क्या आपने कभी सोचा है आजादी से पूर्व में राजस्थान में कैमरा ट्रैप फोटो लिया गया था ? आइये जानिए कैमरा ट्रैप के इतिहास एवं उससे जुड़े कुछ रोचक तथ्यो के बारे में…
वन्यजींवों के संरक्षण में वन्यजींवों की संख्या का अनुमान लगाना एक अत्यंत महत्वपूर्ण कार्य है। भारत में वर्ष 2006 के बाद से बाघ अभयारण्य में बाघों की संख्या का अनुमान लगाने के लिए कैमरा ट्रैप का उपयोग होने लगा। आज कैमरा ट्रैप के उपयोग से संख्या का अनुमान अधिक सटीक और बिना इंसानी दखल के होने लगा है। कैमरा ट्रैप के इस्तेमाल से न केवल वन्यजींवों की संख्या का अनुमान बल्कि इससे उनके संरक्षण के लिए कई महत्वपूर्ण जानकारियां जैसे जंगल में शिकारियों व् अवैध कटाई के परिणाम भी प्राप्त किये जाते है।
वर्तमान में प्रयोग में लिया जाने वाला कैमरा ट्रैप दूर से काम करने वाली मोशन सेंसर बीम तकनीक पर आधारित है, इन अत्याधुनिक उपकरण में से निकलने वाली इंफ़्रारेड बीम के सामने यदि कोई भी गतिविधि होती है तो तस्वीर कैद हो जाती है। परन्तु पहली बार जब कैमरा ट्रैप के अविष्कार कर्ता जॉर्ज शिरस-III ने सन 1890 में इसका उपयोग किया तब वह एक ट्रिप वायर और एक फ़्लैश लाइट का इस्तेमाल करके बनाया गया था। इनसे लिए गए फोटो 1906 में नेशनल जियोग्राफिक मैगज़ीन में प्रकाशित हुए थे। भारत में ऍफ़ डब्लू चैंपियन ने 1926 में राजाजी नेशनल पार्क में टाइगर की कैमरा ट्रैप से पहली पिक्चर लेने में सफलता प्राप्त की। ऍफ़ डब्लू चैंपियन, प्रसिद्ध शिकारी जिम कॉर्बेट के दोस्त एवं संरक्षक थे और उन्होने ही जिम कॉर्बेट को बन्दुक की जगह कैमरा पकड़ने की सलाह दी थी। जिसके बाद जिम कॉर्बेट एक वन्यजीव प्रेमी के रूप में प्रसिद्ध हुए।
आधुनिक कैमरा ट्रैप लगाते हुए एक स्वयंसेवक
परन्तु क्या आप जानते है? राजस्थान में संयोजित तरह से आधुनिक कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल डॉ जी वी रेड्डी के दिशा निर्देशन में रणथम्भोरे रास्ट्रीय उद्यान में सन 1999 में किया गया था। उन्होने पहली बार डॉ उल्हास कारंथ के सहयोग से बाघों की संख्या का अनुमान लगाने का प्रयास किया। परन्तु इतिहास के अनछुए पन्नो में प्रमाण मिलते है की राजस्थान में सबसे पहले कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल चितोड़गढ़ में किया गया था। आज़ादी से पहले देश में ब्रिटिश लोगो को खुश रखने के लिए यहाँ के राजा-महाराजा, वन्यजीवों के शिकार के लिए विशेष आयोजन किया करते थे। परन्तु इन्ही दिनों की एक विशेष फोटो अनायाश ध्यान आकर्षित करती है। वर्ष 1944 में चित्तोड़ में एक तालाब पर आने वाले बाघ की फोटो लेने में जब सफलता हासिल नहीं हुई तो यहाँ सबसे पहले कैमरा ट्रैप का इस्तेमाल करके टाइगर का चित्र लिया गया। जिसका साक्षी बीकानेर का लक्ष्मी विल्लास होटल हे, जहाँ यह फोटो आज भी लगी हुई है और यदि ध्यान से देखा जाये तो टाइगर के पीछे के पैर के पास एक खींची हुई रस्सी या तार देखी जा सकती है जो दाये और बाये दोनों हिस्सों में दिखाई देती है।
यह वह दुर्लभ फोटो है जिसे राजस्थान की प्रथम कैमरा ट्रैप फोटो माना जा सकता है
कैमरा ट्रैप फोटो के निचे लिखा विवरण
आजकल कैमरा ट्रैप अत्याधुनिक डिजीटल कार्ड तथा बैटरी द्वारा संचालित फोटो एवं वीडियो दोनों बनाने में सक्षम होते हैI उस दौर में कैमरा ट्रैप में प्लेट एवं कालांतर में रील का उपयोग किया जाता था और फोटो को लैब में प्रोसेस होने के बाद ही देखा जा सकता था।
आज डिजिटल कार्ड की बदौलत पलभर में जंगल के अंदर ही मोबाइल में फोटो देखी व् तुरंत साझा की जा सकती है।
पनचीरा कलाबाजी खाते हुए और करीने से पानी को चीरते हुए मछली का शिकार कर यह सिद्ध कर देता है की वह एक अचूक और माहिर शिकारी है और हर समय अद्वितीयरूप से विजित ही रहेगा, पर मानवीय हस्तक्षेप के चलते यह अपने एकमात्र प्रजनन स्थल या फिर यों कहे अपने अंतिम गढ़ चंबल नदी पर भी अस्तित्व की लड़ाई में पराजीत होता प्रतीत हो रहा है…
इंडियन स्कीमर (Indian skimmer) जिसे हिंदी में पनचीरा व राजस्थानी स्थानीय भाषा में पंछीडा भी कहते है। अपनी काली टोपी और चटक नारंगी रंग की चोंच, जिसका निचला भाग ऊपरी भाग की अपेक्षा लम्बा होने, के कारण इसे आसानी से पहचाना जा सकता है। इसका नाम, इसके भोजन को पकड़ने के तरीके से एक पल में ही स्पष्ट हो जाता है, क्योंकि यह अपनी चोंच से पानी की ऊपरी सतह को चीरते हुए, जैसे दूध से मलाई निकालते हो, मछली को पकड़ता है। इसका वैज्ञानिक नाम “Rynchops albicollis” है तथा यह Laridae परिवार का सदस्य है। यह कुछ हद तक टर्न (Tern) जैसे लगते है। राजस्थान में यह चम्बल व उसकी सहायक नदियों के पास मिलता है, परन्तु मानवीय हस्तक्षेपों और घटते आवास के कारण आज यह एक संकटग्रस्त प्रजाति है।
इंडियन स्कीमर का चित्रण/निरूपण (Description):
इंडियन स्कीमर की चोंच उसके शरीर का सबसे आकर्षक भाग होती है क्योंकि इसकी चोंच लम्बी, मोटी, गहरी नारंगी तथा सिरे से हल्के पीले रंग की होती है। चोंच का निचला भाग ऊपरी भाग की अपेक्षा लम्बा होता है तथा यह सिरे से चाकू की तरह चपटा व धारदार होता है। इसके सिर का ऊपरी भाग काला होता है मानो सिर पर काली टोपी रखी हो। शरीर के ऊपरी भाग काले तथा निचले भाग सफ़ेद रंग के होते हैं। अपने लम्बे और नुकीले पंखों के कारण यह टर्न जैसा दिखता है परन्तु इसके पंखों के किनारे सफ़ेद होते है तथा इसके पंखों का विस्तार लगभग 108 सेमी होता है। इसकी पूँछ काली, छोटी, सिरे से कांटे जैसी तथा इसके बीच के पंख सफ़ेद होते है। टंगे तथा पैर लाल होते है। नर और मादा दिखने में एक से ही होते हैं, हालांकि, नर आकार में थोड़े बड़े होते हैं।
युवा पक्षियों के शरीर के ऊपरी भाग भूरे तथा सिर वयस्कों से ज्यादा सफ़ेद होता है। इनकी चोंच नारंगी-भूरी तथा सिरे से गहरे रंग की होती है। चोंच सामान्य ही होती है परन्तु उम्र के साथ निचला भाग बढ़ जाता है। एक नज़र में किसी उड़ान भरते या स्थिर बैठे स्कीमर को देखने पर उनकी क्षैतिज रूप से विस्तारित (horizontally extended) आँखें एक पतली पट्टी या धारी (slits) कि तरह दिखती हैं जो कि इनके समुद्र की सतह पर घूमते समय पानी के संभावित बौछार से आँखों को सुरक्षित रखता है।
इंडियन स्कीमर “Rynchops albicollis” (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)
इतिहास के पन्नो में इंडियन स्कीमर
इंडियन स्कीमर का जिक्र सबसे पहले एडवर्ड बक्ले (1602-1709) द्वारा बनाए गए उनके चित्र में किया गया। एडवर्ड बक्ले मद्रास में तैनात ईस्ट इंडिया कंपनी के सर्जन और एक अग्रणी प्रकृतिवादी थे। ये पहले इंसान थे जिन्होंने भारतीय पक्षियों की प्रजातियों के चित्र बनाकर दस्तावेजीकरण किया था। इन्होंने मद्रास स्थित फोर्ट सेंट जॉर्ज (Fort St. George) के आसपास के इलाके से कुल 22 पक्षियों के चित्र व विवरण तैयार किए थे। सन 1713 में यह सभी विवरण और चित्र एक अंग्रेजी प्रकृतिवादी जॉन रे की किताब Synopsis Methodica Avium & Piscium: Opus Posthumum में छपे जो कि भारतीय पक्षियों पर छपने वाला पहला दस्तावेज था। एडवर्ड बक्ले ने ही स्कीमर का सबसे पहला चित्र बनाया जिसे उस समय मद्रास सी क्रो (Madras Sea Crow) का नाम दिया था।
अल्फ्रेड हेनरी माइल्स ने An Encyclopedia of Natural History में जिक्र किया है कि सन 1731 किसी अमेरिकी लेखक ने समुद्र के ऊपर पानी को चीरते हुए उड़ने वाले पक्षी को “cut water” नाम से संबोधित किया था जो कि बाद में Scissors Bill नाम से जाना जाने लगा।
विलियम जॉन स्वेन्सन (William John Swainson) ने सन 1838 में इंडियन स्कीमर को द्विपदनाम पद्धति के अनुसार “Rynchops albicollis” नाम दिया। स्वेन्सन एक अंग्रेजी पक्षी विशेषज्ञ,मैलाकोलॉजिस्ट, किट विशेषज्ञ और कलाकार थे जो प्रकृति के सुंदर रंगीन चित्रों, विशेष रूप से फूलों और पक्षियों के लिए जाने जाते थे।
एडवर्ड बक्ले द्वारा बनाया गया मद्रास सी क्रो (Madras Sea Crow) का चित्र
इंडियन स्कीमर का वितरण
पक्षी विशेषज्ञ TC Jerdon द्वारा 1864 में भारतीय पक्षियों पर लिखी पुस्तक के एक विवरण कि कल्पना करें तो ये अनुमानित किया जा सकता है कि पनचिरा कभी हजारों कि तादाद में पाया जाता था। जेरडोन कि पुस्तक का विवरण कुछ इस प्रकार है “श्री ब्रुक्स लिखते है की उन्होंने मिर्ज़ापुर में सैकड़ों की तादाद में स्किमर्स के चूजे को देखा तो वो दृश्य आश्चर्यचकित कर देने वाला था, मानो बहुत सारे छोटे कछुए की सेना नदी की तरफ दौड़ रही हो।”
इंडियन स्कीमर मुख्य रूप से नदियों, झीलों और नमभूमियों में पाया जाता है। सुन्दर (2004) के अनुसार, पहले यह म्यांमार की प्रमुख नदियों, भारत-चीन में मेकांग के आसपास तथा भारतीय उप-महाद्वीप में व्यापक रूप से मिलते थे। परन्तु इसकी सीमाएं हाल के दशकों में तेजी से खंडित हुई है जिसके परिणामस्वरूप आज पाकिस्तान और म्यांमार में इनकी बहुत छोटी सी आबादी जीवित बची है तथा मेकांग डेल्टा में यह पूर्णरूप से लुप्त हो चुकी है। मोहसिन (2014) के अनुसार, वर्तमान में भारत, और बांग्लादेश इंडियन स्कीमर के अंतिम गढ़ हैं तथा भारत इस प्रजाति के लिए एकमात्र शेष प्रजनन आवास है। भारत में, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, आंध्र प्रदेश, बिहार और ओडिशा से इसकी सूचना है।
Distribution of Indian Skimmer (Source: birdlife.org)
आज भारत में राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य भारतीय स्किमर की एक बड़ी आबादी (लगभग 80 प्रतिशत) का प्रजनन स्थान है। अभी तक राजस्थान में यह केवल चम्बल व उसकी सहायक नदियों जैसे रामेश्वरम घाट, बनास नदी व इसके पास के कुछ तालाबों जैसे “सूरवाल” में देखा जाता है। इनको आसानी से चम्बल नदी के किनारे पर देखा जा सकता है।
राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में इंडियन स्किमर (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)
आहार व्यवहार
इंडियन स्कीमर का नाम इसके भोजन के शिकार करने की विधि के आधार पर रखा गया है। यह अपनी चोंच को खोल कर पानी की सतह को निचली चोंच से चीरते हुए, सीधी उड़ान भरते है और जैसे ही कोई मछली सामने आती है तो तुरंत अपनी चोंच से उसे पकड़ लेते है। यह एक उल्लेखनीय एरोबैटिक कौशल दिखाते हैं जिसमें यह अपनी चोंच को पानी की सतह पर स्थिर एक सीधे पथ पर बनाये रखते है। यह देखा गया है की इंडियन स्कीमर मुख्यरूप से सतह पर उपलब्ध छोटी मछलियों की प्रजातियों को खाते है तथा छोटे झुंडों में खाना खोजते है। इसके आहार में मुख्य रूप से 04-14 सेमी लंबाई की छोटी मछलियाँ होती हैं तथा जो मछली 2 सेमी से छोटी होती है, उन्हें युवा पक्षियों को खिलाया जाता है। राजगुरु (2017) के अनुसार यह Salmophasia bacaila, Salmophasia sardinella, Systomous sarana, Pethiaticto, Dermogenys pusilla आदि प्रजातियों की मछलियां खाते है।
अपनी चोंच से पानी की सतह को चीरते हुए मछली पकड़ते इंडियन स्कीमर (फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल)
प्रजनन
इंडियन स्कीमर का प्रजनन काल भीषण गर्मी के दिनों में (मार्च से मई) होता है तथा यह मुख्य रूप से खुले रेत तट पर अपना घोंसला बनाते है। अंडे भूरे धब्बों और लकीरों के साथ सफेद व भूरे रंग के होते हैं। राजगुरु (2017) ने यह सूचित किया है की तेजी गर्मियों में यह अपने अंडों को गर्मी के प्रभाव से बचाने के लिए बार-बार पानी में जाकर अपने अग्र भाग को भिगो कर अंडों पर बैठ उन्हें ठंडा करते है। देबाता (2018) ने यह सूचित किया है की इंडियन स्कीमर, टर्न के घोंसलों में अपने अंडे रख कर Brood Parasitism का उद्धरण देते है, परन्तु इस व्यवहार के अन्य संदर्भ नहीं आये है। इनका प्रजनन काल नदियों के जल स्तर पर भी निर्भर करता है।
इंडियन स्कीमर पर खतरे
पहले यह पक्षी भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से मिलता था परन्तु आज मानवीय हस्तक्षेपों के चलते यह बहुत कम हो गए तथा IUCN के अनुसार एक संकटग्रस्त प्रजाति है। वर्तमान में इसकी वैश्विक आबादी केवल 6,000-10,000 पक्षी हैं। यह मनुष्यों द्वारा निवास स्थान के खत्म होने, मछली पकड़ने, परिवहन, घरेलू उपयोग, सिंचाई योजनाओं और कृषि व औद्योगिक रसायनों से नदियां व झीलें प्रदूषित हो रही है तथा इन्हीं कारणों से इंडियन स्कीमर की आबादी में गिरावट आ रही है क्योंकि इन कारकों ने इसके प्रजनन और खाना ढूंढने की सफलता को कम कर दिया है। सुंदर (2004) के अनुसार राजस्थान में चम्बल नदी के ऊपर बांध बनने से, भी इसकी आबादी पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है, क्योंकि बाँध से पानी छोड़ने के कारण जलस्तर में निरंतरता नहीं रहती है। प्रजनन काल में यह नदी किनारे रेत पर घोंसला बनाते है परन्तु ऐसे में यदि बाँध से पानी छोड़ा जाता है तो नदी किनारों पर जलस्तर बढ़ने के कारण इनके घोंसले बह जाते है। और यदि किनारों पर पानी बहुत काम रहे तो आवारा कुत्ते व मवेशी, इनके घोंसलों को नष्ट कर देते है।
इसकी अधिकांश आबादी असुरक्षित हैं लेकिन कुछ संरक्षित क्षेत्रों जैसे राष्ट्रीय चंबल अभयारण्य में सुरक्षित हो रही है। परन्तु सरकार को इस पक्षी के संरक्षण के लिए और कदम भी उठाने चाहिए, क्योंकि यह जल-पक्षी नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र का एक अभिन्न अंग हैं तथा ये पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
References:
Debata, S., T. Kar, K.K. Swain & H.S. Palei (2017). The Vulnerable Indian Skimmer Rynchops albicollis Swainson, 1838 (Aves: Charadriiformes: Laridae) breeding in Odisha, eastern India. Journal of Threatened Taxa 9(11): 10961–10963
Debata, S., T. Kar, K.K. Swain & H.S. Palei(2018): Occurrenceof Indian Skimmer Rynchops albicollis eggs in River Tern Sterna aurantia nests, Bird Study
Jerdon, TC (1864). Birds of India. Vol 3. George Wyman & Co. p. 847.
John Ray & Edward Buckley. 1713. Synopsis methodica avium & piscium : opus posthumum, quod vivusrecensuit & perfecit ipse insignissimus author: in quo multas species, in ipsiusornithologiâ &ichthyologiadesideratas, adjecit: methodum quesuampiscium naturæ magìsconvenientemreddidit. Cum appendice, &ico. P.203
Rajguru, S. K., (2017). Breeding biology of Indian Skimmer Rynchops albicollis at Mahanadi River, Odisha, India. Indian BIRDS 13 (1): 1–7.
Sundar, K.S.G. (2004). Observations on breeding Indian Skimmers Rynchops albicollis in the National Chambal Sanctuary, Uttar Pradesh, India. Forktail 20: 89–90.
Swainson,1838. Animals in menageries. Part III. Two centenaries and a quarter of birds, either new or hitherto imperfectly described. p. 360.
साँड़ा, पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान में पायी जाने वाली छिपकली, जो मरुस्थलीय खाद्य श्रृंखला में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है परन्तु आज अंधविश्वास और अवैध शिकार के चलते इसकी आबादी घोर संकट का सामना कर रही हैं।
साँड़े का तेल, भारत के विभन्न हिस्सो मे यौनशक्ति वर्धक एवं शारीरिक दर्द के उपचार के लिए अत्यधिक प्रचलित औषधि हैं परन्तु इस तेल का तथाकथित बिमारियों मे कारगर होना एक अंधविश्वास मात्र हैं एवं इस तेल के रासायनिक गुण किसी भी अन्य जीव की चरबी के तेल के समान ही पाये गये हैं। आज इस अंधविश्वास के कारण इस जीव का बहुतायत में अवैध शिकार किया जाता हैं, जिसके परिणाम स्वरूप सांडो की आबादी तेजी से घटती जा रही हैं।
साँड़े के नाम से जाने जाने वाला ये सरीसृप वास्तव में भारतीय उपमहाद्वीप के शुष्क प्रदेशों में पाए जाने वाली एक छिपकली हैं। यह मरुस्थलीय छिपकली Agamidae वर्ग की एक सदस्य है तथा अपने मजबूत एवं बड़े पिछले पैरों के लिए जानी जाती हैं। साँड़ा का अँग्रेजी नाम, Spiny-tailed lizard होता है जो इसे इसकी पूंछ पर पाये जाने वाले काँटेदार स्केल्स के अनेकों छल्लो (Rings) की शृंखला के कारण मिला हैं।
विश्वभर में साँड़े की 20 प्रजातियाँ पायी जाती हैं जो की उत्तरी अफ्रीका से लेकर मध्य-पूर्व के देशों एवं उत्तरी-पश्चिमी भारत के शुष्क तथा अर्धशुष्क प्रदेशों के घास के मैदानों में वितरित हैं। भारतीय उपमहाद्वीप में पायी जाने वाली इस प्रजाति का वैज्ञानिक नाम “Saara hardiwickii” हैं, जो की मुख्यतः अफगानिस्तान, पाकिस्तान तथा भारत में उत्तरी-पश्चिमी राजस्थान, हरियाणा, एवं गुजरात के कच्छ जिले के शुष्क घास के मैदानों में पायी जाती है। कुछ शोधपत्रों के अनुसार साँड़े की कुछ छोटी आबादियाँ उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों, उत्तरी कर्नाटक, तथा पूर्वी राजस्थान के अलवर एवं सवाई माधोपुर जिलों में भी पायी जाती हैं, जो की इनके शुष्क आवास के अलावा अन्य आवासों में वितरण को दर्शाती हैं। वहीँ दूसरी ओर वन्यजीव विशेषज्ञो के अनुसार साँड़े का मरुस्थलीय आवास से बाहर वितरण मानवीय गतिविधियों, मुख्यत: अवैध शिकार का परिणाम हो सकता हैं क्योंकि वन्यजीव व्यापार में अनेकों जीवो को उनकी स्थानीय सीमाओं से बाहर ले जाया जाता हैं।
साँड़े की भारतीय प्रजाती में नर (40 से 49 सेमी) सामन्यत: आकार में मादा (34 से 40 सेमी) से बड़े होते हैं तथा अपनी लंबी पूंछ के कारण आसानी से पहचाने जा सकते हें। नर की पूंछ उसके शरीर की लंबाई के बराबर या अधिक एवं छोर से नुकीली होती हें जबकि मादा की पूंछ शरीर की लंबाई से छोटी तथा सिरे से भोंटी होती हैं।
भारतीय साँड़ा छिपकली (Indian Spiny tailed lizard “Saara hardiwickii”)
पश्चिमी राजस्थान के रेगिस्तान एवं कच्छ के नमक के मैदानों में पायी जाने वाली साँड़े की आबादी में, त्वचा के रंग में एक अंतर देखने को मिलता हैं। अक्सर पश्चिमी राजस्थान की आबादी में पूंछ के दोनों तरफ के स्केल्स में तथा पिछले पैरों की जांघों के दोनों ओर हल्का चमकीला नीला रंग देखा जाता है, परन्तु कच्छ के नमक मैदानों की आबादी में इस तरह का कोई भी रंग नहीं पाया जाता है। दोनों राज्यों में पायी जाने वाली आबादी में रंग के इस अंतर का कारण जानने के लिए और अधिक शोध की आवश्यकता हैं। परन्तु रंगों में यह अंतर आहार में भिन्नता तथा दोनों आवास में पायी जाने वाली वनस्पतियों में अंतर होने के कारण भी हो सकता है।
भारतीय साँड़े को भारत मे पाये जाने वाली एकमात्र शाकाहारी छिपकली माना जाता है। इनके मल के नमूनो की जांच के अनुसार वयस्क का आहार मुख्यत वनस्पति, घास, एवं पत्तियों तक सीमित रहता हैं लेकिन शिशु साँड़ा प्रायतः वनस्पति के साथ विभ्न्न कीटो मुख्यत: भृंग, चींटिया, दीमक, एवं टिड्डे का सेवन करते भी जाने जाते हैं।बारिश मे एकत्रित किए गए कुछ वयस्क साँड़ो के मल में भी कीटो की बहुतायत मिलना इनकी आहार के प्रति अवसरवादिता को दर्शाता हैं।
साँड़ा, मुख्यरूप से शाकाहारी भोजन पर ही निर्भर रहती है
मरुस्थल में भीषण गर्मी के प्रभाव से बचने के लिए साँड़े भी अन्य मरुस्थलीय जीवो के समान भूमिगत माँद में रहते हैं। साँड़े की माँद का प्रवेश द्वार बढ़ते चंद्रमा के आकार समान होता है तथा इसी कारण से यह अन्य सस्थलीय जीवों की माँद से अलग दिखाई पड़ती हैं। ये मांदे अक्सर टेड़ी-मेढी, सर्पाकर तथा 2 से 3 मीटर गहरी होती हैं। माँद का आंतरिक तापमान बाह्य तापमान की तुलना में बहुत ही प्रभावी रूप से कम होता हैं, जिससे साँड़े को रेगिस्तान की भीषण गर्मी में सुरक्षा मिलती हैं। ये छिपकली दिनचर होती हैं तथा माँद में आराम करते समय अपनी काँटेदार पूंछ से प्रवेशद्वार को बंद रखती हैं। रात के समय में अन्य जानवरों विशेषकर परभक्षी जीवो को रोकने के लिए प्रवेश द्वार को अपनी पूंछ द्वारा मिट्टी से सील भी कर देती हैं।
माँद बनाना, रेगिस्तान की कठोर जलवायु में जीवित रहने के लिए एक आवश्यक कौशल है तथा इसी कारण पैदा होने के कुछ ही समय बाद ही साँड़े के शिशु मादा के साथ भोजन की तलाश के साथ-साथ माँद की खुदाई सीखना भी शुरू कर देते हैं। अन्य सरीसृपों के समान साँड़े भी अत्यात्धिक सर्दी के समय दीर्घकाल के लिए शीतनिंद्रा में चले जाते हैं। इस दौरान ये अपनी शरीर की रस प्रक्रिया (metabolism) दर को धीमी कर शरीर में संचित वसा (stored fats) पर ही जीवित रहते हैं। हालांकि कच्छ के घास के मैदानों में शिशु साँड़ों को अक्सर दिसम्बर एवं जनवरी माह में भी सक्रिय देखा गया हैं। इसका मुख्य कारण कच्छ में सर्दियों के समय तापमान की गिरावट में अनियमितता हो सकता हैं।
साँड़ों का प्रजनन काल फरवरी माह से शुरू होता है और उनके छोटे शिशुओं को जून व् जुलाई के महीने तक घास के मैदानों में इधर-उधर दौड़ते हुए देखा जा सकता है। वर्ष के सबसे गर्म समय के दौरान भी ये छिपकलियां प्रकृति में सख्ती से दिनचर बनी रहती हैं तथा इनकी गतिविधियां सूर्योदय के साथ शुरू होती हैं एवं सूर्य क्षितिज से नीचे पहुंचते ही समाप्त हो जाती हैं। गर्मी के दिनों में तेज धूप खिलने पर यह भरी दोपहर तक सक्रिय रहते हैं। यदि किसी दिन बादल छाए रहे तो इनकी शाम तक भी रहती है।
साँड़ा मरुस्थलीय खाद्य श्रृंखला का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है तथा यह खाद्य पिरमिड के सबसे निचले स्तर पर आता हैं। शरीर में ग्लाइकोजन और वसा की अधिक मात्रा, इसे रेगिस्तान में अनेकों परभक्षी जीवो के लिए प्रमुख भोजन बनाते हैं। साँड़े को दोनों, भूमि तथा हवा से परभक्षी खतरों का सामना करना पड़ता है। मरुस्थल मे पाये जाने वाले परभक्षी जीवो की विविधता एवं बहुतायता जिनमे स्तनधारी, सरीसृप, स्थानीय एवं प्रवासी शिकारी पक्षी शामिल हैं, सांडो की बड़ी आबादी का ही परिणाम हैं। हैरियर और फाल्कन जैसे कई अन्य शिकारी पक्षियो को अक्सर इन छिपकलियों का शिकार करते हुए देखा जा सकता है। केवल बड़े शिकारी पक्षी ही नहीं परंतु किंगफिशर जैसे छोटे पक्षी भी नवजात साँड़ों का शिकार करने का अवसर नहीं गवाते।
पक्षियों के अलावा अनेकों सरीसृप भी रेगिस्तान में इन उच्च ऊर्जावान खाद्य स्रोत साँड़ों को प्राप्त करने का एक अवसर भी नही गवातें। थार रेगिस्तान में विषहीन सांप की एक आम प्रजाति जिसे आम बोली में दो मूहीया धुंभी (Red sand-boa) कहते हैं, अक्सर साँड़े को माँद से बाहर खदेड़कर कहते हुए देखी जा सकती हैं। दो मूही द्वारा माँद में हमला करने पर साँड़े के पास अपने पंजो से जमीन पर मजबूत पकड़ बनाने एवं माँद की संकीर्न्ता के अलावा अन्य कोई सुरक्षा उपाय नहीं होता हैं। हालांकि दोमूही के लिए भी ये कार्य अत्यधिक ऊर्जा व समय की खपत करने वाला होता है क्योंकि साँड़े को माँद से बाहर निकालना बिना हाथ पैर वाले जीव के लिए आसान काम नहीं होता। लेकिन ये प्रयास व्यर्थ नहीं हैं क्योंकि एक सफल शिकार की कीमत ऊर्जा युक्त भोजन होती है। प्रायतः संध्या काल में सक्रिय होने वाली भारतीय मरु-लोमड़ी भी अपनी वितरण सीमा में अक्सर साँड़े को माँद से खोदकर शिकार करती देखी जा सकती हैं।
खाद्य पिरामिड के विभिन्न ऊर्जा स्तरो से परभक्षी जीवो की ऐसी विविधता के कारण साँड़े ने भी जीवित रहने के लिए सुरक्षा के कई तरीके विकसित किये है। हालांकि इस छिपकली के पास किसी भी प्रकार की आक्रामक सुरक्षा प्रणाली से नहीं हैं परंतु इसका छलावरण, फुर्ती एवं सतर्कता इसका प्रमुख सुरक्षा उपाय हैं। इसकी त्वचा का रंग रेत एवं सुखी घास के समान होता हैं, जो इसके आसपास के पर्यावास में अच्छी से घुलकर एक छलावरण का कार्य करता हैं एवं इसे शिकारियों की नजर से बचाता हैं।
यदि छलावरण शिकारियों के खिलाफ काम नहीं करता, तो यह शिकारियों से बचने के लिए अपनी गति पर निर्भर रहती हैं। साँड़ा छिपकली के पीछे के टांगे मजबूत तथा उंगलिया लम्बी होती हैं जो इसे किसी भी शिकारी से बचने के लिए उच्च गति प्राप्त करने में मदद करती है। गति के साथ-साथ, यह छिपकली भोजन की तलाश के दौरान बेहद सतर्क रहती है। विशेष रूप से, जब शिशुओं के साथ हो, वयस्क छिपकली आगे के पैरो पर सर को ऊपर उठाकर, धनुषाकार पूंछ के साथ आसपास की हलचल पे नजर रखती हैं। साँड़ा अक्सर अपने बिल के निकट ही खाना ढूंढ़ती हैं और आसपास में एक मामूली हलचल मात्र से ही खतरा भांप कर निकट की माँद मे भाग जाती हैं। साँड़े अक्सर समूहो में रहते है तथा अपनी माँद एक दूसरे से निश्चित दूरी पर ही बनाते हैं। प्रजनन काल में अक्सर नरो को मादाओ से मिलन के लिए मुक़ाबला करते देखा जा सकता हैं। नर अपने इलाके को लेकर सक्त क्षेत्रीयत्ता प्रदर्शित करते हैं तथा अन्य नर के प्रवेश पर आक्रामक व्यवहार दिखाते हैं।
अवैध शिकार एवं खतरे
आज मनुष्यों से, साँड़ा छिपकली को बचाने के लिए न तो छलावरण, न ही गति और न ही सतर्कता पर्याप्त प्रतीत होती हैं। साँड़े की वितरण सीमाओं में इनके अंधाधुन शिकार की घटनाएँ अक्सर सामने आती रहती हैं। माँद में रहने वाली इस छिपकली को पकड़ने के लिए शिकारीयो को भी अनेकों तरीके इस्तेमाल करते देखा गया हैं।सबसे सामन्या तरीके में साँड़े की माँद को गरम पानी से भर के या माँद खोदकर उसे बाहर आने के लिए मजबूर किया जाता हैं। एक अन्य तरीके में शिकारी, साँड़े की माँद ढूंढने के बाद उसके प्रवेश द्वार पर एक छोटी रस्सी का फंदा लगा देते हैं तथा उसके दूसरे छोर को छोटी लकड़ी के सहारे जमीन में गाड़ देते हैं। जब साँड़ा अपनी माँद से बाहर निकलता है तो उस समय ये फंदा उसके सर से निकलते हुए पैरों तक आ जाता हैं तथा जैसे ही साँड़ा वापस माँद में जाने की कोशिश करता हैं वैसे ही फंदा उसके शरीर पे कस जाता हैं, परिणाम स्वरूप साँड़ा वापस माँद में पूरी तरह नहीं जा पता हैं। तभी फिर साँड़े को पकड़ के उंसकी रीड की हड्डी तोड़ दी जाती हैं ताकि वो भाग न सके। तत्पश्चात उसके शरीर से मांस एवं पूंछ के वसा से तेल निकाला जाता हैं।
साँड़े को भारतीय संविधान के वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 1972 के तहत अनुसूची 2 में रखा गया हैं, जो इसके शिकार पर पूर्णत: प्रतिबंद लगता हैं। हालांकि, भारतीय साँड़े का आईयूसीएन (IUCN) की रेड डाटा लिस्ट के लिए मूल्यांकन नहीं किया गया है, लेकिन यह जंगली वनस्पतियों और जीवों की लुप्तप्राय प्रजातियों में अंतर्राष्ट्रीय व्यापार पर कन्वेंशन (CITES) के परिशिष्ट द्वितीय में शामिल हैं। TRAFFIC की एक रिपोर्ट के अनुसार अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारतीय साँड़े का हिस्सा 1997 से 2001 के बीच सांडो की सभी प्रजातियों के कुल व्यापार का केवल दो प्रतिशत ही पाया गया, लेकिन इस प्रजाति को क्षेत्रीय पैमाने पर शिकार के गंभीर खतरों का सामना करना पड़ रहा है। अंतरराष्ट्रीय व्यापार में भारतीय साँड़े का छोटा हिस्सा इसके कम शिकार का पर्यायवाची नहीं हैं, अपितु इसकी अधिक मात्र में स्थानीय खपत एवं व्यापार स्थानीय बाजार की स्थिति को दर्शाता हैं।
हाल ही में बेंगलुरु के कोरमंगला क्षेत्र से पकड़े गए कुछ शिकारियों के अनुसार साँड़े के मांस एवं रक्त की स्थानीय स्तर पर यौनशक्ति वर्धक के रूप में अत्यधिक मांग हैं। पकड़े गए गिरोह का सम्बन्ध राजस्थान के जैसलमर जिले से पाया गया, जहां पर साँड़े अभी भी बुहतायत में पाये जाते हैं। समय समय पर चर्चा में आने वाले इस तरह के गिरोह का नेटवर्क कितना गहरा पसरा हुआ हैं कोई नहीं जानता। आम जन में जागरूकता की कमी एवं अंधविश्वास के कारण सांडो को अक्सर कई स्थानीय बाजार में खुले बिकते भी देखा जाता हैं। प्रशासन की सख्ती के साथ साथ आम जनता में जागरूकता सांडो एक सुरक्षित भविष्य के लिए अत्यंत आवश्यक हैं। अन्यथा भारतीय चीते के समान ये अनोखा प्राणी भी जल्द ही किताबों व डोक्य्मेंटेरी में समा के रहा जाएगा।
सवाल यह है कि क्या भारतीय साँड़ा अपनी गति और सतर्कता के साथ आज की दुनिया में विलुप्ति की कगार से वापस आ सकता है जहां प्राकृतिक आवास शहरी विकास की कीमत चुका रहे हैं और जैवविविधता संरक्षण के नियमों की अनदेखी की जा रही है।
मार्च महीने की एक सुबह थार के मरुस्थल में मैंने एक शानदार मरुस्थलीय पक्षी ग्रेटर हूपु लार्क (Alaemon alaudipes) देखा जो कभी शिकार की तलाश में ‘मगरे’ पर इधर उधर उड़ रहा था, तो कभी अपनी लम्बी टांगो से दौड़ रहा था ।चारों ओर से रेत के टीलों से घिरे,कंक्रीट की कठोर सतह वाले स्थान को स्थानीय भाषा में ‘मगरा’ कहा जाता है।
काफी कोशिश करने के बाद लार्क को एक मकड़ीनुमा शिकार मिला जिसे उसने अपनी लम्बी चोंच में पकड़ रखा था । मैंने उस समय इस पक्षी के व्यवहार के कुछ फोटो लिए, जिनमें शिकार की मात्र टांगे ही दिखाई दे रही थी, उसके शरीर का कुछ हिस्सा पक्षी के मुंह में था। मुझे लगा शायद यह एक बड़ी मकड़ी है या फिर केमल स्पाइडर (solifuge) है, परन्तु ये दोनों अक्सर रात को ही सक्रीय होते हैं।
ग्रेटर हूपु लार्क द्वारा पकड़ा गया डेजर्ट मेंटिस फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल
अगली सुबह उसी ‘मगरे’ पर मुझे कुछ फिसलता हुआ दिखाई दिया, लगा मानो कोई कंकर का टुकड़ा हो। उस समय बहुत तेज हवा चल रही थी। पत्थर की तरह दिखने वाला यह जीव हवा के विपरीत दिशा में तेजी से चल रहा था। मैंने उसे नजदीक जाकर देखा देखा तो प्रकृति का एक अद्भुत छलावरण (camouflage) नजर आया। यह था एक मरुस्थल में मिलने वाला प्रेइंग मैंटिस (Praying mantis), जो पत्थर या कंकर के सामान लगता है। मुझे नजदीक पाकर वह बचाव की मुद्रा में आ गया। इसी मुद्रा में यह मैंटिस परिवार का सदस्य लगता है, जिसमें वह अपने आगे की दोनों टांगे हाथ जोड़ने की मुद्रा में ले आता है।
यह वही जीव था जिसे ग्रेटर हूपु लार्क ने पिछले दिन पकड़ रखा था। यह थार डेजर्ट मैंटिस (Eremiaphila rotundipennis) था। यह मेंटिस छलावरण (कैमोफ्लाज) में इतना माहिर होता है की इसको आंखों के सामने आने पर भी पहचानना लगभग असंभव होता है।
मानव जैसे दिखने वाले चहरे को ऊपर उठाते हुए डेजर्ट मेंटिस फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल
इसका शरीर त्रिभुजाकार, आगे के पैर अच्छी पकड़ वाले, एवं पेट के पास का हिस्सा रंगीन होता है । यह एक आक्रामक शिकारी मेंटिस है। अन्य अधिकांश मेन्टिसों के विपरीत डेजर्ट मेंटिस उड़ नहीं सकते हैं क्योंकि इनके उड़ने वाले पंख अवशेषी रह गए हैं । जब ये मेंटिस आगे के पैरों को बंद करके बैठते हैं तो लगता है जैसे पूजा में हाथ जोड़कर बैठे हुए हों। यह देखना बहुत ही रोचक लगता है।
डेजर्ट मेंटिड इरेमियाफिला (Eremiaphila) जीनस का सदस्य है जिसकी पूरी दुनिया में 68 प्रजातियां हैं एवं उनमें से केवल एक ही यह प्रजाति थार डेजर्ट मेंटिस (Eremiaphila rotundipennis) भारत में पायी जाती है।
डेजर्ट मेंटिस के पेट के नीचे का हिस्सा रंगीन एवं पंख अवशेषी रह गए हैं फोटो: डॉ. धर्मेंद्र खांडल
डेजर्ट मेंटिस मरुस्थलीय पर्यावरण के प्रति पूरी तरह से अनुकूलित होते हैं। ये जमीन पर रहते हैं जहाँ इनके लम्बे पैरों के कारण आसानी से तेजी से चल सकते हैं। ये कीड़ों एवं मकड़ियों को खाकर जीवित रहते हैं । रेगिस्तान में भीषण गर्मी,पानी की कमी,धूल भरी आंधियां सामान्य हैं जिसमे जीवों एवं पेड़ों को प्रतिकूल जलवायु का सामना करना पड़ता है।डेजर्ट मेंटिस इन सब परिस्थितियों को सहन करता है यही कारण है की उड़ने वाला यह जीव जमीन पर पाया जाता है। मुझे लगता है की थार मरुस्थल में डेजर्ट मेंटिस एवं ग्रेटर हूपु लार्क का कोई गहरा सम्बन्ध है, तो जब भी आपको रेगिस्तान के मगरे में यह पक्षी दिखाई दे तो आप डेजर्ट मेंटिस को भी तलाशने की कोशिश करें।
श्री विवेक शर्मा एक सर्प विशेषज्ञ हैं जिन्होंने कई प्रकार के सर्पों एवं उनसे जुड़े विषयों पर विस्तृत शोध किया है, प्रस्तुत लेख में श्री शर्मा ने सॉ-स्केल्ड वाइपर सांप के एकिस वर्ग की उप प्रजाति सॉशुरेक सॉ-स्केल्ड वाइपर के बारे में बताया है।
विश्व में पाए जाने वाले सभी सॉ-स्केल्ड वाइपर सांप एकिस वर्ग (genus Echis) के अंतर्गत आते हैं जो की सबसे व्यापक रूप से वितरित विषैले सांपो के वर्ग में से एक हैं तथा ये भारतीय उपमहाद्वीप से लेकर अफ्रीकी महाद्वीप में भूमध्य रेखा के उत्तर तक पाये जाते हैं। इसकी अधिकांश प्रजातियाँ मध्य-पूर्व एशिया और अफ्रीका में पाई जाती हैं, जबकि भारत में केवल एक प्रजाति एकिस कैरिनेटस (श्नाइडर, 1801) की 2 उप-प्रजातियाँ ही हैं।
राजस्थान में भी सॉ-स्केल्ड वाइपर (एकिस कैरिनेटस) की दो उप-प्रजातियाँ पायी जाती है। उप-प्रजाति एकिस कैरिनेटस कैरिनेटस भारतीय प्रायद्वीपीय इलाके अरनी (आरनी) से खोजा और प्रदर्शित किया गया था जो की महाराष्ट्र के यवतमाल जिले में स्थित है।यह भारत में व्यापक रूप से फैली हुई है और दक्षिण भारत से उत्तर भारत तथा पूर्व में यह पश्चिम बंगाल के मिदनापुर जिले तक पायी जाती है जो इस सम्पूर्ण जीनस की सबसे पूर्वी सीमा भी है। दूसरी उप-प्रजाति सॉशुरेक सॉ-स्केल्ड वाइपर (एकिस केरिनैटस सॉशुरेकी स्टेमर, 1969) को पाकिस्तान के बलूचिस्तान के पिशिन के पास स्थित बान कुशदिल खान नामक जगह से अलग उप-प्रजाति के रूप में मान्यता दी गई थी। यह अपने बड़े आकार, स्केल्स की गिनती में अंतर और मध्य-पूर्व के अधिक सूखे भागों में अलग से वितरण के कारण अलग श्रेणी में रखा गया है। यह राजस्थान से संयुक्त अरब अमीरात और ईराक तक पाया जाता है। उप-प्रजाति सॉशुरेकी का नाम ऑस्ट्रेलियाई पशु चिकित्सक एरिक सॉशुरेक के नाम पर रखा गया था। यह उप-प्रजाति थार रेगिस्तान और इसके किनारों में बहुत आम उपस्थिति के कारण राजस्थान में बहुत ख़ास है। इस तरह का पर्यावास दक्षिणी और पूर्वी राजस्थान को छोड़कर अधिकांश राज्य में फैला हुआ है। रात में जब इनकी गतिविधि का मुख्य समय होता है तब यह बड़ी संख्या में खाने की तलाश में निकलते है और इन्हे देखना बहुत ही आकर्षक और रोमांचक क्षण होता है।
राजस्थान में पायी जाने वाली प्रजाति एकिस केरिनैटस सॉशुरेकी (Echis carinatus sochureki) फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल
सॉशुरेक सॉ-स्केल्ड वाइपर की अपने प्रायद्वीपीय भारतीय करीबी की तुलना से बड़ी आबादी है। यह 80 से.मी. तक लम्बा होता है लेकिन 60 से.मी. से ऊपर लम्बाई मिलना दूर्लभ है। यह छोटा और मोटा सांप होता है जिसका सिर बड़ा और पूँछ छोटी होती है। सॉ-स्केल्ड वाइपर की सभी प्रजातियों में से, यह उप-प्रजाति रंग और स्वरुप, और वैज्ञानिक वर्गीकरण में भिन्नताओं के लिए जानी जाती हैं। कुल मिलाकर यह सूखी सतह जैसा दिखता है जिसके कारण यह सूखे मैदान (रेत, चट्टानों, पत्ती कूड़े आदि) में किसी को आसानी से दिखाई नहीं देता है। इसका सिर त्रिकोणीय आकार का होता है जो गर्दन से स्पष्ट अलग दिखाई देता है। यह छोटे सूखे दिखने वाले कील स्केल्स (जिन स्केल में बीच में एक लंबाई के साथ एक सीधा उभार होता है जिसे छूने से भी अलग अहसास होता है) से ढका होता है। इसके सिर के शीर्ष पर एक लम्बी “प्लस या धन या त्रिशूल” आकार के निशान होते हैं जो इस सांप को पहचानने में मदद करने वाली विशेषता है। इसका ऊपरी शरीर (डॉरसल बॉडी) मूल रूप से मटमैले-भूरे रंग का होता है जिस पर रीढ़ के साथ-साथ 31-41 हल्के रंग के धब्बे होते हैं। इन धब्बों की दोनों तरफ लहराती हुई रेखाएं होती है जो स्पष्ट रूप से एक दूसरे को छूती नहीं है। इस सांप के सभी रूपों में इन धब्बों के बीच की जगह का रंग बाकी शरीर से ज्यादा गहरा होता है तथा शरीर की निचली सतह (उदर सतह/वेंट्रल बॉडी) पर छोटे गहरे भूरे या काले रंग के धब्बे हो भी सकते हैं और नहीं भी।
वैज्ञानिक वर्गीकरण से इस उप-प्रजाति में कुछ उल्लेखनीय चरित्र हैं जो वैज्ञानिक स्तर पर पहचान में मदद करते हैं, जैसे की 154-181 वेंट्रल, 27-34 सब-काडल, मध्य शरीर में 28-32 डॉरसल स्केल्स, 3-7 क्रमिक रूप से दांतेदार स्केल, सुस्पष्ट सुपरा-ऑक्युलर स्केल्स और आँखों व् सुपरा-लेबिअल के बीच 2 स्केल्स होते हैं। कैरिनैटस में उदर (वेंट्रल) स्केल्स सॉशुरेकी से कम होते हैं और आमतौर पर आँखों व् सुपरा-लेबिअल के बीच केवल एक ही स्केल होता है। सॉशुरेकी में दो धब्बो के बीच की खाली जगह गहरे रंग की होती है तो वहीं कैरिनैटस में ऐसा कुछ नहीं होता है। इसके अलावा कैरिनटस में 40 से.मी. से ऊपर लंबाई मिलना आम नहीं है, लेकिन सॉशुरेकी में यह आकार सामान्य रूप से पाया जाता है। अध्ययनों के अनुसार, सॉशुरेकी पश्चिमी भारत और पाकिस्तान व ईरान के पश्चिमवर्ती अधिक सूखे इलाकों के लिए अनुकूलित है, जबकि कैरीनेटस विभिन्न प्रकार के निवास स्थानों जैसे खुले जंगलों, झाड़ियों, शुष्क पर्णपाती जंगलों, प्रायद्वीपीय भारत के चट्टानी मैदानों में रहता है।
एकिस केरिनैटस सॉशुरेकी (Echis carinatus sochureki) सॉ स्केल वाइपर की अन्य उपप्रजाति की तुलना में तुलना में काफी बड़ा सांप होता है फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल
सॉ-स्केल्ड वाइपर में दिलचस्प पारिस्थितिकी देखने को मिलती है जो कि अन्य वाइपर प्रजातियों में से अलग है। सबसे पहले तो यह की यह सांप अन्य वाईपर की तुलना में छोटा होता है। इनके पास रेगिस्तान और अन्य शुष्क क्षेत्रों की कठिन मौसम में भी जीवित रहने की क्षमता होती है। हमने सॉशुरेकी को गुजरात के समुद्री तटों में भी देखा है जहाँ ताजा पानी उपलब्ध नहीं होता है। ये ज्यादातर स्थलीय हैं, लेकिन कांटेदार झाड़ियों में चढ़ने और यदि तापमान सही रहे तो कई दिनों तक वहां रहने की क्षमता रखते हैं। मैंने खुद व्यक्तिगत रूप से सॉशुरेकी के एक सांप को देखा है जिसने तटीय गुजरात में धातु की बाड़ पर 10 फीट ऊंचाई पर 25 दिन और रात से अधिक समय बिताया था। अन्य वाइपर (और पिट-वाइपर) के विपरीत, यह कई प्रकार के जानवरो को खाते हैं जैसे की चूहे, छिपकली, अपनी प्रजाति व अन्य प्रजाति के सांप और कीड़े आदि। बल्कि ये दोनों उप-प्रजातियाँ अकशेरुकीय और छिपकलियों पर सबसे अधिक निर्भर हैं। भोजन में विविधता होने के कारण यह उन क्षेत्रों में भी जीवित रह सकते हैं जहां खाद्य श्रृंखला में अच्छी संख्या में पौष्टिक शिकार नहीं हैं।
सभी एकिस(Echis) प्रजातियों की तरह, सॉशुरेकी में भी खतरे की परिस्थिति में एक विशिष्ट प्रकार का प्रदर्शन होता है जो इसे दुश्मन के सामने शक्तिशाली, सतर्क और चुस्त दिखाता है। यह अंग्रेजी के सी (C) के आकार की कुंडली बना लेता है तथा अपने स्केल्स को आपस में रगड़ कर एक ख़ास प्रकार की ध्वनि उत्पन्न करता है। यह ध्वनि 4-5 पंक्तियों में डॉरसल स्केल्स की अनूठी व्यवस्था द्वारा निर्मित होती है जहाँ ये लंबवत नहीं बल्कि 45 डिग्री के कोण पर जमे होते हैं।इसके अलावा, उनके तिरछे व्यवस्थित स्केल्स में लकीरें होती हैं (उन्हें तकनीकी रूप से कील्ड स्केल्स कहा जाता है) जो आरी की तरह दाँतदार होते हैं। बगल वाले डॉरसल स्केल्स में इस प्रकार के परिवर्तन से उन्हें कम ऊर्जा खर्च कर ध्वनि उत्पन्न करने में मदद मिलती है। यह संभवत: इन सांपों को उनके दुश्मन को बिना मुंह से हिस्स या फुंफकार की ध्वनि निकाले चेतावनी देने में मदद करता है जिसके लिए शरीर में पानी की अधिक आवश्यकता होती है। यह विशिष्ट रूप से चेतावनी-आक्रमण के प्रदर्शन के समय अपने सिर को स्थिर रखते हैं और बाकि शरीर को हिला कर ये ध्वनि उत्पन्न करते हैं। स्थिर सिर दुश्मन को काटने की स्थिति में सटीकता रखने में मदद करता है। इस सांप और अन्य सभी एकिस (Echis) प्रजातियों की हमला करने की गति बाकी सभी सांपो से तेज होती है। यह तेज गति चूहों और बिच्छू जैसे तेज व सतर्क शिकार को सफलतापूर्वक काटने और घातक जहर छोड़ने के लिए आवश्यक होती है। रेगिस्तानों में जहां छिपने के स्थान सीमित होते हैं और बहुत गहरे नहीं होते हैं, सॉशुरेकी को कांटेदार रेगिस्तानी वनस्पतियों की जड़ें और कृंतक टीले आश्रय के रूप में मिलते हैं। सॉशुरेकी का प्रजनन जीवंत है और यह सीधे जून से सितंबर के दौरान 3 से 23 संतानों को जन्म देता है। संभोग पुरुष युद्ध के बाद शुरू होता है, जहां ज्यादातर वाइपर की तरह दो वर्चस्व में दिलचस्पी लेने वाले और प्रजनन के लिए सक्षम नर अपने एक तिहाई अग्रभाग को उठाते हैं और पारस्परिक रूप से एक-दूसरे के सिर के ऊपर से एक-दूसरे को वश में करने की कोशिश करते हैं। सर्दियों के दौरान सॉशुरेकी गहरे टीले में छिपने लगते हैं।
भारत में व्यापक रूप से फैली हुई उप-प्रजाति एकिस कैरिनेटस कैरिनेटस(Echis carinatuscarinatus ) फोटो डॉ. धर्मेंद्र खांडल
सॉ-स्केल्ड वाइपर (उसकी दोनों उप-प्रजातियां) कुख्यात बिग-फोर के सदस्य हैं जो चार चिकित्सा की दृष्टि से महत्वपूर्ण विषैले सांप स्पेक्टाकल्ड स्पेक्टेकल्ड कोबरा (नाजा नाजा), रसल्स वाइपर (दबोइया रसेली), कॉमन क्रेट (बंगारस सिरुलियस) और सॉ-स्केल्ड वाइपर (एचिस कैरीनेटस) के सदस्य हैं। ये सभी भारतीय उपमहाद्वीप में व्यापक रूप से फैले हैं। सांप के काटने से होने वाली मौतों और सर्पदंश संबंधी विकलांगता के लिए ये सांप ही जिम्मेदार हैं। हालाँकि, हाल के अध्ययनों में यह पाया गया है कि एचिस कैरीनेटस से काटने की घटनाएं इसके आवास वाले क्षेत्रों में इतनी आम नहीं हैं। लेकिन सॉशुरेकी की सीमा में, अन्य विषैले सांप आमतौर पर नहीं पाए जाते हैं और यह सॉशुरेकी को सबसे प्रमुख चिकित्सकीय दृष्टि से महत्वपूर्ण साँप बनाता है। मानसून और गर्मियों के महीनों के दौरान काटने की घटनाएं बढ़ जाती हैं जब साँप भोजन और प्रजनन के लिए सबसे अधिक सक्रिय होता है। ज्यादातर दंश तब होता है जब पीड़ित इनके क्षेत्र में नंगे पांव चलते हैं और अनजाने में सांप पर कदम रखते हैं। कुछ मामलों में, जमीन पर सोने वाले लोगों को भी सर्पदंश हुआ है। आक्रामक और संभावित घातक साँप होने के बावजूद कभी-कभी कम विष की मात्रा के कारण इसके दंश घातक नहीं होते हैं और पीड़ित अपनी प्रतिरक्षा के बूते ठीक हो जाता है। इस कारण से सर्पदंश ठीक करने के वैज्ञानिक रूप से अप्रभावी या अष्पष्ट तौर तरीकों को खुद को सही साबित करने का मौका मिल जाता है क्योंकि पीड़ित तो खुद के मजबूत प्रतिरक्षा या विष की कम मात्रा से खुद ही ठीक हो जाते हैं।
दुर्भाग्य से इस तरह के प्रतिरोध आधारित शरीर के ठीक होने के प्रयासों से पीड़ित व्यक्ति के गुर्दे की प्रणाली को नुकसान पहुंच सकता है क्योंकि वाइपर के काटने से रक्त और ऊतकों को गंभीर रूप से नकारात्मक प्रभाव जाता है, और गुर्दे की विफलता / क्षति इन मामलों में एक सामान्य परिदृश्य है, जो कि जल्दी नजर में नहीं आते हैं।
सामान्यतया शुष्क माना जाने वाला राज्य राजस्थान विविध वन्यजीवों एवं वनस्पतियों से सम्पन्न है। इस लेख में राजस्थान के दक्षिणी हिस्सों में पायी जाने वाली उड़न गिलहरी के बारे में बताया गया है। वैसे तो उड़न गिलहरी भारत केबड़े पर्णपाती एवं विशाल वृक्षों वाले जंगलोंमेंपायी जातीहै लेकिन इन राज्यों की भौगोलिक सीमाओं से दूरइसका राजस्थान में मिलना उल्लेखनीय है। प्रस्तुत लेख में डॉ. विजय कुमार कोली ने राजस्थान में उड़न गिलहरी की वर्तमान स्थिति, पर्यावास एवं व्यवहार के बारे में विस्तार से बताया है। डॉ. विजय कुमार कोली ने अपनी डॉक्टरेट की उपाधि के लिए शोधकार्य (Ph.D.) उड़न गिलहरी पर ही किया है।
भारत में तीन प्रकार की गिलहरी पायीं जाती हैं जिनमे पांच धारीवाली छोटी गिलहरी (Five-striped Palm Squirrel), तीन धारीवाली गिलहरी (Three-striped Palm Squirrel) एवं उड़न गिलहरी (Indian Giant Flying Squirrel) शामिल हैं। उड़न गिलहरी एक रात्रिचर स्तनधारी है जो पेड़ों पर रहती है। भूरे रंग की यह गिलहरी पेड़ों की शाखों पर ग्लाइड करने में माहिर होती है। इसे दक्षिणी राजस्थान के जंगलों में देखा जा सकता है। शाम होने पर यह अपने आवास से बाहर निकलती है और सुबह होने तक पेड़ों पर सक्रीय रहती है। भारत में पायी जाने वाली 15 प्रकार की उड़न गिलहरियों में से केवल यह राजस्थान में पायी जाती है। इसकी लम्बाई1मीटर से भी अधिक ( लगभग104.0 सेंटीमीटर ) होती है जिसमें से पूँछ की लम्बाई 50.0 सेंटीमीटर से भी ज्यादा होती है जबकि इसका वजन 1Kg से 2.5Kg तक हो सकता है। वयस्क गिलहरी में ऊपर का हिस्सा कहीं कहीं से हल्की सफेदी लिए ग्रिजल्ड ब्राउन या क्लैरट ब्राउन होता है। इसके पैराशूट एवं आगे की भुजाएं भूरी होती हैं। नीचे का हिस्सा हल्की सफेदी लिए होता है। चेहरा भूरा और कालापन लिए होता है इसकी घनी पूँछ आखिरी छोर पर कालापन लिए हुए शरीर से भी लम्बी होती है। पैरों का रंग काला होता है इसके रंग में उम्र के साथ हल्के बदलाव होते रहते हैं।
इस गिलहरी की आबादी छितरायी हुई राजस्थान के दक्षिणी चार जिलों प्रतापगढ़,उदयपुर,डूंगरपुर,एवं बांसवाड़ा में देखने को मिलती है। प्रतापगढ़ के सीतामाता एवं उदयपुर के फुलवारी की नाल वन्यजीव अभ्यारण्य के संरक्षित क्षेत्रों में यह अच्छी खासी संख्या में विद्यमान है। यह उप सदाबहारीय एवं घने जंगलों में अधिकतर महुआ के पेड़ों पर रहना पसंद करती है।महुआ के तने इसके आवास के लिए उपयुक्त होते हैं। महुआ समेत बरगद एवं कदम्ब जैसे पेड़ों की ऊँची टहनियों से यह आराम से ग्लाइड कर लेती हैं। प्रजनन काल के दौरान नर व मादा दोनों इस तने पर बने आवास में रहते हैं लेकिन जन्म देने के बाद नर गिलहरी इसे छोड़ देती है और इसमें केवल मादा अपने बच्चे के साथ रहती है। कुछ महीनों के बाद मादा भी इस कोटर को छोड़ देती है और पास ही किसी अन्य पेड़ पर बने कोटर में रहने लगती है। यह पेड़ो के ऊपरी स्थानों से नीचे की जगहों पर ग्लाइड करती है ।
दक्षिणी राजस्थान में उड़न गिलहरी का वितरण
इस प्रजाति में एक विशेष झिल्ली की तरह की संरचना पेटेजियम होती है जो की हाथों से पैरों की और फैली हुई होती है। यह शरीर का बहुत लचीला हिस्सा होता है। ग्लाइड करने के कारण यह आने जाने में व्यय होने वाली अपनी बहुत सी ऊर्जा को बचा लेती है साथ ही शिकारियों के हमले से भी बच जाती है और भोजन की नयीं संभावनाएं बिना थके तलाश लेती है।पीछे की और धक्का देकर यह अपनी ग्लाइड की दूरी को आगे बढाती है। जब यह हवा में गोते लगाती है तो इसके पैरों व हाथों से लगी झिल्लीनुमा पैराशूट खुल जाता है जो इसे दिशा देने में सहायता देता है।उतरने के दौरान पहले यह पेड़ के मुख्य तने को अगले हाथों से पकड़ती हैं और फिर पिछले हाथों की मदद लेती हैं।नीचे उतरने चढ़ने में और पकड़ बनाने में इसके तीखे नुकीले पंजे बहुत मदद करते हैं।सामान्यतया यह एक निश्चित मार्ग पर ही आवाजाही करती है। यह अधिकतम 90 मीटर तक ग्लाइड कर सकती है लेकिन सामान्यतया यह 10 से 20 मीटर ही ग्लाइड करती है।बारिश में यह विचरण नहीं करती है।
यह बदलते हुए मौसम में खुद को ढाल लेती है और मौसम के अनुसार ही भोजन चुनती है। तना,टहनियां, पत्तियां, कलियाँ, फूल, फल, बीज इसके भोजन हैं। पिथ इसके भोजन का मुख्य भाग होता है। महुआ, बहेड़ा (Terminalia bellirica), (Terminalia tomentosa) एवं टिमरू (Diospyros melanoxylon) के पेड़ इसके भोजन एवं आवास के लिए सबसे उपयुक्त होते हैं।
सीतामाता अभ्यारण्य में उड़न गिलहरी के आवास चित्र :डॉ. विजय कुमार कोलीपीपल की टहनी का पिथ खाने के बाद छोड़ी गयीं पत्तियां चित्र : डॉ. विजय कुमार कोली
यह एक निशाचर जीव है जो कोटर से शाम 7 बजे के बाद निकलती है एवं सुबह 6 बजने तक वापस कोटर में चली जाती है। सर्दियों के समय में इसे दिन के समय अपने कोटर केआसपास धूप सेकते हुए देखा जा सकता है।इसकी गतिविधियां सबसे ज्यादा रात के 6 से 11बजे एवं 2 से 6 बजे के बीच देखीं जा सकतीं हैं। रोशनी पड़ने पर यह बिना हिले डुले एक जगह बैठ जाती है। रात को यह आवाज के माध्यम से दूसरी गिलहरियों के बीच संवाद स्थापित करती है औरआवाज से ही प्रजनन काल में ये जोड़े बनाती हैं। इनकी आवाज मध्यरात्रि को या अल सुबह कोटर में जाने से पहले सबसे ज्यादा सुनी जा सकती है। शिकारियों से बचने के लिए यह घने पेड़ों में बैठकर आवाज निकालती है। सुबह के समय इनकी आवाज आसानी से सुनी जा सकती है।
रात के समय पेड़ के तने पर आराम करती हुई उड़न गिलहरी चित्र : डॉ. विजय कुमार कोली
इस क्षेत्र में गर्मियों से पहले का समय इनका प्रजनन काल होता है। नए बच्चे का जन्म और देखभाल इन्हीं कोटरों में होता है। हालाँकि IUCN की रेड डाटा बुक के अनुसार यह प्रजाति संकटमुक्त की श्रेणी में रखी गयी है लेकिन राजस्थान के पश्चिमी हिस्से में इसकी संख्या धीरे धीरे कम होती जा रही है।आदिवासियों द्वारा इनका शिकार, बढ़ता शहरीकरण, उद्योगों के लिए वनों का कटाव इस प्रजाति के भविष्य के लिये चुनौतियाँ हैं।भील एवं गरासिया जनजातियां भोजन,रीति रिवाजों एवं अन्धविश्वास के नाम पर इनका शिकार कर रहे हैं। ये लोग इन मृत गिलहरियों के कंकाल,हड्डियां एवं बालों को अपनी झोपड़ियों में रखते हैं। कमजोर बच्चों का वजन बढ़ाने में इनकी हड्डियों के टुकड़े करके गले में बंधा जाता है।जंगलों से होकर निकलने वाले राजमार्गों से भी गिलहरी की यह प्रजाति नकारात्मक रूप से प्रभावित हुई है।राजस्थान में पायी जाने वाली इस उड़न गिलहरी के संरक्षण एवं विकास के लिए महुआ,बहेड़ा एवं कदम्ब के पेड़ों की कटाई रोकने के प्रयास किये जाने चाहिए। साथ ही उड़न गिलहरी मिलने वाले जिलों में आदिवासियों के साथ जागरूकता कार्यक्रम चलाये जायें जिससे इनके शिकार पर अंकुश लग सके।
For further study:
Koli VK, Bhatnagar C, Sharma SK (2013). Food habits of Indian Giant Flying Squirrel (Petaurista philippensis Elliot) in tropical deciduous forests, Rajasthan, India. Mammal Study 38(4): 251-259.
Koli VK, Bhatnagar C (2014). Calling activity of Indian Giant Flying Squirrel (Petaurista philippensis Elliot, 1839) in the Tropical deciduous forests, India. Wildlife Biology in Practice, 10(2): 69-77.
Koli VK, Bhatnagar C (2016). Seasonal variation in the activity budget of Indian giant flying squirrel (Petaurista philippensis) in tropical deciduous forest, Rajasthan, India. Folia Zoologica 65(1): 38-45.
Koli VK (2016) Biology and Conservation status of flying squirrels (Pteromyini, Sciuridae, Rodentia) in India: an update and review. Proceedings of the Zoological Society, 69(1): 9-21.
Koli VK, Bhatnagar C, Sharma SK (2013). Distribution and status of Indian Giant Flying Squirrel (Petaurista philippensis Elliot) in Rajasthan, India. National Academy Science Letter 36(1): 27-33.
Koli VK, Bhatnagar C, Mali D (2011). Gliding behaviour of Indian Giant Flying Squirrel Petaurista philippensis Elliot. Current Science, 100(10): 1563 – 1568