Peregrine.
Laggar falcons are uniform dark brown usually with uniform unbarred tail and primaries while saker falcons have barred primaries and tail.
Saker falcon With Green PigeonPhoto By Mr Nirav Bhatt
Distribution
In India, it is considered to be a rare bird with a small number of resident breeding population limited to Ladakh region and migratory birds seen ocassionally near the Himalayas and regularly in and around the Thar desert of Gujarat and Rajasthan.
Sightings in Rajasthan in last few years
Jodbeed – Adult female – Mr.Nirav Bhatt ( Seen for 3 consecutive seasons 2014-15 by Mr.Hira Punjabi, 15-16 by Mr.Nirav Bhatt, 16-17 by Nirav Bhatt
Desert National park – Adult bird – Mr.Hemant Dandekar (seen only once in Nov 2014)
Jodbeed – Juvenile bird – Mr.Jay Shah seen only once Jan 2016
Sambar Lake – Adult male with yellow footed green pigeon kill – Mr.Nirav Bhatt (Seen in 2019-20)
Prey
Sakers are physically adapted to hunting close to the ground in open terrain, combining rapid acceleration with high maneuverability, thus specializing on mid-sized diurnal terrestrial rodents like Desert Jird and Bandicoot. However they also predate on small to medium sized birds ranging from Larks to pigeons.
Importance
Saker falcons are adapted to survive in arid habitats and the sightings of Saker falcons in the area is an indicator of healthy desert ecosystem. Occurrence of such rare species of falcons in the state is of a great importance as far as ornithology is concerned. Extensive study of the thar desert can reveal more information of occurrence of more Saker falcons.